डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कहानी

टेलीफोन लाइन
तेजेंद्र शर्मा


टेलीफोन की घंटी फिर बज रही है।

अवतार सिंह टेलीफोन की ओर देख रहा है। सोच रहा है कि फोन उठाए या नहीं। आजकल जंक फोन बहुत आने लगे हैं। लगता है जैसे कि पूरी दुनिया के लोगों को बस दो ही काम रह गए हैं - मोबाइल फोन खरीदना या फिर घर की नई खिड़कियाँ लगवाना। अवतार सिंह को फोन उठाते हुए कोफ्त सी होने लगती है। सवाल एक से ही होते हैं, ‘हम आपके इलाके में खिड़कियाँ लगा रहे हैं। क्या आप डबल ग्लेजिंग करवाना चाहेंगे? ‘या फिर ‘सर क्या आप मोबाइल फोन इस्तेमाल करते हैं?’

‘मैं फोन इस्तेमाल करता हूँ या नहीं, इससे आपको क्या लेना देना है?’

‘सर हमारे पास एकदम नई स्कीम है। दरअसल ये कोई सेल्स कॉल है ही नहीं। हमारे कंप्यूटर ने आपका नाम सुझाया है, राईट! आपको फोन एकदम फ्री मिलेगा। राईट! ...यू डू नॉट हैव टु पे ईवन ए पेन्नी फार दि फोन... ’

‘यार बिल तो मुझे ही देना पड़ेगा न?’

एक दिन तो एक ने कमाल ही कर दिया। अवतार सिंह का नाम सुन कर बोला, ‘अंकल जी मैं दिल्ली तों टोनी बोल रिहा हाँ। अंकल जी प्लीज फोन ले लीजिए न। मेरा टारगेट नहीं हो पा रहा। प्लीज!’

अवतार ने फिर टेलीफोन की तरफ देखा है। प्रतीक्षा कर रहा है कि आंसरिंग मशीन चालू हो जाए तो बोलने वाले की आवाज सुन कर ही तय करेगा कि फोन उठाना है या नहीं।

किसी जमाने में पिंकी के फोन की कितनी शिद्दत से प्रतीक्षा होती थी। फिर पिंकी का फोन और उसका फोन एक हो गए थे। पिंकी अपने पिता का घर छोड़ कर अवतार के पास आकर उसकी पत्नी बन कर रहने लगी थी। कुछ साल तो सब ठीक चलता रहा। लेकिन फिर जैसे उनके संबंधों के नीचे से जमीन भुरभुरी होती चली गई।

...फोन जरूर किसी सेल्स वाले का ही होगा। संदेश नहीं छोड़ रहा।

पिंकी भी बिना कोई संदेश छोड़े उसे अकेला छोड़ गई थी। पिंकी के इस तरह उसके जीवन से निकल जाने ने अवतार के व्यक्तित्व पर बहुत से गहरे निशान छोड़े हैं। उसे आज तक समझ ही नहीं आया कि कमी कहाँ रह गई। क्या हालात सचमुच इतने बिगड़ गए थे कि पिंकी को घर छोड़ कर जाना पड़ा?

पिंकी अवतार को छोड़ कर उसके दोस्त अनवर के साथ भाग गई। सुना है आजकल तो पूरा बुरका पहन कर घर से निकलती है। अवतार हैरान भी है और परेशान भी। पिंकी के भागने से अवतार को बहुत से नुकसान हुए हैं। पहले तो दोस्ती पर से विश्वास उठ गया है। फिर मुसलमानों के विरुद्ध उसके मन में गाँठ और पक्की हो गई है। हालाँकि कुसूर पिंकी का भी उतना ही था जितना कि अनवर का।

पिंकी मुसलमानों के विरुद्ध कितनी बातें किया करती थी! वह तो बुरका पहनने वाली औरतों को बंद गोभी तक कहा करती थी! फिर ऐसा क्या हो गया कि वह स्वयं औरत न रह कर बंद गोभी बनने को तैयार हो गई?

अनवर जब लंदन आया था तो उसका पहला दोस्त अवतार ही बना था। अनवर मिघयाणे का रहने वाला था। जगह का नाम सुनते ही अवतार की आँखें नम हो आईं थी। उसके अपने माता पिता हमेशा ही झंग की बातें करते थे। झंग और मिघयाणा तो जैसे जुड़वां शहर थे। अनवर की बोली भी अवतार के माता पिता की बोली से कितनी मिलती जुलती थी। अनवर जब बोलता तो अवतार बस सुनता रहता। अनवर हीर बहुत मीठी गाता था।

हीर के मकबरे की बातें करता अनवर अपनी आँखों में पानी ले आता। हीर माई की बातें और तख्त-हजारे का राँझा - दोनों दोस्त ख्यालों के सागर में नहाते रहते। और फिर एक दिन हो गई थी अवतार की शादी और अनवर को भी घर का खाना मिलने लगा था। वरना तो दोनों दोस्त हाउंसलों के ढाबे-नुमा रेस्टोरेंटों की कमाई बढ़ाने का काम करते रहते थे। तीनों इकट्ठे फिल्में देखने भी जाते थे। आखिरी फिल्म बार्डर ही देखी थी तीनों ने। और पिंकी घर की सीमा पार कर उस पार चली गई थी।

अब तो संदेसे भी नहीं आते। बस कभी कभी कोई समाचार आ जाता है। जब अवतार का कोई दोस्त सायरा को साउथहॉल या ईलिंग रोड की मुख्य सड़कों पर खरीददारी करते देख लेता है तो चुटकी लेते हुए अवतार को बताता जरूर है। पिंकी को सायरा बानू नाम भी पसंद था और इस नाम की फिल्मी हिरोइन भी सुंदर लगती थी। उसने कई बार अवतार से कहा भी था, ‘मैं किहा जी, मैं अपना नाम सायरा बानू रख लवाँ? किन्ना प्यारा नाम लगदा है!’ शायद यही नाम रखने के लिए ही वो मुसलमान हो गई!

