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कविता

कविताएँ
महेश वर्मा


लाओ

हिसाब

तुम्हारी बात

रविवार

अनुवाद

लड़की और गुलाब के फूल

रात

उन दिनों - 1

उन दिनों - 2

गिरने के बारे में एक नोट...

किसी जगह

कमीज़

कुछ नहीं

भूल

मेरे पास

छींक

घर

पत्थर

पुराना पेड़

पूर्वकथन

पूर्वज कवि

पहला

ढूँढ़ना-पाना

किस्सागो

किस्सा

इस समय के किस्सागो को समझे जाने की ज़रूरत है

इतिवृत्त

सदी के बीच में

चंदिया स्टेशन की सुराहियाँ प्रसिद्ध हैं

आदिवासी औरत रोती है

वक्तव्य

कोई आवाज़ होती

हाथ

सेब

भाषा

पानी

वर्षाजल

बारिश

और छायाएँ

दीवारें

धूल की जगह

उदास साँझ

दूसरी ओर से

झाड़ू

बाँह उखड़ जाने पर

ख़ून

किससे छूट गया

रहस्य

शायद

उतर गया है पानी में

बीज

राख

चढ़ आया है पानी

एक जगह

भाषा

फिर लौटकर

कुर्सी

पीठ

मिट्टी तेल

हमारे सुंदर दुःख

अनुपस्थित

चेतावनी

चील

कीचड़

रात

इसी के आलोक में

रुका रहता है

नहीं

मक्खियाँ

जीवन-कविता

नेपथ्य

कल के लिए

भाषा लेकिन भूल गया था

आग

अँधेरा

एक दिन

कुछ पड़ गया है आँख में

मिलने गया था

पोलिश कवि ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त के लिए छह कविताएँ 

नेलकटर

खिड़कियाँ

भाषाएँ

पत्थर

बोतलें

सिलाई मशीनें

 

लाओ

कोई चीज़ लाओ
जिसको कोई न जानता हो
जिसके बारे में कुछ बताने की असफलता
को भी कोई समझ न पाए

वह ज्ञान, तर्क, अनुभूति और अध्यात्म
सबको धता बताती हुई
पहली बार की तरह आए
जब वह आए तो कोई परिपाटी न हो उसकी

उसकी आराधना करने
उसकी हत्या करने
उससे डरने, प्यार करने, नफ़रत करने की
कोई वज़ह ही नहीं हो पहले से

समय उसके बाद शुरू हो या न हो

फिर चाहे तो भाषा आए

उसे इस तरह लाओ कि उसे लाने का कोई तरीका
तुम्हें मालूम नहीं था, वज़ह भी नहीं
उसकी कोई देह थी या नहीं किसी को मालूम नहीं था
इंद्रियों से उसके संबंध भी अज्ञात ही थे

उस ऐसे लाओ कि कोई उपमा न दे पाए
वह कहीं से भी लाई जाए या कहीं नहीं से भी
वह कण हो या अंतरिक्ष,
आंतरिक हो या बाह्य
कुछ भी हो ना हो

उसे लाओ।

 

हिसाब

ब्लेड से पेंसिल छीलते हुए
एक पूर्ण-विराम-भर कट सकती है उँगली
लेकिन अश्लील होता

बिल्कुल सफ़ेद काग़ज़ पर गिरना
अनुस्वार-भर भी
रक्त की बूँद का।

नहीं आ पाई थी कोई भी ऐसी बात
कि उँगली से ही लिख दी जाती -
लाल अक्षरों में

उत्तापहीन हो चला था इतिहास
सिर्फ़ हवाओं की साँय-साँय सुनाई देती थी
कविताओं के खोखल से

सिर्फ़ प्रेम ही लिख देने भर भी
उष्म नहीं बचे थे हृदय, तब
प्रेमपत्रों को कौन पढ़ता?

बचती थी केवल प्रतीक्षा ज़ख़्म सूखने की
कि पेंसिल छीलकर लिखा जा सके -
हिसाब

 

तुम्हारी बात

और जबकि किसी को बहला नहीं पाई है मेरी भाषा
एक शोकगीत लिखना चाहता था विदा की भाषा में और देखो
कैसे वह रस्सियों के पुल में बदल गया

दिशाज्ञान नहीं है बचपन से
सूर्य न हो आकाश में
तो रूठकर दूर जाते हुए अक्सर
घर लौट आता हूँ अपना उपहास बनाने

कहाँ जाऊँगा तुम्हें तो मालूम हैं मेरे सारे जतन
इस गर्वीली मुद्रा के भीतर एक निरुपाय पशु हूँ
वधस्थल को ले जाया जाता हुआ

मुट्ठी भर धूल से अधिक नहीं है मेरे
आकाश का विस्तार - तुम्हें मालूम है ना?

किसे मै चाँद कहता हूँ और किसको बारिश
फूलों से भरी तुम्हारी पृथ्वी के सामने क्या है मेरा छोटा सा दुख?

पहले सीख लूँ एक सामाजिक भाषा में रोना
फिर तुम्हारी बात लिखूँगा

 

रविवार

रविवार को देवता अलसाते हैं गुनगुनी धूप में
अपने प्रासाद के ताख़े पर वे छोड़ आए हैं आज
अपनी तनी हुई भृकुटी और जटिल दंड-विधान

नींद में मुस्कुराती किशोरी की तरह अपने मोद में है दीवार-घड़ी

ख़ुशी में चहचहा रही है घास और
चाय की प्याली ने छोड़ दी है अपनी गंभीर मुख-मुद्रा

कोई आवारा पहिया लुढ़कता चला जा रहा है
वादियों की ढलुआ पगडंडी पर

यह खरगोश है आपकी प्रेमिका की याद नहीं
जो दिखा था, ओझल हो गया रहस्यमय झाड़ियों में

यह कविता का दिन है गद्य के सप्ताह में

हम अपनी थकान को बहने देंगे एड़ियों से बाहर
नींद में फैलते ख़ून की तरह

हम चाहेंगे एक धुला हुआ कुर्ता-पायजामा
और थोड़ी सी मौत

 

अनुवाद

दरवाज़े के दो पल्ले अलग-अलग रंगों के, दो आदमियों के बीच अपरिचित पसीने की गंध और एक आदमी की दो पुतलियाँ अलग अलग रंगों की। एक तहजीब में परिचय का हाथ आगे बढ़ाते तो दूसरी सभ्यता के अभिवादन से उसे पूरा करते। शराब मेज़ से उठाए जाने से लेकर होंठों तक आने में अपना रंग और असर बदल चुकी होती। उधर से कोई ग़ाली देता तो इधर आते तक ख़त्म हो रहता उसका अम्ल। एक देश के सिपाही का ख़ून बहता तो दूसरे देश के सिपाही के जूते चिपचिपाने लगते। यहाँ जो चुंबन था वहाँ एक तौलिया।

एक आदमी के सीने में तलवार घोंपी जाती तो दूसरे गोलार्द्ध पर चीख़ सुनाई देती, यहाँ का आँसू वहाँ के नमक में घुला होता जो यहाँ के समंदर से निकला था।

एक कविता जो उस देश की ठंडी और धुँधली साँझ में शुरू हुई थी दूसरे देश की साफ़ और हवादार शाम पर आकर ख़त्म होती। वहाँ का घुड़सवार यहाँ के घोड़े से उतरेगा। यहाँ की नफ़रत वहाँ के प्रतिशोध पर ख़त्म होगी लेकिन लाल ही होगा ख़ून का रंग। जहाँ प्यार था वहाँ प्यार ही होगा जहाँ स्पंदन था वहीं पर स्पंदन, केवल देखने की जगहें बदल जातीं।

अनुवादक दो संस्कृतियों के गुस्से की मीनारों पर तनी रस्सी पर बदहवास दौड़ता रहता, कभी रुककर साधता संतुलन, पूरा संतोष कहीं नहीं था।

 

लड़की और गुलाब के फूल

उन दिनों हमने शायद ही यह शब्द कहा हो - प्यार! हम कुछ भी कहते टिफ़िन, हवा, दवाई, शहर, पढ़ाई ...सुनाई देता प्यार। प्यार से हम नफ़रत करते, चिढ़ते और एक-दूजे को ख़त्म करते।

प्यार से हम इतना दुख देते कि मुँह मोड़ लेती सिसकी लेती हवा। हमें वह प्यार सुनाई देता - हवा का सिसकी लेना।

एक अभिशप्त भविष्य का हम चित्र रचते प्यार में और उसे ज़हर बुझे लिफाफों में एक दूसरे को भेंट करते। एक ज़हरीला संगीत जो हवा में गूँजता रहता, हम उसको सबसे पहले सुन लेते - पर हमें वह प्यार सुनाई देता।

हम जुदाई की मेहँदी रचाते न आने वाली रातों के सपनों में, एक जली हुई सड़क हमारे सामने होती तो कहते थोड़ी दूर चल लेते हैं साथ।

हमें अलग-अलग समयों में जन्म लेना था कहने से पेश्तर एक बार कह लेना था प्यार।

गुलाब के फूलों का ज़िक्र और लड़की आने से छूट गए कैसे नामालूम इस अफ़साने में।

 

रात

कभी मांसल, कभी धुआँती कभी डूबी हुई पसीने में
ख़ूब पहचानती है रात अपनी देह के सभी रंग

कभी इसकी खड़खड़ाती पसलियों में गिरती रहतीं पत्तियाँ
कभी टपकती ठंडी ओस इसके बालों से

यह खुद चुनती है रात अपनी देह के सभी रंग

यह रात है जो खुद सजाती है अपनी देह पर
लैंप पोस्ट की रोशनी और चाँदनी का उजास

ये तारे सब उसकी आँख से निकलते हैं
या नहीं निकलते जो रुके रहते बादलों की ओट

ये उसकी इच्छाएँ हैं अलग-अलग सुरों की हवाएँ

तुम्हारी वासना उसका ही खिलवाड़ है तुम्हारे भीतर
ऐसे ही तुम्हारी कविता

यह एकांत उसकी साँस है
जिसमें डूबता आया है दिनों का शोर और पंछियों की उड़ान

तुम्हारा दिन उसी का सपना है।

 

उन दिनों - 1

अक्सर लगता कि कोई दरवाज़ा खटखटा रहा है, कोई दे रहा है आवाज़, देर से बज रही है फ़ोन की घंटी, बाहर बारिश हो रही है। फ़ोन के मूर्ख चेहरे को घूरना छोड़ कर बाहर आते तो दिखाई देता उड़ता दूर जाता पॉलीथीन का गुलाबी थैला। पता नहीं वे कौन से दिन थे और कौन सा मौसम। एक ज़िंदा ख़बर के लिए अख़बार उठाते तो नीचे से निकल कर एक तिलचट्टा भाग कर छुप जाता अँधेरे में।

सुनाई नहीं देता था कोई भी संगीत कोई चिट्ठी हमारी चिट्ठी नहीं थी, किसी को नहीं करना था अभिवादन, कोई शिकायत नहीं थी सड़क की कीचड़ से या गड्ढे से।

रात आती तो देर तक ठहरती कमरे में और आँख में। सारे मज़ाक ख़त्म हो चुके थे अपने अधबीच, कोई चिड़िया आ जाती भूल से तो रुकी रहती जैसे दे रही हो सांत्वना फिर ऊबकर वह भी चली जाती शाम के भीतर।

पेशाब करते हुए सामने के धुँधले आईने में जितना दिखाई देता चेहरा, उसे देखते और हँस देते अकेले

 

उन दिनों - 2

बातों की सड़क से उतरकर ख़यालों की पगडंडियाँ पकड़ लेते फिर सड़क को भूल जाते और चौंक कर कहीं मिलते कि बात क्या हो रही थी तो वह ख़यालों का ही चौराहा होता। जैसे एक गूँज से बनी सुरंग में अभिमंत्रित घूमते रहते और बाहर की कम ही आवाज़ें वहाँ पहुँच पातीं, कभी कोई आवाज़ आकर चौंका देती तो वह भी गूँज के ही आवर्त में अस्त हो जाता - आवाज़ नहीं चौंक उठाना।

उन दिनों बहुत कम बाहर आना होता था अपने डूबने की जगह से। धूप की तरह आगे-आगे सरकती जाती थी मौत, प्रायः वह खिन्न दिखाई देती। चाँद नीचे झाँकता भी तो फिर घबराकर अपनी राह पकड़ लेता, फूल उदास रहते। खिड़की कोई बंद दिखाई देती तो चाहते खड़े होकर उसे देखते रहें देर तक, देर जब तक शाम उतर न आए।

डूबने से बाहर आते तो बाहर का एक अनुवाद चाहिए होता। इस बीच लोगों के मरने और विवाह करने की ख़बरें होतीं।

 

गिरने के बारे में एक नोट ...

