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कहानी

मेमने की चीख
आशा पांडेय


रात आधी से अधिक बीत गई है, पर चौधरी बिस्तर पर करवट ही बदल रहे हैं। भुलई काका के खखारने की आवाज आई तो चौधरी उठकर बिस्तर पर बैठ गए। कोई और दिन रहा होता तो भुलई काका के खखारने के बाद चौधरी भी खखारकर अपने जगे होने का सबूत दे देते, किंतु आज उनका मन बहुत विकल है। रीढ़ चिलक रही है उनकी। सीधे खड़े होना मुश्किल है। वैसे वार उनके दिल पर हुआ था, पर न जाने कैसे दर्द रीढ़ में फैल गया और इतने गहरे फैल गया कि लगता है अब कभी तन कर खड़े नहीं हो पाएँगे चौधरी।

सिरहाने चौकी पर लोटे में पानी ढक कर रखा है। चौधरी ने लोटा उठाकर दो घूँट पानी पिया, फिर से ढक कर उसे रख ही रहे थे कि बत्ती चली गई। दालान में अँधेरा फैल गया। तकिया के नीचे से टार्च निकालकर चौधरी ने एक बार उसे जलाया। लोटे को ढक कर चौकी पर रखा, फिर टार्च बुझाकर लेट गए। दर्द की एक लहर फिर उठी जो रीढ़ से होकर दिल में उतर गई।

ऐसा नहीं है कि बच्चों से मिला ये पहला वार है। इसके पहले प्रकाश और विकास ने, जिन्हें, वकालत की पढ़ाई के लिए चौधरी ने शहर भेजा था और जिनके वकील बनते ही वे गर्व से तन गए थे, गैर बिरादरी की अपनी-अपनी सहपाठिनों से विवाह कर, वहीं शहर में ही बस गए। चौधरी को नाराज होने या उन दोनों के लिए घर का दरवाजा बंद कर देने की धमकी देने का मौका भी नहीं मिला, क्योंकि अपनी शहरी पत्नियों की परेशानी को देखते हुए वो दोनों स्वयं ही गाँव के गँवारूपन से अपनी दूरी बना लिए। चौधरी का छोटा बेटा सुभाष जो गाँव में उनके साथ ही रहता है उसकी शादी यूँ तो चौधरी की मर्जी से बिरादरी में ही हुई किंतु बहू तेज मिजाज की है। शादी के साल भर बाद ही लड़-झगड़ कर अलग चूल्हा जला ली और जब तब किसी न किसी बात को पकड़कर चौधरी के सात पुश्तों को न्योतना शुरू कर देती है

किंतु नालायक बेटों की नालायकी से अथवा नाकिस बहू की उद्दंडता से चौधरी के रुआब में कोई कमी नहीं आई है। आज भी जब वे अपनी रौबदार मूँछों को ऐंठते हुए कड़क आवाज में पंचायत का फैसला सुनाते हैं तो गाँव पवस्त के लोग अदब से सिर झुका देते है। ...लड़कों की जाति है, इधर-उधर कुछ कर भी लिए तो उससे नाक कटती है भला!

लेकिन अब ये नया पेंच!

कितना तीखा बोल लेती है हंसा!

रात को, खाना परोसते हुए हंसा की माँ ने धीमी आवाज में चौधरी से कहा - 'हंसा के बाबू, मैं सोच रही हूँ, हंसा का दूसरा ब्याह कर देना चाहिए।'

चौधरी सिर उठा कर पत्नी को देखने लगे - माँएँ ऐसी ही होती हैं, बेचारी! बच्चों का दुख उनसे देखा ही नहीं जाता - रोटी का कौर तोड़ते हुए चौधरी ने कहा, 'दूसरा ब्याह? क्या बोल रही हो? दूसरा ब्याह आसान नहीं है हंसा की माँ, एक बेटे की माँ है हंसा। मोहन बारह साल का हो गया है, अब कौन करेगा हंसा से ब्याह?

'आसान है हंसा के बाबू, तभी कह रही हूँ ...अपने मास्टर करेंगे हंसा से ब्याह।'

'क्या?' कौर अटक गया चौधरी के गले में। गिलास उठाकर पानी पिए। एक-दो लंबी साँस लिए। फिर पत्नी से पूँछे, 'तुमसे कहा मास्टर ने?'

'नहीं, हंसा से'।

'हंसा से?' फिर चौके चौधरी। 'हंसा से ऐसी बातें करता है मास्टरवा!' ...दोनों में ये सब बातें होती हैं! तुम जानती हो सब!' चौधरी की आवाज तेज हो गई।

'धीरे बोलो हंसा के बाबू, बेटी का मामला है ...सुभाष बहू हरदम कान पारे रहती हैं। सुन लेंगी तो पूरे गाँव में खबर फैला देंगी। हंसा बदनाम हो जाएगी। ...मुझे कुछ नहीं पता था, चार-पाँच दिन पहले हंसा ने ही मुझे बताया। कह रही थी कि बाबू तैयार हो जाएँ तो मास्टर उससे ब्याह करने को राजी है'।

'हूँ' क्रोध से हुंकार भरी चौधरी ने ...तो हर दूसरे-तीसरे दिन इसलिए यहाँ आकर बैठता था मास्टरवा! और मैं सोचता था कि मुझसे मिलने आता है।'

'हर्ज क्या है हंसा के बाबू?' ...अपने से ऊँच जाति का है ...सहारा मिल जाएगा हंसा को।' बात पूरी होते-होते हंसा की माँ की आवाज कातर हो गई।

'पगला गई हो क्या? ऊँच जाति का है तो क्या हुआ? जाति बिरादरी का तो नहीं है। जाति से बाहर? दूसरा ब्याह? सोचा कैसे तुमने? मोहन बड़ा हो रहा है अब वही बनेगा हंसा का सहारा, समझीं।' थाली में रखे चावल में दाल की कटोरी पलट कर मिलाने लगे चौधरी।

'अपने भी तो तीन बेटे है हंसा के बाबू, देंगे हम लोगों को सहारा? कर सकते है उनसे कोई उम्मीद? अरे, बेटा अपनी जिंदगी जिएगा कि...

