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कविता

खोईचा
विनीता परमार


विदा तो करते हो
फिर थोड़ा-सा अंश
रख ही लेते हो अपने कलेजे के टुकड़े का
लक्ष्मी है तू मेरे घर की
हो जाएगी अब तू दूसरे घर का सौभाग्य
फिर भी थोड़ा-सा डरा
थोड़ा सा सशंकित हूँ
जब तू जाती है
तेरा भाई पाँव झाड़ के रख लेता है
तेरे भाग्य के बहाने
तुम्हारा कुछ हिस्सा भी यहीं रह जाता है

जानती है तू जब-जब आती है
तेरी माँ और भाभी तेरे
खोईचे के पाँच दाने रख
लेती हैं कि तू आए यहाँ बार-बार
और सुन पहली बार
जब विदा हुई थी तेरी माँ ने रख लिया था खोईचे का एक भाग

हाँ पापा, अगर खोईचे के साथ रह जाता
सम्मान, स्वाभिमान, सौभाग्य
तो रख देती सब यहीं पर।


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