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कहानी

पुतले
आनंद हर्षुल


वे सीमेंट के थे - छह पुतले। सीमेंट के रंग की ही साँवली त्वचा लिए। काँच की रंगीन गोलियों और चीनी मिट्टी के टूटे बर्तनों से, उनकी त्वचा सजी थी। इन काँच की गोलियों का खेल, बच्चे अब भूल चुके थे। बच्चे अब कंप्यूटर के सामने बैठकर, दुनिया से खेल रहे थे। कंप्यूटर के भीतर काँच की गोलियों का उस तरह का कोई खेल नहीं था जैसा धरती पर कभी, उन बच्चों के पूर्वजों के बचपन में था। यही हाल चीनी मिट्टी के बर्तन का भी था, वे इस तरह तड़क चुके थे कि अब किसी काम के नहीं बचे थे और खाने की टेबल बाहर हो गए थे।

पुतलों की देह, मनुष्य के इस्तेमाल से बाहर आ गई चीजों से सजी बनी थी। यह अलग बात है कि मनुष्य के कारीगर हाथ उनकी देह पर झिलमिलाते से दिख रहे थे : मनुष्य की अँगुलियों की झिलमिलाती थाप।

पुतलों का कद बहुत बड़ा नहीं था। वे बच्चों के कद में जैसे बड़ों का चेहरा पहने हुए थे। इनमें चार पुरुष थे और दो स्त्रियाँ। स्त्रियाँ, पुरुषों के बीच थीं। सर पर टोकरी रखीं। एक स्त्री की टोकरी में मछलियाँ थीं और दूसरी स्त्री की टोकरी में सब्जियाँ। टोकरी में रखी मछलियाँ, बरसों हो गए अब तक सड़ी नहीं थीं और सब्जियाँ अब भी ताजी थीं। सीमेंट के पुरुषों की पीठ, उनके बीच में खड़ी उन दो सीमेंट की स्त्रियों की ओर थीं। पुरुष-पुतले, स्त्री-पुतलों को नहीं, पृथ्वी की चार दिशाओं को देखते खड़े थे। पृथ्वी की चारों दिशाएँ, पुरुष-पुतलों के कंचे की आँखों में आकर डूब रही थीं।

इन छह पुतलों के चारों ओर लोहे की मोटी छड़ों से बना गोल घेरा था। घेरा, सड़क से ढाई फुट ऊँचे, ईंटों के गोल प्लेटफार्म पर गड़ा हुआ था। लोहे की छड़ों के सिरों पर भाले थे। भालों की नोक, पुतलों को देखो तो आँखों में चुभती थी। यह किसी को मालूम नहीं था कि पुतले जब घेरे के बाहर देखते हैं तो उनकी कंची आँखों में भाले की छाया गड़ती है या नहीं... कोई यह सोचता ही नहीं था कि पुतले भी देखते होंगे। स्त्री-पुतले, स्त्री की तरह और पुरुष-पुतले, पुरुषों की तरह देखते होंगे। इस चौक से जितना उन्हें दिखता होगा। देखते होंगे उतना।

उन पुतलों के आसपास, लोहे के गोल और नुकीले घेरे के भीतर, मखमली घास उगी थी हरी। हरी घास के ऊपर फूलों के छोटे-छोटे पौधे उभरे हुए थे - कुछ इस तरह कि कोशिश कर थोड़ा और उभरना चाह रहे हों... थोड़ा और आसमान की ओर उठना... थोड़ा और पुतलों के कद को छूने की कोशिश करना चाह रहे हों... उन उभरते फूलों ने, उस गोल घेरे को चटक रंगों से भर दिया था। नीला, पीला, लाल बैगनी। रंगों में, भालों की नुकीली और लोहे के स्वाद-सी छाया, कहीं-कहीं गड़ी-सी दिख रही थी।

इन फूलों के पास, बच्चों को भाने वाले सभी रंग थे। कभी कोई रंग फूलों का खटकता था बच्चों के मन में तो आश्चर्य कि फूल अपना रंग बदल लेते थे। जबकि बच्चे, उन फूलों को उस व्यस्त चौराहे के गुजरते हुए, बस एक झलक ही देख पाते थे। बच्चों की उस एक झलक में उपजी खटक को, सीमेंट के इन पुतलों के आस-पास उगे फूल तुरंत पकड़ लेते थे और मुस्कुराते हुए अपना रंग बदल देते थे कि बच्चा जब अगली बार गुजरे चौराहे से तो अपनी पसंद का रंग, फूलों में देख सके।

फूल ऐसे खिले थे, जैसे वे पुतलों को छूने की कोशिश कर रहे हों। हरी घास इस तरह बेचैन थी, जैसे वह ऐसी हलचल अपने भीतर चाह रही हो कि पुतले जो दिखने में बड़ों की तरह थे वे मन से बच्चे बन, उस पर खेल सकें। फूल और घास की इस कोशिश को आसमान ध्यान से देख रहा था और आसमान का नीला रंग, पुतलों के लिए हो रही, फूल और घास की इस निश्छल कोशिश पर झर रहा था...