'बस्स, चुप्प, ...अब एकदम चुप रहना ...कुछ भी बोल रही हो? ...मास्टरवा से हंसा का ब्याह करके मुझे पूरे गाँव में अपनी भद्द नहीं पिटवानी है, समझी तुम। ...और आज के बाद ये बात तुम माँ बेटी के दिमाग से निकल जानी चाहिए।' चौधरी का चेहरा क्रोध से लाल हो गया। भोजन पूरा होना अभी बाकी था, किंतु चौधरी थाली खिसका कर उठ गए। आँगन में आकर हाथ मुँह धोए और बाहर जाने के लिए मुड़े ही थे कि हंसा उनके सामने आकर उन्हें सुनाते हुए माँ से बोली, 'बाबू पूरी जिंदगी मुझे रोते हुए ही देखना चाहते हैं अम्मा, पर अब मैं नहीं रोऊँगी ...मेरी खुशी नहीं देख सकते तो न देखें, पर अब अपने आँसू भी नहीं देखने दूँगी ...मेरी पूरी जिंदगी बरबाद कर दिए फिर भी चैन नहीं मिला इन्हें।' चौधरी हंसा की बात सुनकर भौंचक्के थे। पहली बार इस तरह की जुबान चलाई थी हंसा ने। गुस्से से काँप रही थी वह। चौधरी कुछ बोलते उसके पहले ही हंसा की माँ हंसा को पकड़ कर खीचते हुए कमरे में लेकर चली गईं। चौधरी कुछ देर अवाक आँगन में खड़े रहे फिर चुपचाप बाहर चले गए।

गाँव में आठवीं तक का स्कूल है। इसी स्कूल में साल भर पहले ये मास्टर बदली होकर आया है। उसका घर यहाँ से दूर है। इसलिए स्कूल में ही रुकने लगा है। पढ़ने में कमजोर बच्चों को रात में स्कूल में बुलाकर घंटे दो घंटे पढ़ाता है। मोहन भी मास्टर के पास पढ़ने जाता है। चौधरी को मास्टर ईमानदार और मेहनती लगता है इसलिए वे मास्टर को पसंद करते हैं। मोहन की पढ़ाई-लिखाई के कारण हंसा की भी बातचीत मास्टर से हो जाती है। लेकिन ये बात-चीत यहाँ तक पहुँच गई!! अचरज में हैं चौधरी।

उस दिन से घर में सब चुप-चुप ही रह रहे थे। एक मोहन था जिसकी शरारतें घर में कुछ आवाजें पैदा करती थीं, किंतु एक दिन वह बीमार पड़ गया और हफ्ते भर के बुखार में ही चल बसा।

वज्र टूट पड़ा हंसा के ऊपर। सिर्फ बेटा ही नहीं जीवन के बचे-खुचे सपने भी मर गए उसके।

मोहन को जमीन पर लिटा दिया गया है। हंसा की माँ मोहन के पास बैठी सिसक रही है। कुछ दूर बैठी हंसा मोहन को एकटक देख रही है। जैसे अभी धरती फट पड़ेगी और पूरा गाँव उसमें समा जाएगा, डरे सब ऐसे ही हैं। किंतु हंसा सूखी आँखें लिए बैठी है। हंसा का ये रूप चौधरी को दोहरी पीड़ा दे रहा है। इतने बड़े दुख में भी बगावत का ये रूप! भीड़ से कुछ दूर आम के पेड़ के पास खड़ा मास्टर हंसा को देख रहा है। आँखें उसकी लाल हो गई हैं।

शंकर अभी-अभी पहुँचा है वहाँ। साइकिल की हैंडिल से झोला उतारकर चौधरी को पकड़ा दिया। चौधरी बेजान हाथों से झोला पकड़ लेते हैं, झोले के अंदर कुछ टटोलते हुए धीरे से कफन बाहर निकालते हैं और उसी में मुँह छिपाकर फफक पड़ते हैं। भीड़ से भी रोने का हृदय विदारक स्वर उठता है।

हंसा अब भी खामोश बैठी है।

चौधरी के बगल में ही सुभाष बैठे हैं। आँखें भरी हैं उनकी।

अंतिम यात्रा पर ले जाने के लिए मोहन को नहलाया-धुलाया जा रहा है। हंसा वहाँ से उठकर भीतर गई। अपने बक्से से एक नई कमीज निकाली। महीने भर पहले मोहन मास्टर के साथ बाजार गया था। मास्टर ने ही ये कमीज उसके लिए खरीदी थी। घर आकर मोहन ने इसे पहन कर देखा था और खुश हुआ था कि इसकी जेब कुछ बड़ी है, इस बार दीवाली में चीनी के एक-दो हाथी, घोड़े और समा जाएँगे इस जेब में।

हंसा कमीज लेकर बाहर आई। मोहन के पास जाकर उसे पहनाने लगी। शरीर कड़ा हो गया है अब। पहनाना मुश्किल हो रहा है। हारकर उसने कमीज को मोहन के ऊपर ओढ़ा दिया और माथा चूम कर वहाँ से हट आई। मास्टर जो दूर खड़ा हंसा को कमीज पहनाते देख रहा था फूट-फूट कर रो पड़ा। चौधरी सिर नीचे किए बैठे थे। मास्टर की रोने की आवाज सुने तो सिर उठाकर उसकी ओर देखने लगे। दिल में अजब-सी हलचल उठी उनके।

