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उपन्यास

प्रेम की भूतकथा
विभूति नारायण राय

अनुक्रम

अनुक्रम नो रिग्रेट्स माय लव     आगे

फादर कैमिलस और कसाई कल्लू मेहतर के बीच का संवाद :

कितना मुश्किल था कल्लू का प्रश्न, "फादर, आपको लगता है कि साहब कतल किये हन?"

फादर कैमिलस के मन की छटपटाहट और कल्लू का सहज विश्वास! फादर पढ़े-लिखे हैं और पादरी हैं, कल्लू के हाथ की पर्ची लेकर उलटते-पुलटते हैं। एक अनगढ़-सी हस्तलिपि में लिखा हुआ एक वाक्य : "नो रिग्रेट्स माय लव।"

इसे पढ़कर कल्लू की नजर बचाकर अपनी बायीं आँख पोंछते हैं। कल्लू की तरह कह नहीं पाते - "साहब लड़ाई के मैदान में बहुतन के जान लिए हैं पर ई कतल ऊ नाहीं किये।"

कल्लू ने कितनों को फाँसी पर चढ़ाया है पर रो पहली बार रहा है।

फादर कैमिलस रो नहीं सकते। पढ़े-लिखे आदमी का दुख! पढ़ा-लिखा आदमी इतनी आसानी से किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकता। या शायद पहुँच भी जाय तो इतनी आसानी से किसी अनपढ़ के सामने स्वीकार नहीं कर सकता। उसी जैसे गोरों का न्यायप्रिय शासन है। इस व्यवस्था में एक निर्दोष को फाँसी पर कैसे चढ़ाया जा सकता है? वह भी एक निर्दोष गोरे को? फादर कैमिलस इस द्वन्द्व को इस अनपढ़ जाहिल कसाई के सामने स्वीकार भी नहीं सकते। फादर कैमिलस इसलिए भी रो नहीं सकते कि वे एक पादरी हैं। इनके सामने कितने लोग क्या-क्या कन्फेस करते हैं। पत्थर जैसा भावहीन चेहरा लिए वे अक्सर सामने देखते रहते हैं, कई बार तो कन्फेशन करने वाले की आँखों में भी झाँकते हैं पर उस समय भी चेहरा पूरी तरह भावशून्य बना रहता है।

मैं भूत से जानना चाहता हूँ कि कल्लू जिस पर्ची को जेल से अपनी तहमद में छिपाकर लाया था और डाक बम्बे में डालने के पहले फादर कैमिलस को दिखाकर आश्वस्त होना चाहता था कि उसमें सरकार के खिलाफ कुछ ऐसा-वैसा तो नहीं था कि बाद में वह किसी झमेले में फँस जाय, और उस पर लिखा वाक्य "नो रिग्रेट्स माय लव" किसे सम्बोधित था?

मैं जानना चाहता था कि उस पर्ची के साथ एलन ने पता लिख कर जो एक दूसरा पर्चा कल्लू को दिया था और जिस पते को फादर कैमिलस ने एक लिफाफे पर लिखकर कल्लू को डाकखाने में डालने के लिए दे दिया था, वह किसका था? क्यों उस पते को कल्लू की नजरें बचाकर अपनी डायरी में नोट करने के बाद भी फादर कैमिलस ने इलाहाबाद वापसी के दौरान यमुना पुल पर से गुजरते हुए धीरे से डायरी खोलकर, पता लिखा पृष्ठ ढूँढ़ निकाला और चलते इक्के के हिचकोलों के बीच उसे इतनी सावधानी से फाड़ा कि डायरी के दूसरे पन्ने अव्यवस्थित न हों और फिर धीरे-धीरे उसकी चिन्दियाँ करते हुए विशालकाय लोहे के पुल से एक-एक कर नीचे फेंकते चले गये। डायरी का वह पृष्ठ असंख्य छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा हुआ हवा में इस तरह उड़ाया गया कि कुछ टुकड़े पुल के दैत्याकार खम्बों के बीच की दरारों से तैरते हुए यमुना की तरफ उड़ गये, कुछ पुल पर ही गिरे तो कुछ इक्के के पहियों और पायदान पर चिपक-से गये। ऐसा लगता था कि फादर कैमिलस उस संभावना को भी नष्ट कर देना चाह रहे थे जिसमें कोई सतर्क खोजी इन टुकड़ों को मेहनत करके बीन ले और एक-एक टुकड़े को जोड़ता हुआ उस पते तक पहुँच जाय जिसके पास उस अभागे कैदी का यह आश्वासन पहुँचने वाला था कि जो कुछ हुआ उसका उसे कोई पछतावा नहीं है...

"नो रिग्रेट्स माय लव!"

सँकरे पुल पर फादर कैमिलस के इक्के के आगे-आगे भैंसों का एक झुण्ड जा रहा है, नीचे धीर-गम्भीर यमुना डूबते सूरज की ललौंछ में धीरे-धीरे बह रही है और उसके गहरे हरे जल के बरक्स दूर थोड़ी छिछली गंगा का हल्का सफेद जल उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। डूबता सूरज कुछ ऐसे कोण से जल समाधि लेने जा रहा है कि उसकी कमजोर रोशनी गंगा-यमुना की सन्धि-स्थली पर श्वेत फेनिल पानी की मेड़ पर पड़ रही थी। इन सबके बीच एक निर्लिप्त किला खड़ा है जैसे उसका काम सिर्फ यमुना को मोड़कर गंगा से मिलने के लिए प्रेरित करना है। फादर कैमिलस हवा में उड़ती चिन्दियों को देख रहे हैं और उनके चेहरे पर वही निर्लिप्त तटस्थता है जो कन्फेशन के दौरान उन्हें घेरे रहती है।

जिस भूत ने यह दृश्य मुझे दिखाया उसी भूत ने कितनी आसानी से मेरी जिज्ञासा को एक वाक्य में खारिज कर दिया।

"मुझे पता नहीं।"

अगर पता लिखे कागज के हजार टुकड़े हुए भी और बावजूद भूत के इस शायराना वक्तव्य के कि -

"कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा।"

उसके लिए क्या मुश्किल है कि कागजों के उन टुकड़ों को एक बार फिर से जोड़कर उसमें लिखा हुआ पता वह मुझे पढ़कर सुना दे। भूत तो कुछ भी कर सकते हैं! आखिर इसी भूत ने तो मुझे तमाम ऐसे दृश्य दिखाये थे, तमाम ऐसी घटनाओं का आँखों देखा हाल सुनाया था जहाँ वह खुद उपस्थित नहीं था। फिर इसी एक मामले में यह इतना जिद्दी क्यों हो रहा है? मैं जितना पूछता गया वह उतना ही खामोश होता गया। यह भी भूतों को लेकर मेरे अब तक के अनुभवों के खिलाफ था। मेरा अनुभव था कि भूत वाचाल होते हैं और उन्हें आप दुख या सदमे के किसी ऐसे भँवर में नहीं डाल सकते जहाँ से खामोशी की यात्रा शुरू होती हो।

आप थोड़ा चकित होंगे कि भूत इस कथा का सूत्रधार कैसे हो गया? दरअसल बिना इस गुत्थी को सुलझाये कथा आगे बढ़ेगी भी नहीं।

आपने कभी कोई भूत देखा है? कभी उसके साथ वक्त काटा है? उसके साथ हँसे हैं, बोले- बतियायें हैं या कुछ दूर साथ चलें हैं? अगर आप भूत में यकीन करते हैं तब तो मैं दावे से कह सकता हूँ कि आप भूत से डरे होंगे। अँधेरे एकांत में भूत के खिलखिलाने से आप के मन में गुदगुदी नहीं पैदा हुई होगी, भय से आपके माथे पर पसीना चुहचुहाने लगा होगा और आपकी घिग्घी बँध आयी होगी। अगर आप भूत के अस्तित्व में विश्वास रखते होंगे तो यह हो ही नहीं सकता कि आपने फुसफुसाकर भूत से अपने मन का रहस्य बतलाया हो या भूत ने मुस्कुराकर आपके कंधे पर हाथ रखा हो और आप और आपका मित्र भूत गपियाते हुए दूरदराज किन्हीं अनजान, अपरिचित वादियों में उतर गये हों। भूत आपका दोस्त तभी हो सकता है जब आपका उसके अस्तित्व पर विश्वास न हो। आधा-अधूरा यकीन आपके किसी काम नहीं आयेगा। जरा भी संशय आपका काम बिगाड़ सकता है। इसलिए भूत के साथ दोस्ती करने की जरूरी शर्त है कि आप के मन में भूतों के अस्तित्व को लेकर सौ प्रतिशत अनास्था हो।

मेरी भूतों से चटपट दोस्ती हो जाती है। मजेदार बात यह है कि एक साथ कई भूतों से एक ही समय में दोस्ती चलती रहती है। भूतों में एक अच्छी बात मैंने यह पायी है कि वे ईर्ष्यालु नहीं होते। एक ही समय में आपके कई बेस्ट फ्रेंड हो सकते हैं। कोई बेस्ट फ्रेंड किसी दूसरे बेस्ट फ्रेण्ड से ईर्ष्या नहीं करता। इन भूतों से मैं घंटों बतिया सकता हूँ। भूत भी अपने मन की अतल गहराइयों से निकाल-निकाल कर न जाने कैसी-कैसी गाथाएँ ले आते हैं और किसी पटु किस्सागो की तरह मुझे सुनाते हैं। कई बार ये कथाएँ किस्तों में सुनाई जाती हैं और दो वृत्तांतों के बीच कई-कई दिनों और कभी-कभी तो महीनों का फर्क पड़ जाता है। जाहिर है कि निपुण से निपुण किस्सागो भी लम्बे अंतराल के बाद जब कहानी के सूत्र फिर से पकड़ता है तो उसमें कुछ न कुछ जुड़ जाता है या कुछ छूट जाता है। अगर आप भूत को याद दिलायें कि गुरू, कुछ गड़बड़ हो रही है, पिछली बार तो तुमने नायिका का नाम फलानी बताया था, इस बार अलानी कैसे हो गया या फलाँ घटना इस तरह नहीं उस तरह घटी थी या ऐसी ही कोई और गलती तो भूत इस पर मनुष्य कथाकार की तरह तर्क-कुतर्क नहीं करेगा या आपको दुष्ट, अज्ञानी और विरोधी खेमे का एजेन्ट घोषित नहीं करेगा। वह तो सिर्फ फिस्स से हँस देगा और कथा के सूत्र को फिर से जोड़कर आगे बढ़ जायेगा। इसीलिए कई बार कथा की शुरुआत में आप जिस अंत की कल्पना कर रहे होते हैं वह एकदम उल्टा हो जाता है।

इस कथा का सूत्रधार था नहीं, थी। मेरा पाला इस बार एक स्त्री भूत से पड़ा था। मैंने बड़ी कोशिशें कीं पर मुझे भूत का कोई सम्मानजनक स्त्रीलिंग नहीं मिला। हमारा समाज सिरे से स्त्री विरोधी है। स्त्रीवाचक शब्द और स्त्री शरीर गालियों के लिए सबसे उपयुक्त माने जाते हैं, शायद यही कारण है कि भूत के स्त्रीलिंग भूतनी या चुड़ैल गाली-गलौज के काम ही ज्यादा आते हैं। आपने कभी किसी पुरुष को गाली देते समय भूत नहीं कहा होगा पर जब कभी किसी औरत को चुड़ैल कह कर पुकारा होगा, आपके मन में उसके लिए खराब भाव ही रहे होंगे। इसीलिए मैं अपनी इस बार की मित्र को भूतनी नहीं, भूत ही कहूँगा। जो कथा मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ वह मुझे इसी भूत ने सुनायी थी और पूरी कथा के दौरान मैं सजग रहा कि मैं उसे भूतनी न कह बैठूँ। क्या पता वह मुझसे नाराज हो जाय या यह भी हो सकता है कि वह मुझसे नाराज न हो क्योंकि एक बार मनुष्य योनि से छुटकारा पाने के बाद ज्यादा संभावना है कि भूत उन सारे ओछेपनों से मुक्त हो जाते हों जिनसे पृथ्वी पर वे ग्रस्त रहते हैं। बहरहाल मैं कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था। जो कहानी मुझे सुनायी जा रही थी वह इतनी दिलचस्प थी कि मैं कथावाचक को नाराज कर के कहानी के बीच में व्यवधान नहीं पैदा करना चाहता था। इसलिए मैंने पूरी कथा भूत से सुनी, भूतनी से नहीं।

इस भूत से मुलाकात अचानक हुई थी और मिलने की कथा भी कम दिलचस्प नहीं है।

एक औसत भारतीय के मन में गोरी चमड़ी को लेकर हमेशा लालसा मिश्रित कौतूहल रहता है। आजादी के इतने सालों बाद भी इसमें बहुत फर्क नहीं आया है। गोरी चमड़ी अगर किसी मेम की हो तब तो हिन्दुस्तानी मर्द के मन में फौरन ही खदबदाहट शुरू हो जाती है। मैं अब आप से क्या छिपाऊँ कि मेरे मन में भी मादा गोरी चमड़ी के लिए दुर्निवार आकर्षण है। कभी कोई गोरी मेम किसी हिल स्टेशन पर मुझसे टकरा जाय, यह मेरी एक बहुत पुरानी फैन्टेसी का भाग था। जीवित संसार में तो ऐसा हुआ नहीं, पर एक बार फिर इस मामले में भूत ही मेरे काम आये। इस बार जो भूत मेरे सम्पर्क में आया या यूँ कहिए आयी वह एक गोरी मेम का था। गोरी भी ऐसी-वैसी नहीं, विशुद्ध योरोपीय नस्ल की और उस पर सोने में सोहागा यह कि उस अँग्रेज कौम से ताल्लुक रखने वाली जिन्होंने दो सौ वषों तक हमारे ऊपर हुकूमत की थी।