चौक की गोल ऊँचाई पर उगी, इस हरी घास की जमीन पर, फूलों के पौधों के साथ-साथ, वे पुतले भी उगे हुए से ही थे - मनुष्य की गढ़ी थोड़ी सजावटी और थोड़ी बनावटी उस घास की हरी ऊँचाई-निचाई पर। इसीलिए वे छह पुतले एक दूसरे से थोड़ा ऊपर नीचे खड़े थे। स्त्री-पुतलियाँ ढाल पर थीं, कुछ इस तरह कि चौक से उतरकर बाजार चली जाएँगी - सब्जी और मछली बेचने और पुरुष-पुतले, अपने सामने दिखती दिशाओं पर निकल पड़ेंगे, अनंत यात्रा पर जो समुद्र के किनारे जाकर खत्म होगी या समुद्र के तल पर, अथाह जल के नीचे।

पुतले इस शहर के सबसे अभिजात्य चौक पर खड़े थे। सिविल लाइन्स स्क्वैअर पर। शहर इसी चौक से उत्पन्न होने और इसी चौक पर समाप्त होने के लिए अभिशप्त था। यह चौक उस कॉलोनी के मध्य में था जो अपनी ताकत से इस शहर को और इस राज्य को चला रही थी... इस राज्य का मुख्यमंत्री, सारे मंत्री, सारे आई.ए.एस., इसी कॉलोनी में रहते थे। वे छह पुतले अपनी कंची आँखों से उनकी आवाजाही देखते रहते थे। इन पुतलों की पलके थीं सूर्य और चंद्रमा। पुतलों की कंची आँखें, सूर्य की रोशनी में जागती थीं और चंद्रमा की रोशनी में सोती थीं। पुतलों की पलकें पुतलों के चेहरे पर नहीं आसमान में थीं और इस तरह आसमान में छह सूर्य और छह चंद्रमा थे, जब तक चौक पर थे छह पुतले।

सबसे बड़ी बात यह थी ये पुतले, महापुरुषों के पुतले नहीं थे। महापुरुषों के पुतले अपनी आँखों से कुछ नहीं देख पाते हैं। वे दिन में भी, अपनी आँखों के भीतर घना अँधेरा लिए, शहर के कई चौराहों पर खड़े रहते हैं। महापुरुषों के पुतलों के लिए, दिन और रात बराबर हैं। शहर और जंगल बराबर हैं। महापुरुषों के पुतले देखने के लिए नहीं, शहर को महान भव्यता देने के लिए शहर में जहाँ-तहाँ खड़े हैं, जैसे खड़े हैं वे जंगल में, शहर में नहीं। इस राज्य का मुख्यमंत्री, सारे मंत्री, सारे अधिकारी, महापुरुषों के पुतलों के कारण ही इस चौराहे पर सामान्य जनों के पुतलों को अनदेखा करते हुए, महान भव्यता में आवाजाही कर रहे हैं : बेशर्म आवाजाही।

इस सिविल लाइन्स स्क्वैअर पर खड़े पुतले, जिनके पास महापुरुषों का चेहरा नहीं था एक दूसरे की पीठ को महसूस कर रहे थे। वे घूमकर, एक दूसरे की पीठ देखना चाह रहे थे। पर वे घूम नहीं पा रहे थे। पैर उनके गड़े हुए थे हरी घास के नीचे बिछी, काली के बाद भूरी और कड़ी मिट्टी के भीतर। इसलिए पुतलों के पास एक दूसरे का चेहरा नहीं था और उन्हें यह पता नहीं था कि लगभग वे एक जैसे दिखते हैं। उन्हें यह भी पता नहीं था कि जब एक पुतला, मन ही मन मुस्कुराता है, तब ठीक उसी क्षण, सभी पुतले मन ही मन मुस्कुराते हैं। जब एक पुतला होता है दुखी तो सभी पुतले होते हैं दुखी। सच तो यह था कि पुतलों के पास खुद के चेहरे भी नहीं थे और उन्हें यह नहीं पता था कि वे दिखते कैसे हैं। वे अपने को रचने वाली मनुष्य अँगुलियों की हरकतों को याद कर, अपने चेहरे की कल्पना करते रहते थे और कभी ठीक-ठाक ढंग से अपने चेहरे तक अपनी कल्पना को नहीं पहुँचा पा रहे थे।