फौलादी दिल पाया था चौधरी ने। हारना कभी जाने ही नहीं। दर्द पर दर्द पाते रहे पर बाहर उसे छलकने नहीं दिया। लेकिन आज कलेजा कड़ा करना कठिन हो रहा है चौधरी के लिए। अग्नि संस्कार से लौटने के बाद से वे एकदम गुमसुम पड़े है दालान में।

हंसा चौधरी की तीसरी संतान है। तीन बेटे भी हैं उन्हें, दो हंसा से बड़े, एक हंसा से छोटा। तीन बेटो के बीच अकेली हंसा सबकी लाड़ली थी। लाड़-प्यार अकारण नहीं था। होनहार भी बहुत थी हंसा।

जब वह आठवीं में थी तो डिस्ट्रिक टूर्नामेंट में उसका स्कूल भी प्रतिभागी हुआ था। आठ सौ मीटर की दौड़, चार सौ मीटर की दौड़, सौ मीटर की दौड़ तथा निबंध लेखन प्रतियोगिता में हंसा पूरे जिले में प्रथम आई थी। खो-खो में हंसा की टीम तीसरे स्थान पर रही। सबसे उल्लेखनीय बात ये रही कि पूरे जिले के सैकड़ो स्कूल वहाँ उपस्थित थे, किंतु समापन समारोह में कलेक्टर के सामने राष्ट्रगीत गाने का मौका हंसा को मिला। स्कूल की अध्यापिकाएँ हंसा से खुश थीं। चौधरी ने हंसा को गले से लगाकर रुँधी आवाज में बस इतना कहा कि, 'तू बेटा होकर क्यों नहीं पैदा हुई हंसा?'

बेटी होकर पैदा हुई होनहार हंसा की पढ़ाई आठवीं के बाद बंद हो गई। गाँव में आठवीं तक का ही स्कूल था। आगे की पढ़ाई के लिए गाँव से बाहर जाना पड़ता। चौधरी ने कहा, 'भले घर की लड़कियाँ दर-दर भटकती नहीं है, तुम दसवीं का प्राइवेट फार्म भर देना।'

हंसा ने दसवीं का प्राइवेट फार्म भर दिया। इसी बीच चौधरी उसकी शादी खोजना शुरू कर दिए थे और हंसा की भाग्य (?) देखो कि दो गाँव आँतर ही एक खानदानी परिवार मिल भी गया चौधरी को।

ब्याह तय करके चौधरी खुशी-खुशी घर लौटे। खुश हंसा की माँ भी बहुत थीं। पानी का गिलास चौधरी को पकड़ा कर उनकी खटिया के पास ही जमीन पर बैठ गईं। पानी पीकर चौधरी ने कंधे पर पड़े अगौछे से मुँह पोछा फिर खुशी से चमकती आँखों से पत्नी की ओर देखकर बोले, 'राज करेगी तुम्हारी हंसा, दो ट्रैक्टर की खेती है। मकान तो ऐसा कि पूछो मत, लगता है जैसे महल खड़ा हो। ...दरवाजे पर छे-सात जर्सी गाय बँधी हैं।' हंसा की माँ गद्गद होकर सुन रहीं थीं।

'सुभाष कह रहे थे कि आठवीं फेल है लड़का, वहाँ जाओ ही मत शादी की बात करने।'

'आठवीं फेल? 'करंट-सा लगा हंसा की माँ को।

हाँ तो इसमें इतना चौंकने की क्या बात है? ...पढ़ा-लिखा नहीं तो क्या हुआ, हजारों में एक है लड़का। इतनी कम उम्र में ही पूरे पवस्त में उसकी धाक है। दूर-दूर तक के गाँवों में पंचायत के लिए बुलाया जाता है और निर्णय तो ऐसा देता है कि दस मजिस्ट्रेट पानी भरें उसके आगे।

'तो भी हंसा के बाबू, जमाना बदल गया है। हंसा को ये गाँव में धाक वाला लड़का पसंद आएगा? अपने बेटे इतना पढ़े-लिखे हैं और दामाद आठवाँ फेल! ...मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।

'अपने लड़के ससुर पढ़-लिख कर कौन-सा मेरा सिर ऊँचा कर दिए हैं? उठा तो लाए शहर से मेम।'

'पर हंसा को ये पसंद...

'शादी कहाँ होगी, अब ये हंसा तय करेगी? 'हंसा की माँ की बात बीच में ही काट कर चौधरी गरज पड़े। ...हंसा का बाप हूँ मैं, मुझे पता है हंसा के लिए क्या ठीक है, क्या गलत समझीं?' हंसा की माँ चुप हो गई। चौधरी के गुस्से के आगे हंसा की माँ एक शब्द नहीं बोल पाती हैं।

दसवीं की परीक्षा नजदीक थी। हंसा परीक्षा की तैयारी में जुटी थी और चौधरी ब्याह की। ठीक हिंदी के पेपर वाले दिन ब्याह का मुहूर्त निकला। हंसा बहुत रोई। हंसा को रोता देखकर चौधरी लड़केवालों से विवाह को एक माह आगे बढ़ाने की विनती भी कर आए। किंतु लड़केवाले इसी माह में विवाह करना चाहते थे और इस माह में शुभ मुहूर्त बस यही एक था। अंत में चौधरी ने हंसा से कहा, 'अगले साल फिर से तुम्हारा फार्म भरवा दूँगा बिटिया, तब दे लेना परीक्षा। इतना अच्छा घर-बार रोज-रोज नहीं मिलता।' फिर हँसकर बोले, 'पा रही हो रानी का सिंहासन और रो रही हो दसवीं की परीक्षा देने के लिए।'