जैसे ही कोई स्वप्न देखता वह उसको देख लेती और हँसने लगती, अगर सपने में मैं होता तो उसको देख लेता कि वह देखती है इस सपने को भी और उसका हिस्सा नहीं है, अलबत्ता उसके हँसने की वजह मुझको साफ़ होती और बड़ी प्रामाणिक मालूम पड़ती कि अजीब ढंग के बिना नाप के कपड़े पहने हास्यास्पद

जबकि अपने बारे में मेरा यह गर्व कि कपड़ों के चयन और सिलाई के मामले में काफी सावधान और सुरुचिसंपन्न व्यक्ति हूँ।

...तो मेरे सपना देखते ही वह उसको देख लेती और उसकी इच्छा होती तो उस सपने में आती भी। अपने आने में लेकिन वह मुझसे बेपरवाह रहती। अपने सपने वह मुझसे छुपाकर रखती रात के कोटर में नहीं अपने स्त्री होने के रहस्य के भीतर... बल्कि मेरे सामने तो वह कभी सोती ही नहीं। जागती रहती और दूर से देख लेती थके कदमों से आती हुई मेरी नींद को। नींद जब मेरे लिए आ रहती तो वह और निरपेक्ष हो जाती, यह जानता हुआ भी कि मेरे देखते ही वह मेरे सपने देख लेगी, मैं सो रहता।

...एक बार तो यह सोचता अपने सपने में कि अगर वह दिखाई देगी दूर से मेरे सपनों को देखती तो मैं बाहर जाकर उससे पूछूँगा उसके सपनों के बारे में - मैं सपने से गिर भी गया था...

 

किसी जगह

किसी भी वक्त तुम वहाँ से गुजरो -
तुम्हें मिलेगा धूप का एक कतरा
जो छूट गया था एक पुराने दिन की कच्ची सुबह से

और वहाँ गूँजता होगा एक चुंबन

बीतते जाते हैं बरस और
पुरानी जगहों पर ठिठका, रुका रहता है
समय का एक टुकड़ा
एक लंबे गलियारे के अंतिम छोर पर

हमेशा रखी मिलेगी एक धुँधली साँझ
और उसमें डूबता होगा एक चेहरा जो उसी समय
और उजला हो रहा था - तुम्हारी आत्मा के जल में

उतरती सीढ़ियों पर तुम्हें विदाई का दृश्य मिलेगा
जो ले जाता था अपने साथ
प्रतीक्षाओं का पारंपरिक अर्थ

कहीं और रखी होगी एक और सुबह
अनपेक्षित मिलन के औचक प्रकाश से चुँधियाई
और शायद इसी से शब्दहीन

किसी मौसम के सीने में शोक की तरह रखा होगा
कोई और कालखंड

और कितनी खाली जगह हमारा आंतरिक
जहाँ रखते हम ये ऋतुएँ,
            ये बरस,
            ये सुबह और
साँझ के पुराने दृश्य।

 

कमीज़

खूँटी पर बेमन पर से टँगी हुई है कमीज़
वह शिकायत करते-करते थक चुकी
यही कह रहीं उसकी झूलती बाँहें

उसके कंधे घिस चुके हैं पुराना होने से अधिक अपमान से
स्याही का एक पुराना धब्बा बरबस खींच लेता ध्यान

उसे आदत-सी हो गई है बगल के
कुर्ते से आते पसीने के बू की
उसे भी सफाई से अधिक आराम चाहिए
इस सहानुभूति के रिश्ते ने आगे आकर ख़त्म कर दी है उनकी दुश्मनी

लट्टू के प्रकाश के इस कोण से
उसकी लटक आई जेब में भर आए अँधेरे की तो कोई बात ही नहीं

 

कुछ नहीं

व्यस्तता छोड़कर एक पल को रुकना होगा
सुननी ही होगी मेरी बात
संक्षेप में कहने को मत कहना
कुछ नहीं है बात - इसी से देर लगेगी

मत पूछना कि इससे तुमको क्या
कि रात के ठीक किस पहर गिरते हैं पारिजात
नीली देह वाली यह शोख नदी
अकेले में क्या कहती है चाँद से

तारों से
रात से

मत कहना ऊब कर कि तुम्हें न बताऊँ
बचपन के बक्से के बारे में
जिसमें रखे पत्थर और काँच के टुकड़े
तुम्हें सौंपने की इच्छा में बिता आया हूँ आयु

रुक कर सुननी होगी
छोटे कोमल बछड़े, समुद्र और हवा के गोपन रिश्ते की कविता
बैठना होगा धैर्य से इस साफ़ पत्थर पर
कण भर भी इस पर धूल नहीं है
बात कुछ भी नहीं है
बड़ी मुश्किल से कहा जा सकेगा उसका थोड़ा-सा अंश
कुछ पल रुकना होगा
सुननी होगी बात

 

भूल

आम बात है प्रेम में शब्दों का भूल जाना
यहीं हम सीखते हैं विरामचिह्नों का महत्व, सुनते हुए
चुप की चीखती आवाज़

हमेशा हाथ लगता कोई ग़लत शब्द
आतुर उँगलियों से टटोलते,
शब्दों के पुराने झोले को - प्रेम में

भूल जाते हम पुरातन शब्द और उतरन की मुद्राएँ
स्मृतियों के झुटपुटे में ऐसे ही रख छोड़ते, अस्तव्यस्त-सी जगह पर
अटपटी भाषा और भंगिमाएँ प्रेम के समकाल की

वाक्य विन्यास और
शब्दों के सुंदर चित्र भूल आए हम संसार की पुरानी मेज़ पर
और
भूल आये कोई थरथराता पुल - धूप में

व्यक्त भाषा के अंतरालों में बैठकर,
हँसते रहते प्रेम में भूले शब्द -
अवश भाषा की पगडंडियों पर जो उग आते
अनचीन्हे जंगली फूल -
इन्हें दोबारा नहीं देख पाएँगे।

 

मेरे पास

मेरे पास जो तुम्हारा ख़याल है
वह तुम्हारे होने का अतिक्रमण कर सकता है
एक चुप्पी जैसे चीरती निकल सकती हो कोलाहल का समुद्र

           मैं एक जगह प्रतीक्षा में खड़ा रहा था
           मैं एक बार सीढ़ियाँ चढ़कर वहाँ पहुँचा था
           मैंने बेवजह मरने की सोची थी
           मैंने एकबार एक फूल को और

           एकबार एक तितली के पंख को ज़मीन से उठाया था
           मैं दोपहरों से वैसा ही बेपरवाह रहा था जैसा रातों से
           मैं रास्ते बनाता रहा था और
           मैं रास्ते मिटाता रहा था - धूल में और ख़याल में

इन बेमतलब बातों के अंत पर आती रही थी शाम

तुम्हारा एक शब्द मेरे पास है
यह किसी भी रात का सीना भेद सकता है और
प्रार्थनाघरों को बेचैन कर सकता है
सिवाय अँधेरे के या गुलामी के पट्टे के
इसे किसी और चीज़ से नहीं बदलूँगा

इसे दोहराता हूँ
कि जैसे माँज के रखता हूँ चमकदार!

 

छींक

छींक एक मजेदार घटना है अपने आंतरिक विन्यास में और बाहरी शिल्प में। अगर एक व्यक्ति के रूप में आप इसे देखना चाहें तो इसका यह गौरवशाली इतिहास ज़रूर जान जाएँगे कि इसे नहीं रोका जा सकता इतिहास के सबसे सनकी सम्राट के भी सामने। "नाखूनों के समान यह हमारे आदिम स्वभाव का अवशेष रह गया है हमारे भीतर" - यह कहकर गर्व से चारों ओर देखते आचार्य की नाक में शुरू हो सकती है इसकी सुरसुरी।

सभ्य आचरण की कितनी तहें फोड़कर यह बाहर आया है भूगर्भ जल की तरह - यह है इसकी स्वतंत्रता की इच्छा का उद्घोष। धूल ज़ुकाम और एलर्जी तो बस बहाने हैं हमारे गढ़े हुए। रुमाल से और हाथ से हम जीवाणु नहीं रोकते अपने जंगली होने की शर्म छुपाते है।

कभी दबाते है इसकी दबंग आवाज़

कभी ढकना चाहते अपना आनंद।

 

घर

घर वैसा ही होगा जब हम लौटेंगे
जैसे शताब्दियों तक वैसे ही रहते हैं घर क़िताबों में

हम क़िताबों की धूल झाड़ेंगे
और घर में प्रवेश करेंगे
वहाँ चूल्हा वैसे ही जल रहा होगा
जैसा कहानी में जलता था और
लकड़ी बुझने से पहले शुरू हो गया था दूसरा दृश्य
वह बुढ़िया अभी भी आराम-कुर्सी में
सो रही होगी जो कुछ सौ साल पहले
ऊँघ गई थी आँच से गर्म कमरे के विवरणों के बीच
इसे एक गोली की आवाज़ ही जगा सकती है
लेकिन मालूम नहीं कब

हम चाहते भी थे कि दुर्भाग्य का वह पन्ना उधड़ कर
उड़ता चला जाए किसी रहस्य-कथा में

हम चाँदनी से भी आरामदेह एक बिस्तर पर लेट जाएँगे
जहाँ नींद की उपमा की तरह आएगी नींद
और हमें ढक लेगी

हम सपना देखेंगे एक घर का या क़िताब का

 

पत्थर

इतने संतुष्ट थे पत्थर
कि उनकी छाया ही नहीं थी
जो लाखों साल वे रहे थे समंदर के भीतर
यह भिगोए रखता था उनके सपनों को

गुनगुनी धूप थोड़ा और देर ठहरे
इस मामूली इच्छा के बीच
वे बस इतना चाहते हैं
कि कोई अभी उनसे बात न करे

 

