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कहानी

रिश्ते का क्या नाम है
पूनम तिवारी


आज युनिवर्सिटी में फार्म मिलने का आखिरी दिन था। उन्नति फार्म लेने के लिए लाइन में पिछले तीन घंटे से लगी थी। खड़े-खड़े पैर जवाब देने लगे थे। उन्नति को महसूस हुआ यदि कुछ देर और यूँ-ही खड़ी रही तो निश्चित तौर पर गश खाकर गिर पड़ेगी, बिना वजह वहाँ खड़े लोगों के बीच दया का पात्र बन जाएगी।

उन्नति ने अपने आगे पंक्ति में बड़ी संख्या में खड़े लोगों को गिना। कंधे में लटके बैग से पानी की बोतल निकाली ढक्कन खोलकर पानी पीना शुरू किया ठीक से गला तर भी नहीं हुआ कि बोतल खाली हो गई।

उसे फार्म चाहिए था। दिल्ली युर्निवसिटी से ग्रेजुएशन जो करनी थी। कितनी मुश्किल से तो मम्मी-पापा राजी हुए हैं। ब्रेन वाश करते-करते उन्नति अधिया गई, तब कहीं जाकर राजी हुए, 'अंत भला तो सब भला' उन्नति को इसी बात का डर था यदि पापा नहीं माने तो उसे वहीं के डिग्री कालेज में चप्पलें घिसनी पड़ती।

पापा तो यहीं चाह रहे थे कि पास के कालेज में एडमिशन ले ले। शहर में अकेले भेजने में डर लगता है। उन्नति की जिद के आगे पापा नरम पड़ गए वैसे सच तो यह था कि मन ही मन पापा-मम्मी स्वयं भी चाह रहे कि बेटी कूप-मंडूक न रहे। घर से दूर रहेगी तो कुछ नई तहजो-तहजीबें सीखेगी।

डर का कुछ भाग उन्नति की शहर में रहने वाली मौसी ने भी यह कह कर कम कर दिया।

विश्वास से डर भागता है विश्वास करना सीखो। 'गायत्री! आज की बयार ही कुछ ऐसी है। पता नहीं कैसी संगत मिल जाए।' माँ ने अपनी शंका जाहिर की।

'दीदी ज्यादा दिमाग मत उलझाओ, यदि बिगड़ना ही होगा तो पास रखकर तुम यहाँ रोक नहीं लोगी। मेरी मानो बिटिया को अपने पैरों खड़े होने दो।'

डरते-डरते ही सही मम्मी-पापा ने कल शाम सात बजे ही फाइनल इजाजत दी। उन्नति के खुशी के मारे पैर जमीं पर नहीं पड़ रहे थे। सुबह चार बजे की ट्रेन पकड़कर फार्म लेने पहुँच गई।

उन्नति ने फिर खिड़की की ओर देखा। ये लाइन वहीं की वहीं है कम होने का नाम क्यों नहीं ले रही है। अच्छा तो अब जनाब के लंच का समय हो गया था। टिफिन खोलकर चापना शुरू कर दिया था। भूख-प्यास और गर्मी से लाइन में लगे लोग बेहाल थे। धूप इतनी कड़ी थी कि अंदर तक की हड्डियाँ सिक रही थी।

फार्म फिर बँटने लगे परंतु स्पीड बहुत धीमी थी। फार्म जल्दी-जल्दी बँटे भी तो कैसे? जनाब तत्परता तो दिखाएँ। दिखाएँ भी तो कैसे? एक मोहतरमा उनके पास आकर जो बैठ गई थीं। गपियाये पड़े थे उनसे ही-ही करके, उन्नति का भूख-प्यास व गर्मी से बुरा हाल हो रहा था।

उन्नति को सुबह मम्मी ने घर से चलते वक्त पूड़ी-सब्जी बनाकर पैक की थी। पूड़ी-सब्जी का नाश्ता तो ट्रेन पर कर लिया था। अब तो लंच का समय हो रहा था। उन्नति को तो वैसे भी भूख कहाँ बर्दास्त होती है? दादी तो हर वक्त यहीं चिल्लाती रहती हैं कि इसकी कोई भी आदतें लड़कियों की तरह क्यों नहीं हैं।

दादी अपने जमाने की बात करती हैं। बात-बात में अपनी बहू को उलाहने देती हैं कि बेटी को लड़कियों सा गंभीर शांत, व नम्र रहना नहीं सिखाया। दादी के हिसाब से लड़कियों की कोई भी इच्छा तीव्र व बलवती नहीं होनी चाहिए। जितना दादी, उन्नति को दबाव में रखना चाहती उससे कई गुना वो स्वतंत्र रहना चाहती है।

उन्नति ने अपने आगे की पंक्ति में नजर दौड़ाई अभी भी छब्बीस लोग लाइन में उससे आगे थे। सत्ताइसवाँ नंबर उसका था यानि घंटों का इंतजार था। उन्नति को कुछ खुरापात सूझी सँभलते-सँभलते कुछ सेकेंडों में धप्प से जमीन पर गिर पड़ी।

पंक्ति में खड़े और कैंपस में उधर-उधर घूम रहे लोग दौड़-भाग कर उन्नति के चारों ओर एकत्र हो गए। एक साथ कई आवाजें...।

'अरे... क्या हुआ इसे...?'