फोन फिर बजने लगा है। बे-ध्यानी में उसने उठा भी लिया है। फोन श्रीवास्तव जी का है। अवतार समझ गया कि चालीस पैंतालीस मिनट का नुस्खा तो हो गया। श्रीवास्तव जी के साथ उसकी बातचीत कम से कम इतनी तो चलती ही है। श्रीवास्तव जी की पत्नी तो अवतार को अपनी सौतन कह कर बुलाती है। लेकिन प्यार भी बहुत करती हैं। श्रीवास्तव जी उम्र में भी अवतार से बड़े हैं। पाँच सात साल तो बड़े होंगे ही। कट्टर मार्क्सवादी हैं। कभी कभी अवतार को भी बोर कर देते हैं। अवतार किसी वाद विवाद को नहीं मानता। इनसानियत उसका धर्म है और इनसानियत ही जिंदगी। वो स्वयं न तो गुरुद्वारे अरदास करने जाता है और न ही मंदिर में पूजा करने।

अवतार की माँ सिख थीं और पिता हिंदू। माँ ने अवतार को सिख धर्म की सीख दी। लेकिन माता पिता दुर्गा के मंदिर भी उसी श्रद्धा से जाते थे जैसे कि गुरूद्वारे। घर में गुरू नानक और श्री कृष्ण जी की फोटो साथ साथ टँगी रहतीं। अवतार को भगवान कृष्ण के सिर में लगा मोर का पंख बचपन से ही आकर्षित करता था। हालाँकि श्रीवास्तव जी के साथ वह नीस्डन के स्वामी नारायण मंदिर भी चला जाता और साउथहॉल के गुरूद्वारे में लंगर भी खा आता। लेकिन श्रद्धा वाली कोई बात नहीं थी।

श्रीवास्तव जी ने नई गजल लिखी है। वे जब जब कोई नई नज्म या गजल कहते हैं, बेचारे अवतार पर ही जुल्म ढाते हैं ! अवतार भी उनकी रचनाओं का आनंद उठाता है। दोनों दोस्त कभी कभी दोपहर को भोजन भी इकट्ठे कर लेते हैं। श्रीवास्तव जी अवतार के कंप्यूटर को हिंदी भी सिखाते हैं और गुरमुखी भी। लेकिन कंप्यूटर के सीख लेने के बावजूद अवतार कंप्यूटर के मामले में अपने को अनाड़ी ही पाता है। दोनों को जब कभी कोई नया लतीफा कहीं से सुनने को मिलता है, तो दूसरे के साथ जल्दी से बाँट लेते हैं। अवतार का तकिया कलाम रहता है, ‘हाँ जी, कोल कोई खलोता तां नहीं ?... लो फिर ताजा ताजा हो जाए।’ फिर दोनों दोस्त देर तक हँसते रहते।

श्रीवास्तव जी ने कभी भी अवतार से पिंकी के बारे में बातें नहीं कीं। श्रीवास्तव जी का परिवार अवतार के जीवन में पिंकी के जाने के बाद ही आया। अवतार को अच्छा भी लगता है कि श्रीवास्तव जी ने कभी भी उसकी निजी जिंदगी के बारे में कभी कुछ नहीं पूछा। उसे अपनी आँखों में आँसू बिल्कुल पसंद नहीं हैं !

फोन रख दिया है। श्रीवास्तव जी की नई नज्म हैरो शहर पर लिखी गई है। वही सुना रहे थे। अवतार के दिमाग में दो पंक्तियाँ अभी भी गूँज रही थीं, ‘बाग में जिसने बना डाले भवन / तय करो उसकी फिर सजा क्या है! ‘हाउंसलो ही की तरह हैरो की भी शक्ल बदल रही है। बदल तो उसकी अपनी जिंदगी भी बहुत गई है। आज पिंकी बहुत याद आने लगी है। पिंकी और अनवर, भारत और पाकिस्तान, हिंदू और मुसलमान - सभी उसके दिमाग को मथ रहे हैं। अचानक ये सब उसे अपने स्कूल में पहुँचा कर खड़ा कर देते हैं।

फोन की घंटी फिर बज उठी है। अवतार ने गिलास में व्हिस्की डाल ली है। वह रोजाना शाम को व्हिस्की के दो पैग लेता है। जब कभी यादें सुकून से खिलवाड़ करने लगती हैं, वह दो से तीन तक भी पहुँच जाता है। उसकी प्रिय व्हिस्की है कुछ नहीं। जब पहली बार श्रीवास्तव जी ने इस व्हिस्की के बारे में बताया था तो वह अपनी हैरानी नहीं छिपा सका था। कुछ नहीं! भला इस नाम की भी स्कॉच व्हिस्की हो सकती है?

श्रीवास्तव जी ने ही बताया था कि यह व्हिस्की एक भारतीय मूल के व्यक्ति के दिमाग की उपज है। आप व्हिस्की पियो तो भी कुछ नहीं पियोगे और अगर नहीं पियोगे, तब तो कुछ पी ही नहीं रहे!... वैसे अब जीवन में कुछ बचा ही कहाँ था?

जब से अनवर से दोस्ती टूटी है, व्हिस्की जरूरत सी बन गई है। मुश्किल यह है कि जब अनवर की याद सताने लगती है तो व्हिस्की पीकर बिना भोजन किए ही सो जाता है। किंतु अनवर को भुलाने की तमाम कोशिशें नाकाम ही रहती हैं। क्योंकि अनवर के साथ ही जुड़ी हैं पिंकी की यादें। भला अपनी जिंदगी को कोई कैसे भूल सकता है? आजकल मीट भी नहीं बनाता है। भला अकेले बंदे के लिए क्या भोजन पकाना? मीट खाना लगभग छूट ही गया है।

स्कूली जीवन में भी मीट कहाँ खाता था। घर में माँ और पिता दोनों ही शाकाहारी थे। अवतार की बहन निम्मो भी शाकाहारी है। अवतार ने खुद भी लंदन आकर ही मीट खाना शुरू किया था। हालाँकि जानता था कि इनसान को मीट नहीं खाना चाहिए। बहुत देर तक शाकाहार पर लेक्चर दे सकता था। लेकिन फिर भी दोस्तों के साथ बैठ कर मीट खा लेता था। हाँ एक बात तय थी कि न तो वह गाय का मीट खाता और न ही सुअर का गोश्त। ले दे कर चिकन और मछली ही खा पाता था।

