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आलोचना

रच-रच मृदु छंदों के बंध
श्रीराम परिहार


सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने मुक्त छंद की चर्चा के संदर्भ में 'परिमल' की भूमिका में लिखा है - ''छंद कानून के अंदर सीमा के सुख में आत्म-विस्मृत होकर सुंदर नृत्य करते, उच्चारण की शृंखला रखते हुए श्रवण माधुर्य के साथ-ही-साथ श्रोताओं को सीमा के आनंद में भुला रखते हैं।'' इस कथन में 'कानून के अंदर की सीमा के सुख में आत्म-विस्मृत' और 'श्रोताओं को सीमा के आनंद में भुलाना' पदबंध महत्वपूर्ण है। अमरकोश में छंद शब्द का अर्थ - 'मन की बात' बताया है। अमरकोश में अन्य स्थान पर इसका अर्थ 'वश' दिया गया है। निराला के कथन में 'मन की बात' और 'वश' दोनों ही अर्थों का संकेत है। निघण्टु में प्रसन्न करने के अर्थ में ही 'छंद' धातु मिलती है। यास्क ने 'छंदासि छदनात्' कहकर छंद में छद् धातु ध्वनित की है। सामान्यतः जिस कविता में मात्राओं और वर्णों का रचनाक्रम, गति, यति का नियम और चरणांत में तुक पाई जाए उसे छंद कह सकते हैं -

मत बरण गति यति नियम, अंतहि समताबंद
जा पद रचना में मिले, 'भानु' भनत स्वइ छंद।

वेदों में सर्वप्रथम सात छंदों का उल्लेख मिलता है। यथा - गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहति, पंक्ति, त्रिष्टुप और जगती। इन सातों का संबंध भिन्न-भिन्न देवताओं से है। अग्नि ने गायत्री, सविता ने उष्णिक, सोम ने अनुष्टुप, वृहस्पति ने वृहति, मित्रावरुण ने पंक्ति, इंद्र ने त्रिष्टुप और विश्व देव ने जगती छंदों की रचना की है। ये देव इन छंदों के जन्मदाता भी माने जाते हैं। अन्य ऋषियों के भी छंद वेदों में मिलते हैं। वेदों में 261 प्रकार के छंद मिलते हैं। देवताओं के अतिरिक्त प्रमुख छंद-प्रवक्ता विद्वान - भरत, पतंजलि, शौनक, पिंगल और कात्यायन हैं। छंद कविता में रस, भाव और विषयवस्तु को अनुशासित स्वरूप देकर यति, गति, लय, चरण से आह्लादित करते हैं। वर्णिक एवं मात्रिक छंदों से भारतीय साहित्य समृद्ध है। सम, अर्द्धसम और विषम छंदों से भी कवियों ने भावोद्भाव और काव्य-रचना की है। छंद अनुशासित रूप से वैखरी द्वारा प्रस्फुटित वाणी का आह्लाद है।

