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कहानी

जलकुंभी
मधु कांकरिया


प्रणीता की कहानी मैं लिखना नहीं चाहती थी क्योंकि उसे संपूर्णता में पकड़ पाना, अनंत उदासी के उसके घेरे को बेध पाना मेरे बस की बात नहीं थी। फिर भी उसकी कहानी मैं लिख रही हूँ तो महज इस कारण कि कौन जाने किन सहृदय पाठकों के हाथों में पड़कर यह कहानी उसे उसकी मंजिल तक पहुँचाने में कामयाब हो जाए।

उसकी बेचैनी जिंदगी की तरह सच थी। उससे मिलकर पहली बार यह अहसास हुआ कि सत्य चाहे सुंदर होता हो पर सत्य को जानना हमेशा सुंदर नहीं होता है।

वाकया उन दिनों का है जब अपनी यूरोप यात्रा के दौरान नीदरलैंड की राजधानी एम्सटर्डम में तीन दिनों के लिए इंका के घर ठहरी थी मैं। वहीं मिली थी मुझे प्रणीता। दो दिनों तक इंका मुझे कभी वैन गॉग का आर्ट म्यूजियम, कभी द्वितीय विश्व युद्ध में मारे गए यहूदियों के स्मारक, कभी नेशनल म्यूजियम तो कभी वहाँ के प्रसिद्ध चर्च घुमाती रही। तीसरे दिन उसने हमें प्रणीता के हवाले कर दिया - आंटी आज आप मेरी सहेली प्रणीता के साथ घूम लीजिए। अरे नहीं आंटी, उसे भारतीय बहुत पसंद है, जान छिड़कती है वह हर आने वाले भारतीय पर। आंटी आप सोच भी नहीं सकती कि भारत किस कदर उसके भीतर धँसा हुआ है। जानिए कि किसी अदृश्य वाई-फाई से उसका सिस्टम हमेशा वहीं से जुड़ा रहता है, शर्त लगा लीजिए यदि ऐल्प्स देखते देखते उसके दिमाग में हिमालय न ठकठकाए और एम्स्टल नदी देखते देखते गंगा उसकी आँखों में न लहराए। और तो और हर दीपावली पर वह अपने कमरे में पीतल का छोटा सा दीपक जलाती है, जिसे उसने मुंबई से ही खरीदा था। उसकी स्टडी टेबल पर आपको सरस्वती जी की छोटी सी प्रतिमा भी मिल जाएगी। ऐसा क्यों? भारतीयों को तो विदेशियों पर मुग्ध होते देखा था, पर ऐसे विदेशी तो कभी मिले नहीं जो भारतीय पर या भारत पर इस कदर मुग्ध हों।

मैं हैरान थी

- ऐसा इसलिए आंटी कि वह आधी हिंदुस्तानी हैं। उसने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा।

आधी हिंदुस्तानी? मैंने मुस्कुराते हुए सोचा, जरूर उसके माँ-बाप में से कोई एक भारतीय मूल का होगा। नाम भी कुछ ऐसा ही लग रहा था।

मध्यम कद, गोरेपन की ओर उन्मुख गेहुँआ रंग, काले बाल, हलकी भूरी आँखें और अजंता एलोरा की मूर्तियों सी उठान ...सबकुछ उसके भारतीय होने की गवाही दे रहे थे, पर उसका उच्चारण... शुभानअल्लाह! वह हिंदी तो क्या अँग्रेजी भी टूटी फूटी ही बोल पाती थी। उसकी मातृभाषा डच थी।

उसे देख मेरी मित्र दिव्या ने आँखें मटकाते हुए चुटकी ली थी, बाप रे, इंडियन हार्डवेअर में यूरोपियन सॉफ्टवेयर! अजीब कॉम्बिनेशन!