खुद के चेहरे तो मनुष्यों के पास भी ठीक-ठाक नहीं हैं... आईना देखो तो चेहरा दिखता है... आईने के सामने से हटते ही चेहरा पास से गायब हो रहा है... मनुष्य अपने चेहरे के आभासों को रच रहा है... मनुष्य चेहरे के आभासों के साथ जी रहा है... मरते समय मनुष्य के पास हमेशा दूसरों के चेहरे रहते हैं... मनुष्य दूसरों के चेहरों से रची गहराई में धीरे-धीरे डूबते हुए मरता है।

पुतलों के पास कोई आईना नहीं था। पुतलों के लिए अगर आसमान को आईना मान लें तो आसमान में पुतले अपना चेहरा नहीं देख पा रहे थे। पुतलों को चौराहे से गुजरती मनुष्यों की आँखें देख रही थीं जरूर। पर मनुष्यों की आँखों में उभर नहीं रहा था पुतलों का चेहरा।

इन पुतलों पास दृष्टि थी अनंत। दृष्टि अनंत उनकी देख रही थी, चारों दिशाओं में पूरे शहर को। शहर पार, पूरे राज्य को। राज्य पार, पूरे देश को। देश पार, पूरी पृथ्वी को। पृथ्वी पार, पूरे ब्रह्मांड को।

इस सिविल लाइन्स स्क्वैअर की, दक्षिण दिशा की सड़क, पुलिस लाइन तक जाकर खत्म हो रही थी। कह सकते हैं कि यह सड़क पुलिस के बूटों की आवाज और खुरदुरे खाकी रंग तक पहुँचा रही थी, क्योंकि जैसे ही सड़क पुलिस लाइन के गेट के भीतर घुसती - अचानक बदल जाती थी। वह पुलिस की सड़क बन जाती और सामान्य आदमी जब उस पर पैर रखता, गेट के बाहर से गेट के भीतर तो उसके पैरों के पंजों का एहसास, धीरे-धीरे खत्म होने लगता। अपने पंजे नहीं लगते अपने। सामान्य आदमी को लगता कि उसके पंजे खाकी वर्दी के बूटों के नीचे आ रहे हैं, बार-बार और कुचल रहे हैं बार-बार। इस तरह पुलिस लाइन के गेट के भीतर घुसने के बाद, सामान्य आदमी लहूलुहान पैर लेकर घर लौट रहा था और कई दिनों तक चलता रहता था लंगड़ाता।

इसी सड़क की बाईं ओर, सिविल लाइन्स स्क्वैअर को छूते हुए, सबसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री का बंगला दिख रहा था। पुराना बंगला : मंगलोरी खपरैलों से ढँका। खपरैल काई के धब्बों से भरे हुए थे। बंगले से कई गुना बड़ा, बंगले का खुला क्षेत्र था। बंगला पेड़ों के साथ और पेड़ बंगले के साथ थे। बंगला पूर्व मुख्यमंत्री के साथ था जो शहर के बीचोंबीच, एक बड़ी भूमि को घेरे, धरती पर थोड़ा धँसा सा अपने पुरानेपन पर खड़ा था। बंगला इतने पुरानेपन पर था कि रंगरोगन के बावजूद यह लग रहा था कि यह थोड़ा और पुराना होगा तो ध्वस्त हो जाएगा। यह पुरानापन सिर्फ बाहर था। अंदर बंगला भव्य था। यह जनता को धोखा देने के लिए था कि देखो पूर्व मूख्यमंत्री को कितना जर्जर बंगला दिया गया है। जबकि यह दिया गया नहीं, उनके द्वारा चुना गया बंगला था। जनता बंगले के भीतर कभी नहीं जाती थी और हमेशा बंगले का बाहरी ध्वस्त-सा दृश्य, अपने मन में रखती थी और खुश होती थी। जनता को लगता था कि पूर्व मुख्यमंत्री उसके समकक्ष है।