हंसा अच्छे घर की अच्छी लड़की की तरह चुप रह गई। आठवीं फेल लड़के की पत्नी दसवीं की परीक्षा दे, ये भी तो अच्छा नहीं लगता। न जाने कैसे हंसा को ये बात भी समझ में आ गई और फिर उसने कभी भी दसवीं का फार्म नहीं भरा, ना ही पढ़ाई के लिए रोई। अलबत्ता अब वो ये समझने में लग गई कि ससुराल की डगर आसान नहीं है।

हंसा के माँ-बाप जिस राजा महाराजा के घर में बेटी की शादी करके गद्गद हो उसके भाग्य को सराह रहे थे उसी राजा महाराजा के घर में बात-बात पर उसके माँ-बाप को कंगाल घोषित कर दिया जाता था। सुनकर हंसा छटपटा जाती थी। एकदिन अपनी सास से उसने कहा, तुम लोगों के पास बहुत धन है अम्मा, पर मेरे माँ-बाप भी इतने गए-गुजरे नहीं हैं। बात-बात पर उन्हें नीचा मत दिखाया करिए। क्या इसीलिए आपने ये शादी की थी कि मेरे माँ-बाप की हँसी उड़ा सकें?'

सास बिफर पड़ी। नई-नवेली दुल्हन के ये तेवर! जबान चलाना भी आता है इसे! अभी से नहीं रोका गया तो बहुत बढ़ जाएगी ...शाम तक ससुर, देवर, पति सबके पास नमक मिर्च लगा कर पहुँचाई गई हंसा की बात। धाकड़ पति को, पत्नी की बदजुबानी नहीं भाई। उसने धड़ाधड़ कई हाथ जड़ दिए तथा धक्का देकर दनदनाता हुआ बाहर निकल गया। हंसा की चूड़ियाँ टूटकर कोठरी में बिखर गईं। कलाई में कई जगह जख्म हो गया। कुछ देर पड़ी रही हंसा उसी हाल में। जब आँखों के आँसू सूख गए तब खुद ही उठी, टूटी चूड़ियों को इकठ्ठा कर फेंक आई, कलाई पर सूख गए खून के धब्बे को साफ की और घर के काम में लग गई।

अब ये सिलसिला चल निकला। हंसा जब-तब पति की मार खा जाती। धीरे-धीरे हंसा भरी जवानी में ही पीली पड़ने लगी। मायके जाती तो वहाँ माँ-बाप को इस खुशी में डूबा पाती कि, बेटी बड़े घर की बहू बनी है। हंसा माँ-बाप से आप बीती बताने की हिम्मत ही न कर पाती। एकाध बार माँ से दबी जुबान कहना भी चाही, पर माँ ने कहा, आदमी की जात, गुस्सा करने की आदत होती है। उन्हें प्यार से अपने बस में करना चाहिए। हंसा चुप हो गई।

शादी के दो साल बाद हंसा गर्भवती हुई। तीन-चार महीने बीत गए तो पति उसे लेकर अस्पताल गया, जाँच कराने। अल्ट्रासाउंड में बेटी होने की जानकारी मिली तो गर्भपात करा दिया। हंसा को बताया कि बच्चा विकलांग हो सकता था इसलिए डॉक्टर ने गर्भपात का निर्णय लिया। किंतु घर में होने वाले खुसुर-फुसुर से हंसा धीरे-धीरे ये जान गई कि उसके साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ है। अब वह सतर्क रहने लगी।

जब वह दूसरी बार गर्भवती हुई तो डॉक्टर के पास जाकर जाँच कराने का पुरजोर विरोध किया। खूब लड़ाई-झगड़ा होता, कभी-कभी मार भी खाती लेकिन हंसा अपनी जिद पर अड़ी रही। एक दिन इसी कहा-सुनी के बीच उसके पति ने चूल्हे पर उबल रहे दूध को हंसा के सिर पर उलट दिया। वह बुरी तरह जल गई। हंसा के चिल्लाने की आवाज सुनकर उसकी सास दौड़कर रसोई में आई। हंसा की हालत देखकर घबरा गई और रसोई में रखी पानी की बाल्टी हंसा के ऊपर उड़ेल दी। ठंडा पानी पड़ते ही पीठ, हाथ, कमर में पड़े बड़े-बड़े फफोले शरीर छोड़कर लटक गए।

उड़ते-उड़ते ये खबर चौधरी तक पहुँची। चौधरी हंसा की ससुराल आए। बेटी की हालत देखकर उनका मन चीत्कार कर उठा। हंसा के सास-ससुर से खूब झगड़ा हुआ। चौधरी पुलिस रिपोर्ट करने जा रहे थे, गाँव वालों ने उन्हें समझा-बुझा कर शांत किया। वैसे चौधरी ये बात भी जानते थे कि पुलिस-दरोगा सब इन्हीं लोगों की सुनेंगे। पैसा बड़ा होता है, गुनाह नहीं। दुखी चौधरी हंसा को साथ लेकर घर लौट आए। तीन-चार महीने तक उसका इलाज हुआ तब जाकर वह ठीक हुई। गर्दन और पीठ पर आज भी जले का निशान बचा है।