पुराना पेड़

वह दुख का ही वृक्ष था
जिसकी शिराओं में बहता था शोक
दिन-भर झूठ रचती थीं पत्तियाँ हँसकर
कि ढका रह आए उनका आंतरिक क्रंदन

एक पाले की रात
जब वे निःशब्द गिरतीं थीं रात पर और
ज़मीन पर
हम अगर जागते होते थे
तो खिड़की से यह देखते रहते थे

देर तक

 

पूर्वकथन

संज्ञाओं, परिभाषाओं और उपमाओं पर विश्वास न करता हुआ
खालीपन हूँ चीज़ों के बीच छूटा हुआ

वृक्ष, हवा और यौनिकता एक धोखा है
समझे हुए हूँ यह बात
कामनाओं से अंधा होने के पहले वाले दिन से

नफ़रत से लिथड़ी एक ग़ाली
एक कुत्ते वाला पट्टा
काठ का एक प्रतीकात्मक देवदूत
एक फूल जो भोंडे ढंग से बताएगा प्यार
इन सब को प्यार से चूमता हूँ
या नहीं चूमता
इन पर थूकता हूँ या नहीं थूकता
मेरे मुँह ही नहीं है - लार भी नहीं

भाषा को जोड़ो क़तरा-क़तरा
आवाज़ों और आँसुओं को ध्यान में रखकर
या उलट-पुलट दो इस बेतुकेपन को
बेतुकेपन के लिए और...
और ध्यान रखो इससे तैयार न हो जाए कोई संयोजन
या मत रखो ध्यान

तुक और बेतुकेपन पर आस्था रखता हुआ
मैं आस्था को नहीं जानता ठीक से
जानने को नहीं जानता
पुनरावृत्ति को भी नहीं समय के भीतर

मैं खाली जगह भीतर से भरा हुआ और संदिग्ध
मुझको ग़ाली दो

 

पूर्वज कवि

पूर्वज कवि आते हैं
और सुधार देते हैं मेरी पंक्तियाँ
मैं कहता हूँ कि हस्ताक्षर कर दें जहाँ
उन्होंने बदला है कोई शब्द या पूरा वाक्य

होंठ टेढ़ा करके व्यंग्य में मुस्काते
वे अनसुनी करते हैं मेरी बात

उनकी हस्तलिपि एक अभ्यस्त हस्तलिपि है
                 अपने सुंदर दिखने से बेपरवाह
                 और तपी हुई
                 कविता की ही आँच में

सुबह मैं ढूँढ़ता उनके पदचिह्न ज़मीन पर
सपनों पर और अपनी कविता पर

फुर्र से एक गौरय्या उड़ जाती है खिड़की से

 

पहला

आप पहले कवि हैं इस भाषा के
आप पहले स्वतंत्रता-सेनानी
आप पहले कमीने हैं इस क्षेत्र के
आप पहले ग्रेजुएट, आप पहले दलाल

पृथ्वी की पहली आवाज़ के स्याद्वाद से
अधिक हास्यास्पद हैं ऊपर लिखे वाक्य

क्योंकि हम इतने बीच में हैं इस सब के
कि हम जानते हैं
कि किसी भी चीज़ की शुरुआत के बारे में
हम कुछ नहीं जानते
मसलन यह सड़ा हुआ प्याज
जो कुचला गया हमारी हवाई-चप्पल से
हम नहीं जानते इसकी शुरुआत - प्याज की
सड़न की
चप्पल की
चलने की
यह इतिहास का प्रश्न नहीं है न पुरातत्त्व का
कार्बन-परीक्षण के दशमलवांकित आँकड़ों से अलग
यह झूठ की भाषा का पहला शब्द हो शायद

शुरुआत एक मोहक शब्द है लेकिन अर्थहीन
इसका अलंकारिक महत्व है झूठ की और झुका हुआ

 

ढूँढ़ना-पाना

देह नहीं खोज रहे थे देह में
दुःख की जगहें तलाश रहे थे
एक दूसरे की

इसमें रुकावटें जो थीं
देह की नहीं थीं
एक हिचक थी पुराने किस्म की और भय था

बीच में रेत की नदियाँ थीं
जिनमें चमक आते थे तृष्णाओं के दृश्य

नेपथ्य में रोजमर्रा की आवाजें थीं
अगर संगीत था तो यही था

कुछ और आवाजें थीं जैसे रोशनी की तीखी किरनें कौंधतीं
ये दुस्वप्नों की सलाखें थीं -
जागते नहीं थे डरकर सोते भी नहीं थे

इसी बीच में सब कुछ ढूँढ़ना था
देह को नहीं ढूँढ़ना था देह में
छुपी हुई जगहें तलाशनी थीं दुःख की।

 

किस्सागो

एक बार ऐसा हुआ
कहकर एकबार जब वह रुका

तो ऐसा हुआ कि उसे कुछ भी याद नहीं आया
अभी इतने किस्से थे बताने को
कि गुज़र जानी थीं हज़ार रातें जब वह रुका -
वह खोजता रहा रेगिस्तान, जंगल,
समय और आकाश के भीतर, वह खोजता रहा
और बाहर बैठे रह गए सुनने वाले बहुत सारे लोग

फिर ऐसा हुआ एक बार कि बहुत सारे लोग
मदद को चले गए उसके पीछे उसके भूलने की जगहों पर
और भूल गए किस्सागो का चेहरा
अपने ग्रह आकाश और स्मरण समेत
खो गए सारे लोग, एक भूले हुए किस्से की ख़ातिर
फिर बाहर भूल गए लोग यह सारा किस्सा
ऐसा हुआ एक बार।

 

किस्सा

चलते चलते हम कहानी में उस जगह पहुँच गए हैं
जहाँ चाकू किसी भी चीज़ को काट नहीं पाते
और कूट संकेत बताने वाली चिड़िया की आवाज़
सूख गई है अनाम वृक्ष की टहनी पर।
नदियाँ इतनी शांत
कि धूप में काँच की तश्तरी पर सजाई-सी दिख रही हैं
उदास आँखों वाली मछलियाँ
तहखानों में भर रही है रेत और
पत्थर की मूर्तियाँ उनमें नाक तक डूब चुकी हैं
मंत्रोंवाली किताब की सतरें भुरभुरा कर झरीं
और हवा उन्हें बहा ले गई है प्राचीन वर्णमालाओं के देश में
उबासियाँ लेते नहीं थकते अभिमंत्रित थे जो लोग
वे रुकते हैं तो बस तारीख और समय पूछते हैं,
दूर सुनाई दे रही है भापवाले ट्रेन की सीटी जो उन्हें ले जाएगी।

राजकुमारियाँ झुर्रियों से बेपरवाह
और उनके बाप शतरंज में मशगूल।
सपनों में खजूर खाते हरकारे नींद में मुँह चला रहे हैं,

बुद्धिमान लोग कोई उलझाव गढ़ते हैं,
तो बच्चे उन्हें जूतों के तस्मों की तरह खोल लेते हैं
गोया यह खेल भी ख़त्म पर।

हम अँधेरे में दीवार टटोल रहे हैं कि कोई खटका हाथ लगे,
कि दरवाज़ा दिखाई दे बाहर जाने का।

 

इस समय के किस्सागो को समझे जाने की ज़रूरत है

मृतकों के बारे में बताता हुआ वह मनुष्यों से अपने विवश जुड़ाव
को व्यक्त कर रहा है, कम से कम एक वस्तु तो उन्हें मान ही रहा
है जिसे पहचानता है।

सफ़ेद बर्फ़ जिसमें कोई जीवाश्म भी जीवित नहीं विकिरण भी
नहीं, बताते हुए उसके पास पानी की एक पुरानी (उदास) याद
तो है।

खिड़की के बाहर की स्थिरता जिसमें वायुमंडल की खाली
जगह है और कँटीली झाड़ियाँ, इसमें ही से आपको ढूँढ़ लेने
हैं इतिहास और नृविज्ञान के संदर्भ।

उसके किस्सों में काफी कुछ दर्ज है भाई अब भी।

 

इतिवृत्त

अभी यह हवा है वह पुराना पत्थर
           (चोट की बात नहीं है यहाँ सिर्फ देह की बात है)
यह सर हिलाता वृक्ष पहले उदासी था
यह कील थी पहले एक आँसू
यह रेत एक चुंबन की आवाज़ है मरुस्थल भर
हँसी नहीं था यह झरना -
                   यह आग थी हवा में शोर करती चिटखती
                          अब इसने बदल ली है अपनी भाषा
चाँद पुराना कंगन नहीं था
कुत्ते के भौंकने की आवाज़ थी
परिंदे दरवाज़े थे पहले और आज
जो दरवाज़े हैं वे दरख़्त थे; यह
               सब जानते हैं।

जानना पहले कोई चीज़ नहीं थी
वह नृत्य लय थी : खून की बूँदों पर नाचती नंगे पाँव

शोर चुप्पी से नहीं
रोशनी से आया है यहाँ तक

खाली जगहें सबको जोड़ती थीं।

 

सदी के बीच में

चीख़ें अभी बुझी नहीं हैं और मांस जलने की चिरायँध
किसी डियोड्रेंट से नहीं जाने वाली,
पुराने जख़्मों की बात करना फैशन से बाहर की कोई चीज़ है -
हम दरवाज़ा बंद करना चाहते हैं
उस ओर और इस ओर के लिए।

कोई क्या करे लेकिन इन बूढ़ों का
जो मृत्यु के भीतर रहते थे और अब
उन्होंने उसे पहन लिया है त्वचा की जगह।

एक और बूढ़ा जो हमेशा पेट के बल सोता है धरती पर
वह अपने सीने के छेद में मिट्टी भर लेना चाहता है - वहाँ अब बारूद है।
एक और बूढ़ा बचपन का गीत याद करना चाहता है और
उल्टी करने लगता है इतिहास।

हमारे पास पुराने घर हैं जहाँ
दीवारों से राख झर रही होती है और खाली कमरों में भी नही गूँजती आवाज -

हम क्या करें इसका जहाँ गुलाब रोपने की खुरपी
निकाल लाती है एक कोमल हड्डी।
हमारे पास मोमबत्तियाँ हैं और दवाइयाँ
हम दरवाज़ा बंद करना चाहते हैं
अपनी ओर और उस ओर के लिए।

 

चंदिया स्टेशन की सुराहियाँ प्रसिद्ध हैं

जंगल के बीच से किंवदंती की तरह वह आई प्यास उस
गाँव में और निश्चय ही बहुत विकल थी।

और चीज़ें क्यूँ पीछे रहतीं जब छोटी रानी ही ने उससे
अपनी आँखों में रहने की पेशकश कर दी, लिहाजा
उसे धरती में ही जगह मिली जहाँ की मिट्टी का उदास
पीला रंग प्रेमकथाओं की किसी साँझ की याद दिलाता है।

पहली जो सुराही बनी वह भी प्यास धरने के लिए
ही बनी थी लेकिन कथाएँ तो गलती से ही आगे बढ़ती हैं।

आगे बढ़ती ट्रेन उस पुराने गाँव की पुरानी कथा में
थोड़ी देर को जब रुकती है तो लोग दौड़कर दोनों
हाथों में सुराहियाँ लिए लौटते हैं - कथा में नहीं बाहर
सचमुच की ट्रेन में।