'होगा क्या...? भूखे-प्यासे बच्चे घंटों से लाइन में लगे हैं। ऊपर से चिलचिलाती धूप, पूरी तरह अव्यवस्था है 'पानी तक का इंतजाम नहीं है।' इतना बोलते ही उस व्यक्ति ने उन्नति की बाँह पकड़कर उठाना चाहा। हमदर्दी जैसा कोई इरादा नहीं था उनका। उन्हें तो बस कुछ छूकर तफरी लेने का मू्ड था। उन्नति के बाँह से सटे अंग को बिना वजह छूने का प्रयास किया।

कोई अन्य लड़की होती तो शायद डर था शर्म के कारण चुप रह जाती मगर उन्नति! वह कहाँ शांत रहने वाली थी धीरे से बाईं आँख खोलकर देखा। हमदर्दी जताने वाला एक अधेड़ था। आँख बंद कर ली, मन ही मन बुदबुदाते हुए बोली।

'तुझे तो बूढ़े खूसट बाद में देख लूँगी।' कहकर धीरे से उसका हाथ उन्नति ने झटक दिया तभी पानी की छोटी-बड़ी छीटें एक साथ उन्नति के मुँह पर पड़े। चुल्लू से किसी ने पानी पिलाया फिर उन्नति ने धीरे से दाईं आँख खोलकर देखा, एक हैडसम नौजवान सामने पानी की बोतल लिए उसे होश में लाने का प्रयास कर रहा था।

उन्नति सोचने लगी अभी तो मैं नाटक कर रही थी यदि सच में भी बेहोश होती तो बिना पानी के ही होश आ जाता इस डूड को देखकर, चेहरे से पानी की छीटें झटकती हुई उठ बैठी।

'आर यू ओके...?' लड़के ने पूछा।

'या! मच बेटर नाउ...।' उन्नति सँभलते हुए उठ खड़ी हुई। ड्रामे का पूरा फायदा उन्नति को मिल गया। फार्म तो सबसे पहले मिला ही साथ ही खाने-पीने का भी इंतजाम हो गया।

क्लासेस शुरू हो चुकी थी। उन्नति को सबसे अधिक खुशी इस बात थी कि यहाँ कोई रोक-टोक करने वाला नहीं है। कालेज जैसा कोई माहौल नहीं है। हर रोज एक ही छिसी-पिटी यूनिफार्म पहनकर नहीं जानी पड़ती। अधिक जानकारी न होने के कारण हॉस्टल में रूम नहीं मिल पाया था। नए शहर में किसी से पहचान भी तो नहीं थी।

जानते हुए भी कि पी-जी में रहने-खाने में खर्च अधिक होगा किंतु क्या कर सकती थी मजबूरी थी। पापा ने काफी असमर्थता जताई कि इतना पैसा हम कहाँ से भेज पाएँगे? गाँव में खेती-बाड़ी और जमीन काफी है। संयुक्त परिवार है। गाँव के हिसाब से जिसके बीघों में खेत हो शहरों के हिसाब से घर तो वैसे भी कई गुना बड़े होते हैं। इन्हीं सब से तो गाँव का व्यक्ति संपन्न और मजबूत होता है। दादी की खर्च से अधिक लड़की की सुरक्षा की चिंता थी उनका कहना था कि घर से छह सौ कि.मी. दूर रहने को क्या जरूरत है, जब दस-बारह कि.मी. की दूरी पर गाँव में ही डिग्री कालेज है।

खुशदिल, खुशमिजाज होने के कारण उन्नति के जल्द ही कई दोस्त बन गए। पानी के छीटें मारने वाला वो डूड भी शामिल था जिसका नाम मोहक है। मोहक अच्छे रईस खानदान से है। 'टू बी एच के' के सेपरेट फ्लेट में रहता है। जहाँ उसके सभी मित्र बेतकल्लुफ आते-जाते है। उन्नति तो चाहकर भी अपने रूम में किसी को नहीं बुला सकती पी.जी. की वार्डेन को छोटी-बड़ी हर बातों का जवाब देना पड़ता है। जैसे 'कल देर रात तक तुम्हारे रूम लाइट क्यों जल रही थी।'

'मैम! मैं पढ़ रही थी एग्जाम चल रहे हैं।'

'ये सब नहीं चलेगा, पहले ही बोला था लाइट रात बारह बजे के बाद नहीं जलेगा। पढ़ना हो, जल्दी उठकर पढ़ो, जल्दी सोएगा तो जल्दी नीद खुलेगा समझा?'

'यस मैम।'

'आगे से ध्यान रखने का।' उन्नति के पास कोई और रास्ता नहीं था। रूम चेंज करने की सोची मगर इससे बेहतर कही आस-पास मिला नहीं।

उन्नति का बर्थडे था आज रूम पर ही दोस्तों को आमंत्रित किया था। केक का आर्डर दिया था। शॉप का लड़का केक नाश्ते कोल्ड ड्रिंक की बॉटल लेकर घर पर आ गया। वार्डेन की नजर उस पर पड़ गई। स्वयं भी लड़के के पीछे-पीछे चली आई। लड़के ने दरवाजा नॉक किया पीछे खड़ी थी। उन्नति ने सामान का पेमेंट किया लड़का चला गया। उन्नति को घूरते कर्कश आवाज में पूछा।

'ये सब क्या है?'