इस बार हंसा को बेटा हुआ। हंसा की ससुराल वाले बेटा होने की खबर से उत्साहित हो गए और हंसा को वापस बुला लेने का प्रयास करने लगे किंतु चौधरी अड़े रहे। जल्लादों के घर में वे अपनी बेटी को दुबारा नहीं भेजना चाहते थे। यूँ हंसा के मन में भी उस घर में लौटने की कोई उत्कट इच्छा नहीं थी किंतु वह ये भी नहीं चाहती थी कि उसका बच्चा अपने पिता और अपने घर से दूर रहे। वह अपने बेटे के लिए उस घर में लौटना चाहती थी किंतु चौधरी ने हंसा की दलील को कभी सुना ही नहीं। अब ये मुद्दा चौधरी की नाक का हो गया था। कुछ दिनों के बाद हंसा के ससुराल वाले भी चुप बैठ गए और हंसा यहीं मायके में रह गई। बाद के दिनों में ये खबर मिली कि हंसा के पति ने दूसरी शादी कर ली।

चौधरी करवट बदल कर उठ बैठे। शरीर पसीने से तर हो गया है। सुबह दस बजे से ही बिजली गुल है। सिरहाने रखे अंगोछे से हवा करते हुए सोचे, पहले का जमाना ही अच्छा था, आदत तो नहीं पड़ी थी बिजली की। पंखी-बेना के सहारे दुपहरिया बीत जाती थी। एक उचटती हुई नजर पंखे पर डाली चौधरी ने - जब पहले-पहल गाँव में बिजली आई थी तब बड़े चाव से खरीदकर लाए थे वे ये पंखा। इसे यूँ टँगा देखकर और गर्मी लगने लगती है।

दालान से बाहर निकलने के लिए चौधरी खटिया से उठे ही थे कि सुभाष धड़धड़ाते हुए दालान में घुसे, 'बाबू ये हम क्या सुन रहे हैं? मास्टरवा दीदी से ब्याह करने की सोच रहा है? ...ऊ ससुरे की इतनी हिम्मत! इतना आगे सोच लिया वो?'

'कौन कह रहा था?' चौधरी सकपकाए, कहीं गाँव में खबर फैल तो नहीं गई है।

'अम्मा, ...वो तो चाह रहीं हैं कि, हो जाए दीदी का ब्याह मास्टरवा के साथ, दीदी को सहारा मिल जाएगा। ...मोहन के मरने के बाद अम्मा भी पगला गईं है न, अच्छा-बुरा कुछ समझ ही नहीं पा रहीं हैं। कह रहीं हैं, आन बिरादरी का है तो क्या हुआ अपने से तो ऊँच ही है। ...पर बाबू, अगर तुम ये फैसला लोगे तो मैं बर्दास्त नहीं कर पाऊँगा। अम्मा कह रहीं हैं कि अपने बाबू को समझाओ कि मान जाएँ और कर दें ब्याह पर मैं तुम्हें कह रहा हूँ बाबू कि ये बिचार मन में भी मत लाना। अम्मा का क्या, बुढ़ा गई हैं। ...तुम लोगन की तो अब बीत गई बाबू, मुझे तो अभी इसी गाँव में रहना है। ...मैं नहीं सह सकता ये ...पंचायत में कौन-सा मुँह लेकर जाऊँगा मैं? ...बोलो बाबू, इस बारे में क्या सोच रहे हो?'

चौधरी चुप रहे। क्या सोच सकते हैं वो! मान-मर्यादा, बाप-दादों की इज्जत, गाँव जवार में रुआब, ये सब तो चौधरी को भी प्रिय है। अब तक वे इज्जत ही तो कमाते रहे और इतनी कमाए कि गाँव वालों के लिए उनकी बात पत्थर की लकीर बन जाती है। पंचायत में सिर झुकाकर सब उनकी बात मानते हैं। रामनाथ भी सिर झुकाकर उनका फैसला मान लिया था ...हूक उठी चौधरी के दिल में उसकी बेटी भाग कर दूसरी बिरादरी में शादी कर ली थी इसमें रामनाथ का क्या दोष था भला! पाँच साल से बिरादरी का बहिष्कार झेल रहा है बेचारा... अपने द्वारा दिए गए ऐसे कई फैसले आज याद आ रहे हैं चौधरी को। पहली बार उन्हें अपने फैसलों पर ग्लानि हो रही है।

अब तक के जीवन में पहली बार वे खुद को इतना असहाय पा रहे हैं। दोनों बड़े बेटों ने उनसे किनारा कर लिया, वे दहाड़ते रहे। हंसा के पति ने दूसरा ब्याह कर लिया, वे नहीं टूटे। छोटा बेटा बात-बात पर विरोध करने खड़ा हो जाता है वे नहीं टूटते। सहने को तो वे मोहन की मौत का दर्द भी सह ले जाए पर ये हंसा! ...नरम पड़ रहे हैं चौधरी। बचपन से जिस खूँटा बाँधे उसी खूँटा बंधती आई है बेचारी! अब मोहन भी नहीं रहा। ठीक ही तो कहती है हंसा की माँ, किसके सहारे जिएगी बेचारी!