स्कूल में भी एक दिन उसके दोस्त ने उसे मछली पेश की थी। मगर उन दिनों कहाँ खा सकता था मछली। मछली की महक से ही उबकाई महसूस हुई थी। तभी अचानक एक आवाज सुनाई दी थी, ‘अरे कहाँ पंडित जी को मछली खिला रहे हो? ... तुम सचमुच के सरदार तो हो न? या खाली बस पगड़ी सजा रखी है सिर पर? ’

यह आवाज थी सोफिया की। सोफिया भी दसवीं में पढ़ रही थी; वो भी विज्ञान की विद्यार्थी थी; फिर भी अवतार से अलग कक्षा में बैठती थी। सोफिया पढ़ रही थी बायलॉजी यानी कि मेडिकल साइंस और अवतार पढ़ रहा था मैकेनिकल और ज्योमैट्रिकल ड्राइंग यानी कि उसका लक्ष्य था इंजीनियर बनना। इसलिए विज्ञान के विद्यार्थी होने के बावजूद दोनों अलग अलग क्लास में बैठने को मजबूर थे।

किंतु दोनो की क्लासों के कमरे कुछ इस तरह के कोण बनाते थे, कि खिड़की में से दोनो एक दूसरे को निहार सकते थे। और दोनों यही किया भी करते थे। अवतार जरा झेंपू किस्म का लड़का था और सोफिया दबंग। सो लड़कों वाले सभी काम सोफिया को ही करने पड़ते। यद्यपि अवतार सोफिया को प्रेम का संदेश कभी प्रेषित नहीं कर पाया, फिर भी स्कूल में दोनों को लेकर खुसर-फुसर जरूर शुरू हो गई थी। ढिंढोरची अरुण माथुर तो एक एक को बताता फिरता, ‘बेटा देख लियो, सोफिया तो थोड़े दिनों में फूला हुआ पेट ले कर चलती दिखाई देगी। यह साला सरदार ऊपर से शरीफ बना फिरता है। खूब खेला खाया है। तुम क्या समझते हो छोड़ता होगा ऐसे माल को। गुरू, पेल रहा है आजकल, जोरों शोरों से। और सोफिया साली कौन सी कम है, लूट रही है मजे, सरदार के साथ भी, और नसीर सर के साथ भी। ऐश हैं लौंडी के, दोनों टाइप का मजा है गुरू।’

अवतार को इतनी ओछी बातें कभी पसंद नहीं आईं। वह चुप रह जाता। लेकिन सोफिया कहाँ चुप रहने वालों में थी, ‘अबे जा तूं, पेट फुलाऊँगी तो अपना; मजे लेती हूँ तो मैं लेती हूँ;... तूं क्यों मरा जा रहा है? जानती हूँ तेरे बस का तो कुछ है नहीं। तूं तो ढंग से पेशाब ही करले, तो भी हो गई तेरी कमाई।’

माथुर की मर्दानगी पर चोट होती तो वह तिलमिला जाता। लेकिन न तो वह स्वयं ही चुप होता और न ही सोफिया। जब से पिंकी अनवर के साथ भाग गई है, तब से अवतार को सोफिया की याद शिद्दत से सताने लगी है, ‘कहाँ होगी, क्या करती होगी, कैसा परिवार होगा। उसकी शादी तो हायर सेकेंडरी के बाद ही हो गई थी। अब तो उसके बच्चे भी जवान होंगे।’

अवतार और पिंकी तो अपना परिवार भी शुरू नहीं कर पाए। जब से लंदन आया है अपने हाथ का बना या ढाबे का खाना खाने को अभिशप्त है अवतार। अपने आप को व्यस्त रखने का प्रयास करता है। दोस्तों की एक लंबी से फेहरिस्त है। इंटीरियर डेकोरेटर का काम है अवतार का, दूसरों के घर सजाता है, लेकिन अपना घर नहीं बसा पाया।

बेचैन हो उठा है अवतार, उठ कर म्यूजिक सेंटर के पास जाता है, शिव कुमार शर्मा का सी.डी. लगा देता है। संतूर की लहरियों पर दिमाग बेलगाम तैरने लगता है। स्कूल यूनिफॉर्म में सोफिया फिर सामने आ खड़ी हुई है। उसके पिता तो राष्ट्रपति भवन में ही काम करते थे। उसका तो घर भी वहीं प्रेसिडेंट्स इस्टेट में था। लंदन आने के बाद एक बार गया भी था वहाँ। अपना स्कूल देखने के बहाने गया था। अपने स्कूल को भुला पाना भी कौन सा आसान काम था। सोफिया जिस क्लास में बैठती थी; जिस कॉरीडोर में चलती थी; जहाँ पहली बार उसके हाथ से हाथ मिलाया था... वो सब उसकी यादों के धरोहर हैं।

पता चला था कि सोफिया के अब्बा रिटायर हो कर जमुना पार किसी कालोनी में फ्लैट खरीद कर वहाँ चले गए हैं। अब तो असली दिल्ली जमुना पार ही बसती है। हालाँकि वहाँ वाले पुराने लोग आज भी जब जमुना पार करते हैं तो कहते हैं कि दिल्ली जा रहे हैं। अवतार ने अपने स्कूल को एक नया कंप्यूटर दान में दिया। आँखों में गीलापन लिए बस इतना ही कह पाया, ‘सर, इस स्कूल से इतना कुछ पाया है कि यह कर्ज तो कभी नहीं उतार सकता।’

अब तो प्रिंसिपल भी बदल गए हैं। उसके जमाने में तो बेदी साहब प्रिंसिपल हुआ करते थे। करीब छ: फुट लंबा कद, भरा हुआ शरीर, देखने में एकदम इटैलियन लगते थे। पूरा स्कूल उनसे डरता भी था। आज प्रिंसिपल के कमरे के बाहर की तख्ती बता रही है -ओम प्रकाश गुप्ता। तख्ती हिंदी में ही लगी है। बेदी साहब की शायद अंग्रेजी में थी। वैसे क्या फर्क पड़ता है कि तख्ती किस भाषा में है। प्रिंसिपल तो प्रिंसिपल ही रहेगा। प्रिंसिपल के कमरे के सामने एक खाली स्थान था जहाँ कुछ फूलों के पौधे लगे थे। उसके बाद दूसरा बरामदा था। और वहाँ था कंट्रोल रूम।