'परिमल' में निराला का कवि-उन्मेष प्रकट होता है। इसके बाद निराला के अनेक काव्य-संग्रह और गद्य पाठ हिंदी को प्राप्त हुए। निराला का काव्य प्रबंध, मुक्तक, गीत, छंदमुक्त आदि के अनुशासन में उद्भाषित हैं। इन सभी काव्य रूपों में निराला एकदम अनूठे और 'निराला' हैं। उनमें काव्य परंपरा की नकल की अपेक्षा काव्य-परंपरा का विकास अधिक है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक रचनाओं से ही मुक्त-छंद का प्रयोग किया है। 1916 में प्रकाशित उनकी प्रसिद्ध और प्रिय रचना 'जूही की कली' से ही उनके काव्य में मुक्त-छंद का प्रवेश हो जाता है। मुक्त-छंद से आशय छंद से मुक्ति या छंद विहीनता या गद्य-रूप कविता या लयहीन कविता या संगीत के इलाके से बाहर खड़े काव्य रूप से नहीं है; वरन छंद की मूलभूत भूमि पर खड़े हुए कविता के आतंरिक स्वच्छंद एवं कठोर बंधनहीन रूप से है, जिसमें भाव एवं विचार अभिव्यक्ति प्रवाह में किसी प्रकार की बाधा न पड़े। लयात्मकता कायम रहे। प्रवाहमयता बनी रहे। कविता पारंपरिक छंद के कठोर अनुशासन से मुक्त हो 'नवगति, नवलय और नव ताल-छंद' में अपने व्यक्तित्व का प्रकटीकरण करती रहे। मुक्त छंद के विषय में निराला 'परिमल' की भूमिका में स्पष्ट उद्घोष करते हैं - ''मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति होती है। मनुष्यों की मुक्ति, कर्मों के बंधन से छुटकारा पाना है और कविता की मुक्ति छंदों के शासन से अलग हो जाना है। मुक्त काव्य कभी साहित्य के लिए अनर्थकारी नहीं होता, प्रत्युत उससे साहित्य में एक प्रकार की स्वाधीन चेतना फैलती है, जो साहित्य के कल्याण की मूल ही होती है। मुक्त छंद तो वह है, जो छंद की भूमि में रहकर भी मुक्त है, मुक्त छंद का समर्थक उसका प्रवाह ही है, वही उसे छंद सिद्ध करता है और उसका नियम-साहित्य उसकी मुक्ति।'' (निराला रचनावली भाग-1, पृ.426)

ईश्वरीय सृष्टि में वैविध्य का सौंदर्य है। प्रत्येक रचनाकार की मनोभूमि भी भिन्न-भिन्न होती है। प्रत्येक रचनाकार स्वयं के माध्यम से सृष्टि-रचना के सौंदर्य को भावभूमि पर अवस्थित कर नव-नव भंगिमाओं में प्रस्तुत करता है। रचनाकार का नव-नव आग्रह और उसमें निहित अनंत संभावनाएँ सर्जन को नव-नव रूप और स्वरूप देने की हुमस लिए रहती है। रचनाकार के आग्रह में स्वयं के माध्यम से सृष्टि के अनुभवों को नव-नव स्वरूपों और रूपों में शब्द-शब्द प्रकट करने की स्वीकृति सक्रिय रहती है। रचनाकार अपने स्वायत्त और मुक्त सृजन के द्वारा ही अपनी स्वतंत्रता को अर्थ देता है। अपनी रचना के द्वारा स्वयं की स्वतंत्रता और मनुष्य की मुक्ति को चरितार्थ करता है। निराला ने इसी संदर्भ में कविता को भी मुक्त किंतु अपनी मर्यादा में उसके मूल स्वरूप 'लयात्मकता' को सुरक्षित रखते हुए नई बनक दी है। निराला के श्रेष्ठ साहित्य का प्रतिफलन स्वतंत्रता, स्वाधीनता और मुक्ति के स्वरों में हुआ है। निराला के व्यक्ति और रचनाकार के पास स्वतंत्रता का जो आदर्श है, वह स्वतंत्रता, स्वाधीनता और मुक्ति के क्षितिजों तक विस्तृत है। संपूर्ण स्वतंत्रता का आदर्श है। तंत्र की, स्वयं के अधीन रहने की और रूढ़ि-बंधन से मुक्त होने की गहरी आकांक्षा उनके काव्य की मूल प्रेरणा है।

1924 में मतवाला में स्वाधीनता शीर्षक से दो कविताएँ हुईं। पहली कविता में पल्लव के संकेत से वे कहते हैं -

पल्लव जब आए थे
आए स्वाधीन
जाते हैं, अपनी ही इच्छा से मुक्त स्वाधीन। (निराला रचनावली-1, पृ.131)

दूसरी कविता में स्वाधीनता का विस्तार भू-नभ के ओर-छोर नापता दिखाई देता है -

भ्रमर का गुंजार,
वह भी स्वाधीन
पक्षियों का कलरव,
वह भी स्वाधीन,
उदय-अस्त दिनकर का,
तिमिर हर के अंतर से
तिमिर का उद्गम से
और तम के हृदय से।
निशानाथ का प्रकाश,
सब है स्वाधीन। (निराला रचनावली-1, पृ.132)

