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उपन्यास

लौट आओ दीपशिखा
संतोष श्रीवास्तव


गुलमोहर के साये में स्थित वह खूबसूरत बंगला जो 'गौतम शिखा कुटीर' के नाम से मशहूर था और जो कभी रौनक से लबरेज हुआ करता था आज सन्नाटे की गिरफ्त में है और उसके भीतरी दरवाजे और काले स्टील के कंगूरेदार गेट पर सरकारी ताले लटक रहे हैं। शेफाली कितनी बार इस गेट से पार हुई है। बंगले का कोना-कोना उसका परिचित है और उसकी मालकिन मशहूर चित्रकार उसकी बचपन की दोस्त दीपशिखा... उसकी हर अदा, हर खासोआम बात की राजदार है वह। जिंदगी का ये हश्र होगा सोचा न था। ये सरकारी ताले उसके दिमाग में अंधड़ मचा रहे हैं। वह तहस-नहस हो जाती है। उसकी नींदें दूर छिटक जाती हैं और चैन हवा हो जाता है। क्या इनसान इतना बेबस-लाचार है? क्या वो सबके होते हुए भी लावारिस और तनहा है?

कितनी दर्दनाक थी वह सुबह जब अलार्म की जगह फोन की घंटी बजी थी... इतनी सुबह! घड़ी पर नजर गई। आठ बज रहे थे यानी शेफाली ही ज्यादा सो ली। लौटी भी तो थी हफ्ते भर के टूर से। शौक ही ऐसा पाला है उसने। चित्रों की प्रदर्शनी के लिए अब बुलावे आने लगे हैं। पाँच साल के आर्यन और तीन साल की प्राजक्ता को घर की देखभाल करने वाली काकी के भरोसे छोड़ वह नौकरी और अपने टूर में व्यस्त रहती है। बीस दिन घर में तो दस दिन बाहर। तुषार को भी बड़े-बड़े केसेज के इलाज के लिए देश-विदेश बुलाया जाता है। बूढ़े सास-ससुर की घर में मौजूदगी ही शेफाली की निश्चिंतता के लिए काफी है। फोन बजकर शांत हो गया था। शेफाली ने एक लंबी अँगड़ाई लेते हुए हमेशा की तरह आवाज दी - "काकी, चाय।" काकी पाँच मिनिट में चाय बना लाई।

"आर्यन, प्राजक्ता सो रहे हैं क्या?"

"जी भाभी... दो बार गौतम सर का फोन आ चुका है।"

"अरे, ऐसी क्या बात हो गई, देना मेरा मोबाइल।" मोबाइल मुश्किल से लगा - "क्या हुआ गौतम? दीपू ठीक तो है?"

"सब कुछ खतम हो गया शेफाली... मेरी शिखा हमेशा के लिए चली गई।" उसकी आवाज पथराई हुई थी।

"क्याऽऽऽ कब, कैसे? अभी बुध की सुबह ही तो हैदराबाद से फोन पर बात हुई थी उससे। मैं आ रही हूँ... गौतम कंट्रोल योरसेल्फ।"

गौतम शिखा कुटीर का नजारा ही कुछ और था। गेट के बाहर पुलिस की जीप और अंदर लंबे चौड़े कंपाउंड में लोग ही लोग। बीच में स्ट्रेचर पर सफेद कपड़े से ढकी दीपशिखा की लाश। खंभे से लगा खड़ा गौतम... बस, और सब अड़ोसी, पड़ोसी, पुलिस के आदमी। वह खामोशी से गौतम की पीठ सहलाने लगी। कुछ सूझ नहीं रहा था क्या करें? चकित, व्याकुल और अविश्वसनीय सी मन की हालत हो रही थी। यह आखिर हुआ क्या? तभी पुलिस इंस्पेक्टर उसके पास आया - "मैडम, आप इनकी रिश्तेदार हैं?"

"नहीं, मैं इनकी सहेली हूँ।" मुश्किल से कह पाई वह।

"ओ.के., आप इनके संबंधियों को खबर कर दें। हम लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले जा रहे हैं। बॉडी शाम तक ही मिल पाएगी क्योंकि सभी कानूनी औपचारिकताएँ करनी पड़ेंगी।"

"आप बंगला क्यों सील कर रहे हैं?" शेफाली ने हिम्मत कर पूछा।

"इनके रिश्तेदारों के आने के बाद हम बंगला खोल देंगे।"

लाश एंबुलेंस में रख दी गई थी। दरवाजा धड़ाक से बंद हुआ जैसे सीने पर किसी ने जोर का घूँसा मारा हो... तीन दिन पहले तक जीती जागती, फोन पर उससे बतियाती दीपशिखा आज निश्चल बेजान बंगले से ऐसे जा रही है जैसे कोई फालतू सामान, जिसकी अब जरूरत नहीं रही। वह भी लगभग सड़ चुकी हालत में। लाश की बदबू कंपाउंड से हवा आहिस्ता-आहिस्ता उड़ा ले चली जितने आहिस्ता इस कंपाउंड के बगीचे में लगे फूल महकते हैं। मह-मह... और हवा को रूमानी बना देते हैं। रात को बंगले की सड़क से गुजरने वाला हर मुसाफिर पल भर रुक कर रातरानी की सुगंध जरूर अपनी साँसों में भर लेता है और सुबह की सैर पर निकले लोग पारिजात की खुशबू को। आज वहाँ सड़ चुके बदन की बदबू है... उन हाथों की जिन्होंने इन फूलों के पौधों को रोपा था।

"वह अगले महीने की बीस तारीख को लंदन के डॉक्टर के पास उसे लेकर जाने वाला था। तुषार ने ही अपॉइंटमेंट दिलाया था। मैं ऑफिस के कामों में ऐसा उलझा रहा कि जिस वक्त उसे मेरी सबसे ज्यादा जरूरत थी मैं उससे दूर रहा। मेरे ही साथ क्यों होना था ये सब?"

गौतम की वीरान आँखों में एक रेगिस्तान सा नजर आ रहा था... जहाँ सिर्फ रेतीले ढूह होते हैं, जीवन नहीं होता। शेफाली गीता के कर्मयोग की हामी... लेकिन इस वक्त वह भी हिल गई थी अंतरमन के कोने टूटी काँच से झनझना उठे थे। बाजू में खड़ी गजाला रो रो कर हलकान हुई जा रही थी। "तुम कहाँ थीं तीन दिन से?" शेफाली ने उसके कंधे झँझोड़ डाले थे। वह रोते-रोते बताने लगी - "मालकिन ने मुझे सर के दिल्ली जाते ही बाहर निकालकर यह कहते हुए दरवाजा बंद कर लिया कि फौरन घर जाओ... सुनामी आने वाला है। अमेरिका से मेरे पास फोन आया है कि घर से मत निकलना... तुम भी मत निकलना जब तक मैं फोन न करूँ।"

"और तुम उसके फोन का इंतजार करती रहीं... बेवकूफ जानती नहीं थी क्या कि उसका अकेले रहना कितना खतरनाक है?"

फिर बरामदे के छोर पर खड़े लॉन की सफाई करने वाले लड़के और वॉचमैन दोनों पर बरस पड़ी शेफाली। लड़का थर थर काँपते हुए बोला - मुझे दो दिन से बुखार आ रहा था। आज सुबह ही सफाई के लिए आया तो देखा दरवाजे के बाहर दूध के पैकेट और अखबार ज्यों के त्यों पड़े हैं... घंटी बजाई... देर तक बजाता रहा। दरवाजा नहीं खुला तो मैं वॉचमैन के बूथ की ओर दौड़ा। ये नहीं था वहाँ।"

"अरे थे कैसे नहीं... अब बाथरूम-आथरूम के लिए आदमी नहीं जाता क्या? जब तक लौटे यहाँ तो हंगामा मचा था।"

"झूठ बोलता है ये... ये कहीं नहीं था। मैं ही पड़ोसियों को बुला लाया, पुलिस को खबर की गई। दरवाजा तोड़ा गया।"

अकेली मौत से जूझती रही दीपशिखा? इतने नौकर चाकर, गौतम, शेफाली सब के होते हुए भी वह अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव में नितांत अकेली पड़ गई। क्या पता पानी के लिए तड़पी हो... क्या पता गौतम को पुकारा हो। गौतम और शेफाली टूटी शाखों की तरह वहीं कुर्सियों पर गिर पड़े। गजाला जल्दी-जल्दी फोन पर सबको खबर दे रही थी। मारे पछतावे के उसके आँसू थम नहीं रहे थे। मन कर रहा था अपना सिर दीवाल पर दे मारे। इतने सालों से उसने तन-मन से मालकिन की सेवा की। वह उनका मानसिक रोग भी जानती थी फिर भी उनकी बातों में आ गई? सारे किए धरे पर पानी फिर गया। उसने गौतम सर का भरोसा तोड़ा है... अब इस दाग को जिंदगी भर ढोना है।

बरामदे के खूबसूरत खंभे पर जूही की बेल माशूका सी लिपटी थी और फुनगियों पर फूल महक रहे थे। गौतम ने खंभे पर अपना सिर टिका दिया। उस पर जैसे जुनून सा चढ़ गया था - "मेरी शिखा फरिश्ता थी। उसने उस वक्त मुझे सम्हाला जब मैं अपने अवसाद में गहरे पैबिस्त था। उसने मुझे अपने प्रेम और विश्वास के पंख दिए ताकि मैं अपनी जिंदगी में फिनिक्स पक्षी की तरह आसमान में उड़ सकूँ। अपनी मानसिक बीमारी के चलते, बल्कि पूरी तरह बरबाद हो चुकी खुद की जिंदगी के चलते उसने मेरी जिंदगी को मकसद दिया, जीने का हौसला दिया। आज वह रेशा-रेशा बिखर गई और मैं कुछ नहीं कर पाया।"

शेफाली ने उसकी बाँह पर अपना हाथ रखा। पल भर खामोशी रही - "चलो घर चलते हैं, अब यहाँ पुलिस का पहरा है, रुक कर करेंगे भी क्या?"

"मुझे यहीं रहने दो... काश, मैं भी उसके साथ चला जाता इस दुनिया से।"

"चलो, उठो... अब हमारे पास इंतजार के सिवा कोई चारा नहीं है।" शेफाली ने उसे सहारा देकर उठाया। गजालाने सवालिया नजरों से शेफाली की ओर देखा। उसकी आँखों में गहरा पछतावा था।

"तुम सुबह शाम बंगले का चक्कर लगा लिया करो। जब देखो ताला खुला है आ जाना।"

वह तुषार के फोन का भी इंतजार कर रही थी। घर पहुँचते पहुँचते फोन आ गया- "चार बजे तक पहुँच जाऊँगा।" तसल्ली हुई। काकी चाय ले आई। गौतम ने खाने से मना कर दिया।

"दो बिस्किट खाकर चाय पी लो गौतम... यही ईश्वर की मर्जी थी... इतना ही जीना था दीपू को... हम कर भी सकते हैं। यहीं आकर सब कुछ फेल हो जाता है और जिंदगी से विरक्ति हो जाती है। फिर भी अंतिम साँस तक तो जीना पड़ेगा न गौतम।"

और गौतम के सब्र का बाँध टूट गया। सुबह से जब्त किए था जिस बाढ़ को वह आँसू बन बह चली। शेफाली ने रो लेने दिया। जरूरी था रोना वरना ये बोझ हमेशा के लिए कुंठा में तब्दील हो जाता।

तुषार के आते ही तीनों मुर्दाघर की ओर रवाना हुए। लेकिन लाश मिलने के आसार कम ही नजर आ रहे थे। पुलिस उनके इस तर्क से सहमत नहीं थी कि दीपशिखा का कोई रिश्तेदार नहीं है हालाँकि अभी तक किसी ने बॉडी क्लेम नहीं की थी। कितनी अजीब बात है कि जो गौतम दीपशिखा के लिए सब कुछ था आज उसी को दीपशिखा की लाश सौंपने में पुलिस आनाकानी कर रही है क्योंकि कोई सामाजिक या धार्मिक रिश्ते की मोहर उनके संबंधों में नहीं लगी थी। उन्होंने बिना शादी किए जीवन को स्वच्छंद भाव से जिया था। दोनों बरसों से साथ रह रहे थे। हर पीड़ा, हर खुशी दोनों ने साथ-साथ जी थी। दीपशिखा की मानसिक बीमारी को लेकर भी गौतम कहाँ-कहाँ नहीं दौड़ा था। देश-विदेश के हर उस डॉक्टर को दिखाया था जहाँ से थोड़ी सी भी संभावना नजर आती थी। मगर आज दीपशिखा और गौतम ने पश्चिमी जीवन मूल्यों वाले उस लिव इन रिलेशन की कीमत चुकाई है जिसकी ओर हमारा समाज ललचाई नजरों से देखता है लेकिन वास्तविक जीवन में कभी स्वीकार नहीं करता। यह कैसी विडंबना है कि सच्चे साथी के बावजूद मृत्यु के समय दीपशिखा के न तो कोई सिरहाने था न पायताने और अब उसके दाह संस्कार के लिए भी सवाल उठ खड़े हुए थे। तो क्या जिसका कोई नहीं होता उसका कोई सामाजिक महत्व नहीं जबकि रिश्तों की आँच में धीमे-धीमे न जाने कितनी जिंदगियाँ सुलगती हैं उम्र भर।

उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा था। शाम को बंगले के लॉन पर शेफाली ने कुर्सियाँ लगवा दी थीं और चाय पानी का इंतजाम भी करवा दिया था। सना फ्लाइट से दो घंटे पहले ही आई थी। अंकुर ग्रुप ऑफ आर्ट्स के सभी सदस्य अपनी-अपनी जिंदगियों में इधर-उधर थे। लेकिन कला क्षेत्र के सभी चित्रकार, बॉस सहित गौतम का पूरा स्टाफ इकट्ठा हो चुका था जिनके बीच दीपशिखा की अजीबोगरीब जिंदगी, उसकी मानसिक बीमारी और पागलपन का दबा-दबा जिक्र था। जिक्र भले ही सब तरह का हो रहा था पर सभी के दिल में दीपशिखा को लेकर सहानुभूति थी।

"सोचना ये है कि बॉडी मिले कैसे?" शेफाली के चेहरे पर इस बात को लेकर काफी तनाव था। जवाब तुषार ने दिया - "मैं वकील से कान्टेक्ट करने की कोशिश कर रहा हूँ। वैसे भी पुलिस दो तीन दिन तो इंतजार करेगी। अगर फिर भी रिश्तेदार क्लेम नहीं करेंगे तब हमें बॉडी मिल जाएगी।"

कितनी बड़ी त्रासदी थी कि दीपशिखा को अपने घर का एक कोना भी न मिला जहाँ उसकी तस्वीर पर फूलमाला चढ़ाई जाती, दीपक जलाया जाता, अगरबत्ती की पवित्र सुगंध होती। बंगला अँधेरे की गिरफ्त में था अँधेरे से टूटा अँधेरे का एक टुकड़ा। एक झिलमिलाती लौ तक करीब न थी जिसके। दीपशिखा हमेशा चर्चा का विषय रही लेकिन उसकी मौत इतनी खामोशी से होगी कि तीन दिनों तक किसी को पता ही न चले कि एक चर्चित शख्सियत किसी धूमकेतु की तरह तेज रोशनी के साथ आसमान में तो दिखाई देती है लेकिन फिर अंधकार के गर्त में कहाँ विलीन हो जाती है पता नहीं चलता। दीपशिखा मुफलिसी से नहीं निकली थी बल्कि नवाबी खानदान से ताल्लुक था उसका। विशाल, समृद्ध कोठी के कीमती खजाने की एकमात्र वारिस थी वह। जो पूरे गुजरात में पीपल वाली कोठी के नाम से जानी जाती थी। इसका एक महत्वपूर्ण कारण और भी था। दीपशिखा के पिता यूसुफ खान जूनागढ़ के नवाब के यहाँ कानून मंत्री थे और माँ सुलोचना अहमदाबाद के करोड़पति व्यापारी की बेटी थीं। दोनों का प्रेम विवाह था जो माँ-बाप की मर्जी के बिना हुआ था और जो हिंदू और मुस्लिम धर्म के कट्टरपंथियों के लिए चुनौती था। शादी के बाद यूसुफ खान को पैतृक संपत्ति से बेदखल कर दिया गया था। सुलोचना को कई बरसों तक मायके की चौखट नसीब नहीं हुई थी। लेकिन फिर धीरे-धीरे सुलोचना की कोशिशों से उनके माता-पिता ने उन्हें माफ कर दिया। वक्त सबसे बड़ा मलहम होता है।

एक-एक कर बरस बीतते गए पर यूसुफ खान के घर औलाद के दर्शन नहीं हुए। सुलोचना ने न जाने कितनी मन्नतें कीं, कितने मंदिरों में माथा टेका... यूसुफ के साथ पीर औलिया, मजार, दरगाह... कहाँ नहीं गईं। गंडा ताबीज से बाँहें भरी रहतीं... कि एक दिन सब्र का अंत हुआ और चौदह बरस बाद सुलोचना गर्भवती हुईं। यूसुफ ने हिफाजत बरतने के खयाल से उन्हें बुजुर्गवार फातिमा बेगम और दाई की निगरानी में रखा। जिस दिन से बाहर निकलकर दाई ने सूचना दी - "बेटी हुई है।" यूसुफ खान के घर में मानो जन्नत उतर आई। पीपलवाली कोठी खुशियों से लबरेज हो गई। शहनाइयाँ बजीं, मिठाइयाँ बँटी। पीपलवाली कोठी हिंदू-मुस्लिम तहजीब का मिला जुला संगम थी। जहाँ होली, दीपावली, दशहरा आदि त्योहार भी उतनी ही धूमधाम से मनाए जाते थे जितनी कि ईद, बकरीद आदि। यूसुफ खान यूँ तो प्रगतिशील विचारों के थे पर अपनी बेटी को लेकर बेहद अंतर्मुखी थे। उन्हें लगता था दीपशिखा के रूप में उनके वैवाहिक जीवन के चौदह बरसों के औलाद हीन वनवास का जो खात्मा हुआ है उसमें खुदा की मर्जी और उनकी मन्नतें, दुआएँ हैं लेकिन वक्त इतना अधिक निकल चुका था कि वे एक एक कदम फूँक-फूँक कर रखते थे। दीपशिखा नाज नखरों में पाली जाने लगी। फिर भी सुलोचना सतर्क रहतीं, कहीं इतनी नाजुक न हो जाए कि जिंदगी के धूप पाले में कुम्हला जाए। लिहाजा उसके लिए तैराकी, नृत्य, घुड़सवारी और योगा के विशेषज्ञ नियुक्त किए गए। दीपशिखा सीख तो रही थी पर उसका मन चित्रकला में रमता था। छोटी सी उम्र में ही वह पेंसिल स्केच में माहिर हो गई।

"तुम्हारी बेटी तो चित्रकार है यूसुफ और चित्रकार है तो भावुक भी होगी जो औरत के लिए बड़ा नुकसानदेह है।"

"क्यों... यह तो अच्छी बात है। दूसरों के दुख दर्द समझेगी।"

"और फिर उस दुख-दर्द को अपने मन पर लेगी, जराजरा सी बात में हर्ट होगी... अभी से ये सारे लक्षण दिखाई दे रहे हैं... छोटी-छोटी बातों को दिल पे लेना इनसान को कुंठित कर देता है।"

यूसुफ खान हँस पड़े। अपनी खूबसूरत पत्नी की नाक दबा कर बोले - "जैसी तुम, वैसी तुम्हारी बेटी।"

पीपलवाली कोठी की दिनचर्या आम जिंदगियों जैसी नहीं थी। वहाँ सूरज उगता अपनी मर्जी से था लेकिन ढलता हुआ मानो थम सा जाता था क्योंकि शाम यूसुफ खान और सुलोचना के लिए बारह बजे रात तक रुकी रहती थी। दोनों ही शेरो शायरी के शौकीन थे। यूसुफ खान खुद बेहतरीन गजलें लिखते और जब महफिलों में उन्हें पढ़ते तो वाह-वाह-मुकर्रर की दाद मिलती। चाय कॉफी के दौर चलते। सुलोचना उनके शौक में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थीं। दीपशिखा की आँखों से भी नींद उड़ी रहती। वह यूसुफ खान की सिंहासन जैसी कुर्सी के इर्द गिर्द मँडराती रहती। इतनी छोटी सी उम्र खिलौनों की जगह गजलें?

"यूसुफ... बेटी की फरमाइश सुनी तुमने? दूध के दाँत तक तो टूटे नहीं अभी तक और..."

"तुम्हारी तिलस्मी कहानियों से तो बेहतर है कि एक राजकुमारी थी जो उस राजकुमार का इंतजार करती थी जो सफेद घोड़े पर बैठकर एक दिन आएगा और राजकुमारी को विदा कराके ले जाएगा... बस एक ही मकसद जिंदगी का शादी... और पति से तमाम इच्छाओं की पूर्ति... बाप तो नाकारा है, कुछ कर ही नहीं सकता।"

"यूसुफ, मैंने ऐसा कब कहा?"

यूसुफ ने दीपशिखा को बाँहों में भर लिया - "हमारी दीपू लाखों में एक है।"

दीपशिखा सचमुच बेमिसाल थी। उसकी तीक्ष्ण बुद्धि और संवेदनशीलता वस्तुओं की सूक्ष्म पकड़ ने उसे कैनवास थामने पर मजबूर कर दिया। ब्रश, रंग, थामते ही अनोखे दृश्य बिंबों की रचना ने पीपलवाली कोठी में उसके नाम को लेकर खलबली मचा दी। एक दिन माली काका ने क्यारियाँ साफ करते हुए बताया था - "पहले इस जगह पीपल ही पीपल के झाड़ थे। ऊँचे-ऊँचे घने झाड़ों वाले जंगल में शाम और रात की तो छोड़ो दिन में भी यहाँ से गुजरने में लोग डरते थे।"

"क्यों? इसमें डरने की क्या बात है?" दीपशिखा ने चकित होकर पूछा।

"पीपल के झाड़ में भूतों का वास होता है, ब्रह्मराक्षस रहता है उस पे।"

"ब्रह्मराक्षस? वो क्या होता है?"