उस कंट्रोल रूम के इंचार्ज हुआ करते थे, सर आर.के. सीम। सीम सर से एक बार पूछा भी था कि उनके सरनेम का अर्थ क्या है। वे बस मुस्करा कर रह गए थे। सीम सर ड्राइंग भी पढ़ाते थे और कंट्रोल रूम भी देखते थे। अवतार की आवाज बहुत सुरीली थी। स्कूल में जब सुबह की प्रार्थना होती थी तो अवतार ही मुख्य गायक की तरह पहले प्रार्थना शुरू करता। बाकी तमाम बच्चे उसके पीछे पीछे गाते। अवतार जब जब एसेंबली के सामने जा कर प्रार्थना शुरू करता, सोफिया उसे निहारती। शरमाता हुआ अवतार अपना काम करता जाता। यदि किसी दिन बरसात हो रही होती तो अवतार को कंट्रोल रूम से ही प्रार्थना की शुरुआत करनी होती। उसदिन उसे सोफिया की मुस्कराहट कंट्रोल रूम के बेहिसाब बटनों में ही ढूँढ़नी पड़ती। सोफिया के लिए उस दिन प्रार्थना का कोई अर्थ ही नहीं होता।

इस कंट्रोल रूम में इतने बटन लगे रहते कि इस के भीतर का माहौल खासा रहस्यमयी लगता था। यदि स्कूल की ओर से कोई घोषणा करनी होती, तो कंट्रोल रूम से सीम सर या प्रिंसिपल वो घोषणा कर देते। यदि किसी क्लास में शोर हो रहा होता तो कंट्रोल रूम में उस क्लास की पूरी आवाज सुनाई दे जाती, और फिर गूँजती सीम सर की आवाज, ‘क्लास टेंथ-ए, मानीटर कम टू दि कंट्रोल रूम। इतना शोर क्यों हो रहा है।’ टेंथ-ए का मानीटर तो अवतार ही था। कई बार उसको भी बुलाया जाता था।

वैसे उसकी अपनी क्लास की सुनीता भी उसे चाहने लगी थी। अपने घर मिंटो रोड ले कर भी गई थी। उस दिन वह घर पर अकेली थी। लेकिन अवतार को समझ नहीं आया कि सुनीता उसे अकेले अपने घर क्यों ले गई, ‘अरे जब ममी पापा घर पर नहीं हैं, तो मुझे आने को क्यों कहा? तुमको तो मैं स्कूल में भी मिल लेता हूँ।’ आज सोचता है तो अपने पर स्वयं ही हँसी आ जाती है। लेकिन अब सुनीता का पता नहीं कि कहाँ है।

फोन फिर बजा है। अचानक उसे एक शरारत सूझती है। सोचता है कि थोड़ी देर राँग नंबर पर ही बात कर ली जाए। फोन उठाता है, ‘हलो!’

‘हलो, इज दैट अवतार सिंह!’

आवाज की भारतीयता को पहचानते हुए अवतार हिंदी में ही बोला, ‘जी मैं अवतार सिंह ही बोल रहा हूँ।’

‘अवतार, मैं सोफिया बोल रहीं हूँ दिल्ली से।’ आवाज में एक घबराहट भरी तेजी थी, ‘प्लीज मेरा नंबर नोट कर लो और मुझे दिल्ली फोन करो। तुम से जरूरी बात करनी है।’

अवतार ने यह भी नहीं पूछा कि कौन सोफिया; और अभी बात क्यों नहीं कर पा रही; अवतार क्यों फोन करे। बस कागज उठाया और फोन नंबर लिखने लगा।

फोन क्लिक से बंद हुआ और अवतार फोन हाथ में लिए ही खड़ा रह गया। कितने हक से सोफिया ने आदेश दे दिया था कि फोन करो। और अवतार भी तो कुछ कह नहीं पाया। मन में द्वंद्व है कि फोन करे या न करे। वह जानता है कि वो फोन करेगा। सोफिया का फोन हो, तो वह कैसे वापिस फोन किए बिना रह सकता है।

अवतार ने महसूस किया कि उसके हाथ काँप रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी किसी के व्यक्तित्व का इतना गहरा असर हो सकता है क्या? हो सकता हो या नहीं, किंतु हो तो रहा है। दिमाग सवाल पर सवाल पूछे जा रहा है, ‘आज कल देखने में कैसी लगती होगी? ...कितने बच्चे होंगे? पति है या मर गया? ...कहीं मुझ से शादी तो नहीं करना चाहती? ...क्या मैं किसी मुसलमान औरत से शादी कर सकता हूँ ...क्या अनवर और पिंकी की घटना के बाद वह किसी मुसलमान के प्रति कोमल भावनाएँ महसूस कर सकता है... और अगर शादी हुई तो कैसी होगी?... कोर्ट में या फिर निकाह? ‘फिर अपने आप पर कोफ्त होने लगी। क्या बेहूदा बातें सोचने बैठ गया है वो? पता नहीं उसे क्या जरूरत आन पड़ी है... कहीं पैसे तो नहीं माँगेगी? क्या फर्क पड़ता है अगर माँग भी ले तो। कम से कम उससे बात तो होगी। पैसे देना या न देना तो मुझ पर निर्भर करता है।

अवतार ने एक नंबर कहीं लिख कर रखा है जहाँ भारत की टेलीफोन कॉल पाँच पेंस प्रति मिनट में हो जाती है। सोचा बात तो लंबी चलने ही वाली है। वैसे भी पिछले दो तीन वर्षों में टेलीफोन कॉल की दरों में भारी कमी आई है। पाँच वर्ष पहले तो भारत फोन करना एक गुनाह जैसा लगता था। एक पाउंड बीस पेंस प्रति मिनट। दरें इतनी महँगी थीं, कि बात की चुभन जेब तक पहुँच जाती थी।

स्कूली अवतार ने सोफिया का नंबर मिला ही लिया। फोन का नंबर मिलाते मिलाते पिंकी, अनवर, श्रीवास्तव जी, सुनीता सभी धुँधले पड़ते जा रहे थे। अवतार को अर्जुन की तरह केवल सोफिया ही दिखाई दे रही थी। फोन की घंटी बजते ही सोफिया ने फोन उठा लिया, ‘हेलो अवतार! ...फोन करने में पूरे पाँच मिनट लगा दिए! मैं घबरा रही थी कि तुम फोन करोगे या नहीं।’

‘पाँच मिनट का इंतजार तुमको इतना लंबा लगा? यहाँ तो एक जिंदगी ही निकल गई!’