'मैम! टुडे इज माई बर्थडे।' उन्नति ने चहकते हुए बताया वार्डेन की तेवरियाँ चढ़ गई। उन्नति अपेक्षा में मुँह ताकती रह गई कि वार्डेन सर पर हाथ फेरकर बधाई देगी। 'तो क्या तुम रूम पर पार्टी करेगा? क्या तुम्हारा दोस्त लोग रूम पर आएगा? ये सब यहाँ पर नहीं चलेगा ध्यान रखने का।'

उन्नति के किसी भी जवाब की प्रतीक्षा किए बिना वार्डेन चली गई। भारी डील-डौल की क्रिश्चन महिला जिसे सीढ़ियाँ चढ़ने में तकलीफ होने के बावजूद सुबह-शाम दोनों समय राउंड पर जरूर आती है। उन्नति अपने जन्मदिन को लेकर काफी उत्साहित थी। स्वाभाविक भी था खुश होना ये सब उसने शहर में आकर ही तो सीखा था। गाँव में सिर्फ भाई को जन्मदिन मनाया जाता था। दोनों बहनों के जन्मदिन पर कुछ खास नहीं होता था।

उन्नति ने रूम सजाया म्यूजिक सिस्टम भी दोस्त से माँगकर आ गया। वार्डेन के मना करने पर भी तैयारियाँ पूरे जोर-शेार से चल रही थी। उन्नति को मालूम था कि वार्डेन आउट ऑफ स्टेशन जा रही है। अपनी बहन के पास, रात आठ बजे की गाड़ी थी। घर से वार्डेन सवा सात पर स्टेशन के लिए निकल गई वार्डेन के जाते ही उन्नति के सभी दोस्त आ पहुँचे।

म्यूजिक सिस्टम अपनी पूरी जान लगाकर बज रहा था ऐसा महसूस हो रहा था कि थोड़ी ही देर में धमाका होगा कमरे की काँपती दीवारें भरभरा कर जमीं से लग जाएँगी और अपना दुखड़ा बयाँ करेंगी। मोहक ने होटल से खाना भी आर्डर कर दिया था। उन्नति की बचपन से दबी इच्छाएँ अब कुलाचें मार रही थी। बहुत कुछ सुन रखा था शहर के बारे में, अवसर मिलते ही शहर का शहरपना उतार लेना चाहती थी अपने भीतर और गाँव में बिताए अपने रूखे-सूखे जन्मदिन की भरपाई कर लेना चाहती थी।

वार्डेन साल में तीन-चार बार ही बाहर जाती थी। अड़तालीस कमरों का हास्टल चलाने के लिए बाकी समय मुस्तैद रहती हैं। पार्टी पूरे शबाब में थी। सब झूम रहे थे। पेपर डांस चल रहा था। मोहक उन्नति को पीठ पर लादे पेपर के आखिरी तह पर था। उन्नति की नजर कमरे के दरवाजे पर पड़ते ही 'मैम' कहकर मोहक की पीठ से नीचे कूद पड़ी, मोहक भी लगभग गिरते-गिरते बचा। सभी दोस्त एक ओर सिमट कर खड़े हो गए। उन्नति का डर से बुरा हाल था। म्यूजिक बंद हो गया।

वार्डेन की ट्रेन रद्द हो गई थी। कुछ देर पहले म्यूजिक के शोर से दीवारे काँप रही थी। अब म्यूजिक बंद था, कमरे में मरघट सा सन्नाटा हो गया था। वार्डेन लाल आँखें करती इतनी तेजी से चिल्लाई कि कमरा कुछ देर के लिए गूँज गया।

'क्या हो रहा था? अपना फादर का घर समझा है? या होटल समझ रखा है। मना करने के बाद भी, कितना हिम्मत है तुम्हारा?' उन्नति का नया रूप दिख रहा था शेरनी बनी रहने वाली, वार्डेन के सामने भीगी बिल्ली सी खड़ी थी। वार्डेन उन्नति के इतनी नजदीक खड़ी चीख रही थी। उन्नति धीमे-धीमे पीछे खिसकी जा रही थी। उसे भली-भाँति मालूम था सबसे सुन रखा था कि मैडम डिसूजा जरा भी रहमदिल नहीं है। छात्राएँ मजबूरी में ही आती हैं रहने व अन्य सुविधा अच्छी होने के साथ ही नजदीक भी है युर्निवर्सिटी से।

वार्डेन उन्नति के पास से हटकर उसकी कबर्ड की ओर बढ़ी। कबर्ड से सामान निकाल कर बाहर फेकने शुरू किए। उन्नति ने बहुत हाथ पैर जोड़े मगर वो टस से मस नहीं हुई।

'मैम प्लीज मैम! इतनी रात, मैं कहाँ जाऊँगी?'

'क्यों!' बड़ी-बड़ी आँखों से लड़के-लड़कियों को घूरा।

'ये सब लोफड़-लफाड़ी दोस्त तुम्हारा कब काम आएगा? जाओ निकलो।

'मैम सॉरी! विश्वास कीजिए मेरा! बस एक मौका दीजिए। आगे से कभी ऐसा नहीं होगा।'

'तुम बहुत स्मार्ट बनता है मैंने मना किया था न? जल्दी सामान निकालो वरना सामान समेत लॉक कर देगा रूम। बस हॉफ एन आवर हैं तुम्हारे पास!' लास्ट वार्निंग देकर वार्डेन चली गई।

मित्र बहुत थे लेकिन सभी के पास सिंगल रूम था। मोहक ही एक ऐसा था जिसके पास दो रूम का फ्लैट था। सभी दोस्तों की सहमति से उन्नति, मोहक के रूम में साथ रहने आ गई। उन्नति को इस बात का पूरा आभास था। यदि घर में किसी भी तरह पता चल गया तो भूचाल अवश्य आ जाएगा। गाँव में लिहाज के चलते भाई-बहन में भी एक दूरी बनी ही रहती है।