वे भी इसमें पानी ही रखेंगे और विकल रहेंगे,
गलती दुरुस्त नहीं हुई है इतिहास की।

 

आदिवासी औरत रोती है

आदिवासी औरत रोती है गुफाकालीन लय में।
इसमें जंगल की आवाज़ें हैं और पहाड़ी झरने के गिरने की आवाज़,
इसमें शिकार पर निकलने से पहले जानवर के चित्र पर टपकाया
गया आदिम खू़न टपक रहा है,
तेज़ हवाओं की आवाज़ें हैं इसमें और आग चिटखने की आवाज़।
बहुत साफ और उजली इस इमारत के वैभव से अबाधित
उसके रुदन से यहाँ जगल उतर आया है।

लंबी हिचकियों के बीच उसे याद आते जाएँगे
मृतक के साथ बीते साल, उसके बोल, उसका गुस्सा -
इन्हें वह गूँथती जाएगी अपनी आवाज़ के धागे पर
मृतक की आखिरी माला के लिए।
यह मृत्यु के बाद का पहला गीत है उस मृतक के लिए -
इसे वह जीवित नहीं सुन सकता।

हम बहरहाल उन लोगों के साथ हैं
जिनकी नींद ख़राब होती है - ऐसी आवाज़ों से।

 

वक्तव्य

अपने आप में बड़बड़ाते चलने वालों के पास
दूसरों के स्थगित वाक्य हैं।
टल गया जिनका कहा जाना कभी संकोच
कभी हड़बड़ी और अक्सर
समय पर न सूझ पाने के कारण।
आपके ठीक बगल से गुज़रते हुए वे कहते हो सकते हैं
वह वाक्य जो आपसे कहना चाहता था आपका परिचित
और चुप रह गया था पिछले किसी मौसम।

वे यूँ ही याद रखने को दुहरा रहे हों
किसी दूसरे के हिस्से का वाक्य जिसे
आगे किसी जगह पहुँचाना है।
बाज़ दफा जब वे चुपचाप गुज़र जाएँ आपके पास से सोचते कोई बात -
वे सुन रहे होते हैं कान देकर आपके भीतर गूँजते
आपके अनकहे वाक्य।

 

कोई आवाज़ होती

कोई आवाज़ होती और
एक ओर अचानक सब लोग देखने लगते।
जिन्हें अब भी उम्मीद होती|
ऐसे कुछ लोग आवाज़ की जगह के नज़दीक भी जाते -
प्रायः वहाँ हल्की खरोंच और थोड़ी धूल और बदहवासी मिलती।
हताश लोग बैठे रहते कि कोई आकर विवरण सुनाएगा और
वे अविचल बने रहेंगे लेकिन उनके अनजाने -
उनके घुटने बगावत कर चुके होते
और अपने लगातार हिलते पैर का उन्हें मालूम भी नहीं होता।
थोड़ी या अधिक देर होती तो
लोग अपनी हथेली पर रखे दिन-रात को
रेंगते कीड़े की तरह फिर से देखने लगते।
लेकिन जो आवाज़ हुई थी और एक ओर
देखने लग गए थे सब लोग इसने
आज को इतना तो हिला ही दिया होता
कि अगर आज का वृक्ष है तो
कुछ पुरानी पत्तियाँ झर गई हैं उदासी से और
पड़ी हुई ज़मीन पर उड़ नहीं रहीं।

हताश लोग पुरानी दुर्घटनाओं में मारे गए
बहुत पुराने परिचित का विवरण सुनाने लगते
कोई उत्तेजना की लहर आती भी
तो कुत्तों के चैंक पड़ने से आती।

 

हाथ

अभी इस पर धूल की पतली परत है लेकिन
यह मेरा हाथ है जिसे देखता हूँ बार बार
डूबकर जीवन में।

यहीं कहीं हैं भाग्य और यश की पुरातन नदियाँ
कोई त्रिभुज घेरे हुए भविष्य का वैभव,
समुद्र यात्राओं के अनाम विवरण,
किसी चाँद का अपरिचित पठार, कोई रेखा
जिसमें छिपाकर रखे गए हैं आयु और स्वास्थ्य के रहस्य,
गोपन प्रेम की छोटी-छोटी पगडंडियाँ, कोई सुरक्षित दांपत्य का पर्वत
भूत भविष्य की कोई दुर्घटना-किसी पांडुलिपि की लिखावटें -
इसे देखता हूँ एक अधूरे सपने की तरह-समय के आखिरी छोर से।
प्रेम कविताओं की तरह के स्पंदित शब्द
जो लिखे जाने थे इससे, इसे बनाना था कोई चित्र -
अभी बाकि हो प्रेम का कोई अछूता स्पर्श।
इसे बढ़ना था कितनी दिशाओं में मैत्री के लिए
अभी दबाई जानी थी बंदूक की लिबलिबि,

अभी देना था ह्रदय का उष्म संदेश।
मेरी देह से जुड़ा यह हाथ है मेरा
मेरा प्रिय, कितना अपरिचित।

 

सेब

जब इतनी बारिश लगातार हुई
कि डूब सकता था कुछ भी
मैं भागकर कमरे में आया और
उठाकर बाहर आ गया - यह अधखाया सेब।
मुझे याद आया जब लगी थी आग पिछली गर्मियों में
तब भी मैंने बचाया था -
एक अधखाया सेब।
जाड़े में धीमे सड़ती हैं चीजे़ं लेकिन
पाले में उँगलियाँ गलने से पहले भी
मैनें ज़मीन से उठाकर रख लिया था जूठा सेब।
इससे पहले कि इसमें ढूँढ़ लिया जाए कोई संदर्भ
इस बेकार की चीज़ को -
मैं उछालता हूँ आपकी ओर

 

भाषा

अब भला क्या तर्क है इसे स्खलन माने का
कि भाषा ने ही हमें सामर्थ्य दी
कि हम बदल सके अपने रुदन को
एक सामाजिक वक्तव्य में।
शब्द तो आ ही गए थे इसके कुछ पहले
दीर्घकालिक विलापों के बीच की हिचकियों के ठीक बाद
या ठीक पहले, प्रायः जोड़ते हुए मृतक का कोई संस्मरण
या उसका अनुपस्थित।
कभी हम एक पागल सम्राट की तरह भर देते
उसके मुँह में नीली स्याही, कभी बुझा देते एक जलती लाल
सलाख उसके गँदले जल में।
अक्सर एक अनाड़ी की तरह साइकिल चलाते
हम गिर जाते डगमगा कर उसकी पगडंडियों के दाहिनी ओर की घास में,
कभी समुद्र की उत्ताल तरंग की तरह वह हमें
फेंक आती पॉलीथीन, कचरे और विसर्जित देवताओं के बीच।
बहुत दिनों तक जिस रस्सी को हम थामे रहते
समझकर रास, मोतियाबिंद के पीछे से मुश्किल से
दिखाई देता किसी अश्व या रथ का नहीं होना।
इसी के जाम में घोलकर जो हम पी गए थे
एक पागल चाँद, तब कहाँ डूबने देते थे इसमें अपना प्रेम
कभी हम ढूँढ़कर लाते असंगत ऋतुओं के वन, वर्षा और
धूप के प्रसंग और रोप देते भाषा के मैदान पर।
यहीं सीखा हमने क्षोभ, उन्माद और प्यार को
एक धुँधली मुस्कान में अनूदित करने का कौशल।
कभी होता यह एक रिसता हुआ घाव कभी
अनुच्चरित शब्दों की कब्रग़ाह। कभी होती यह आततायी
की तलवार बोलती प्यार। कभी एक ख़ालिस बोरियत
जिसे ढाल देते हम एक सामाजिक वक्तव्य में।
अभी कहाँ सोच पाए हैं उन शब्दों के बारे में जिन्हें
आना है भाषा के भीतर।
शायद भाषा भी देखती हो उनका ही कोई स्वप्न।

 

पानी

अब वही काम तो ठीक से करता, वहाँ भी
पिछड़ ही गया वाक्य सफ़ेद कुर्ते में पान खाकर

तर्जनी से चूना चाटने की तरह कहा जाता
जहाँ उसी आसपास साइकिल अब कौन चढ़ता है
प्रश्न के उत्तर की तरह चलता हुआ ब्रेक इसलिए
नहीं लगा पा रहा था कि रुकते ही प्यास
लगेगी। बिना अपमान के सादा पानी छूँछे
पीकर निकल जाना मुश्किल होते जाने के शहर
में या तो मंत्री हो गए सहपाठी का किस्सा सुनाते
परचूनिए से उधार ले लूँ या पत्रकार बन जाऊँ के विकल्प
को छोड़ कर कविता लिखना तो ट्यूशन पढ़ाने से भी
कमज़ोर काम कि पीटने के लिए छात्र और दाँत
दिखाने के लिए विद्यार्थी की महिला रिश्तेदार भी
नहीं। धूप में साइकिल कहीं रोकने में पुराने पंक्चर
के खुलने का डर तो इस दोगलेपन का क्या
कि जो दरवाजा जीवन से कविता की ओर खुलता
वही दरवाजा कविता से जीवन में लौटने का नहीं।

इस वाक्य ने डरा ही दिया जिसकी चूने वाली मुद्रा
पहले ही बोल चुका जो यूँ सुनाई दिया कि कविता में
भी पिछड़ गया, कम से कम वही ठीक से लिखता।

 

वर्षाजल

अगर धरती पर कान लगाकर सुनो
इतिहास की कराहटें सुनाई देंगी।
सम्राटों की हिंस्र इच्छाएँ,
साम्राज्ञियों के एकाकी दुःख,
स्त्रियों के रुदन की चौड़ी नदी का हहराता स्वर -
गूँजते हैं धरती के भीतर।
ऊपर जो देखते हो इतिहास के भग्नावशेष
सूख चुके जख़्मों के निशान हैं त्वचा पर।
फिर लौटकर आई है बरसात -
जिंदा घावों को धो रहा है वर्षाजल।

 

बारिश

घर से निकलते ही होने लगती है वर्षा
थोड़ा बढ़ते ही मिटते जाते कीचड़ में पिछले पदचिह्न
ढाँढ़स के लिए पीछे मुड़कर देखते ही
ओझल हो चुका होता है बचपन का घर।
घन-गर्जन में डूब जाती माँ-बाबा को पुकारती आवाज़
पुकारने को मुँह खोलते ही भर जाता है वर्षाजल
मिट रही आयु रेखाएँ त्वचा से
कंठ से बहकर दूर चला गया है मानव स्वर
पैरों से उतरकर कास की जड़ों में चली गई है गति।
अपरिचित गीली ज़मीन पर वृक्ष सा खड़ा रह जाता आदमी
पत्रों पर होती रहती है बारिश।

 

और छायाएँ

ऊपर यहाँ इस पहाड़ी मोड़ से -
दिखाई देता है एक पोखर।
आज इसके किनारे बैठी है एक स्त्री
धोती हुई अपने कपड़े और अपनी देह।
मेरे भीतर है यह पोखर जिसके शांत जल में
झाँकती वृक्षों की छायाएँ और आकाश,
किनारे बैठी औरत धोती रहती है अपने शोक।
मैं हूँ वह पोखर जो दिखता ऊपर से
मैं ही हूँ वह औरत जो देखती है - जल में हिलती छाया।