"रहने दो बिटिया, रात में डरोगी नाहक।"

"नहीं डरूँगी, बताओ न काका।"

क्यारियों में कचरा इकट्ठा हो गया था, उसे डलिया में भरकर माली गेट के बाहर रख आया। दीपशिखा ने जिद पकड़ ली "बताओ न माली काका।"

माली ने तंबाखू हथेली में मलकर फाँकी और बड़ी कैंची से क्रोटन को शेप देने लगा - "जिन लोगों की पुराण, शास्त्र पढ़ने की इच्छा होती है और बिना पढ़े ही अकाल मर जाते हैं वो ब्रह्मराक्षस बनकर पीपल में वास करते हैं। किसी को डराते थोड़ी हैं, पैर ही नहीं होते उनके। वो तो अपना ही नर्क भोगते पड़े रहते हैं। ये जगह ही ऐसी है। हर साल एक न एक की बलि लेती है। पिछले साल भटनागर का लड़का स्कूटर एक्सीडेंट में मर गया। वो तो हमारे साहब का जिगरा है जो यहाँ रहते हैं। तमाम झाड़ कटवा के कोठी बनवाई। इसीलिए तो इसका नाम रखा पीपलवाली कोठी। बड़ा भारी यज्ञ कराके बनी है ये कोठी। सब भूतों का उद्धार हो गया।"

दीपशिखा को बाकी कुछ समझ में न आया हो पर भूतों के बारे में अच्छे से समझ में आ गया। कई बार दाई माँ भी भूत प्रेतों की कहानी उसे सुनाती है। उसने अपने कमरे की दीवारों पर सुंदर-सुंदर चित्र उकेरे हैं, लेकिन आज वह पीपल के पेड़ों पर भूतों के चित्र बनाएगी।

सुबह सुलोचना जब दीपशिखा को उठाने उसके कमरे में आईं तो देखा कोने की दीवार पर पीपल के पेड़ों की डालियों पर बिना पैरों वाले इनसानों की आकृतियाँ... अस्पष्ट सी... जैसे ढलते सूरज के उजाले में परछाइयाँ लंबी-लंबी दिखती हैं... कुछ वैसी सी। दीपशिखा जाग चुकी थी। उसके रेशमी मुलायम बालों को उसके चेहरे पर से हटाते हुए सुलोचना ने उसे चूम लिया - "गुडमॉर्निंग माँ।"

"गुडमॉर्निंग... दीपू... ये दीवार पर तूने क्या चित्रकारी की है?"

"माँ... वो भूत हैं... ब्रह्मराक्षस।"

सुलोचना ने चौंककर ध्यान से चित्रों को देखा और दीपशिखा का चेहरा अपने सीने में दबोच लिया - "मेरी नन्ही प्रिंसेज भूत कुछ नहीं होता। भूत यानी गुजर चुका कल... और जो गुजर चुका उसके लिए क्यों सोचा जाए?"

लेकिन छोटे से मन में डर का बीजारोपण हो चुका था।

ग्रीष्मावकाश के बाद स्कूल खुलते ही दीपशिखा की क्लास में एक नया चेहरा था। भोला-भाला, बड़ी बड़ी हिरनी सी चंचल आँखों वाला - "मेरा नाम शेफाली है, क्या तुम मेरी दोस्त बनोगी।"

"दोस्त बनाए नहीं जाते हो जाते हैं। हम भी अच्छे दोस्त हो सकते हैं।" दीपशिखा ने कहा।

कद की ऊँचाई के हिसाब से क्लास टीचर ने दोनों को साथ-साथ एक ही बैंच पर बैठाया था। धीरे-धीरे दोनों में आत्मीयता बढ़ती गई। ड्रॉइंग का पीरियड होते ही दोनों चहक पड़तीं। दोनों ही चित्रकला की शौकीन... उनके चित्रों की जब तारीफ होती और एक्सीलेंट का रिमार्क मिलता तो स्कूल की छुट्टी होते ही दोनों चिड़िया सी उड़ने लगतीं। दीपशिखा की गाड़ी गेट के बाहर उसका इंतजार करती और वह डूबते सूरज का पीछा करती... कभी पेड़ बीच में आ जाते या बादल का टुकड़ा सूरज को अपने दामन में छिपा लेता तो वे वहीं रुक जातीं... "देखो, सूरज हार गया। हमसे डर कर छिप गया।" दीपशिखा शेफाली का हाथ थाम लेती... वे लौट पड़तीं और शाम होते होते ड्राइवर पहले शेफाली को उसके घर छोड़ता फिर दीपशिखा को।

दीपशिखा पढ़ाई में शेफाली से तेज थी। लेकिन विज्ञान और गणित में शेफाली। दीपशिखा की रुचि साहित्य, नृत्य, नाटक, चित्रकला में बहुत अधिक थी। स्कूल की पढ़ाई में उसने शहर के सभी स्कूलों के छात्रों में टॉप किया था और कॉलेज में भी वह हर परीक्षा में अव्वल रहती थी। शेफाली को घर का माहौल आगे बढ़ने से रोक देता। उसके पिता एक दुर्घटना में चल बसे थे और माँ का पूरा बायाँ अंग लकवाग्रस्त था। घर बड़े भाई के कंधों पर था। शेफाली, उसकी बड़ी बहन और माँ... खरामा-खरामा उसके भाई का स्वभाव रूखा और चिड़चिड़ा सा हो गया था। इन सब बातों को दीपशिखा गहरे महसूस करती। वह अधिक से अधिक शेफाली को खुश रखने की कोशिश करती... ऐसे ही एक खुशहाल दिन दीपशिखा ने पार्क में टहलते हुए कहा - "मैं चित्रकला में सिद्धहस्त होना चाहती हूँ। मुंबई के जे.जे.स्कूल ऑफ आर्ट्स से चित्रकला में डिप्लोमा लेना चाहती हूँ।"

दोनों पार्क की बैंच पर बैठ गईं। लॉन में कुछ बच्चे बड़ी सी गेंद से खेल रहे थे और उनकी माँओं के आस-पास गुब्बारे वाले मँडरा रहे थे।

"यानी बी.ए. के बाद पढ़ाई बंद।"

"नहीं, प्राइवेट एम.ए. करूँगी।"

"दीदी भी मुंबई में नौकरी के लिए ट्राई कर रही है। अगर दीदी की नौकरी लग गई तो मैं भी मुंबई आकर चित्रकला का डिप्लोमा लूँगी।"

सुनकर दीपशिखा खिल पड़ी - "तू आएगी तो क्या कहने? वैसे आँख मूँदकर हम डिग्रियाँ हासिल करते रहें उससे बेहतर है अपना लक्ष्य पहले से निर्धारित कर लें। कामयाबी तभी मिलती है। मैं आज ही माँ से बात करूँगी।"

लेकिन यह बात इतनी आसान नहीं थी। मुंबई में सुलोचना के रिश्तेदार तो थे पर उनकी अंतर धर्म शादी से वे नाराज थे और नाता तोड़ चुके थे। यूसुफ खान तनावग्रस्त हो गए - "अकेली कहाँ रहेगी वह? इकलौती संतान... कारोबार ऐसा कि खुद मुंबई जाकर नहीं बसा जा सकता।" सुलोचना भी सोच में पड़ गईं। दीपशिखा को इनकार किया जा सकता था पर इससे उसके अंदर पनप रहा कला का अंकुर खत्म हो जाएगा... हो सकता है यह बात वह अपने मन पर ले ले... तब? रात भर दोनों के बीच विचार विमर्श चलता रहा। माँ-बाप के नजरिए से उसका साथ देना जरूरी था। तय हुआ पहले प्रवेश परीक्षा दे दी जाए फिर आगे की योजना पर विचार हो।

दीपशिखा को जे.जे. स्कूल में प्रवेश मिल गया। इस बीच यूसुफ खान ने देखभाल कर बेहतरीन सोसाइटी में फ्लैट खरीद लिया। कुछ महीने सुलोचना वहाँ रहकर सब व्यवस्थित कर दें फिर दाई माँ और उनके पति महेशचंद्र को उसके संग रखा जाए। इतनी सुंदर व्यवस्था के बारे में सुनते ही शेफाली उछल पड़ी थी - "तब तो मेरा मुंबई आना पक्का। दीदी की नौकरी नहीं भी लगी तो मैं तेरे साथ रह लूँगी।"

सुलोचना के साथ दीपशिखा मुंबई आ गई। जुहू में समंदर की ओर खुलती खिड़कियों और बालकनी वाला पाँचवी मंजिल पर स्थित उसका फ्लैट खूब खुला और हवादार था। तीन बेडरूम, बड़ा सा हॉल, किचन, बालकनियाँ... और बिल्डिंग के कंपाउंड में नारियल, बादाम और अशोक के दरख्तों की गझिन हरियाली। गेट पर बोगनविला की सघन लतर हमेशा सफेद, मजंटा रंग के फूलों से लदी रहती थी। बहुत खुश थी दीपशिखा इस माहौल में और उसकी खुशी पे निहाल थीं सुलोचना। क्लासेज से लौटकर दीपशिखा बालकनी में ईजी चेयर पर बैठकर समंदर की लहरों को गिना करती और फिर शेफाली को फोन पर दिन भर का समाचार देती। धीरे-धीरे रात की चहल-पहल के संग समंदर का काला जल अद्भुत सम्मोहन पैदा करता था। जैसे वह किसी तिलिस्म से गुजर रही हो। जब कभी समंदर शांत दिखता था तो मानो चाँद-सितारे उसकी सतह पर चहलकदमी करते नजर आते। डूबते उतराते चाँद के कई चित्र उसने बना डाले थे। वह अपने में खोई-खोई पूरे ब्रह्मांड की सैर कर लेती थी। उसे लगता आसमान कैनवास होता तो भी छोटा था जितने कि चित्र उसके जेहन में उभरते थे। जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट्स तो कला को मंजिल तक पहुँचाने का एक बहाना था... एक दिशा जो सीधी उस राह की ओर खुलती थी जिसके लिए दीपशिखा इस दुनिया में आई थी। उसे अपने चेहरे की आकृति से मोह हो गया था और अब पीपलवाली कोठी में बीजारोपण हुए डर के साथ-साथ वह आत्ममोहग्रस्त भी हो गई थी। जैसे नार्सिसस... नार्सिसस को अपने रूप रंग से प्यार हो गया था। वह आत्ममोहग्रस्त हो भयानक अवसाद में चला गया था और अंत में उसने आत्महत्या कर ली। कहते हैं नार्सिसस ने ही नरगिस के फूल के रूप में जन्म लिया। पीपलवाली कोठी से अपनी जीवन यात्रा आरंभ करने वाली बेहद स्वाभिमानी, मोहक व्यक्तित्व की अत्यंत संवेदनशील दीपशिखा के अंदर भी नरगिस का फूल अँगड़ाई ले रहा था और वह आईने के सामने घंटे भर बैठकर अपने प्रतिबिंब का पोर्टेट बना लेती थी और नीचे दो पंक्तियाँ भी लिखी थीं उसने - इस दिलकश हुस्न को थामे रखना, कहीं ये छूट न जाए तुम्हारी जद से। ज्यादातर पंक्तियाँ यूसुफ खान की लिखी होतीं जिन्हें हर वक्त गुनगुनाते रहना उसका शगल था।

कला शिक्षा के दौरान ही दीपशिखा ने भूलाभाई इंस्टिट्यूट भी ज्वाइन कर लिया जो एक तरह से कला और संस्कृति का तीर्थस्थल था। वहाँ चित्रकारों के अपने-अपने स्टूडियों थे जहाँ वे दिन रात रंगों और ब्रश की दुनिया में डूबे रहते। उनकी आँखों में बस एक ही सपना था... किसी तरह फ्रांस जाना और पेरिस में प्रदर्शनी लगाना। दीपशिखा को यहाँ का माहौल ज्यादा पसंद आया... वह उसकी आँखों में पल रहे सपने में खुद भी शामिल हो गई। उसी रात उसने यूसुफ खान को फोन किया - "पापा, मुझे एक स्टूडियो खरीदना है।"

"स्टूडियो।" उधर से आवाज चौंकी थी।

"जी पापा, यहाँ इंस्टिट्यूट में सबके अपने स्टूडियो हैं जहाँ उनके रंग, ब्रश बिखरे रहते हैं। उन्हें घर लौटने से पहले सब कुछ समेटना नहीं पड़ता। रंग सूखे या न सूखें... घर लौटने का मन हो तो बसता लगाओ और चल दो।"

दीपशिखा की बात को यूसुफ खान कैसे टाल सकते थे जबकि वह उनसे बात करने के दौरान तीन बार दाई माँ को टाल चुकी थी जो सूप का कटोरा लिए कब से उसके पास खड़ी इस रार कर रही थीं - "गरम है... पहले पी लो न।"

"ठीक है बेटा... मैं कल सुबह की फ्लाइट से मुंबई पहुँच रहा हूँ।"

रिसीवर रखते ही उसने दाई माँ के गले में बाँहें डाल उनके गाल चूम लिए। मानो इतनी देर खड़े रहने की तपस्या खत्म हुई उनकी। वे खुश होकर उसे अपने हाथों से सूप पिलाने लगीं। दीपशिखा तो दूसरी ही दुनिया में खोई थी। एक ऐसी दुनिया जिसमें संपूर्ण प्रकृति ही कैनवास थी और उस कैनवास में अगर रेगिस्तान का विस्तार था तो बर्फ लदी वादियाँ भी थीं... रंगों का ऐसा बरीक जाल कि जिसमें भँवरे, तितली, चिड़ियाँ, मोर सब एकम-एक थे। कल ही तो मुकेश ने कहा था कि - "मैं चित्रों के साथ-साथ छाया चित्र भी तैयार कर रहा हूँ और इसके लिए मैं राजस्थान के बीहड़ों में जाने का प्लान कर रहा हूँ। उसके बाद रुद्रप्रयाग जो हिमालय की गोद में है।"

"यानी कि तुम फोटोग्राफी और पेंटिंग्स दोनों का एग्जीबिशन प्लान कर रहे हो?"

"तभी तो सबसे आखिरी में मेरा स्टूडियो बंद होता है। समझीं राजकुमारी दीपशिखा।"

दोनों भूलाभाई देसाई रोड से चहलकदमी करते हुए हाजीअली तक आए। बावजूद रात अधिक होने के सड़कें चहल पहल से भरी थीं। खाने-पीने के स्टॉल पर ठहाकों का सैलाब था। "चाट खाओगी?" मुकेश के गले में कैमरा था और पीठ पर बैग... शायद वजनी... शायद नहीं भी।

"चलो खाते हैं।" दीपशिखा ने समंदर के काले जल में पड़ती रोशनी की शहतीरों पर नजरें टिका दीं... शहतीरों के बीच हाजी अली दरगाह सफेद नगीने सी जड़ी थी। मुकेश ने कैमरा बैग में डाल लिया और दोनों 'हीरा पन्ना' से लगे फुटपाथ पर की दुकानों में चाट के लिए बढ़िया स्टॉल तलाशने लगे। एक स्टॉल पर पानीपूरी और तवे पर सिंकती आलू टिक्की देख वे रुक गए।

"मेरे में तीखा कम।"

मुकेश ने मुस्कुराकर दीपशिखा की ओर देखा और आलू टिक्की चम्मच से काटकर चम्मच उसकी ओर बढ़ाई एक बाइट।"

"खाओ न।" कहते कहते चम्मच मुँह के अंदर। दीपशिखा ने होठों पर हथेली दबा ली। मुकेश उसे शरारत से देखे जा रहा था। समुद्री हवा के झोंके रह-रह कर दीपशिखा के बालों से खेल रहे थे। कभी बाल चेहरे पर छा जाते, कभी पीछे की ओर उड़ जाते।

"प्लेट पकड़ो और ऐसी ही खड़ी रहना।" कहते हुए मुकेश ने कैमरा निकाला और चार पाँच तस्वीरें खींच डालीं।

घर लौटते हुए मुकेश संग-संग गेट तक आया था और चांदनी रात में दीपशिखा को गेट पर लगा बोगनविला का पेड़ रुपहला नजर आया था और जब मुकेश सड़क के मोड़ से दिखना बंद हो गया था तो उसे लगा था कि सपनों की गली खुली और उसके संग ही चली गई। रात दस बजे उसने शेफाली को फोन किया - "शेफाली, मुझे प्यार हो गया है।"

शेफाली ने शरारत की - "तुझे और प्यार... ये मेरी चित्रकार हसीना... बता किससे, कब, कहाँ?"

"अभी-अभी... अभी वो मुझसे जुदा हुआ है... यानी तीन घंटे पहले मुझे गेट पर छोड़कर... और उसके जाते ही मुझे लगा जैसे मैं सितारों की ओर उड़ी चली जा रही हूँ। बार-बार मुट्ठी खोलती, बंद करती कि जैसे उनकी झिलमिलाहट को कैद कर लेने को आतुर... और यूँ लगा जैसे अभी-अभी किसी कली ने मेरे मन को छुआ है और मैं खिल पड़ी हूँ।" दीपशिखा की आवाज मानो साज पर छेड़ा गया कोई सुर हो।

"मेरे पास भी एक खुशखबरी है।"

"तुझे भी प्यार हो गया क्या?"

"नहीं... मैं अगले महीने की 15 तारीख को मुंबई आ रही हूँ। दीदी का जॉब लग गया है। फिलहाल हम दोनों वर्किंग वुमेंस हॉस्टल में रहेंगे फिर घर तलाशेंगे। तू भी घर के लिए कोशिश कर।"

"अरे वाह, ये तो ट्रीट लेने वाली खुशखबरी है। दीदी को मेरी ओर से बधाई देना। और आने से पहले माँ से जरूर मिलकर आना।"

"ओ.के. डियर... रखती हूँ, गुडनाइट।"

सुबह यूसुफ खान के आते ही दाई माँ, महेश काका बड़े व्यस्त नजर आने लगे। दीपशिखा तो उनके इंतजार में सुबह से तैयार होकर बैठी थी।

"तुम वहीं क्यों स्टूडियो लेना चाहती हो?" यूसुफ खान ने दीपशिखा के इरादे को भाँपते हुए कहा।

"पापा, वहाँ सभी चित्रकारों के अपने स्टूडियो हैं। सभी मिलजुलकर कला को परख कर काम करते हैं। अपनेपन का माहौल है। स्पर्धा नहीं है बस काम करने की लगन है जो एक-दूसरे को प्रेरित करती है... इसीलिए पापा।"

"ठीक है, शेफाली भी अगले महीने आ जाएगी तब तुम शायद होमसिक नहीं होगी। सुलोचना टेंशन में आ जाती हैं - तुम्हारे अकेलेपन को सोचकर।"

दाई माँ ने नाश्ता मेज पर लगा दिया था - "पापा... माँ की लाड़ली बिटिया हूँ न... इसीलिए। वैसे यहाँ मेरे सभी दोस्त बहुत मददगार हैं... मुकेश तो घर तक छोड़ने आता है।"

कह तो दिया था उसने फिर सकपका गई। यूसुफ खान के भी कान खड़े हुए - "ये मुकेश कौन है?"

"मेरा दोस्त पापा... चित्रकार है, फोटोग्राफी भी करता है। बहुत अच्छा कलाकार है। मिलवाऊँगी आप से।" भोलेपन से दीपशिखा बोली।

लेकिन यूसुफ खान ने इस बात को भोलेपन से नहीं लिया। उन्होंने बाल्कनी में जाकर सुलोचना को फोन लगाया - "तुम्हारी बेटी के दोस्तों में लड़के भी हैं। ऐसे में कुछ ऊँच-नीच न हो जाए। तुम कुछ दिनों के लिए यहाँ आकर रहो। माहौल देखो, दीपू को समझो... ये जरूरी है।"

सुलोचना ने खामोशी से सुना। यूसुफ खान के शक्की स्वभाव से वे परिचित थीं। कोई सुलोचना की तारीफ कर दे या बार-बार उससे मिलने आए तो उन्हें शक हो जाता था। फिर ये तो बेटी का मामला है। बेटी में आए बदलावों को सुलोचना समझाना चाहती थीं। तय हुआ कि यूसुफ खान के लौटते ही वे मुंबई जाएँगी। दाई माँ को ताकीद की गई कि दीपशिखा के आने, जाने मिलने-जुलने वाले लोगों पर नजर रखें और पल-पल की खबर उन तक पहुँचाएँ।

लेकिन दीपशिखा के कदमों को अब कोई रोक नहीं सकता था। भले ही पंख न हों पर हौसले हैं और यही हौसले तो परवाज हैं जो आकाश को चूमेंगे।

"क्या रखा है आकाश में दीप..."

दीपशिखा के स्टूडियो में एक ढलती शाम मुकेश ने खूब मीठी कड़क चाय पीते हुए कहा - "वहाँ न घर बना सकते, न फूल खिला सकते, न ही छै ऋतुओं का आनंद ले सकते। बड़ी शून्य सी कल्पना है आकाश को चूमने की।"

दीपशिखा कैनवास पर रंगों के कोलाज में डूबी थी। चौंक पड़ी... "क्या कहा तुमने? शून्य कल्पना! हुजूर, शून्य ही तो सबको विस्तार देता है।"

"मेरे कैमरे को नहीं... मेरे कैमरे में शून्य समा ही नहीं सकता।"

"फोटोग्राफर महाशय जी... आप चाहें तो क्या-क्या बना दें शून्य को... साधारण औरत को अप्सरा बना दें..."