इसी सड़क के दाईं ओर एक बड़े व्यापारी का विशाल दुमंजिला बंगला था जो हमेशा सूना दिखता था, जैसे वह व्यापार में लिप्त, अपने मालिक के व्यापार से मुक्त होकर, इस शहर में आने का इंतजार करता खड़ा हो। पूर्व मुख्यमंत्री का सरकारी बंगला, इस व्यापारी के बंगल के सामने दयनीय दिख रहा था। यह बस दिखना था कि वस्तुएँ जैसे दिख रही थीं वैसी वे दरअसल थी नहीं। व्यापारी के बंगले से ज्यादा ताकत, पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले के भीतर अब भी मौजूद थी। यही व्यापारी, पूर्व मुख्यमंत्री के चरणों में लोट चुका था - धन के साथ, जब वे मुख्यमंत्री थे और शब्द 'पूर्व' उनके साथ नहीं लगा था। अब यह व्यापारी नए मुख्यमंत्री के चरणों में लोट रहा था। व्यापारी लोटता है तो चरणों में धन बिखरता है। जितना धन व्यापारी चरणों में बिखेरता है - उससे कई गुना यादा धन वापस बटोर कर ले जाता है। जिन चरणों में धन बिखरता है, वे यह सब जानते हैं। चरणों के आस पास बिखरा धन दिखता है, पर व्यापारी कुछ देकर जो अधिक ले जाता है - वह धन जनता का है और इसीलिए मुख्यमंत्री या मंत्री या अधिकारी को वह धन दिखाई नहीं देता है।

व्यापारी का बंगला कभी भी, पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले की ओर टक-टकी लगाकर नहीं देखता है। वह जब देखता है, कनखियों में देखता है। कुछ इस तरह कि उसके देखने को पूर्व मुख्यमंत्री का बंगला पकड़ न पाए। देखो इस तरह कि न देखने जैसा लगे। पूर्व मुख्यमंत्री को अपने सामने झुके सिर पसंद हैं - उनके चरणों को देखते सिर। कोई देखे टकटकी लगाकर यह धृष्टता है।

पूर्व मुख्यमंत्री ने यह सोचा नहीं था कि वे दुबारा, सत्ता में नहीं आ पाएँगे। वे नए बने राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे। जोड़-तोड़ में माहिर। पर राज्य के दूसरे चुनाव में, उनका दल बहुमत नहीं पा सका था और उन्हें वह बंगला छोड़ना पड़ा था, जिसकी दिशाएँ वास्तुशास्त्रियों और जिसका मुहूर्त ज्योतिषों ने, बहुत ठोक बजाकर तय किया था। मुख्यमंत्रीत्व काल का वह बंगला, कलेक्टर से छीना गया था, क्योंकि राज्य का यह पहला मुख्यमंत्री कभी कलेक्टर था और उसी बंगले में पद छोड़ने तक रह चुका था। वह एक बड़े भ्रष्ट-कांड में फँसने से बचने के लिए, कलेक्टर का पद छोड़, राजनीति की शरण में आया था। जाहिर था कि वह उस बंगले को शुभ समझता था। राजनीति इतनी उसे फली थी कि वह नए राज्य का पहला मुख्यमंत्री बन गया था। पर अब ऐसी स्थिति नहीं थी। अब वे पूर्व मुख्यमंत्री थे और किसी का कोई बंगला छीन नहीं सकते थे। उन्हें सरकार से प्रस्तावित दो चार बंगलों में से एक चुनकर संतोष करना था : फालतुओं में एक फालतू को चुनने-सा। पूर्व मुख्यमंत्री के पास निजी बंगले असंख्य थे। देश के हर बड़े शहर में और विदेश में। पता नहीं किसके किसके नाम पर बंगले थे। पर सरकारी बंगले में रहना, सत्ता में रहने जैसा था। जर्जर दिखते बंगले के भीतर रहते हुए पूर्व मुख्यमंत्री, जर्जर सत्ता के भीतर रह रहे थे।

सत्ता से हटते ही, ठीक दूसरे दिन, पूर्व मुख्यमंत्री के कमर से नीचे का हिस्सा मर गया - अचानक। वे अपने कार्यकर्ताओं को गाली बकते ढह गए फर्श पर। फिर जब उठे तो व्हील चेयर पर थे। उन्हें अपनी कमर से नीचे की देह दिख रही थी, पर महसूस नहीं हो रही थी। अपना ही पेशाब दिख रहा था, पर पेशाब की धार, महसूस नहीं हो रहा थी। कभी-कभी धोखे से उनकी अँगुलियाँ कमर के नीचे चल देतीं तो टट्टी या पेशाब से लिथड़ जाती थीं और वे थोड़ी टूटती और बिखरती सी दयनीय आवाज में अपने अधीनस्थों और परिजनों पर चिल्लाने लगते थे... हास्यापद स्थिति थी, जिससे दुख चू रहा था। पूर्व मुख्यमंत्री के शरीर से चू रहे इस दुख को, पैसा पोछ नहीं पा रहा था। सार्वजनिक जगहों पर बड़ी मुश्किल हो रही थी। वैसे तो उनकी कमर के नीचे का हिस्सा पूरी तरह ढँका रहता था। महँगी खुशबू में डूबा हुआ। पर बदबू को ढकना इतना आसान नहीं था। बदबू उनकी कमर के नीचे बिखेरी गई खुशबू को फाड़ती आखिर ऊपर आ ही रही थी और राज्य में जहाँ-तहाँ फैल रही थी। पूर्व मुख्यमंत्री का इस बदबू पर कोई बस नहीं था। वे अपने पुनः सत्ता में आने का इंतजार कर रहे थे। उन्हें पता था कि सत्ता में आते ही उनकी कमर के नीचे का हिस्सा पुनः जीवित हो जाएगा और कमर के नीचे से उठती बदबू, खुशबू में बदल जाएगी...?