मैं ही वह शोक जो धोया जा रहा इस जल में।
यहीं से ऊपर की ओर
देखता हूँ ऊपर से
जहाँ से दिखाई देता एक पोखर, एक स्त्री और छायाएँ

 

दीवारें

कमरा यह बना दीवारों से
यहाँ वर्जित है आकाश का आना
सुबह को खुली खिड़कियों के अंतराल से ज़्यादा।

कमरे में नहीं होता आकाश तो नहीं होती चिड़िया,
पतंग या लड़ाकू विमान।
नहीं होते सितारे, न बरसती ओस न बरख -
एक हवा होती, रंगहीन, जिसमें
घूमता होता पंखा मीडियम स्पीड पर।
दीवारें रोकती हैं आकाश।
इस गहरी रात में निकलकर बाहर छोटे से इस चाँद के नीचे -
मैं ज़ोर से भरता हूँ फेफड़े में आकाश -
थोड़ा उजला हो जाता, आत्मा का साँवला रंग।

 

धूल की जगह

किसी चीज़ को रखने की जगह बनाते ही धूल
की जगह भी बन जाती। शयन कक्ष का पलँग
लगते ही उसके नीचे सोने लगी थी मृत्यु की
बिल्ली। हम आदतें थे एक दूसरे की और वस्तुएँ
थे वस्तुओं के साथ अपने रिश्ते में।

कितना भयावह है सोचना कि एक वाक्य
अपने सरलतम रूप में भी कभी समझा नहीं
जा पायेगा पूर्णता में। हम अजनबी थे अपनी
भाषा में, अपने गूँगेपन में रुँधे गले का रूपक
यह संसार।

कुछ आहटें बाहर की कुछ यातना के चित्र ठंड में
पहनने के ढेर सारे कोट और कई जोड़े जूते हमारे
पुरानेपन के गवाह जहाँ मालूम था कि धूप
आने पर क्या फैलाना है, क्या समेट लेना है
बारिश में।

कोई गीत था तो यहीं था।

 

उदास साँझ

पहले से उदास होती है उदास साँझ जब
वह पूछती है हमारी आत्मा से
अपनी उदासी का कारण, कभी अर्थ।
निकल पड़ते ही हम वापस
अपने जीवन की पगडंडियों पर पुरानी ओर, प्राचीन दिशा,
ढूँढ़ते हुए यातना, बिछोह ओर प्रेम के धुँधलाए रत्न।
कहीं भी पहुँचें, जाएँ किसी भी दिशा,
उलीच डालें अपनी अंजलि का आत्माजल,
ढूँढ़ पाएँ कितने भी सुंदर तर्क बेचकर अपने जीवन का समकाल,
इतना तो तय है फिलहाल,
पहले से उदास होती है उदास साँझ जब -
पूछती है हमारी आत्मा से अर्थ और कारण।

 

दूसरी ओर से

अगर खूब याद रखें तो भी
थोड़ी ही देर में भूल जाते कि कैसे दिख रहे हैं
हम इस क्षण उस दूसरी ओर से।
कितनी कातर, मुस्कान की हमारी यह मुद्रा
जो दूसरी ओर से दिखती शायद व्यंग्य,
तीसरी ओर से खीज और किसी परम कोण से
होती एक समर्पण।
कैसा दिखाई देता हमारा क्रोध औ हमारा प्रेम,
दूसरे किसी कोण से कैसे दिखते हमारे जीवन के ये कोण।
सभी दिशाएँ बदल जाएँ आईनों में तो भी
बहुत कम होते वह कोण जिधर से
ठीक ठीक हम देख पाते अपने होने का आकार।
और कितनी अनंत वे जगहें
जहाँ के बारे में सोचना भी असंभव
कि कैसा दिखेगा हमारा होना - वहाँ से।
जितना थोड़ा होता हमारे जानने में हमारा होना,
उससे भी कितना कम होता
हमारे जानने में हमारा दिखना।

 

झाड़ू

वे बुहार आएँगी एक रोज़ हमारा अंतरिक्ष।
जिनके टूटकर गिरने के दृश्य में
गूँज उठती थीं हमारी अपूरित चाहनाएँ
आत्मा के खाली कमरे में।
बुझे हुए वो तारे बुहारकर डाल दिये जाएँगे
किसी विस्मृति जैसे ब्लैक होल में।
क्षुद्रग्रहों की धूल से अँटे मैदान पर
एक ओर से पानी सींचते बढ़ जाएँगे देवता अनंत में।
यहीं कहीं पड़े होंगे हमारे शौर्य के मलबे -
कृत्रिम उपग्रह और अंतरिक्ष यान।
निर्वात में चलने के हास्यापद अभ्यास,
फूली वादियों के भीतर, भारहीन उत्तेजना से धड़कते हृदय
और इनसब के बहुअभ्यासित संस्मरणों का पुनर्कथन
बुहारकर फेंक दिए जाएँगे सब
किसी निर्जन से सौरमंडल के कूड़ेदान में।
तब जो थका सा चमक रहा था हमारा अंतरिक्ष
धूल की उदास परत के नीचे,
दीप्त हो उठेगा अपने गर्वीले एकांत में।
फिर वो चाहेंगी कि सजा सजा दें
गेंदे के फूलों से भरा शीशे का गिलास
ब्रह्मांड की खाली मेज़ पर।

 

बाँह उखड़ जाने पर

किसी फूल से उड़कर आई हो यह तितली
एक जंतु की तरह बैठती है त्वचा पर
पहले कभी आते ही बैठती हो सपने की किसी टहनी पर,
किसी असावधान क्षण
रगड़ सकता हो इसको दूसरा स्वतंत्र हाथ.
कोई पानी या जल नहीं बह रहा इसके बहने में
यह जो आ गई है नदी कहाँ को आते जाते,
भले ही भूल की तरह रखा हो जेब में
प्यास की श्वते-श्याम चित्र, और दूसरे किनारे से -
जो बहा आता है विलाप या रुदन
कितनी तीव्रता मापी जाए इस आवाज़ की?
हम आगे आएँ या लौटें पीछे
या जाएँ किसी भी दिशा में
आईना देखें, पुस्तकें या स्त्रियाँ
बहुत बाद में पता चला कि पता नहीं कहाँ
लेकिन पीछे कहीं हम छोड़ आए थे अपना मन।
फर्श पर जो फेंक दी गई है गुड़िया -
मुस्कराती रहती है बाँह उखड़ जाने पर भी।

 

ख़ून

चाहे कितने भी बार काग़ज़ पर लिखा जाए खू़न
कितना यह अलग होता सचमुच के चिपचिपे खू़न से।
अपरिचित गाड़ी से कुचले गए अपरिचित का
जो बहा था ख़ून हमारे अनुपस्थित में -
उसकी कत्थई याद जो चिपकी रह गई हो
सड़क के काले चेहरे पर -
काफ़ी है सिहराने को रीढ़ की हड्डी।
खेलते हुए किसी घरेलू छुरे से
कुलबुलाती है सुरक्षा के कोष्ठक के भीतर
हथेली पर चीरा लगाने की दुर्बल सी इच्छा।
हत्या को भी कहा जाता रहा ख़ून
और वास्तव में देखने के बाद कोई लाश
जिसका की किया गया था ख़ून
वैसा ही नहीं रह पाता आगे बचा जीवन।
एक सैनिक के गर्व से देखते हम
परखनली में निकाला गया जो हमारा ख़ून -
बीमारी जाँचने में।

 

किससे छूट गया

जाने किससे छूट गया खेत में।
आयु, गुलामी, दौड़, ईर्ष्या
किससे छूट गया?
खाता हूँ कीचड़, फफूँद, कीड़े
पानी, हवा, धूप पीता हूँ
छूट ग़या खेत में।
उग आई है घास
कानों में, सीने में, आँखों की कोटर में,
नथुनों से झरते हैं परागकण
मुँह उगलता है बीज
भूल गया साँस लेना, भूल गया शब्द।
ईर्ष्या, दौड़, गुलामी, आयु
किससे छूट गया खेत में।

 

रहस्य

कितने बल से धकेला जाए दरवाजा दाहिने हाथ से
ओर उसके कौन से पल चढ़ाई जा सकेगी बाएँ हाथ से चिटखनी
इसी संयोजन में छुपा हुआ है -
मुश्किल से लग पाने वाली चिटखनी का रहस्य।
इस चिटखनी के लगने से जो बंद होता दरवाजा
उसके बाहर और भीतर सिर झुकाये खड़ी है लज्जा
कि जीवन भर समझ नहीं पाया पुरुष
इसे बंद करने की विशेषज्ञता को सीखने में
स्त्री की अरुचि का रहस्य।
एक विशिष्ट आवाज़ है इस चिटखनी के खुलने बंद होने की
धीरे-धीरे हुई यह दरवाजे की आवाज़ और अब
यह प्रतिनिधि आवाज़ है इस घर की।
इसी से बन सका है घर का हवाओं से एक मौलिक और निजी रिश्ता
खोलते बंद करते छू जातीं उँगलियाँ जहाँ नियम से
छूट गया है वहाँ पर दरवाजे़ का थोड़ा सा रंग
झाँक रहा है नीचे से लकड़ी का प्राचीन रहस्य।

 

चढ़ आया है पानी

देह के भीतर चढ़ता जा रहा है पानी
बाहर आईने में रोज परख रहा हूँ मैं
अपनी त्वचा का आश्वासन,
एक पुराने चेहरे के लिए
मेरे पास है मुस्कान का समकालीन चेहरा।
कल जो कमर तक था पानी आज
चढ़ आया है सीने तक
सुनाई देने लगी है कानों में हहराते पानी की आवाज़
दिखाई देते हैं फुनगी के थोड़े से पत्ते
डूब जो चुकी है पगली झाड़ी।
किसी पर्व की रात सिराए दीपक सी
अब भी डगमग उतराती हो आत्मा
इसी बढ़ते जल में

 

एक जगह

उदासी एक जगह है
जैसे कि यह शाम जहाँ अक्सर मैं छूट जाता हूँ।
मुश्किल है बाहर का कुछ देखना-सुनना।
उदासी की बात सुनकर
दोस्त बताते हैं नज़दीक के झरनों के पते
जहाँ बीने जा सकते हैं पारिवारिक किस्म के सुख।
पता नहीं यह अँधेरा है,

या नींद,
या सपना, जिस पर,
गिरती रहती है झरने-सी उदासी।
मेरी हर यांत्रिक चालाकी के विरुद्ध
मेरी अनिद्रा, मेरा प्रत्युत्तर है मुझको इस समय।
और एक जगह है यह अनिद्रा भी, जिसके भीतर
सोकर, नींद भूल गई हो - बाहर का संसार।
पत्थर हो चुके इसको खोजने निकले राजकुमार।

 

भाषा

मैं अपनी धूल हटाता हूँ
कि देखो वहाँ पड़े हुए हैं कुछ शब्द।
मेरे होने की संकेत लिपि से बेहतर,
विकसित भाषा के शब्द ये -
शायद इनसे लिखा जा सके निशब्द।

 