सुभाष जिस तरह दनदनाते हुए आए थे, उसी तरह दनदनाते हुए दालान से निकल भी गए। चौधरी ने उनसे इतना जरूर बता दिया कि यहाँ से मास्टर की बदली कराने की बात-चीत कर रहे हैं वे। साथ में इतना और जोड़ दिया कि, इस बात को अपने तक सीमित रख कर ठंडे मन से विचार करें।

चौधरी का पूरा समय अब दालान में ही बीतने लगा है। न खेत-बाड़ी देखने जाते हैं न बाग-बगीचा। गाय-भैस खूँटे पर बंधे हुमकते रहते है पर चौधरी का मन उनके खूँटे तक जाने का नहीं होता। नित्य-क्रिया तथा पेट की भूख को मार पाते तो शायद दालान से बाहर निकलते ही न। दिन-प्रतिदिन झुकी जा रही है उनकी कमर। ये पहला ऐसा काँटा चुभा है चौधरी को जिसकी काट वे नहीं खोज पा रहे हैं। हंसा सामने पड़ती है तो चौधरी नजरें बचा लेते हैं। खुद को उसका गुनाहगार मानने लगे हैं अब।

सुभाष आजकल माँ से कुछ अधिक तना-तना रहने लगा है। माँ को देखते ही कोई न कोई ऐसी बात शुरू कर देता है जिससे ये तनातनी और बढ़ जाती है। अभी-अभी कहीं से घूमघाम के लौटा है। माँ आँगन में झाड़ू लगा रहीं हैं। देखते ही चिढ़ गया, 'थोड़ी देर रुक जाओ अम्मा, धूल उड़ाए पड़ी हो। मैं इधर ही आ रहा हूँ, दिखाई नहीं पड़ रहा है क्या?'

शब्द तीर की तरह चुभते हुए भीतर तक उतर गए, पर अम्मा चुपचाप झाड़ू लगाना रोक दीं।

'बाहर जो गंदगी फैल रही है उसकी चिंता नहीं है, झुट्ठै घर साफ करने में लगी हैं।' उपहास से सिर झटकते हुए सुभाष आगे बढ़ा किंतु अम्मा अब चुप नहीं रह पाई,' क्या बोल कर चले जा रहे हो तुम? साफ-साफ क्यों नहीं बोलते?'

'अब इतनी भी अनजान मत बनो अम्मा, सब समझ रही हो तुम। ...हंसा दीदी जो गुल खिला रहीं हैं ...अपने घर में तो निभा नहीं पाई अब मेरे घर की इज्जत उतारने पर जुटी हैं।'

'ऐसा क्या किया हंसा ने कि तुम्हारे घर की इज्जत उतर गई? ...मैं तुम्हें न बताती तो क्या तुम जान पाते कि मास्टर हंसा के साथ ब्याह करना चाहता है? ...तुमने या गाँव वालों ने कभी हंसा को मास्टर से चोरी-छिपे मिलते हुए या बात करते हुए पकड़ा है क्या?'

'यही हाल रहा तो पकड़ भी लेंगे अम्मा।'

'हंसा तुम्हारी बड़ी बहन है सुभाष, कुछ बोलने के पहले सोचा तो करो।'

'सोचना तो तुम लोगों को पड़ेगा अम्मा, मैं चूड़ियाँ पहन कर नहीं बैठा हूँ। ...ये रासलीला नहीं बर्दाश्त करूँगा।' सुभाष की आवाज में धमकी है।

'सुनो सुभाष' माँ की आवाज तेज हो गई, 'हंसा कुछ गलत नहीं कर रही है। मास्टर उससे ब्याह करना चाहता है ...बाकायदा ब्याह, समझे तुम?"

"एकदम ही पगला गई हो क्या अम्मा? गाँव के लोगों को कैसे मुँह दिखाओगी?"

'पगला नहीं गई हूँ, होश में आई हूँ। ...पहले ही आ जाना चाहिए था, जब विद्या तड़प रही थी तब। जब सीमा की माँ छटपटा रहीं थी तब। जब सोहना की बहू हलाल हो रही थी तब। तुम लोग क्या समझोगे इस घुटन को? जाता ही क्या है तुम्हारा? फरमान जारी करने में एक जुबान ही तो घुमानी पड़ती है। मैं अपने जीते जी अपनी हंसा के साथ ऐसा नहीं होने दूँगी। ...और इस घर की इज्जत को बचाए रखने की जिम्मेदारी क्या बस हंसा के सिर पर ही है? घुट-घुट कर मर जाए वह तुम्हारी इज्जत सँभालने के लिए? ...तुम्हारे दोनों भाइयों ने जब गैर बिरादरी में ब्याह कर लिया तब नहीं गई थी घर की इज्जत? और तुम? ...तुम क्या बोल रहे हो? दो बच्चों के बाप बन गए हो, दिन-दिन भर सावित्री के दुआरे बैठे खिखियाते रहते हो, तब नहीं जाती तुम्हारी इज्जत? ...तुम्हारा सावित्री के साथ क्या चक्कर चल रहा है ये पूरा गाँव जानता है। ...मैं कुछ बोलती नहीं हूँ तो सोचते हो मुझे कुछ पता ही नहीं है। ...अरे, मैंने तो तुमसे इस उम्मीद से चर्चा की थी कि तुम नए जमाने के लड़के हो, इस बात को समझोगे और अपने बाबू को समझाओगे। लेकिन तुम तो उनसे भी आगे बढ़ गए। ...तुम क्या समझाओगे, समझाने के लिए समझ होनी चाहिए। खैर ...मैं समझाऊँगी तुम्हारे बाबू को। हंसा की जिंदगी सँवरने का रास्ता दिख रहा है तो मैं झूठी मान मर्यादा के चक्कर में पड़ उसे यूँ तड़प कर मरने नहीं दूँगी... तुम भी इस बात को अच्छी तरह से समझ लो।'

माँ के इस तीखे वार से सुभाष तिलमिलाता हुआ वहाँ से चला गया। उस दिन से माँ बेटे के बीच अनबोला शुरू है।

