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कहानी

कॉर्नसूप
शर्मिला बोहरा जालान


बक्से में कपड़े डालते-डालते सुमन को कुछ याद आया - क्या वह अपने साथ डायरी और एक-दो पत्रिकाएँ नहीं ले जाएगी? ठीक है मुंबई में वह रजनी और विकास के साथ रहेगी। समय कहाँ मिलेगा कुछ भी पढ़ने-लिखने का? सभी लोग इकट्ठा होंगे और सभी का मन होगा साथ बैठ, हँसने-बतियाने का। इस बीच क्या एकांत मिल पाएगा? हो सकता है किसी दिन समय मिल जाए। हर्ज ही क्या है डायरी-वायरी रखने में!

सुमन कुछ दिनों के लिए अपने पति राजीव के साथ मुंबई जा रही है। वहाँ उनके रिश्तेदार रजनी और विकास रहते हैं। राजीव की विकास से अच्छी पटती है सो दफ्तर से मिली छुट्टियों में उसने सोचा और कहीं न जाकर मुंबई हो आए। साल के अंत और शुरुआत में मुंबई में घूमना हो जाएगा, हवा-पानी भी बदल जाएगा और मजा भी आएगा।

सुमन के मन में यह बात भी है कि कहीं ऐसा न हो कि दोनों का वहाँ मन ही न लगे। एक-दो परिचित हैं मुंबई में जिनसे मिला जा सकता है। कुछ जगहों पर घूमा जा सकता है पर उसके बाद भी इतना समय हाथ में निकल आएगा कि कुछ पढ़ना-वढ़ना हो जाएगा।

रजनी और विकास दोनों नौकरी करते हैं और दो-चार दिनों को छोड़ दोनों काम पर जाएँगे सो यह सोच कर तो नहीं रहा जा सकता कि पाँच दिनों तक वे सुमन और राजीव को समय देंगे।

मुंबई पहुँचने के बाद सुमन मुंबई कैसा शहर है, यहाँ के लोग कैसे हैं, देखने सोचने लगी और उस दिन का दैनिक अखबार लेकर बैठी ही थी कि रजनी आ गई। बोली, "भाभी, यह सब छोड़िए। क्या अखबार लेकर बैठी हैं! कमरे में अलमारी का जो एक खाना खाली है उसमें अपने कपड़े-लत्ते सामान वगैरह सजा लीजिए। अलमारी में सामान सुरक्षित रहेगा।" आजकल घरों में काम करने वाली बाइयों का भरोसा नहीं। कब क्या गायब कर दें, फिर आसपास जो इतने अच्छे-अच्छे पार्क हैं, जहाँ से समुद्र दिखता है, बहुत अच्छी हवा चलती है देख आइए। आज का दिन आप अपनी तरह से गुजार लीजिए, कल से तो मैं आपको घुमाने ही वाली हूँ।

रजनी की बात सुन सुमन ने पूछा, "कहाँ ले जाने वाली हो? 'एलिफैंटा' या 'प्रिंस ऑफ वेल्स"। रजनी हँसते हुए मुँह बनाकर बोली, "क्या भाभी आप कोई विदेशी टूरिस्ट हैं, जो इन सब जगहों पर जाएँगी! हम तो मॉल जाएँगे। आइनॉक्स में फिल्म देखेंगे। यह एकदम मत सोचिएगा कि मुंबई में आपका मन नहीं लगेगा या कैसे लगेगा? मॉल है न! बस मॉल और मॉल। मॉल छोड़ और कुछ देखने-सुनने की जरूरत ही नहीं।"

"मॉल में क्या रखा है?" सुमन बोली तो रजनी ने खूब हँसते हुए कहा, "सब कुछ। बहुत कुछ। आप बस देखती जाइए कैसा होता है मॉल का मजा। मैं ले जाऊँगी आपको 'फीनिक्स', 'अट्रिया', 'सिटी-सेंटर'। मॉल का जबर्दस्त जादू चढ़ेगा कि उतरेगा ही नहीं।" सुमन ने डायरी में लिखा -