फिर लौटकर

घूमकर वापस आती है ऋतुएँ,
पागल हवाएँ, बीमार चाँद और नदियों की याद
वापस आते हैं घूमकर
घूमकर आता है वही भीगा हुआ गीत।
जहाँ अब भी झर रहे हैं पारिजात के फूल।
घूमकर याद आती है कोई बुझी हुई सी जगह
चमकने लगतीं जैसे सभ्यताएँ
हटाकर पुरातत्व की चादर।
घूमकर लौट आता है मृत्यु का ठंडा स्पर्श,
स्नायुओं का उन्माद और कोई निर्लज्ज झूठ।
घूमकर वापस आती है पृथ्वी हाथ की रेखाओं में,
लौटकर अस्त होता सूर्य अक्सर पुतलियों में,
अभी-अभी तो लौटा है साँसों में आकाश,
घूमकर वापस लौटता ही होगा कोई
जीवन कण अनंत सेँ

 

कुर्सी

सर्दी, पानी, धूप-घाम के बीच
बाहर में पेड़ के नीचे
किसी तरह से छूट गई है कुर्सी।
उजड़ चुका पुराना रंग,
जंग लगे कीलों से जुड़े जोड़ों में,
धीमे-धीमे जमा हो गई हैं चरमराहटें।
एक दिन शेष हो जाएँगे
इस पर बैठने वाले का संस्मरण सुनाते अंतिम लोग।
बताना मुश्किल होगा इसकी अस्थियों से
इसका विगत विन्यास,
नये और अपरिचित लोगों के बीच -
जब खुल जाएँगी इसकी संधियाँ।
इससे पहले ही किसी शिशिर में शायद
एकमत हो जाएँ कुछ लोग
दहकाने को इससे -
एक साँझ का अलगाव।

 

पीठ

अनंत कदमों भर सामने के विस्तार की ओर से नहीं
पीठ की ओर से ही दिखता हूँ मैं हमेशा जाता हुआ।
जाते हुए मेरी पीठ के दृश्य में
पूर्वजों का जाना दिखता है क्या?
तीन कदमों में तीन लोक नापने की कथा
रखी हुई है कहीं, पुराने घर के ताखे में।
निर्वासन के तीन खुले विकल्पों में से चुनकर
अपना निर्विकल्प, अब मैं ही था सुनने को
निर्वासन के आत्मगत का मंद्रराग।
यदि धूप और दूरियों की बात न करें हम
जाता हुआ मैं सुंदर दिखता हूँ ना?

 

मिट्टी तेल

चाहे कुछ भी कहते हों उसका संभ्रांतजन
हमारी ओर तो मिट्टी तेल ही पुकारा जाता रहा हमेशा उसे
पुरानी घटना नहीं है इससे जलती लालटेन की उजली रौशनी में
दीवार पर डोलती परछाइयाँ।
कहाँ ख़त्म हुई है हवा से
पंप वाले स्टोव की भरभराती आवाज़।
जितने गहरे से यह आया है ऊपर
पार करते कितने तरह की मिट्टियाँ -
उससे भी गहरा मिट्टी से इसका अनुराग
कि मिट्टी तेल से भी नहीं जलती हमारी धरती
जो अब तक बनी हुई है मिट्टी से।
आज लौटे हैं लेकर इतनी सारी आग
लाखों साल पुराने हमारे पुरखे, हमारे जीव।
घूमते इतने सारे लोग सड़क पर
भीतर इतने कल का मिट्टी तेल, अगर कोई
सुलगा ले माचिस से अपनी तर्जनी की पोर
जल पाएगी थोड़ा पहले
क्या थोड़ी सी भी आग?

 

हमारे सुंदर दुःख

इसी से तो ले आए थे उन्हें यहाँ इस डूबते से मैदान पर,
हम चाहते थे कि दूसरी ओर से हमेशा
एक धीमे बुखार में तपते दिखाई दें - हमारे सुंदर दुःख।
बहुत कठिन और अनेकार्थक बिंबों वाली संरचनाओं के भीतर रखकर
अपना गोपन प्रेम, हम लौट आए थे अपने समकाल में।
यहीं सजे हैं हमारे दिव्य पराभव और सोने का पानी चढ़ी सफलताएँ
काफी समय तक जिन्हें हम समझते रहे अपनी भाषा
फिर घिसकर दिखने लगा था नीचे का-सस्ता सा धात्विक।
एक ओस भीगी टहनी पर जल्दी से रखकर अपने आँसू
हमने पहन लिए नज़र के चश्मे -
और जो माँगते रहे एकांत सूर्य से, स्त्री से और संसार से
और जो माँगते रहे एकांत अरण्य से, पुस्तक से और अंधकार से
                             - क्या करते उसका?
कुछ शब्द थे जिन्हें बदल दिया हमने ठीक उनकी नाक के नीचे।
बड़ी मुश्किल थे उठाकर यहाँ तक लाया जा सका उन्हें, इतने
जर्जर थे कुछ सपने कि उनसे झरती ही जा रही थी राख़।
यहीं हमसे टकरा जाते थे हमारे पूर्वज कवि
छड़ी के सहारे टटोलते हुए रास्ता,
प्रायः वे ही माँग लेते थे पहले माफ़ी।
यहाँ कोई नहीं करता था नींद की बातें,
इतने नज़दीक से भी पहचान नहीं पा रहे थे अपने ही बच्चे को,
यहीं दिखाते रहे वो सारी भंगिमाएँ -
कि जिससे वाजि़ब मान लिया जाता था हमारा ख़ून की
एक नुची-चिथी कपड़े की गेंद सी वह पड़ी हुई है किनारे -
हमारी आत्मा

 

अनुपस्थित

सामने दीवार पर, चौखुट भर
जगह है एक तस्वीर की
कोई तस्वीर नहीं है एक जगह है -
तस्वीर के न होने की, और
यह न होना भी इतनी पुरानी घटना कि
पिछले बार की पुताई में मिल नहीं पाया था -
इस चौखुटे से-पुती हुई बाकी दीवार का रंग।
अलग से और उजला दिखने लगा है इस खाली जगह का खाली रंग
एक जि़द की तरह की गई दोबारा पुताई बस इस चौखुटे भर।
क्या था इस जगह पर?
देवता-पितर या शाश्वत झरते झरने का भूदृश्य?
कोई प्रमाणपत्र?
याद करते हुए देखने लगता हूँ खिड़की से बाहर दूर -
एक सूखा वृक्ष और उसकी टहनियाँ, जैसे
खाली जगह हरे पत्तों के न होने की।
अपने अनुषंगों के साथ आती जाती रहती उस पर भी वर्षा
और गहराता जाता सूखी टहनियों के बीच का अनुपस्थित हरा रंग।
निशब्द घुस जाता असमय मारा गया दोस्त सोचने की
धुँधली कोठरी में।
भूल की तरह आ जात जिसका नाम जीवित दोस्तों की महफि़ल में
फिर और साफ दिखने लगती वह जगह दोस्त के न होने की,
इसके बाद दिखने लगता शब्दों का न होना शब्दों के बीच।
अंततः की तरह लौटते हुए अपने कमरे
सामने दीवार पर - कोई तस्वीर नहीं है एक जगह है
तस्वीर के न होने की।
अपने अनुपस्थित की तरह देखता हूँ यह, अपना कमरा।
मेरे अनुपस्थित की तरह देखता है यह मुझको।

 

चेतावनी

और जबकि ख़त्म करते ही यह कविता
यह मान लिया जाएगा कि आपको दी जा चुकी थी चेतावनी
मेरा अनुरोध है कि आप छोड़ दें
घटनाओं को नज़रअंदाज करना।
कल ही अभी जब नाती के साथ मिलकर
आप पानी दे रहे थे घास में,
चौदह वर्ष के बाद नाती के जीवन में घटित
प्रेम की पटकथा लिख गई थी हरे घास
और पानी की भाषा में।
सड़क पार करते हुए किसी शाम
जूते के नीचे आकर बहुत थोड़ा चरमराई थी जो पन्नी
उसी के कारण ठिठक जाएगा कोई चीखता वाहन
आपको कुचलने और न कुचलने के असमंजस में।
अत्प्रत्याशित नहीं है आयु के इस खंड में आया प्रेम
शायद आप भूल चुके हैं वह दोपहर
जब आपके हाथ से छूट गई थी
नीले स्याही की खुली दवात ज़मीन पर।
अच्छी नहीं मानी जा रही यह आदत
ताल देने की पथरीली रेलिंग पर उँगलियों से -
इसी से गुमसुम रहने लगा है प्यारा तोता आपका।
कुछ सोचते हुए अनायास, जो बजा देते हैं आप सीटी -
बढ़ती जा रही आपके ऑफिस में उमस आजकल।
और बेकार होगी कोशिश कि आप याद करें कोई पुरानी घटना -
ढूँढ़ते हुए अभी-अभी की घटना का पूर्वरंग।
और कितनी चेतावनी दी जा सकती है किसी को लिखकर
कि लिखते हुए ये थोड़े से शब्द
हम रच रहे हों - ठीक छब्बीस माह, चार दिन,
तेइस घंटे और चौदह मिनट बाद
जो पढ़ा जाएगा शोक प्रस्ताव।

 

उतर गया है पानी में

बढ़ते-बढ़ते उतर गया है -
छाती तक पानी में।
अचरज नहीं, तट की बजाय
विगत ग़लतियाँ याद आने लगें।
मंथर गति से हलकोरते
गहरे उतरते पानी में -
गूँजता है घमासान पुरानी हिंसाओं का
खोपड़ी में।
अब तक बाहर बची एक तिहाई देह में
दहाड़ते हैं प्राचीन दुःख।
चारों ओर अपरिमित जल है आँसू नहीं है।
कहाँ से आ रही है वंशी की पुरानी टेर?
मुड़ते ही जो हो गया पत्थर -
क्या कहेगा जल?
और दावानल?
अक्षुण्ण अग्नि की लपलपाती शाखाओं को
धारण किए -
बढ़ते बढ़ते उतर गया है
छाती तक पानी में।

 

शायद

बातचीत में शायद की जगह
शायद के अनिश्चित से इतनी निश्चित
कि बदल देती निश्चित चीज़ों के अर्थ और संबंध।
एक शायद के पहले कितना मज़बूत था प्यार?
शायद के बाद बदल जाता किसी संसार में शांति का आकाश।
एक शायद के गरजने लगते लड़ाकू विमान,
कहीं रुक जाता वसंत, मुस्कान की कोर पर।
शायद जैसे चील की उड़ान का सौंदर्य,
जैसे हवा में चल चुका कोई तीर।
किसी हाँ और ना के बीच धड़कता हृदय,
समय के दो बिंदुओं के बीच एक स्पंदित संभावना -
जिसके पीठ की ओर खड़ी हो मृत्यु और सम्मुख जीवन।
भविष्यकथनों और हस्तरेखाओं के रहस्य लोक का वृद्धसृष्टा,
स्वर्ग और नर्क के बीच
पृथ्वी जैसी एक संभावना।

 

बीज

जंगल की आँख हैं बीज जिससे
देखते हैं जंगल धरती के भीतर का जीवन।
कितने पत्थर, कितना जल
कितना लावा, कितना प्यार सीने में रखकर
रचती है पुरातन धरती एक वृक्ष का स्वप्न।
एक चिड़िया जिसे
जन्म लेना है बाद के किसी साल
उसके भी सपने में है इसी बीज की देह
जिस पर उसको रचना है अपना नीड़।
तब जो एक वृक्ष होगा या एक झाड़ी
उसी के अँधेरे की आस में जन्मेगा एक साँप।
चुपचाप कहीं को जाती चींटियाँ
अगली पीढ़ियों के कान में कह देंगी इस बीज का रहस्य।