मुलाकात का लोकेल भी बड़ा खूबसूरत था। मसूरी हिल स्टेशनों की रानी कही जाती है। मुलाकात वहीं हुई। मसूरी आज वाली नहीं, जिसका नाम सुनते ही टूटी सड़कें, बजबजाती नालियाँ, पॉलीथीन के ढेर, कन्धे से कन्धा छीलती भीड़ और ग्राहकों को लूटना ही जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य है ऐसे दुकानदारों से पटी कंक्रीट के जंगल वाली नगरी का चित्र आँखों के सामने घूमने लगता है और जिसे बसाने वाले गौरांग महाप्रभुओं की भाषा में ही अगर कहना हो तो कहा जायेगा कि इट इज़ बर्स्टिंग एट द सीम्स।

मैं मसूरी गया था एक निहायत ही घटिया मकसद से। घटिया सिर्फ इसलिए कह रहा हूँ कि मैं भी उन तमाम हजारों-लाखों लोगों में शरीक हूँ जो यह मानते हैं कि उन्होंने जिस पेशे को अपनाया है वे उससे कहीं बेहतर जरिया माश के पात्र थे। उन्हें जहाँ होना चाहिए था वे वहाँ नहीं हैं। वहाँ वे लोग बैठे हैं जिन्हें वहाँ नहीं होना चाहिए था। मसलन मैं पत्रकारिता में आ गया, लेकिन हमेशा सोचता हूँ कि मुझे किसी रोबदाब, तड़क-भड़क वाली जगह पर होना चाहिए था जैसे पुलिस, सेना या इसी तरह की कोई और संस्था मेरे व्यक्तित्व के अनुकूल होती। बहरहाल, कुछ नहीं मिला तो पत्रकारिता में आ गया और शुरूआती सालों में लगातार हाथ-पैर मारता रहा कि किसी मनपसंद जगह पर पहुँच जाऊँ, पर मेरी जैसी स्थिति में आम तौर से जैसा होता है चार-पाँच वर्षों की जद्दोजहद के बाद नियति मानकर मैंने अपने दफ्तर में कलम घसीटना शुरू कर दिया था।

मेरा सम्पादक कब्ज, अपच और बवासीर का पुराना मरीज था। वह अजीब उकतायी नजरों से मुझे देखता था। उसकी दृष्टि में मैं निहायत ही नाकारा, बोर, काहिल और न जाने क्या-क्या था। मुझे भी कोई असुविधा नहीं थी। वह मुझे चुपचाप काम करने देता और रात को दारू पीने के समय दफ्तर छोड़ देने देता तो मैं भी खुश और वह भी खुश। टकराव के मौके तभी आते जब वह मेरी इस छोटी-सी कामना के रास्ते में रोड़े अटकाता। तब कुछ दिनों तक दफ्तर में तनाव रहता। उसकी बवासीर उसे कुछ ज्यादा परेशान करने लगती, मुझसे भी वर्तनी की गल्तियाँ अधिक होतीं और मेरी कुर्सी के नीचे की धरती कागज की चिन्दियों से पट जाती। गनीमत यह थी कि मेरे अखबार के मालिकान पुराने स्कूल के लोग थे। उनके अखबारों से सिर्फ अर्थियाँ ही बाहर निकलती थीं। इसलिए मेरी नौकरी को खतरा नहीं था और तनाव के इन अस्थायी क्षणों के अलावा जीवन काफी हद तक इकहरी दिनचर्या और बेस्वाद अनुभवों के साथ, आप कह सकते हैं कि मजे से बीत रहा था।

मेरे इस उथल-पुथल रहित जीवन में भूचाल इस दुष्ट संपादक की वजह से आया।

अनुभवी लोग जानते हैं कि जब वह अपनी खल्वाट खोपड़ी पर पेंसिल से टिक-टिक करने लगता और यह टिक-टिक एक निरंतर मध्यम संगीत लहरी की भाँति उसके शीशों वाले केबिन से टकराने लगती तब बाहर हाल में बैठे लोगों को सतर्क हो जाना चाहिए कि कोई दुष्टतापूर्ण विचार उसके भुस्स भरे दिमाग में उमड़-घुमड़ रहा है। भाई लोग पेंसिल के शुरूआती आघातों से ही सतर्क हो जाते। इन दिनों वह आश्चर्यजनक रूप से भलामानुष हो जाता। अपनी घूमने वाली कुर्सी पर बैठकर शीशों वाले केबिन से वह बाहर हॉल में बैठे हम लोगों की निगरानी करता था। मुझसे पुराने लोगों का कहना था कि उसके पहले वाले संपादक का केबिन शीशे का नहीं था। इस दुष्ट ने आते ही मालिकों से कहकर जिस हॉल में हम लोग बैठते थे उसी में अपने लिए शीशे का केबिन बनवाया था। अन्दर से बैठकर वह हम लोगों के हगने-मूतने पर निगाह रखता था। हम बतियाते रहते और अचानक पाते कि कोई ठंडी निगाह हमें घूर रही है। हमारे ठहाके हवा में लटके रह जाते और उन्हें उसकी घूरती दृष्टि बीच में ही लोक लेती। जिन दिनों उसकी सफा- बाल चाँद पर पेंसिल ठक-ठक करती उन दिनों उसकी निगाह अदृश्य हो जाती। हम जोर-जोर से बातें करते और उम्मीद करते कि एक डाँटती हुई नजर हमें बरजेगी, पर हम पाते कि केबिन के पीछे से संपादक की निगाहें हमारे ऊपर से सर्कस की सर्चलाइट की तरह घूमती हुई गुजर जाती। हम उसकी आँच से झुलसते नहीं बल्कि उसकी निरपेक्ष उदासी से चकित रह जाते। छुट्टी माँगने पर वह काट खाने को नहीं दौड़ता। उन दिनों यह भी होता कि केबिन में खबर की बाबत बात करने गये किसी रिपोर्टर को पानी या चाय के लिए पूछ लेता।

पुराने घाघ ऐसी स्थिति में उससे दूर ही रहते। मुझे बहुत अनुभव नहीं था, इसलिए फँस गया।

हुआ कुछ ऐसे कि मैं एक राष्ट्रीय दलाल के बारे में, जो आजकल हमारे सूबे की सरकार का सूत्रधार था, संपादक से पूछने गया था कि उसका हाजमा खराब होने की खबर मुखपृष्ठ पर छपेगी या तीसरे पेज पर। पहले तो मुखपृष्ठ पर छपती थी, लेकिन इस बीच केन्द्र में उस दलाल को नापसन्द करने वाली पार्टी की सरकार आ गयी थी और मैंने उड़ती-पुड़ती अफवाहें सुनी थीं कि हमारे मालिकान अब इस दलाल से दूरी दिखाना चाहते हैं। मामला गंभीर और नीतिगत था, इसलिए संपादक की राय जरूरी थी।

मैं जब कमरे में घुसा वह पेंसिल से अपनी खोपड़ी खटखटा रहा था। हालाँकि उसके चेहरे पर वही पुरानी उबाऊ उदासी थी पर मुझे देखकर वह मुस्कुराया। मैं थोड़ा असहज जरूर हुआ पर बिना किसी औपचारिकता के मैंने अपनी समस्या उसके सामने रखनी शुरू कर दी।

वह आँख मूँदे मुझे सुनता रहा। उसकी पेंसिल खोपड़ी पर टिक-टिक करती रही। अचानक उसने अपनी आँखें खोलीं। हाथ के इशारे से मुझे बोलने से रोका और मुझे उसका यह बेहूदा प्रस्ताव सुनने को मिला जिसके कारण मैं मसूरी पहुँच सका।

"तुम इस सड़ी गर्मी में यहाँ क्या कर रहे हो? किसी हिल स्टेशन पर क्यों नहीं चले जाते?"

मैंने अचकचा कर उसे देखा। जाहिर था कि पैसे या छुट्टी जैसी बातें इस समय बहुत छोटी लगतीं। मेरा कुछ बोलना ही मुझे निरर्थक लगा। इसलिए मैं चुप रहा।

"मेरा मतलब है तुम मसूरी हो आओ --- मालिकों के खर्चे पर।"

वह हँसा जैसे उसने कोई बहुत बड़ा मजाक किया हो। मेरी चुप्पी से उसकी हँसी लम्बी नहीं खिची।

"मेरे पास एक दिलचस्प काम है तुम्हारे लिए। एक घंटे बाद आओ, बताऊँगा। तब तक इस कूड़े-करकट को निपटा लूं।"

उसने अपने सामने पड़े कागज़ों की तरफ इशारा किया।

मैंने राष्ट्रीय दलाल वाला मसला फिर उसके सामने रखने का प्रयास किया पर उसने सामने पड़े कागजों में अपनी आँखें गड़ा लीं थीं और हाथ से मुझे जाने का इशारा करते हुए बुदबुदाते हुए जो कुछ कहा उसका मतलब कुछ भी हो सकता था - मैं खुद फैसला करने में सक्षम था, फोटो ऊपरी पृष्ठ पर छपनी चाहिए या कि फोटो अन्दर कहीं जा सकती है। यह उसकी पुरानी आदत थी। ऐसा कोई फैसला वह नहीं करता था जिसमें बाद में कोई पचड़ा हो। वह हमेशा इतनी गुंजाइश रखता था कि ऐसा काम जो बाद में मालिकों को पसंद न आये उसके लिए नीचे वाले को दोषी ठहराया जा सके।

मैं बाहर निकल आया। अब दलाल के फोटो की समस्या उतनी बड़ी नहीं रह गयी थी। मेरी समझ में आ गया था कि ज्यादा बड़ी मुसीबत मेरे सामने आने वाली थी।

हमारे संपादक के दिमाग में अकसर मूर्खतापूर्ण तरंगें उठा करतीं थीं। इन तरंगों की वजह से वह अधीनस्थों को भाँति-भाँति के प्रोजेक्ट सौंपा करता था। दरअसल हमें बहुत बाद में पता चला कि इन योजनाओं के पीछे मालिकों के परिवार की विलायत पलट लड़की थी जो उनके कागज, जूट, स्टील और दूसरे कारखानों के साथ-साथ अखबारों में भी प्रयोग करती रहती थी। उसने विदेशी अखबारों को सालों साल पढ़ा था और देशी, खास तौर से हिंदी, अखबारों के बारे में निहायत घटिया राय रखती थी। जब वह विलायत से पढ़कर लौटी और उसे अपने घराने के साम्राज्य में दखल देने का मौका मिला तो सबसे पहले उसने हिंदी के अखबारों को बन्द करने का ही फैसला किया। उसका इरादा तब बदला जब परिवार के बुजुर्गों ने यह समझाया कि इस देश में जूट और कागज के कारखाने भी फायदे में तभी चलते हैं जब पास में घाटे में चलने वाला एक अखबार भी हो। उसे बताया गया कि विलायत में कल-कारखाने किसी भी वजह से चलते हों पर हमारे यहाँ तो तभी चलते हैं जब अफसर और नेता उन पर मेहरबान हों। अफसरों और नेताओं को ठीक रखने के लिए अखबार सबसे बढ़िया तरीका है। नेताओं की नयी पीढ़ी भले ही अँग्रेजी अखबार पढ़ती हो, पर उनके वोटर अभी भी देशी भाषाओं के जरिये ही खबरें हासिल करते हैं। उसकी समझ में यह बात बैठ गयी और उसने हमारे अखबार को बंद करने का इरादा छोड़ दिया, लेकिन इसे सुधारने का बीड़ा जरूर उठा लिया।

हमारे अखबार में तरह-तरह के प्रयोग किये गये। उसका शीर्षक अँग्रेजी में रखा गया, कॉलम विदेशी अखबारों से उठाये गये, पूरी की पूरी सामग्री अनूदित की जाने लगी वगैरह-वगैरह। मेरे जैसे लोगों की सेहत पर इससे ज्यादा असर नहीं पड़ा। जब तक नौकरी सुरक्षित रहे और देर शाम तक दफ्तर में न बैठना पड़े - मुझे कोई दिक्कत नहीं आने वाली थी। पर दिक्कतें दूसरे रूप में आयीं। हम पूरी तरह से आश्वस्त थे कि यह आइडिया उस विलायत पलट लड़की की वजह से हमारे संपादक के मस्तिष्क में आया होगा। संपादक के मन में तो ऐसे विचार आ ही नहीं सकते थे - ऐसा हम सभी का मानना था।

दूसरे अखबारों से हम अलग दिखें - इसे लेकर संपादक ने हम सभी की बैठक बुलायी। सभी की राय माँगी गयी। सब जानते थे कि यह सिर्फ औपचारिकता है। मालिकों ने, खास तौर से मालिकों के परिवार की इस विलायत पलट लड़की ने कुछ न कुछ तय कर रखा होगा और सनकी संपादक बड़े दंभ और मूर्खता से मुस्करायेगा और जादू के पिटारे की तरह अपनी मेज की दराज खोलेगा, उसमें से एक कागज निकालेगा और हम सबको तुच्छ और बुद्धि तथा कल्पना से हीन साबित करता हुआ कुछ मूर्खतापूर्ण सुझाव रखेगा। हममें से कुछ वाह वाह करने लगेंगे, कुछ नजरें दायें-बांयें करते हुए उपहास से अपने होंठ चौड़े करेंगे और कुछ मेरे जैसे दो-एक ऊब कर जमुहाई लेंगे और सभा के बर्खास्त होने का इंतजार करेंगे। हर बार यही होता था।

आज भी कमोबेश यही हुआ।

हम मे से कुछ नये थे। वे जोश में बोले। उन्होंने तरह-तरह के सुझाव दिये। संपादक बत्तख की तरह अपनी गर्दन आगे बढ़ाकर आधी मूँदी आँखों से उन्हें ध्यान से सुन रहा था। पुराने लोग जानते थे कि यह उत्सुकता सिर्फ दिखावटी थी। अगर किसी वक्ता को बीच में रोक कर उसके सुझाव के बारे में संपादक की राय पूछी जाती तो निश्चित था कि वह अचकचा जाता। उसके बारे में मशहूर था कि वह सिर्फ मालिकों की बात ध्यान से सुनता था। उनका टेलीफोन आने पर फौरन जेब से छोटी डायरी निकाल कर पेन खोल लेता था। इसलिए पुरानों में से ज्यादातर कुछ बोले नहीं और जब उनमें से एक-दो का नाम लेकर संपादक ने बोलने को कहा तो उन्होंने कुछ औपचारिक-से वाक्य बोलकर अपनी छुट्टी पा ली।

फिर वह क्षण आया जिसका ऊब और खीझ के साथ हम इंतजार कर रहे थे।

"हम कुछ हत्याओं की रिपोर्टिंग करेंगे," उसने घोषणा की।

हे भगवान ! हममें से ज्यादातर के चेहरे उतर गये। हम और क्या करते हैं?

