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कहानी

एक टूटी-फूटी कहानी
शर्मिला बोहरा जालान


मैं उन्हें देखकर देखती ही रही। एकदम रीना आंटी जैसी ही लगती हैं सुस्मिता आंटी। वैसी ही बड़ी बड़ी आँखें। छोटे-छोटे केश। हँसी भी दोनों की एक सी। हाँ, रीना आंटी जहाँ लंबी हैं सुस्मिता नाटी-सी। कहीं दोनों बहनें तो नहीं! नहीं बहनें कहाँ हैं! निकली बचपन की सहेलियाँ। बस कुछ ही दिन छोटी-बड़ी दो सखी। साथ खेली-पढ़ी-बड़ी हुई। क्या स्वभाव के साथ शक्ल भी मिलने लगी है? ...चमत्कार है! यह भी तो चमत्कार ही है कि रीना आंटी के पति की शक्ल भी रीना आंटी सी है। वैसे ही गोरे-चिट्टे। लाल-लाल गाल। केशों का विन्यास भी एक जैसा। पति-पत्नी दोनों एक तरह के केश रखते ऐसा पहली बार देखा और पाया। हे भगवान, मैं चकित हूँ! सुस्मिता आंटी को बताउँगी कि मैं कैसे रीना आंटी रीना आंटी और उनके पति को देखकर अचंभे में पड़ गई हूँ। पर यह सुस्मिता आंटी क्या कह रही हैं? यह तो कह रही हैं कि जिसे मैं रीना का पति कह रही हूँ वह उसका पति नहीं है। तो भाई होगा! तभी दोनों की शक्लें मिलती हैं। लेकिन सुस्मिता आंटी कह रही हैं उनका भाई-वाई नहीं। वह तो उनकी सहेली हैं लीना। ये तीनों बचपन की सहेलियाँ हैं, लीना, रीना, सुस्मिता। मैं इस कहानी में पागल हो जाउँगी। कैसी अजीब-अजीब बातें सामने आ रही हैं। सुस्मिता आंटी कह रहीं है कि लीना जिन्हें मैंने रीना आंटी का पति या भाई समझा, दरअसल वह महिला हैं। पुरुष नहीं।

क्या वह लड़की हैं? लड़की! महिला। ऐसा कैसे हो सकता है! वह पुरुष था। पुरुष लगा था। उफ, पुरुष ही था। थियेटर रोड पर स्थित रेमंड्स कपड़ों की दुकान में रीना आंटी के साथ मैंने गोरे-चिट्टे, लाल-लाल गाल वाले पुरुष को देखा था। बहुत सारी लड़कियाँ और महिलाएँ पुरुषों की पोशाक पहनती हैं पर देखने वालों की आँखों को भ्रम नहीं होता। तत्काल बात समझ में आती है कि पुरुष की पोशाक में महिला है। रीना आंटी को ही देख लें! क्या वह पैंट-शर्ट ही अक्सर पहने नहीं रहतीं? पर लगती तो स्त्री ही हैं।

सुस्मिता आंटी मेरी बात पर थोड़ी हँसी, फिर बोली, "हाँ, लीना ऐसी ही है। उसे पहचानने में धोखा होता है। वह लड़कों का रूमाल इस्तेमाल करती है। चाल-ढाल भी मर्दाना है।"

तो फिर रीना आंटी का पति, कहीं वह लंबा सा आदमी तो नहीं जो उसी दुकान में लीना और रीना से थोड़ी दूर पर खड़ा एक नीले रंग की शर्ट निकलवा रहा था। जरा सुस्मिता आंटी से पूछ लूँ। हो न हो वह रीना आंटी का पति था। वैसे मुझे रीना आंटी के विषय में इतनी बात जानने-पूछने कि क्या जरूरत है। नहीं जानने से भी चलेगा, पर मन हो रहा है जानने-पूछने का। रीना आंटी सुंदर हैं। भगवान करे वह लंबा आदमी, जिसकी शक्ल मैं देख नहीं पाई वह भी सुंदर हो। सुस्मिता आंटी, जो रीना आंटी की सहेली हैं, यही कहें कि वह सुंदर हैं। संकोच कैसा। पूछ लूँ? मैं पूछ क्यों नहीं पा रही? अच्छा, अब पूछती हूँ।

"सुस्मिता आंटी, यह तो बताएँ कि रीना आंटी के पति लंबे और देखने में अच्छे हैं न?"