"भला ऐसा क्यों? जबकि मेरे पास अप्सरा है।"

"सुनूँ तो... कौन है वह?"

मुकेश ने कैमरा दीपशिखा के चेहरे पर लाकर क्लिक किया और स्क्रीन पर दिखाया - "ये।"

दीपशिखा का चेहरा आरक्त हो उठा। उसे लगा जैसे उसका दिल धक से हुआ है और जिसकी आवाज अब भी उसे सुनाई दे रही है। शाम का जादुई तिलिस्म धीरे-धीरे स्टूडियो में भी उतर आया। न जाने कैसे... बस इसी एक लम्हे में मुकेश ने झुककर आहिस्ता से दीपशिखा के होठ चूम लिए। पहले प्यार का पहला स्पर्श... जैसे बाहर लगे बाँस के झुरमुट में हवा के चंचल झोंके की बीन बज उठी हो।

सुलोचना का आना दीपशिखा को चकित कर गया। न कोई सूचना, न तयशुदा कार्यक्रम, न यूसुफ खान ने ही इसके संकेत दिए। शाम के झुटपुटे में जब वह मुकेश से बिदा ले घर आई तो दरवाजा खुलते ही सुलोचना को सोफे पर बैठे पाया - "माँऽऽ... तुम?"

वह दौड़कर उनके गले लग गई - "अचानक कैसे? कहीं सपना तो नहीं?"

सुलोचना ने दीपशिखा को बाँहों में भरकर उसके गाल, माथा चूम लिए - "माँ तो हकीकत होती है दीपू, सपना नहीं। लेकिन तुम जरूर सपनों की उम्र से गुजर रही हो।"

दीपशिखा सोफे पर माँ के बाजू में बैठ गई - "देखो माँ, तुम्हारी बेटी कितना काम करती है। सुबह की निकली हूँ।"

"तो फिर लंच वगैरह?"

"अरे माँ... दाई माँ ब्रेकफास्ट के नाम पर ब्रंच करा देती हैं और काम के जूनून में भूख किसे लगती है?"

कहते हुए दीपशिखा कपड़े चेंज करने के लिए उठी। दाई माँ ने नजदीक आकर कहा - "जल्दी फ्रेश हो जाओ बिटिया। मूँग की दाल में मेथी के पत्ते डालकर मुंगौड़ियाँ बनाई हैं। साथ में अदरक वाली चाय भी न? फटाफट ले आती हूँ।"

जींस, टी-शर्ट उतारकर वह बाथ टब में जा घुसी। कुनकुने पानी में सारी थकान पिघलने लगी। चेहरा धोते हुए ऊँगलियाँ होठों पर आकर टिक गईं... वो प्रथम चुंबन! उसके अंदर जैसे कुछ पिघलने सा लगा, नसों में तीव्र गति से दौड़ने लगा। क्या था वह... प्यार... प्यार का जमा हिमखंड जो मुकेश के होठों की आँच से पिघलने लगा था, पिघल कर नसों में दौड़ रहा था और वह समूची खिंची जा रही थी मुकेश की ओर... नहाने के दौरान ही उसने मुकेश को एस.एम.एस किया - "मैंने ये दावा कब किया कि तुम मेरे हो। तुम्हारी आँखों ने खुद ही बता दिया।"

जवाब आया - "मेरी आँखें अब वो नींद न लें जिसके सपनों में तुम मौजूद न हो।"

"मुझे सपना नहीं हकीकत बनाओ मुकेश।"

"मेरी दीप... तुम मुझमें हो और मैं तुममें हूँ, तो ये हकीकत ही तो है।"

धीरे से दरवाजा खटका - "दीपू, कितना नहाओगी?"

"आई माँऽऽ..." और आज का आखिरी एस.एम.एस...

"मेरे होठों पर तुम्हारे होठों की छुअन... एक जिंदा एहसास कि तुम मेरे करीब हो। गुड नाइट।"

सोने से पहले सुलोचना दीपशिखा के सिरहाने आकर बैठ गईं - "दीपू अब तो तुम बड़ी चित्रकार हो गई हो। देखी मैंने तुम्हारी पेंटिंग्स... मुझे तुम पर गर्व है।"

दीपशिखा ने सुलोचना के सीने में अपना चेहरा छुपा लिया। "ओह माँ, रीयली! मैं अमृता शेरगिल जैसी तो नहीं पर उनकी चित्रकारी मुझे अपील करती है। माँ... एक बात बताओ... कलाकार छोटी उम्र क्यों लेकर आते हैं दुनिया में? जैसे अमृता शेरगिल, जैसे पाश, सुकांत भट्टाचार्य, हेमंत। हेमंत भी चित्रकार और कवि दोनों था न माँ... पर ये कलाकार कवि बाईस, तेईस साल ही जिए। माँ, मैं मरना नहीं चाहती।"

"पगली।" सुलोचना ने उसकी पीठ थपथपाई - "यह सब हमें नहीं सोचना है, हर एक का मरण का दिन तय है... हमें सिर्फ जीने और कुछ कर गुजरने की बात सोचनी चाहिए।"

"हाँ माँ, मैं पेरिस में एग्जीबिशन लगाना चाहती हूँ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने चित्र प्रदर्शित करना चाहती हूँ पर पहले मुंबई, दिल्ली और भोपाल में... है न माँ।"

सुलोचना दीपशिखा की आँखों में आकांक्षाओं का समंदर ठाठें मारते देखती रहीं। वे सहम गईं। बचपन से ही दीपशिखा में असाधारण बातें उन्होंने देखीं। छोटी सी उम्र से चित्रकारी, गजल, कविता की समझ... लेकिन दोनों ही कलाओं में कहीं बचपना नहीं दिखा। प्रौढ़ता दिखी, गंभीरता दिखी। मुंबई में पढ़ने, अकेले रहने के उसके फैसले के आगे जो वे झुकी थीं उसकी वजह जहाँ एक ओर उनकी अपनी सोच थी कि वे भी तो ऐसा ही जोश भरा खून अपनी नसों में दौड़ता महसूस करती थीं और इसी कारण वे अपने माता-पिता की मर्जी के बिना मुसलमान लड़के से शादी करने की हिम्मत जुटा पाईं थीं, वहीं दूसरी ओर उसकी प्रौढ़ता और गंभीरता भी थी। लेकिन आकांक्षाएँ यदि पूरी न हों तो सर्वनाश कर डालती हैं इनसान का। उन्होंने दीपशिखा में जो आकांक्षाओं का अथाह समंदर देखा... उन्हें लगा कहीं कुछ गलत हो रहा है... कहीं कुछ ऐसा जिसे होने देने से रोकना है लेकिन जिसकी अनिवार्यता की जड़ें भी गहरी-गहरी हैं। उन्होंने ऊँघती दीपशिखा का सिर तकिए पर रखा - "अब सो जाओ, गुडनाइट।"

"गुडनाइट माँ।"

दीपशिखा के कमरे की दूधिया चाँदनी सी रोशनी से बाहर निकलते ही सुलोचना को तेज बल्बों की चकाचौंध ने दबोच लिया। वे घबराई हुई तो थीं ही... उत्तेजित भी हो गईं... "महेश, लाइट क्यों जल रही है अब तक?" एक खामोश आहट... कमरा अँधेरे में कैद हो गया और उससे भी गहन अँधेरे में सुलोचना... क्या होगा दीपू का? आकांक्षाओं का भँवर जाल न ले डूबे कहीं? देर रात तक सुलोचना अपने बिस्तर पर करवटें बदलती रहीं। तीन बजे के करीब नींद आई होगी और सुबह छै बजे खटपट से नींद खुल भी गई। देखा, बाल्कनी में दीपशिखा प्राणायाम कर रही थी और दाई माँ जूसर में से लौकी का जूस निकाल रही थी। महेश दीपशिखा के कपड़ों में आयरन कर रहा था। सब कुछ व्यवस्थित... दीपशिखा भी सधी-सधी सी, प्राणायाम के बाद वह वॉकर पर आ गई।

"हाय माँ... गुडमॉर्निंग, नींद अच्छी आई? इधर आइए बाल्कनी में। समंदर की ताजी हवा के संग उड़ते परिंदों को देखिए... वाओ... ब्यूटीफुल... अब बताइए, पीपलवाली कोठी से दिखता है ऐसा नजारा?"

पसीने से लथपथ वह फर्श पर ही बैठ गई... नेपकिन से पसीना सुखाते हुए बोली - "माँ... देखो ये चार लाइनें कविता की सुबह-सुबह लिखीं। दाई माँ, जूसऽऽऽ"

सुलोचना अब तक एक शब्द भी नहीं बोली थीं। दीपशिखा के रूटीन वर्क को मुग्ध हो निहार रही थीं। बदलाव तो आया है बेटी में। पर इतना और इस तेजी से आएगा, उन्होंने सोचा न था।

अगली सुबह शेफाली ने सरप्राइज दिया - "हम आ गए हैं मुंबई।"

"अरे वाह, अच्छा सरप्राइज दिया। इसीलिए दो दिन से चुप थी तू।"

"तूने कौन सा फोन किया? तू भी तो..."

"अरे यार, माँ आई हैं।"

"पता है मुझे... आ रही हूँ बारह बजे तक। तू अपना पता एस.एम.एस कर। दीदी ने आज से नौकरी ज्वाइन कर ली। अभी हम वर्किंग वुमन हॉस्टल में हैं।" शेफाली ने पूरा समाचार एक ही साँस में कह डाला। दीपशिखा ने फोन रखते ही माँ से कहा - "माँ, शेफाली और दीदी आ गई हैं। दाई माँ... आज बैंगन का भरता जरूर बनाना, शेफाली को बहुत पसंद है।"

अपनी प्राणों से भी प्यारी सखी के स्वागत में वह और भी कुछ सोचती कि सुलोचना ने कहा - "अच्छा हुआ शेफाली आ गई... मैं भी कल लौट रही हूँ। अब निश्चिंतता रहेगी।"

निश्चिंतता रहेगी!! दीपशिखा के मन में कुछ खटका... तो क्या माँ उसके इस महानगर में अकेले रहने की वजह से चिंतित हैं? मगर क्यों?

बारह बजे उसने शेफाली को अटैंड किया... दिन भर गपशप, खाना-पीना। शाम को स्टूडियो भी ले जाकर दिखाया। मुकेश से भी मिलवाया लेकिन वह 'क्यों' उसके जेहन में दिन भर अटका रहा। अगर वह माँ की जगह होती तो वह भी शायद ऐसा ही सोचती लेकिन माँ के लहजे में 'कुछ और' की बू भी थी जिसके लिए वह खुद को मना नहीं पा रही थी। उसके हर कदम का माँ ने, पापा ने साथ दिया... फिर? सुलोचना के जाने के बाद भी कई दिनों तक वह बेचैन रही... टुकड़ों-टुकड़ों में बँटकर उसने रूटीन तो निभाए पर हर बार वह उन मौकों पर मन से गैर मौजूद रही।

अद्भुत दुनिया से परिचित हो रही थी दीपशिखा। चित्रकला, रॉकपेंटिंग, फोटोग्राफी। फोटोग्राफी में भी छायाचित्रों को मिला-जुलाकर अनोखे दृश्य प्रस्तुत करना। मुकेश को इसमें कमाल हासिल था। रॉकपेंटिंग में शेफाली बेजोड़ थी। शेफाली दीपशिखा के साथ उसके स्टूडियो में चार-पाँच घंटे काम कर लेती थी। जास्मिन, सना, एंथनी, शादाब, आफताब सब अच्छे दोस्त बन गए थे। सबका मकसद एक था, लगन एक थी... हौसले एक थे पर चुनौतियों को झेलने की ताकत अलग-अलग थी। दीपशिखा को बहुत आनंद मिलता था, इन सबों के बीच। शेफाली का मानना था - "रॉक पेंटिंग प्रकृति से सीधा साक्षात्कार कराती है। अजंता की गुफाओं पर की कला आदिम युग में मानव की मूर्तिकला की सबसे पहली साक्षी कही जा सकती हैं। ऊर्जा का स्रोत जो प्रागैतिहासिक युग के रहस्यों को अपने में छुपाए है।" दीपशिखा कैनवास पर गढ़े चित्रों को रहस्यमय समझती थी जिसकी एक-एक रेखा न जाने कितने रहस्यों से भरी है।

सभी चित्रकार हुसैन से मिलने के इच्छुक थे। जहाँ एक ओर वे किंवदंती बन चुके हैं वहीं दूसरी ओर अपनी सनक और जूनून के लिए भी मशहूर हैं। शेफाली को 'हुसैन दोशी गुफा' देखने की तमन्ना है जो अजंता की गुफा के तर्ज पर बनी है और जिसमें हुसैन की पेंटिंग लगी हुई है।

"चलो हम देखकर आते हैं' हुसैनी गुफा'।"

सना के प्रस्ताव पर शादाब चहककर बोली - "तुम लोगों ने अभी तक हुसेनी गुफा नहीं देखी... माशा अल्लाह मिरेकिल है, थोड़ी जमीन के नीचे है तो थोड़ी ऊपर... मानो एक ऐसा कैपसूल जो एयर स्पेस में बस छूटना ही चाहता हो। वहाँ उनके काले कटआउट कुछ इस तरह बिखरे हैं जैसे खामोश, गुमनाम परछाइयाँ चल रही हों... सन्नाटा इतना कि खामोशी तक सुनाई न दे।"

"क्या बात है शादाब... तुम तो शायरा हो सकती हो।" सना मंत्र मुग्ध हो बोली। एंथनी ने जोरदार ठहाका लगाया - "ये और शायरा... इसे तो उर्दू तक ठीक से नहीं आती... और है मुसलमान।"

शादाब तुनक गई - "एंथनी, तुम मेरा मजाक मत उड़ाया करो।"

"अरे, बुरा मान गईं?" एंथनी के लहजे में माफीनामा था।

"बुरा न मानने के लिए दिल को मनाना पड़ रहा है, वह कह रहा है सबको चाय समोसे खिलाओ।"

ताबड़तोड़ ऑर्डर दिया गया।

"एक ट्रीट जास्मिन की बाकी है। उसकी पेंटिंग्स काफी अच्छे दामों में बिकी हैं एग्जीबिशन में।"

"हाँ तो एक ही दिन इतना नहीं खाना है और जास्मिन की ट्रीट तो शानदार होगी। चाय समोसे से काम नहीं चलेगा। समोसे गर्मागर्म थे... सभी के बीच बहस के मुद्दे भी गर्मागर्म थे। माहौल खुशनुमा था। और खुशनुमा क्यों न होगा मशहूर हस्तियों की कला ने भी इसी इंस्टिट्यूट ने निखार पाया है। शादाब जिनकी फैन है वे हुसैन भी यहाँ चित्रकारी करते थे। इस इंस्टिट्यूट की बरसों से देखभाल करते उम्रदराज सैयद साहब जिन्हें सब चचा कहते हैं बताते हैं कि "हुसैन का कहना ही क्या था... लाजवाब चित्रकार। उन दिनों उन्होंने एक फिल्म बनाई थी 'थ्रू द आइज ऑफ ए पेंटर' जिसकी शूटिंग राजस्थान के जैसलमेर और रेगिस्तानी इलाकों में हुई थी। मैं भी उनके साथ था। कई दिन हम वहाँ रहे और हुसैन ने एहसास नहीं होने दिया कि हम अपने घर से इतनी दूर हैं।"

सैयद चचा जब भी फुर्सत में होते चित्रकारों के किस्से सुनाते। दीपशिखा ने जाना कि चित्रकला एक तपस्या है जिसमें शुरुआती मेहनत और कष्ट के बाद का हासिल रोमांचक है। वह उस हासिल में दिलोजान से जुट गई।

"क्यों न हम सब एकजुट होकर एक प्रदर्शनी लगाएँ जिसमें सभी के चित्रों की मिली-जुली प्रस्तुति हो।" आफताब के इस सुझाव पर सभी के चेहरे खिल उठे।

"अभिनव प्रयोग रहेगा यह। जहाँगीर आर्ट गैलरी में तारीखें देख लेते हैं कि कब वहाँ जगह उपलब्ध है और काम में जुट जाते हैं।" सना जोश में थी।

"मेरा भी एक सुझाव है।" मुकेश ने कहा।

"हाँ, बोलो न।"

हम आठों मिलकर एक आर्ट ग्रुप स्थापित करते हैं और उसी के तहत प्रदर्शनी लगाएँगे।"

मुकेश के सुझाव पर सभी उछल पड़े - "अरे वाह यार... क्या आइडिया है कसम से... जहाँ को लूट लेंगे हम।"

एंथनी ने एक फ्लाइंग किस मुकेश की तरफ उड़ाया।

"हाँ... तो पहले कॉफी... कॉफी के साथ ग्रुप का नामकरण होगा।"

फोन पर कॉफी का ऑर्डर दिया गया। थोड़ी देर बाद सबके हाथों में कॉफी के मग थे और स्टूडियो में खामोशी। दीपशिखा ने पर्ची पर लिखा अंकुर ग्रुप ऑफ आर्ट'। सैयद चचा को बुलाया गया। नाम की पर्ची उन्हीं से निकलवाई गई और इत्तफाक कि दीपशिखा की पर्ची ही सैयद चचा ने निकाली। नामकरण के साथ ही सैयद चचा नारियल और बेसन के लड्डू खरीद लाए। मुकेश ने नारियल फोड़कर सभी के स्टूडियो में उसका पानी छिड़का और अगरबत्तियाँ लगाई गईं। यह एक ऐसी पहल थी जिसने सभी को जोश और उत्साह से भर दिया था। दूसरे दिन शादाब और एंथनी जहाँगीर आर्ट गैलरी जाकर प्रदर्शनी की तारीख पक्की कर आए और गैलरी बुक करा आए। सारा खर्च दीपशिखा ने दिया। सबसे पहले निमंत्रण पत्र बना।

"अंकुर ग्रुप ऑफ आर्ट की प्रस्तुति... चित्रकला रॉकपेंटिंग और छायाचित्रों (ट्रांसपेरेंसियाँ) का अनूठा संगम। प्रायोजक - दीपशिखा।"

"नहीं, मेरा नाम नहीं आना चाहिए।" दीपशिखा ने विरोध किया।

"क्यों खर्च तो तुम्हीं कर रही हो।"

"तो क्या हुआ, हम सब अंकुर के ही तो सदस्य हैं।"

"ओ.के... ओ.के..." मुकेश ने सबको शांत किया।

"ऐसा करते हैं जब हमारे चित्र बिकेंगे तो हम उसमें लागत शामिल करके शेयर कर लेंगे इसलिए प्रायोजक का नाम मत दो... क्यों दीपशिखा, ठीक है न।"

फिर भी दीपशिखा भुनभुनाती रही। स्टूडियो से निकलकर सब अपनी-अपनी राह हो लिए थे। मुकेश, दीपशिखा प्रियदर्शिनी पार्क की ओर चले आए। नारियल के पेड़ों के इर्द-गिर्द की चट्टानों पर बैठते हुए दीपशिखा ने सामने फैले समंदर की ओर देखा... लहरें शांत थीं - "दीप, क्यों हर बात मन पर ले लेती हो?" मुकेश ने उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।

"मैं ऐसी ही हूँ।"

दीपशिखा के बालों का क्लिप मुकेश ने शरारती अंदाज में निकाल लिया। रेशमी सुनहले बालों के संग हवाएँ सरगोशियाँ करने लगीं - "और मैं ऐसा हूँ।"

"वो तो मैं जानती हूँ।" दीपशिखा ने उसके कंधे पर अपना सिर टिका दिया - "तुम्हें जाना तभी तो तुम मेरा हाथ अपने हाथों में लेने का साहस कर पाए।"

"मैं खुशनसीब हूँ, मुझको किसी का प्यार मिला।"

"हूँऽऽ आज तुम मस्ती के मूड में हो... जाओ... पॉपकॉर्न लेकर आओ... आज मैं तुम्हें अपनी कविता सुनाऊँगी।"

"माय गॉड... पॉपकॉर्न खाते हुए कविता पाठ??"

"जाओ न यार... भूख लगी है।"

रात दबे पाँव शमा के करीब आ चुकी थी। समुद्री हवाओं में खुनकी घुलने लगी थी।

"मेरे लिए सूरज का डूबना सच है क्योंकि मैं सूरज का उगना देख ही नहीं पाता।" मुकेश ने पॉपकॉर्न चबाते हुए कहा।

"क्यों? मैं तो हर सुबह सूरज को उगता देखती हूँ... मासूम सा... गोल... नारंगी... बिना किरनों वाला लेकिन झिलमिलाता।"

"फीमेल की यही तो फितरत है... जो चमकदार है उसका साथ देती हैं।"

"ऐसा तुम सोचते हो। तुम मर्दों की सोच ही संकीर्ण है।"

"शुक्रिया... शुक्रिया जानेमन... हाँ तो मैं कह रहा था कि मेरे लिए सूरज का डूबना सच है। मैं जो देखता हूँ वही मेरे लिए सच है। सूर्योदय के समय मैं सोता रहता हूँ। सूरज को अगर समंदर में डूबते हुए देखो तो लगता है जैसे समंदर के हर कतरे ने बड़ी शिद्दत से उसे अपने में समेट लिया है।" और कैमरे की स्क्रीन पर वह डूबते सूरज की तस्वीरें दिखाने लगा - "मैं जो प्रदर्शनी के लिए चित्र बनाऊँगा न, उसकी थीम ही रहेगी डूबता सूरज।"

"मेरी थीम आदिवासी। मैं आदिवासियों पर पहले से ही काम कर रही हूँ।"

"तुम थीम का नाम देना प्रकृति पुत्र।"

गहराती रात में दीपशिखा और मुकेश चट्टान से उठकर तट पर टहलने लगे। सैलानियों की भीड़ के बावजूद दोनों एक-दूसरे में डूबे थे। मुकेश ने दीपशिखा को बाँहों में भरकर चूम लिया। समंदर का कतरा-कतरा पुकार उठा... मरहबा... मरहबा... दोनों के दरम्यान वक्त मानो थम सा गया। लहरें किनारों तक आकर लौटना भूल गईं, रेत में समाने लगीं। समंदर से बर्दाश्त नहीं हुआ, उसने रेत के संग ही लहरों को वापिस खींच लिया।

और दिनों की बनिस्बत आज दीपशिखा को घर लौटने में देर हो गई थी। दाई माँ पाँच-छै बार फोन कर चुकी थीं और हर बार दीपशिखा का जवाब होता... काम में बिजी हूँ, लौटने में देर होगी।"

"इतनी देर कहाँ लगा दी बिटिया... मारे घबराहट के हम तो..." दीपशिखा ने झट दाई माँ के गाल चूम लिए - "क्या दाई माँ... अब मैं बड़ी हो गई हूँ। पर तुम मुझे अभी भी तोतली गुड़िया ही समझती हो... छोती छी... पाली... पाली..."

