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कविता

साल गिन गिन कर बिताई उम्र
सुधेश


साल गिन गिन कर बिताई उम्र
यह जीना नहीं है।

जल की मीन पशु और पंछी
जल थल गगन में साँस लेते
मानव पशु उन्हें खाने को
अपने जाल में पर फाँस लेते।

अपनी जिंदगी तो जिंदगी
अन्य का जीना क्या जीना नहीं है?
दो घूँट पानी के लिए नित
याचक प्यास सदा बस तरसी
गगन के मेघ की जल राशि
तृप्ति बन कर के कहाँ बरसी।

ए सी हवा में बैठ कह दो
यह सावन महीना नहीं है।


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