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सिनेमा

पापा बिजनेस के लिए बाहर गए हैं : व्हेन फादर वाज अवे ऑन बिजनेस
विमल चंद्र पांडेय


"जब से पापा बिजनेस के लिए बाहर गए हैं, सभी लोग बहुत तनाव में रहते हैं। दादाजी, माँ और हमारे घर आने वाला हर व्यक्ति बहुत चिंतित दिखाई देता है। वे सभी घड़ी के पेंडुलम कि तरह अपने सिर हिलाते रहते हैं। माँ हर वक्त सिलाई करती रहती है और जब वह सिलाई करना बंद करती है, बुरी तरह रोने लगती है। एक दिन मैंने सुना श्रीमती इलोना माँ से कह रही थीं, "मत रोओ सेना, वह इन्फोर्मर नहीं है। वह कुछ और है।" "और क्या?" माँ ने पूछा। श्रीमती इलोना खामोश थीं, ठीक उसी तरह जैसे झूठ बोलते वक्त मैं खामोश हो जाता हूँ।"

यह कहना है एक छोटे से बच्चे मलिक का जो इस कहानी का सूत्रधार है और जिसे इंतजार है कि उसके प्यारे पापा कब अपना बिजनेस ट्रिप खत्म कर वापस आएँगे। सर्बियन निर्देशक एमिर कुस्तुरिका की 1985 की यूगोस्लावियन फिल्म 'व्हेन फादर वाज अवे ऑन बिजनेस' द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के उस यूगोस्लाविया का चित्रण करती है जहाँ सोवियत यूनियन के विघटन के बाद इन्फोर्म्बिरो पीरियड चल रहा है। इन्फोर्म्बिरो 'इन्फोर्मेशन ब्यूरो' या 'कम्यूनिस्ट इन्फोर्मेशन ब्यूरो' (कोम्निफोर्म) का यूगोस्लावियन नाम है जब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ यूगोस्लाविया (केपीजे) को मार्क्सवाद-लेनिनवाद से विचलन और अन्य आरोपों के कारण कम्युनिस्ट इन्फोर्मेशन ब्यूरो से बाहर कर दिया गया था और इसके कम्युनिज्म को मास्को द्वारा सोवियत की लाईन से अलग टिटोइज्म कहा गया और इसे देशद्रोही की उपमा भी दी गई। ऐसे माहौल में मलिक के पिता मेसा को कोम्निफोर्म के लिए काम करने के शक में गिरफ्तार कर लिया जाता है और एक लेबर कैंप में भेज दिया जाता है। यह वह माहौल है जहाँ यह कहा जाता है कि "मैं अमेरिकन केक की तुलना में रशियन शिट खाना पसंद करूँगा"। यह खतरनाक इन्फोर्म्बिरो पीरियड 1948 से 1955 के आसपास तक माना जाता रहा है और फिल्म ऐसे ही माहौल में खेतों के एक दृश्य से शुरू होती है जहाँ एक किसान अपनी प्रेमिका चिकीता के लिए एक प्रेमगीत गा रहा है। यह एक मैक्सिकन गीत है और इसे गाने के पीछे उसका मकसद एक सुरक्षित गीत गाना है ताकि वह देशद्रोह के इल्जाम में पकड़ा ना जाए। बच्चे उसके आसपास पेड़ों पर झूल कर खेल रहे हैं और यही से फिल्म की कहानी एक बच्चे मलिक की नजरिए से शुरू होती है। मलिक को नींद में चलने की बीमारी है और उसकी माँ ने उसे बताया हुआ है कि उसके बिता बिजनेस ट्रिप के लिए बाहर गए हैं। युद्ध के बाद के मार्शल टीटो के यूगोस्लाविया और स्टालिन के सोवियत संघ के संबंधों की वजह से वहाँ के नागरिकों की दुनिया में क्या फर्क पड़े, इसे दिखाने के लिए फिल्म कई परतों का सहारा लेती है। मलिक का पिता मेसा अखबार में छपी अपनी एक टिप्पणी के कारण लेबर कैंप भेज दिया जाता है लेकिन इसके पीछे की वजह दरअसल उसका साला है जो कम्युनिस्ट पार्टी का एक नौकरशाह अधिकारी है और उसी औरत को चाहता है जिसके मेसा से विवाहेत्तर संबंध रहे हैं। वह चाहता तो मेसा की सजा में कुछ छूट या कमी हो सकती थी लेकिन वह ऐसा नहीं चाहता और मेसा को एक खान में काम करने के लिए भेजा जाता है। उसका परिवार पीछे उसका इंतजार करता रह जाता है। मलिक की माँ अपने बच्चों, अपने पिता की देखभाल के साथ-साथ अपने पति को छुड़ाने की कोशिशें भी करती है और इसके लिए वह अपने भाई से भी मिलने जाती है लेकिन कुछ काम नहीं आता। हर तरफ मेसा के बारे में तरह-तरह की बातें हो रही हैं और पूरा परिवार परेशान है। आखिरकार उसे और उसके बच्चों को मेसा से खान में ही मिलने की इजाजत दी जाती है। मलिक को एक डॉक्टर की बेटी से प्यार हो जाता है और वह छोटी उम्र में बहुत तरह के अनुभवों से गुजरता है। फिल्म बड़ी खूबसूरती से एक भयावह समय में धैर्य, प्रेम और स्वार्थ की कहानी कहती है और ढेर सारी घटनाओं से गुजरती है। बहुत सारे खूबसूरत प्रसंग आँखों में ठहरे रह जाते हैं। मलिक को पता चल जाता है कि उसके पिता के संबंध एक महिला पाईलट से हैं।