एक सुबह इस सिविल लाइन्स स्क्वैअर के इन छः पुतलों ने देखा कि पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले के सामने एक दुकान सजी हुई है। बंगले के काँटा-तार के घेरे पर, जिसमें कुछ लतरें, जिद कर चढ़ी हुई थीं और जिनकी पत्तियाँ धूल से सनी हुई थीं। वस्तुओं की खाली चमकीली पालिथीन की थैलियाँ और खाली पुट्ठे के डिब्बे, बड़ी जतन से तार के काँटों पर फँसाकर सजा दिए गए थे। घेरे के नीचे सड़क किनारे टीन और प्लास्टिक के छोटे-बड़े डिब्बे तथा बोतलें, करीने से सजी रखी हुई थीं। इस दुकान में मशरूम के डिब्बे से लेकर, चाकलेट के डिब्बे तक थे। इसमें कंडोम से लेकर, एंटी सेप्टिक क्रीम तक के डिब्बे और सिगरेट के डिब्बे से लेकर, क्रार्नफ्लेक्स तक के डिब्बे थे। इस दुकान में राशन और तेल के डिब्बे भी थे। बासमती चावल की पालीथीन-थैली अपने भीतर इस तरह हवा भर कर फरफरा रही थी कि लग रहा था चावल से भरी हुई है। सड़क किनारे रखे खाली डिब्बों को देखकर कोई पता नहीं कर सकता था कि वे खाली हैं, पर काँटातार पर लटकी पालीथीन की थैलियाँ अपने खाली और हवा से भरे होने को बार-बार कह रही थीं।

इन खाली डिब्बों और पालिथीन की थैलियों के बीच एक आदमी बैठा था। आदमी कद पाँच फुट आठ इंच था। शरीर तगड़ा और रंग काला था। सूरज बरसों से उसके खुले शरीर से लिपट रहा था सीधे। शरीर पर उसने बस चड्डी पहन रखी थी - शेष देह नंगी थी, एड़ियों तक : काली चमकती। सूरज इसलिए सुनहरा था कि उसने इस आदमी के शरीर से रंग गोरा सोख लिया था। इस आदमी की काली देह पर, जहाँ-तहाँ मैल की पर्तें उभरी हुई थीं। यह आदमी बरसों से नहाया नहीं था। वह बस बारिश में भीगता रहा था बरसों से और बारिश ने उसे, जितना साफ किया था छूकर, यह आदमी उतना ही साफ हुआ था। बारिश के बाद, हवा और धूल ने उसे जितना मैला किया था, वह उतना मैला होता गया था।

