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कहानी

विसर्जन
शर्मिला बोहरा जालान


Art does make a difference. I think that is its purpose to open up spaces in a closed world.

देबू दा पाल हैं। लंबे हट्टे-कट्टे से। गौर वर्ण। बांग्ला नहीं बोल सकते ऐसा कैसे हो सकता है, वह तो मातृभाषा है पर हिंदी भी बोल लेते हैं। अच्छी तरह। और क्यों न बोलें, गोरखपुर जबलपुर, भोपाल, इंदौर आते-जाते रहे हैं वर्षों। वही... मूर्तियाँ बनाने के लिए। मूर्तिकार हैं ना! ऐसा मँजा हुआ हाथ। देखते ही देखते मिट्टी बदल जाती है आकृतियों में। मूक और नकली नहीं बोलने वाली, सजीव। जिसमें धड़कते हैं प्राण। फिर उन पर करते हैं रंग, पहनाते हैं पोशाक और सजाते हैं उन्हें आभूषणों से। कुछ है देबू दा के हाथों में! तभी नजर पड़ते ही मूर्तियाँ बुलाने लगती हैं।

जो मूर्ति शुरू में ही ऐसे चक्कर में फँसाती है, ऐसा घेरा डालती है उसे पूजा के बाद कैसे विसर्जित किया जाता होगा? कैसे उतारा जाता होगा गंगा में और कैसे छोड़ दिया जाता होगा कहीं सुदूर पानी में विलीन होने के लिए? यह बात वही जाने जो उसे खरीदता और विसर्जित करता है।

मीनाक्षी रवींद्र सरणी में रहती है और बचपन से कुम्हार टोली आती-जाती रही है। वही काका के पास। काका ही तो कहती है वह देबू दा को। अपनी सब बात उन्हें बताती है। पूछती है, "काका जो मूर्तियाँ खरीदते हैं, पूजा करते हैं, बाद में उसे गंगा में कैसे प्रवाहित कर पाते हैं?" काका कहते हैं, "उनकी बात तो समझ में आती है क्योंकि उनका प्रतिमा से संबंध तीन-चार दिनों का ही होता है पर सोचो, तब मेरी हालत क्या होती होगी जब मैं मूर्तियों को खरीददार के हाथ में सौंपता होऊँगा, क्या कोई समझ सकता है? ऐसा मन भर आता है कि क्या कहूँ... खुशी तो होती है कि मूर्तियाँ बिक रही हैं।"

"जानती हो कि नहीं... आजकल प्रतिमाओं के बाजार में होड़ लगी हुई है। सभी शिल्पकार ग्राहकों को पहली नजर में ही घेर लेना चाहते हैं। सभी को लगता है कि पहले उनकी चीज बिके। इसके लिए वे दाम भी गिरा देते हैं। ग्राहकों को तोड़ते हैं, इशारे से बुलाते हैं। ऐसे समझो अभी-अभी एक ग्राहक आया। उसने मेरी मूर्ति पसंद की। मोल-भाव करके दाम तय हुए तभी अचानक उसके मन में न जाने क्या आता है, वह झट से अभी आता हूँ कहकर दुकान से निकल जाता है। मेरी दुकान से सट कर कालीपत की दुकान में जा चुपचाप थोड़े कम दाम में मूर्ति खरीद सरक जाता है।

मूर्तियों का बिकना किसे अच्छा नहीं लगता पर अपने हाथ से गढ़ी जिस मूर्ति के साथ महीनों से हैं उसे ग्राहक के द्वारा ले जाता देख मन कैसा-कैसा भी हो जाता है।

मीनाक्षी जानती है, ऐसा सिर्फ देबू दा के साथ ही होता है। कोमल मन जो है। तभी इन मूर्ति-मूर्ति की बात छोड़ देबू दा मीनाक्षी से कहते हैं, "यह सब छोड़ो, यह बताओ अब तो तुम्हारी कॉलेज की छुट्टियाँ हो गई हैं, अब तुम क्या करोगी?"