"हम शताब्दी की हत्याओं की रिपोर्टिंग करेंगे, "उसने रहस्यमय मुस्कान के साथ कहा। हम सुनने के अलावा कर भी क्या सकते थे। वह हमारा बॉस था। बॉस की दिमागी तरंगें हमेशा अद्भुत होती हैं।

"पिछली शताब्दी में बहुत-सी हत्याएँ हुई हैं जो अनसुलझी रह गयीं। मेरा मतलब उन हत्याओं से है जिनमें अदालतों ने तो सजा दे दी पर लोगों के मन में हमेशा यह शक बना रहा कि जिन्हें फाँसी पर लटका दिया गया क्या वे सचमुच हत्यारे थे! हम ऐसी हत्याओं की पड़ताल करेंगे।"

हम सुनते रहे और वह बोलता रहा। वह बोलता रहा और हम सुनते रहे। बाहर निकलकर हममें से कोई बहुत उत्साही नहीं दिखा। कम से कम मैं तो नहीं ही था। जो कुछ मैं समझ पाया उसके मुताबिक हमें पुराने केसों की फाइलें खँगालनी थीं, अगर उन मामलों में कोई जीवित बचा हुआ था तो उससे बात करनी थी और किसी न किसी तरह एक ऐसा सनसनीखेज मामला बनाना था जिससे पाठकों की सहानुभूति हत्यारे के साथ हो जाय। ऐसी सीधी-सादी कहानी, जिसमें वास्तविक हत्यारा फाँसी चढ़ गया हो, हमारे लिए बेकार थी। हमें तो ऐसी कहानी ढूँढ़नी थी जिसमें कोई निर्दोष फाँसी चढ़ गया हो या कम से कम कहानी सुनाते समय साबित करना था कि जो फाँसी चढ़ा वह निर्दोष था। तभी पाठकों की दिलचस्पी हमारी कहानी में पैदा होगी।

बाहर निकलते समय मैंने यह नहीं सोचा था कि इस योजना का पहला शिकार मैं बनूँगा।

राष्ट्रीय दलाल की तस्वीर वाला मसला तो पीछे रह गया और यह एक नयी मुसीबत मेरे सामने आ गयी थी। एक घंटे बाद जब मुझे संपादक ने अपने केबिन में बुलाया, मैं किसी बड़ी मुसीबत के लिए तैयार था। मेरे बैठते ही वह शुरू हो गया।

"1909 में मसूरी में एक हत्या हुई थी।" उसने मेरे चेहरे पर नजरें गड़ायीं।

जरूर उसे निराशा हुई होगी। मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। हर साल मसूरी में हत्याएँ होती हैं। इसमें नया क्या है?

"यह मसूरी की पहली हत्या थी," मै खामोश बैठा रहा।

"1909 में मसूरी में पहली बार बिजली आयी थी।" उसने चौंकाने वाले भाव से मुझे देखा। मुझे उस पर दया आयी। हर शहर में बिजली कभी न कभी पहली बार आयी होगी। इससे क्या बनता-बिगड़ता है?

इसके बाद वह फिल्मी वकीलों की तरह बोलने लगा। उसने कातिल, मकतूल, मौका-ए वारदात, अंतरात्मा, कत्ल जैसे न जाने कितने शब्द मेरे सामने दोहराये और हर बार उनके इस्तेमाल के बाद मेरे चेहरे पर पड़ने वाले भावों का अध्ययन करने के लिए रुका। मेरा खयाल है कि हर बार उसे निराशा ही हाथ लगी होगी। मेरा चेहरा खाली था।

उसका सुनाया हुआ किस्सा कुछ यूँ था कि सन 1909 में, जब मसूरी अभी बसनी शुरू ही हुई थी और जब तक उस इलाके में लैण्डोर नाम का एक छोटा-सा कैण्टोनमेंट ही आबाद हुआ था और उसी सन में जब मसूरी में पहली बार बिजली आयी थी, एक अँग्रेज केमिस्ट की हत्या हुई थी। हत्या उसी दवा की दुकान के अन्दर की गयी थी जिसमें वह केमिस्ट काम करता था और जिसके पिछले हिस्से में वह रहता था। केमिस्ट की हत्या के सिलसिले में एक अँग्रेज सिपाही पकड़ा गया था और देहरादून सेशन अदालत में मुकदमे की सुनवाई के बाद उसे फाँसी की सजा सुनायी गयी थी और बाद में नैनी सेण्ट्रल जेल में उसे फाँसी पर लटका दिया गया था।

मामला बड़ा सीधा-सादा था। जो कथा सुनायी जा रही थी उसमें मुझे सिर्फ यही दिलचस्प लगा कि यह मसूरी की पहली हत्या थी, इसलिए मसूरी और लैण्डोर के छोटे-से ऐंग्लो-इण्डियन समुदाय में अगले कई वर्षों तक इस हत्या की चर्चा होती रही। उन दिनों यूरोपियन, खास तौर से अँग्रेज जो भारत में काम या व्यापार के सिलसिले में रह रहे थे, ऐंग्लो-इण्डियन कहलाते थे। यह तो कुछ दशकों बाद हुआ कि आधे गोरे आधे हिन्दुस्तानी ऐंग्लो-इण्डियन कहलाने लगे और गोरे अँग्रेज या यूरोपियन हो गये।

उन दिनों मसूरी से एक अखबार मसूरी टाइम्स निकलता था और हत्या के बाद बहुत दिनों तक यह घटना उस अखबार की सुर्खियों मे छायी रही। संपादक के नाम सैकड़ों पत्र छपे, कई संपादकीय लिखे गये और सालों-साल लोग मनुष्य स्वभाव की उस कमजोरी को तलाशते रहे जिसके वश में होकर कोई अपने इतने नजदीकी दोस्त की ऐसी नृशंस हत्या कर सकता था। केमिस्ट जेम्स रेगिनैल्ड क्लैप और उसका हत्यारा सार्जेंट एलन घनिष्ठ मित्र थे। एलन ही नहीं, उस जैसे दर्जनों गोरे सिपाही जेम्स के करीबी थे। खुशमिजाज जेम्स अभी कुँवारा था। पीछे ब्रिटेन में वह अपनी माँ को छोड़कर अकेला पैसा कमाने हिन्दुस्तान आया था। किसिम-किसिम के धन्धे करती हुई पेशावर से कलकत्ता तक घूमी हुई उसकी जवान काठी आराम करने के लिहाज से मसूरी में टिकी तो फिर यहीं की हो कर रह गयी। कुछ दिन मटरगश्ती करने के बाद उसने इस केमिस्ट शॉप पर नौकरी कर ली। दुकान जिस कैप्टन सैमुअल की थी उसकी उसी साल सहारनपुर में हैजे से मृत्यु हो गयी थी। गर्मियों में दूसरी अँग्रेज मेमों के साथ मसूरी आयी हुई उसकी पत्नी को उसकी मृत्यु की सूचना तब मिली जब सैमुअल के रेजिमेण्ट की एक टुकड़ी उसके सामान के साथ सहारनपुर से देहरादून की यात्रा नई-नई आरम्भ हुई रेल से और उसके बाद बैलगाड़ी और खच्चरों पर करने के बाद मसूरी में दाखिल हुई। ऐसे ही थे वे दिन। सहारनपुर से देहरादून की यात्रा रेल से तय की जाती थी और वहाँ से मसूरी तक का सफर बैलगाड़ी और फिर पैदल या खच्चरों पर होता था। वर्दी, पेटी और दूसरे सामानो के साथ पलटन के कमाण्डिंग अफसर का शोक संदेश था और यह सूचना थी कि पलटन नें अपने बहादुर अफसर को पूरे धार्मिक कर्मकाण्ड तथा सैनिक सम्मान के साथ दफन कर दिया है और मिसेज सैमुअल जब कभी अपने पति की कब्र पर आयेगी उसे अपने स्वर्गीय पति की गरिमा के अनुकूल पायेंगी।

मिसेज सैमुअल उसी टुकड़ी के साथ दूसरे दिन सहारनपुर रवाना हो गयीं। जाते समय उन्होंने मसूरी के उस छोटे-से समूह के सामने, जो उन्हें सान्त्वना और विदा देने के लिए इकट्ठा हुआ था, जरूर यह घोषणा की कि पति के बिना जीवन निरर्थक हो गया है - लिहाजा वे मसूरी वापस नहीं लौटेंगी और शेष जीवन किसी कॉनवेंट में प्रभु यीशू की पूजा और दीन-दुखियों की सेवा करते हुए बिता देंगी।

पर पुरानी कहावत है कि सब कुछ वही नहीं होता जो मनुष्य चाहता है। पता नहीं यह सहारनपुर की सड़ी गर्मी थी या कैप्टन सैमुअल की पलटन के कमाण्डिंग अफसर मेजर स्टीव और उनकी पत्नी की निरंतर सलाह, दो महीने बाद मिसेज सैमुअल वापस मसूरी लौट आयीं। जब तक वे वापस विलायत नहीं जातीं उन्हें जीवन यापन के लिए कुछ करना था। उन दिनों न तो फौज में अच्छी पेंशन थी और न ही आज की तरह डयूटी पर मरने वालों के परिजनों को पूरा वेतन मिलता था पर इसके बावजूद सरकार, रेजिमेंट और मसूरी के गोरे समुदाय ने श्रीमती सैमुअल की इतनी मदद जरूर की कि मसूरी के धीरे-धीरे विकसित हो रहे बाजार में उन्होंने दवा की यह दुकान खोल ली और हर साल इस इरादे के साथ सर्दियाँ बिताने के बाद कि अगले साल जरूर सब कुछ बेच-बाच कर वह विलायत वापस चली जायेंगी, वे कहीं नहीं गयीं और एक निःसंतान विधवा की तरह उन्होंने शेष जीवन मसूरी में ही काटा जहाँ दवा की यह दुकान उनके भरण-पोषण का भरपूर सहारा बनी रही।

दवा की इस दुकान पर पहले तो मिसेज सैमुअल खुद ही बैठतीं थीं पर बाद में जब कारोबार बढ़ा और मसूरी की सोशल सर्किल में उनकी व्यस्तता बढ़ी तो उन्हें एक सहायक की जरूरत पड़ी और तभी यह जेम्स नौकरी की तलाश में मसूरी आ पहुँचा। आजकल की तरह बेरोजगारी नहीं थी, जेम्स दुनिया घूमा था, मसूरी के प्रभु वर्ग में सब एक-दूसरे को जानते थे, इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि एक रविवार को प्रार्थना समाप्त होने के बाद जैसे ही उसने पादरी के सामने अपनी नौकरी की इच्छा रखी उसे मिसेज सैमुअल से मिलने की सलाह दी गयी। सलाह ही नहीं दी गयी बल्कि उसे वहीं मिला भी दिया गया। पादरी के सहायकों में से एक दौड़ा हुआ गया और प्रार्थना समाप्त कर चर्च के बाहर निकली ही थीं मिसेज सैमुअल कि उन्हें पादरी का संदेश देकर बुला लाया।

मिसेज सैमुअल और जेम्स चर्च से दुकान तक टहलते हुए आये और रास्ते में ही सारी शर्तें तय हो गयीं। उसी शाम जेम्स ने कारोबार सँभाल लिया। छोटी-सी दुकान थी। एलोपैथिक दवाएँ बिकतीं थीं, इसलिए शहर के गोरे और पास के लैण्डोर कैण्टोनमेंट के फौजी ही ग्राहक थे। ज्यादातर ग्राहकों को नाम से पुकारा जाता था। जेम्स ने भी हफ्ते-दस दिन में ज्यादातर के नाम याद कर लिए थे। इस दुकान पर जेम्स ने अपने जीवन के नौ वर्ष बिताये और यहीं से उसकी अंतिम यात्रा कब्रिस्तान के लिए रवाना हुई।