उस आदमी की दुकान भी, बारिश और हवा के खेल के भीतर फँसी हुई थी। दुकान को हवा और बारिश मिटाने लगते थे और वह उन्हें सहेजता रहता था। होता यह था कि दुकान के हवा से उड़ जाने पर, या पानी में बह जाने पर, वह शहर के मुख्य बाजार की ओर निकल पड़ता था देर रात, जैसे थोक व्यापारियों के यहाँ कोई चिल्हर विक्रेता खरीददारी के लिए जाता है। बंद दुकानों के सामने फेंक दी गई खाली पालिथीन की थैलियों, डिब्बों और बोतलों को वह इस तरह उठाता था, जैसे वे भरे हुए हैं। रात उसके उठाए खाली डिब्बे, बोतल और पालीथीन की थैलियाँ अँधेरे से भरे हुए रहते थे। सूरज उगता सुबह तो भी डिब्बों में अँधेरा भरा रहता था। पालीथीन की थैलियों और प्लास्टिक की बोतलों में अँधेरे के साथ-साथ, दिन के उजाले की छाया भी बैठी रहती थी। वह आदमी थैलियों, डिब्बों और बोतलों के खालीपन को नहीं पहचानता था। उसे खाली डिब्बे, पालीथीन थैलियों और बोतलें, वस्तुओं से भरी और भारी लगती थीं। वह जब पानी की खाली बोतल का मुँह आसमान की ओर उठा अपने ओठों से लगाता तो उसका गला गट्गट् की आवाज निकालने लगता था। चावल की पालीथीन से उसकी हथेली पर चावल गिरने लगता और कार्नफ्लेक्स के रंगीन डिब्बे से कार्न फ्लेक्स वह फाँकता तो मुँह से कुरुम-कुरुम की आवाज उठने लगती। सिगरेट के खाली डिब्बे से, वह सिगरेट निकालता और माचिस की खाली डिब्बी से तीली निकाल कर, वह सिगरेट को उस तीली से छूता तो रोशनी फूटती और सिगरेट जलने लगती थी। वह आदमी अभी सिगरेट का लंबा कस खींच रहा था और धुआँ, जब उसने अपने फेफड़ों से बाहर छोड़ा तो चौराहे पर खड़े छह पुतले उस धुएँ में डूब गए। उस आदमी की सिगरेट और उस से निकल रहा धुआँ, बस उस आदमी को और उन छह पुतलों को दिख रहा था।

वह दिन भर ग्राहकों का इंतजार करता रहता था। वह रात भर ग्राहकों का इंतजार करता। ग्राहक कोई नहीं आता। उसका मन खाली डिब्बों और पालिथीन की वस्तुएँ तो रच लेता था, पर ग्राहक नहीं रच पा रहा था। हवा और पानी ही थे उसके ग्राहक जो आते और पूरी दुकान का समान एक बार में खरीद कर ले जाते। वह खुश होता कि सब कुछ बिक गया और फिर दुकान सजाने निकल पड़ता। खाली डिब्बे, पालिथीन की थैलियाँ बीनने। बीनते-बीनते वह अपनी दुकान की पुरानी जगह को भूल जाता था। पर उसे यह लगता था कि वह एक जगह पर ही बरसों से वस्तुओं को बेचता रहा है अब तक। इस तरह वह पूरे शहर भर में, अपनी दुकान लगाता घूम रहा था और पूरा शहर उसके लिए दुकान की एक छोटी जगह में बदल चुका था। पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले के सामने की यह जगह भी उसे ऐसी लग रही थी कि वह बरसों से यहाँ बैठा है अपनी दुकान सजाए। बरसों से सीमेंट के छह पुतले उसे देख रहे हैं लगातार, जैसे उसकी दुकान के सामने लगातार मौजूद है छह ग्राहक जो उसकी दुकान की किसी भी वस्तु को खरीदने अब तक झुके नहीं हैं। वह दिन में दो-तीन बार सीमेंट के पुतलों के चेहरों के सामने पालिथीन की थैली और डिब्बे लहराते हुए मोल भाव कर चुका है। रेट फिक्स है... रेट फिक्स है, वह चिल्ला चुका है कई बार। पहली बार उसे छह ग्राहक दिखे हैं एक साथ जो लगातार उसकी दुकान के सामने खड़े हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री की कार, उनके बंगले के भीतर गई कि बाहर बंगले के गेट पर तीन सिपाही आए तुरंत। पूर्व मुख्यमंत्री के आदेश की हड़बड़ी और बेचैनी उन तीनों के चेहरों पर इस तरह थी कि वे एक चेहरे के सिपाही लग रहे थे, जैसे तीनों एक दूसरे के क्लोन हों। उन तीन सिपाहियों ने उस आदमी को घेर लिया जो पूर्व मुख्यमंत्री के गेट पर दुकान लगाए बैठा था, खाली डिब्बों और पालिथीन की थैलियाँ की। उन तीनों ने उस आदमी पर हमला बोला। सबसे पहले काँटा-तार की फेंसिग से लटकी पालिथीन की थैलियों और पुट्ठों के रंगीन डिब्बों को नोच-नोचकर एक जगह ढेर बना दिया। फिर वे तीनों, जमीन पर सजे काली डिब्बों को पैरों और हाथों दोनों की मदद से समटेने लगे। अब उस आदमी की दुकान एक ढेर में बदल गई थी। उनमें से एक सिपाही ने अपनी जेब से लाइटर निकाला खट्ट की आवाज हुई। एक सुनहरी लौ चमकी। लौ के साथ-साथ वह आदमी दुकान के ढेर पर झुकता दिखा और लौ ने ढेर को छू लिया तो झटके से पीछे हटता दिखा।