"क्या करूँगी! काका यह कहो क्या-क्या कर पाऊँगी? कल सुजाता के भाई की शादी है। वहाँ जाने के लिए अपनी पोशाकों को ठीक करना, उन्हें सँभालना है। तीन-चार जोड़े पहनने-बदलने पड़ेंगे। परसों मैं काकी की लड़की सुनीता के जन्मदिन पर गई थी। वहाँ जो सलवार-कमीज मैंने पहनी थी उसे धोना इस्त्री करना है। पूजा आने वाली है। अपनी सहेलियों और दोस्तों के साथ घूमने जाऊँगी सो नए पहनावे बनवाने हैं। पुरानी पोशाकों को छोटा-बड़ा करके दुरुस्त करना है। लाल कमीज में दर्जी से तारा लगवाना है। नीले और काले जींस को नीचे से मोड़ना है। यह सब करते-करते छुट्टियाँ कब बीत जाएँगी पता कहाँ चलेगा।" देबू दा बोले, "तुम्हारा पूरा-पूरा दिन कपड़ों पोशाकों को उठाने, तह करने धोने में ही लग जाता है। हैं न? और तुम्हारे पास तो बहुत कपड़े होंगे। पोशाकों व कपड़ों को रखने सँभालने का बहुत काम होता होगा?"

"और नहीं तो क्या काका! आजकल बहुत सारे कपड़े बनवाने रखने पड़ते हैं। सुबह टहलने जिन कपड़ों को पहन कर जाती हूँ वही पहनकर कॉलेज थोड़े ना जा सकती हूँ। और जिसे पहनकर कॉलेज जाती हूँ वह पहनकर जन्मदिन या किसी के घर में होने वाली किसी पूजा में क्या जाऊँगी? रात में सोने की पोशाक अलग। पर यह सब तुम क्या समझो। तुम तो अपनी दो कमीज में ही रहते हो और ज्यादातर समय वह भी कहाँ पहनते हो। मूर्तियाँ बनाते समय तो सिर्फ लुंगी में ही तुम्हें रहना पड़ता है।

काका हँसने लगे।

"हँसो मत काका। तुम सोचते हो, मूर्ति बनाना ही काम करना होता है। नहीं, तुम गलत समझते हो। पोशाकों को अच्छी तरह रखने का काम भी बहुत भारी और समय खाऊ काम है। तुम जानते हो आजकल रोज फैशन बदलते हैं। पोशाकें कितनी महँगी बनने लगी हैं। सो कीमती चीज की क्या ठीक से सार सँभाल करनी जरूरी नहीं है? कवर में रखना, अच्छी तरह तह लगाकर रखना। कभी-कभी तो मेरा पूरा-पूरा दिन अपनी सलवार-कमीज को धुलवाने, इस्त्री करवाने में ही निकल जाता है।

एक बात तो है काका, तुम भले ही खुद बहुत बुशर्ट नहीं रखते, कमीज खरीदने में ज्यादा मग्पच्ची नहीं करते, पर अपनी प्रतिमाओं को सुंदर रंग-बिरंगी पोशाकें पहनाते हो।"

"वह सब इसलिए ही कर पाता हूँ कि तुम इतने सुंदर 'खुश' रंग पहन खिलखिलाती हुई मेरे पास आती हो। तुम्हारे रंग ही तो इनमें भरता हूँ। पर मीना, आजकल तुम काला रंग क्यों पहनने लगी हो।" देबू दा मीनाक्षी को मीना ही कहते हैं। मीनाक्षी बोली, "अरे काका, आजकल काला रंग बहुत चल रहा है। हर जगह जिसे देखो वह काला ही पहने घूम रहा है।"

"अच्छा! पर क्यों? छिः क्या-क्या लोगों को पसंद आने लगा है।"

"छोड़ो काका, तुम ध्यान मत दो। तुम अपनी प्रतिमाओं को इंद्रधनुष के रंग की ही पोशाकों पहनाते रहना।" ऐसा कह कर मीनाक्षी काका की मूर्तियों को देखने लगी और थोड़ी उदास हो गई।