समय तो ऐसे भागता है मानो पंख लगे हों। दोनों का पोस्टग्रेजुएशन (एम.बी.ए.) भी समाप्त हो गया था। 'जहाँ चाह वहाँ राह' दोनों का प्लेसमेंट भी एक ही शहर में हो गया। दोनों पुणे आ गए। मोहक को ऑफिस की तरह से फ्लैट मिला हुआ था। उन्नति भी निःसंकोच उस फ्लैट में रहने की बराबर की हिस्सेदारी निभा रही थी। अब तो दोनों एक साथ रहने के अभ्यस्त हो गए थे।

फ्लैट मोहक का था लेकिन अधिकार दोनों का बराबर था। आफिस के लिए दोनों साथ निकलते मोहक ने नौकरी लगते साथ ही कार भी फाइनेन्स करा ली थी। दोनों साथ निकलते पास के स्टापेज तक मोहक उन्नति को छोड़ देता वहाँ से वो किसी अन्य साधन से अपने ऑफिस निकल जाती। साथ रहते-रहते दोनों भूल चुके थे कि उन दोनों के बीच सिर्फ दोस्ती का रिश्ता है। दोनों का एक-दूसरे के प्रति ऐसा बर्ताव रहता कि उन दोनों के रिश्तों से अनजान कोई भी उन्हें पति-पत्नी ही समझ लेता।

उन्नति ने इच्छा जाहिर की कि टिफिन के बजाए खाना घर पर बने। वर्षों से बाहर का खाना खा-खाकर मोहक भी ऊब चुका था। घर खाना बनेगा काम तो बढ़ेगा ही बर्तन निकलेंगे। राशन बाजार से आएगा, सब्जियाँ भी लानी पड़ेगी। कुल मिलाकर पूरी घर-गृहस्थी वाला कार्यक्रम हो गया था। मेड भी रखनी पड़ी थी। मेड दोनों को पति-पत्नी ही समझ रही थी वैसे तो इतना वक्त ही कहाँ होता था कि वह अन्य घरों की तरह इधर-उधर की बतियाए, सुबह जब मेड आती दोनों को ऑफिस जाने की हड़बड़ी रहती। शाम उन्नति ऑफिस से पहले आ जाती आते ही साथ लैपटाप में लग जाती। मेड खाने की पूरी तैयारी करके चली जाती जब मोहक आता दोनों मिलकर खाना बना लेते।

वैसे तो आज के समय में शायद किसी को ऐसी कोई जिज्ञासा नहीं होती है कि एक साथ रहने वाले लड़के-लड़कियों का आपसी रिश्ता क्या है? मोहक अच्छे बैकग्राउंड से था और इस बात से अनजान भी नहीं था कि मम्मी-डैडी उसका रिश्ता अपनी पसंद से करना चाह रहे थे। लड़की भी पसंद कर ली थी। उन्नति मन ही मन मोहक को अपने हमसफर के रूप में देखने लगी थी। एक दिन मेड की बात सुन मोहक चिंतित हो गया, उन्नति खुश हो गई। इतवार छुट्टी थी। मोहक और उन्नति बालकनी में बैठे थे। चाय के दो कम रखते हुए मेड बोली।

'मेम साहब अब बच्चा प्लान कर लो। वो दसवीं मंजिल वाली मेम साहब है न? शादी का पाँच साल हो गया था। अभी पिछले महीने ही उनके घर बेबी हुआ। आपकी मैरिज को कितना साल हुआ?' मोहक को चाय पीते-पीते ठसका सा लगा। उन्नति और मोहक ने एक दूसरे को देखा। उन्नति ने बिना जवाब दिए उसे टालना चाहा।

'गैस पर दूध रखकर आई हो न? जाओ देखो नहीं तो उस दिन की तरह फिर उबल जाएगा। मेड दौड़ती हुई किचन की ओर चली गई। मोहक को मेड की बात सुनते ही अचानक कोई बात याद आ गई। 'उन्नति हमने तो कभी इस ओर सोचा नहीं, नेक्सट मंथ मम्मी-डैडी आ रहे है बताया था न? कहीं ऐसी बाते उनके कानों में न पड़ जाए।' 'कब बताया? मोहक! इतनी बड़ी बात तुम कैसे भूल गए? क्या होता जा रहा है? तुमने पिछली बार भी यही गलती की थी ठीक ऐन वक्त पर बताया था। याद है कि भूल गए?' 'याद कैसे नहीं रहेगा, बात-बात में रोकती जो रहती हो।'

'मजाक छोड़ो! ये बताओ अब करना क्या होगा? वहाँ तो अपने इतने सारे फ्रैंड्स थे, तब भी कितनी प्राब्लम हुई थी इला के रूम पर। यार सबकी अपनी-लाइफ होती है। सबका अपना तरीका होता है।'

'उन्नति! तुम ऐसा क्यों नहीं करती? दो-चार दिनों के लिए 'मम्मी के पास हो आओ। सबसे मुलाकात होगी उन्हें अच्छा लगेगा और तुम्हें भी चेंज हो जाएगा।'

'मोहक!तुम्हें कितनी बार बता चुकी हूँ मुझे अन्कंफर्ड होता है गाँव में, इतना टाइम बीत गया मैं समय के साथ आगे निकल आई। अब मुझे गाँव की खुली छत पर नींद नहीं आती और वहाँ लाइट का आना-जाना कुछ निश्चित नहीं रहता। 'जानता हूँ या! सॉरी तुम तो बिना एसी के अब सो भी नहीं सकती।'