‘अरे तुम को तो बोलना भी आ गया!... फैंटेस्टिक!... मुझे तो डर था कि जो नंबर मुझे मिला, वो ठीक है या नहीं।’

‘कहाँ से लिया मेरा नंबर? ...वैसे कैसी हो? ...तुम्हारी आवाज तो आज भी वैसी ही है।’

‘अरे मेरा क्या पूछते हो। मैं तो कॉलेज तक भी नहीं पहुँच पाई। स्कूल के बाद ही मेरे कजन से मेरी शादी हो गई थी। मेरे चाचा का ही लड़का था - जावेद... दि बास्टर्ड लेफ्ट मी विद टू किड्ज।’

‘क्या! छोड़ गया तुम्हें!’ अचानक रोशनी की एक लकीर अवतार की आँखों के सामने झिलमिला उठी। हुआ क्या’

‘उसे हमेशा से शक था कि मेरा किसी हिंदू लड़के से चक्कर है... वो बस उस लड़के को कोई नाम, कोई चेहरा देने के चक्कर में था... गधे को पता नहीं कि हमने जिंदगी में बस एक ही लड़के को पसंद किया था... और वो हिंदू नहीं था... सरदार था!’

‘अरे हिंदू और सरदार में कोई फर्क थोड़े ही होता है... तुम्हारा तो पता नहीं, लेकिन मैं तो तुम्हारे चक्कर में था ही... वैसे चक्कर कोई अच्छा शब्द नहीं है। मैं तुम्हें प्यार करने लगा था।’

‘तुम और प्यार! ...लल्लू थे तुम, याद नहीं वो बात?’

‘कौन सी बात?’

‘अरे जब तुम प्रिंसिपल के पास मेरी शिकायत ले कर गए थे और उसके सामने घिघिया रहे थे कि सर मुझे एक लड़की छेड़ती है - सोफिया हक, तो प्रिंसिपल ने क्या जवाब दिया था?’

‘हाँ, बेदी सर जोर से हँसे थे और बोले थे, ‘अबे लल्लू, अगर वो छेड़ती है तो तू छिड़। बेवकूफ तुझे जरा भी शर्म नहीं आती कि तू एक लड़की की शिकायत कर रहा है?... हम इतने बड़े हो गए हैं लेकिन आजतक हमें किसी लड़की ने नहीं छेड़ा। अरे तुम सचमुच बीसवीं सदी के लड़के हो या विक्टोरियन एज के बचे हुए नमूने हो?’

‘तुम को एक बात बताऊँ, तुम हमेशा बहुत शरीफ लगा करते थे... तुम्हारी पगड़ी इतनी स्टाइलिश बँधी होती थी कि मैं तो फिदा ही हो गई थी।’

‘वैसे एक बात बताओ, अगर मैं झेंपू किस्म की चीज नहीं होता तो क्या होता। हमारी दोस्ती कहाँ तक पहुँच जाती?’

‘अरे वो माथुर याद है?... जो वो कहता था, बस वही हो जाता... मैं पेट फुलाए स्कूल में आती कि अवतार जी ने मेरे पेट में नया अवतार लिया है! हा हा हा हा... वैसे क्या तुम्हारा कभी जी नहीं चाहा कि आगे बढ़ कर मेरा हाथ पकड़ लो?’

‘जी चाहने से क्या होता है? हिम्मत भी तो होनी चाहिए। मुझ में तुम्हारे वाली हिम्मत ही कहाँ थी? ... तुम्हें वो उषा याद है क्या?’

‘कौन सी उषा?’

‘वही जो स्कूल के बाहर ही रहती थी। आर्ट्स में थी। वो मुकेश का गाना गाया करती थी, जिएँगे मगर मुस्करा न सकेंगे, कि अब जिंदगी में मुहब्ब्त नहीं है।’

‘हाँ जी, उस रोंदड़ को कौन भूल सकता है। बोलती थी तो लगता था कि अब रोई के तब रोई... उसने छ: साल तक बस वो एक ही गाना सुना सुना कर बोर कर दिया...। वैसे अवतार, गाती ठीक थी, ...मुझे मुस्कराए हुए तो एक जमाना ही बीत गया है।’

‘जानती हो उसने एक दिन मुझे कहा था कि अवतार तुम कोई माडर्न नाम रख लो न! आई विल कॉल यू ऐवी! अवतार बहुत पुराना सा नाम लगता है। तुम में जो सेक्स अपील है, नाम भी वैसा ही होना चाहिए... उसके बाद उसने मुझे हमेशा ऐवी कह कर ही बुलाया... मुझे पता ही नहीं चलता था कि मुझे बुला रही है... वैसे रोंदड़ नहीं थी यार। अच्छी भली लड़की थी... साँवली भी थी। मुझे गोरे रंग के मुकाबले हमेशा साँवला रंग ज्यादा अट्रेक्ट करता है।’

‘मैने भी नोट किया था कि तुमने यह बात स्कूल में दो तीन बार दोहराई थी। तुम्हें अपर्णा सेन बहुत सुंदर लगती थी... गोरी चिट्टी हिरोइनें नहीं... फिर इंग्लैंड में क्या करते हो?... किसी गोरी मेम से चक्कर नहीं चला क्या?’