इस बार काका की मूर्तियों में जान नहीं है। दुर्गा की दस प्रतिमाएँ बनाई हैं काका ने और सभी में से कोई बात गायब है। मीनाक्षी जानती है ऐसा क्यों हो रहा है। काका भी जानते हैं उनके हाथ से इस बार काम पहले जैसा नहीं हो पा रहा। काका मीनाक्षी के चेहरे को पढ़ रहे हैं कि वह मूर्तियों को देखकर क्या कुछ बोलने वाली है। मीनाक्षी काका को दुखी नहीं करना चाहती सो इधर-उधर की बात करने की कोशिश में बोल रही है, "काका यह तो बताओ पूजा आने वाली है ऐसा मौसम बदलने से ही क्या पता नहीं चल जाता। सब कुछ बदला-बदला सा लगने लगा है न? चहल-पहल बढ़ गई है और जानते हो शाम का समय तो आजकल सबसे ज्यादा सुंदर और मोहक लगने लगा है। शाम को मैं जब भी किसी बाजार की तरफ निकलती हूँ। चारों तरफ जलती जगमगाती बत्तियाँ, लोगों का आना-जाना, खरीददारी करना, सब कुछ बदला-बदला सा लगने लगा है न? बाजार जैसे बोलने और बजने लगा है। मंदिरों के पास बैठे फूलवालों के फूलों से उठती सुगंध मन को भाती है।"

"मुझे क्या पता, मैं तो अपने कमरे में पीली बल्ब की रोशनी और मूर्तियों के साथ पड़ा रहता हूँ।"

"मुझे पता है काका तुम बहुत व्यस्त भी रहते हो। तुम्हें यह सब बता रही हूँ। अरे! देखो तो बात करते-करते रात होने को आई, पता नहीं चला, अब जाती हूँ। जब ये मूर्तियाँ तैयार हो जाएँगी तब आऊँगी।" मीनाक्षी चली गई।

कुछ दिनों बाद अष्टमी के दिन मीनाक्षी कुम्हार टोली में घुसी तो सहम गई। सभी दुकानें खाली पड़ी हैं। दो चार दिन पहले जो दुकानें हरी-भरी थीं, दुर्गाओं से अटी पड़ीं। यह क्या पूरी कुम्हार टोली की प्रतिमाएँ कहाँ गईं? अब सब वीरान हैं! क्यों? कैसे? मरघट सा सन्नाटा क्यों हो गया? अरे! सभी मूर्तियाँ बिक गईं। तो यह बात हैं। तभी शिल्पकार ऐसे सो रहे रहें मानो महीनों बाद सोए हों। अब लक्ष्मी पूजा और काली पूजा के लिए काम शुरू होगा।

काका! उनकी मूर्तियाँ भी बिक गई होंगी? मीनाक्षी जल्दी-जल्दी काका के घर की तरफ जो गली जाती है उसमें घुस गई। एक जगह तीन-चार दुर्गा की प्रतिमाएँ विराज रही थीं, जिसे देखकर मीनाक्षी ने मुँह बनाया और मन ही मन कहा, "शिल्पकार ऐसी नकली मूर्तियाँ क्यों बनाते हैं : कौन खरीदेगा ऐसी प्रतिमाएँ? मैं तो कभी भी ना खरीदूँ।" मीनाक्षी आगे बढ़ी जा रही थी कि पीछे से देबू दा की आवाज आई, "मीना, मैं घर पर हूँ : आ जाओ।"

क्या? मीनाक्षी चौंकी। पीछे मुड़कर देखा तो समझ में आया कि वह देबू दा के घर से आगे निकल आई है। जिन प्रतिमाओं को देखकर वह आगे बढ़ गई थी वे काका के घर के सामने खड़ी हैं और काका की ही बनाई हुई हैं। हे भगवान! काका के हाथ में क्या हुआ!

जैसे ही मीनाक्षी काका के घर में घुसी देबू दा बोले -

"इस बार बहुत घाटा हो गया रे।"

"क्या? कैसे?"