उसने तुतलाकर अपनी ही नकल उतारी। दाई माँ लाड़ से उसे देखती रहीं। दीपशिखा को दाई माँ लगती भी बहुत सुंदर हैं। गोरा-गोरा मुखड़ा... काली भँवरे सी आँखें और पतले-पतले गुलाबी होठ...

जब सुलोचना की शादी हुई थी तो उनके साथ मायके से दहेज के रूप में दाई माँ ही आई थीं - चूँकि अंतर्जातीय विवाह था बल्कि अंतरधार्मिक भी इसलिए कहीं ससुराल में सुलोचना अकेली न पड़ जाएँ तो संग कर दी गई थीं दाई माँ जो सुलोचना की ही उम्र की थी। वो भी तब जब सुलोचना के लिए मायके का दरवाजा खुल गया था। शुरू-शुरू में तो वे हर दो महीने बाद छुट्टी लेकर अपने पति महेशचंद्र के पास चली जातीं पर फिर यूसुफ खान ने महेशचंद्र को अपने कारोबार में नौकरी पर लगा दिया। पीपल वाली कोठी के सर्वेंट क्वार्टर में दोनों की गृहस्थी बस गई। दो लड़कियाँ हैं उनकी। अब तो घर द्वारवाली हो गईं। दोनों की पढ़ाई-लिखाई, शादी ब्याह का खर्च यूसुफ खान ने ही उठाया। बहुत सारे एहसानों का बोझ लिए दोनों मियाँ बीवी पीपलवाली कोठी के लिए समर्पित रहे। सुलोचना को और यूसुफ खान को उन दोनों पर इतना विश्वास है कि वे दीपशिखा की ओर से एकदम निश्चिंत हैं। दाई माँ को तो लगता ही नहीं कि दीपशिखा उनकी बेटी नहीं है।

टेबिल पर खाना लगाकर दाई माँ फुलके सेंकने लगीं। दो फुलके खाती है दीपशिखा जो दाई माँ हमेशा गर्मा गर्म ही परोसती है उसे। खाना खाते हुए सारे दिन की घटनाओं का बयान सुने बिना दाई माँ उसे सोने नहीं देती। लेकिन दीपशिखा सावधान है। वह भूल से भी मुकेश का जिक्र नहीं छेड़ती। अगर बात खुल गई तो हो सकता है पाबंदियाँ शुरू हो जाएँ क्योंकि पल-पल की खबर दाई माँ के जरिए यूसुफ खान और सुलोचना तक पहुँच जाती है। पीपलवाली कोठी में दिन की और रात की शुरुआत दाई माँ के फोन से ही होती है। दीपशिखा के जन्म के पहले सुलोचना को विशाल कोठी मानो काटने को दौड़ती थी लेकिन अब... कोठी के हर कोने, हर वस्तु में दीपशिखा की मौजूदगी का एहसास है। एक शाम कोठी के लॉन में चाय पीते हुए यूसुफ खान ने कहा भी - "तुम हर महीने एक चक्कर मुंबई का लगा लिया करो।"

"कहो तो दीपू की शादी होने तक वहीं रह जाऊँ?"

"शादी? ये अचानक तुम्हें क्या सूझी? इस ओर तो मेरा ध्यान ही नहीं गया।" यूसुफ खान के चेहरे पर चिंता झलक रही थी।

"दीपू अब छब्बीस की हो गई। तुम क्या उसे बच्ची ही समझ रहे हो? सवाल ये उठता है कि लड़का किस कौम में तलाशा जाए।"

सुलोचना की आँखों की दुविधा यूसुफ खान तुरंत समझ गए। थोड़ा सम्हले - "लड़का मुस्लिम ही होगा।"

"जरूरी तो नहीं, हिंदू भी हो सकता है। यह तो दीपू की पसंद पर निर्भर करता है।"

"यानी कि अब अपना भला बुरा वह सोचेगी? वह तय करेगी कि हिंदू में शादी हो कि मुस्लिम में... है उसे इतनी समझ?"

सुलोचना के चेहरे पर मुस्कुराहट देख वे परेशान हो उठे - "तुम मेरी बात को तवज्जो नहीं दे रही हो।"

"मैं सोच रही हूँ कि आखिर है तो वो हमारी ही बेटी। जब हमने अपनी शादी का फैसला खुद किया तो वह क्यों नहीं कर सकती?"

सुलोचना के याद दिलाने पे उन्हें अपनी शादी याद आ गई। कैसे चार दोस्तों की उपस्थिति में उनका सुलोचना से निकाह हो गया था। निकाह के समय उनका नाम बदलकर निकहत रखा गया था और सभी दंग रह गए थे जब सुलोचना ने निकाहनामे पर उर्दू लिपि में हस्ताक्षर किए थे। फिर सुलोचना की मर्जी के अनुसार यूसुफ खान ने हिंदू रीति से भी शादी की थी। उनका नाम भी बदलकर 'अजय' रखा गया था। तभी दोनों ने तय कर लिया था कि दोनों अपने-अपने ढंग से अपनी जिंदगी जिएँगे। वहाँ उनका कोई दखल नहीं होगा। सुलोचना माँग में सिंदूर भी लगाती हैं, माथे पर बिंदी, मंगलसूत्र... करवाचौथ का व्रत भी रखती हैं। इस सबको लेकर कभी उन दोनों में मतभेद नहीं हुआ। लेकिन युसूफ खान के परिवार वालों को यह बात बड़ी नागवार लगती थी और वे धीरे-धीरे यूसुफ खान को उनके हर हक से बेदखल करते गए। यूसुफ खान ने इस बात की परवाह नहीं की। सुलोचना उनके प्रति बेहद समर्पित और ईमानदार है। वे सुलोचना की मौजूदगी से भरी साँसों को बड़े एहतियात से लेते हैं... लेकिन बेटी के मामले में विचलित हो उठे हैं।

"लगाओ दीपू को फोन... शादी के मामले में उसकी मर्जी पता करो।"

"यूसुफ महाशय... शादी के मामले कहीं फोन पर पूछे जाते हैं। वह दशहरे में आएगी ही। बीस ही दिन तो बचे हैं। तभी बातें करना सही होगा।" कहते हुए सुलोचना ने चाय की आखिरी घूँट भरी और फूलों की क्यारियों की ओर चल पड़ीं... माली को कुछ जरूरी निर्देश देने थे।

दीपशिखा और शेफाली आज जल्दी पहुँच गई थीं स्टूडियो। दीपशिखा आदिवासियों की पेंटिंग्स के साथ-साथ इब्न-ब-तूता पे भी काम करना चाहती थी। जब वह पीपलवाली कोठी में थी, मुंबई नहीं आई थी तब उसने इब्न-ब-तूता पर एक रेखाचित्र बनाया था। इस सैलानी व्यक्तित्व के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान और पास में खड़ा उसका गधा और बच्चों की उसकी कहानियाँ सुन-सुन कर विस्फारित आँखों को उसने रेखाचित्र में उकेरा था। अब वह इस चित्र में इब्न-ब-तूता की लंबी दाढ़ी और उस दाढ़ी में चिड़ियों के घोंसले भी बनाएगी। यही घोंसले तो बच्चों को उसकी ओर आकर्षित करेंगे।

"बहुत मुश्किल है शेफाली उस रहस्यमयी मुस्कान को इब्न-ब-तूता के चेहरे पर चित्रित करना जो सदियों तक शहर-दर-शहर गाँव-दर-गाँव भटकने और सैंकड़ों सालों तक बच्चों को कहानियाँ सुनाने के बाद चेहरे पर उभरती है लेकिन नामुमकिन नहीं।"

"तुम ऐसा कर लोगी दीपशिखा... मुझे पता है।"

"तुम लोगों का भरोसा नर्व्हस भी करता है और उत्साहित भी।"

इतने में मुकेश आ गया... उसके चेहरे पर ताजी खिली मुस्कान थी।

"लो तुम्हारा इब्न-ब-तूता आ गया।" दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

"क्या बात है, मैं चाँदनी में नहा रहा हूँ।" मुकेश ने रोमांटिक होते हुए कहा।

"देख दीपू... मुकेश कवि होने की जद में प्रवेश कर रहा है।" दीपशिखा ने बेहद प्यार भरी नजरों से मुकेश की ओर देखा और अपने काम में लग गई। हालाँकि उसके सभी दोस्तों को उनके प्रेम के बाबत पता है लेकिन दोनों सबके सामने प्रगट नहीं करते। एक स्वस्थ दोस्ती का रिश्ता कायम है सब के बीच। हँसना, खिलखिलाना, एक-दूसरे को छेड़ना, खानापीना और काम में जुटे रहना... दिन मानो पंख लगाए उड़े चले जा रहे थे। लेकिन एक रूटीन दीपशिखा और मुकेश के बीच बिना चूके चलता रहा। स्टूडियो के बाद कभी प्रियदर्शिनी पार्क, कभी गिरगाँव चौपाटी, कभी मरीन ड्राइव के समुद्री तट पर तीन-चार घंटे गुजारना और दीपशिखा को घर के गेट तक पहुँचाना। जुहू तट पर वे कभी नहीं जाते थे क्योंकि वह दीपशिखा के घर के एकदम नजदीक था। दीपशिखा अब मुकेश की जरूरत थी और मुकेश दीपशिखा की। इस जरूरत ने दोनों को ऐसे तारों से जोड़ दिया है जिसे तोड़ना आसान नहीं। एक-दूसरे के अंदर से गुजरते हुए जैसे दोनों बारीक तार हो गए हैं और उनका वजूद बारीक तारों से बुना जाल बन गया है। इस गहराते प्रेम जाल में दोनों कोमलता से समा गए थे। जाल से आजाद होना अब उनके वश में न था। दीपशिखा हवा में डोलती पंखुड़ी सी मुकेश के दिल में समा गई थी और मुकेश के जिस्म का कोना-कोना महक उठा था। हवा ने उन्हें शरारत से देखा और पंखुड़ियाँ छितरा कर हँस दी। कोयल एन कानों के पास झुककर कुहुक उठी... जाने कहाँ से आवाज आई... दीप... दीप... दीप... मुकेश... मुकेश... मुकेश की दोनों के दिल की पहाड़ियों ने दूधिया झरने छलका दिए।

दशहरे पे दीपशिखा दाई माँ के संग पीपलवाली कोठी आई। महेश काका फ्लैट की देखभाल के लिए मुंबई में ही रुक गए। दाई माँ की बड़ी बेटी की जचकी होने वाली थी सो आते ही वे उसके पास गाँव चली गईं। सुलोचना को दीपशिखा कुछ बदली-बदली सी नजर आई। खूबसूरत तो वह बला की थी तिस पर मुकेश के प्रेम ने उसके चेहरे को गुलाब सा खिला दिया था। वह बेहद खुश रहने लगी थी। संगीत, चित्रकला से उसे हद्द दर्जे का लगाव था... सुलोचना ने एक और रूप देखा उसका... सुबह उठकर योगासन, प्राणायाम के बाद वह अपने मोबाइल में फीड गाने लगाती और नाचती... नाच भी गजब के! बिल्कुल फिल्मी स्टाइल वाले। वे चकित थीं कि उनकी धीर, गंभीर बेटी में आकांक्षाओं के साथ-साथ यह चंचलता, यह जीवंतता कैसे, कहाँ से आ गई? फिर उन्हें याद आया कि नृत्य, संगीत और शेरो शायरी के शौकीन तो यूसुफ खान भी हैं। दीपशिखा जब दस वर्ष की थी तो उनकी कोठी में बनारस घराने के कत्थक नर्तक गोपीनाथ आए थे। उनके नृत्य का आयोजन इसलिए भी और किया गया क्योंकि उस दिन सुलोचना और यूसुफ खान की शादी की सालगिरह थी। कई लोगों को आमंत्रित किया गया था। नृत्य तो रात भर चलता रहा लेकिन हैरत की बात यह थी कि दीपशिखा भी मध्यरात्रि तक जागकर नृत्य देखती रही थी। नृत्य के गीत के बोल थे - "बलमवा मोहे... लालचुनरिया मँगा दे।"

गोपीनाथ जी ने लाल रंग की अनेकों मुद्राएँ प्रस्तुत कीं... खिले हुए पुष्प, सिंदूर से भरी माँग, बिंदी, उगता सूरज, पान का बीड़ा लेकिन बलमवा तब भी नहीं समझे कि चुनरिया का रंग उनकी सजनी को कैसा चाहिए। अंत में यशोदा मैया की गोद में उनके लाल कन्हैया को बताकर नृत्य की समाप्ति हुई। सुबह दीपशिखा ने सुलोचना से पूछा - "माँ, लाल रंग की ही चुनरी लानी है ये कैसे समझाया उन्होंने?" सुलोचना की आँखें रात्रि जागरण से बोझिल हो रही थीं। चाहती थीं थोड़ी देर सो ले पर बेटी की जिज्ञासा को वे टाल नहीं सकती थीं - "दीपू... कोई भी कला हो... एक तपस्या होती है। तुम्हें चित्रकारी का शौक है तो तुम चित्रकारी से अपने मन के भाव प्रगट करती हो वही काम नर्तक अपनी भावमुद्राओं से करता है। गहरे डूबना ही कला का उद्गम है।"

शायद दीपशिखा में चित्रकारी के साथ नृत्य का बीज भी उसी दिन पड़ा हो। उनके प्रश्न का समाधान हो गया था। उन्होंने दीपशिखा को एकांत में बुलाया - "बैठो दीपू।" दीपशिखा समझ गई... माँ किसी मसले पर चर्चा करना चाहती हैं और निश्चय ही यह मसला उससे जुड़ा ही होगा। उसने अपने मन को तैयार किया।

"पहले ममा... मेरी नई लिखी कविता सुनो...

दीपशिखा टकटकी बाँधे सुलोचना को देखे जा रही थी। उसे लग रहा था जैसे मुकेश के साथ चलने का रास्ता अब सुगम होता जा रहा है।

"तो तलाशूँ कोई जीवनसाथी तुम्हारे लिए?"

"इस बार वह चौंकी - "क्या माँ?"

सुलोचना ने अपनी बात दोहराई। इस बीच दीपशिखा को जवाब ढूँढ़ने का मौका मिल गया - "नहीं माँ, मैं शादी के बंधन में नहीं बँधना चाहती हूँ।"

"क्यों? कोई खास वजह?"

दीपशिखा खामोश रही... वह कह भी सकती थी कि उसे मुकेश से प्यार है और वह उसी के साथ जीवन गुजारना चाहती है और अगर यह हो जाता है तो इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता। लेकिन वह अपेक्षाओं के घेरे में नहीं आना चाहती। शादी और कुछ नहीं बस एक-दूसरे से अपेक्षाओं का लंबा सफर है।

"जवाब दो दीपू, तुम कौन से दिली मंथन से गुजर रही हो?" दीपशिखा सावधानी से बात को खत्म करना चाहती थी कि माँ को शक भी न हो, दुख भी न हो और बेटी पर से उनका विश्वास डगमगाए भी नहीं।

माँ, मैं विश्वविख्यात चित्रकार, कवयित्री होने का सपना पाले हूँ। शादी इस सपने की कतई इजाजत नहीं देती। और माँ शादी तो एक आम बात है, हर व्यक्ति शादी करता है, परिवार बनाता है और एक दिन दुनिया से चल देता है। माँ, क्या तुम चाहोगी कि तुम्हारी बेटी साधारण जीवन जिए?"

सुलोचना उसके सुलझाव भरे वाक्यों में डूब गईं। उन्हें लगा जो वे नहीं कर पाईं वह दीपू कर रही है। जो वे नहीं सोच पाईं... वह दीपू सोच रही है। असाधारण होकर वे भी जीना चाहती थीं पर समाज और परिवार के विद्रोही तेवरों को नकारते हुए सिर्फ प्रेम विवाह कर पाईं वे और फिर यूसुफ के कदमों तले जन्नत की कामना में समर्पित होती गईं और रह गईं बस एक साधारण औरत बनकर जो मोम सी पिघलती है पर अपने पिघलने का सबब नहीं जानती बस इतना जानती है कि उसका पिघलना दूसरों को उजाला दे रहा है जब कि वह अपने अंदर की उस आँच से पिघलती है जो औरत का रूप बख्शते वक्त विधाता ने उसके सीने में उतार दी थी। सुलोचना ने दीपशिखा कोगले से लगा लिया, सीने में ऐसे दुबका लिया जैसे अपने पंखों के नीचे गौरैया अपने चूजों को दुबकाती है।

"मुझे तुम पर भरोसा है दीपू... तुम जो करोगी ठीक ही करोगी।"

"शुक्रिया माँ... माँ, मैं आम जिंदगी के लायक नहीं। मुझे ऐसे ही अच्छा लगता है। धरती पर रहकर आसमान को देखना। उन आकाशगंगाओं को जिनमें करोड़ों सूरज और चाँद हैं। हम सुई की नोक बराबर भी तो नहीं हैं माँ।"

सुलोचना ने उसकी पीठ थपथपाई और अंदर रसोई घर में चली गईं। यूसुफ खान का प्रश्न अनुत्तरित ही रहा। हालाँकि रात की तनहाई में, अँधेरे में हाथ बढ़ाकर यूसुफ खान ने सुलोचना की हथेली छुई थी।

"क्या कहा दीपू ने?"

सुलोचना ने सारी बातें बताते हुए कहा - "हमें वक्त का इंतजार करना होगा।"

"कब तक?"

"बता नहीं सकती। पर इसके अलावा दूसरा विकल्प भी तो नहीं है हमारे पास।"

यूसुफ खान ने लंबी साँस हरी और अँधेरे में धीरे-धीरे उभरते छत के दूधिया झाड़ फानूस पर नजरें टिका दीं।

मुंबई वापिसी की दीपशिखा की फ्लाइट सुबह 3.30 की थी। रात को दाई माँ अपनी बेटी की जचकी करा के लौटी थीं और बहुत खुश थीं। लड़का जो पैदा हुआ था। रात को ही सुलोचना ने बूँदी के लड्डू मँगवाए थे। दाई माँ के लिए साड़ी और चूड़ियाँ... ढेर सारे मेवे मिठाई, कपड़े, जेवर जच्चा-बच्चा दोनों के लिए दौलत सिंह के हाथ वे कल भिजवाएँगी ऐसा उन्होंने दाई माँ को बताया। दाई माँ की खुशी समेटे नहीं सिमट रही थी। वे ढोलक लेकर बैठ गईं और लगीं सोहरें गाने। पीपलवाली कोठी गीतों से गुलजार थी। कल सब कुछ शांत हो जाएगा सोचकर सुलोचना उदास हो गईं। सबसे छुपाकर उन्होंने अपनी छलक आई आँखें रूमाल में दबा लीं। इस बार दीपशिखा की बिदाई बोझिल हो रही थी। यूसुफ खान के लिए सुलोचना के लिए और खुद दीपशिखा के लिए भी... जिन माँ पापा ने उसे चौदह बरस बाद पाया था उनकी अपेक्षाओं में खरी कहाँ उतर पा रही थी दीपशिखा? तो क्या वह स्वार्थी है, सिर्फ अपने ही बारे में सोचती है? सहसा वह सुलोचना से लिपटकर सुबक पड़ी - "माँ... मुझे लेकर दुखी मत रहना... मैंने अपना जीवन कला को समर्पित कर दिया है। माँ, मैं खुद की रही कहाँ?" "ईश्वर तुम्हें सही राह दिखाए दीपू।" कहकर सुलोचना ने अपनी बिटिया को कलेजे से ऐसे भींचा मानो ईश्वर के दिए इस तोहफे को नजर न लगे किसी की।

मुंबई लौटकर जिंदगी को ढरल्ले पर आ जाना चाहिए था पर ऐसा हुआ नहीं। कुछ दिन अवसाद में बीते सखी सहेलियों के साथ के बावजूद... सुलोचना का चेहरा बार-बार आँखों के सामने आ जाता। बार-बार वह अपराधबोध से ग्रसित हो जाती, कई सवाल दिमाग में मँडराते, क्यों वह उन्हें खुश नहीं रख पा रही हैं क्या कर डाले ऐसा कि माँ के खामोश होठ मुस्कुराने लगें?

"स्टूडियो क्यों नहीं आ रही हो? सब काम रुका पड़ा है।" फोन शादाब का था जबकि शेफाली और मुकेश को वह तबीयत खराब होने के बहाने से टाल चुकी थी। शेफाली तो क्या टलती... आ धमकी घर - "यह क्या चेहरा बना लिया है, हुआ क्या है तुझे?"