चौधरी आज शिक्षा अधिकारी से मिलने शहर गए थे। मास्टर के तबादले के लिए। वहाँ कुछ बात नहीं बन पाई है। अभी-अभी शहर से लौटे हैं वे। कुर्ता उतार कर खूँटी में टाँग ही रहे थे कि हंसा की माँ चाय का गिलास लिए दालान में पहुँची। चौधरी को चाय का गिलास देते हुए बोलीं, 'हंसा के बाबू, मैं तुमसे कुछ कहती नहीं हूँ पर घर में बड़ी कलह मची रहती है। सुभाष बहू बड़ी दुश्मनी रखने लगीं है अब। मैं चाय बना रही थी तो मोनुआ कटोरी लिए आ गया मेरे पास रसोई में। मैं उसकी कटोरी में चाय छान ही रही थी कि तेहा में भरी हुई आई और मोनुआ को घसीटते हुए अपने कमरे में लेकर चली गई ...अब उसे मार रही हैं कि वहाँ चाय माँगने क्यों गया। मोनुआ दादी-दादी चिल्ला रहा है ...सुनो, यहाँ तक आवाज आ रही है।'

'हंसा कहाँ है?' पत्नी की बात को अनसुना करते हुए चौधरी ने पूछा 'कहाँ होगी? वहीं, ...इनारा की छूही पकड़कर बैठी है, ...मेरे भी करम... पता नहीं क्या लिखवा कर आई थी मैं, हंसा को लेकर सुभाष दोनों परानी ऐसी बात बोलते हैं कि कलेजा फट जाता है।'

चौधरी चुप हैं। हंसा का दर्द उनके दिल में भी उठता है पर कहते कुछ नहीं।

चौधरी का घर गाँव के एक किनारे पर है। घर से लगे खेत में कुआँ है। जब से मोहन मरा है, हंसा कुछ देर के लिए कुएँ पर जाकर बैठती है। शुरू-शुरू में घर और गाँव के लोग भी इस बात से डरे रहते थे कि बेटे के गम में किसी दिन हंसा कुएँ में न कूद जाए। पर धीरे-धीरे सब आश्वस्त हो गए हैं।

कुएँ से कुछ दूर पर स्कूल है। गाँव वालों को लगता है कि, पढ़ते-लिखते, उछलते-कूदते बच्चों के बीच हंसा की आँखें मोहन को तलाशती होंगी, ...बेचारी! उसे कुएँ पर बैठे देख गाँव की औरतें आँचल से अपने आँसू पोछने लगती हैं। हंसा की माँ का भी यही मानना है, किंतु चौधरी और अब तो सुभाष भी हंसा के कुएँ पर जाते ही चौकन्ने हो जाते हैं। सुभाष ने कई बार हंसा को मना भी किया पर हंसा अब बगावती तेवर अख्तियार कर ली है। कहती तो कुछ भी नहीं पर सुनती भी नहीं है किसी का। न चौधरी की, न सुभाष की।

'हंसा के बाबू, तुम गुस्साओगे तो जरूर,पर बिना बोले मुझसे रहा नहीं जा रहा है।' चारपाई के पास से स्टूल खींचकर बैठते हुए हंसा की माँ ने बात शुरू की।

'तुम मास्टर की बदली कराने के लिए शहर का चक्कर लगा रहे हो, ठीक है, बदली करा दो, लेकिन हंसा को सजा मत दो। ...देखो अब तो मोहन भी नहीं रहा, अब वो किसके सहारे बिताएगी जिंदगी ...उसका ब्याह कर दो मास्टर से।'

चौधरी उदास नजरों से पत्नी की ओर देखने लगे। क्रोध या झल्लाहट नहीं है उनके चेहरे पर। पत्नी की हिम्मत बढ़ गई।

'सुभाष और सुभाष बहू का भरोसा मत करना। हमारे न रहने पर ये दोनों हंसा को एक मिनट भी घर में रहने नहीं देंगे। ...हम लोगों का भी अब क्या भरोसा? ...कमर टूट गई हंसा के बाबू, इतने बड़े दुख का बोझ अब सहा नहीं जाता। ...भगवान जाने कब खटिया पकड़ लूँ।' छलछला आए आँसुओं को अपने आँचल से पोछते हुए हंसा की माँ ने कहा। थोड़ी देर तक के लिए दालान में मौन पसर गया। इस मौन को हंसा की माँ ने ही तोड़ा, 'अपनी आँखों से हंसा को तिल-तिल जलता देख रही हूँ मैं ...बचपन से ही एक-एक सुख उससे छिनते चले गए ...अपनी इच्छा से एक दिन भी नहीं जी पाई है वह, अब अगर तुम चाह लो तो ...' बोलते-बोलते दोनों हाथ जुड़ गए उनके। चौधरी की आँखें भर आईं, उन्होंने हंसा की माँ के जुड़े हाथों को अपने हाथों में पकड़ लिया - 'हंसा की माँ, तुम ठीक कहती हो, हर सुख उससे छिनते चले गए ...अब कौन है उसका? ...मैं तुम्हारी बात पर विचार कर रहा हूँ ...कर दूँगा हंसा का ब्याह मास्टर के साथ।" गहरे अंतर्द्वंद्व में फंसे चौधरी आज कुछ उबर गए हैं। हंसा की माँ चौधरी को एकटक देखने लगीं, उन्हें अपने कानों पर विश्वास करने में कुछ वक्त लगा, फिर मारे खुशी के चौधरी के हाथों में अपना सिर रख कर फफक पड़ी। चौधरी भी रो पड़े। हंसा की माँ के दिल में उम्मीद की एक किरण जाग उठी।