जैसा कि एक छोटे कस्बे में, जहाँ सिर्फ गर्मियों से बचने के लिए गोरी मेमें रहतीं थीं, थोड़ी- बहुत शिक्षण संस्थाएँ थीं और पास के लैण्डोर कस्बे में स्वास्थ्य लाभ कर रहे फौजी रह रहे थे, हो सकता था यहाँ भी हुआ। संध्याकालीन चाय पार्टियों और खच्चरों की पीठ पर चढ़कर पहुँचे जाने वाले पिकनिक स्थलों में चटखारों के साथ जेम्स और मिसेज सैमुअल के बीच पल-बढ़ रहे प्रेम प्रसंगों की चर्चा हुई। इस पूरे घटनाक्रम के लगभग सौ वर्षों बाद जब मैं मसूरी पहुँचा यह प्रसंग अफवाहों के रूप में अभी भी कहीं न कहीं जीवित था। सुन्दर सिंह थापा नाम के एक कुली ने, जिसकी उम्र उसके चेहरे की झुर्रियों में कहीं गुम हो गयी थी और जो अभी भी पचास साठ किलो का वजन अपनी पीठ पर रस्सी से बाँधे फुर्ती से ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों पर चढ़ सकता था, एक बार मेरा सामान एक चट्टान पर रखकर सुस्ताते हुए मुझे बताया था कि एक ऐसी अपराहृ चाय पार्टी में, जिसमें अठारह साल की उसकी नानी गोरी मेमों को चाय परोस रही थी, मिसेज सैमुअल ने अपने छलकते हुए आँसुओं को दबाकर मिसेज जेफरसन से जो कहा उसका मतलब था कि अच्छा ही हुआ जो उन्होंने जेम्स का प्रस्ताव अभी तक स्वीकार नहीं किया था अन्यथा ईश्वर उन्हें एक बार फिर विधवा बना देता। यह जेम्स की हत्या के बाद वाले सप्ताह का कोई दिन था।

दुकान के पिछले हिस्से में जेम्स रहता था। रोज ठीक दस बजे वह दुकान खोलता था, दोपहर बारह से दो तक लंच और आराम के लिए दुकान बंद करता और फिर दो बजे से अँधेरा होने तक दुकान खोले रहता। बंदी का समय मौसम के अनुसार घटता-बढ़ता रहता। हालाँकि मसूरी में उसकी मृत्यु के साल बिजली आ गयी थी, लेकिन बिजली का मतलब स्ट्रीट लाइट से था। एक खम्बा तो मिसेज सैमुअल की दुकान के ठीक सामने भी था पर अभी घरों या दुकानों में बिजली नहीं पहुँची थी और जेम्स को अँधेरा होने के बाद लालटेन की रोशनी में काम करना पड़ता था। जब तक कोई ग्राहक दुकान की साँकल पीटकर रात में ही दवा खरीदने की जिद नहीं करता वह अँधेरा होने के बाद दुकान नहीं खोलता था।

शाम होते-होते जेम्स की व्यस्तता और बढ़ जाती थी। लैण्डोर के फौजियों के बीच वह बहुत लोकप्रिय था। शाम ढलते ही उसके यहाँ फौजियों का जमावड़ा लग जाता। फौजी अपने साथ शराब और अलग-अलग तरह का गोश्त लाते थे। इनमें एलन भी था जो दक्ष शिकारी था और जिसके मारे गये खरगोश, तीतर या हिरन अक्सर जेम्स के यहाँ पकते। फौजी ताश खेलते, गोश्त खाते और नाइट रोल कॉल के पहले अपनी-अपनी बैरकों की तरफ भागते। जेम्स में उनके लिए एक दूसरा आकर्षण भी था। वह फौजियों को कर्ज देता था। ज्यादातर फौजी जुआ खेलते थे। शराब और जूआ उनकी एकरस जिन्दगी के सबसे बड़े सहारे थे।

ये सभी बीमार लोग थे जो स्वास्थ्य लाभ के लिए लैण्डोर छावनी में लाये गये थे। सुबह एक बार वे पी.टी. के लिए फालिन होते थे फिर दिन भर अमूमन उन्हें कोई नहीं पूछता था। अफसरों का दिन अस्पताल और डाक्टरों के चक्कर में बीतता था, इसलिए रात की रोलकॉल के पहले अमूमन उन्हें कोई नहीं पूछता था। इन्हीं फौजियों को जेम्स कर्ज देता था। तीन रुपया सैकड़ा, महीना। ब्याज की यह पद्धति जेम्स ने भारत में आकर यहाँ के साहूकारों से सीखी थी। जुए और शराब में रुपया गँवाकर फौजी उससे कर्ज लेते और अपने घरों को पैसा भेजते। तनख्वाह मिलते ही जेम्स का कर्ज चुकाते और दूसरा हफ्ता खत्म होते-होते फिर कर्ज ले लेते। वह फौजियों की लायी शराब पीता और वसूले गये ब्याज के पैसे मिसेज सैमुअल के पास जमा करके एक सपना बुनता। वह देखता कि बुढ़ापे में वापस बर्मिंघम चला गया है और एक लम्बे फार्म हाउस का मालिक बनकर ठाठ से घोड़े पर सवार अपने गायों और भेड़ों के झुण्ड को तृप्त आँखों से निहार रहा है। जाहिर है कि उसका यह सपना उसके भय और दर्द की पछाड़ें मारती लहरें समेटे अधमुँदी आँखों के साथ मसूरी के गोरा कब्रिस्तान में दफन हो गया।

"तो कब जा रहे हो मसूरी?" संपादक ने कथा का प्रवाह बीच में रोककर टोका तो मैं अचकचा गया।

"भूत से पूछ कर बताऊँगा।" अनजाने में मेरे मुँह से निकला।

"भूत से!" संपादक के चेहरे पर बेचैनी थी।

"मेरा एक दोस्त है, उसे मैं भूत कहता हूँ।" मैंने बात टाली।

संपादक के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी -

"भाई, तुम भी खूब हो। हिल स्टेशन पर जाने का फैसला बीवी की जगह दोस्त से पूछ कर करते हो।"

वह अपनी कुटिल मुद्रा में वापस लौट रहा था। मैं जानता था कि वह कुछ न कुछ ऐसा कहेगा जो मुझे आहत करे। मैंने उसे इसका मौका नहीं दिया। पूरी कहानी सुने बिना मैं उठ खड़ा हुआ।

"मैं एक-दो दिन में बताऊँगा।"

"बताना क्या है... जाना तो तुम्हें ही है...।"

मैं अंदर से जल-भुन गया लेकिन बिना कुछ जवाब दिये बाहर निकल आया। उससे कुछ कहने का मतलब था उसे नमक-मिर्च लगाकर मालिकों से अपनी शिकायत करने का मौका देना।

उन दिनों मेरी एक फ्रांसीसी भूत से खूब छन रही थी। मेरा यह दोस्त निकोलस फ्रांसीसी क्रांति में राजा के खिलाफ लड़ा था। उसका दावा था कि मेरी अल्लायेनेत की गर्दन जिस गिलेटिन पर कटी थी उसे चलाने वाला वही था। इस भूत से मेरी मुलाकात बडी दिलचस्प परिस्थितियों में हुई थी। मैं इस बीच फ्रांसीसी इतिहास पढ़ रहा था। 1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के बारे में पढ़ते-पढ़ते अचानक एक रात यह भूत किताब में छपी अपनी तस्वीर से बाहर निकल आया।

मुझे इतिहास के पन्नों में छिपी गाथाएँ हमेशा आकर्षित करती रही हैं और इसीलिए ऐसे भूतों से मेरी दोस्ती भी जल्दी और गाढ़ी हो जाती है जो मुझे इतिहास कथाएँ सुनाते हैं। इतिहास में भी असफल क्रांतियों में मेरी विशेष दिलचस्पी रही है। मेरा मानना है कि सफल क्रांतियाँ अंतत: अपने नायकों के खुदगर्ज, अहकांरी और भ्रष्ट हो जाने की गाथा बन कर रह जाती हैं जब कि असफल क्रांतियाँ शायद अपनी असफलता में उस आदर्शवाद की कसक छिपाए होती हैं जिनके चलते हजारों-लाखों लोग फाँसी के फंदों पर झूल जाते हैं। यही बात मुझे उनकी तरफ आकर्षित करती है। फ्रांस की यह क्रांति तो बाद की सभी क्रांतियों की माँ कही जाती है, इसलिए इसके किस्से मुझे और भी आनन्द देते हैं।

एक दिन लेटे--लेटे मैं इस क्रान्ति के नायकों-प्रतिनायकों की तस्वीरें देख रहा था। बड़े-बड़े गलमुच्छों, फ्राक कोटों और ब्रीचेज पहने लांग बूट डाटे अहंकार से मदमस्त सिपाही और उनके नायक। काले रंग के स्वर्णाभूषण जड़ित जैकेट और प्लम हैट धारण किये हुए सामंत और प्लेन ब्लैक में मध्य वर्ग, जिनके सर पर बिना किसी अधिकार चिह्न वाला हैट दिख रहा था। इन सबसे अलग लियों और पेरिस की सड़कों पर "रोटी-रोटी" की पुकार लगाते गैंती, फावड़ों और छुरों के साथ तेज रफ्तार से हवा में मुट्ठियाँ लहराते चलते किसानों के ठट्ठ के ठट्ठ। सब कुछ इतना सम्मोहक था कि मैं पिछले कई दिनों से इन सबमें उलझा हुआ था।

मुझे इन सबमें से एक ऐसे भूत की तलाश थी जो तस्वीरों से बाहर निकल कर आये और मुझे अपने समय की गाथा सुना सके। भूतों को बुलाने का मेरा अपना तरीका है। आपने प्लैंचेट से भूतों को बुलाने का आहृवान करते लोगों को देखा होगा, ओझों-सोखाओं को भूत नचाते भी देखा-सुना होगा। पर मेरा तरीका इन सबसे भिन्न है।

दरअसल मेरी भूतों से इतनी जल्दी दोस्ती हो जाती है कि आपको सुनकर आश्चर्य होगा। मुझे बस किसी चीज को पूरे मन से ध्यान लगाकर याद करने की जरूरत पड़ती है और उसका भूत मेरे सामने हाजिर हो जाता है।

अब आप अगर इस तरह के सवाल पूछें कि क्या भूत इतने सहज उपलब्ध हैं या हर मनुष्य मरने के बाद भूत बन जाता है क्या या दूसरे क्यों नहीं इतनी आसानी से भूतों का सान्निध्य हासिल कर पाते हैं तो जाहिर है कि मैं आपको कोई बहुत आश्वस्तिकारक उत्तर नहीं दे पाऊँगा। मेरा मानना यही है कि आप भी यदि निश्छल मन से भूत की संगत माँगें और आप भी मेरी तरह उसके अस्तित्व में यकीन न रखते हों तो आपको भी भूत की दोस्ती सहज उपलब्ध हो सकती है।

मेरा यह दोस्त निकोलस फ्रांस के उन हजारों दीन-हीन किसानों में से एक था जिनकी ठठरियों की नींव पर फ्रांसीसी क्रान्ति खड़ी हुई थी। जमीन के छोटे-से टुकड़े का मालिक निकोलस का बचपन अपने बाप को भूमि कर, धर्म कर और नमक कर अदा करते हुए देखते बीता था। इन करों के अलावा जमींदार की लड़की की शादी, बपतिस्मा या किसी बड़ी दावत के लिए भी उससे वसूली की जाती थी। बेगार अलग से। जमींदार के कारिन्दे भी अपने हिस्से की लूट-पाट करते थे। कहावत थी कि सामंत लड़ता है, पादरी पूजा करता है और सामान्य जन कर देता है।

ऐसे मुश्किल वक्त में वही हुआ जो होना चाहिए था। किसानों के सब्र का बाँध जब टूटा तो वे गोदामों और कारखानों पर टूट पड़े। उन्होंने अनाज के बोरे लूट लिए, मशीनें तोड़ दीं और जहाँ बन पड़ा सामंतों के सर काट दिये। लियों में ऐसी ही एक भीड़ 1786 की हाड़ कँपाती सर्दियों में "रोटी-रोटी" चिल्लाती हुई गलियों में पगलायी घूम रही थी जब राजा की जर्मन और स्विस पलटनों से उसकी मुठभेड़ हो गयी। निकोलस को अब भी अच्छी तरह से याद नहीं कि उनमें कितने मरे और कितने जख्मी हुए थे। उसे सिर्फ इतना याद था कि उसके सर पर बन्दूक का एक कुंदा पड़ा था और उसे जब होश आया तो वह एक ऐसी अँधेरी, सीलन और बदबूदार तंग कोठरी में था जहाँ से उसे 14 जुलाई 1789 को ही मुक्ति मिली। यही वह कोठरी थी जहाँ मेरी निकोलस से पहली मुलाकात हुई थी।

हुआ कुछ ऐसा कि मैं फ्रांसीसी क्रान्ति पर एक ऐसी किताब पढ़ रहा था जिसमें बहुत-सी तस्वीरें थीं। इसमें एक पूरा अध्याय 14 जुलाई 1789 को बास्तीय के किले पर मजदूरों, किसानों और छोटे किरानियों के हमले पर था। बास्तीय पेरिस से थोडी दूर एक छोटा-सा किला था जो वर्षों से खूँखार कैदियों को रखने के काम आ रहा था। इस समय स्वतंत्रता और समानता का नारा लगाते हुए "रोटी-रोटी" चिल्लाते किसानों से खतरनाक कौन हो सकता था? मेरी जब निकोलस से मुलाकात हुई, किले का कमाण्डर द लोने मारा जा चुका था।, राजा के शस्त्रागार से लूटे गये शस्त्रों और अपने विशाल संख्याबल से जनता राजा के सिपाहियों के शस्त्र रखवा चुकी थी और वह शोर मचाती हुई, मशालों की रोशनी में किले के छोटे-छोटे तहखानों, कोटरों की तलाशी ले रही थी।