उसने सब कुछ बयान कर दिया... शेफाली हँस पड़ी - "इतनी सी बात? एक बार मुकेश से मिल ले, सब ठीक हो जाएगा, बेचारा मजनू बना तेरे घर और स्टूडियो की सड़कें नाप रहा है।"

तैयार होकर दोनों स्टूडियो पहुँची... फिर ढेरों सवाल... कहाँ थी? क्या हो गया था? प्रदर्शनी के दिन नजदीक आ रहे हैं और आप जनाब...

मुकेश दूर खड़ा बेहद उदास नजर आ रहा था।

"अब आ गई हूँ न! काम पे लग जाती हूँ। तुम सब भी तो कलाकार हो, जानते नहीं कलाकार अपने मूड से ही काम कर पाते हैं।"

"ओऽऽऽ" दोस्तों के समवेत स्वर ने दीपशिखा के चेहरे पर मुस्कान ला दी। मुकेश को मानो जिंदगी मिल गई। वह दीपशिखा के नजदीक स्टूल पर बैठ गया। कैनवास पर इब्न-ब-तूता था।

"यार... ये इब्न-ब-तूता तुम्हारी थीम में फिट नहीं बैठ रहा... इसे बनाकर अलग रख दो और थीम को कंसंट्रेट करो।" मुकेश के कहने पर शेफाली ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई...

"ओ.के. बाबा... लो इब्न-ब-तूता ये गया कोने में, बस।" दीपशिखा ने अधूरी पेंटिंग सचमुच कैनवास से उतार कर कोने में टिका दी। उसकी इस हरकत पर सब खुशी से चीख सा पड़े - "ये हुई न बात।"

"ओ.के. नो बहस... अब हम काम पर लगें?" और दीपशिखा ने ब्रश उठाया।

बाकी लोग अपने-अपने स्टूडियो में चले गए। मुकेश तल्लीनता से दीपशिखा को देखे जा रहा था। शेफाली को लगा इस वक्त उसका यहाँ मौजूद रहना ठीक नहीं - "चलो, मैं चलती हूँ। दीदी को आज शॉपिंग करनी है। रूठ गईं तो मनाना मुश्किल हो जाएगा।"

दीपशिखा समझ गई... उसकी सखी में गजब की समझ है। वह उसके चेहरे के भाव पढ़ लेती है और कभी उसे निराश नहीं करती। उसके जाते ही दीपशिखा मुकेश से अपनी थीम पर चर्चा करने लगी।

"मैं चाहती हूँ मुकेश कि चित्र ऐसे बनाऊँ जो केवल आँखों से ही दिखाई न दें बल्कि भावों के द्वारा महसूस भी किए जा सकें।"

"मसलन?"

"मसलन कि मैं उन रंगों को बिखेरूँ जो अभिव्यक्ति से गूँथे हों... काला रंग महज काला न दिखे... एक भरी पूरी चंद्रविहीन रात दिखे... रात का सन्नाटा दिखे... दृश्य की बेचैनी दिखे... सुनहले रुपहले रंग... महज सुहावनापन न दें बल्कि एहसास कराएँ दिन की समाप्ति का, सूरज के डूबने का, पंछियों के घोंसलों में लौटने का... मुकेश में रंगों के साथ-साथ भावों को भी उतारना चाहती हूँ।"

"तुम कर पाओगी ऐसा... क्योंकि तुम एक कवयित्री हो... तुम बिंदु से रंगों को निकालकर अभिव्यक्ति दोगी... दीप, करो ऐसा, तुममें वो जज्बा है।"

जाने क्या हुआ... कौन सा बोध... कौन से अनागत का संकेत कि दीपशिखा सिहर उठी। उसका दिल तेजी से धड़कने लगा। ब्रश हाथ से छूट गया और वह मुकेश की बाँहों में समा गई। वह कहना चाहती थी कि हाँ, मैं कर पाऊँगी ऐसा... वह कहना चाहती थी कि कर पाने में उसे उसका साथ देना होगा... पर इस साथ की चाहत में दीपशिखा के आगे एक शून्य खुलता गया और उसने घबराकर आँखें मींच लीं।

अंकुर ग्रुप ऑफ आर्ट की प्रदर्शनी मुंबई में चर्चा का विषय बन गई। प्रतिदिन अखबारों में छपने लगा... संभ्रांत घरों के और कला के पारखियों की शामें प्रदर्शनी मन रखे चित्रों की चर्चा में गुजरती रहीं। कुछ चित्रों को छोड़कर लगभग सभी चित्र बिक गए। दीपशिखा का बीस एक चित्र नहीं बिका जो उसने आर्ट गैलरी को उपहार में दे दिया। सभी बेहद खुश थे। शुक्रवार की रात प्रदर्शनी खत्म हुई और शनिवार इतवार मनाने को कोई माथेरान गया तो कोई खंडाला... मुकेश और दीपशिखा महाबलेश्वर चले गए। दाई माँ को समझाकर कि "चिंता मत करना, सोम की सुबह मैं लौट आऊँगी।"

"पीपलवाली कोठी से फोन आया तो?" दाई माँ को जवाब चाहिए था।

"हाँ, तो कह देना, अब इतने दिन लगकर काम किया है तो दो दिन दोस्तों के साथ वीक एंड मनाएँगे और क्या?"

दाई माँ के पल्ले बात पड़ी नहीं... अमीरों की अपनी जीवन पद्धति... इतने साल पीपलवाली कोठी में गुजारकर न वे समझ पाई हैं और न समझना चाहतीं हैं। वैसे भी वे इन दिनों नाती के खयालों में मगन रहती हैं। महेशचंद्र से कहकर ऊन मँगवाया है और छोटे-छोटे मोजे, टोपे, स्वेटर बुनने में लगी रहती हैं। अब उधर ठंड भी तो कितनी पड़ती है।

महाबलेश्वर के वो दो दिन... वक्त मानो ठहर सा गया था दीपशिखा और मुकेश के दरम्यान - "यू नो दीप जिंदगी कितनी पेचीदा है?"

दीपशिखा के हाथों में मुकेश का एक हाथ था और दूसरे हाथ से वह उसके बालों से खेल रहा था। नाव झील की सतह पर आहिस्ता-आहिस्ता डोल रही थी। मल्लाह की मौजूदगी कोई महत्व नहीं रखती। उसे पता है इस रोमेंटिक जगह में प्रेमी या नए शादीशुदा जोड़े ही अधिक आते हैं। पतवार की छप... छप में मल्लाह के गीत की लय अजब समाँ बाँध रही थी। दीपशिखा ने उसके होठों पर हथेली रख दी - "नहीं, कुछ मत कहो... वक्त को यूँ ही बहने दो।"

मुकेश देर तक दीपशिखा की सपनीली आँखों में देखता रहा... देखता रहा कि सपनों का हुजूम वहाँ करवटें बदल रहा है कि उन आँखों में ऐसा कुछ है जो और कहीं नहीं दिखता जबकि वह कहना चाहता था कि जिंदगी उन्हें खूबसूरत लगती है जो उसे तर्क की नजर से देखते हैं और उन्हें भयानक जो उसकी आलोचना करते हैं।

"दीप... जिंदगी के मायने बताओगी?"

"मुझे नहीं पता मुकेश... मेरे लिए जिंदगी ईश्वर का दिया वो कालखंड है जिसमें मुझे आसमान छूना है और पाताल की गहराइयाँ तलाशनी हैं।"

नाव किनारे लग चुकी थी। मुकेश ने मल्लाह को रुपये दिए तो उसने झुककर सलाम ठोंका। पास ही स्ट्रॉबेरी का स्टॉल था। लाल-लाल स्ट्रॉबेरी मानो आमंत्रण दे रही थी। मुकेश स्ट्रॉबेरी खरीद लाया जिसे खाते हुए दोनों होटल की ओर लौटने लगे।

होटल का एक ही कमरा, एक ही बिस्तर... एक-दूसरे पर कुर्बान दीपशिखा और मुकेश... खिड़की पर लगे सुनहले और कत्थई परदों की धीमे धीमे हिलती झालर साक्षी थी दोनों के मिलाप की, हवाओं की चंचल तरंग साक्षी थी दोनों के समर्पण की जो बार-बार उन परदों को छेड़ रही थी। दो रातें... हसीन, नशीली और बहकती दो रातें संग-संग गुजार कर जब दोनों मुंबई लौटे तो दीपशिखा का निखरा-निखरा खूबसूरत चेहरा देख दाई माँ आश्वस्त हुईं - जब गई थी बिटिया रानी तो थकी-थकी लगती थी, अब थकान का कहीं नामोनिशान न था। वह दीपशिखा की लाई पत्तेदार गाजरें, स्ट्रॉबेरी जैम और स्ट्रॉबेरी से भरा पैकेट थाम किचन की ओर मुड़ी - "चाय बनाएँ बिटिया?"

"नहीं कॉफी... कुछ खाने को भी दो, बड़ी भूख लगी है।"

जिंदगी ने रफ्तार पकड़ ली। छै महीने गुजरते देर न लगी। मुकेश भारी उधेड़-बुन में था। पापा का हुक्म था फौरन घर आ जाओ, ममा ने उड़ती-उड़ती खबर दी थी उसे कि कोई लड़की पसंद की है उन्होंने... वह पसंद कर ले, हामी भर दे तो शादी की तारीख पक्की कर ली जाए। मुकेश का काम में मन नहीं लग रहा था... क्या करे? दीपशिखा के संग संबंध बन चुके हैं... एक तरफ यथार्थ है दूसरी तरफ यूटोपिया। एक ओर सच्चाई है तो दूसरी ओर स्वप्न... वह किस सिरे को पकड़े... दोनों में से एक सिरा तो छूटेगा ही जबकि उसके लिए दोनों सिरे महत्वपूर्ण हैं। पापा-ममा को ही समझाना पड़ेगा। सुबह उसने दीपशिखा को फोन किया - "कुछ दिनों के लिए घर जा रहा हूँ। इस बीच तुम अधिक से अधिक पेंटिंग बना लो ताकि लौटकर भोपाल में प्रदर्शनी प्लान कर सकें।"

"अरे... अचानक। और ज्यादा पेंटिंग मतलब तुम देर से लौटोगे?" दीपशिखा उदास हो गई।

"नहीं दीप... जल्दी लौटूँगा... तुम्हारे बिना क्या रह पाऊँगा मैं... अब तुम्हारी आदत हो गई है मुझे।"

"सिर्फ आदत... प्रेम नहीं?"

"तुम भी न... प्रेम से ही तो जरूरत उपजती है। आदत उपजती है।"

"बातें बनाना खूब आता है तुम्हें? जाओ, जल्दी लौटना। मैं तुम्हारा इंतजार करूँगी।"

स्टूडियो सूना-सूना लग रहा था। हालाँकि सभी संगी-साथी थे। बातें भी अमूमन वैसी ही पर मुकेश की कमी के शून्य ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया था। दिल में प्यार और बदन में उसके बदन का, छुअन का एहसास... एक नए दौर से गुजर रही थी दीपशिखा। उसकी नजरों में कैद थे महाबलेश्वर के हरे भरे जंगल, बलखाते ऊँचे-नीचे रास्ते, रास्तों पर पसरा सन्नाटा... सन्नाटे में उसकी और मुकेश की हलचल... शांत मंथर झील... झील पर तैरती नावें और मल्लाह के गीत... वह कैनवास में खुद को पिरोने लगी। पहले लहरें उभरीं जो गति की प्रतीक हैं। जीवन गति ही तो है... जैसे लहरें अपने साथ बहुत कुछ लाती भी हैं और ले भी जाती हैं। लहरों को उसने कितने कोणों से उकेरा और हर चित्र में लहरों का सौंदर्य नए-नए रूपों में नजर आने लगा। ओह, कितना रोमांचक है... एक लहर शरीर में भी समा गई है, मुकेश की छुअन की लहर जो माथे से पैर के अँगूठों तक दौड़ गई थी जब मुकेश के होठ उस पर फिसले थे।

"तुम्हारा बदन जैसे साँचे में ढला हो... पत्थर की शिला को तराशकर जैसे मूर्तिकार मूर्ति गढ़ता है।" वह रोमांचित हो उठी थी। अपने इस रोमांच को वह चित्र में ढालने लगी। एक युवती गुफा के मुहाने पर ठिठकी खड़ी है। युवती पत्थर की मूर्ति है मगर चेहरे झोंकों जिंदगी को पा लेने की आतुरता है। आँखों में इंतजार... जिंदगी का... उसने शीर्षक दिया 'आतुरता' ...उसे लगा मानो उसकी आतुरता मुकेश तक पहुँची है। वह समंदर के ज्वार सा उसकी ओर बढ़ा चला आ रहा है। पीछे-पीछे फेनों की माला लिए लहरें और रेत में धँस-धँस जाते मुकेश के कदम... वह मुड़कर समंदर के बीचों-बीच लाइट हाउस को देख रहा है जो तेज ऊँची-ऊँची लहरों पर डोलते जहाजों के नाविक को राह दिखाता है।

फिर दौड़ा है मुकेश... अब की बार उसका लंबा कुरता, बाल हवा के तेज झोंकों में उड़ रहे हैं और वह किसी रोमन सा नजर आ रहा है... फिर खुद को उकेरा दीपशिखा ने... दीपशिखा मुकेश की बाँहों में झूल गई है और ज्वार से भरी ऊँची-ऊँची लहरों ने उन्हें भिगो दिया है और समंदर के अंतिम छोर से चाँद झाँका, हँसा और बादलों में समा गया मगर रुपहली चाँदनी फिर भी फूटी पड़ रही है बादलों से... समंदर रजत हो उठा है।

दीपशिखा ने पूरे हफ्ते चित्र बनाए। वॉटर कलर्स के साथ-साथ उसने ग्रेफाइट, क्रेयोंस और ऑइल कलर्स का भी इस्तेमाल किया। हल्के-हल्के रंगों की छटा ने उसके चित्र जीवंत कर दिए... जास्मिन, सना, शादाब, आफताब, एंथनी अवाक थे।

"दीपशिखा... यार, गजब के जीवंत चित्र बनाए हैं। कमाल हो गया... हम भोपाल की आर्ट गैलरी बुक करवा ही लेते हैं। दिसंबर में जब मौसम खुशनुमा होगा और बाजार क्रिसमस के उपहारों से लदा होगा।"

"मगर एंथनी?"

"तो क्या? 25 दिसंबर क्रिसमस के लिए हमेशा से तय तारीख है। हम दिसंबर का पहला हफ्ता बुक कराते हैं। अभी तो दो महीने बाकी हैं।"

दीपशिखा मुकेश को फोन लगा-लगा कर थक गई पर नॉट रीचेबल... पहुँच के बाहर।

"मुकेश का घर कहाँ है आफताब?" दीपशिखा बेचैन थी।

"यू.पी. में है... सुल्तानपुर है शायद।"

"बताता कहाँ है कुछ अपने बारे में।"

सूरज ढलते ही परिंदे घोंसलों की ओर लौटने लगे। स्टूडियो बंद कर दीपशिखा अनमनी सी घर लौटी। दाई माँ की जिद के कारण उसे दो निवाले हलक के नीचे उतारने पड़े। बिस्तर पर लेटी तो लगा सेज काँटों की है, मुकेश खामोश क्यों है? फोन क्यों नहीं करता? बताता क्यों नहीं कि वहाँ कौन सी उलझन में है... कहीं वह धोखा तो नहीं दे रहा? उसे पा लेने की तड़प में वह इतने लंबे अरसे तक उसके आगे पीछे घूमता रहा और अब... जब दोनों एक हो गए... संग-संग जीने मरने की कसमें खा लीं तो वो कौन सा राज है जिसे मुकेश उससे छिपा रहा है... नहीं... नहीं... वह दीपशिखा को धोखा नहीं दे सकता। जरूर किसी मुश्किल से गुजर रहा होगा। वह सोते-सोते चौंककर उठ बैठती। एस.एम.एस. करती तो फेल हो जाता। ट्राई अगेन... ट्राई अगेन... कॉल करती तो नॉट रीचेबल... आखिर हुआ क्या है?

कई हफ्ते बीत गए। भोपाल की प्रदर्शनी के दिन नजदीक आ गए। दीपशिखा ने अपने चित्रों में प्रेम का संसार रच दिया था। पहले वह गुनगुनाते हुए चित्र बनाती थी इसलिए आस-पास की आवाजें सुनाई नहीं देती थीं। अब खामोशी मुकेश की गैर मौजूदगी को बढ़ा देती है। उसके ब्रश में से प्रेम के सातों रंग उभर आते हैं - प्रेम, विश्वास, आतुरता, जुनून, घृणा, तिरस्कार, धोखा... और उसका ब्रश जुनून से छलाँग मारकर सीधा धोखे पर आ जाता है। आफताब सना के कान के पास फुसफुसा रहा था - "खबर पक्की है, मुकेश ने शादी कर ली है।"

जैसे दिल में घूँसा सा लगा हो। कानों में पहुँची इस फुसफुसाहट से पूरे बदन में सनसनी तारी हो गई... वह नहीं ऽऽ की चीत्कार के संग बिखरे रंगों पर ढेर हो गई।

"दीपू... सँभालों खुद को। यह तुम्हें क्या हुआ?" शेफाली भी चीखी। पल भर को वक्त स्तब्ध रह गया।

बंद आँखों में भी मानो हर दृश्य उभर रहा था। पापा आए हैं। वह हवाई जहाज से पीपलवाली कोठी लाई गई है। उसका अपना कमरा... सामने बालकनी की ग्रिल पर चमेली की उलझी-उलझी सी लतर पर खिले फूलों की खुशबू नथुनों में समा गई। माली काका गुलाब की छँटाई कर रहे थे। उसकी ऐसी हालत देख कैंची उनके हाथ में धरी की धरी रह गई... माँ सिरहाने खड़ी डॉक्टर के हर सवाल का जवाब देतीं। डॉक्टर के जाने के बाद लगभग दो घंटे बेहोशी की नींद सोती रही दीपशिखा। उठी तो चिंतातुर माँ को सामने पाया - "मुझे क्या हुआ था माँ?" पूछना चाहा पर तभी सुलोचना बोल पड़ीं - "अब कैसी हो दीपू?"

वह हथेली की टेक लेकर उठी। सुलोचना ने तकियों के सहारे उसे बैठा दिया... उसने पूछना चाहा क्योंकि अब कोई शंका शेष नहीं थी इसलिए कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ माँ?

"तुम्हारे सारे चित्र बिक गए दीपू... शेफाली का फोन था कि प्रदर्शनी बहुत सफल रही।"

"सचऽऽऽ... माँ..." खुशी की लहर ने उसके चेहरे को खिला दिया।

"तुमने मेहनत भी तो बहुत की थी। तुम्हारे पापा बता रहे थे कि चित्र बेहद कलात्मक थे। वे तो मोहित हैं तुम्हारी चित्रकारी से।"

भर आई आँखों के बावजूद वह मुस्कुरा पड़ी।

"माँ, मैं कुछ दिन बिल्कुल अकेले रहना चाहती हूँ। खुद का मंथन करना चाहती हूँ, पहचानना चाहती हूँ।"

"हाँ... तो रहो न इधर।"

"इधर...? इधर तनहाई कहाँ है, मैं लद्दाख जाना चाहती हूँ। बस आठ दस दिन के लिए।"

"पहले पूरी तरह स्वस्थ हो जाओ फिर चली जाना। वहाँ का इंतजाम दौलत सिंह से करवा देंगे।"

दरवाजे के परदे पर टँगी घंटियाँ टुनटुनाईं - "कैसी है मेरी शहजादी? ये देखो, पेपर में तुम्हारी तस्वीर।"

"मेरी तस्वीर?"

"तुम्हारे सारे चित्र फिल्म डायरेक्टर नीलकांत ने खरीद लिए हैं। इसलिए खबर ने भी तीसरे पन्ने पर जगह पाई, तुम्हारे चित्र की और तुम्हारी फोटो के साथ नीलकांत की फोटो... रातों-रात तुम भी स्टार बन गईं दीपू..."

दीपशिखा ने पापा के हाथ से पेपर लेकर पलंग पर फैला लिया। ओह सेलिब्रिटी पेज पर उसकी तस्वीर उसकी पेंटिंग, उसका नाम... आँखें उमड़ आईं... सच है इनसान का जब दिल टूटता है ईश्वर मलहम साथ-साथ भेज देता है। उसे लगा वह पहाड़ से गिरी जरूर पर फूलों की घाटी ने उसे लपक कर कोमल बिछावन दे दी।

इतने दिनों बाद दीपशिखा ने सबके साथ भरपेट डिनर लिया और गहरी नींद सोई।

सुबह वह तरोताजा थी। उसने शेफाली को फोन लगाया। वह चहकी - "अरे छा गई तू तो यार... बंबई, भोपाल के सारे अखबारों में तू छपी है... नीलकांत काफी बड़ी हस्ती हैं। तू जब बंबई लौटेगी तो मिलने चलेंगे उनसे..."

"शेफाली... अरे, मेरा हाल तो पूछ।"

"पूछना क्या... तू अच्छी है... तुझे और कुछ नहीं सोचना है। भूल जा उस धोखेबाज को... उसने तुझे दिया ही क्या? बस... लिया ही लिया है... ऐसे लोग बरबाद हो जाते हैं। अब तुझे केवल और बस केवल ही... अपने पेंटिंग पर ध्यान देना है। तू मशहूर हो गई है। लोगों की अपेक्षाएँ बढ़ गई हैं तुझसे।"

हाँ सच... आसमाँ पर बिठा दिया है उसे उसके फैंस ने... और उसे उस जगह को बरकरार रखना है। सहसा वह ऊर्जा से भर उठी। उसे लगा जैसे आसमान उसे आमंत्रण दे रहा हो।

"माँ, कब की टिकट है लद्दाख की?"

