देव जिये जब पूछौ तौ पीर कौ पार कहूँ लहि आवत नाहीं। सो सब झूठ मतै मत के बरु मौन सोऊ सहि आवत नाहीं। ह्वै नंद संग तरंगनि में मन फेन भयो, गहि आवत नाहीं। चाहे कह्यो बहुतेरो कछू, पै कहा कहिए, कहि आवत नाहीं।।
हिंदी समय में देव की रचनाएँ