"कौन जाने कैसे? ये देखो मूर्तियाँ बच गईं। ग्राहक छोड़ गए।"

"पर, काका आपने कहा था सभी मूर्तियों के ग्राहक पहले से ही तय थे।"

"हाँ। कहा था। ग्राहक आए थे। मुझसे उन्होंने बात की थी। फिर मैंने कहा, पसंद नहीं आई तो छोड़ दीजिए।"

मीनाक्षी से सुना नहीं गया, बोली, "पागल हो क्या काका। तुमने कहा छोड़ दीजिए। कोई ले जाता था तो ले जाने देते।"

"क्या करूँ। ग्राहक बोले, "आपके पास से ही हर बार लेते हैं पर इस बार आपकी प्रतिमाओं में वह बात नहीं है।"

ठीक ही कहा ग्राहकों ने। काका की प्रतिमाएँ अब काका की बनाई हुई नहीं लगतीं। ऐसी तो कोई भी बना सकता है। देबू दा ने बची प्रतिमाएँ गंगा में बहा दीं। मीनाक्षी ने इस बार यह नहीं पूछा कि कैसे प्रवाहित की गईं। सोचा, यह अच्छा हुआ कि उन उदास मूर्तियों को दूर हटा दिया। रखने की जगह कहाँ है। दुकान तो खाली करनी होगी। नई मूर्तियाँ बनाने के लिए। लक्ष्मी और काली माता की प्रतिमाएँ भी काका हर साल बनाते हैं सो वह काम भी शुरू करना है।

यह क्या? लक्ष्मी और काली भी वैसी ही बनी हैं। कहाँ माँ काली का क्रोध से जलता हुआ लाल सिर शिव को पाँव तले रौंदने के कारण शर्म से पानी-पानी होता रूप। कहाँ देबू दा की निरीह सी काली की प्रतिमा। देबू दा में यह उदासी कैसे घुस आई! साल डेढ़ साल पहले तक उनके हाथों से बनी प्रतिमाएँ खिलती मचलती प्रतिमाएँ हुआ करती थीं। अब तो बस मरी-मरी ही लगती हैं।

क्या बताएँ यह सब कैसे हुआ? कहाँ से शुरू हुआ? कुछ महीने पहले की बात है, देबू दा अपने पिता के साथ भूतनाथ मंदिर जो नीमतल्ला श्मशान-घाट के पास है, जा रहे थे। दोनों आपस में बतियाते हुए मदनमोहन मंदिर के सामने जो रास्ता है उससे गंगा घाट की तरफ बढ़ रहे थे कि देखा रेलवे क्रासिंग के पास रेल आने की सूचना के कारण डंडे गिरे हुए हैं। और आगे जाने का रास्ता बंद है जो काफी देर तक बंद रहेगा। दोनों तरफ जितनी सवारियाँ थीं वहीं की वहीं खड़ी होकर रेल के आने फिर चले जाने का इंतजार कर रही थीं। देबू दा के पिता का रुकने का मन नहीं था। उन्होंने जिद की, कौन रेल आने तक खड़ा रहेगा। चलो झुककर जल्दी से उस पार निकल चलें। उन्हें कई लोगों ने देबू दा के अलावा भी रोका पर वह माने नहीं और आगे निकल पड़े। तभी दूर से आती रेल ने सीटी मारी। वे हड़बड़ाए-घबराए-लड़खड़ाए फिर वहीं धम्म से पटरी पर जा बैठे। शोर उठा लोगों का हटाओ, उठाओ, बचाओ। जल्दी करो। देबू दा ने न दाएँ देखा न बाएँ जल्दी से अपने पिता को ऐसे उठाया जैसे किसी बच्चे की ओर दौड़ पड़े। वहाँ जाकर दम लिया जहाँ एक बोर्ड लगा था, लिखा था, 'सूतानती कुम्हार टोली गंगा घाट।'