"दो तारीख की फ्लाइट है दीपू... तुम्हारा सारा लगेज कैनवास, ब्रश, कलर्स, पेपर्स सब कुछ दौलत सिंह लेह में होटल का कमरा बुक करा के रख आया है। एक जीप का भी इंतजाम हो गया है। पहाड़ी इलाका है, जीप ठीक रहेगी।"

सुलोचना बताती जा रही थीं और दीपशिखा की अटैची तैयार करती जा रही थीं।

एयरपोर्ट में अंदर जाते-जाते सुलोचना और यूसुफ खान के चीयर्स करते हाथ उनके जाने के बाद भी आँखों में कैद रहे। जाँच पड़ताल के बाद वह कुर्सी पर बैठी फ्लाइट अनाउंस होने का इंतजार करती रही। मन नहीं माना तो मुकेश का नंबर डायल किया - "नॉट रीचेबल... पहुँच से बाहर... सच है मुकेश अब पहुँच से बाहर ही हो गया है। उसने बिना आगा-पीछा सोचे मुकेश के साथ इतना बड़ा कदम उठा लिया, अपने भोले-भाले स्वभाव के कारण उस पर भरोसा किया। रिश्तों का मतलब ढूँढ़ने निकली थी पर जहाँ मतलब होता है वहाँ रिश्ते नहीं होते। वह जिंदगी के मेले में ठगी गई... उसका गुनाह था प्यार करना और अगर वो गुनाह था तो वह उस गुनाह को बार-बार करना चाहेगी। फिर क्यों पीड़ा दे रहे हैं वे दिन? क्या खुद पर से भरोसा उठ गया है... भरोसा तो मुकेश ने तोड़ा है... और जिंदगी भरके लिए एक पथराया मौन दिल की तहों में ज्वाला की तरह सुलग रहा है। जो हुआ उसके लिए रोए या क्यों हुआ इस सवाल से जूझे... वह मुकेश को क्यों दोष दे? उसने भी तो यही सब चाहा था। चाहा था मुकेश के शरीर के तेज में खुद को सूरजमुखी की तरह खिला देना... चाहा था उसकी आँखों की झील में डूब जाना... नशीले स्वाद में... बनैले आगोश में... पर अधबीच में सफर से किनारा कर लेना... कैसे सहे दीपशिखा? उसकी आस्था, विश्वास मुकेश की क्षणवादिता के आगे चूर-चूर हो गया है... अब याद आ रहा है उस रात के मंजर का असली रूप... जब मुकेश ने उसे बाँहों में भरकर करीब लिया था और वह कसमसाई थी... मुकेश... ये सब बिना किसी बंधन के?"

"लेट्स एन्जॉय दीप... ये खूबसूरत लम्हे क्या दोबारा आएँगे? इस पल में जियो... देह को मर्यादा से मुक्त करो, देखो जिंदगी कितनी खूबसूरत है।"

वह उलझी लता सी थरथराई थी - "मुझे अपना बना लो मुकेश, वादा करो... कहो तुम मेरे हो।"

"मैं तुम्हारा हूँ... यह वक्त कह रहा है, तभी तो हम साथ हैं, तभी तो मिलन के ये लम्हे नसीब हुए हैं। कुछ मत सोचो दीप... अपनी नसों में आग सुलगा लो और खुद को मुझमें बह जाने दो... ये लम्हा ही सच है जैसे भीतर ली साँस सच है... जैसे दिल की ये धड़कनें सच हैं।" बौनी पड़ गई थी दीपशिखा मुकेश के तर्कों के आगे... उसका सनातन सच, शाश्वत आस्थाएँ और अनवरत भावनाएँ लघु हो गई थीं।

लगातार छै महीनों तक दोनों के बीच बस देह रही। वह शीशम के दरख्त सा मजबूत यौवन और जीवन की अनंत संभावनाओं से लबरेज... हर पल चिटख जाने को आतुर... हर पल मधुदंश देने को बेकरार और वह बूँद-बूँद खुद को लुटाती, रिसती... उसके जीवन का गुलाब तो काँटा ही काँटा रह गया।

लेह पहुँचकर वह अवाक थी। पहाड़ों के इतने रंग। इतनी खूबसूरती!! ईश्वर भी काबिले तारीफ चित्रकार है। एयरपोर्ट से बाहर उसके नाम की तख्ती लिए जीप खड़ी थी। ड्राइवर ने सलाम किया और उसके हाथ से अटैची ले ली। होटल तक का रास्ता बर्फीली हवाओं के कारण खासा लंबा लग रहा था।

"ड्राइवर जी... आपका नाम बताएँगे?"

"जी... नीमा।"

शक्ल सूरत से लद्दाखी लगता था नीमा। लद्दाखी ही तो है। छोटी-छोटी आँखें, चपटी नाक। दीपशिखा के हर एक सवाल का जवाब वह मुस्कुरा कर देता तो चेहरे पर आँखें काली पतली लकीर सी दिखतीं। होटल आ चुका था। कमरे में सामान होटल के कर्मचारी ने पहुँचा दिया और इंटरकॉम पर आधे घंटे बाद डिनर के लिए बुलावा भी आ गया।

"शुबै कितना बजे आऊँ?" नीमा ने अदब से पूछा।

"ब्रेकफास्ट के बाद चलेंगे साढ़े दस तक।"

"ओ.खे." फिर सलाम।

उसके जाते ही वह पलंग पर गिर पड़ी। ओ गॉड, इतनी ठंड! चलो दीपशिखा जी पहले फ्रेश हो लेते हैं। छोड़ो यार, फ्रेश तो हैं ही... चेंज कर लेते हैं और माँ को पहुँचने की खबरकर देते हैं। खुद से बात करते हुए उसने चेंज के लिए अटैची खोली ही थी कि पीली पोशाक पर पहली नजर... मुकेश को ये रंग कितना पसंद था। महाबलेश्वर के एकाकी कमरे में उसने खुद ये पोशाक उसे पहनाई थी और उसके बालों को सँवार कर तस्वीरें खींची थीं - "दीप... पीला रंग जैसे उगता सूरज... पीला रंग जैसे पीली उजास में बुना गया स्वप्न जाल और इस रंग में तुम मेरे दिल की मलिका... ईश्वर ने तुम्हें अपने हाथों से गढ़ा है।"

वह लम्हा आज तक रुका है दीपशिखा के सामने। फिर जाने क्या हुआ... पीली पोशाक उसने अटैची में सबसे नीचे डाल दी...

"फोन बजा।"

"पहुँच गई दीपू?"

ओह, चूक हो गई उससे। आते ही साथ पहले माँ को फोन करना था।

"माँ, इतना खूबसूरत है लेह। अभी तो एयरपोर्ट से होटल तक के रास्ते से ही गुजरी हूँ। और माँ, बहुत कड़ाके की ठंड है... पता है, मैंने तो कनटोपा भी पहना है। पहाड़ी भालू लग रही हूँ मैं।"

"सुलोचना हँसती रहीं। दीपशिखा सराबोर होती रही।

डिनर के बाद गर्म पानी की थैलियाँ बिस्तर में रखकर और गुडनाइट कहकर कर्मचारी चला गया। वह लिहाफ ओढ़कर सुकून भरी गरमाहट में नींद का इंतजार करने लगी।

नीमा काफी अच्छी हिंदी बोल रहा था। बताने लगा - मैमशाब, आपको पता है लद्दाख जम्मू कश्मीर का ही एक हिस्सा है। उधर तो बहुत आतंकवादी हैं... पर लद्दाख में हम सुरक्षित हैं क्योंकि हमें फौज से बहुत हेल्प मिलती है। फौज हमसे खुश है क्योंकि जब भी सरहद पार से खतरा आता है हम सब लद्दाखी फौज की मदद के लिए आगे आ जाते हैं।" दीपशिखा को नीमा की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह तो प्राकृतिक दृश्यों में खोई हुई थी। खूबानियों से लदे पेड़ और खेतों में लहलहाती गेहूँ की फसल देख न जाने कितने चित्र वह मन के कैनवास पर उकेरने लगी। तीखी तेज धूप में पहाड़ शीशे से चमक रहे थे। रास्ते के दोनों ओर सुनहले पत्तों से भरे यूलक के पेड़ बेहद खूबसूरत लग रहे थे।

लेह के सबसे बड़े बौद्ध मठ हेमिस में दीपशिखा की मुलाकात बौद्ध लामाओं से हुई। बच्चों से लेकर बड़ों तक जितने भी लामा थे सबके सिर घुटे हुए... शरीर पर एक भी गरम कपड़ा नहीं... गले से पैर तक कत्थई परिधान में उनके गोरे चमकते चेहरे दीपशिखा देर तक देखती रही। लामा बाल्यावस्था में ही बौद्ध धर्म में दीक्षित हो जाते हैं, शादी ब्याह का तो सोचते तक नहीं, घर-घर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचार करने और गरीबों की मदद करने का ये संकल्प लेते हैं।

उसने सीढ़ियों पर बैठकर मठ का और लामाओं का स्कैच बनाया।

नीमा ने सूर्यास्त तक दीपशिखा को ठिक्से मठ, शांति स्तूप आदि दर्शनीय स्थल घुमा दिए। जिन जिन रास्तों से जीप गुजरी सड़क के संग संग सिंधु नदी उसकी हमसफर बनी रही... स्वच्छ पारदर्शी पानी में से तलहटी के गोल-गोल सफेद पत्थर दीपशिखा के मन में नए-नए चित्र रचते गए। कविता इस बार सूझ नहीं रही थी। दो चार लाइनें दिमाग में आती भी तो उनमें मुकेश होता... तो क्या उसकी काव्य प्रतिभा मुकेश के समान ही पहुँच के बाहर हो गई? मुकेश फिर मन में फाँस सा रड़कने लगा। वह होली फिश पांड के किनारे खड़ी सुनहले धाननुमा पौधों के बीच काली सफेद बत्तखों को निहार रही थी। क्वैं-क्वैं की आवाज करती वे उसके नजदीक आ गई थीं। मुकेश ने उसका वहाँ खड़ा रहना दूभर कर दिया... वह तेजी से आकर जीप में बैठ गई - "होटल चलो नीमा।"

नीमा ने मैमशाब का मुरझाया चेहरा देखा और उन्हें खुश करने के लिहाज से डंडीदार सुगंधित सफेद फूल उसकी ओर बढ़ाया - "आपके लिए।"

दीपशिखा ने पलभर नीमा की ओर देखा... फिर फूल लेकर गाल से सटाया और आँखें मूँद लीं।

जीप शाम के सुरमई रास्तों पर चल पड़ी। रात भर बर्फीली हवाएँ चलती रहीं। कमरा हीटर और बिस्तर की गर्म पानी की थैलियों से एकदम नॉर्मल टेंपरेचर पे था फिर भी टूटे दिल की चिनगारियाँ दीपशिखा को होठों के ऊपर और माथे पर पसीने की बूँदों से बेचैन किए थीं। मुकेश की स्मृतियों के हमले से वह लड़खड़ा उठी थी... दर्द की लहर उसकी पसलियों को चीरते हुए माथे के पठार पर रुकी फिर पाँवों के समंदर में छलाँग लगाकर तैरने लगी।

"यह दर्द तुमने खुद चुना है दीपशिखा... अब शिकायत करोगी भी तो किससे?"

शायद रात के तीन बजे नींद आई हो, सुबह जब नींद खुली तो आठ बज चुके थे। धूप खिड़की के बाहर चमक रही थी। उसने खिड़की तक पहुँच कर परदा खींचने को ज्यों ही हाथ बढ़ाया नजरें होटल के लॉन पर जमे बर्फ के ढेर पर गईं। तुरंत खिड़की से इधर-उधर झाँका... बर्फ ही बर्फ... तो रात को बर्फबारी हुई है। उसने इंटरकॉम पर चाय का ऑर्डर दिया और फ्रेश होकर सोफे पर बैठ गई। चाय लाने वाले लड़के से पूछा - "क्या बहुत बर्फ गिरी है?"

"नहीं मैम, थोड़ी सी ही है। अभी पिघल जाएगी।"

"फिर तो रास्ते में कीचड़ मिलेगी।"

"नहीं मैम... धूप तीखी तेज होती है न, घंटे दो घंटे में रास्ता सुखा देगी।"

अरे कमाल है, ठंड इतनी और धूप ऐसी?"

"हाँ मैम, साल के तीन सौ दिन धूप ऐसी ही तीखी तेज होती है और रात को बर्फीली हवाएँ चलती हैं।"

"अनोखा प्रदेश है लद्दाख।"

लड़का मुस्कुराता हुआ चला गया।

जीप में कैनवास और चित्रकारी का सामान लादा गया। पानी की बोतलें... कॉफी से भरा थर्मस और बिस्किट। आज चित्रकारी का पूरा मूड था दीपशिखा का। आज नीमा उसे सिंधु दर्शन के लिए ले जा रहा है। दीपशिखा ने काला लांग स्कर्ट, मरून टॉप और मरून स्वेटर पहना है। ऊँची एड़ी की सैंडिल पहनने का मन था लेकिन घूमने में कठिनाई होगी इसलिए जूते ही पहने। वह सिंधु नदी देखने के लिए उतावली हो रही थी। पहले सिंधु दर्शन के लिए पाकिस्तान जाना पड़ता था। सिंधु नदी हिमालय से निकलकर लद्दाख से बहती हुई पाकिस्तान जाती है और वहाँ से फिर भारत लौटती है। जब लोगों को यह भूगोल समझ में आया तो लेह में सिंधु दर्शन की परंपरा चल पड़ी। अब तो बड़े जोर शोर से सिंधु महोत्सव होता है।

"अरे... यहाँ तो बड़ी भीड़ है, क्या आज ही सिंधु महोत्सव है?"

"नहीं... मैमशाब... फिल्म का शूटिंग चल रहा है। आज सिंधु दर्शन नहीं हो सकता... नो एंट्री है।"

दीपशिखा ने देखा खूब लंबे चौड़े पक्के चबूतरे पर कैमरे ही कैमरे... दौड़ते-भागते लोग... एक आदमी फिल्म डायरेक्टर के सिर पर धूप से बचने के लिए छतरी ताने खड़ा था... वह जीप से बाहर निकली... शूटिंग देखने के बहाने चबूतरे पर सीमेंट से बनी गेरू रंग की छतरी के नीचे जाकर खड़ी हो गई। हीरोइन ने सिंधु जल अंजलि में भरकर होठों से लगाया और पास खड़े दस ग्यारह बरस के लड़के से कहा - "आओ बेटा... आचमन कर लो।"

कैमरे चमके और शॉट ओ.के. ...पैक अपकी घोषणा, फिल्म डायरेक्टर गदबदे बदन का चालीस पैंतालीस बरस का होगा। वह सिंधु नदी का जल स्पर्श करने के लिए सीढ़ियाँ उतर ही रही थी कि कानों में सुनाई दिया - "दीपशिखाऽऽऽ"

वह पलटी... सामने फिल्म डायरेक्टर - "आप चित्रकार दीपशिखा ही हैं न?"

"जी... आप मुझे कैसे जा..."

"हम तो आपके मुरीद हो गए हैं। भोपाल में लगी एग्जीबिशन से आपके सारे चित्र खरीदे हमने। वाह, आपके हाथों में जादू है।"

"आप नीलकांत ठक्कर!!" वह अवाक थी। शूटिंग देखने आई भीड़ अब नीलकांत के साथ-साथ दीपशिखा के भी ऑटोग्राफ लेने लगी।

"आप कहाँ रुकी हैं?"

होटल का नाम बताने पर अब चौंकने की बारी नीलकांत की थी - "हम भी तो उसी होटल में अपनी टीम सहित रुके हैं। क्या इत्तिफाक है।" दोनों मुस्कुराए।

"अगर कोई और प्रोग्राम न हो तो हम साथ में डिनर लें?"

दीपशिखा के पास इनकार करने की कोई वजह नहीं थी। उसका कद्रदान कोई मामूली इनसान तो न था। इतना बड़ा फिल्म डायरेक्टर... हिट फिल्मों का नामवर आदमी...

"आई डोंट माइंड।"

नीलकांत के ड्राइवर ने कार का दरवाजा खोला। इस बीच नीमा को दीपशिखा ने वापिस लौट जाने को कह दिया। कार में वह नीलकांत के बाजू में बैठी। तेज परफ्यूम की खुशबू कार में समाई थी। नीलकांत की उँगलियों में हीरा, नीलम, पन्ना चमक रहा था। सूरज ढल चुका था। सुरमई अँधेरा पहाड़ों को क्षितिज के कैनवास पर चित्रित कर रखा था। नीलकांत ने सनग्लासेज उतार दिए। उसकी आँखें नीली थीं जो उसके गोरे चेहरे पर खूब फब रही थीं।

"मैं आपको थीम दूँगा, क्या आप उस पर पेंटिंग बनाएँगी।" नीलकांत ने खामोशी तोड़ी।

"फिलहाल तो मैं फ्रांस में अपने चित्रों की एग्जीबिशन प्लान कर रही हूँ।"

"ओ ग्रेट... और कहाँ-कहाँ लग चुकी है आपके चित्रों की प्रदर्शनी?"

रेस्तराँ आने तक दीपशिखा ने नीलकांत के सारे सवालों के जवाब दे दिए। रेस्तराँ के केबिन में दोनों बैठे तो ऐसा एकांत दीपशिखा को असहज कर गया। वह संकोच से भर उठी। न जाने क्या सूझी कि एक अजनबी के साथ यूँ डिनर पर चली आई। वो भी फिल्मी आदमी। इन पर भरोसा भी तो नहीं किया जा सकता? तो क्या मुकेश भरोसेमंद साबित हुआ? नहीं... नहीं, सारे मर्द एक जैसे नहीं होते।

"क्या लेंगी... ठंड बहुत ज्यादा है थोड़ी ब्रांडी और स्टार्टर में चिकन लॉलीपॉप।"

ब्रांडी की एक छोटी बॉटल तो सुलोचना ने भी उसके बैग में रखी थी कि ठंड ज्यादा हो तो थोड़ी सी पी लेना, गर्मी रहेगी।

"क्या सोच रही हैं? कम ऑन... यहाँ का वैदर रात को बर्फीला हो जाता है। खुद की सुरक्षा के लिए ब्रांडी दवा जैसी है।"

तब तक बैरा ऑर्डर की गई सामग्री रख गया था। नीलकांत के आत्मीय व्यवहार से दीपशिखा खुलती गई। इस बेहतरीन वक्त के लिए वह किसे शुक्रिया कहे? ईश्वर को या नीलकांत को?

होटल लौटते हुए उसे बदन में गरमाहट महसूस हो रही थी। ब्रांडी वाकई अच्छी थी। नीलकांत उसे कमरे तक छोड़ने आया... "कल पैंगोग लेक के किनारे कुछ शॉट्स लेने हैं... "आप चलेंगी तो मुझे खुशी होगी।"

"सुबह बताऊँगी।"

"मैं इंतजार करूँगा, गुडनाइट।"

नीलकांत के विदा होते ही उसने दरवाजे को अच्छी तरह बंद किया और चेंज करके गर्म बिस्तर में घुस गई। सोचा था तुरंत सो जाएगी पर मुकेश उसे हांट करता रहा। सोचते-सोचते आधी रात हो गई तब कहीं जाकर नींद आई।

लॉन के फूलों भरे पौधे धूप में नहा रहे थे। इंटरकॉम पर नीलकांत था - "गुडमॉर्निंग... चल रही हैं?"

"ओ.के. ...कितनी देर में निकलेंगे। अभी तो मैं सोकर उठी हूँ।"

"एक घंटे बाद?" नीलकांत की आवाज की मिश्री कानों से होठों तक लरज गई।

"ओ.के." रिसीवर रखते ही कदमों में फुर्ती आ गई। ब्रश करते करते उसने चाय का ऑर्डर दिया। आज वह पीली ड्रेस पहनेगी। देखती है इन हसीन वादियों में वह पीले रंग के साथ कितना कंप्रोमाइज कर पाती है। आज का पूरा दिन नीलकांत के साथ गुजरेगा। क्या वे लम्हे उसे कचोटेंगे जो पीले रंग के साथ अनायास जुड़े हैं? क्या धोखे की यादों से ठसाठस भरे दिल को पैंगोंग झील के किनारे उलीच पाएगी? शायद हाँ... हाँ, वह कोशिश करेगी।

इत्तिफाक। नीलकांत ने भी नीली जींस पर पीली टी शर्ट पहनी थी। उसे देखते ही मुस्कुराया - "व्हाट ए कोइंसिडेंट।"

अब उसे पीले रंग के साथ संघर्ष करना है। यानि कि जो सामने मौजूद है... सहज है... उसके लिए संघर्ष। आज वह कैनवास भी नहीं लाई। स्केच बुक और पेंसिल लाई है... आज उसे खुद को सीप में पिरोना है तभी तो मुक्ता रूप पकेगा।

मनाली चायना बॉर्डर रोड पर नीलकांत की टीम का काफिला चल पड़ा।

"नामग्याल जी... थोड़ा बताते चलिए, हमारे लिए तो यह जगह अननोन है।"

आशुतोष ने ड्राइवर से कहा तो वह अपने पीले दाँतों को निपोर कर मुस्कुराया - "जी शाब।"

"आपको पता है दीपशिखा जी, आज हम समुद्र सतह से 17586 फीट की ऊँचाई तय करने वाले हैं। वहाँ से 13900 फीट पर है पैंगोग झील।"

"जी... और वह 134 कि.मी. एरिया में फैली है। 100 कि.मी. चायना में और 34 कि.मी. भारत में।"

"अरेवाह! यानी कि आप सही मायने में टूरिस्ट हैं।" वह मुस्कुराई... नीलकांत भी।

"शाबजी, आज ड्राई डे है।" नामग्याल ने जानकारी दी।

"यानी कि आज लेह वासी शराब नहीं पिएँगे? मगर क्यों?"