"आपने कब देखा रीना के पति को?"

"उसी दिन। वहीं रेमंड्स में।"

"नहीं-नहीं। आपने किसी और को देखा होगा। रीना तो कुँवारी है। कहाँ की अभी तक उसने शादी?"

क्या? यह क्या कह रही हैं सुस्मिता आंटी! ऐसा कैसे हो सकता है! उन्होंने शादी नहीं की? क्यों? वह इतनी हँसमुख और अच्छी हैं। आँखें ममत्व से भरी। विश्वास नहीं हो रहा है कि उन्होंने शादी नहीं की। सुस्मिता आंटी तो विचित्र-सी और भी नई-नई बात कह रही हैं कि लीना भी कुँवारी हैं।

दोनों कुँवारी हैं।

दोनों साथ रहती हैं।

उनमें से एक एकदम पुरुष लगती हैं!

कहीं दोनों लेस्बियन...!

छोड़ो, जाने दो। मुझे इन सब बातों से क्या लेना देना! किसी के बारे में इतनी दूर तक जाकर क्या सोचना। मुझे तो सिर्फ इस बात से मतलब रखना चाहिए कि मैं मुन्ना को सुस्मिता आंटी, जो एक बंगाली महिला हैं, उनके पास पढ़ने ले जाती हूँ। वह एक अनुभवी हँसमुख शिक्षिका हैं।

मुन्ना ने कहा, कहानी सुनाओ। रात तो कहानी के लिए होती है तो मैंने कहा सुनाऊँगी नहीं, बनाऊँगी। चलो हम-तुम कहानी बनाएँ। और मैं ऐसी कहानी बुनने लगी कि मुन्ने को कुछ भी समझ में नहीं आ रही।

"मुन्ना मेरा बेटा! और पास आओ। चिपक जाओ।"

"मम्मी, आपकी आँखें क्यों खुली हुई हैं?"

"मैं तारे देख रही हूँ।"

"मैं भी देखूँगा।"

"देखो।"

"कितने अच्छे हैं ये तारे सुंदर-सुंदर। मम्मी ये तारे सुंदर हैं न?"

"हूँ।"

"हूँ मत कहिए। कहिए हाँ जी।" सुस्मिता आंटी कहती हैं पुकारने पर हूँ-हूँ मत किया करो। कहा करो, हाँ जी।"

"अच्छा। मेरे अच्छे मुन्ना। मुन्ना तुम बहुत अच्छे हो।"

"मम्मी, आप भी बहुत अच्छी हैं। माँ माई।"

"मुन्ना, मुन्नू म।"

"म क्या होता है मम्मी?"

"म होता है मेरा।"

"म होता है मेरी मम्मी।"

"मम्मी अच्छी लगती है?"

"मम्मी अच्छी है। अच्छी लगती है।"

"और?"

"और सुस्मिता आंटी भी। और वह आदमी भी जो चौकीदार है। जो हमारे मकान से सटकर दूसरा जो मकान है उसके सामने बैठा रहता है। जो चित्र बनाता है। जो खेत-पेड़-गाय और तालाब बनाता है। मैं उतनी सुंदर गाय नहीं न बना सकता। मम्मी क्या उसकी मम्मी ने भी उसे ड्राइंग सीखने स्कूल भेजा था?"

"मुझे क्या मालूम, उसकी मम्मी ने उसके लिए क्या किया था?"

"मम्मी, क्या वह चौकीदार भी जब छोटा था त्रिभुज के अंदर रंग न भरकर बाहर फैला देता था?"

"मुझे नहीं मालूम।"

"आपको क्यों नहीं मालूम?"

"मैंने पूछा नहीं।"

"आपने क्यों नहीं पूछा?"