'तुम छोड़ो! मैं ही अपना कोई इंतजाम कर लूँगी। हाँ आफिस की एक लड़की शायद अकेली हो रहती है।'

'हाँ! ठीक है, उससे दोस्ती बना लो। मुझे लगता है अब मम्मी-डैडी भइया किसी न किसी का आने का प्रोग्राम बनता ही रहेगा सभी को पता है ऑफिस से फ्लैट मिला हुआ है।'

'गाना भी तो तुम्हीं ने गाया है।'

'हाँ यार! उन्नति कितने खुश हुए घर वाले सुनकर, तुम अंदाजा नहीं लगा सकती।'

'हाँ-हाँ बस ठीक है। ये बताओ कल मैंने तुमसे सामान लाने को बोला था

"याद है मैंने तुमसे पहले ही कहा था शायद मुझे टाइम न मिल पाए तुम लेती हुई आना...'

'मैं तो आज लिफ्ट लेकर आई हूँ क्या उससे कहती कि वह मुझे शापिंग भी करा दे?'

'उन्नति यार! वो, टिफिन सिस्टम ही ज्यादा बेहतर था ये हर रोज की चिक-चिक तो नहीं थी।

जिस तरह शांत झरना अच्छा नहीं लगता। उसी तरह घर पर छुट-पुट उठा-पठक न हो तो घर अच्छा नहीं लगता। घरवालों की ओर से उन्नति पर अब शादी का दबाव बनने लगा था। उन्नति तो मोहक के बिना शायद रहने की सोच भी नहीं सकती थी। वैसे सच तो ये था कि उन्नति को अविवाहित जैसा अहसास कहाँ बचा था? मात्र फेरे ही तो नहीं हुए थे। उन्नति को रह-रहकर इस तरह के झटके लग जाया करते थे। जब भी शादी की बात होती उसके अंदर की औरत उससे कहती 'विवाह तो लड़कियों का होता है। तुम तो कब की औरत बन चुकी हो।' उन्नति के पास अब कोई बहाना भी तो नहीं बचा था। पढ़ाई नौकरी यही दो कारण थे। नौकरी के बाद से अब दबाव कुछ अधिक बनने लगा।

उन्नति घर कम जाती थी लेकिन घर वालों की छोटी-बड़ी सभी बातों का ख्याल रखती थी। एम.बी.ए. के लिए लोन की किस्त हर महीने उन्नति की सैलरी से कटती थी। दादी-मम्मी भाई-बहन सभी की जरूरत की वस्तुएँ समय-समय पर भिजवाती रहती थी। पापा को घर खर्चे के लिए उनके अकाउंट में पापा के लाख मना करने पर भी भेजती रहती थी। हर तरह से घर की आदर्श बिटिया थी।

परंतु व्यक्तिगत जिंदगी में उसे अपने घरवालों का भी हस्तक्षेप पसंद नहीं था। मोहक के घर वालों के आने पर उसे कहीं और जाने पर अब कोफ्त होने लगी थी। जिस तरह से चोर, चोरी के पश्चात कोई भी निशानदेही नहीं छोड़ना चाहता ठीक वैसे ही मोहक चाहता था घर वालों के आने पर उन्नति का एक हेयर बैंड भी न छूट जाए। सोचते-सोचते उन्नति गंभीर हो गई। पहले भी कई बार इस विषय को लेकर उसके मस्तिष्क में सवाल उठे थे जिनके निराकरण के लिए मोहक से बात भी की थी किंतु आज फिर नए सिरे से बात करने के मूड में थी। मोहक बेडरूम में सोने की तैयारी कर रहा था एसी आन किया। रूम फ्रेशनर स्प्रे कर अभी लेटा ही था सोया नहीं था उन्नति का इंतजार कर रहा था।

तीन रूम के फ्लैट में ड्राइग रूम और दो बेडरूम थे मगर इस्तेमाल एक बेडरूम होता था। उन्नति और मोहक बेड भी एक ही शेयर करते थे। अब आदत सी बन चुकी थी दोनों झगड़ने के बाद भी सोते एक साथ ही थे। उन्नति रूठने में माहिर थी मोहक के पास रूठे को मनाने की कला थी। उन्नति मोहक के सीने पर अपनी कोहनी टिका कर बैठ गई।

'मोहक! मैं तुमसे कुछ बात करना चाह रही हूँ।'

'जान! मैं तो तुम्हारा कितनी देर से इंतजार कर रहा हूँ।'

मोहक ने उन्नति को अपने सीने पर झुका लिया।

'मोहक! स्टॉप किडिंग, आई एम सीरियस यार।'

'वाहट हैपेंड यार! कुछ देर पहले तो तुम ठीक-ठाक थी।

ये अचानक तुम्हें क्या हो गया?'

'ये बताओ हमारे रिश्ते का क्या नाम है?'

'दोस्ती का! इससे बड़ा भी कोई नाम होता है क्या?'