भाव का विचार के स्तर पर विस्तार होता है और वे कविता में गाते हैं -

निर्भय अपने को
और दुर्बल समाज को
'स्वाधीनता' का ही
एक और अर्थ निर्भय है। (निराला रचनावली-1, पृ.132)

निराला ने मुक्त छंद के अनेकविध सफल प्रयोग किए हैं। वर्णिक, मात्रिक, सममात्रिक, विषम मात्रिक, अंत्यानुप्रास एवं पूर्णतः मुक्त छंद काव्यानुशासन की मर्यादा के साथ मुक्ति या स्वच्छंदता की रुझान के साथ अवतरित हुए हैं। सममात्रिक छंदों में मात्राक्रम के अंतर्गत लघु-गुरु की आवृत्ति प्रत्येक पंक्ति में एक नहीं है, फिर भी समग्र पंक्ति में कहीं सम, कहीं अर्धसम मात्रिक विशेषता विद्यमान है। तुक या अंत्यानुप्रास में भी उन्होंने अनेक जगह स्वतंत्रता ली है। काव्यशास्त्र के अनुसार सम और अर्धसम छंद प्रायः चार पंक्तियों में लिखे जाते हैं, जो चार चरणों में पूर्णता पाते हैं। इनकी विशेषता यह है कि प्रत्येक चरण में समान मात्राएँ तथा अंत्यानुप्रास सम मात्रिक छंदों में होता है। निराला ने इस धारणा, मान्यता या अनुशासन या बंधन से कविता को मुक्त किया है। उन्होंने एक ही मात्रावर्ग के विभिन्न छंदों की पंक्तियों को एक छंद में बद्धकर सम मात्रिक छंद के भीतर मुक्ति का द्वार खोला है। इसके अतिरिक्त उन्होंने चार, छह, दस सम मात्रिक पंक्तियों के बाद एक दो या इससे अधिक मात्राओं की पंक्तियाँ रखकर भाव-प्रवाह के मोड़ को नया बाँकपन देते हुए सम या अर्धसम मात्रिक पंक्तियों के द्वारा कविता विशेष को पूर्णता दी है।

वह इष्टदेव के मंदिर की पूजा-सी (22 मात्राएँ)
वह दीपशिखा-सी शांत भाव में लीन, (21'')
वह क्रूर काल-तांडव की स्मृति-रेखा-सी (22'')
वह टूटे तरु की छुटी लता-सी पीन, (21'')
दलित भारत की ही विधवा है। (17'')

निराला के मुक्त छंद के संबंध में डॉ. भगीरथ मिश्र द्वारा उल्लेखित रूपक को देना समीचीन होगा। वे कहते हैं - ''निराला जी की ऐसे छंदों की कल्पना एक नदी के प्रवाह से मेल खाती हैं। नदी का प्रवाह जिस प्रकार तरलता की सप्राणता से गतिवान होता रहता है, जल का ओध जिस प्रकार आगे बढ़ने के उल्लास से स्पंदित और वेगवान रहता है और तरलता और उल्लास उसकी गति को प्रेरित करता है, उसी प्रकार भाव की नदी के प्रवाह की भी यही दशा है। निराला की छंद संबंधी कल्पना कुछ इसी प्रकार की है।'' (निराला काव्य का अध्ययन पृ.42)

तीनों गुण ताप त्रय, भेदकर सप्तावरण-मरण लोक
अभय हो गए थे तुम शोकहारी। पहुँचे थे वहाँ
मृत्युंजय व्योमकेश के समान, जहाँ आसन है सहस्रार-
अमृत-संतान! तीव्र जागो फिर एक बार।

निराला के काव्य-प्रतीकों का यह वैशिष्ट्य है कि वे रूप-चित्रण से अधिक भाव-व्यंजना करते हैं। उनकी कल्पनाएँ भी भावों की सहचरी हैं। इसीलिए उनके काव्य में भाव-चित्रों की भरमार है। भाव गीतिकाव्य का प्राणतत्व है और संगीतात्मकता प्राण-तत्व को सक्रियता और सरल प्राकट्य प्रदान करती है। निराला के काव्य में संगीत की गूँज गहरी अैर सघन; किंतु मद्धम-मद्धम तैरती है। वे ऐसे शब्द चुनते हैं कि उनकी ध्वन्यात्मकता से संगीत का आस्वाद और काव्य-सौंदर्य दोनों बढ़ते हैं। 'गीतिका' की पंक्तियाँ है' -