"नहीं शाब जी... वो वाला ड्राई डे नहीं। आज के दिन यानी हर सोमवार कोबी आर ओ के आदमी पत्थरों को डायनामाइट लगाकर तोड़ते हैं इसलिए गाड़ियों की आवाजाही रोक दी जाती हैं।"

"यार तुम हिंदी अच्छी बोल लेते हो।"

नामग्याल गद्गद हो गया।

चाँगथाँग वैली में झील के ऊपर कुछ काली पूँछ वाले परिंदे उड़ रहे थे। काली गर्दन वाले सारस भी थे। लद्दाख में इन्हें समृद्धि का प्रतीक माना जाता है और इसीलिए बौद्ध मठों की दीवारों पर इन्हें उकेरा जाता है। दीपशिखा ने चलती कार में ही इस दृश्य का स्केच बना लिया। नीलकांत उसे मुग्ध आँखों से निहारता रहा। चढ़ाई पर हवा का दबाव काफी कम था। बर्फीली विरल हवा में साँस भरना मुश्किल हो गया। सुलोचना ने कपूर उसके पर्स में रखते हुए कहा था - "चढ़ाई पर इसकी जरूरत पड़ेगी। सूँघती रहना। यह एक अच्छा ऑक्सीजन वाहक है।"

उसने पर्स में से कपूर की एक टिकिया नीलकांत को दी, दूसरी खुद सूँघने लगी। साँसें नॉर्मल हो गईं।

"कपूर मेरे पास भी है। हमें तो रात दिन की भागदौड़ यह सब सिखा देती है पर आप?"

"कुछ खबरें तो हम भी रखते हैं।" दीपशिखा अब नीलकांत के संग सहज हो रही थी।

लंबे रोमांचक सफर के बाद पैंगोग झील सामने थी। मोरपंखी रंगों वाली झील... दीपशिखा ने कार से उतरते ही दूरबीन आँखों से सटा ली। नीला, हरा, बैंगनी, पीला, गाढ़ा नीला... इतने रंगों का पानी... आश्चर्य? पीछे पर्वतों का सौंदर्य अद्भुत था। दो-तीन रंग के पर्वत झील को अपनी गोद में समेटे थे। दूर चुशूल था... वह लैंड जिसके इस पार भारत और उस पार चीन है। सर्दियों में झील जम जाती है। पाँच फीट तक की गहराई में पानी ठोस बर्फ बन जाता है। तब उस पर फौजी गाड़ियाँ चलती हैं जो सीमा पर सैनिक शिविर में सामान पहुँचाती हैं। इतने ठंडे, सुनसान इलाके में सैनिक देश की रक्षा के लिए डटे रहते हैं।"

फिल्म के शॉट्स रेडी थे। धूप में चौकोर बोर्ड सरीखे कैमरे चौंधियाई रोशनी में पलकें बंद कर लेने को मजबूर कर रहे थे। हीरो हीरोइन पर एक गाना फिल्माया गया। गाने के तीन अंतरे में से एक ही अंतरा शूट हो पाया कि लंच टाइम हो गया। सबके लिए पैक्ड लंच था। वह नीलकांत और हीरो हीरोइन के साथ बैठकर लंच लेने लगी। सैनिकों ने उनके लिए टैंट की व्यवस्था कर दी थी और पूरी टीम के लिए फौज की तरफ से कॉफी बन रही थी।

"बोर तो नहीं हो रही हैं दीपशिखा जी?" नीलकांत के सवाल पर दीपशिखा ने चौंकते हुए कहा - "क्याऽऽ इतने खूबसूरत इलाके में कोई बोर हो सकता है भला।"

"नहीं, मैं शूटिंग में बिजी हूँ और आप अकेली, इसलिए पूछा।"

"चित्रकार को अकेलापन वरदान लगता है। काश मैं कैनवास ले आती तो बात ही और थी।"

"अरे, ले आतीं न।"

वह कॉफी की चुस्कियाँ भरती रही।

आधे घंटे बाद शूटिंग फिर शुरू हो गई। वह अपनी स्केच बुक को लेकर रंग बिरंगे पर्वतों और झील के सौंदर्य में डूब गई।

सूर्यास्त के पहले नीचे उतर जाना है। नामग्याल जल्दी मचा रहा था। बहरहाल पैकअप करते करते धूप ढलने लगी थी।

डिनर के लिए फिर नीलकांत का ऑफर... दीपशिखा क्यों इतनी मजबूर थी उसके सामने कि उसके हर प्रस्ताव पर रजामंदी की मोहर लगा देती। कहीं उसके चोट खाए दिल पर नीलकांत मलहम बनकर तो नहीं आ गया था?

हफ्ते भर के लिए आई थी दीपशिखा लेकिन नीलकांत के साथ दस दिन कहाँ चले गए पता ही नहीं चला। हर बार शूटिंग में दीपशिखा नीलकांत के संग होती, जब लौटती तो स्केच बुक चित्रों से भरी होती। प्रकृति को उसने बहुत नजदीक से महसूस किया यहाँ। रंग-बिरंगे पर्वतों के ईश्वर द्वारा बनाए लैंडस्केप को उतनी ही खूबसूरती से उतारना... बर्फ की कठोरता के संग कोमलता भी महसूस करना... अद्भुत दरख्तों से बतियाना... बौद्ध मठों में लामाओं का कठोर जीवन... बौद्ध धर्मावलंबियों की बौद्ध धर्म में इतनी आस्था है कि वे दस वर्ष की उम्र में ही अपने पुत्र को मठ को सौंप देते हैं। उन्हें पता है कि उसका बचपन छिन रहा है और वह सांसारिक सुखों से वंचित किया जा रहा है। अब उसे सारा जीवन वरिष्ठ लामा की देखभाल में बिताना है और बौद्ध भिक्षु बनना है जिसमें कहीं भी उसकी मर्जी को स्थान नहीं है। बौद्ध धर्मावलंबी निर्वाण धम्मचक्र घुमाते हैं और यह मान लेते हैं कि उन्हें जीवन मरण के चक्र से मुक्ति मिल गई। अगर सभी ऐसा मान लें तो एक दिन तो यह संसार मनुष्य विहीन हो जाएगा। तब क्या होगा? घबरा गई दीपशिखा।

एयरपोर्ट पर नीलकांत की टीम का वह भी एक हिस्सा बनकर जब हवाई जहाज में बैठी तो अपने बाजू वाली सीट पर नीलकांत को ही पाया। नीलकांत अपना कार्ड उसे दे रहा था - "पहुँचकर शायद वक्त न मिले। हमें कार्गोबेल्ट में सामान के लिए काफी देर रुकना पड़ता है। बांबे पहुँचकर संपर्क में जरूर रहना। मेरे लिए ये दस दिन बहुत कीमती थे।"

"जी..."

"ऑफकोर्स... फिल्म की शूटिंग पूरी हो जाना एक वजह थी और एक वजह आप। इस चंद्र प्रदेश में मैं ऐसे चाँद की उम्मीद से तो नहीं आया था न।"

कहते हुए उसने लाड़ से देखा उसे। वह भीतर ही भीतर पिघलने लगी।

पीपलवाली कोठी के अपने कमरे में जब वह तरोताजा होकर सुलोचना के हाथ के बने गर्मा-गर्म भजिए खा रही थी तो सुलोचना ने उसके चहरे को गौर से देखा, अब वहाँ पहले वाली उदासी-अवसाद न था बल्कि एक चमक थी जो अक्सर पतझड़ के बाद बहार आने पर पेड़ों के पत्तों में होती है। नई कोंपलों पर जब धूप की किरनें पड़ती हैं तो पूरा जंगल चमक उठता है। सुलोचना जाने को मुड़ीं... कहीं उनकी ही नजर न लग जाए उनकी बिटिया पर -

"बैठो न माँ... इतने दिनों बाद लौटी हूँ मैं। वहाँ की बातें तो रात को सोते समय बताऊँगी। अभी चित्र तो देख लो। फ्रांस में एग्जीबिशन की पूरी तैयारी कर ली है मैंने।"

सुलोचना दीपशिखा के पंखों का वजन तौलने लगीं। सोचने लगीं जब ये पेट में थी तो वे किन खयालों में डूबी रहती थीं... चित्रकार के तो नहीं ही।

नीलकांत मुंबई पहुँच चुका था क्योंकि सुबह-सुबह उसी का फोन था - "कैसी हैं दीपशिखा जी?"

"जी, आप कैसे हैं?"

"एकदम रिलैक्स मूड में। अगले महीने शूटिंग के लिए पेरिस जाना है। वहीं के लिए ऊर्जा जुटा रहा हूँ।"

"क्याऽऽ पेरिस!! आप पेरिस जा रहे हैं?"

"हाँऽऽ... उसमें इतना आश्चर्य क्यों? फिल्म के अंतिम शॉट्स वहीं के तो लेने हैं।"

"ओह... अगले महीने शायद मैं भी पेरिस..."

"क्याऽऽ फिर वही इत्तिफाक... भई वाह, कमाल हो गया।"

"जी हाँ नीलकांत जी। हमारा ग्रुप तो कब से पेरिस में एग्जीबिशन प्लान किए हुए है। मैं कल ही मुंबई लौट कर इसे अंतिम रूप दूँगी और वीजा के लिए अप्लाई करूँगी।"

"इस जद्दोजहद में मत पड़िए। आपकी पूरी टीम को वीजा दिलाने का जिम्मा मेरा। आप मुंबई आइए फिर मिलते हैं।"

एक सनसनी सी फैल गई दीपशिखा के तनबदन में। उसका ख्वाब इतनी जल्दी साकार होगा सोचा न था उसने। वह खुशी में भरकर सुलोचना से लिपट गई - "माँ, फ्रांस में एग्जीबिशन का पक्का हो गया। मुझे कल ही मुंबई लौटना होगा।"

सुलोचना के चेहरे पर बनावटी गुस्सा था - "यह क्या दीपू, अभी आईं, अभी चल दीं।"

"माँ, इस वक्त मत रोको मुझे... अगर मौका हाथ से गया तो क्या पता दोबारा चांस न मिले। माँ प्लीज।"

जो सपना उसकी आँखों में पल रहा था उसके रेशमी सिरों ने पूरा आसमान थाम रखा था। मानो आसमान नहीं कैनवास हो। फ्रांस के चित्रकारों की नकल की एक प्रदर्शनी उसने मुंबई में फ्रेंच दूतावास में देखी थी। उन्हें देखकर मूल चित्रों को देखने की मन में जो लालसा जागी तभी से उसका पूरा ग्रुप फ्रांस जाने और अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाने की धुन में लगा है। 'अंकुर ग्रुप ऑफ आर्ट' बड़ी सक्रियता से काम कर रहा है।

मुंबई इस बार वह अकेली ही आई। सुलोचना और यूसुफ खान ने मान लिया था कि दीपशिखा अपने तरीके से अपनी जिंदगी जीना चाहती है और अगर ज्यादा दखलंदाजी की तो हो सकता है वे बेटी से ही हाथ धो बैठें।

आते ही उसने सारे मित्रों को फोन लगाए, नीलकांत को भी - "आ गई हूँ।"

"वेलकम दीपशिखा, इस वक्त मीटिंग में हूँ। शाम को बात करेंगे।"

शाम को सारे मित्र घर आ गए। दाई माँ और महेश काका जुटे थे रसोईघर में, पावभाजी और गुलाब जामुन की खास फरमाइश थी।

"बड़ी खुशबू आ रही है। क्या कुछ खास बनाया जा रहा है?" शेफाली ने दीपशिखा को बाँहों में भर लिया।

"क्यों नहीं... मेरे दोस्त भी तो खास हैं।"

मुकेश को छोड़कर कहना चाहा शेफाली ने पर वह दीपशिखा के चेहरे की खुशी को उदासी में नहीं बदलना चाहती थी। हो जाता है ऐसा जिंदगी में... जिंदगी के सफर में कई बार अजनबी मिल जाते हैं और सफर अधूरा छोड़कर बिछुड़ जाते हैं। जरूरी तो नहीं कि अंत तक साथ दिया जाए। जितना साथ दिया, उतना कीमती लम्हों के कोष में समा जाता है। जब कभी फुर्सत होगी कोष खोला जाएगा।

शेफाली रसोई घर में गई और गरम-गरम गुलाब जामुन मुँह में भर लिया। दाई माँ हँसने लगीं। वह हँसी तो चाशनी होठों के इर्द गिर्द बह आई।

सभी आ चुके थे, भूखे प्यासे... सबसे पहले खाने पर टूट पड़े फिर इत्मीनान से पेरिस में लगाई जाने वाली प्रदर्शनी पर एकाग्र हुए।

"मेरी थीम तो लगभग पूरी हो चुकी है। महीने भर बाद हमें कूच करना है।" दीपशिखा उत्साह से भरी पूरी थी।

"कला के मैदान के लिए।" सना खिलखिलाई।

"बिना हार जीत की परवाह किए।" एंथनी भी मूड में आ गया। देर रात तक सबने प्रदर्शनी की फाइल फाइनल कर ली। तय हुआ कि कल स्टूडियो में सब अपने-अपने पासपोर्ट और रुपये दीपशिखा के पास जमा कर देंगे। सब चले गए शेफाली को छोड़कर।

"सच बता दीपशिखा, कोई मिल गया क्या? तेरा चेहरा एक किताब है, जिसे मैं पढ़ सकती हूँ।"

जाने क्यों दीपशिखा का मन लड़खड़ा गया। उसका ध्यान शेफाली के इस सवाल पर नीलकांत की ओर क्यों गया?

"नहीं जानती शेफाली पर तेरे सवाल के साथ ही नीलकांत क्यों याद आया समझ नहीं पा रही हूँ।" और उसने लद्दाख में नीलकांत के साथ बिताए दिनों को शेफाली के सामने ब्यौरेवार रख दिया। उसे लगा जैसे वह पंख सी हलकी हो आसमान में तैर रही है। एक बिजली सी जरूर कौंधी मुकेश की यादों की पर बिजली की तरह ही उसके धोखे के काले बादलों में समा भी गई।

"मैं मिलना चाहूँगी नीलकांत से... बस देखा भर है भोपाल के एग्जीबिशन में जब वे तेरे सारे चित्रों को खरीद रहा था। मुझे वह कला का पारखी लगा था।"

लेकिन शेफाली इसलिए भी मिलना चाहती थी कि कहीं उसकी भोली भाली सखी दोबारा न छली जाए।

"मिला दूँगी... कलाकार तो है ही वह... फिल्मों का निर्देशक जो ठहरा।"

शेफाली दीपशिखा के गले लग दरवाजे की ओर बढ़ी - चलती हूँ, अपना ध्यान रखना।"

शेफाली के जाते ही नीलकांत का फोन... मानो प्रतीक्षा ही कर रहा था कि कब दीपशिखा अकेली हो।

"क्या कर रही हो?"

"कुछ नहीं... अभी-अभी दोस्त विदा हुए हैं। प्रदर्शनी प्लान कर ली है। कल सब अपना पासपोर्ट ले आएँगे। मैं परसों आपको वीजा के लिए दे दूँगी।"

"लेकिन उससे पहले मिलोगी नहीं?"

"कब?"

"कल शाम हम गेटवे ऑफ इंडिया चलेंगे। थोड़ी देर बोटिंग फिर ताज में डिनर।"

वह सकुचा गई। दिल के हर कोने में द्वंद्व मचने लगा। वह दिल की सुने या दिमाग से काम ले।

"चुप क्यों हो दीपशिखा... इतना सोचती क्यों हो? जिंदगी जीने के लिए है और अच्छे, सच्चे दोस्त मुश्किल से मिलते हैं।"

उसके टूटे दिल पर इन शब्दों ने मलहम का काम किया।

"मैं आऊँगी नीलकांत।"

उसने हिम्मत बटोरकर उसका नाम लिया। नीलकांत की आवाज भी लरज गई - "थैंक्यू... डियर, मिलते हैं फिर।"

स्टूडियो में नशा तारी था। यह नशा दीपशिखा सहित सभी चित्रकारों ने विगत दो वर्षों के साथ से अर्जित किया था। मुकेश की कमी अब खलती नहीं थी। वैसे भी कलाकार भावुक होते हैं। सोच लिया कि रही होगी कोई मजबूरी मुकेश की वरना कौन अपने उभरते करियर को ठोकर मारता है। दोपहर को एंथनी ने बीयर मँगाई थी - "आज हम एक-एक जाम मुकेश को अलविदा कहने का लेंगे और फिर काम में तल्लीनता से जुट जाएँगे।" "हाँ, मेरी स्केच बुक और दिमाग में फीड लद्दाख की प्रकृति... बस मुझे उसके साथ खुद को जोड़ देना है। वहाँ के रंग बिरंगे पर्वत, सुनहले पत्तों वाले पेड़, मोरपंखी झील, काली पूँछ वाले सारस सब उड़ते, फिसलते, लुढ़कते... नदी, झील, पहाड़, मैदान, समंदर लाँघते मेरे चित्रों में आ बसें... मेरे कैनवास पर फैलकर अपनी मंजिल पा लें... यूँ लगे जैसे वे अपनी लंबी यात्रा की थकान उतार रहे हों, सुस्ता रहे हों..."

"ए दीपशिखा मोहतरमा... अब चित्र बनाते-बनाते कविता न करने लगना वरना सारे सपने यहीं के यहीं धरे रह जाएँगे।"

"सना बेगम... क्या तुम्हें नहीं पता कि दीपशिखा के चित्र उसके नीचे लिखी कविता की दो पंक्तियों से ही जाने जाते हैं?"

"हाँ, उसी पर तो मर मिटा वोनीऽऽऽऽ"

"शेफालीऽऽऽ" दीपशिखा ने आँखें तरेरीं।

सब उत्सुकता से दीपशिखा को छेड़ने लगे... "कौन... कौन बता न... ये नी कौन है।"

दीपशिखा के चेहरे पर बनावटी रोष था - "इसी से पूछो... ईडियट..."

शेफाली ने अपने कान पकड़कर तौबा की... फिर सब हँसते खिलखिलाते बीयर की मदहोशी में डूब गए।

शाम लौटते परिंदों की चहचहाहट लिए हाजी अली के समंदर को सिंदूरी कर रही थी। कुछ परिंदे लहरों पर छोटी-छोटी कागज की नावों सरी खेडोल रहे थे। जैसी वह बचपन में बनाती थी। वह और शेफाली... और बरसते पानी के जमाव पर तैराती थीं।

"तू गंगा की मौज मैं जमुना की धारा..." दोनों भीग-भीग कर नाचतीं, कपड़े तरबतर और माली काका की प्यार भरी डाँट... "चलो बच्चियों... क्या बीमार पड़ना है।"

दीपशिखा मुस्कुराई।

"क्या हुआ?" शेफाली ने उसकी ओर गौर से देखा - "ये तेरा बेमतलब मुस्कुराना... कहीं..."

"फिर वही... मैं तो तेरे साथ बिताए बचपन के दिन याद कर रही थी। कितना कुछ बदल गया। तब हम कागज की नावें बनाते थे। पानी पर हमारे जहाज चलते थे, बचपन कितना मालामाल था।"

"और आज रंगों से खेल रहे हैं। खेल तब भी था, आज भी है। फर्क बस हमारी उम्र और नजरिए का है।" जाने कहाँ से हवा में तैरता भूखा पत्ता आया और दीपशिखा की सैंडिल में उलझ गया। वह उसे निकालने को झुकी ही थी कि कार के ब्रेक ने उसे चौंका दिया। सामने नीलकांत अपनी लंबी खूबसूरत गाड़ी में था। काले काँच की खिड़की से भी वह उसे देख पा रही थी। दरवाजा खुला। नीलकांत ने सिर बाहर निकाला।

"हाऽऽय... कम इन।"

"मेरी सखी से मिलिए... शेफाली... ग्रेट पेंटर।"

नीलकांत कार से बाहर आया। शेफाली ने नमस्कार करते हुए कहा - "नीलकांत जी?"

"ओ... आप मुझे जानती हैं?"

"आप भूल गए। हम भोपाल में आर्ट गैलरी में मिले थे जहाँ आपने दीपशिखा के सारे चित्र खरीदे थे।"

"ओ.के. ...याद आया। अच्छा लगा आपसे मिलकर और यह जानकर कि आप दीपशिखा की बेस्ट फ्रेंड हैं। चलिए एक-एक कप कॉफी।"

शेफाली का मन तो था पर वह दीपशिखा को नीलकांत के साथ का मौका देना चाहती थी। अपनी टूटे दिल की सखी को जीने का हौसला देना चाहती थी। चाहती थी उसे कोई ऐसा साथी मिल जाए जिससे वह अपने जज्बातों को, एहसासों को शेयर कर सके।

"थैंक्स... पर मैं घर जाऊँगी। इस वक्त मुझे पेरिस को फोकस करना है। मैंने कठिन थीम चुनी है।"

दीपशिखा समझ गई। बेहद लाड़ से उसने शेफाली की ओर देखा और कार में नीलकांत की बगल वाली सीट पर बैठ गई।

"अच्छी है तुम्हारी सखी... अल्हड़ सी, मासूम।"

"कहीं आप उसे लेकर फिल्म इल्म बनाने का तो नहीं सोच रहे हैं?"

"क्यों? बुरा क्या है? हम फिल्म वाले अब इतने भी बेकार नहीं होते।"

"नहीं, मेरा मतलब वो नहीं था। वह चित्रकार है न..."

