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कविता

झलुआ
संदीप तिवारी


बाँस का झलुआ बहुत बड़ा था
लंबा-चौड़ा,
जैसे कोई भयानक हाथी
जैसे-जैसे ऊपर जाता,
अरर-अरर आवाजें आतीं
उस पर बड़े लोग चढ़ते थे,
दीदी, भैया, चाचा-चाची
अम्मा, फुआ, पुरनकी भौजी
सब चढ़ते, और
गाते भी थे,
गाते-गाते कहाँ पहुँचते...?
मनि पर्वत तक!

छोटा था मैं,
आँख उठाकर देखा करता...
छूने से भी डर लगता था,
दिल कहता था...
काश! बिठाता मुझे भी कोई
काश! उड़ाता मुझे भी कोई
मुझको फुसलाने की खातिर
कई कहानी गढ़ी गई थीं,
फला गाँव में टूटा था जब
बाँस का झलुआ
हाथ-पैर तोड़ा था कलुआ
डर जाता था,
सरपट आगे बढ़ जाता था...
आगे मिलता था जो झलुआ
टायर का था,
इस झलुए पर बहुत भीड़ थी!
पेंगे पर जो खड़े हुए थे
अभी-अभी सब बड़े हुए थे
यहाँ झूलना और कठिन था...

अपना झलुआ पड़ा हुआ था
खपरैले में,
खपरैले की मोटी सिल्ली
जिसमें जकड़ी थी एक रस्सी
उस रस्सी के बीचो-बीच,
मोटा पीढ़ा फँसा हुआ था...
एक समय था...
इसी चौड़के पीढ़े पर
बाबा खाते थे,
एक समय था...
इसी रिटायर पीढ़े से
उड़ते-उड़ते ही,
जुआ खेलता था सपनों के,
सावन में ही नहीं,
साल भर झूल रहा था
कैसे-कैसे बड़ा हुआ
सब भूल रहा था
उसी समय ही...
कई जुआ मैं हार चुका था,
एक समय है...
सड़कों पर अब,
बचा जुआ वो खेल रहा हूँ,
सावन, भादो, जेठ, असाढ़
जाड़ा, गरमी, सूखा, बाढ़,
हर मौसम में...!


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