अब आदमी के अपनी दुकान के ढेर पर, झुकने और फिर हटने से, उन तीन सिपाहियों का ध्यान, उस आदमी पर गया जो पूर्व मुख्यमंत्री के गेट के सामने खाली डिब्बों और पालिथिन थैलियों की दुकान लगाने की गुस्ताखी कर चुका था। उन्होंने देखा कि वह आदमी उन्हें घूरता खड़ा है नंगधंड़ग, बाएँ हाथ से अपने अंडकोषों को सहलता। सिपाही जब तक सामान का ढेर लगा रहे थे वह आदमी यह मान रहा था कि ये पूरा सामान खरीद रहे हैं : अच्छे ग्राहक। उन तीनों ने ध्यान नहीं दिया था कि वह आदमी खुश और उत्तेजित उनके आगे-पीछे होता रहा था। जब उन तीनों में से एक ने ढेर को लाइटर की लौ से छुआ तो अब वह इस घटना को समझने की कोशिश कर रहा था कि कोई दुकान से सामान खरीद कर आग के हवाले क्यों करेगा... उस आदमी के चेहरे पर उन तीनों को घूरना जो उभरा था, इसीलिए उभरा था। वे तीनों सिपाही आदमी को घूरता देख, गुस्से से भर गए। वे आगे बढ़े। उस घूरते आदमी की ओर हाथ उठाकर, गाली बकते हुए। वह आदमी उन्हें घूरता, पीछे हटने लगा। वे तीनों जितने कदम आगे बढ़ रहे थे, वह आदमी उतने कदम पीछे हट रहा था - सड़क के किनारे-किनारे, जहाँ उसकी सीध में, उसकी दुकान ढेर बनी जल रही थी। वह जलते ढेर से दूर हो रहा था। पर उस आदमी का घूरना लगातार बना रहा। वह अपनी लाल ऑॅंखों से घूर रहा था तीनों सिपाहियों को लगातार। वे तीनों सिपाही उसके पीछे दौड़े तो वह आदमी अपना घूरना, सड़क के किनारे, उन तीनों के लिए गिराकर मुड़ा और दौड़ पड़ा उनसे दूर, विपरीत दिशा में। उन तीनों सिपाहियों ने उस आदमी को इतनी दूर तक दौड़ाया कि वह पूर्व मूख्यमंत्री के घर के सामने की जगह को भूल जाए। वापस ना आए दुबारा। दुबारा सजा न ले अपनी खाली दुकान पूर्व मुख्यमंत्री के दरवाजे पर।

पर आश्चर्य कि वह काला नंग-धंड़ग आदमी, दूसरे दिन सुबह-सुबह फिर पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले के सामने खड़ा दिखा। वह अपनी दुकान को ढूँढ़ रहा था जो अब तक एक काले छोटे ढेर में बदल चुकी थी। वह सूरज के साथ-साथ बंगले के सामने उगा आया था। सिपाही सूरज को सुबह उगने से रोक नहीं सकते थे, ठीक उसी तरह सिपाही उस आदमी को सुबह उगने से रोक नहीं पाए थे। वह रात भर पूरे शहर में भटकता रहा था - इस जगह को ढूँढ़ता। रात उसकी आँखों में बैचेन बैठी थी। सुबह उसने अपने को पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले के सामने खड़ा पाया था।

वह आदमी अपनी दुकान के जले हुए ढेर के सामने बैठ गया। अब भी कुछ पालिथीन और एकाध पुट्ठे के डिब्बे में, उस दुकान के निशान, काँटा-तार के घेरे और सड़क किनारे की जमीन पर, अब भी दिख रहे थे। आदमी उकड़ू बैठा था। काँटा-तार पर फँसी पालिथीन की एक छोटी थैली हवा के साथ उड़ी और उकड़ू बैठे आदमी के सिर को छूती निकल गई। आदमी जले हुए ढेर को घूरता रहा देर तक। देर तक धुनता रहा अपना सिर। फिर उठा और छाती पीट-पीट रोने लगा। रोने के साथ उसके मुँह से अजीब आवाज निकल रही थी, जैसे हिचकियों में उसकी साँस बार-बार फँस रही हो। जब रोते-रोते वह थक गया तो गाली बकने लगा गंदी-गंदी : धारा प्रवाह। उसका चेहरा पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले की ओर था और पीठ उन छह पुतलों की ओर जो शुरू से उसे देख रहे थे और उसके लिए दया और सहानुभूति से भरे हुए थे। उस आदमी की गालियाँ, मुँह से बाहर आते ही, पालिथीन थैलियाँ और खाली डिब्बों में बदल रही थीं और हवा के साथ उड़, पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले के ऊपर गिर रही थीं।