मलिक के नींद में चलने को बड़ी खूबसूरती से निदेशक ने मलिक के परिवार और पूरे यूगोस्लावियन समाज के यूगोस्ल्वाविया के टिटोइस्ट रिफोर्म के बाद की स्थिति के रूप में चित्रित किया है। पूरा समाज बुरे सपने में हैं और नींद में चल रहा है यानि ना तो अपने किसी कदम के लिए जिम्मेदार है और ना ही उसे कोई बात समझाई जा सकती है। उसे झकझोर के जगाए जाने की जरूरत है ताकि उसकी नींद टूटे और वह अपने अस्तित्व को पहचान पाए।

मलिक के रूप में मोरेनो डी बार्तोली ने कमाल का अभिनय किया है। यह बच्चा इस फिल्म की जान है और सहज अभिनय की परिभाषा के रूप में इस बच्चे का नाम सिनेमा के किसी भी इम्तिहान में लिखा जाए तो शत-प्रतिशत अंक मिलेंगे। मलिक की माँ सेनिया सेना के रूप में मिरजाना करानोविक फिल्म की दूसरी उपलब्धि हैं जो एक दुखी और बेसहारा महिला के रूप में द्रवित कर देने वाल अभिनय करती हैं और फिल्म को ऊँचाइयों तक ले जाती हैं। फिल्म के कुछ दृश्य बहुत सहज हैं और निर्देशक ने बड़ी कुशलता से तनाव भरे माहौल में भी किरदारों के मनोभावों को दिखाने के लिए सहज दृश्यों का सहारा लिया है। जब एक लंबे अंतराल के बाद सेना को अपने पति मेसा से खदान में ही मिलने की इजाजत मिलती है तो वह मलिक को अपने साथ लेकर जाती है। मलिक अपने पिता को देखकर उदास हो जाता है और द्रवित आवाज में कहता है कि वह कितने दुबले हो गए हैं। रात को सेना मलिक को एक तरफ सुला कर उसके पाँव में घंटी बाँध देती है जो दरअसल मलिक के बड़े भाई का आईडिया था। नींद में चलने की बीमारी के कारण अगर मलिक रात में जगे तो उन लोगों को पता चल जाए, ये मकसद था। सेना एक लंबे अंतराल के बाद अपने पति से मिली है और दोनों एक दूसरे के भीतर समा जाने के लिए आतुर हैं। जब मेसा सेना को निर्वस्त्र करने ही वाला होता है कि मलिक घंटी बजा देता है और सेना को जाना पड़ता है। वह उसे समझा के आती है कि रात बहुत हो गई है और उसे सो जाना चाहिए लेकिन फिर जैसे ही मेसा उसका टॉप उतार कर उसके स्तनों की ओर बढ़ता है, मलिक फिर से घंटी बजा देता है। इस दृश्य के आखिरी हिस्से में दिखाई देता है कि मलिक आकर अपने माता पिता के बीच में सो गया है और सेना की आँखों से आँसू बह रहे हैं।

फिल्म का आखिरी दृश्य बेहतरीन और अर्थपूर्ण है जब मलिक नींद में चलता हुआ दिखाई देता है। उसके कदम बढते जा रहे है और कैमरा सिर्फ उसे ऊपर के हिस्से से कवर करता है। ऐसा लगता है वह नींद में ही एक पेड़ पर चढ़ रहा है। वह चलता हुआ पेड़ की सबसे ऊँची चोटी पर पहुँच गया है जहाँ से उसके सामने आसमान और पहाड़ दिखाई दे रहे हैं। अब उसने एक भी कदम बढ़ाया तो वह नीचे गिर जाएगा, अचानक वह पीछे यानी दर्शकों की तरफ देख कर मुस्कराता है और बहुत सारी चीजें साफ हो जाती हैं। क्यों वह अपने पिता को दूसरी औरत के साथ देख कर नींद में चलता पहाड़ पर चढ़ जाता है और कैसे नींद में चलता हुआ, रास्ते में आए कुत्ते से बचता हुआ डॉक्टर की बेटी से मिलने पहुँच जाता है। फिल्म को ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म श्रेणी में नामांकन मिला था और इसने कांस फिल्म महोत्सव में गोल्डन पाम पुरस्कार हासिल किया था। फिल्म के संवाद फिल्म की जान हैं तो जोरान सिमजनोविक का संगीत इसमें चार चाँद लगता है।


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