"वह एक सिक्योरिटी गार्ड है और मैं चौकीदारों से बात नहीं करती।"

"आप झूठ बोलती हैं। कल तो आपने हमारे घरवाले चौकीदार से बात की थी।"

"मुन्ना तुम बहुत बोलने लगे हो। मैंने घर के चौकीदार से यह कहा था कि दरवाजा जल्दी खोलो। यह सब नहीं पूछा था कि वह चित्र बनाता था कि कसरत करता था?"

"यह कसरत क्या होता है?"

"उफ, तुम्हारे क्यों-क्या का मेरा पास जवाब नहीं।"

"मत दीजिए जवाब। मुझे पता है आप मुझे प्यार नहीं करती। कुछ पूछता हूँ तो बताती नहीं हैं। कहानी भी नहीं सुनाती-बनाती।"

"नहीं-नहीं मुन्ना, ऐसी बात नहीं। मैंने तुम्हें सुनाई थी न कहानी! सुस्मिता आंटी और लीना आंटी की।"

"वह कहानी मेरी समझ में नहीं आई। एकदम फालतू थी, टूटी-फूटी।"

"पर उसे पूरी करनी होगी।"

"नहीं। पड़ी रहने दो।"

"तो चलो दूसरी कहानी बनाएँ। एक बंदर था। उसके पास एक बिल्ली आई!"

"नहीं-नहीं, यह बंदर बिल्ली की कहानी नहीं।"

"तो किसकी?"

"उस आदमी की जो बंदर बिल्ली बना रहा था।"

"मैं उसकी कहानी नहीं जानती।"

"तभी तो कह रहा हूँ बनाइए।"

"देखो, सोचो। हाँ उसका नाम हरि है। वह एक जगह, मान लो कोडरमा में पैदा हुआ था। वह बहुत अच्छा था पढ़ने में। वह अपनी मम्मी को तंग नहीं करता था। वह बहुत सुंदर अच्छे चित्र बनाता था। वह सोचता था कि वह हमेशा वैसे सुंदर अच्छे चित्र बनाएगा। पर वह एक दिन चौकीदार बन गया।"

"वह आज भी चित्र बनाता है?"

"हाँ बनाता है।"

"मैं भी चित्र बनाता हूँ तो मैं भी चौकीदार ही बनूँगा।"

"एक थप्पड़ मारूँगी तुम्हें ऐसी-वैसी बात करोगे तो!"

"मैं ऐसी-वैसी बात थोड़े न कर रहा हूँ, मैं तो कहानी बना रहा हूँ।"

"इस तरह की कहानी मत बनाओ। सो जाओ।"