'मेड की बात को शायद सुनने के बाद भी कोई ध्यान नहीं दिया।'

'वाहट रबिश! क्या हम इतने फालतू हैं कि एक मेड की बात पर अपना मूड ऑफ करके बैठ जाए। सच बताऊँ उन्नति। जब तुम ऐसी बातें करती हो तो लगता है तुम वही गाँव की बैकवर्ड लड़की हो इतने सालों बाद भी बदली नहीं।'

'मोहक! तुम भूल रहे हो, हम कहीं भी रहें हमारे आस-पास एक समाज होता है और उस समाज से ऐसे सवाल उठना लाजिमी है।'

'जानता हूँ कि हम समाज में रहते हैं लेकिन डिपेंड करता हैं कि हम कैसे समाज में रहते हैं। यहाँ किसे पड़ी है। कौन इतना फ्री है? हम तो किसी की पर्सनल लाइफ में इंटरफेयर नहीं करते। मेरी लाइफ! हमें पूरा अधिकार है अपने अनुसार जीने का। हाँ मैं फ्रिक करता हूँ तो सिर्फ अपने घर वालों की, उनकी भावनाओं को किसी तरह कोई चोट न पहुँचाऊँ।' अपनी बात समाप्त कर मोहक ने जड़ बनी बैठी उन्नति को अपने पास खींच लिया।

'आजा सोना बेबी...।' मोहक ने लाइट ऑफ कर दी।

उन्नति और मोहक के बीच इस तरह की चर्चा बहस जो थी कहे कई बार पहले भी हो चुकी थी नतीजा हर बार रेत के महल सा ढह जाता। उन्नति उस पालतू पिजड़े में बंद तोते की भाँति थी पिजड़ा खुला होने पर भी तोता पिजड़े के आस-पास ही चक्कर लगाता रहता।

उन्नति का मूड आज पूरे दिन उखड़ा-उखड़ा सा रहा। ऑफिस से जल्दी घर लौट आई। वह स्वयं नहीं समझ पा रही थी कि मन एकाएक इतना विचलित क्यों हो रहा है। शायद इसलिए कि इससे पहले सिर्फ अपने करियर को ही प्राथमिकता दी थी। जीवन जीने के लिए एक जीवन-साथी चाहिए होता है पति के रूप में जो पूरी तरह अपना हो। उसके किसी और के हो जाने का कभी कोई भय न हो।

मोहक अभी ऑफिस से नहीं आया था। उन्नति ने एक कप कॉफी बनाई और बालकनी में लेकर बैठ गई पहला सिप लिया ही था मोहक की गाड़ी आते दिखी। उन्नति ने एक कप कॉफी और बनाई दोनों बालकनी में बैठकर कॉफी का आनंद लेने लगे।

'क्या बात है? कुछ खोई-खोई सी लग रही हो।' उन्नति को गुमसुम बैठी मोहक ने पूछा।

'मोहक! आज सुबह ऑफिस में दिशा का फोन आया था।'

'अच्छा कैसे हैं दोनों?'

'दुखी थी। दपर्ण ने किसी दूसरी लड़की से शादी कर ली।'

'अच्छा! कब? साले ने इन्फार्म नही किया।

'मोहक! तुम दपर्ण की मैरिज से खुश हो रहे हो? तुमने दिशा के बारे में नहीं पूछा।'

'कुछ पूछने की गुंजाइश कहाँ बची हैं ये तो अच्छा हुआ मैरिज के पहले ब्रेक अप हो गया। यदि गाड़ी बीच के किसी स्टेशन में रुकती तो ज्यादा तकलीफ होती।'

'दिशा ने इतने वर्ष बरबाद किए तुम उसके लिए क्या कहोगे?'

'मैं तो कहूँगा बरबाद नहीं एन्जाय किए।' मोहक ने बेफिक्री से कहा। उन्नति को महसूस हुआ मोहक दिशा के लिए ही नहीं बल्कि जो कह रहा है वो उन्नति पर भी लागू होती है। जब से नौकरी लगी तभी से घर से शादी-शादी की रट लगने लगी हैं। मना करने पर मम्मी का एक ही राग होता है अब कितना देर करेगी? मेरे तो बीस साल की उम्र में तीनों बच्चे हो गए थे। सुन-सुन कर उन्नति थक चुकी थी। मौसी ने एक लड़का बताया है। अच्छी कंपनी में है। अच्छा पैकेज है। पापा का दिन में एक बार फोन जरूर आता है।

जवाब दो, तो बात आगे बढ़ाए।

उन्नति ने दिशा को बात बताई दिशा ने कहा - 'उन्नति ये लड़के भौंरे समान होते हैं। जिधर ताजा खिला फूल देखा बस वहीं रस चूसने लग जाते हैं। मोहक से साफ बात कर ले वरना तू भी मेरी तरह पछताएगी।' उन्नति के दिमाग के तंतु ने काम करना बंद कर दिया था। मोहक से जब भी शादी की बात करों भड़क उठता है। हर रोज बिस्तर का आनंद भी चाहता है।

उन्नति के विचारों में एकाएक ही तो परिवर्तन आया है। मोहक की भाँति पहले उसे भी लगता था कि एक स्त्री-पुरुष को साथ रहने के लिए जितने इन्गीरिएड चाहिए सभी तो है। शादी का सर्टीफिकेट क्या गले में लटकाकर घूमेंगे?, किनतु दर्पण के बर्ताव ने एक नया अनुभव एक नया रास्ता दिखा दिया। आठ साल साथ रहने के बाद कहीं और मुँह मारने चल दिया। साल भर की बच्ची है गोद में, दिशा कितना भी हाथ-पैर मार ले बेटी को उसका अधिकार नहीं दिला पाएगी। डी.एन.ए. कराकर यदि साबित करने का प्रयास भी करना चाहे तो ब्लड सैंपल के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने पर भी सफल होना नामुमकिन ही है।