मेरी नजर हड्डियों की ऐसी ठठरी पर पड़ी जो सीधे खड़ी नहीं हो पा रही थी और जिसे कई लोग सहारा देकर चला रहे थे। उसने अपनी आँखें ढाँप रखी थीं। ऐसा लग रहा था कि मशाल से पड़ने वाली रोशनी से उसकी आँखें चकाचौंध हो रहीं थीं। उसमें कुछ ऐसा था जिसने मुझे यकबारगी उसकी तरफ आकर्षित किया। मैं टकटकी लगाकर उसे देखता रहा और जैसा कि ऐसे मौकों पर होता था वह मेरा दोस्त बन गया। उससे मेरा मतलब उसके भूत से था।

निकोलस के भूत ने मुझे बताया कि बास्तीय के नर्क में उस जैसे बहुत-से लोग थे जो बरसों से अँधेरी तंग कोठरियों में बंद थे। वे चलना-फिरना भूल चुके थे और उनकी आँखें अँधेरे की ही अभ्यस्त हो चुकीं थीं। इसलिए जब क्रान्तिकारी जनता ने उन्हें आजाद कराया तो उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने में दिक्कत हुई और जरा-सी रोशनी से उनकी आँखें चौंधियाने लगती थीं।

निकोलस ने मुझे बहुत कुछ बताया। फ्रांसीसी क्रान्ति के तमाम नायकों से मेरी मुलाकातें करायीं। जिन लोगों से मैं मिला उनमें रूसो, मान्टेस्क्यू और वाल्तेयर थे, लुई सोलहवाँ और मारी आंतुआनेत थे, तूर्जो, नेकर और मिराबो थे, इतिहास की एक से एक शख्शियतें थीं जिन्होंने अगले दो सौ सालों तक मनुष्यता के इतिहास को प्रभावित किया था। उसने उन युद्धों, षड्यंत्रों, जन सैलाबों से मुझे परिचित कराया जिनका असर सिर्फ उस समय के फ्रांसीसी समाज पर ही नहीं पड़ा बल्कि पूरी दुनिया जिनके प्रभाव से वर्षों थरथराती रही।

आजकल वह मारी आंतुआनेत के बारे में बता रहा था। मारी आंतुआनेत - वही दंभी कुटिल रानी जिसने अपने सौंदर्य और षड्यंत्रों के बल पर राजा को बेबस कर दिया था और जिसका यह कथन कि अगर लोगों को रोटी नहीं मिल रही तो केक क्यों नहीं खाते - जनता के गाल पर तमाचे की तरह पड़ा तो लेकिन उसने मुकुट राजा का गिराया। उसने रस ले-लेकर मारी के बारे में महल में प्रचलित कहानियाँ सुनायीं। वह प्रसंग भी हँस-हँस कर सुनाता रहा जिसमें महल के कुछ दुष्ट षड्यंत्रकारी सामंतों ने एक धूर्त पादरी को मारी आंतुआनेत को एक मँहगी भेंट देने के लिए उकसाया और फिर भेंट लेती रानी को पकड़वा दिया। रानी की कामुकता को लेकर महल और उसके चारों तरफ फैले वर्साय शहर में जो गीत दबे स्वर में गाये जाते थे, वे भी उसने सुनाये।

अब वह मारी को गिलोटिन पर चढ़ाये जाने की कथा सुनाने वाला था और इसे लेकर बहुत उत्तेजित था। अन्य कथाओं के बीच-बीच में वह किसी मँजे कथावाचक की तरह यह सूचना देता रहता था कि अभी तो मुझे उसने सिर्फ ट्रेलर दिखाया है। असली कथा तो अब आयेगी। उसने मेरे अंदर यह जानने की उत्कट इच्छा पैदा कर दी थी कि कैसे एक अधखाया अधनंगा किसान क्रान्ति की लड़ाई में सिपाही बन बैठा और कैसे उसने एक कड़ी प्रतियोगिता में दूसरे सिपाहियों को पछाड़ते हुए मारी आंतुआनेत की गर्दन गिलोटिन पर काटने का सम्मान हासिल कर लिया।

"क्या मैं इस दिलचस्प गाथा से वंचित रह जाऊँगा?"

मैंने दफ्तर में बैठे-बैठे सोचा कि अगर मैं मसूरी चला गया और किसी दूसरे गंभीर प्रोजेक्ट में लग गया तो इस कथा का क्या होगा? हालाँकि मेरा पुराना अनुभव कहता था कि भूत समय का व्यतिक्रम नहीं मानते और किसी भी कथा के सूत्र कहीं भी छोड़कर कभी भी उठा सकते हैं। वे इतने पटु किस्सागो होते हैं कि आपको पता भी नहीं चलता और कहानी अपनी पुरानी रफ्तार से चलने लगती है। इसके बावजूद मेरा अनुभव यह भी था कि कई मामलों में एक बार साथ छूटने के बाद फिर वे पकड़ में नहीं आते। अगर ऐसा इस भूत के साथ भी हुआ तो मैं फ्रांसीसी क्रांति की इस अद्भुत कथा से वंचित रह जाऊँगा।

मैं कर भी क्या सकता था? यह तय था कि दुष्ट सम्पादक मुझे मसूरी भेज कर ही मानेगा। मैंने सब कुछ भूत के ऊपर ही छोड़ने की ठानी और अपने काम में डूब गया। घर लौटकर रात में जब मेरी मुलाकात भूत से हुई और उसने कहानी आगे बढ़ायी तो मैं इसी उलझन में था।

कहानी सुनाते-सुनाते अचानक भूत ठिठका। उसका स्वर कुछ धीमा हुआ और उसने पूछा -

"क्या हुआ दोस्त? कुछ अनमने लग रहे हो?"

मैं समझ गया कि वह क्षण आ गया है जब मैं उससे अपनी समस्या के बारे में प्रश्न कर सकता था।

"देखो, मुझे गलत मत समझना। मुझे तुम्हारी बातों में बड़ा मजा आ रहा है। अब तो कहानी का वह क्षण आने वाला है जिसका मैं इतने दिनों से इन्तजार कर रहा था। रोटी माँगने पर केक खिलाने वाली रानी की गर्दन कटती और उसे तुम काटते। मजा आ जाता। पर दोस्त, मुझे कुछ दिनों के लिए बाहर जाना है। शहर से बाहर। क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ दिनों के लिए तुम इस कथा को यहीं रोक दो? लौटने के बाद फिर यहीं से शुरू करेंगे।"

मैंने देखा कि भूत का चेहरा लटक गया। बात सँभालने के लिए मैंने कहा -

"या ऐसा करते हैं कि तुम भी साथ चलो। हिल स्टेशन चलेंगे। तुम्हारा साथ रहेगा तो और मजा आयेगा। रास्ते में कहानी भी चलती रहेगी।"

भूत को बच्चों की तरह बहलाया-फुसलाया नहीं जा सकता। मेरा दोस्त भी कोई अपवाद नहीं था। यह उसकी भलमनसाहत ही थी कि उसने सख्ती से कुछ नहीं कहा पर नर्मी से जो कुछ कहा उसका मतलब यह था कि कल किसने देखा है। कल का भरोसा उसने जीवित रहते नहीं किया तो अब भूत योनि में जाने के बाद क्यों करेगा? रही बात बाहर जाने की, तो भूत बाहर सिर्फ विश्वासी लोगों के साथ ही जाते हैं। मेरे जैसे आदमी का क्या भरोसा जिसे भूतों के अस्तित्व पर ही विश्वास नहीं है। मुझे पहाड़ों पर कोई दूसरा भूत मिल जाएगा तो मैं उसकी दोस्ती में रम जाऊँगा और उसे भूल जाऊँगा। इससे अच्छा है कि वह यहीं रह जाए और अगर मेरे लौटने तक उसे कोई दूसरा श्रोता नहीं मिला या मेरी उससे दोस्ती की इच्छा बरकरार रही तो फिर मिलेंगे। तब तक के लिए बाय-बाय, टा-टा।

मुझे अफसोस हुआ कि मैंने उसे बताने में जल्दी क्यों कर दी - अभी तो मसूरी के लिए निकलने में पूरे अड़तालीस घन्टे बाकी थे। तब तक उससे इस दिलचस्प कथा के अगले हिस्से सुने जा सकते थे। हालाँकि वह कातता बहुत था और कहानियों से कहानियाँ गढ़ता था पर क्या पता वह इन अड़तालीस घंटों में उस बिन्दु तक पहुँच ही जाता जिसका मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा था - यानी रानी मारी आंतुआनेत की गिलेटिन पर कटती हुई गर्दन और दर्प, विस्मय तथा भय से भरी आँखों वाला कटा सर, गिलेटिन के सामने छटपटाकर शांत होता धड़, गिलेटिन के पीछे और गिलेटिन का लीवर हाथ में पकड़े हुए सिपाही में तब्दील एक किसान जो काम खत्म होने के सन्तोष के अलावा दुख और घृणा के साथ अपने माथे का पसीना पोंछ रहा है - इस दृश्य में मैं अपने दोस्त का दो सौ साल पुराना चेहरा देखना चाहता था। जिस तरह से वह कहानी बुनता था उसमें उम्मीद तो कम थी, पर क्या पता हम अगले अड़तालीस घंटों में वहाँ तक पहुँच ही जाते ।

बहरहाल अब किया ही क्या जा सकता था ?

शायद उसे मेरी बेवफाई की फितरत का सही अंदाज था। उसका शक सही था। पहाड़ पहुँचने के दो-एक दिनों के अंदर ही मेरी दोस्ती दो भूतों से हो गयी जिनमें एक स्त्री भूत थी और जैसा मैं ऊपर निवेदन कर चुका हूँ, मैं उसे भूतनी नहीं, भूत ही पुकारूँगा। मुलाकात के बाद मैं उसमें इतना रम गया कि अपने इस मित्र को लगभग भूल-सा गया।

इस भूत से मिलने की कथा भी बड़ी दिलचस्प है और बिना आपको सुनाये कहानी आगे नहीं बढ़ेगी।

मैं मई के पहले हफ्ते में मसूरी पहुँचा था और उस समय मसूरी भीड़ से पटी पड़ी थी। कंधे से कंधा छिल रहा था। टैक्सी से उतरते ही मेरा मूड ऑफ हो गया। इस भीड़ में काम क्या हो पायेगा ? मेरे हाथ में जो प्रोजेक्ट था उसके लिए सन्नाटा और एकाग्रता दोनों जरूरी थी। चलो दो-एक दिन घूम-घाम कर लौट जाएँगे, संपादक की बात भी रह जाएगी और कुछ तफरीह भी हो जाएगी, मैंने सोचा। अगली बार बड़े दिन की छुट्टियों में आऊँगा। बेटे की छुट्टियाँ होने के कारण बीवी भी आ सकेगी और सर्दियों में भीड़-भाड़ न होने के कारण मसूरी में काम करना भी आसान होगा।

मैंने कुली से सामान किसी होटल में ले चलने के लिए कहा। कुली मेरा सामान पीठ पर लादे कई होटलों में गया पर जगह कहीं नहीं थी। होटलों के रिसेप्शन पर बैठे लोग सीधे मुँह बात नहीं कर रहे थे। घुसते ही सर हिलाने लगते थे। काफी जद्दोजहद के बाद कुली मुझे इस खटारा-से होटल में लेकर आया जहाँ एक छोटे-से सीलन भरे कमरे में, जिसमें पहले से ही एक दूसरा मुसाफिर ठहरा हुआ था, मुझे एक चारपाई और सामान रखने भर की जगह मिल सकी ।

होटलों की तलाश में कई घंटे पैदल चलने ने मुझे इतना थका दिया था कि जैसे ही इस होटल में बिस्तर पर लेटने की संभावना दिखाई दी मैंने कमरे की सीलन और उसके साथ जुड़े बाथरूम की बदबू नजरअंदाज की, कमरे में मौजूद दूसरे बिस्तर पर बेसुध लेटे व्यक्ति पर उचटती हुई नजर डाली और खुद भी जिन कपड़ों में वहाँ तक पहुँचा था उन्हीं में अपने बिस्तर पर लुढ़क गया।

मुझे याद नहीं कि मैं कितनी देर सोया। जब उठा तो अजीब तरह का आलस बदन पर तारी था। मेरे सिर के ठीक सामने कमरे की बड़ी-सी खिड़की थी जिससे शहर की रोशनियाँ दिखाई दे रहीं थीं। मैं जब बिस्तर पर गिरा था तब सूरज डूबा नहीं था। इसका मतलब मैं कई घंटे सोता रहा था।

कमरे में नीम अँधेरा था। हल्के टिमटिमाते बल्ब की रोशनी में कुछ समय लगा यह देखने में कि कमरे के दूसरे बिस्तर पर कोई बैठा था।

"मैं आपके उठने का इंतजार कर रहा था। अपना सामान चेक कर लीजिए, मैं जा रहा हूँ।"

मैंने अनमने भाव से कमरे के उस कोने पर नजर दौड़ायी जहाँ सामान पटककर मैं बिस्तर पर लेटा था। मेरे दोनों सूटकेस और कपड़े का झोला वहीं पड़े थे।

मैंने औपचारिकता में पूछा - "आप मसूरी से जा रहे हैं?"

"मसूरी से नहीं, सिर्फ इस होटल से जा रहा हूँ।"

"कोई बेहतर जगह मिल गयी?"

