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कविता

श्री कृष्ण गाथा
द्वारिका प्रसाद मिश्र


दोहा :

नील पीत पट, लट मुकुट, कुंडल श्रुति ताटंक,
अरुझत एकहिं एक मिलि, राधा-माधव-अंक॥

चौपाई :

बहेउ अनवरत रास-प्रवाहा, बसुधा सुधा-सिंधु अवगाहा।
उमहत-उछरत शशधर ओरा, सींचत अंतर हर्ष हिलोरा।
अमर-बाम निज-निज पति संगा, बहीं रात-रस निर्मल अंगा।
किन्नर, सिद्ध, नाग, गंधर्वां, नभ नाचत अनुहरि हरि सर्वां।
उदधि-वीचि, विधु-निशि कर जोरे, नाचत नखत रास-रस भोरे।
महि, खग, मृग, तरु, लता, विताना, नाचत सस्मित विविध विधाना।
नहिं जड़ चेतन कहुँ कोउ वाचा, हरि-लय-लिप्तत विश्वन सब नाचा।
विधि-शारदा, इंद्र-इंद्राणी, नाचत विहँसि महेश-भवानी।

दोहा :

रास-सुधा-सिंचित बहुरि, पाये अंग अनंग,
नाचति रित पति पाय पुनि, राधा माधव संग॥

चौपाई :

परमानंद, मगन जग जानी, कीन्हेउ कौतुक सारंगपानी।
गहे हाथ निज राधा हाथा, गवने कुंज भवन ब्रजनाथा।
जमुना-नीर तरंग बढ़ायी, पुनि-पुनि चरण पखारत आयी।
झुकत महीरुह करत प्रनामा, बरसत सुमन पराग ललामा।
स्वागत-गीत कोकिला गावहिं, अलि कुल विरुदावली सुनावहिं।
चंद्र-मरीचि रंध्र-मग आयी, विलसति वदन-कुमुद विकसायी।
श्रम-कण मलय समीर सुखाये, आसन किसलय लाय बिछाये।
मंजु निकुंज ब्रह्म आसीना, अंक विराजति प्रकृति प्रवीना।

दोहा :

बिहँसत हरि हेरत प्रियहि, लास-रसीले नैन।
अधर मधुर बरसे बहुरि, सुधा-सिक्त् मृदु बैन॥

चौपाई :

हम दोउ एक, नाहिं कछु भेदा, कहत सकल निगमागम वेदा।
निवसित यथा क्षीर धवलाईं, यथा हुताशन दाहकताई।
बसत प्रिये तस तुम मोहि माहीं, तुमहिं विहाय मोरि गति नाहीं।
मैं सृष्टा, तुम चिर नव सृष्टी, मैं संतोष, परम तुम तुष्टी।
मैं दिनपति तुम दिन उजियारी, मैं शशि तुमहु कांति समहारी।
मैं दीपक, तुम शिखा सोहावनि, मैं जलनिधि, तुम वेला पावनि।
मैं पावक, तुम स्वाहा रूपा, मैं धनेश, तुम ऋद्धि अनूपा।
मैं जहँ अर्थ तहाँ तुम बानी, मैं नय, तुमहिं नीति कह ज्ञानी।

दोहा :

धर्म संत क्रिया सदृश हम, बोध बुद्धि अनुहारि।
व्याप्त विश्व भरि तत्व इक, दिखत पुरुष अरु नारि।


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