उन्नति का दिमाग पूरी तरह उलझ गया था। ऑफिस के काम में मन नहीं लग रहा था। दिशा का ख्याल आते ही ठीक-ठाक टेंप्रेचर के बावजूद माथे पर पसीना उभर आया। अपना भविष्य भी दिशा की ही तरह अधर में झूलता दिख रहा था। चार माह पहले की ही तो बात है मासिक दस दिन ऊपर चढ़ गया था। भागी-भागी गई थी। लेडी डॉक्टर के पास 'रेजिस्ट्रान' की गोलियाँ लिखी थी यदि अवेयर न होती तो अर्बासन की नौबत आ जाती। मोहक को बताया सुनकर कोई हैरत नहीं हुई।

'यार! सेफ या अनसेफ ये तो तुम्हीं बता पाओगी न! तुम्हें ध्यान रखना चाहिए।' उन्नति झुलझलाती हुई तेज आवाज में बोली। 'जब अपनी धुन में होते हो, कुछ बोलने का मौका देते हो? कुछ सुनते हो? तुम तो मर्द हो तुम्हें औरत को सुनना कहाँ पसंद आएगा? 'कूलडाउन बेबी! कूलडाउन! क्या करूँ जान! इतना मदहोश हो जाता हूँ कि रुका नहीं जाता। मेरी गलती नहीं है, तुम चीज ही इतनी मस्त हो।' मोहक ने आँख मारी, आँखों में उत्तेजना चमकने लगी। उन्नति को बाँहों में भरना चाहा। 'क्या बात है? ज्यादा मस्ती सवार हो रही है? एक घूँसा माँरूगी न...।' कहते ही उन्नति ने मोहक की पीठ पर गुद्दा मार दिया। मोहक ने हँसते हुए उन्नति के होठों पर किस कर लिया।

अकसर ऐसी ही चुहलबाजी चलती रहती दोनों के मध्य। उन्नति को इस बात से भी इनकार नहीं था कि वह मोहक के साथ खुश नहीं है। बहुत खुश है। बहुत प्यार दिया है मोहक ने, मोहक के प्यार से दिल लबालब भरा है। दिशा भी उन्नति की भाँति हर तरह से तृप्त थी।

कंप्यूटर ऑन था उन्नति पिछले एक घंटे से उहा-पोह के जंगल में भटक रही थी। सभी अपने में व्यस्त थे प्राइवेट सैक्टर में कहाँ किसी को फुर्सत होती है? आस-पास की टेबल पर पानी रखते चपरासी की नजर उन्नति पर पड़ गई थी। टेबल पर पानी का गिलास रखते चपरासी ने कहा 'मैडम! पानी' उन्नति की तंद्रा लौटी। पानी का गिलास उठाया गटागट पी गई। चपरासी उन्नति को देखता रहा।

'मैडम! सिर में दर्द है क्या? गोली चाहिए।'

'नहीं... नहीं...।'

'मैडम चाय कॉफी?'

'हाँ... एक कप कॉफी पिला दो।' कॉफी पीने के पश्चात कंप्यूटर में मशगूल हो गई।

उन्नति दिशा के लिए पूरा जोर लगा रही थी। वकील ने भी केस को कमजोर कहकर आगे बढ़ाने से मना कर दिया वकील ने जो प्वांइट आगे रखे उसमें सौ प्रतिशत सच्चाई थी। किसी लड़की का उसकी इच्छा के विरुद्ध यदि बलात्कार होता ऐसे में यदि वो माँ बनती है तो स्थिति कुछ और होती है। लोगों की सहानुभूति होती है उसके प्रति। स्वयं बनाए विवाह के पूर्व शारीरिक संबंधों के परिणाम को कहाँ हमारा समाज जायज मानता है?

वकील महोदय के ऑफिस मे एक बुजर्ग क्लांइट भी बैठे थे। उनको भी केस काफी कुछ समझ आ चुका था। वार्तालाप के मध्य उन्होंने भी धीमे से अपनी बात रखी।

'आज की नई पीढ़ी अपनी एक नई दुनिया में जीना चाहती है। नियम, रीति-रिवाज, परंपराएँ, समाज यहाँ तक घर वालों के प्रति विश्वास आदर्श सब शूली पर टाँग देना चाहते है।' शायद बोलते-बोलते अपनी रौ में आ गए थे उन्नति से शिकायती लहजे में उन्होंने कहा।

'तुम्हारी सहेली को समझना चाहिए था कि चरणबद्ध तरीके से किया गया काम ही सही होता है विवाह के पश्चात ही बच्चे के बारे में सोचना चाहिए था।'

'क्या मैरिज के पश्चात तलाक नहीं होते? पूछिए वकील साहब से हर रोज इनके पास तलाक के कितने केस आते होगें?' उन्नति ने वकील साहब की ओर इशारा करके कहा।

'आपकी बात बिल्कुल सही है, तलाक के ढेरों केस आते है मेरे पास आपको आश्चर्य होगा कई बार लोग कानून से अधिक 'लोग क्या कहेंगे' से डरते हैं। केस आते बहुत है लेकिन समझाने बुझाने के पश्चात सत्तर प्रतिशत रिश्ते पूर्ववत हसने-खिलखिलाने लगते हैं।' अपना अनुभव बताते-बताते वकील साहब ने टेबल पर रखी मिठाई की प्लेट उठाई जो कुछ देर पहले उनका नौकर रखकर गया था।

'ये लीजिए! ये एक ऐसे ही रिश्ते का प्रसाद है जो टूटने से बच गया। सुबह ही मियाँ-बीवी एक किलो का डिब्बा पहुँचा कर गए है। मैं तो डरने लगा हूँ कहीं मुझे डाईबिटीज न हो जाए। मैं अपनी फीस से ज्यादा मिठाई का वेट करता हूँ।' वकील साहब की हँसी के साथ क्लाइंट और उन्नति की हँसी से कमरा गूँज उठा। तभी उन्नति का मोबाइल घनघना उठा। 'हाँ पापा।'

'बेटा! तुमने बताया नहीं? मौसी का फोन आया था लड़के वाले तुमसे मिलना चाह रहे हैं। क्या जावाब दूँ उनको?'