मैंने सोचा कि मेरी तरह मसूरी में यह भी इस घटिया होटल में आ गया था और अब ठीक- ठाक जगह मिल जाने के कारण जा रहा है।

"अजी इतने पैसे में इससे अच्छा होटल कहाँ मिलेगा? जहाँ जा रहा हूँ वह भी ऐसा ही है। लेकिन वहाँ कमबख्त भूत से तो छुटकारा मिल जाएगा।"

"भूत से! यहाँ कोई भूत भी रहता है?" मैं खुशी से चिहुँका।

"हाँ जी, रात भर ससुरे ने सोने नहीं दिया। पूरी रात घोड़े की टाप सुनाई देती रही। मैं तो रात ही में भाग जाता पर कमबख्त होटल वाले ने नीचे से दरवाजा बन्द कर रखा था।"

"चलो अब मजा आयेगा।" मैंने उसकी घबराहट का आनन्द लेते हुए कहा।

"मजा आयेगा! आपको भूत से डर नहीं लगता?"

"डर! डर किस बात का? भूत तो मेरे दोस्त हैं।"

मेरे रूममेट का मुँह खुल गया था और वह आश्चर्य से मुझे परख रहा था। इस बीच उसने दोनों हाथों में अपना सामान उठा लिया था।

"भूत तुम्हारे दोस्त हैं?"

"दोस्त ! मैं तो खुद ही एक भूत हूँ।"

मेरे मुँह से निकल तो गया पर जिस तरह गिरते-पड़ते अपने सामान के साथ वह कमरे से भागा, उसे देखकर मुझे उस पर तरस भी आया और हँसी भी।

उसके निकल भागने के बाद मैं देर तक हँसता रहा। दरअसल ये लोग जो भूतों के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं, उनसे सिर्फ डर सकते हैं, मेरी तरह उनसे दोस्ती नहीं कर सकते।

कमरे में अकेले होते ही मैंने भूत की तलाश शुरू कर दी। कैसा है? कहाँ है? भूत योनि में कब से है ? तमाम प्रश्न थे जिनके उत्तर तलाशने थे। सबसे पहले तो यह जानना जरूरी था कि भूत है किसका ?

भूतों से मेरी दोस्ती तभी शुरू होती है जब कुछ बुनियादी सूचनाएँ मेरे पास हों। सूचनाएँ किसी किताब से हासिल हो सकतीं थी या फिर कोई किस्सागो दे सकता है। एक बार भूत की शक्ल-सूरत या जन्म-मृत्यु से परिचित होते ही फिर मुझे किसी तीसरे की जरूरत नहीं रह जाती है। फिर तो भूत होता है और मैं। भूत से अच्छा किस्सागो नहीं होता और मुझसे अच्छा श्रोता भी दुर्लभ है, लिहाजा दोस्ती और कहानी चल निकलती है।

इस भूत के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए मुझे देर तक इन्तजार नहीं करना पड़ा। पहला बेयरा जो कमरे में घुसा वही मेरी शंका समाधान के लिए पर्याप्त था।

"भाग गये साहब।" उसने कमरे के खाली बिस्तर की तरफ देखते हुए कहा।

"हाँ, किसी भूत का जिक्र कर रहे थे।"

मैंने उसके हाथ से चाय का प्याला ले लिया, "कहाँ है भूत?"

"अरे साहब, आप आराम से रहिए, कोई भूत-वूत नहीं है।"

"भूत नहीं है तो मैं क्या करूँगा रहकर। मैं तो भूत की वजह से ही आया था।"

"आप भूत से मिलने आये हैं, अखबार वाले हैं क्या?"

मेरे हाँ में सर हिलाने पर उसने ट्रे मेज पर रख दिया,

"अखबार वाले कभी-कभी आते हैं कप्तान साहब के बारे में जानकारी हासिल करने। इस होटल की खिड़कियों से मैंने देखा है कप्तान साहब को घोड़े पर सवार अपनी कोठी की बाहरी दीवार पर टप-टप की आवाज करते। मेरी तो फोटू भी उतार कर ले गये हैं कई बार। कई अखबारों में छपी भी। कल दिखाऊँगा आपको।" उसने गर्व से कहा।

इसके बाद काफी देर तक एक-दूसरे के धैर्य की परीक्षा ली गयी।

मैं बार-बार उससे इसरार करता रहा कि वह मुझे कप्तान साहब के भूत से मिलवा दे जिसका जिक्र अभी-अभी उसने किया था और वह हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर इसे टालता रहा।

"साहब सिर्फ उजाले पक्ष में आता है। आपको सात-आठ दिन बाद आना पड़ेगा तब आप उसे अपना घोड़ा टप-टप दौड़ाते हुए देख पायेंगे।"

"एक बार मुझसे दोस्ती हो जाएगी तो अँधेरी रातों में भी साहब आ जाएगा।"

"नहीं, अँधेरी रात में नहीं आयेगा।"

"फिर कल इस कमरे में उसके घोड़ों की टाप कैसे सुनाई देती रही कि बेचारा भला आदमी भाग गया।"

"अरे ये तो डर गये थे। किसी से सुन लिया था कि यहाँ भूत आता है तो खिड़की-दरवाजे बन्द करके सोये। सपने में टप-टप सुन कर डर गये होंगे। साहब तो उजाले पक्ष में ही आता है। खास तौर से पूरे चाँद की रात आप को घोड़ा दौड़ाता दिखेगा।"

"अरे भाई, मेरे पास तो भूत कभी भी आ सकते हैं।"

इस तरह के कुछ वाक्यों के आदान-प्रदान से मैं समझ गया कि भूत से ज्यादा कठिन इस बेयरे से निपटना है। पहाड़ों पर भी अर्थशास्त्र पहुँच गया था, खास तौर से मसूरी जैसे हिल स्टेशनों पर तो सिर्फ अर्थशास्त्र ही बचा था।

भूत के बारे में जानकारी फोकट में नहीं मिलेगी - यह स्पष्ट हो गया।

मैंने बेयरे को अपनी शाम के लिए एक बोतल रम लाने को कहा और उसे इतना पैसा दिया जिसमें दो बोतलें आ सकें और बिना किसी लाग-लपेट के यह बता दिया कि दूसरी बोतल उसके लिए है। इसके बाद चीजें आसान हो गयीं। वह मुझे कमरे की खिड़की के पास ले गया और उससे बाहर झाँकते हुए थोड़ी दूर पर स्थित एक विशाल हवेली की तरफ इशारा किया। शहर चारों तरफ बिजली के लट्टुओं की रोशनियों से जगमगा रहा था। इन रोशनियों के बीच खण्डहर में तब्दील होती यह हवेली किसी बीमार की तरह पीली और उदास लग रही थी।

मैं समझ गया कि दूसरे भूतों की तरह यह भूत भी खण्डहरों का शौकीन है। पता नहीं ये भूत खण्डहरों को ही क्यों पसंद करते हैं? वे चाहें तो आलीशान मकानों को भी अपना डेरा बना सकते हैं। वे चाहें तो क्या नहीं कर सकते पर शायद वे मानते हैं कि दुनिया में रहने वाले जीवित लोगों को अच्छे मकानों की ज्यादा जरूरत है। उनके लिए क्या फर्क पड़ता है - किसी खण्डहर के कोने-अँतरे में लटके रह सकते हैं।

दूसरों की सुख-सुविधा के लिए खुद को आराम से वंचित रखना कोई भूत से सीखे!

इस विशाल हवेली, जो इस समय मुकदमेबाजी से पस्त है, के बड़े-से फाटक पर एक पत्थर लगा है जिस पर उसके बनाने वाले ने बड़े प्रेम से एक इटैलियन संगमरमर पर इमारत का नाम खुदवाया था। डेढ़ सौ सालों की गर्द-गुबार चढ़ने के बाद भी अगर थोड़ा-सा खुरचा जाए तो अभी भी इस नाम को साफ-साफ पढ़ा जा सकता है। बेयरे ने मकान के नाम का जो उच्चारण किया वह मेरे पल्ले नहीं पड़ा। मैं सिर्फ इतना ही समझ पाया कि कोई विदेशी नाम है और बेयरा उसका गढ़वाली संस्करण पेश कर रहा है। मैं बहुत परेशान इसलिए नहीं हुआ कि सही नाम तो भूत बता ही देगा।

भूत के नाम का भी गढ़वालीकरण हो गया था। यह समझने में थोड़ा वक्त लगा कि जिन सज्जन को वह कप्तान साहब कह रहा था वह अँग्रेजी फौज के कैप्टन थे। आज के कैप्टन नहीं जहाँ तक पहुँचने में इस समय हिन्दुस्तानी फौज के अफसरों को चार-पाँच साल लगते हैं, उस जमाने के कैप्टन - जब इस पद पर ज्यादातर अफसर अपनी उम्र की ढलान पर पहुँचते थे।

जिस भूत को वह कप्तान जंग का भूत कह रहा था वह तो मुझे उससे मुलाकात के बाद पता चला कि वह कैप्टेन यंग नामक आइरिश अफसर का भूत था और जो अपने गोरखा सिपाहियों के बीच इतना लोकप्रिय था कि उसके सिपाही उसे यंग की जगह जंग और जंग से भी ज्यादा जंग बहादुर कह कर पुकारते थे और जो लड़ाई के मैदान में उनसे तेज आवाज में "आयो आयो रे गुरखाली" का रणघोष करता था और जो विजया दशमी के दिन अपनी खुखरी से उनसे अधिक प्रवीण तरीके से भैंसे की मोटी गरदन एक बार में उड़ा देता था। यह तीसरी गुरखा पलटन थी जिसे अंग्रेजों ने खड़ा किया था और जिसकी पहली कमान कैप्टन यंग ने सँभाली थी।

मैंने बाजार से रम लेकर लौटे बेयरे से कैप्टन यंग का कोई फोटो दिखाने के लिए कहा। बेयरा काफी देर तक घूम-घाम कर असफल लौट आया। चूँकि बिना पूरे हुलिए की जानकारी के किसी भूत से मेरी दोस्ती नहीं हो पाती, इसलिए यह बहुत जरूरी था कि मैं उसकी शक्ल-सूरत से वाकिफ होऊँ। मैंने चौकीदार से कैप्टन यंग के चेहरे-मोहरे की जानकारी देने को कहा क्योंकि उसने शुरू में ही दावा किया था कि वह हर चाँदनी रात में सरपट घोड़ा दौड़ाते हुए यंग के भूत को देखता है, पर अपने खौफजदा चेहरे और आंतकित आँखों से उसने सिर्फ इतना ही कहा कि काला लबादा ओढ़े भूत को ऊँचे घोड़े पर सवार टप-टप दौड़ते हुए उसने हमेशा पीछे से देखा है, सामने से भूत को देखने की ताब किसमें है?

भूत अपनी जीवित अवस्था में कैसा था इसे जानने का एक ही तरीका था कि शहर के इतिहास पर लिखी गयी कोई ऐसी किताब हाथ लगती जिसमें कैप्टन यंग की तस्वीर हो। मैं फौरन बिस्तर से उठ खड़ा हुआ।

"साथ में सोडा लेंगे या सिर्फ पानी लगाऊँ?"

"आस-पास कोई किताबों की दुकान है?"

बेयरे ने अचकचा कर मुझे देखा। शराब और किताब में क्या सम्बन्ध हो सकता है, उसकी समझ में नहीं आया।

"किताब की कोई दुकान खुली होगी इस समय?"

मैंने उतावली से पूछा।

आठ बज रहे थे और मई का महीना होने के बावजूद दोपहर बाद हुई बारिश से खासी ठण्ड थी और इस बात की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि मसूरी में इस समय कोई दुकान खुली होगी, पर मैं बाहर निकल आया।

मेरा होटल जहाँ था वह जगह मुख्य सड़क से थोड़ा हटकर थी। एक पतली-सी गली आगे चलकर सड़क से मिलती थी। मैं बाहर निकला तो गली एकदम सुनसान थी। तेज हवाओं में ठंडी नमी घुली हुई थी जो थपेड़ों की तरह मेरे चेहरे से टकरा रही थी और एक बार तो मेरे मन में आया कि वापस अपने कमरे में भाग जाऊँ लेकिन भूत से मिलने की उत्तेजना ने मुझे बाहर दूर तक चलने के लिए प्रेरित किया।

मेरा पुराना अनुभव है कि जब मैं किसी भूत से मिलने को मन से उत्सुक होता हूँ तो भूत मेरी मदद करते हैं। यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ। निर्जन माल रोड पर जब कुहरा बूँद-बूँद कर ठण्ड की शक्ल में टपक रहा हो और जब स्ट्रीट लाइट से झरने वाले प्रकाश की किरणें सड़क से तीन-चार फुट ऊपर ही टँग कर रह जा रही हों और निर्जन बन्द शटरों वाले बाजार में आपको दूर-दूर तक कोई न दीख रहा हो, उसी समय अगर दूर एक दुकान पर कोई बूढ़ा आदमी अपनी दुकान का शटर गिराता-सा दिखे तब आप क्या सोचेंगे? यही न कि कोई आपके ही इन्तजार में था और ऐसा नहीं कि वह निराश होकर जा रहा है, वह तो सिर्फ बाहर सड़क पर खड़ा होकर शटर गिराने का अभिनय कर रहा है ताकि आप उस आदम न आदमजात बाजार में भी उसे देख लें और कहीं दूर से ही वापस न लौट जायँ। जाहिर है कि ऐसी दुकान उसी चीज की होगी जिसकी आपको तलाश है। इस दुकानदार ने कोई सपना नहीं देखा होगा कि आप उसे ढूँढ़ते हुए ऐसे एकांत समय में उसके पास आयेगे। निश्चित रूप से आपके मित्र भूत ने ही उसे यह बताया होगा और प्रेरित किया होगा कि जब पूरा बाजार शटर गिरा कर सर्दियों की मार से बचने के लिए लिहाफ में दुबक जाए, यह बूढ़ा आदमी भूख और अपनी बुढ़िया की प्रतीक्षारत चिंतित आँखों की उपेक्षा कर अपनी दुकान में आखिरी ग्राहक के रूप में आपका इंतजार करे!