आज इतना भर याद है कि जब वह मुझे एम्सटर्डम का लाल बत्ती इलाका घुमा रही थी और जब रात के मादक अँधेरे में उस सभ्यता की एक एक पाँखुरी खुल रही थी तो तिलस्मी चकाचौंध के बीच पारदर्शी शीशों के भीतर वासना की लहर सी लपलपाती और तसवीर सी खड़ी नग्नप्रायः उन बार बालाओं को देख कर भी मैं उतनी भौंचक नहीं हुई थी जितनी कि उस रेड लाइट एरिया के बीच शान से इठलाते चर्च को देखकर हुई थी। लाल बत्ती इलाके के बीच खुली हुई 'सेक्स शॉप' तो समझ में आती थी पर व्यभिचार और मांसलता की अश्लील दरिया जहाँ बह रही हो, जहाँ मांसलता, कुटिलता और कामुकता बेखौफ टहल रही हो। उनके बीच धर्म और करुणा का प्रतीक चर्च? मैं सचमुच हैरान थी। कामुक मांसलता से हाथ मिलाता धर्म! ऐसा सिर्फ एम्सटर्डम में ही संभव था। और यह हैरानी एक तरस और छिः में बदल गई जब थोड़े ही और आगे जाकर मैंने देखा बच्चों की 'डे केयर'! छिः इतना भी क्या गिरना कि बच्चों तक का लिहाज नहीं। और तब दिव्या ने चुटकी लेते हुए कहा था, 'यह इसलिए की रात में पाप करो, वेश्याओं के साथ मजे लूटो और दिन में पास में ही बने चर्च में जाकर कन्फेस कर दो, हिसाब बराबर, लाल बत्ती इलाका भी खुश और चर्च भी खुश। और देश की भावी पीढ़ी भी इसे देख देख कर संस्कारित होती रहे! किसी बड़ी बूढ़ी कि तरह मेरी बड़बड़ाहट अचानक मुखर हो उठी -भारत तो सचमुच बहुत पिछड़ा हुआ है उसे तो यहाँ तक पहुँचने में सदियों लग जाएँगे। भारत की तो वेश्याएँ भी एम्सटर्डम की लड़कियों से ज्यादा ढकी रहती हैं।' भारत का नाम सुनते ही प्रणीता नाम की वह नन्ही सी गुड़िया अचानक बारूद की पुड़िया बन गई और तेज आँच पर चढ़ी हँड़िया की तरह खदबदाने लगी - 'सही कहती है आंटी, ब्रह्म, आत्मा और परमात्मा में लीन रहने वाला भारत यौनिक पवित्रता का देश हैं न! इसलिए वहाँ की स्त्रियाँ भी बहुत शरीफ, शर्मीली और ढकी छुपी होती हैं, हमारी स्त्रियों की तरह उघड़ी नहीं होती, पर उनकी सारी रंगीनियाँ परदे के पीछे होती हैं कुछ इस कदर कि कुछ जिंदगियाँ मिट जाती हैं उन पर्दों को उठाने में ही। बोलते बोलते किसी खास किस्म की बेचैनी से चमकने लगी थी उसकी आँखें और हल्के से काँपने लगे थे उसके ओंठ। मैं समझ नहीं पा रही थी कि अचानक उसे हो क्या गया था, कहीं वह मेंटल तो नहीं...। सुना तो था कि वह भारत भक्त है लेकिन जो दिख रहा था वह वह नहीं था जो हमने सुना था। बहरहाल खुशनुमा माहौल बिगड़ न जाए इस कारण भारत वार्ता को स्थगित कर हम यूरोप में बढ़ते इस्लामिक फोबिया पर गर्म गर्म बहस करने लगे थे।

***

पेड़ पर अटकी पतंग सी फड़फडा रही है स्मृतियाँ! उसकी वे आँखें वह अंगार होता चेहरा और उसकी आँखों की बाँबी से सरसराते वे सर्प! आज करीब दो साल बाद आए इंका के ई-मेल से शायद कुछ अनुमान लगा सकूँ मैं की उसकी आँखों की बाँबी से वे सर्प क्यों सरसराए थे।