'पापा! अभी में कहीं बाहर हूँ। मुझे थोड़ा टाइम दीजिए मैं आपको फोन करके बताऊँगी तब आगे बात कोई करिएगा।'

घर लौटते वक्त पूरे रास्ते वकील और क्लाइंट की बातें उन्नति के मस्तिष्क में घुमड़ती रही। घर पहुँच कर दरवाजे का ताला खोलते साथ ही दरवाजे के दोनों पल्ले अलग हो गए। उन्नति सोचने लगी ये कुंडा ही तो है जो दोनों पल्लों को जोड़कर रखता है। ठीक विवाह भी तो यही कार्य करता है। उन्नति को अपनी सोच पर स्वयं ही हँसी आ गई। धीरे से स्वयं से बुदबुदाई।

'ये मुझे क्या होता जा रहा है? ये विवाह का ताप अचानक मुझ पर कहाँ से चढ़ गया है।' बैग से मोबाइल निकाल कर मोहक को फोन लगाती है।

'मोहक! कितनी देर में आओगे? यार चाय पीने का मन कर रहा है... मैं तुम्हारा वेट कर रही हूँ।'

'डार्लिंग! मुझे मालूम था तुम मेरा वेट कर रही होगी इसीलिए मैं पहुँच गया फटाफट दरवाजा खोलो।' उन्नति ने दरवाजा खोला मोहक हाथ में फल, मिठाई, सब्जी के कई पैकेट ले कर खड़ा था।

'इतना सामान! मैं तो कल दिशा के घर जा रही हूँ।'

'अचानक प्रोगाम बन गया? सब ठीक तो है?

'हाँ! बस इधर बीच कुछ परेशान है। सोच रही हूँ एक हफ्ते उसके पास रह आती हूँ।'

'वन वीक! तुम्हारा दिमाग तो ठीक है? इतने दिन मैं अकेला रहूँगा? पिछली बार जब तुम अपने घर गई थी ये घर मुझे काटने को दौड़ रहा था। नहीं-नहीं तुम दिशा को यहाँ बुला लो।' उन्नति मोहक देखती रह गई। 'मोहक! पापा का आज भी फोन आया था।' पापा फोन पर क्या पूछ रहे होंगे ये मोहक को पता है। वह चुप रहा कुछ नहीं बोला। गंभीर बना बैठा रहा। मेड आ गई थी चाय बना रही थी। 'मेम साहब! सब्जी क्या कटेगी?' मेड ने आकर पूछा

'मटर-पनीर बनेगा तुम पेस्ट तैयार कर दो और नान के लिए मैदा गूँद देना।' उन्नति ने समझाया मेड किचन में चली गई। 'उन्नति यार इसको जल्दी फुटा दिया करो जितनी देर घर पर रहती है, बड़ा अनकंफर्ट महसूस होता है। पता नहीं कौन सी बात सुन ले, कहाँ जाकर लगा दे।' उन्नति को हँसी आ गई। मोहक अपनी ही बात से झेप गया। बहुत धीमे स्वर में बोला।

'आज दर्पण का फोन आया था।'

'धोखेबाज कहीं का, क्या कह रहा था?'

गिल्ट महसूस कर रहा है। माँ ने जहर खाने की धमकी दी थी। मजबूरन माँ की पसंद की लड़की से मैरिज करनी पड़ी। उन्नति एक बात उसने और कही। वह दिशा को नहीं भूल पा रहा है। उन्नति जानती हो? मैंने आज ऑफिस में कोई काम नहीं किया।

'क्यों तबियत तो ठीक है न?' उन्नति ने मोहक का माथा छूकर देखा। मोहक की आँखे पनीली थी। मोहक ने उन्नति को अपने पास खींच लिया उसका हाथ अपने दोनों हाथों के बीच दबा लिया।

'उन्नति! मैं कई दिनों से एक अजीब सी उधेड़-बुन में हूँ। दर्पण के फोन के बाद मन एकदम विचलित हो उठा। मैंने हर तरह से सोचा मेरी सोच का अंतिम निर्णय उन्नति। मैं तुम्हारे बिना किसी हाल में नहीं रह सकता। उन्नति मोहक को एकटक देखती रह गई मानो कोई ख्वाब देख रही हो। लंबा कद, खूबसूरत चेहरा, गठीला जिस्म, मनमोहक आँखें, इससे पूर्व इतने ध्यान से कभी देखा ही नहीं।

उन्नति की मृगनयनी सी आँखों और खूबसूरत चेहरा, पाँच फिट पाँच इंच की लंबाई छरहरा बदन शायद थोड़ा भी प्रयास करती तो मॉडल अवश्य बन जाती। मोहक सोचने लगा मम्मी-डैडी की मर्जी से शादी कर उन्हें तो खुश कर दूँगा किंतु सारी जिंदगी स्वयं से सवाल माँगता रहूँगा। नहीं! उन्नति नहीं! तुम कहीं नहीं जाओगी तुम मेरी हो! सिर्फ मेरी! मोहक ने उन्नति को बलपूर्वक अपनी बाँहों में भर लिया। उन्नति चकित तृप्त हिरनी सी खिलखिला उठी।


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हिंदी समय में पूनम तिवारी की रचनाएँ