पहला दिन : 'मुंबई और एलिफैंटा' - कल से हम मॉल घूमेंगे। पर करेंगे क्या। वही शॉपिंग। चलो अच्छा है मजा आएगा। मन तो है 'एलिफैंटा', 'प्रिंस ऑफ वेल्स' देखने का। वह भी देख लेंगे। रजनी और विकास के साथ मॉल ही ठीक है। छह दिन हाथ में हैं। वैसे तो पाँच दिन ही माना जाएगा। अंतिम दिन तो जाने की तैयारी में लग जाएगा। एक आध दिन मॉल देख लें फिर म्यूजियम वगैरह हो लेंगे। और मिलने वालों से मिल लेंगे।

मॉल घूमना अच्छा लगता है। वहाँ की ठंडक सुहाती है। जगमगाती रोशनी, चमकती चीजें, चमकते लोग, जवान दिखते बूढ़े-बूढ़ी। बच्चों की तरह मचलते युवा। सारा वातावरण मोहक लगता है। मन होता है यह खरीद लें वह खरीद लें, यह भी नहीं छोड़ें और वह भी नहीं छोड़ें। मन ही नहीं होता मॉल से बाहर निकलने का। इतनी भीड़ पर शोर नहीं। इतनी महँगी चीजें... पर खरीदारों की कमी नहीं। ताँता लगा रहता है चमकीली नई-नई गाड़ियों का। जिसमें से निकलते हैं चमचमाते-चमकते सुगंध बिखेरते लोग, जो बहुत खरीदारी करते हैं कॉर्न पर कॉर्न पीते और खाते हैं, पैकेट पर पैकेट पकड़े रहते हैं, जो उनसे सँभाले नहीं सँभालता।

सुमन डायरी छोड़ पैसों का हिसाब करने लगी। क्या-क्या खरीदना है और किन-किन लोगों के लिए। अगर समझ बूझकर खर्च नहीं किया तो सारे पैसे मिनटों में उड़ जाएँगे। कई लोग हैं जो शहर से बाहर जाने पर सुमन के लिए कुछ न कुछ जरूर लाते हैं, सो उसे भी उन लोगों के लिए कुछ खरीदना चाहिए। पर सबके लिए कुछ-कुछ लेना, वह भी मॉल से! नहीं बाबा!"

सुमन अपने कपड़े-लत्ते अलमारी में रखने लगी कि ऊपर वाले खाने से हरहरा कर बहुत सारी चीजें उसके ऊपर गिरीं। यह...य...ये क्या है? यह सब क्या है? क्या भरा पड़ा है? यह तो रजनी के कपड़े हैं। साथ हैं क्रीम, पाउडर, बायोटिक का कॉस्मैटिक सेट। पर्स। रजनी ने यह सब क्यों भर रखा है? सामान ज्यादा है या जगह कम, समझ में नहीं आ रहा। बाहर जो जूते-चप्पलों की अलमारी है वह भी ठसाठस भरी हुई है। ढेरों चप्पलें। इतनी चीजें! सब सामान को ठीक से रखना चाहिए। कीमती है। ऐसे तो सब खराब हो जाएगा! यह सब जो गिर पड़ा है उन्हें उठाकर रख दूँ और नहा धोकर तैयार हो जाऊँ। यह स्नानघर! यह रजनी का नहीं है। रजनी का सोने का कमरा उस तरफ है और उसका स्नानघर भी उसी के साथ लगा हुआ है! फिर इस स्नानघर में इतने शैंपू-क्रीम-पाउडर क्यों रखे हुऐ हैं?

