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कविता

तुम क्या जानो...?
संदीप तिवारी


कितनी मेहनत,
खून-पसीना
आँसू-पीना
तुम क्या जानो
मई-जून की दुपहरिया
का कठिन महीना
तुम क्या जानो...?

सर्दी
पानी
घाम...
तुम क्या जानो
कौन-कौन सा
करता है
वह काम... तुम क्या जानो...?

उसका जीवन
लड़के-बच्चे
फीस-पढ़ाई
भूख-दवाई
शादी-गौना
तुम क्या जानो...?
दौड़ भाग
उसकी कठिनाई
तुम क्या जानो...?

माघ-पूस की विकट ठंड में
रात-रात भर
ठिठुर-ठिठुर कर
कोई पुराना कंबल ओढ़े
फसलों की वह करे सिंचाई
तुम क्या जानो पीर पराई
तुम क्या जानो...?
किस धागे से
कौन सुई से,
सिली जा रही फटी रजाई...
तुम क्या जानो?

गाय-भैंस का सानी-पानी
गोरु-बछरू खेती-बारी
तुम क्या जानो
किस स्थिति में?
उस किसान पर
कैसे-कैसे चढ़ी उधारी
तुम क्या जानो...?
इसी देश में रहने वाले
सबकी भूख मिटाने वाले
पेट काटकर जीने वाले
धँसे पेट और सीने वाले नंगी पीठ पसीने वाले
सदियों से बेहाल
तुम क्या जानो...!

उस किसान का हाल
तुम चीखो-चिल्लाओगे बस
अपना काम बनाओगे बस
नेता नहीं मदारी हो तुम
सबसे बड़े शिकारी हो तुम
तुम हो नमकहराम चोरों
तुमको नहीं मलाल चोरों...!


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