कम से कम मैं तो यही मानता हूँ। पिछले बहुत सारे अनुभवों की तरह यहाँ भी मैं गलत नहीं हो सकता।

मैं करीब पहुँचा तो बूढ़े ने ताले पर फिरती ऊँगलियाँ रोक दीं। उसके हाथ में कोई चाभी नहीं थी। साफ था कि वह शटर गिराकर ताला बन्द करने का अभिनय सिर्फ समय काटने के लिए कर रहा था। जैसे ही मैं उसकी तरफ मुड़ा उसने बिना कुछ कहे-सुने ताला शटर के छेद से बाहर निकाला और शटर ऊपर उठा दिया।

"बहुत देर कर दी।"

मैंने कोई जवाब नहीं दिया।

शायद बूढ़े को किसी जवाब का इन्तजार भी नहीं था। वह शटर उठाकर दुकान के अन्दर घुसा। अन्दर की बत्तियाँ जल रही थीं। जैसे कोई जानता था कि अभी फिर दुकान खुलेगी, कोई चीज बिकेगी और तब दुकान बढ़ा दी जाएगी।

मैं बूढ़े के पीछे-पीछे अंदर घुसा। बिना दुकान का बोर्ड देखे मैं यह जानता था कि यह किताबों की दुकान होगी और यह किताबों की ही दुकान थी।

बूढ़ा एक तरफ खड़ा हो गया और उदास नजरों से मुझे रैक में लगी किताबों पर दृष्टि दौड़ाते देखता रहा। काफी समृद्ध दुकान थी। साहित्य, कला, इतिहास और दर्शन शास्त्र जैसे खानों में बँटी हुई। मुझे पता था कि मेरा भूत किसी इतिहास की किताब में छुपा होगा। इसलिए मैं इतिहास वाली रैक के सामने जुट गया। काफी देर तक मैं अपने मतलब की किताब नहीं तलाश पाया और मैंने बूढ़े की तरफ यह जानने के लिए देखा कि वह मेरी उपस्थिति से छुटकारा तो नहीं पाना चाहता है। उसका चेहरा पहले की ही तरह निर्विकार था लेकिन उसके हाथों में एक मोटी जिल्ददार किताब थी जिसे इस बीच उसने न जाने कहाँ से निकाल लिया था। उसने किताब मेरी तरफ बढ़ायी।

मैंने किताब की कीमत चुकायी और बिना उसे उलटे-पुलटे बाहर निकल आया। मुझे पता था कि जिस भूत से मेरी मुलाकात होनी है वह इसी किताब में मौजूद है।

सड़क पर ठण्ड के कारण सन्नाटा तो था ही, अँधेरा भी कोहरे से लिपटा हुआ बूँद-बूँद कर पानी की शक्ल में टपक रहा था। रही-सही कसर सर्द हवा के थपेड़े पूरी कर रहे थे। इन सबसे बचने के लिए मैं लगभग दौड़ता हुआ अपने होटल में लौटा।

मैंने अपने कमरे में पहुँचते ही ओवरकोट उतारकर कुर्सी पर फेंका, अपने लिए एक बड़ा पैग बनाया और किताब लेकर रजाई में घुस गया।

किताब देहरादून के सैनिक इतिहास पर लिखी गयी थी। मैंने बेचैनी से उसके पन्ने पलटने शुरू किये और जल्दी ही मुझे अपनी बेचैनी का जवाब मिल गया। किताब के बीच में मोटे आठ पन्ने चित्रों से भरे थे और उनमें से तीसरे ही चित्र पर मेरी आँखें टिक गयीं।

पैंतीस-चालीस की पकी उम्र को छूती हुई एक गर्वीली काया, दोनों कानों के कुछ नीचे तक चौड़े गलमुच्छों और हल्के-से बाहर निकले पेट पर ब्रीचेज डाटे, घुटनों तक के लांग बूट के ऊपर फ्राक कोट और कमर से लटकी जमीन को छूती तलवार के साथ पूरे पृष्ठ पर टँकी हुई थी। नीचे बोल्ड में छपा था - कैप्टन यंग, तीसरी गोरखा रेजीमेण्ट के प्रथम कमाण्डेन्ट।

मैं काफी देर तक कैप्टन यंग की तस्वीर निहारता रहा। सब कुछ बड़ा ही भव्य और सम्मोहक था। तस्वीर थी ही ऐसी कि लगा बोल पड़ेगी। मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि बोलने को आतुर यह व्यक्ति भूत बन गया था। ऐसे व्यक्ति बोलने को आतुर होते ही हैं। कम से कम मेरा मानना यह है कि मेरी संगत में आते ही ऐसे लोग बोलने के लिए बेताब हो जाते हैं। वे भूत होते ही इसलिए हैं कि मेरे दोस्त बन जाऐं और दोस्त होते ही मुझसे बतियाने लगते हैं। उनके बोलने से ही मेरी कहानी आगे बढ़ती है।

गोरखा पलटनों का इतिहास पढ़ते हुए एक सैनिक इतिहासकार ने इस दिलचस्प विरोधाभास की तरफ मेरा ध्यान आकर्षित किया कि ब्रिटिश इन्डियन आर्मी का एक बड़ा हिस्सा उस नेपाल से आता था जिसके शासकों ने प्राणपण से प्रयास किया कि गोरों की परछाईं भी उसके भू-भाग और प्रजा के आसपास न फटक पाये। दुनिया के सैनिक इतिहास में शायद यह पहला उदाहरण है जहाँ पहले दो कौमों में घनघोर युद्ध लड़ा जाता है और फिर लड़ाई के फौरन बाद पराजित लड़ाके विजेता फौज के सबसे महत्वपूर्ण अंग बन जाते हैं। गुरखे 1815 में अपने बहादुर नायक अमर सिंह के नेतृत्व में जनरल आक्टरलोनी की अपने से कई गुना बडी फ़ौज से हारे जरूर पर उन्होंने अंग्रेजों से अपनी बहादुरी का लोहा मनवा लिया।

शुरू में जो चार गोरखा पलटनें खडीं हुईं उनमें से तीसरी पलटन को पहले कमाण्डेंट के तौर पर कैप्टन यंग मिला। ये सारी पलटनें लोकल इनफैंटरी कहलाती थी और वेतन तथा भत्तों में नियमित पलटनों से थोड़ा कमतर थीं।

कैप्टन यंग के भूत से मिलने के पहले जो तैयारी जरूरी थी वह मैंने अगले दो-तीन घंटों में पूरी की। बेयरे के बयान के मुताबिक आधी रात के आसपास घोड़े की टापों की आवाजें सुनाई देती हैं और तभी हिम्मत वालों को घोड़े पर सवार कैप्टन यंग का भूत दिखाई देता है। कमजोर दिल वाले होटल के कर्मचारी और मुसाफिर तो टापों की आवाजें सुनते ही अपने बिस्तरों में रजाई ओढ़ कर दुबक जाते हैं। गोरखा रेजिमेंट पर जो किताब मैं लाया था उसे अगले कुछ घंटों में मैंने खत्म कर दिया। गुरखों, कैप्टन यंग और उनकी तीसरी पलटन, जिसे सिरपूर बटालियन भी कहते थे, के बारे में मुझे इतनी जानकारी मिल गयी थी कि मुझे पूरा विश्वास था कि कैप्टन यंग से मेरी खूब छनेगी।

मेरा विश्वास सही साबित भी हुआ। मैंने लौटकर कमरे में ही अपना खाना मँगा लिया था और किताब शुरू करने के पहले अपना पहला पेग भी बना लिया था पर जब तक किताब खत्म हुई मेरा भोजन और पेय अनछुआ पड़ा रहा।

बेयरे के मुताबिक पूरे चाँद की रात बारह बजे के बाद मलिंगर नाम की इस कोठी के खण्डहरों की छत पर काले रंग के एक ऊँची काठी वाले घोड़े पर सवार जंग बहादुर का भूत दिखता है। यदि आप किसी खिड़की-दरवाजे के पीछे सटकर स्थिर खड़े हो जाएँ और ध्यान से देखें तो पहले काफी देर तक यह आकृति स्थिर खड़ी दिखती है। फिर किसी बेचैन आत्मा की तरह सवार अपने घोड़े को एड़ मारता है और मलिंगर की छतों, दीवारों, दालानों और खाली भरी जगहों पर घोड़ा और उसका सवार दौड़ते ही रहते हैं - दौड़ते ही रहते हैं। बेयरे का दावा था कि उसने खुद अपनी आँखों से हर पूर्णिमा को यह दृश्य देखा है। कई बार तो उसने देशी-विदेशी पत्रकारों को भी यह दृश्य दिखाया भी है। मसूरी की उस रात होटल के साधारण-से कमरे में मैं पूरी खिड़की खोले नीम अँधेरे में डूबी एक ऐसी इमारत को निहार रहा था जिसे डेढ़ सौ साल पहले आयरलैण्ड के मलिंगर नामक कस्बे से आये कैप्टन यंग ने बीस साल से अधिक समय तक अफगानिस्तान से लेकर कुमाऊँ और गढ़वाल की पहाड़ियों में लड़ते-लड़ते थक गये अपने शरीर को आराम देने के लिए बनवाया था। यह उन दिनों की बात है जब मसूरी अभी बस ही रही थी और मलिंगर उसकी पहली इमारतों में एक है। आज खंडहर हो चुकी इस इमारत को देखकर भी इसके भव्य अतीत का अनुमान लगाया जा सकता था। यंग को यह जगह इतनी पसन्द आयी कि उसने रिटायरमेंन्ट के बाद आयरलैण्ड वापस लौटने का इरादा छोड़ दिया और यहीं बस गया।

खुली खिड़कियों से ठंडी हवा के थपेड़े अन्दर आ रहे थे और बर्फानी सलाखों से सटा मेरा चेहरा सुन्न-सा हो रहा था। ठीक बारह बजे मुझे मलिंगर की छत पर एक आकृति उभरती-सी दिखी। अगर मुझे यंग का इंतजार न होता तो मैं उसे खण्डहरों का ही एक हिस्सा समझता। पर नहीं -- थोड़ी देर नजरें गड़ाते ही मुझे एक विशाल घोड़ा और उस पर बैठे बड़ी कद-काठी के सवार की आकृति साफ दिखने लगी। मैं जिस कुर्सी पर बैठा था उसे लगभग धकेलता हुआ बाहर भागा। पूरे होटल में सन्नाटा था। पहली मंजिल के सूने गलियारे को लगभग दौड़ते हुए पार कर सीढ़ियों से मैं नीचे उतरा। नीचे रिसेप्शन पर एक अधेड़-सा आदमी ऊँघ रहा था, उसके सामने सोफे पर एक बेयरा सोया पड़ा था और सर्दियों से बचने के लिए बाहर का दरवाजा पूरी तरह बन्द था। मेरे दरवाजा खोलने तक उन दोनों को पता नहीं चला पर जैसे ही मैंने सिटकनी गिरायी, खट् की आवाज ने दोनों को चैतन्य कर दिया। उनके प्रश्नों का उत्तर सिर्फ हाथों को हिलाते हुए देकर मैं कमरे के बाहर टपकती हुई नम बूँदों वाले ठण्डे कोहरे में समा गया।

"जय गोरख हूजूर।"

जैसे ही मैंने गोरखों का पारम्परिक अभिवादन किया, कैप्टन यंग जंग बहादुर बन गया और घोड़े से कूदकर मेरे सामने आ खड़ा हुआ। फिर शुरू हुईं लम्बी बातें - दूसरे भूतों की तरह यह भूत भी बातूनी था। फौजी था, इसलिए कड़क और सनक से भरपूर।

उसने कितनी बातें कीं। दुनिया-जहान की बातें। फौजियों की तरह ज्यादातर बातें युद्धों की, शूरमाओं की और युद्धस्थल पर बिछड़ने वाले अपने साथियों की। उसने मलाउन की पहाड़ियों पर जनरल आक्टरलोन के नेतृत्व में लड़े गये लोमहर्षक युद्ध के विवरण सुनाये जिसमें पहली बार गोरखों की बहादुरी के दृश्य उसने देखे थे और जो अब भी उसकी स्मृति में टँके हुए हैं। 1815 की शुरुआत में गोरखा जनरल अमर सिंह को हरा कर आक्टरलोन ने जो जंग जीती, उसने अँग्रेजों को गोरखा पलटनें खड़ी करने की प्रेरणा दी और कैप्टन यंग को इनमें से एक की कमान सँभालने का मौका दिया।