सब विदेशी-एलिजाबैथन एडन क्रीम-टोनर, लॉरियल शैंपू, डव साबुन, ऑरिफ्लेम नाइट क्रीम, पलकों पर लगाने वाले तरह-तरह के काजल, ढेर सारी मेकअप की ब्रशें। न जाने रजनी को इतनी क्रीम की जरूरत क्यों पड़ती है? अलग-अलग कंपनी की। शायद एक तरह की क्रीम लगाकर बोर हो जाती होगी। ओह! मैं इन्ही सबमें लगी रहूँगी तो तैयार होने में देर हो जाएगी। ये गंदे कपड़े यहाँ इस खाने में डाल दूँ। कपड़े धोने के लिए बाई आएगी तो अंदर से ले लेगी। पर इसमें कुछ पड़ा है। ठसाठस भरा हुआ। इसमें कई तरह के पर्स रखे हुए हैं। किसी पर्स में काँच के टुकड़े लगे हुए हैं तो कइयों में हाथ का काम किया हुआ है - फैन्सी, कीमती। मेरे पास कुल मिलाकर कितने बैग होंगे? तीन तो हैं ही। रजनी के पास? पंद्रह बीस से कम क्या होंगे! हर पोशाक के रंग से मिलता एक पर्स। पर वह अपने सामान को ऐसे क्यों रखती है? लगता है ठूँस दिया हो। जहाँ-तहाँ पटक दिया हो। मन तो हो रहा है पूरी अलमारी को, इस खाने को ठीक से सजा दूँ। सारा सामान निकालकर झाड़कर रख दूँ। रजनी को यह सब अच्छा नहीं लगेगा। उसका घर है और उसका सामान। जैसे चाहे रखे।

हम आज 'फीनिक्स' जाएँगे। भाभी, तैयार हो जाइए। सुमन तैयार होने लगी। उसने सोचा मॉल में जाने के लिए कुछ नए ढंग से तैयार होना चाहिए। पुराने-सुराने ढंग से नहीं चलेगा। मॉडर्न दिखना होगा। केशों को अलग तरह से सजा-सँवारकर खुला छोड़ देना चाहिए। सुमन ने अपनी नई फैशन की सलवार-कमीज निकाली और एकदम नए ढंग से सजधज कर खड़ी हो गई। रजनी उसे देखते ही चहकी - वाउ! आप तो एकदम मुंबइया हो गई हैं।

सुमन जानती है, वह आधुनिक कपड़े उस तरह के तो नहीं पहन सकती जिस तरह के रजनी पहन लेती है। जो भी हो, साड़ी छोड़ कुछ और पहन लिया वह भी कम बड़ी बात नहीं है।

'फीनिक्स' बहुत बड़ा है। रजनी ने सुमन से कहा, "एकदम विदेशी मॉल-सा है। बहुत बड़ा। बहुत खुला हुआ। हम यहाँ कॉर्न-चाट खाएँगे।"

सुमन, रजनी, विकास और राजीव मॉल में इधर-उधर बिखर गए। सभी अपने-अपने ढंग से अपने लिए कुछ-कुछ देखने चुनने लगे। सुमन भी देख रही थी। सोच रही थी मित्रों-परिचितों-रिश्तेदारों के लिए क्या ले जाए? कुछ समझ में नहीं आ रहा। ब्रांडेड दुकानें। छोड़ो, यहाँ से ढोकर क्या ले जाना। जो देना है वह वहीं से खरीदकर दे देगी। इस सलवार-कमीज की डिजाइन बहुत अच्छी है। कितना प्यारा रंग है! अपने लिए ले लूँ? कितना सुंदर काम किया हुआ है, छोड़कर बेवकूफी करूँगी। फिर कहीं यह रंग, यह कढ़ाई मिले न मिले। थोड़ा महँगा है तो क्या हुआ! ले लेती हूँ। इस तरह मन मसोसकर क्या रहा जा सकता है... खरीद लेती हूँ।