देबू दा धम्म से जमीन पर बैठ गए। पिता को उतरा और जोर-जोर से साँस लेने लगे। पिता को जोर से डाँट कर कहा, "आज तुम्हारे प्राण तो जाते ही संग में तुम मेरे भी हर लेते और पूरा परिवार शोक में डूबता सो अलग कथा होती। फिर घर के लोग नीमतल्ला घाट में कर देते हमारा दाह संस्कार आमने-सामने लेटाकर। सच कहता हूँ बाबा, आज माँ दुर्गा ने हमें बचाया हैं। अब उठो भी घर चलो।" देबू दा ने देखा, उसके पिता उसकी बात न सुनकर कहीं कुछ देख रहे हैं और सोच रहे हैं। पिताजी का चेहरा डरा हुआ था। सामने गंगा घाट के चबूतरे पर वे मूर्तियाँ पड़ी थीं जिन्हें पूजा करने के बाद लोगों ने गंगा में प्रवाहित नहीं किया था। गले में उनके सूखी मालाएँ थी। गंगा-घाट पर हल्की-हल्की धूप फैली हुई थी और इस धूप में उन लोगों का सिर चमक रहा था जो उन मूर्तियों के पास बैठे नाई से सिर के केश हटवा रहे थे। चार कच्ची उम्र के लड़के केशविहीन सिर लिए बैठे थे। धूप उनके सिर पर पड़ रही थी और उसमें उनके सिर ऐसे चमक रहे थे जैसे सर पर सोना-चाँदी रख दिया हो।

देबू दा ने जब अपने पिता को यह सब देखते हुए पाया तो घबरा गए। धीरे से सिर हिलाकर पुछा, "बाबा कहाँ हो, सब ठीक है ना? चलो घर चलें।" बाबा ने कहा, "नहीं, भोलेनाथ के दर्शन कर लें फिर घर चलेंगे।" दोनों धीरे-धीरे मंदिर की तरफ बढ़ने लगे। रास्ते में देबू दा के पिता ने देबू दा से पूछा, "उनका कौन मर गया रे?"

"कौन जाने बाबा।"

दोनों मंदिर में बाबा भूतनाथ के दर्शन कर घर आ गए। पर आज बाबा चुप थे। सब ने पूछा, "बाबा, क्या हुआ, क्या बात है?" वह कुछ नहीं बोले। बहुत बार पूछा गया तब जाकर बस एक बात बोले, "मैं नहीं बचूँगा।" देबू दा ने उन्हें डाँटा, "क्या अंट-शंट बोलते हो! ये नहीं सोचते हमारे ऊपर यह सुनकर क्या बीतती है। चलो मूर्तियाँ बनाएँ। देखो वहाँ मिट्टी लाई हुई पड़ी है। बाँस में भूसा-चारा तो कल ही मैंने बाँध दिया था।

बाबा बोले, "रहने दो मन नहीं है।"

"नहीं ऐसे बोलने से नहीं चलेगा। बनाना होगा। उठो, मैं उठाता हूँ।" बाबा उठे। चलने लगे और ऐसे चले कि चिकनी मिट्टी में धड़ाम से फिसल गए। पकड़ो-पकड़ो, बाबा को पकड़ो। तारा, जल्दी आओ, बाबा गिर पड़े हैं। उन्हें उठाना है। हे भगवान, यह क्या हो गया।

पूरा घर दौड़ा। किसी तरह उन्हें उठाया गया, लेटाया गया। डॉक्टर को दिखलाया गया। पूरा घर चुप हो गया, पता लगा बाबा को लकवा मार गया है। दायाँ हाथ, दायाँ पाँव, दायाँ मुँह सब जगह सन्नाटा। शरीर का दायाँ भाग हरकत नहीं कर रहा।

खर्च। दवा दारू में खर्च, डॉक्टर का खर्च।

खर्च ही खर्च। कभी इस बहाने, कभी उस बहाने।

बाबा की सेवा करते-करते देबू दा की पत्नी तारा निढाल हो जाती। एक अकेली औरत और उस घर में पाँच-पाँच मर्दों का खाना। पाँच तो हो ही गए न। देबू दा चार भाई हैं। तीन भाई छोटे और कुँवारे। एक बोल नहीं पाता तो एक थोड़ा कम समझता है और बचा हुआ एक इतना भोला है कि उसका ध्यान रखना पड़ता है। बस देबू दा ठीक हैं। नहीं, यह बात पूरी तरह सच नहीं है। देबू दा को एक आँख से एकदम नहीं दिखता। आँख में जो तारा चमकता है न, उसके ऊपर माँस चढ़ गया है। मद्रास गए थे आँखों को दिखलाने पर डेढ़ लाख का खर्च सुन कर लौट आए। तारा से बोले... बेकार आने-जाने का खर्च लगा। एक आँख से एकदम नहीं देख पाने के कारण वैसे तो कोई दिक्कत नहीं हो रही पर मन में शंका होती है कि अधूरी दृष्टि के कारण ही मूर्तियों में अधूरापन तो नहीं आने लगा, कहीं इसी कारण प्रतिमाओं में जो जान हुआ करती थी वह जान दिखलाई नहीं पड़ रही? भगवान ही जाने।