इसी की छाल से रगड़ी जाएगी कोई बनैली देह।
बीज को हथेली पर रखकर
केवल वर्षा के बारे में सोचना चाहिए।

 

राख

ढेर सारा कुछ भी तो नहीं जला है इन दिनों
न देह न जंगल, फिर कैसी यह राख?
हर ओर?
जागते में भर जाती बोलने के शब्दों में,
किताब खोलो तो भीतर पन्ने नहीं राख!
एक फुसफुसाहट में गर्क हो जाता चुंबन
और ज़ुबान पर लग जाती राख!
राख के पर्दे,
राख का बिस्तर,
हाथ मिलाने से डर लगता
दोस्त न दे थोड़ी सी राख।
बहुत पुरानी घटना हो गई कुएँ ताला का पानी देखना,
अब तो उसक ढके हुए है राख।
राख की चादर ओढ़कर घुटने मोड़े
मैं सो जाता हूँ घर लौटकर
सपनों पर निःशब्द गिरती रहती है - राख।

 

चील

कोई मयूरपंखी सपना नहीं है इस समय
जो खींचकर ले जाता मुझे आगे
पीछे कुछ चट्टानें हैं दुःख की जिन पर
थोड़ी देर को पीठ टिकाकर मैं
सीधी कर सकता हूँ अपनी रीढ़।
प्यास से थोड़ा बाहर दिखाई दे रहा है एक कुआँ
मैं लोटे के लिए अपनी गठरी में हाथ डालता हूँ
ढनढनाकर बजरी पर लुढ़कती
दूर चली जाती है आत्मा
वहाँ नहीं है कोई झाड़ी
न मेरे तलवे किसी पक्षी जितने उजले,
इस सांत्वना के नज़दीक एक नींद है जिस पर
बहुत थोड़ा भरोसा, अब भी बचा हुआ है मेरा।
बहुत ऊपर आकाश में घूमती रहती है एक चील।

 

कीचड़

थोड़ी भी बारिश हो जाए आजकल
कीचड़ ही कीचड़ हो जाता है हर ओर
पहले कहाँ होता था ऐसा?
और काली सड़क के दोनों ओर की यह चिकनी मिट्टी
किसी दूर देश से लाकर बिछाते हैं इसको ठेकेदार।
कैसा तो रुग्ण पीला इसका रंग, पानी पड़ते ही हो जाता गिचपिच।
इसके खूब नीचे ही मिल पाती इस देस की लाल मुरुम वाली माटी,
रिसकर चला जाता पानी नीचे और नीचे
उपर से सूखी और मज़बूत बनी रहती थी यहाँ की धरती।
पर आजकल अगर थोड़ी भी बारिश हो जाए
हो जाता है कीचड़ हर ओर।
कितने भी रगड़े जाएँ पाँव बाहर पाँवदान पर
चला ही आता कुछ न कुछ कीचड़ भीतर फिर
कितने भी जतन लगा ले गृहस्वामिनी
कम से कम बारिश की मार तो नहीं ही उतरता फर्श से पीला मटमैला रंग
और कितनी तो फिसलन हो जाती इस कीचड़ से,
चलते चलते लगता अड़ा दी हो किसी शोहदे ने लँगड़ी
या चाहती हो यह धरती ही हमारा फिसलकर गिरना।
गिरते ही लग जाता हथेलियों पर, घुटने पर, कुरते पर कीचड़।
सँभाला भी नहीं जाता है चश्मा।
थोड़ी सी बारिश होते ही आजकल।

 

रात

तारों में छोड़कर आए थे
हम अपना दुख
यहाँ इस जगह लेटकर
इसीलिए देखते रहते हैं तारे।
गिरती रहती है
ओस।

 

इसी के आलोक में

एक रिसता हुआ घाव है मेरी आत्मा
छिदने और जले के विरुद्ध रचे गए वाक्यों
और उनके पवित्र वलय से भी बाहर की कोई चीज़।
एक निष्ठुर ईश्वर से अलग
आँसुओं की है इसकी भाषा और
यही इसका हर्ष
कहाँ रख पाएगी कोई देह इसको मेरे बाद -
यह मेरा ही स्वप्न है, मेरी ही कविता,
मेरा ही प्रेम है और इसीलिए -
मेरा ही दुःख।
इसी के आलोक में रचता हूँ मैं यह संसार
मेरे ही रक्त में गूँजती इसकी हर पुकार
मेरी ही कोशिका में खिल सकता -
इसका स्पंदन।

 

रुका रहता है

किसी भी वक्त तुम वहाँ से गुजरो -
तुम्हें मिलेगा धूप का एक कतरा
जो छूट गया था एक पुराने दिन की कच्ची सुबह से
और वहाँ गूँजता होगा एक चुंबन।
बीतते जाते हैं बरस दर बरस और
पुरानी जगहों पर ठिठका, रुका रहता है
समय का एक टुकड़ा।
एक लंबे गलियारे के अंतिम छोर पर
हमेशा रखी मिेगी एक धुँधली साँझ
और उसमें डूबता होगा एक चेहरा जो उसी समय
और उजला हा रहा था - तुम्हारी आत्मा के जल में।
उतरती सीढ़ियों पर तुम्हें विदाई का दृश्य मिलेगा
जो ले जाता था अपने साथ
प्रतीक्षाओं का पारंपरिक अर्थ।
कहीं और रखनी होगी एक और सुबह
अनपेक्षित मिलन के औचक प्रकाश से चुँधियाई
और शायद इसी से शब्दहीन
किसी मौसम के सीने में शोक की तरह रखा होगा
कोई और कालखंड
और कितनी खाली जगह हमारी आत्मा के भीतर
जहाँ रखते हम ये ऋतुएँ, ये बरस, ये सुबह और
साँझ के पुराने दृश्य।

 

नहीं

चलते हुए नहीं
बहुत चलकर रुकने में सुनाई पड़ती हैं
हड्डियों की चरमराहटें।
लू भरे किसी मैदान पर नहीं
ठहरे हुए इस पड़े के नीचे
साँसों में बवंडर की तरह
घूमने लगती है धूल।
किसी साँझ में नहीं
थकन की गोधूलि पर
पुतलियों में डूबता है सूर्य।
त्वचा में नहीं, पहले
आत्मा में ख़त्म होती हैं सिहरनें।
अपने गाँव से बहुत दूर की अपरिचित इस बस्ती में
कोई तैरता है बचपन की नदी में।
दोपहर की प्यास के ऊपर
गिरती है पिछले बरसात की बारिश।

 

मक्खियाँ

अगर हमें फिर से न पढ़नी पड़तीं वे किताबें,
बच्चों को पढ़ाने की खातिर,
तो अब तक हम भूल ही चुके होते उन गंदी जगहों के विवरण
जहाँ से मक्खियों के बैठकर आने का भय दिखाते हैं -
सदा स्वस्थ लोगों के
शाश्वत हँसते चित्र।
वे चाहें तो हमें इतना परेशान कर दें
कि थोड़ी देर को छोड़कर वह ज़रूरी काम
हम सोचने लगे
नुक्कड़ से चाय-सिगरेट पीकर आने के बारे में।
और जहाँ -
सोचना भी मुश्किल गुड़, जलेबी,
नाली और घूरे के बारे में.
मुस्कराते और गुरगुराते एयर कंडीशनरों वाले
काँच से घिरे गंभीर दोस्त के कमरे में -
उन्हें देखा जा सकता है उड़ते
उदास सहजता की पुरानी उड़ान में।
और उनके दिखने पर थोड़ी अतिरिक्त जो
दोस्त की प्रतिक्रिया है - उससे आती हँसी को -
ढाल देते हम
उसके नौजवान दिखने की खुशामद में।

 

जीवन-कविता

एक कविता पढ़ने भर समय के बाद
किताब से सिर उठाते में
कुछ माईक्रॉन की धूल चढ़ आई थी
मकानों, मशीनों और वस्तुओं पर।
अपने डूबने के कोण पर कुछ अंश खिसक चला था सूर्य।
धूल में बने चौकोर खानों में
एक पाँव से उछल उछल कर
दिशाओं को फलाँगने का खेल खेलती लड़की
खेल का अंत जान गई थी माँ की पुकार में।
अपने उद्दंड भविष्य की ओर कुछ कदम
बढ़ चला था कोई लड़का ठोकर मारते किसी टीन के डब्बे को।
अपनी सूखती शिराओं को पीलेपन में थोड़ा और
जान गई थी कोई पत्ती उसी समय
उसके ठीक बगल में कोई अँखुआ
थोड़ा सा ज़्यादा देख पा रहा था बाहर का संसार।
अनुत्पादकता की दिशा में घूमती धरती
अपने क्षण को थोड़ा और धारण करती थी विकिरणों में।
कुछ नई रेखाएँ अपनी नींव डालती थीं
आयु के भय से सिहरती त्वचाओं में।
थोड़ा सा समय जीवन का कम हुआ जितने में
थोड़ा सा और बताती थी कविता जीवन के बारे में।

 

नेपथ्य

और जैसे कि इस छोटी सी पत्ती के नेपथ्य में है
धरती की गर्म तहों का भीतरी जल
और किसी बीज का सपना।
रंगों के नेपथ्य में बैठा है
जली हुई पुतलियों वाला चित्रकार
किसी दोपहर जो देखता रहा था
सूर्य की आँखों में देर तक।
स्मृतियाँ तो खुद ही इस समय का नेपथ्य हैं
उनके नेपथ्य में व्यतीत समय की आहटें हैं और
न पढ़े गए शोक प्रस्तावों की तरह के प्रेमपत्र।
बीमार इच्छाएँ और पागल कविताएँ हैं
ऋतुओं का नेपथ्य।
क्रूरताओं के नेपथ्य में हैं बड़ी-बड़ी इच्छाएँ
और अँधेरी जगहें मन की।

 

कल के लिए

एक शोकगीत की आवाज़ की तरह
पार करता हूँ इस रुके हुए दिन की दूरियाँ।
एक प्याली भर स्याही में डुबोता हूँ पलकें
आँख भर नींद के लिए।
इन्हीं पलकों से निकलकर सूर्य
बनाता आया है कल का दिन।

 

भाषा लेकिन भूल गया था

निर्विवाद थी उसकी गंभीरता इसीलिए
भय पैदा कर लेती थी हर बार -
मुझे भी डर लगा उस रात जब गंभीरता से कहा दोस्त ने
कम होती जा रही हैं गौरय्याँ हमारे बीच।
उम्मीद की तरह दिखाई दी
एक गौरया दूसरी सुबह, जब
दुःस्वप्नों की ढेर सारी नदियाँ तैरकर
पार कर आया था मैं रात के इस तरफ।
मैंने चाहा कि वह आए मेरे कमरे में -
ताखे पर, किताबों की आलमारी पर,
रौशनदान पर,
आए आँखों की कोटर में, सीने के खोखल में,
भाषा में, वह आए और अपना घोसला बनाकर रहे।
मैंने चाहा कि वह आए और इतने अंडे दे
कि चूज़े अपनी आवाज़ से ढक दें -
दोस्त की गंभीर चिंता।
इतने दिनों में उसे बुलाने की
भाषा लेकिन मैं भूल गया था।