मॉल में घूमते-घूमते समय का पता नहीं चला। सभी ने अपने लिए कुछ न कुछ देखा। पसंद किया। खरीद लिया। ढेर सारे पैकेट। पैकेट ही पैकेट। सभी को जोर से भूख लग गई थी। विकास बोला, "पहले कॉर्न सूप पीते हैं।" सुमन राजीव को देखने लगी कि कॉर्न-वार्न सूप राजीव के वश की बात नहीं है। उसे तो बस चाय पिला दो। अभी वह मुँह बनाकर बोलेगा, नहीं बाबा। इससे अच्छा है डिप-डिप टी कहीं से लें। ऐसा कुछ होगा सुमन इसका अंदाज लगा रही थी कि राजीव की आवाज सुनाई पड़ी, "चलेगा कॉर्नसूप ही मैं भी तो कहने वाला था। कुछ हटकर होगा।"

खाने की सभी चीजें महँगी थीं पर सभी ने कुछ न कुछ एक तरह से सब कुछ खाया। रजनी ने 'यमी', 'अमेजिंग' कहते हुए 'एपल पाई' का स्वाद लिया। 'कॉर्नसूप' पिया। अंत में चारों सुर में सुर मिलाकर बोले, पूरा दिन कहाँ उड़ गया पता नहीं चला। सच यह मॉल का मजा है। हम कल भी आएँगे।

रविवार : अट्रिया मॉल-पूमा। पूमा। मुझे तो पूमा की टी शर्ट खरीदनी है। राजीव ऐसे मचल उठा जैसे कोई बच्चा। दो पर एक मुफ्त। लेना तो है ही। छोड़ूँगा नहीं। सुमन ने राजीव को इस तरह मचलते पहली बार देखा था। सुमन साड़ियों की दुकान में घुस गई। मुंबई में साड़ियाँ महँगी हैं तो क्या हुआ? कौन-सा हम रोज-रोज आते हैं। यहाँ जैसा प्रिंट मिलेगा वैसा कहीं और नहीं। पैसे? मेरे पास जो थे खत्म हो गए। राजीव से कहूँ! राजीव को भी तो पता चले कि सुमन को भी पहनने-ओढ़ने का शौक है। ओह, ये झुमके! ये बहुत प्यारे हैं। सरवोत्सकी के हैं। ये भी ले लूँ।

इस मॉल में भीड़ दूसरे मॉल से कम नहीं। यह बात समझ में नहीं आ रही कि लोग बस सामान देखने आए हैं या खरीदने या सिर्फ समय काटने? क्या आजकल मंदिरों में भीड़ नहीं होती? पूरा शहर मॉल में नजर आता है। सुमन ने राजीव से कहा तो वह बोला, "मंदिरों में भीड़ नहीं होगी ऐसा कभी हो सकता है? वह भी वर्ष के अंत में और शुरुआत में। आजकल नए वर्ष की शुरुआत लोग मंदिरों से करते हैं ताकि पूरे वर्ष मॉल में घूम सकें।"

आज का दिन 'सिटी सेंटर, के नाम। वैसे देखो तो मॉल-मॉल में फर्क नहीं होता पर समझो, ध्यान दो तो फर्क ही फर्क है। रजनी ने सुमन से कहा, "यहाँ मुझे मेरी वाली चप्पलें मिल गईं। एक साथ मैं दो जोड़े खरीद लूँगी। वह पलकों के ऊपर लगानेवाला गहरे नीले रंग का काजल भी यहीं मिला। एकदम वही रंग जो मैं खोज रही थी। भाभी आप भी कुछ खरीद लीजिए। यह रंग एक दम आप पर खिलेगा। यह 'मेट्रो' की सैंडल देखिए। छोड़िए यह 'हाइड साइ' की बैग ले लीजिए। कितना आकर्षक डिजाइन है। महँगी है पर ब्रांड भी तो देखिए।"