सिविल लाइन्स स्क्वैअर उस आदमी की गालियों से भर रहा था। आते-जाते लोग ठिठकने लगे थे। बस उन छह पुतलों को उस आदमी की गालियाँ नहीं छू रही थीं। गालियाँ जैसे ही पुतलों को छूती तुरंत पानी में बदल जाती थीं। उस आदमी के आस-पास साइकिल सवारों और मजदूरों की अच्छी-खासी भीड़ अब इकट्ठा हो चुकी थी। ये वे लोग थे जो सुबह काम पर निकले थे और जिन्हें शाम को थककर वापस लौटना था। वह आदमी भीड़ को नहीं देख पा रहा था। बंद आँखों से, वह पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले को देख रहा था। बक रहा था वह सिर्फ बंगले को गाली।

अचानक सिपाही उस आदमी पर टूट पड़े। उनके हाथ-लात एक साथ चलने लगे। बहुत देर तक तीनों सिपाहियों के बूट उस आदमी की देह पर बजे। सिपाही बारी-बारी से उसके सिर के लंबे, गंदे और उलझे बालों को पकड़, उसकी देह को घुमा रहे थे। सिपाही उस आदमी से भी ज्यादा गंदी गालियों में डूब रहे थे।

सिपाही जब उसे पीटते-पीटते थक गए तो वह आदमी उठा लड़खड़ता। उसकी नाक से खून गिर रहा था - टप्-टप्। पीठ कोहनियाँ, घुटने और चेहरा छिल गया था। वह काला आदमी, अब खून के लाल धब्बों से भरा हुआ था। वह अब भी सिपाहियों को नहीं, बंगले को घूर रहा था, जैसे बंगले ने आकर उसे पीटा हो और फिर वापस जाकर, अपनी जगह खड़ा हो गया हो। एक सिपाही ने उसे धकेला, चल भाग यहाँ से। वह आदमी कुछ पीछे हटा... फिर कुछ कदम और... फिर सिपाहियों ने उसकी पीठ देखी नंगी और काली पीठ जिससे खून छलक रहा था। पीठ उस आदमी के चेहरे की तरह दिख रही थी। सिपाहियों ने और वहाँ खड़ी भीड़ ने - किसी पीठ को चेहरा बनते पहली बार देखा था। सिपाही, काली पर लाल धब्बों भरी उस पीठ के घूरने की हद के भीतर थे : बेचैन।

वह आदमी अपने गायब होने के कुछ घंटों बाद, जब सूर्य बस डूबने वाला था, फिर चौराहे पर प्रगट हो गया। इस बार वह सीमेंट के छह पुतलों के बीच खड़ा था। पूर्व मुख्यमंत्री का बंगला, रात्रि की चहल-पहल से पहले के मौन में डूबा हुआ था। गेट पर खड़े सिपाहियों ने उस आदमी को चौराहे के गोल घेरे पर चढ़ता देख लिया था, पर उन्होंने अपना ध्यान, जान-बूझकर उस से हटा लिया। उनकी ड्यूटी उस आदमी के लिए ही गेट पर लगी थी। वह आदमी जब गेट के सामने आएगा तो सिपाही उसे देखेंगे। ये वही तीन सिपाही थे जो कुछ घंटे पहले, उस आदमी की पीठ को चेहरा बनते देख चुके थे।

उस रात सीमेंट के छह पुतलों की बीच खड़ा वह आदमी, लगातार पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले की ओर घूरता रहा गुस्से से। वह आदमी रात में हुई, बंगले की चहल-पहल को घूरता रहा। वह अँधेरे में डूबे बंगले को घूरता रहा जो चहलपहल के बाद थककर सोया-सा लग रहा था। उस आदमी के इस तरह बंगले को लगातार घूरने का असर, सीमेंट के उन छह स्त्री-पुरुषों के पुतलों पर भी हुआ। सीमेंट के वे छह पुतले पहली बार अपनी जगह से हिले। उनके जमीन पर घँसे पैर खुल गए। पहली बार पुतलों ने अपने देखने की दिशा बदली। वे उस आदमी के दर्द के छह गवाह थे जो अब उनके बीच खड़ा था, बंगले को घूरता। सुबह हुई तो उस चौराहे पर, सीमेंट के छह पुतलों की जगह, अब सीमेंट के सात पुतले थे और सातों पुतले पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले की ओर घूर रहे थे...


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हिंदी समय में आनंद हर्षुल की रचनाएँ