कपड़ा सूखने की डोरी पर आज मोहन के कपड़े सूख रहे हैं।

हंसा को आज ये क्या सूझा! उसने ही धोकर डाले हैं ये कपड़े।

घर से दालान की ओर जाते-जाते चौधरी के पाँव ठिठक जाते हैं। मोहन का हँसता-बोलता चेहरा सामने आ गया। आँखें भर आईं हैं चौधरी की।

बैशाख का महीना है। दुपहरिया चढ़ आई है। गर्मी से अलसाया गाँव वीरान-सा लग रहा है। हंसा घर में नहीं है। कुएँ पर बैठी होगी। इतनी तेज धूप में भी, बस कुएँ की छूही की छाया में! स्कूल अब सुबह का हो गया है। बारह बजते-बजते छुट्टी हो जाती है। हंसा फिर भी कुएँ पर है! मोहन की मौत के बाद से मास्टर चौधरी से मिलने नहीं आता। हंसा ने रोक दिया होगा क्या? एक टीस-सी उठती है चौधरी के दिल में।

सुभाष कहीं से लौटे हैं। दालान के सामने चौधरी को देख, रास्ता बदल कर जल्दी से घर में घुस जाते हैं। यूँ बाप-बेटे में हमेशा छत्तीस का आँकड़ा रहता है पर आज सुभाष का इस तरह उनसे बच कर घर में चले जाना उन्हें अचरज में डाल रहा है। कुछ छिपा रहा है क्या ये! बात-बात पर तन कर खड़ा हो जाने वाला ये लड़का आज इस तरह... डरने लगे हैं चौधरी। पता नहीं कौन-सा दिन दिखा दे ये सुभाष! मोहन के मरने के बाद से ही चौधरी का पत्थर-दिल मोम में तब्दील होने लगा है।

मोहन के सूखते कपड़ो पर एक दर्द भरी नजर डालकर चौधरी दालान में चले गए। चैन तो अब उन्हें कभी नहीं मिलता लेकिन आज कुछ अधिक बेचैन हैं। सुभाष का इस तरह नजर झुका कर रास्ता बदल घर में चले जाना उन्हें असहज कर रहा है।

हंसा जब कुएँ पर जाकर बैठती है तो उसकी माँ थोड़ी-थोड़ी देर में उसे झाँक आती है। डरती है, कहीं कुछ कर न बैठे।

दालान का दरवाजा उठगा ही था। जोर का धक्का देकर दरवाजा खोलते हुए हंसा की माँ दालान में आईं। चौधरी लेटे हैं। हंसा की माँ का घबराया चेहरा देख उठकर बैठ गए।

'हंसा कुएँ पर नहीं है हंसा के बाबू...' आवाज काँप रही है उनकी 'कुएँ के अलावा कहीं नहीं जाती हंसा, फिर भी मैं सुमेर, नंदू, करुणा सब के घर पूछ आई। स्कूल में भी देख आई, कहीं नहीं है हंसा।' बिना रुके, एक साँस में बोल गई हंसा की माँ।

चौधरी को रास्ता बदलते हुए सुभाष याद आ गए। वे बिस्तर पर से उठकर खड़े हो गए।

हंसा की खोज शुरू हो गई। सुभाष भी खोजने में लगे हैं। चौधरी बार-बार कुएँ में झाँकते है, लोगों से कुएँ में उतरने के लिए कहते हैं। शंकर दौड़कर पड़ोस के गाँव से कुएँ में उतरने वाले पनडुब्बे को बुला लाया है।

लाश कुएँ में है। हंसा की माँ सँभाले नहीं सँभल रही है। बार-बार बेहोश हो रहीं हैं। दाँत बैठ जा रहे हैं उनके। दो औरतें उन्हें पकड़कर बैठी हैं।

छह महीने बाद ही चौधरी के दरवाजे पर एक बार फिर रोती बिलखती भीड़ इकट्ठी है। भीड़ के बीच चौधरी भौचक्के से खड़े हैं। सुभाष कुछ दूर पर एकदम अकेला खड़ा है। कफन लाने की जिम्मेदारी इस बार भी शंकर ने ही निभाया।

कफन लेकर शंकर अभी-अभी पहुँचा है चौधरी के पास। चौधरी कफन हाथ में लेते हैं, उलट-पलटकर सूखी आँखों से उसे देखते है फिर कफन लेकर सुभाष के पास जाते हैं,' बाप-दादों की इज्जत खूब बचाए तुम सुभाष, अब रक्खो गरदन सीधी, क्यों मुँह नीचा किए दूर खड़े हो?' सुभाष चौंक जाता है। चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगती है उसके। घृणा से भरपूर नजर सुभाष पर डालकर चौधरी वहाँ से लौटने लगते हैं। सुभाष सुकून की साँस लेता है।

मास्टर कुछ दूर पर खड़ा रो रहा है। चौधरी हंसा के पास न लौट कर मास्टर की ओर मुड़ जाते हैं।

'लो मास्टर अपनी हंसा को कफन ओढ़ा दो।' मास्टर अपने आँसू पोंछकर आश्चर्य से चौधरी को देखने लगता है।

'मैं तुम्हारा गुनाहगार हूँ मास्टर, जो सजा चाहो दे दो पर लो, कफन पकड़ो।' गाँव वाले कुछ समझें उसके पहले ही चौधरी आगे बढ़कर कफन मास्टर के हाथ में पकड़ाते हैं और उसे खींचकर सीने से लगा लेते हैं। अब तक सूखी पड़ी चौधरी की आँखें छलछला उठती हैं और दोनों लिपट कर फूट-फूट कर रो पड़ते हैं।


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हिंदी समय में आशा पांडेय की रचनाएँ