रजनी मॉल आकर बहुत खुश है, ऐसी बात नहीं है। अक्सर आती है इसलिए ऐसे भाव नहीं है कि अनोखी जगह आई है। हाँ, ऐसा लग रहा है, अपनी मन पसंद जगह आकर उसे अच्छा लग रहा है। रजनी और विकास दोनों एम॰बी॰ए॰ हैं। दोनों तेज हैं, स्मार्ट भी। रजनी मन की अच्छी है। बच्चों-सी चंचल। तुरंत खुश हो जाती है, जोर-जोर से हँसने लगती है। कद-काठी शक्ल सूरत से मॉडर्न लगती है। नौकरी कर रही है, करना चाहती है पर तब तक जब तक कोई संतान नहीं होती। बच्चा होने पर झटपट छोड़ देगी। दोनों पति-पत्नी की अच्छी पटती है। दोनों घंटों बातें करते हैं। विवाह के बाद रजनी केडिया से अग्रवाल हो गई। कुछ चिट्ठियाँ फिर भी रजनी केडिया के नाम से आती हैं। कहती है, "अब मुझे अपने नाम के सामने यह केडिया-फेडिया अच्छा नहीं लगता। जो केडिया नाम से पत्र भेजेगा उसे जवाब नहीं दूँगी। लोगों को पता होना चाहिए कि मैं अब अग्रवाल हूँ। इतनी अच्छी गाड़ी चलाती हूँ कि क्या कहा जाए!" लगता है मॉल का चप्पा-चप्पा जानती है। झट से दुकानों में ले जाती है और चटपट सब कुछ देख समझ आगे बढ़ जाती है।

पॉपकॉर्न के बिना फिल्म कैसे देख पाएँगे! यहाँ दाम तो ज्यादा होंगे ही। भई सब अपना-अपना अलग-अलग पकड़ो। नहीं-नहीं एक दूसरे में से उठाने से नहीं चलेगा। और पेप्सी व कोक क केन? वह भी तो लेना है। मैं लाता हूँ। राजीव सभी के लिए एक-एक कैन उठा लाया। सभी आइनॉक्स में नई फिल्म देखते हुए पॉपकॉर्न और पेप्सी पीते हँसने लगे। आज फिर फीनिक्स! क्यों? अच्छा, 'रिबॅाक' का जूता लेना है। वह ऑफर कैसे छोड़ दूँ! वह जींस पैंट तो देखो। कितना प्यारा रंग है। वह घड़ी। चौड़ी बेल्ट वाली। यही तो चाहिए। यह नीले रंग की चौड़ी बेल्ट वाली घड़ी मैं कब से ढूँढ़ रही थी। आज पच्चीस दिसम्बर है। देखो वहाँ से एक आदमी सांता बनकर आ रहा है। उसके बगल में एक मिकी-माउस भी है और एक चार्ली चैप्लिन भी। वाउ! मजा आ गया।

रजनी कह रही थी, घर के सामने जो शॉपिंग कॉम्पलेक्स है क्यों न उसमें घूम लिया जाए! अच्छे आकर्षक कुर्ते आए हैं 'फेब इंडिया' में। आज यह खरीदने-वरीदने का काम खत्म करना है ताकि कल एलिफैंटा घूमा जा सके। "कौन जाएगा एली...फैंटा। दिमाग खराब नहीं है मेरा जो मॉल वॉल के बाद फैंटा-वैंटा जाऊँ।" राजीव बोला। हम लोगों का किसी का मन नहीं है। छोड़ो और हटाओ।

पाँचवा दिन और कॉर्नसूप : "कहो राजीव आज किस मॉल का चक्कर लगाना है? क्या खरीदना है? क्या बात है राजीव, तुम बहुत सुस्त लग रहे हो? थक गए हो क्या? विकास की बात सुन राजीव बोला, "वैसी कोई बात नहीं। इतनी खरीददारी हो गई कि अब यह चिंता हो रही है सामान लेकर कैसे जाएँगे। सारे सूटकेस ठसाठस भर जाएँगे। लगता है दो-तीन और सूटकेस या बड़े बैग खरीदने होंगे। सुमन बोली, "हाँ, आज यह सब इंतजाम कर लें। मैं मॉल से बोर भी हो गई हूँ।"