मुन्ना लगता है सो गया। न जाने इसके मन-दिमाग में भी कौन-कौन घूमते हैं। कैसे ख्याल इसे आते हैं! और नहीं तो चौकीदार की रामायण लेकर बैठ गया। क्या मेरा यही काम रह गया है कि मैं चौकीदारों के बारे में सोचूँ, चर्चा करूँ? वह तो सिक्योरिटी गार्ड है, जो आईसीआईसीआई बैंक के एटीएम पर बैठता है, जिसके लिए मुन्ना कह रहा था कि वह चित्र बनाता है, कल उसने कैसा अश्लील चित्र बनाया था। कहने को तो माँ काली की तसवीर थी पर भौंडी व भद्दी सी बनाकर मुन्ना के हाथ में थमा दी। मैंने नौकर भुवनेश्वर को हजार बार मना किया है कि मुन्ना को पार्क से, स्कूल से सीधे घर लाया करो। इधर-उधर गप्प लड़ाने मत बैठा करो। न जाने कहाँ-कहाँ किसके पास ले जाते हो, कैसे आचरण वह देखता है। पर भुवनेश्वर भी बस ऐसा ही है। कोई भी बात सुनता नहीं। उलटे कहेगा। मुन्ना चौकीदार के पास ले जाने की जिद करता है, उससे तसवीर बनवाता है। सब समझती हूँ मैं इस चौकीदार की कहानी। जानबूझकर गंदी तस्वीरें बनाता है। कैसे घूरता है। और कुछ नहीं तो चौकीदार बन गया। जान-बूझकर बना है कि घूर सके औरतों कों। ये भी कोई काम है कि पूरे दिन बैठे रहो कुर्सी पर। हाथ की अँगुलियों को बजाते रहो और देखते रहो, ताकते रहो औरतों को। न बदन हिलाना न डुलाना। पड़े-पड़े बन जाओ आलसी। मैं पूरे दिन में दो-तीन बार नीचे उतर इधर-उधर हो आती हूँ, घूम आती हूँ पर वह वहीं वैसे ही कुर्सी से सटा बैठा मिलता है। कुर्सी के घेरे के आसपास। पूरे बारह घंटे तक। कैसा जीवन है इसका! यहाँ हाजरा रोड की गली में तीन जगहों पर सिक्योरिटी गार्ड दिखलाई पड़ते हैं। दो तो दो मकानों के सामने खड़े रहते हैं और एक इस बैंक के सामने। एक मकान का गार्ड बूढ़ा है। साठ से ऊपर होगी उसकी उमर। तभी तो उसकी तनख्वाह भी कम है। दूसरे मकान का गार्ड भी पैंतालीस से ज्यादा उमर का है। बस इस बैंक के सामने का चौकीदार युवा गार्ड है। भुवनेश्वर बता रहा था कि जो युवा गार्ड है वह मौलवी है और जो बूढ़ा है वह ब्राह्मण। भुवनेश्वर मुन्ना के पापा को यह भी बता रहा था कि आजकल सब चौकीदार बनना चाहते हैं। शहरों में आजकल ऐसे काम मिलने लगे हैं। परसों रामलाल दादाजी आए थे। कह रहे थे उनके घर के बगल में थियेटर रोड पर सफेद रंग का मकान है उसमें एक नया गार्ड आया है। जिसका नाम है - राजकुमार। कहने लगे वह सचमुच राजकुमार लगता है। ऐसा सुंदर सजग-चुस्त-फुर्तीला। दादाजी भी पागल हो गए। चौकीदार को राजकुमार कहने लगे। उनकी बातें सचमुच विचित्र होती हैं। किसी जमाने में समाजवाद की किताबें खूब पढ़ा करते थे। चौकीदार क्या कभी राजकुमार लग सकता है? पर कौन उनको समझाए। एकदम सनकी हैं। अच्छा ही हुआ जो मुन्ना उनसे नहीं मिला। नहीं तो उसके सामने इस तरह की बातें करते तो वह भी चौकीदार को राजकुमार पुकारना शुरू कर देता। हमने दादाजी को दीपावली के घर पर भोजन करने के लिए निमंत्रण दिया था पर वह बस वैसे ही हैं। रौ में बोलने लगे, "राजकुमार का जीवन भी कोई जीवन है! पूरे दिन अकेले उदास पड़े रहो। कोई आए-जाए तो उठकर सलाम ठोको। मालिक की गाड़ी का दरवाजा झट से उठकर खोलो-बंद करो। किसी से बात नहीं कर सकते, मिल नहीं सकते।"

दादाजी को इन लोगों से बहुत सहानुभूति है। कहते हैं - ये एक-दूसरे से बात नहीं कर पाते। अगर बतियाते हुए पकड़े गए तो नौकरी गई समझो। पर हमारे यहाँ के गार्ड को देखेंगे तो पता चलेगा। कैसे तीनों एक दूसरे से ही-ही, हा-हा करते रहते हैं। पूरे दिन अड्डा मारते रहते हैं। मालिकों का क्या डर है इनको? पता चलेगा साहब आ रहे हैं तो फट से छिटक जाएँगे, सलाम ठोकेंगे, वरना पूरे-पूरे दिन बस गप्पबाजी। काम तो काम होता है ट्रैफिक पुलिस को ही देख लो। कितनी भी गर्मी क्यों न हो, चमड़े का जूता पहने यूनिफार्म पहने सिर पर टोपा लगाए, भले पसीना चूता रहे, हाथ हिलाते-डुलाते खड़े रहना पड़ता है पर दादाजी को कौन समझाए!