‘अरे हमारा क्या चक्कर चलना, एक शादी की थी, वो भी सँभाली नहीं गई... फिर से कुँआरा बना बैठा हूँ।’

‘हाँ अशोक बख्शी और नरेश मिले थे। दोनों ने बताया कि तुम उनसे कांटेक्ट रखते हो। उन्होंने ही बताया कि तुम्हारा डिवोर्स हो गया या समथिंग लाईक दैट।’

‘हाँ बख्शी और नरेश तो अब भी मिलते हैं। लेकिन बाकी की क्लास से तो कट ही गया... तुम मेरी छोड़ो, अपनी बताओ। तुम्हारे जावेद मियाँ का क्या हुआ?’

‘होना क्या था यार, बस शक्की दिमाग का आदमी था। मेरी गोद में दो लड़कियाँ डाल कर कहीं भाग गया। आजकल एक प्राइवेट नौकरी कर रही हूँ। साला गुजारा तक ठीक से नहीं हो पाता। मैने अपनी बड़ी वाली की तो शादी भी कर दी थी। लेकिन उसकी किस्मत मेरे से भी ज्यादा खराब निकली।’

‘अरे तुम्हारी बेटी की भी शादी हो गई?’

‘शादी भी और विधवा भी... अब क्या बताऊँ तुम्हें।’

‘यार यह सुन कर तो लगने लगा है कि मैं भी बूढ़ा होता जा रहा हूँ। क्या हम इतने बड़े हो गए हैं कि हमारे बच्चों की शादियाँ होने लगें? अपने यार को तो यह एक्सपीरियेंस कभी हुआ ही नहीं।’

‘अवतार मियाँ तुम भूल रहे हो कि मेरी शादी हायर सेकेंडरी पास करते ही हो गई थी। अभी तो अट्ठारह की भी नहीं हुई थी... जब शादी होगी, तो सुहागरात भी होगी... और जब वो होती है तो पेट फूल ही जाता है। दो बार फूला और दो बार हवा निकलवा दी। वर्ना चार चार को ले कर बैठी होती। हमारे मर्द भी तो जाहिल होते हैं। उनके लिए औरत बस इसी काम के लिए होती है। हर साल एक बच्चा बाहर निकाल लो... बेगैरत होते हैं सब।’

‘आई एम सॉरी सोफी! मुझे कुछ भी नहीं पता था... वैसे तुम बोलती आज भी उतना ही बिंदास हो...’

‘जानते हो कितना जी चाहता था कि मुझे कोई सोफी कह कर लिपटा ले अपने साथ। आज पहली बार किसी मर्द ने मुझे यह कह कर बुलाया है। लगता है अचानक नई नवेली दुल्हन बन गई हूँ। काश मैं भी कॉलेज और यूनिवर्सिटी जा पाती। मुझ में भी थोड़ी नफासत आ जाती। मुझे तो नौकरी भी वैसी ही मिली हुई है जैसी किसी हायर सेकेंडरी पास टाइपिस्ट को मिल सकती है। बस टाइपिंग सीख ली थी जो काम आ रही है।’

‘काम क्या करता था जावेद?’

‘जमादार था नामुराद। निकम्मा एक नंबर का बाप के सिर पर खा रहा था और मुझे भी खिला रहा था। वो भागा तो उसके बाप ने मुझे और बच्चियों को भी निकाल बाहर किया... वैसे तो मैं तुम्हें कभी भूली ही नहीं थी... पर उन दिनों तुम्हारी बहुत याद आयी। तुम हिंदू लोग अपने परिवार को कितना प्यार करते हो।’

‘नहीं सोफी ऐसी कोई बात नहीं। अच्छे लोग अच्छे ही होते हैं। चाहे वो हिंदू हों या फिर मुसलमान या ईसाई... वैसे थोड़ी देर पहले तुमने मुझे सिख कहा था! ...अब देखो मेरी पत्नी मुझे छोड़ कर अनवर के साथ चली गई। उसे कोई मुसलमान पसंद आ गया। मैंने सुना है अब तो दोनों के दो बच्चे भी हैं।’

‘या अल्लाह, तुम कैसे मर्द हो जी। अपनी बीवी को जाने दिया? दो झापड़ नहीं लगाए उसे?’

‘सोफी घर बनता है प्यार से, विश्वास से। झापड़ से घर टूटते हैं बनते नहीं।’

‘एक बात बताओ।’

‘पूछो।’

‘तुम हिंदू लोग क्या अपनी पूरी तन्ख्वाह अपनी बीवी को दे देते हो? ...क्या घर का खर्चा वो चलाती है? हमारे पड़ोस में दो तीन पहचान वाली हैं। जब वो बात करती हैं तो जलन सी होती है। वो अपने मरद के बारे में कितने हक से बात करती हैं। हमारे मरद तो गिन गिन कर पैसे निकालते हैं दाँत के नीचे से।’

‘मैं औरों की बात तो नहीं कह सकता सोफी, लेकिन हमारे अपने घर में तो सारा खर्चा पहले दादी चलाती थी फिर माँ और यहाँ लंदन में पिंकी। हमें लगता है कि हम कमा कर थक जाते हैं, इसलिए खर्चे का हिसाब बीवी को करने देते हैं... बीवी घर की मालकिन जो होती है।’

‘अल्लाह करे कि हमारे मरद भी तुम लोगों की तरह सोचने लगें। यहाँ तो मामला एकदम उलट ही होता है।’

‘...’

‘...’

‘कुछ बोलो न, तुम चुप क्यों हो गए? ’

‘नहीं कुछ नहीं, बस स्कूल के दिनों की बातें याद आ रही थीं... याद है हमने स्कूल में पहली हड़ताल करवाई थी?’

‘मियाँ हमने मत कहिए। वो हड़ताल तो पूरी तरह से आपके दिमाग की उपज थी। और हड़ताल करवा कर खुद मेरठ भाग गए... डरपोक कहीं के!’