मॉल जाने से भी कोई भला बोर हो सकता है! वहाँ बच्चों से लेकर बूढों तक का मन लगता है - ऐसा कह रजनी और विकास दोनों दफ्तर के लिए घर से निकल गए। सुमन अपनी डायरी निकालकर बैठ गई और देखने लगी कि उसने उसमें क्या बातें दर्ज की हैं और कैसे? उससे अपना लिखा हुआ ही पढ़ा नहीं गया। कुछ भी ठीक से नहीं लिखा। बस हर दिन की तारीख डाल मॉल की बात लिखी हुई है। वैसे इन पाँच दिनों में दोनों ने किया भी क्या है सिवा मॉल घूमने के! सुमन कलम से आगे लिखने लगी, "क्या सोचकर मुंबई आई थी कि कुछ लोगों से मिलूँगी, ऐतिहासिक जगहों पर घूम लूँगी पर मॉल छोड़ कुछ नजर नहीं आया। कई लोगों के लिए उपहार लेने थे पर कुछ नहीं खरीदा। जो खरीददारी हुई वह सिर्फ अपनी। राजीव ने अपने लिए ढेर सारा सामान खरीदा। न जाने कैसे? पैसे तो इतने नहीं लाया था। हो सकता है ले आया हो और मुझे नहीं बताया हो। रजनी के रहने-सहने के ढंग देखकर, कास्मैटिक देखकर मेरा मन भी हुआ क्रीम-लिपस्टिक खरीदने का! अच्छा ही हुआ खरीद लिया। अपनी मनपसंद चीजें मॉल में देखकर किसका मन नहीं होगा खरीदने का। अब कोई मुंबई आए और खरीदारी न करे यह क्या संभव है! ठीक यह सोचकर आई थी कि सोच समझकर खर्च करूँगी पर ऐसा जरूरी तो नहीं... सुमन यह सब लिख रही थी कि राजीव पास आकर बैठ गया। सुस्त था। सुमन ने डायरी बंद कर दी और पूछने लगी, "क्या हुआ? कोई बात है क्या? तबीयत तो ठीक है न? मैंने कल रजनी से कॉर्नसूप बनाना सीख लिया है। जाती हूँ सूप बना लाती हूँ ताकि तुम्हारा आलस भाग जाए।"

"नहीं, मुझे नहीं पीना" राजीव मुँह बनाकर बोला।

"क्यों नहीं? वहाँ तो कह रहे थे 'कॉर्नसूप' ...हाँ, कुछ हटकर है। कुछ अलग-सा है। वही पिऊँगा।"

"मुझे थोड़ी चाय बना दो।"

"नहीं चाय नहीं, कॉर्न सूप।"

"मैंने कहा चाय।"

"मैंने कहा सूप।"

राजीव गुस्से में बोला, "तुम्हें पता है, मुझे कॉर्न-फार्न पसंद नहीं।"

"तो मॉल में विकास के साथ कैसे पी रहे थे? लगता था उसके अलावा कुछ और पसंद नहीं।"

"हाँ पी रहा था। वह सब करना पड़ता है। क्या समझोगी? तुम कुछ नहीं समझती। क्या तुम्हें यह समझ में आ रहा था कि इतनी खरीददारी नहीं करनी चाहिए थी।"

"हाँ नहीं करनी चाहिए थी? तुम भी कर रहे थे और तुम ही मुझे उकसा रहे थे कि जो मन में आए लो।"

"यहीं तो मैं कह रहा हूँ कि तुम कुछ नहीं समझती। तुम्हें पता है हमें घर जाकर विकास को रुपये भेजने पड़ेंगे।"

"रुपये! क्यों? किसलिए!" सुमन चौंकी।

"तो क्या तुम समझती हो ये सारी खरीदारी उन पाँच-सात हजार रुपये में हो गई जो हम लाए थे?"

नाराज क्यों रहे हो? कौन-सा मैंने कहा था मॉल जाकर सामान खरीदने के लिए।"

'पर इनकार भी तो नहीं किया था?"

"तुम्हारा क्या मन नहीं था?"