मौन रही हार
प्रिय पथ पर चलती सब कहते श्रृंगार
कण-कण का कंकण, मृदु किण-किण रव किंकिणी
रणन-रणन नूपुर उर लाज और रंकिनी
और मुखर पायल करें बार-बार
प्रिय पथ पर चलती सब कहते श्रृंगार।

अतः निराला का अभिव्यक्ति कौशल इतना सधा और साधना-पक्व है कि रचनाओं में अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, दीपक, व्यतिरेक, उत्प्रेक्षा, विरोधाभास, अन्योक्ति आदि स्वतः प्रयुक्त होते हुए उनके गीति काव्य को सौंदर्य सिद्ध करते हैं और कविता को गीत के इलाके से बाहर नहीं जाने देते। भावाभिव्यक्ति, संगीत-संपृक्ति, वैयक्तिकता के उत्क्षेपण और प्रकृति-बिंबों के अविरल प्रवाह से छंद से मुक्ति नहीं; बल्कि मुक्त-छंद की स्थापना को बल और दिशा मिली। मुक्त काव्य साहित्य के लिए कभी अनर्थकारी नहीं होता, बल्कि उससे साहित्य में एक प्रकार की स्वाधीन चेतना फैलती है, जो साहित्य के कल्याण की ही मूल होती है। जैसे बाग की बँधी हुई और वन की खुली हुई प्रकृति। दोनों ही सुंदर हैं, पर दोनों के आनंद तथा दृश्य दूसरे-दूसरे हैं; जैसे आलाप और ताल की रागिनी। इसमें कौन अधिक आनंदप्रद है, बतलाना कठिन है। पर इसमें संदेह नहीं कि आलाप, वन्य प्रकृति तथा मुक्त-काव्य स्वभाव के अनुकूल हैं।

निराला मुक्त छंद में प्रवाह की तन्मयता अनिवार्य मानते हैं। उनके मुक्त छंदों में लय की पुष्ट आयोजना मिलती है, जिससे कविता का संगीत-संदर्भित मूल स्वरूप सुरक्षित रह सका है। मुक्त छंद को लेकर उन्होंने अनेक सफल प्रयोग किए हैं, जिससे पारंपरिक छंदों की यात्रा में अनेक नए छंद विकासमान-प्रतिमानों सदृश्य जुड़ते चले गए। निराला के परवर्ती रचनाकारों ने जिन्हें अपनाया और कविता के शिल्प के चहुँदिशा नए द्वार खुले। निराला ने नया छंद गढ़ा -

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार।
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।
एक छन के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा -
मैं तोड़ती पत्थर।

निराला कविता की छंद से मुक्ति कतई नहीं चाहते थे, वरन कविता को मुक्त छंद के नए कलेवर में अपने समय के जीवन को बद्ध करते हैं। नई छंद योजना की दृष्टि से 'राम की शक्ति पूजा', 'तुलसीदास' और 'वनबेला' विशिष्ट हैं। यहाँ तक की 'कुकुरमुत्ता' जैसी रचना में भी लय टूटी नहीं और छंद अपना नया रूप पाता है। निराला ने मुक्त छंद की साधना की और हिंदी कविता को युगांतकारी मोड़ और दिशा दी। वे छंद विशेषकर मुक्त छंद के प्रबल पक्षधर थे और उन्होंने इस साधन पक्ष के माध्यम से भारतीय काव्य शास्त्रीय परंपरा में छांदसिक और भाषाई नए प्रतिमान जोड़े हैं। निराला का प्रभाव परवर्ती काव्य-चिंतन और काव्यशिल्प दोनों स्तरों पर बहुत दूर और बहुत देर तक दिखाई पड़ता है। उनकी काव्य साधना को प्रणाम।


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