मुन्ना। मुन्ना सुन नहीं रहा। लगता है गहरी नींद में है। मैं भी सो जाती हूँ। मुझे नींद नहीं आ रही। मुझे नींद क्यों नहीं आ रही?

वह भुवनेश्वर। वह भी अजीब है। कहता है कि उसकी उमर सत्तर साल है। पिछले वर्ष उसने अपनी उमर पैंसठ वर्ष बतलाई थी। उसे हमारे यहाँ काम करते हुए पंद्रह वर्ष हो गए। मैं विवाह के बाद से ही उसे देख रही हूँ। उसका चेहरा सलवटों से भरा धारीदार चेहरा है। सामने के दो दाँत टूट गए हैं। दो तीन साबुत नजर आते हैं तब जब वह विचित्र ढंग से हँसता है। जो भी हो मुझे उसकी उमर से क्या लेना-देना, पर आजकल वह बात करते-करते धोती जहाँ बाँधता है उसके नीचे हाथ रखे रहता है और खुजलाना शुरू कर लेता है। पहले तो मैंने उसकी इस हरकत पर ध्यान नहीं दिया। यह तो रमा ने मुझे समझाया। रमा मुझसे छोटी है पर उसकी आँखें बहुत कुछ पकड़ लेती हैं।

रमा तो एक घंटे के लिए आई और चली गई पर मैं उलझन में पड़ गई हूँ। पहले तो भुवनेश्वर ऐसा नहीं था। अब इसे क्या हो गया? अगर मुन्ने के पापा से कुछ कहूँगी तो कहेंगे तुम औरतें बस...। या कहेंगे क्या उसने कुछ किया...?

क्या करूँ इस भुवनेश्वर का! अब तो यह मुझे एक आँख नहीं सुहाता। निकाल दूँ। मुन्ना रह नहीं पाएगा इसके बिना। पर यह ऐसा क्यों करने लगा? क्या वह बहुत घबराता है? हर समय हकलाकर ही अपनी बात पूरी करता है।

वह रमा भी कुछ नहीं समझती। उलटे ढंग से सोचती है। भुवनेश्वर एक भला आदमी है। वह अपने परिवार को लेकर आजकल बहुत परेशान रहता है और जब मुझसे घर की बात करता है, कहता है गाँव में इतनी जमीन है, घर है। पर बदमाश बेटे ने सब अपने नाम कर लिया और दारू में सब लुटा रहा है। वह यह सब कहते हुए काँपने लगता है और हाथ-पाँव सब जगह खुजलाने लगता है।

यह क्या आधी रात हो गई! मैं भी अजीब हूँ। सुरेश भी सो गए, मुन्ना भी। और मैं भुवनेश्वर को लेकर बैठी हूँ। वह रीना-लीना भी क्या कहाँ से मुझे मिल गईं। मुन्ना कैसी-कैसी बात करता है, कहता है - चौकीदार से तीन अंकल की तसवीर बनवाऊँगा। भुवनेश्वर ज्यादा आज्ञाकारी बनता है। मुन्ने की ड्राइंग बनाने की कॉपी गार्ड को पकड़ा आया और उसमें तसवीर बनवा लाया। पर इस बार गार्ड ने अच्छा चित्र बनाया है। कई टुकड़े हैं, जिनमें हैं वे तीन अंकल। भुवनेश्वर। वह खुद और मुन्ना और मैं। वैसे यह चौकीदार कभी-कभी अच्छा आदमी लगता है। पर आजकल लोगों के बारे में कहाँ कुछ पता चलता है! कौन अच्छा है और कौन नहीं यह जानना मुश्किल है। लगता है आज मुझे नींद नहीं आएगी पर सो जाऊँ तो अच्छा होगा। नहीं तो कहानी बुनने की झक में और न जाने कितनी कहानियों के टुकड़े बनाती जाऊँगी। पूरा-वूरा करना मेरे वश की बात नहीं। सुरेश ठीक कहते हैं कि एकदम झक्की हो तुम। कम से कम मुन्ना को मत बताना। नींद आ रही है।


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