‘ऐसी बात नहीं है सोफी, तीन दिन तक तो हम सब इकट्ठे तालकटोरा गार्डन में नारे लगा रहे थे। पहली बार प्रिंसिपल सर से बात करने भी तो मैं ही गया था। वो तो मेरी नानी अचानक हस्पताल में भर्ती हो गई थी। इसलिए मुझे जाना पड़ा। मगर वापिस आकर सारा जिम्मा तो मैने अपने सिर ले लिया था।’

‘लेकिन मुझे तुम पर बहुत गुस्सा आ रहा था उन दिनों। तुम चाह रहे थे कि हायर सेकेंडरी के इम्तहान से पहले प्रिपरेटरी लीव मिले और मैं चाह रही थी कि आखिरी दिन तक स्कूल चले। इस तरह तुम से आखिरी दिन तक मिल सकती थी।’

‘मैंने इस ऐंगल से कभी सोचा ही नहीं। मैं तो बस लीडर बना हुआ था। फिर माथुर और खन्ना ने मुझे बाँस के झाड़ पर चढ़ा दिया था। मुझे भी लगने लगा था कि मैं कोई लीडर बन गया हूँ... अब सोचता हूँ तो हँसी आती है।’

‘तुम प्रिंसिपल के चहेते थे, इसलिए बच भी गए, वर्ना वो छोड़ता नहीं।’

‘वैसे अपनी फेयरवेल याद है क्या?’

‘अरे उसे कौन भूलना चाहेगा। तुम्हारे साथ लिया गया जिंदगी का एक अकेला चुंबन। मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा था कि दाढ़ी वाले चेहरे पर किस कहाँ करूँ... जबरदस्त करंट लगा था। तुम तो कुछ कर ही नहीं रहे थे। अगर मैं न हिम्मत करती तो यह यादगार पल भी हमारी जिंदगी में कभी न आ पाता।’

‘इसीलिए तो मैं भी तुम्हें कभी नहीं भूल पाया। तुम वो पहली लड़की हो जिसको छूकर मुझे पता चला था कि औरत मर्द से कितनी अलग होती है। दोनों के मिलने से क्या फीलिंग होती है।’

‘और अब कितने तरह की कितनी औरतें तुम्हारे जीवन में आ चुकी हैं?’

घबरा सा गया अवतार। वैसे उसे सोफिया से ऐसे प्रश्न की आशा तो होनी ही चाहिए थी, ‘अरे कहाँ सोफी, हमारी जिंदगी में कहाँ ऐसी बहार है। एक थी वो भी छोड़ कर चली गई।’

‘घबराइए मत, इंशाअल्लाह जल्दी ही बहारें लौट भी आएँगी... तुम्हारा कोई बच्चा नहीं हुआ पहली बीवी से?’

‘अरे पहली क्या और आखिरी क्या। हमारी ले दे कर एक ही तो बीवी हुई। अभी बच्चे के बारे में सोचा ही नहीं था कि बीवी डोली में बैठ कर पराए घर चली गई... सुनो, दो दो बच्चों के साथ तुम्हें मुश्किल तो बहुत होती होगी... बेटी इतनी कम उम्र में विधवा कैसे हो गई?’

‘क्या बताऊँ दोस्त, अल्लाह की मर्जी के आगे किस का जोर चलता है। जल्दबाजी में बेटी की शादी कर दी। अपनी अम्मी की रिश्तेदारी में ही की थी। लड़का श्रीनगर में नौकरी करता था। सोचा कि लड़की को दिल्ली से दूर भेज दूँ ताकि मनहूस बाप का साया भी न पड़ सके उसकी जिंदगी पर। लेकिन क्या बताऊँ...!’

‘बोलो न, क्या हुआ फिर?’

‘वो लड़का तो आतंकवादी निकल गया। किसी गिरोह के साथ मिल कर दहश्तगर्दी का काम करता था। एक दिन पुलिस के साथ मुठभेड़ हो गई, और गोली लगी उसके दो कानों के ठीक बीच। वहीं सड़क पर ही ढेर हो गया। अभी तो बेटी को यह भी नहीं पता चला था कि शादी का मतलब क्या होता है, और बेचारी बेवा भी हो गई। तीन महीने ही तो रही अपने ससुराल। पुलिस की दरिंदगी से बचाने के लिए मैं उसे वापिस दिल्ली ले आई। अब तो सब अल्लाह पर नजरें टिकी हैं।’

‘सोफी अगर मैं कोई मदद कर सकूँ तो कहो। तुम्हारी बेटी मेरी भी तो कुछ लगती है। उसका दुःख मेरा भी तो दुःख है।’

‘अरे अब तुम्हें ही तो सब करना है। मैं तो थक सी गई हूँ।’ आँसू सोफिया के शब्दों के साथ टेलीफोन से बाहर आए जा रहे थे।

रोते रोते सोफिया ने टेलीफोन बंद कर दिया। अवतार हेलो हेलो ही करता रह गया।

अब सोफिया ने अवतार के दिल-ओ-दिमाग पर कब्जा बना लिया था। शाम को शराब के गिलास में जब पानी डाला तो लगा कि सोफिया के बदन पर होली का रंग डाल रहा है। कुछ नहीं में सब कुछ दिखाई देने लगा था।

दिमाग में बहुत से सवाल कुलबुलाने लगे - ‘आखिर सोफिया मुझ से चाहती क्या है? ... क्या मुझ से विवाह करना चाहती है... ताकि मैं उसकी बेटी की जिम्मेदारी उठा लूँ? क्या मुझे इस लफड़े में पड़ना चाहिए? ... इतने वर्षों में न जाने सोफिया कैसी औरत बन गई होगी? ...उसका दामाद तो आतंकवादी था। कहीं... वो और उसकी बेटी भी? ...यह क्या बेहूदा बातें सोचना लगा है? ... लेकिन ...फिर इतने लंबे समय के बाद अचानक उसे मेरी याद क्यों आई... बात यही होगी... वर्ना ऐसे ही थोड़े मुझे फोन किया है!’