"तुम भी तो चित्रकार हो... पर मेरे दिल की स्टोरी में हीरोइन के लिए मैंने तुम्हें साइन कर लिया है।"

दीपशिखा अव्वल तो समझी नहीं... जब समझी तो उसके गाल दहक उठे... वह नजरें घुमाकर सड़क की ओर देखने लगी। नीलकांत मुस्कुराता रहा, गुनगुनाता रहा। गेटवे ऑफ इंडिया में... समंदर अब काला दिख रहा था। लहरें ऊँची-ऊँची उठ रही थीं...रेलिंग पर भीड़ ही भीड़...

"देर कर दी हमने, बोटिंग का वक्त तो अब नहीं रहा। चलो ताज चलते हैं।"

मुगलई सजावट वाले केबिन में बैठते हुए नीलकांत एकदम फ्री अंदाज में उतर आया - "हाँ तो मोहतरमा, साइनिंग अमाउंट दूँ क्या?"

दीपशिखा भोली भाली, एकदम मासूम सी, मोहक अंदाज में मुस्कुराई - "हमें मंजूर नहीं। पहले हम फिल्म की कहानी सुनेंगे।"

"अच्छाऽऽ..." वेटर को कॉफी, नाश्ते का ऑर्डर देकर उसने सामने रखे गुलदान में से गुलाब की एक पँखुड़ी तोड़ कर उसकी ओर बढ़ाई... "तो शुरुआत करें? यह कहानी शुरू होती है लद्दाख की इठलाती, बलखाती नदी सिंधु के तट से... कैमरा जूम... फोकस... हीरोइन नदी के पानी में पाँव डुबोए छप-छप कर रही है। पानी की छप-छप में उसके पैरों में पहनी पाजेब की छुन-छुन भी शामिल है।"

"कट्" दीपशिखा ने कहा और हथेली में दबी पंखुड़ी गालों से सहलाई - "हीरो कहाँ है?"

"उसका अक्स तुम्हारी आँखों में है... मुझे साफ दिख रहा है।"

दीपशिखा की काली आँखों में नीलकांत का चेहरा था।

"चलिए... फिल्म पक्की... साइनिंग अमाउंट तो आप ऑर्डर कर ही चुके हैं। नाश्ता और कॉफी।"

"बऽऽस... इतना ही, हम तो सॉलिड अमाउंट देंगे।" कहते हुए नीलकांत ने उसकी हथेली चूम ली जिसमें अभी-अभी उसकी दी गुलाब की पँखुड़ी दबी थी और जिसकी खुशबू दोनों के दिलों में महक रही थी।

कॉफी पीते हुए दीपशिखा ने पूछा - "घर में अकेले हैं आप?"

"नहीं" नीलकांत गंभीर हो गया।

"बीवी थी... लेकिन हमारे बीच अंडरस्टैंडिंग निल... अब वह अलग रहती है। दो बेटियाँ हैं जिन्हें मैं शनिवार, इतवार को घर ले आता हूँ। कोर्ट ने बस इतनी ही परमीशन दी है। माँ हैं और छोटी बहन... वह फैशन डिजाइनर का कोर्स कर रही है।"

"उसे फिल्मों में नहीं आना है क्या?"

"नहीं... उसे फिल्मी दुनिया से एलर्जी है। बेटियाँ रिया और दिया एक्टिंग की दीवानी हैं। अभी तो पाँच और सात साल की हैं।"

दीपशिखा को नीलकांत की कुछ इसी तरह की जिंदगी का भास सा हो गया था इसलिए वह नॉर्मल बनी रही। ताज से निकलकर नीलकांत ने उसे घर तक छोड़ा, कल मिलने के वादे पर... "कल सबके पासपोर्ट चाहिए होंगे... वीजा के लिए अप्लाई कर देना है... टिकटें तो बुक करा ही लेते हैं... नहीं तो मुश्किल हो जाएगी।"

"हाँ ठीक है... कल उसी जगह पर पासपोर्ट सहित मैं मिलूँगी।"

"ओ.के. गुडनाइट... शब-ब-खैर डियर।"

वह मीठी-मीठी गुनगुनाहट लिए लिफ्ट में आ गई।

सप्ताह बीतते-बीतते जहाँ दीपशिखा के दिल की ओर नीलकांत ने तेजी से कदम बढ़ाए थे वहीं सबको वीजा भी मिल गया, टिकटें भी आ गईं अंकुर ग्रुप ऑफ आर्ट्स अपने लक्ष्य को पाने में कमर कस कर जुट गया। उनके लिए दीपशिखा मेन पॉवर थी। मुंबई, भोपाल और अब पेरिस में प्रदर्शनी उसी की वजह से हो पा रही थी हालाँकि सबका यह भी मानना था कि दीपशिखा को फूल की तरह इसलिए सहेज कर रखना है क्योंकि वह मुकेश को लेकर एक बड़े छल से गुजरी थी। वह कोमल हृदय की छुई-मुई सी दीपशिखा भीतर ही भीतर कोई रोग न पाल ले इस बात को लेकर सब सतर्क थे। शायद दीपशिखा भी, वह नीलकांत के हर उठे कदम पर ब्रेक लगा देती।

"क्यों? दीप... क्यों?"

"तुम मुझे दीप कहते हो नील तो मैं डर जाती हूँ... इस दीप के अक्षरों ने मुझे खुरच-खुरच कर मिटाया है। लगता है जैसे बहुत करीब होना खो देना है, और मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती।"

नीलकांत ने गौर से दीपशिखा को देखा था... उन आँखों की झील में उसे कुछ कमल खिले तो कुछ मुरझाए नजर आए थे। वह मुरझाए कमलों को खिला देगा, वह दीपशिखा का होकर रहेगा।

दो महीने तक की किसी भी तारीख पर पेरिस में आर्ट गैलरी उपलब्ध नहीं थी। लेकिन नीलकांत की शूटिंग पोस्टपोन नहीं हो सकती थी। करोड़ों दाँव पर लगे थे। तय हुआ बाकी चित्रकार सोलह जुलाई की फ्लाइट लेंगे और दीपशिखा नीलकांत के साथ ही फ्रांस जाएगी ताकि वहाँ का इंतजाम अपनी नजरों के सामने कर पाए।

प्रदर्शनी की तैयारी की वजह से वह पीपल वाली कोठी भी नहीं जा पाई। सुलोचना और यूसुफ खान को ही उसे सी ऑफ करने मुंबई आना पड़ा। जाने से दो दिन पहले वह शेफाली को लेकर नीलकांत के संग हीरा पन्ना में शॉपिंग करती रही। सुलोचना और यूसुफ खान भी एक बड़ा सूटकेस भर कर कपड़े ले आए।

"उधर जरूरत पड़ेगी। महीने भर रुकोगी न तुम?"

"वो तो ठीक है माँ पर शॉपिंग तो मैंने भी कर ली है।"

"तो क्या हुआ, सिलेक्ट कर लेते हैं।"

सुलोचना ने दाई माँ को आवाज दी - "दोनों सूटकेस के कपड़े पलंग पर निकाल कर रखो और इस बड़े वाले सूटकेस पर यह स्लिप चिपका दो।"

दीपशिखा के नाम वाली स्लिप सूटकेस पर चिपकाई गई। कपड़े सुलोचना ने ही सिलेक्ट किए। दीपशिखा देखती रही... 'बेशक, माँ की पसंद लाजवाब है, हर एक ड्रेस के साथ मैचिंग जूलरी, वो भी सिंपल मगर रिच लुक वाली...' गरम कपड़ों का अलग सूटकेस तैयार हुआ। बेटी पहली बार विदेश जा रही है, वो भी अकेले। रात दो बजे तक समझाती रहीं... हिदायतों की लिस्ट लंबी थी। दीपशिखा ऊँघती रही।

मध्यरात्रि तीन बजे की फ्लाइट थी।

"गाड़ी भेजूँ?" नीलकांत ने पूछा।

"नही, माँ, पापा पूरा फ्रेंड सर्किल सी ऑफ करने आ रहा है एयरपोर्ट।"

"ग्यारह, साढ़े ग्यारह तक हर हाल में पहुँच जाना। हमें कस्टम में ज्यादा समय लगेगा... लगेज तुम्हारा भी बहुत होगा।"

"हाँ... पेंटिंग का सारा सामान भी तो है।"

उसके दोस्तों के हाथों में पीले फूलों से भरी डँडियाँ थीं। ये पीला रंग उसका पीछा क्यों नहीं छोड़ता? क्यों जिंदगी के हर खूबसूरत मोड़ पर धमक आता है और वह बिखर जाती है। वह जो स्वयं को नकारते हुए बस वही नहीं रह जाती है जो वह है। वह अतीत को दफन कर देना चाहती है... अतीत सब कुछ भरा होने के बावजूद उसे खाली कर देता है अक्सर।

"क्या शेफाली... और किसी रंग के फूल नहीं थे फ्लोरिस्ट के पास?"

"इस रंग से लड़ना सीखो दीपशिखा, इसे भुलाने की कोशिश बेकार की कोशिश है। सामना करो इसका।"

दीपशिखा की आँखों में पानी तैर आया - "सामना ही तो कर रही हूँ शेफाली..."

सुलोचना और यूसुफ खान को लगा बेटी बिदाई के गम में भावुक हो रही है। सुलोचना ने उसे गले से लगा लिया - "गॉड ब्लेस यू... मेरी गुड़िया।"

ट्रॉली खींचती वह अकेली एयरपोर्ट के अंदर चली गई। अकेला, लंबा सफर जैसे दूर-दूर तक कहीं कोई नहीं, बस है तो वह... उसके कदमों के निशान पीछे छूटते गए... अदृश्य। नीलकांत ने उसे बाँहों में भरकर माथे पर चूम लिया - "अच्छी लग रही हो।"

पेरिस! दीपशिखा के सपनों का पेरिस। उसकी बलवती इच्छा को राह दी नीलकांत ने वरना यह क्या इतना सहज था? एयरपोर्ट के बाहर फिल्म की पूरी यूनिट तीन कोच में समा गई। नीलकांत के लिए कार थी। महँगे पाँच सितारा होटल में उनके कमरे पहले से बुक थे। एयरपोर्ट से होटल तक का रास्ता, वह खिड़की के बाहर देख जरूर रही थी लेकिन जैसे स्वप्नदृश्य में खोई थी। पिकासो, से जाँ... आधुनिक चित्रकार के तीर्थ पेरिस को वह नजरों में भरे ले रही थी। स्वप्न गलियों से गुजरती गलियाँ पक्की, घुमावदार, दोनों किनारों पर लगे बैंगनी और सफेद फूलों से लदे दरख्त।

"मैंने प्लान कर लिया है मैं यहाँ क्या-क्या देखूँगी।" उसने नीलकांत से कहा जो बड़ी देर से फोन पर बिजी था। ठंड बेतहाशा थी, कार अपेक्षाकृत गर्म थी फिर भी ठंड महसूस हो रही थी। होटल पहुँचने में काफी वक्त लग रहा था।

"होटल पहुँचकर तो मैं पहले तुम्हें देखूँगा।" नीलकांत ने शरारत से कहा।

"मुझे?" उसने अपनी मासूम निगाहें नीलकांत पर टिका दीं, वह खिलखिलाकर हँसा।

"हाँऽऽऽ तुम्हें ही तो... अभी देखा कहाँ है?"

वह कुम्हला गई, नीलकांत भी क्या मुकेश की तरह बस जिस्म ही चाहता है उसका?

"क्या यार, मजाक कर रहा था, सीरियसली... जोकिंग। हाँ बताओ, क्या-क्या देखोगी?"

"यहाँ के म्यूजियम, कला के स्कूल, गैलरियाँ, कला स्टूडियो और पोंपेदू सेंटर।" उसने उत्साहित होकर कहा।

"पोंपेदू सेंटर? यह क्या बला है?"

"नील, बला नहीं यह बीसवीं शताब्दी का संग्रहालय है। जिसे फ्रांस के राष्ट्रपति जॉर्ज पोंपेदू ने बनवाया था इसलिए इसका नाम पोंपेदू सेंटर के रूप में फेमस हुआ।"

"चलिए मैम... फिलहाल तो होटल आबाद करिए।" कार खूबसूरत बगीचे वाले लॉन के एक ओर पार्किंग प्लेस पर रुकी। ऊँची-ऊँची चॉकलेटी बुर्जियों वाला गिरजाघर जैसा दिखता होटल। बेहद भव्य रिसेप्शन... उतना ही भव्य उनका स्वागत। कोच पहले ही पहुँच चुकी थीं और पूरी यूनिट बाकायदा अपने-अपने कमरों में बंद हो चुकी थीं। नीलकांत के और दीपशिखा के सुइट की चाबियाँ लेकर होटल बॉय पहुँच चुका था। सुइट आजू-बाजू ही थे।

"तुम फ्रेश हो लो... कॉफी ऑर्डर करते हैं।" वह अपने कमरे में आ चुकी थी। उसने दरवाजा अंदर से लॉक किया और पर्स टेबिल पर रखते हुए फिरकी सी घूमी... 'एन ईवनिंग इन पेरिस... नाउ, आय एम इन पेरिस।'

गुनगुनाते हुए उसने टब बाथलिया। कॉफी बनाकर पी और सुलोचना को फोन लगाने लगी - "माँ, तुम कल्पना भी नहीं कर सकतीं, पेरिस कितना खूबसूरत है।" फिर शेफाली से बात की - "जल्दी आजा शेफाली... यार, रहने लायक जगह है। कुछ दिन बिना किसी तनाव के आई मीन चित्रकारी के बिताएँगे।"

तभी इंटरकॉम बजा - "कॉफी आ गई है। मैं बालकनी में इंतजार कर रहा हूँ।"

वह पतंग में लगी डोर सी खिंचती चली आई नीलकांत के पास। इस बार उसने पहल की। लपककर उसके गले में बाहें डाल दीं - "आई लव यू नील।"

नीलकांत की बाहों में मानो आसमान से चाँद उतर आया, खलबली मच गई, जिस्म के सितारे कानाफूसी करने लगे। नीलकांत ने हौले-हौले उसके चेहरे के हर पोर को चुंबनों से नहला दिया फिर आहिस्ते से उसे सोफे पर बैठाकर केतली से कॉफी निकालने लगा।

"तुम्हारी स्वीकृति भरी मोहर ने मुझे जिंदगी जीने की वजह दी... बड़ी बेवजह जिंदगी जा रही थी।"

"मेरी नहीं नील... मेरी जिंदगी में अगर प्यार नहीं था तो चित्रकारी थी।"

नीलकांत ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा - "झूठी प्यार करता हूँ तुम्हें, इतना भी नहीं समझूँगा।"

उसने शरमाकर पलकें झुका लीं।

हलकी-हलकी बूँदाबाँदी हो रही थी। कोई जिद्दी बादल था जिसने आधा किलोमीटर तक दीपशिखा और नीलकांत की कार का अपनी नन्ही-नन्ही बूँदों से पीछा किया और कार जब सेन नदी के पार्किंग प्लेस पर रुकी तो अच्छी खासी धूप छिटक आई थी। दोनों सेन नदी के सफर के लिए क्रूज पर आ बैठे, नीलकांत उसका हाथ पकड़कर टैरेस पर ले आया। हवा हलकी, खुशबूदार थी। परफ्यूम का शहर जो ठहरा। फ्रांस में चारों ओर फूल ही फूल... वादियों में खिले फूलों का अंबार। यहाँ की मुख्य खेती फूल ही हैं। बहारों के गुजर जाने पर सारे फूल तोड़कर कांसग्रेम में परफ्यूम फैक्टरी में भेज दिए जाते हैं। नदी की शांत लहरों पर क्रूज का चलना पता ही नहीं चल रहा था। फ्रेंच और अँग्रेजी भाषा में कमेंट्री का कैसेट बज रहा था जिसमें बताया जा रहा था कि दाहिने और बाएँ कौन-कौन सी इमारतें हैं। आईफिल टॉवर, ढेर सारे पुल, पुलों के खंभों पर राजा महाराजाओं की मूर्तियाँ जड़ी थीं सफेद पत्थर से बनी। पत्थर के पक्के सीढ़ीदार तट पर कई जोड़े मस्ती कर रहे थे। आज पेरिस में छुट्टी का दिन है। सेन के किनारे कुछ युवा समूह बनाकर नृत्य कर रहे थे। संगीत और ऑर्केस्ट्रा बज रहा था। एक अकेला आदमी सुनसान किनारे पर खड़ा वायलिन बजाता अपने आप में खोया था। दीपशिखा ने उस ओर इशारा किया - "नील, देखो कितनी तल्लीनता से अकेलेपन को एन्जॉय कर रहा है।"

"मैं तो हवा में सिंफनी सुन रहा हूँ।"

"और मैं रोमा रोलाँ को याद कर रही हूँ जिसकी कलम से शब्दों के फूल खिलते थे।"

"तुम कवयित्री हो न... मैं फिल्मकार, सोच रहा हूँ फ्रांस पर एक फिल्म बनाऊँ, यहाँ के फूलों पे।"

"दीपशिखा हँसने लगी - "चलेगी नहीं क्योंकि फूलों पर फिल्म नहीं चित्र बनते हैं हुजूर।"

"नहीं, सच कह रहा हूँ... फूलों पे फिल्म बन सकती है बल्कि परफ्यूम पे।"

"परफ्यूम पे तो बन चुकी है फिल्म 'परफ्यूम द स्टोरी ऑफ ए मर्डरर' जिसमें नायक एक के बाद एक सुंदरियों का अपहरण कर उनके साथ हमबिस्तर होता था और उस दौरान निकले पसीने को इकट्ठा कर उससे परफ्यूम बनाता था। ये परफ्यूम लोग एक्साइटमेंट के लिए लगाते थे।"

नीलकांत ने दीपशिखा के चेहरे को गौर से देखा और उसकी नाक दबा कर बोला - "माई इंटेलिजेंट फ्रेंड, इसीलिए तो मैं फूलों की बात कर रहा था। जानती हो मध्यकालीन फ्रांस में खूब सजी, रंगीन पोशाकें पहनी जाती थीं मानो हर कोई राजघराने का हो। हर जगह बनाव श्रृंगार और मेकअप के किस्से थे लेकिन वे एक-एक पोशाक कई-कई दिन बिना नहाए पहने रहते थे। अपना मेकअप तक नहीं उतारते थे, उसी पर और पोत लेते थे। कई स्त्रियाँ तो अपनी सारी उम्र बिना नहाए ही गुजार देती थीं।"

"ओ माय गॉड... ऐसा सोचना भी दूभर है।" दीपशिखा ने हैरत से कहा।

"स्त्रियाँ ही क्यों, कई पुरुष जीवन में पहली और आखिरी बार तब नहाते थे जब वे सेना में भरती होते थे क्योंकि उस समय उनकी पूरी देह बिना कपड़ों के ही पानी में डुबोकर परीक्षण से गुजरती थी।"

नीलकांत बताना चाहता था कि अमीर घरानों के फ्रांसीसी भी घरमें बड़े-बड़े गमले रखते थे और उसी में लघुशंका, दीर्घशंका कर लेते थे। उस पर मिट्टी ढँककर उसे खाद बनने को छोड़ देते थे। यानी गांधीजी वाला टॉयलेट हर घर में मौजूद था। सामान्य घराने के लोग यह क्रिया घाट मैदान में निपटाते थे। घरों में बाथरूम, टॉयलेट होते ही नहीं थे। पर ये बात वह दीपशिखा से सहज होकर नहीं कह सकता था।

"मुझे लगता है नहाने का चलन न होने के कारण ही परफ्यूम का जन्म हुआ... शरीर को सुगंधित बनाए रखने के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है जबकि फूल भी यहाँ बहुतायत से होते हैं।" दीपशिखा ने कहा।

नीलकांत ने घड़ी देखी - "चलिए मदाम, डिनर का वक्त हो गया। क्रूज भी किनारे पर आ गया है।"

कार एक महँगे रेस्तराँ के सामने रुकी। इस भव्य रेस्तराँ में नीलकांत ने पहले से टेबिल बुक करा लिया था। खाना भारतीय था जिसकी खुशबू उन्हें भारतीय होने के गर्व से भर रही थी।

"तुमने ज्याँ पाल सार्त्र का नाम सुना होगा?" नीलकांत ने सूप पीते हुए पूछा।

"हाँ अस्तित्ववाद का मसीहा था वो, दार्शनिक भी और धारा के विरुद्ध चलने वाली लेखिका सीमोन द बोउवार का प्रेमी था।"

"उनका प्रेम दुनिया जानती है।"

"जैसे अमृता प्रीतम और इमरोज।" वह मुस्कुराई।

"और अब हमारा जानेगी दुनिया, नीलकांत और दीपशिखा का।"

दीपशिखा सपनों में खो गई। उसने नीलकांत की हथेली में अपना हाथ दे दिया - "हम भी घर नहीं बसाएँगे, होटल में रहेंगे और रेस्तराँ में भोजन करेंगे जैसे सीमोन और सार्त्र करते थे। हम भी कहवाघरों में घंटों कला पर बहस करेंगे। सारी रात सड़कों पर इस तरह हाथ पकड़े चहलकदमी करेंगे।"

"नहीं, हम यह सब कुछ भी नहीं करेंगे। हमारे पास कला है, हम अपने प्रेम को कला के लिए समर्पित कर देंगे। खुद को बंधनों में नहीं बाँधेंगे लेकिन रहेंगे साथ। मैं भारत लौटते ही जुहू पर एक बंगला खरीदूँगा जिसमें हम रहेंगे और उस बंगले का नाम होगा..."

"बस... बस, पहले बंगला तो खरीदिए... नामकरण भी हो जाएगा।"

"बंगला तो खरीद लिया समझो।" कहते हुए नीलकांत ने प्लेट से टमाटर की स्लाइस उठा उसके मुँह की ओर बढ़ाई... "और यह भी अच्छे से समझ लो दीप, तुमसे रिलेशन बनाने के पहले मैं ईश्वर को साक्षी मानकर तुम्हारी माँग म