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कविता

धरती हमारि!
चंद्रभूषण त्रिवेदी रमई काका


धरती हमारि! धरती हमारि!
है धरती परती गउवन कै औ ख्यातन कै धरती हमारि।
धरती हमारि! धरती हमारि!

हम अपनी छाती के बल से धरती मा फारु चलाइत है।
माटी के नान्हें कन-कन मा, हमहीं सोना उपजाइत है॥
अपने लोनखरे पसीना ते, रयाती मा ख्यात बनावा हम।
मुरदा माटी जिंदा होइगै, जहँ लोहखर अपन छुवावा हम।
कँकरील उसर बीजर परती, धरती भुड़गरि नींबरि जरजरि॥
बसि हमरे पौरुख के बल ते, होइगै हरियरि दनगरि बलगरि।
हम तरक सहित स्याया सिरजा, सो धरती है हमका पियारि॥
धरती हमारि! धरती हमारि!

हमरे तरवन कै खाल घिसी, और रकतु पसीना एकु कीन।
धरती मइया की सेवा मा, हम तपसिन का अस भेसु कीन॥
है सहित ताप बड़ बूँद घात, परचंड लूक कट-कट सरदी।
रोंवन-रोंवन मा रमति रोजु, चंदनु असि धरती कै गरदी॥
ई धरती का जोते-जोते, केतने बैलन के खुर बिसिगे।
निखवखि, फरुहा, फारा, खुरपी, ई माटी मा हैं घुलि मिलिगे॥
अपने चरनन कै धूरि जहाँ, बाबा दादा धरिगे सँभारि।
धरती हमारि! धरती हमारि!

हम हन धरती के बरदानी, जहँ मूँठी भरि छाँड़ित बेसार।
भरि जात कोंछ मा धरती के, अनगिनत परानिन के अहार॥
ई हमरी मूठी के दाना, ढ्यालन की छाती फारि-फारि।
हैं कचकचाय के निकरि परत, लहि पौरुख बल फुरती हमारि॥
हमरे अनडिगे पैसरम के, हैं साक्षी सूरज और अकास।
परचंड अगिनि जी बरसायनि, हम पर दुपहरि मा जेठ मास॥
ई है रनख्यात जिन्नगी के, जिन मा जीतेन हम हारि-हारि।
धरती हमारि! धरती हमारि!


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