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कविता

गिरना सिर्फ अच्छा होता
विनीता परमार


चाहती थी
हरसिंगार के फूलों सा गिरना
उसपे ओस की बूँदों सा चमकना
बनके प्रेम सदानीरा हो जाना

कभी आम, जामुन बनकर गिरना
और उसे गिलहरी का कुतरना
कुतरे आम, जामुन का मिठास बढ़ा देना
तो कभी बारिश सा गिरना,
उस रेगिस्तान में
जहाँ अंकुरण की चाह है।

गिरती तो नदी भी है
चट्टानों को तोड़ती हुई
गिरती तो बर्फ भी है
स्वर्ग बनाते हुए

जब हम गिरते हैं
मन रोता है, आत्मा रोती है
रोम-रोम काँप उठता है

लेकिन फिर भी मैं सोचती हूँ
कितना अच्छा होता जब
गिरना सिर्फ अच्छा ही होता!


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