कुछ नहीं के पैग की मात्रा में आज अतिरिक्त वृद्धि हो गई थी। तीन के बाद भी रुक नहीं पा रहा। अवतार लगातार पीता जा रहा है। आज पिंकी उसके सिस्टम में से निकल कर कहीं दूर चली गई है जबकि अनवर का चेहरा धुँधला होता जा रहा है - बस एक ही चेहरा आँखों के सामने है, किंतु वो चेहरा भी क्या सचमुच का चेहरा है? जो आवाज आज टेलीफोन लाइन पर सुनाई दी थी, उसका चेहरा तो स्कूल की यूनिफॉर्म पहने सोफिया का था। आज का चेहरा कहाँ है?

रात बिना कपड़े बदले ही बिस्तर पर लुड़क गया था। साइड टेबल पर शराब का गिलास अभी भी आधा भरा पड़ा था। भारी सिर लिए सुबह उठा। लगभग घिसटता हुआ बाथरूम तक गया। सोफिया ने उसकी सपाट जिंदगी में अचानक हलचल मचा दी थी। उसकी बेटी के भविष्य के बारे में चिंता होने लगी थी। अगर धर्म आड़े न आ गए होते तो शायद यह लड़की उसकी अपनी बेटी होती... सोच बेलगाम हो कर दौड़े जा रही थी।

फोन की घंटी फिर बजी...। आज दुविधा बढ़ गई थी। फोन उठाए या नहीं? कहीं सोफिया का न हो... अभी निर्णय ले ही नहीं पाया था कि फोन की आंसरिंग मशीन शुरू हो गई... किसी ने कोई संदेश नहीं छोड़ा... बस सोच रहा है... किसका फोन हो सकता है? क्या यह ठीक रहेगा कि वह सोफिया के फोन की प्रतीक्षा करता रहे। सोफिया तो रोते रोते फोन बंद कर गई। क्या यह उसका कर्तव्य नहीं बनता कि वह स्वयं आगे बढ़ कर सोफिया को फोन करे और उसके आँसू पोंछ दे।

पूरी चौबीस घंटे बीत गए हैं... अपने आपको संयत करने का प्रयास कर रहा है अवतार। तय नहीं कर पा रहा है कि सोफिया के प्रति कैसा रवैया अपनाए। न जाने सोफिया इतने लंबे अर्से में किस किस तरह के लोगों से मुलाकात करती रही है... फिर एक गंदी-सी सोच दिल में आती है... साले मुसलमान मेरी बीवी को ले गए हैं, मैं भी किसी मुसलमान लड़की के साथ घर बसा लूँ तो हिसाब बराबर हो जाएगा। फिर अपने आपको ही डाँट लगाता है। कितनी घटिया बात सोचने लगा है! आज नहीं तो कभी तो प्यार किया था सोफिया से। अवतार तो बेगानों के बारे में ऐसी बातें नहीं सोचता, तो फिर...? फिर तय करता है। ठीक है, मैं पहले फोन नहीं करूँगा। लेकिन यदि सोफिया करेगी तो उसको प्रोपोज कर दूँगा।

टेलीफोन लाइन में फिर हलचल हुई। घंटी बजी। अपनी चिर-परिचित आवाज में बोला, ‘हाँ जी?’

‘वाह जी, लंदन में रहके भी हाँजी कहने की आदत अभी भी चल रही है! मान गए भई।’

‘तुम फोन रखो, मैं करता हूँ।’

‘कोई बात नहीं अवतार, आज तो कार्ड खरीद रखा है।’

‘कोई बात नहीं, कभी इमरजेंसी में काम आ जाएगा। अभी फोन रखो, मैं करता हूँ।’

सोफिया ने फोन नीचे रखने से पहले कह ही दिया, ‘मेरे सरदारा, तू है बड़ा प्यारा!’

अब मुश्किल अवतार की थी, फोन मिलाते हुए उँगलियाँ काँप रही थीं, दिल धड़क रहा था। फिर भी फोन तो मिलाना ही था। फोन मिला, ‘हाँ, बोलिए।’

‘कल हम क्या बात कर रहे थे?’

‘तुम कह रही थीं कि सब कुछ मुझे ही करना है। लेकिन तुमने बताया नहीं कि करना क्या है।’

‘बस मेरी पगली बेटी के लिए कुछ कर दो।’

‘लेकिन अगर मैं तुम्हारे लिए कुछ करना चाहूँ तो?’

‘अब मेरी ऐसी उम्र कहाँ रह गई अवतार। अब तो अपने बच्चों के लिए जी रहे हैं।’

‘हम अपने लिए कभी भी जी पायेंगे क्या?’

‘देखो अवतार अब हालात बहुत खराब हो चुके हैं। तुम मेरी बेटी के बारे में सीरियसली सोचो।’

‘तुम बताओ, क्या चाहती हो तुम?’

‘देखो अगर उसको किसी तरह लंदन बुलवा सको और वहाँ सैटल करवा सको तो उस बिन बाप की बेटी की जिंदगी बन जाएगी... वैसे निगोड़ी है तो बी.ए. सेकेंड ईयर पास। पूरी करने से पहले ही उसका निकाह जो हो गया था।’

‘बात तो तुम्हारी ठीक है पर यहाँ ब्रिटेन में आजकल कानून बहुत मुश्किल हो गए हैं। या तो लड़की प्रोफेशनल हो ऊँची पढ़ाई वाली या फिर किसी से शादी करके यहाँ सैटल हो सकती है। मैं अपने पहचान वालों से बात करके देखता हूँ अगर कोई शादी के लिए लड़का मिल जाए तो...’

‘...’

‘...’

‘हैलो सोफी, क्या तुम लाइन पर हो? हैलो...!’

‘हाँ अवतार, सुन रही हूँ... तुम मेरी बात सुनो... तुम मेरे दोस्त हो... तुम तो मुझ से प्यार भी करते थे... तुम आजकल हो भी अकेले... भला तुम... तुम खुद ही मेरी बेटी से शादी क्यों नहीं कर लेते? तुम्हारा घर भी बस जाएगा और मेरी बेटी की जिंदगी भी सैटल हो जाएगी... तुम सुन रहे हो...।’

अवतार को लगा जैसे टेलीफोन लाइन में बहुत घरघराहट-सी पैदा हो गई है। उसे सोफी की आवाज बिल्कुल सुनाई नहीं दे रही। उसने टेलीफोन बंद कर दिया।


End Text   End Text    End Text