उस लड़ाई में कैप्टन यंग को जो जख्म लगे थे उन्हें वह अपनी कमान के गुरखों को प्रेम से दिखाता था और उन्हें अँग्रेजी में चुनिन्दा गालियाँ देता था। गुरखे कभी बुरा नहीं मानते थे, उन्हें पता था कि उनका कमांडिंग अफसर उन्हें बेटा सिर्फ औपचारिक सम्बोधन के रूप में नहीं कहता बल्कि सचमुच उन्हें अपने बेटे के रूप में मानता भी है। यंग उनके साथ मधु या छाँग पीता, झामरे नृत्य करता और दशहरे के मौके पर शर्त लगाकर बलि के लिए बनी विशेष खुखरी से भैंसे की गर्दन पर वार करता। अक्सर शर्त भी वही जीतता। बहुत कम ऐसा हुआ कि उसके एक वार से किसी भैंसे का सर कटकर जमीन पर न लोटने लगा हो। गोरखों से उनकी भाषा खासकुरी में धाराप्रवाह बातें करता हुआ, शस्त्र पूजा करता, भैंसे का प्रसाद ग्रहण करता या रणभूमि में "आयो रे गुरखाली" का उद्घोष करते हुए हमला करता यंग इतना अधिक गोरखा लगने लगा था कि उसके सिपाहियों ने उसका नाम भी गोरखा कर दिया था - पहले यंग बहादुर और फिर जंग बहादुर।

यही जंग बहादुर उर्फ कैप्टन यंग मुझे न जाने कितनी देर तक मसूरी और गोरखों के किस्से सुनाता रहा। उसने मजे ले-लेकर अपनी पत्नी के खीजने और लड़ने के किस्से सुनाये जब उसने मसूरी में बसने और कोठी बनाने का फैसला किया था। बड़ी मुश्किल से उसकी आइरिश बीवी यहाँ रहने को तैयार हुई। उस बेचारी ने तो यंग की वर्दी-पेटी टँगते ही आयरलैंड वापसी की योजना बना रखी थी। उसकी बात करते-करते यंग उदास हो गया। मिसेज यंग मसूरी रुकी तो जरूर पर अधिक दिन रही नहीं।

अक्सर जब यंग लम्बी घुड़सवारी या शिकार से लौटता, उसे कोठी के बाहर एक चट्टान पर उदास पश्चिम की तरफ टकटकी लगाये देखता। यंग को करीब आता देखकर वह फीकी-सी हँसी हँसती, उसका बढ़ा हाथ थामकर चट्टान से उतरती और अन्दर चली जाती। यंग का फौजी मन बहुत बाद में समझ पाया कि वह अन्दर ही अन्दर घुल रही थी। जब उसने पहली बार बिस्तर पकड़ा और यंग लैण्डोर से फौजी डाक्टर लेकर आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह बहुत दिन जी नहीं पायी। यंग को दुख है कि उसका गुस्सा अभी तक खत्म नहीं हुआ था और आज भी हर पूर्णिमा को यंग चिरौरी करता है, लेकिन वह भूत योनि में भी मलिंगर के खण्डहरों में आने को तैयार नहीं होती।

यंग को और भी बहुत से दुख थे। एक दुख तो ऐसा था जिससे मैंने हर जीवित फौजी को पीड़ित देखा है। पत्रकारिता के अपने अनुभवों से मैं कह सकता था कि फौजी सिविल शब्द का उच्चारण बड़े अपमान के साथ करते हैं। उनके लिए दुनिया की हर खराबी के लिए सिविल यानी असैनिक जिम्मेदार हैं। यंग भी दुख के साथ बयान करता रहा कि कैसे सिविलियनों ने मसूरी बरबाद कर दी। यहाँ तक कि लैण्डोर, जो उसके समय सिर्फ फौजी छावनी थी, भी अब कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गया है। हर तरफ गन्दगी हैं, पेड़ कट गये हैं और भीड़ में एकांत तलाशना मुश्किल हो गया है।

यंग को अब के फौजी अफसरों से भी शिकायत है। यंग को अपनी पलटन के एक-एक जवान का नाम याद था। उनके छुट्टी से लौटने पर उनका चेहरा देखकर वह बता सकता था कि उनके घर में क्या चल रहा था। आज अफसर अपने जवानों के सुख-दुख में शरीक नहीं होते। वे उन्हें बेटा सिर्फ औपचारिकता में कहते हैं। इसीलिए जवान भी अफसरों की कद्र नहीं करते। पुराने फौजी की तरह यंग शिकायतों का पिटारा खोलता रहा और मैं सुनता रहा... सुनता रहा। और मुमकिन था कि मेरे पेट में जो थोड़ी-बहुत शराब और खाना पहुँचा था वह अपना असर दिखाता और मैं सो जाता पर तभी यंग ने एक ऐसा नाम लिया जिसको सुनने की मुझे एकदम उम्मीद नहीं थी और जिसे सुनते ही मैं चैतन्य हो गया।

सार्जेंट मेजर एलन... जैसे ही कैप्टन यंग के मुँह से यह नाम निकला मैं सतर्क हो गया।

"सार्जेंट मेजर या करपोरल एलन?" मैं लगभग चीखा।

"तुम कैसे जानते हो एलन को?" यंग ने चौंक कर मेरी तरफ देखा।

"पहले यह बताओ कि सार्जेंट मेजर या कारपोरल?"

एलन का नाम यंग की शिकायतों में से निकला था। अपने बाद की पीढ़ी के फौजी अफसरों की शिकायत करते-करते यंग ने सार्जेंट मेजर एलन का नाम लिया जिसे उसके अफसरों ने उसके हाल पर छोड़ दिया था। मजाल थी कि ऐसी कोई घटना उसकी पलटन में होती, यंग आसमान न उठा लेता। पर एलन के अफसरों ने तो उसे सब कुछ अकेले ही भुगतने दिया।

"मुझे एलन के बारे में बताओ।" मैं चिरौरी पर उतर आया था।

"एलन का रैंक था तो कारपोरल ही। 14वीं लाइट कैवेलरी में भरती हुआ था। मेरी पलटन में तो दो सालों के लिए ही आया था और उसे लोकल प्रमोशन देकर सार्जेंट मेजर बना दिया गया था। तुम्हें पता नहीं कि उन दिनों पलटनों में कमाण्डेंट, एडजुटेंट, सार्जेंट मेजर और क्वार्टर मास्टर सार्जेंट यूरोपियन होते थे... ।"

मुझे पता था लेकिन मैंने भूत को टोका नहीं। युद्ध और सेनाओं के इतिहास में तो मुझे पहले से ही दिलचस्पी थी, फिर इस मामले में तो मैंने वैसे भी खूब तैयारी की थी। मुझे पता था कि हजार से ज्यादा की जनशक्ति वाली पलटनों में जिम्मेदारी के सारे ओहदे यरोपियन गोरों के पास ही रहते थे, पर मैंने उसे बोलने दिया।

चूँकि नेटिव भले जमादार या सूबेदार के ओहदे तक पहुँच जायें, उन्हें सार्जेंट मेजर या क्वार्टर मास्टर सार्जेंट नहीं बनाया जा सकता था, इसीलिए दूसरी पलटनों से यूरोपियन कारपोरल या लांस कारपोरल को लोकल प्रमोशन देकर दो-तीन साल के लिए किसी पलटन में इन पदों पर तैनात कर दिया जाता था। मेरी समझ में आ गया था, कारपोरल एलन भी 14वीं लाइट कैवेलरी से तीसरी गोरखा पलटन में इसी तरह आया होगा और फिर अपना समय काट कर वापस चला गया होगा।

"एलन मेरा अच्छा ओहदेदार था। सख्त और कड़क -- परेड ग्राउण्ड पर गोरखों का खून पी जाता था। शाम को उनके साथ शराब पीता था और खसकुरी में गाली-गलौज करता था। दो वर्षों में ही दक्ष हाथों से भैंसे की बलि देने लगा था। मैं परेड ग्राउण्ड के बाहर से उसे देखता तो मुझे अच्छा लगता था।"

"पर तब तुम कहाँ थे? तुम्हारे पेंशन जाने के बीसियों साल बाद एलन के पैर भारत की जमीन पर पड़े थे...।"

यंग ने तरस खाते हुए मुझे झिड़का -

"मैंने पलटन खड़ी की थी। पलटन आज भी मुझे अपना पिता समझती है। आज भी उनके अफसर मेस के डायनिंग हाल में सबसे बडी तस्वीर मेरी है। आज भी जंग के मैदान में लड़के "आयो रे गुरखाली" के साथ-साथ कप्तान जंग बहादुर की जय के नारे लगाते हैं। आज भी जब सुबह परेड ग्राउण्ड पर लड़के फालिन होते हैं मैं बाहर खड़ा होकर उन्हें निहारता रहता हूँ... ।"

कप्तान उत्तेजित हो गया था। मैं समझ गया कि चुप रहने में ही भलाई है।

काफी देर तक वह बकबक करता रहा। न जाने कितने अफसरों को उसने ब्लडी बास्टर्ड कहा, कितनों की तारीफ की, न जाने कितने युद्धों में मिली हार-जीत का विश्लेषण किया, कितनी बार बताया कि अगर उसके पास कमान होती तो किस लड़ाई में कौन-सी गलती नहीं होती और कैसे वह हार के जबड़ों से जीत खींच कर ले आता। मैं सुनता रहा और अपनी गलती पर पछताता रहा। भूत और खासकर फौजी भूत को कभी ऐसे नहीं टोकना चाहिए कि उसे लगे कि उस पर अविश्वास किया जा रहा है। एक ही चारा था कि उसे बोलने दिया जाये और बहला-फुसला कर वापस अपने मतलब पर ले आया जाये। मैंने यही किया और घुमा-फिरा कर उसे एलन तक ले आया। हालाँकि इसमें वक्त बहुत लग गया।

"तुम एलन को कैसे जानते हो?"

"मैंने एलन के बारे में पढ़ा है। मुझे लगता है कि इतना अच्छा इंसान हत्यारा नहीं हो सकता।"

"तुम्हें कैसे पता कि एलन अच्छा आदमी था?"

"जितना पढ़ा और आज जितना आपसे सुना उससे तो यही लगता है। आप भी तो यही कह रहे थे... । आपसे अच्छा पारखी कौन हो सकता है?"

मेरी चापलूसी से उसकी आवाज कुछ नर्म पड़ी।

"सही कहते हो। एलन जैसे मस्त मौला और बहादुर सिपाही किसी पलटन में कम ही होते हैं। तुम क्या पत्रकार हो? एलन के बारे में जानकर क्या करोगे?"

"मैं अपने अखबार में लिखूँगा। आपको क्या लगता है कि एलन ने सचमुच कत्ल किया होगा?"

"देखो, सौ साल बाद कुछ कहना बहुत मुश्किल है। कम से कम मेरे लिए तो कुछ भी कहना संभव नहीं है। पर मुझे लगता है कि मेरी पलटन के उस बहादुर सिपाही के साथ न्याय होना चाहिए। शायद तुम कर सको।"

"पर मैं शुरू कहाँ से करूँ? कोई तो ऐसा चाहिए जो मेरी मदद कर सके।"

"तुम पत्रकार हो - मेहनत तो तुम्हें ही करनी होगी। वह फिर उपदेश देने लगा। किसी दूसरे बूढ़े की तरह यह भूत भी नसीहतों से भरा था। वह देर तक आज के पत्रकारों की तुलना अपने समय के पत्रकारों से करता रहा। मुझे अहसास था कि उसे टोकने से कोई फायदा नहीं है। मैं चुपचाप सुनता रहा। शायद मेरे चेहरे की बेचारगी थी या फिर भूत को खुश करने के लिए मेरे द्वारा की गयी बेइंतहा चापलूसी, भूत पिघल ही गया।

"देखो, मैं खुद उत्सुक हूँ, यह जानने के लिए कि एलन हत्यारा था या नहीं। मैंने बहुत कोशिश की लेकिन सच्चाई जानना इतना आसान है क्या? चलो तुम कोशिश करो। तुम कामयाब होगे तो मुझे भी खुशी होगी। मैं देखता हूँ कि मैं क्या मदद कर सकता हूँ।"

उसके बाद कैप्टन यंग के भूत ने जिस मदद की बात की वह बहुत आशा तो नहीं पैदा कर रहा था, पर मेरे पास विकल्प भी क्या था? उसने मुझे एक ऐसे भूत से मिलवाने का वायदा किया जो 1909 में जीवित था और जिसके सीने में ऐसे कई राज दफन हैं जिन्हें कैप्टन यंग बहुत कोशिश करके भी नहीं उगलवा सका था। मैं भी कोशिश करके देख सकता हूँ।

वह लम्बी रात जब तक बीती तब तक मैं बुरी तरह थक गया था। अभी आसमान के पूरब में ह्ल्की लाली दिखी ही थी कि भूत की बेचैनी उसके चेहरे पर साफ छलकने लगी थी। मुझे पता था कि उजाला भूतों का दुश्मन होता है इसलिए मैंने एड़ लगाकर अपने घोड़े पर खण्डहरों को फँलागते और हवा में विलीन होते कैप्टन यंग के भूत को रोकने की कोशिश नहीं की।

मैं जब थका-मादा होटल के कमरे में पहुँचा तब मन में केवल एक इच्छा थी - बेसुध होकर बिस्तर पर गिर जाऊँ और नींद मुझे अपने आगोश में ले ले। पर इस नये भूत की दोस्ती ने मेरी यह छोटी-सी कामना पूरी नहीं होने दी। मेरे सिरहाने स्टूल पर एक डायरी रखी हुई थी। जब मैं गया था तो उस पर पानी का जग रखा था। लौटा तो जग गायब था और यह डायरी मौजूद थी। मैंने बिस्तर पर लेटे-लेटे उत्सुकता से डायरी खोली। पहला पेज पलटते ही मैं उछल पड़ा। 14 अगस्त 1910 की पहली प्रविष्टि ने ही मेरी नींद उड़ा दी। स्पष्ट था कि मेरी सहायता करने के लिए भूत यह डायरी वहाँ रख गया था। इतने अच्छे दोस्त तो सिर्फ भूत ही हो सकते हैं। हर कदम पर आपकी मदद को तत्पर।


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