प्रेम पयोधि परो गहिरे अभिमान के फेन रह्यो गहि, रे मन। कोप तरंगनि सो बहि रे, पछिताय पुकारत क्यों बहि, रे मन। 'देवजू' लाज जहाज तें कूदि रह्यौ मुख मूँदि अजौ रहि, रे मन। जोरत तोरत प्रीति तुहीं, अब तेरी अनीति तुहीं सहि, रे मन।
हिंदी समय में देव की रचनाएँ