"तुम दुकान के सामने से हटती ही नहीं थी। वहीं खड़ी हो जाती थी।"

सुमन जोर से बोली, "हाँ, मैं हूँ ही ऐसी?"

राजीव उससे ज्यादा जोर से बोला, "विकास के सामने मैं क्या कहता! सब तुम्हारा दोष है। औरतें होती ही ऐसी हैं। दुकानें देखकर सम्मोहित हो जाती हैं। पैसों का हिसाब नहीं रहता। ''

"देखो राजीव, तुम बिना मतलब मुझ पर आरोप लगा रहे हो। यह सब तुम्हारा किया धरा है। मैंने तो कहा था कि एक दिन 'एलिफैंटा' चलें और एक दिन 'प्रिन्स ऑफ वेल्स'। नीना आंटी और रघु मामा से मिलने चलेंगे। पर तुम हर दिन मॉल जाने के लिए तैयार होने लगते थे।"

"हाँ-हाँ मैं ही ऐसा हूँ, तुम तो एकदम ठीक हो।"

"छोड़ो राजीव, आपस में इस तरह करके कुछ नहीं होगा। मैंने सचमुच बहुत अच्छा 'कॉर्नसूप' बनाना सीखा है। थोड़ा-सा पियो। देखो अच्छा लगेगा।"

"कितनी बार कहा ये कॉर्न-वार्न मैं नहीं पिऊँगा। तुम पियो और अपने भाई को बुला लो, उसे दो।"

"भाई की बात कहाँ से आ गई?"

"जैसी तुम वैसा तुम्हारा भाई! दो दिन के लिए मेरे साथ अहमदाबाद गया और न जाने कितने-कितने सामान खरीद लाया! मुझसे छोटा है सो मुझे उसे वीसीडी प्लेयर दिलवाना पड़ा। तुम लोगों को खरीदने की हाय-हाय लगी रहती है।"

"क्या कहा तुमने" यही न कि तुम्हें उसे खरीदवाना पड़ा। जबकि उस समय तो कह रहे थे कि आज तक तुमने अपने ससुराल वालों के लिए कभी कुछ नहीं खरीदा, सो चलो अच्छा हुआ मयंक को कुछ दिला दिया।"

"यही तो कहता हूँ कि तुम कुछ नहीं समझती। तुम जैसी तुम्हारे पीहर वाले भी वैसे।"

"देखो राजीव, मैं कहती हूँ तुम मेरे मायके वालों का नाम मत लो।"

"क्या कर लोगी? तुम क्या कर सकती हो, मुझे तो पता चले। कुछ नहीं। तुममें इतना दम नहीं है। अगर तुममें कुछ होता तो तुम अपने मायके से पैसे लाकर विकास का भुगतान कर देती।"

"अब यही बाकी रह गया है। तुम इस तरह से सोच सकते हो? उफ! कैसे हो गए हो तुम। ऐसी घटिया बात तुम्हारे दिमाग आई भी कैसे?"

"हाँ। हाँ। घटिया आदमी हूँ न इसलिए घटिया बात आई। अब पूरी जिंदगी तुम्हें एक घटिया आदमी के साथ गुजारनी होगी। हाँ, एक फालतू आदमी एक घटिया बेकार आदमी" - राजीव विक्षिप्त आदमी की तरह बातें करने लगा। सुमन कभी राजीव को देख रही थी कभी मॉल से लाए कमरे में पसरे सामान को। राजीव को सँभाले कि सामान को! कैसे क्या होगा! राजीव अजीब-अजीब बात कर रहा है। तभी दरवाजे की घंटी बजी।

रजनी थी। खूब खुश बोली, "भाभी, आज का दिन बहुत अच्छा है। विकास को बोनस मिला है। उम्मीदों से ज्यादा। पर आप दोनों को क्या हुआ? परेशान हैं? क्या कॉर्नसूप पी रहे थे? नहीं? चलिए मिलकर बनाते हैं और सेलिब्रेट करते हैं।"


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