तारा पर पूरा घर सँभालने, ससुर की सेवा करने की बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी। देबू दा के तीनों भाई अगर अपने पिता को खिलाने-पिलाने में लग जाएँगे तो मूर्तियाँ बनाने में मदद कौन करेगा। आजकल प्रतिमाओं को बनाते हुए मदद घर का आदमी ही करे तो अच्छा है। मजदूर व कारीगर को रखने से खर्च बहुत बढ़ जाता है। और छोटे शिल्पकार इतना खर्च पोसाते नहीं है।

तारा मजबूत औरत है, मन से भी शरीर से भी। वह इतना काम हँसते-हँसते कर लती है, पर कुछ महीनों से उसे एक चिंता खाए जा रही है। बाएँ वक्ष में जो नन्ही गाँठ थी वह बढ़ गई है और उससे भयंकर दर्द उठने लगा है। देबू दा उसे दिखा नहीं पा रहे। उस एक दिन उनके मुँह से यह बात तुलसीरंजन राय के सामने निकल गई जो कुम्हारटोली के काउंसलर रह चुके हैं। उन्होंने देबू दा को डाँटा कहा, "तुम्हारी स्त्री के वर्षों से गाँठ है और आज तक तुमने उसकी जाँच नहीं करवाई। तुरंत दिखाओ आज, अभी। नहीं तो किसी बड़े चक्कर में उलझ जाओगे।"

देबू दा घबरा गए। डॉ. महापात्र को दिखाया। न जाने पूरे महीने कैसी-कैसी जाँच चलती रही और अंत में जो देबू दा के हाथ लगा उससे देबू दा कहीं के नहीं रहे। न जाने मूर्तियाँ बनाते-बनाते उनसे जीवन में क्या भूल हुई कि घर में एक साथ लकवा और कैंसर की बीमारी छा गई। तारा को स्तन कैंसर निकला। वह भी फेफड़े तक बढ़ा हुआ। तुलसी बाबू ने समझाया, आश्वस्त किया। कहा कि वे कुम्हार टोली सचिव से बात कर उनकी कुछ आर्थिक मदद करने की कोशिश जरूर करेंगे। वे कैसे भारी और कड़े दिन थे जब एक साथ तारा और बाबा के लिए उन्हें भागदौड़ करनी पड़ी। पैसों के लिए इधर-उधर बात कर मदद लेनी पड़ी। दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ा। देबू दा ने बहुत सारी बातों को ईश्वर जो करे सो अच्छा कह मन को समझा लिया। यह समझ गए कि तारा को भी देखना होगा और बाबा को भी। बाबा शायद इसी अवस्था व स्थिति में वर्षों जीवित बचें रहें पर तारा को तो जाना होगा। डॉक्टर ने तारा का इलाज खर्चीला बताया जो उनके वश की बात नहीं है।

मीनाक्षी यह सब जानती है। जानती है कि देबू दा में उसके काले रंगों के कपड़ों की कालिमा घुस गई है। वह रवींद्र सारणी में स्थित तीन सौ वर्ष पुराने सिद्धेश्वरी काली मंदिर के सामने खड़ी माँ काली से प्रार्थना कर रही है, "सच कहती हूँ मैं, जीवन में काला रंग कभी नहीं पहनूँगी और लाल पाड़ की एक साड़ी तुम्हें चढ़ाऊँगी। तुम बस मेरे काका की प्रतिमाओं में रंग भर दो, उन्हें पहले जैसा कर दो, माँ।"


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