 

आग

पृथ्वी पर कैसे आई आग?
प्रश्न से काफी पहले से होती आई आग।
यज्ञ से या चोरी से, प्रार्थना या छल?
सूर्य से या तड़ित से, युद्ध या आशीष?
देवताओं के ही पास होनी थी, जो कैसे आई आग?
कैसा होता हमारा संसार आग से खाली?
एक बर्फ का गोला, एक सहमत जनसमूह?
कहाँ जाते प्रदक्षिणा को चले हुए अनंत कदम?
किन शून्य शिखरों पर टँगे होते आँच तपे गान?
ठंडी क्रूर योजनाओं के विस्तार को कैसे कोई करता पार
बगैर आग की तलवार?
आग की नाव पर करे हम पार जीवन का समुद्र,
आग में शेष नहीं होता अगर आत्मा का जल -
तो कहाँ करते अपना तर्पण
हम आग से खाली इस संसार में।

 

अँधेरा

अगर देखा जाए तो सबसे ज़्यादा जगह होती अँधेरे के ही भीतर।
कितनी आसानी से समा जाता हमारी धरती का आधा हिस्सा
उसके चौड़े सीने में।
उसी के भरोसे, उसी के भीतर छोड़कर उठ जाते हैं हम
अपने रात के दुःख, सुबह की पुकार पर, वहीं छिपा आते
अपना पिटा हुआ चेहरा या खरोंच लगी आत्मा।
अपने काले जीभ से चाटता छुरे की धार अँधेरा
धारण करता है अपने हृदय में हमारा आतंक। इसी में
किसी किनारे ढककर रखते हैं हम अपना भय, यहीं अगोचर
रिसता रहता ख़ून, इसी के लबादे में पोंछता है प्रेम अपने
आँसू, यहीं विसर्जित करने आते हम अपने उजड़े फूल।
दबे पाँव संकोच से अँधेरे का आना कि जैसे
क्षमाप्रार्थी हो घर न पहुँच पाए लोगों से। झींगुरों, वनपशुओं
और थकन के अनंत समुद्र के लिए कितना कोमल कि लेकर
आता नींद, लेकर आता जीवन।
कभी उस ओर से भी देखें उसका जहाँ उजाले
में नहीं खड़े होते हम और स्याह हुआ करता जब
आत्मा का भी रंग।

 

एक दिन

पार उतरने से पहले,
छू कर नदी का जल, मैं किसे याद करूँगा?
थोड़ी देर को रुक जाएगा दिशाओं में हवा का गान,
किसी सूर्य और आकाश को नहीं,
देखता हुआ कोई निरर्थक घास -
कुछ देर ऐसे ही बैठा रहूँगा।
एक दिन मैं भी इसी तट आऊँगा पूर्वजों
तुमसे ही पूछूँगा इस नदी को पार करने का मार्ग
पुण्य से या शोक से,
ज़िद से या शौर्य से,
पाप से या कविता से,
कैसे तुम पार उतरे पितरों?
अधूरे शब्दों से बनाकर टूटी नाव,
गर्म धूल आँखों में भरे,
युद्ध क्षेत्र से बचाकर अपना खोखला सीना
एक दिन मैं भी इस तट आऊँगा पूर्वजों।
पार करूँगा यह नदी।

 

कुछ पड़ गया है आँख में

क्या पड़ गया रे आँख में?
जलती रहती आँख निकलते रहते आँसू
आग-पानी साथ-साथ का कितना सुंदर बिंब
कुछ पड़ गया है आँख में।
कुछ तो भी उड़ता ही रहता हवा में,
राख या रेत क्या मालूम
मलते-मलते लाल हो जाती किरकिराती आँख -
डरता नहीं फिर भी एक कुत्ता भी -
आँख में कुछ पड़ गया है रे!
कुछ तो बढ़ा है इन दिनों हवा में
धुआँ या धूल या क्या पता कोई रसायन
कौन मिलाता रहता है रे ये सब?
जलती रहती आँख
निकलते जाते आँसू
मलते रहते आँख
देता भी नहीं कुछ साफ दिखाई
राह चलते पड़ जाता कुछ अक्सर आँख में।

 

मिलने गया था

बीच में अपने बोलने के वाक्य ही में डूब जाता फिर कुछ
देर पर उसी डूबने की जगह से उसकी थकन बुदबुदाने लगती। कमरे
में अँधेरा छा जाता। कई सूर्यास्त और साल डूब गए उसके बोलने में,
डूबने में, इतने दिनों के बाद वह लौटा था।

बाहर भी गहराती होगी शाम सोचते उठने के मेरे उद्विग्न से
बेपरवाह उसके बोलने में शत्रुओं, स्त्रियों और समर्थ लोगों पर
हिंसा की असमाप्त नदियाँ, इतना उदास और साँवला
होना था जिनका पानी कि अपने भीतर डुबोने का
दु:स्वप्न रचतीं, बहतीं फिर बहना भूल जातीं।
उधड़ी हुई जगहों से रेत और जिंदगी के सूख चुके साल
झरते रहते।

कितना ग़लत था सोचना कि पुराना कवि अपने डूबने में बाहर
कोई जगह खाली करता है नए कवि के लिए, अपने मरने में
बूढा चित्रकार नौजवान चित्रकार के लिए... और ऐसे ही बाकी सब।
बस थोड़ा असावधान था यह कि आसानी से व्यवस्था
इसका शिकार कर पाई और इतना तो अकेला कर ही पाई
दूसरों को जितना यह होता था बाहर।
जितना यह होता था हमारे भीतर हम इसके भीतर वह भी
डूबा इसके डूबने में, क्या फर्क की ये मात्राएँ अलग अलग?

ऐसा नहीं तो क्यूँ उदास कर पाती यह बात मुझको लौटते में
और फिर ये भी कि इससे मिलने जाता ही क्यूँ?

 

पोलिश कवि ज़्बीग्न्येव हेर्बेर्त के लिए छह कविताएँ

नेलकटर

नेलकटर आदमियों से चिढ़ता है, वह एक भूखा जंतु है लेकिन आप उसे कीट-पतंगों या सरीसृपों में से
किसी भी समूह में नहीं रख सकते। अपनी आंतों की बीमारी से दाँत किटकिटाता वह अपनी चिड़चिड़ाहट के बीच भी आपके हाथ की सुस्ती पर तेज़ निगाह रखता है।

उसके काटे जब आप उसे ज़मीन पर गिरता या टेबल पर बेपरवाह पड़ा छोड़कर डिटॅाल
खोजने लगते हैं तब ऐसे में कभी एक पल रुककर उसके शैतानी से हँसते मुँह को देखिएगा। आपको अपनी ओर देखता देखते ही यह भोला निर्जीव-सा मुँह बना लेगा।

 

खिड़कियाँ

ये खिड़कियाँ ही हैं जो आखिरी तक हमारे सुधार की कोशिश कर रही हैं। कितना भी इन्हें बंद रखा जाए
ये दीवार न होंगी। थोड़ी मशक्कत से खुल जाएँगी धूप और हवा और धूल की शोर की ओर। विस्मृति
के विरुद्ध हमारी लड़ाई ये ही लड़ रहीं हैं। ये चाहती हैं हमें याद रहें सुबह और शाम के रंग, साइकिल
चलाते और बीड़ी पीते लोग। हमारा बाहर इन्हीं के फेफड़ों से गुज़रकर हमारी साँस में पैवस्त होता आया है।
बारिश जब इनसे ज्यादा लाड़ दिखाने लगती है तो ये उसको डाँट भी देती है।

 

भाषाएँ

भाषाएँ एक निराकार की ओर जाना चाहती हैं। बगैर उतार चढ़ाव वाली एक सार्वत्रिक आवाज़ में अंतिमतः विलीन होकर वे अभिव्यक्ति को पूर्णता देने के प्राचीन मिशन पर कार्यरत हैं। शब्दकोश वे अपनी दीर्घायु के लिए नहीं बढ़ा रहीं बल्कि वे सबकुछ समेट कर ले जाना चाहती हैं अपनी अंतिम इच्छा के समुद्र में। गणनाएँ उनके विरुद्ध हैं, कविता और संगीत उनके साथ। यह चुप का एकांत नहीं होगा अंत पर, सबकी एक ही भाषा की पहचानहीन आवाज़ होगी। संज्ञा की उसे ज़रूरत न होगी।

 

पत्थर

मौसम से बेअसर रहा आया है अनिद्रा का पत्थर। इसका धैर्य इसे स्थायी बनाता है। बिस्तर के साफ़ कोने में बैठकर यह देखता रहता है कमरे का स्थापत्य और इसकी सजावट। चाय के लिए पूछने पर यह उदासी से मुस्कुरा देता है और सिरहाने पड़ी किताब उठा लेता है यूँ ही पलटने के लिए। इसे तर्कों से नहीं जीता जा सकता, ना विनम्रता से ना बेचैनी से। एक तपस्वी है यह। तपस्या के अंत पर यह उठेगा और मुझको ख़त्म कर देगा।

 

बोतलें

बोतलों की देह को कभी भी युवा स्त्री की आकृति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। इससे बोतलों की भूरी उदासी थोड़ी और गहरी हो जाती है। उनके आँखें नहीं होतीं, अगर होतीं मुझे यकीन है - बड़ी-बड़ी और पनीली होतीं। वे डरी हुई आवाज़ में फुसफुसा कर बोलती हैं और अपने लुढ़कने को अंत तक गरिमापूर्ण बनाए रखती हैं। अपने से चिपटे रहने वाले लेबल्स से उनकी चिढ़ तो जगजाहिर है ही। वे इतनी शर्मीली हैं कि आज तक कर ही नहीं पाईं प्यार।

 

सिलाई मशीनें

सिलाई मशीनें बूढ़ी नहीं हुई हैं उन औरतों की तरह जो अपने पचासवें साल में भी मेहनत से अपना शरीर सुडौल बनाए रखती हैं। कहीं भी उनके चर्बी नहीं चढ़ी हैं और सारे दाँत अपनी जगह पर मौजूद। उनकी टूटी सुई बदलने का सौभाग्य आपको मिला हो तो आप ज़रूर चौंके होंगे उनके मुँह में ग़लती से चली गई अपनी उँगली पर उनके तेज़ दाँतों की चुभन से। उनकी आवाज़ में वही अधिकारपूर्ण फटकार है जो अत्यधिक धनी औरतों या मठों के कठोर अनुशासन में केँआरी रही आई भक्तिनों की आवाज़ में ही पायी जाती है। दोपहरों में सोते से जगा दिए जाने पर उनकी आवाज़ में आई कड़वाहट शाम तक चली जाती है।

गर्मियों में उन्हें खूब चुन्नटों वाले और घेरदार कपड़े पसंद आते हैं, हल्के रंग के और
जाड़ों में रंग -
बिरंगी छीटें और फूल वाले प्रिंट।

वे मानिनी नायिका की भावमुद्रा में हैं लेकिन एक त्रासद नाटक के अवश्यंभावी दुखांत में उनका मरना निश्चित है।

 


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हिंदी समय में महेश वर्मा की रचनाएँ