इंका ने लिखा है - आंटी, अगले सप्ताह प्रणीता मुंबई पहुँच रही है, वह मुंबई के चरणी रोड इलाके में स्थित अनाथालय 'बाल आनंद' के बच्चों के साथ कुछ महीने बिताने लगभग हर साल भारत जाती है। यदि संभव हो तो आप उसे हिंदी सिखाने में मदद कर दीजिएगा। क्या बताऊँ आंटी, प्रणीता की जिंदगी भी किसी कहानी से कम नहीं है। उसका जन्म नागपुर के किसी सरकारी अस्पताल में हुआ था। उसके जन्म के दस दिन बाद ही उसकी माँ उसे एक बास्केट में डाल उसे अस्पताल के ही चाइल्ड केयर हाउस में छोड़ गई थी। उसकी बास्केट में ही उसका जन्म सर्टिफिकेट भी नत्थी किया हुआ था। उसके सर्टिफिकेट में उसका धर्म 'हिंदू' लिखा हुआ था, माँ का नाम 'सूर्यबाला' लिखा हुआ था और पिता का कॉलम रिक्त था। उसी अस्पताल के कर्मचारियों ने ही उसे नाम दिया था 'प्रणीता'। इसके छह महीने बाद उसे मुंबई के चरणी रोड स्थित 'बाल आनंद' में भेज दिया गया, जहाँ से पौने दो साल बाद उसे एम्सटर्डम के एक फर्नाडीज दंपति ने गोद ले लिया। उन्होंने ही प्रणीता को बेटी की तरह पाल पोसा। आज भी प्रणीता उन्ही के साथ रहती हैं। वह यहाँ के प्राइवेट अस्पताल में सीनियर नर्स है, चींटी की तरह रात दिन खटती है, बूँद बूँद पैसे बचाती है, अपने दूसरे दोस्तों की तरह न उसने माँ बाप का घर छोड़ अकेला रहना शुरू किया, न बॉय फ्रेंड बनाए। न ही कहीं दुनिया घूमने निकली। अपनी सारी बचत वह 'बाल आनंद' के बच्चों पर और अपनी माँ को खोजने में लगा रही है। उसकी माँ का नाम भी ऐसा है कि वह महाराष्ट्र की भी हो सकती है और उत्तर भारत में भी कहीं की। पर ज्यादा संभावना है कि उसकी माँ शायद महाराष्ट्रियन थी और नागपुर के आस पास की थी, इसी कारण वह जब भी भारत जाती है नागपुर से मुंबई के बीच चक्कर काटती रहती है। क्या बताऊँ आंटी, यहाँ हम सारे दोस्त छक कर जिंदगी का जाम पी रहे हैं और एक वह है कि अपनी उस अनदेखी-अनजान माँ के पीछे अपनी जिंदगी, अपना प्यार अपना पैसा सब स्वाहा कर रही है। माँ को खोजना है इसलिए पैसे बचाने है, इसलिए अपना अलग ठिकाना तक नहीं बनाया है उसने, अभी भी फर्नाडीज दंपति के साथ ही रहती है जिसके चलते उसका प्रेमी भी उससे किनारा कर चुका है।

प्रणीता को कभी लगता है कि वह शायद कुँवारी माँ थी और भारत में कुँवारी माँ बहुत बड़ा सामजिक कलंक है, इस कारण उसकी माँ ने उसे फेंक दिया तो कभी उसे लगता है कि चूँकि वह कन्या थी, और शायद उसका परिवार पुत्र चाहता था इस कारण विवश होकर उसकी माँ को उसे टोकरी में डाल फेंक देना पड़ा। वह इतनी आक्रांत और ओब्सेस्ड है अपनी माँ से कि जीवन की हर घटना को माँ से जोड़कर देखने की उसकी आदत पड चुकी है। एक बार यहाँ के लाल बत्ती इलाके को देख ही चीख पड़ी थी, 'कौन जाने मेरी माँ लाल बत्ती इलाके की रंडी रही हो। खुद उसको ही नहीं पता हो कि कौन था मेरा बाप इसीलिए...' मैंने सब कुछ आपको इसलिए बताया है आंटी की आप उसकी आत्मा में गड़े माँ नाम के नुकीले काँटे को निकालने में उसकी मदद कर सकें।

सप्ताह भर बाद ही हवा के एक बवंडर की तरह प्रणीता मेरे सामने थी, 'हाई आंटी...' और वह मुझसे लिपट गई थी। लिपटा लिपटी की रस्म के बाद एक भरपूर निगाह उस पर डाली - जयपुरी बंधेज की सलवार कुर्ती और कानों में मोती के बूँदे के साथ माथे पर लगी लाल बिंदी जिसने भारतीय दिखने की उसकी रही सही कसर भी पूरी कर दी थी, 'पधारो म्हारे देश' की ही तर्ज पर मैंने आवभगत की। मेरे पुत्र ने आँखें झपका झपका कर आलोचनात्मक निगाहों से उसे देखा, उसे सुना, फिर कहा 'हमारे देश में आपका स्वागत है' प्रणीता के चेहरे पर जैसे राख पुत गई, तरेरती आँखों से उसने बेटे को देखा और अपनी आवाज को खींच कर किसी तरह शब्दों को बाहर धकेला, 'इट'स माय कंट्री टू,' 'स्योर स्योर' बेटे ने अपनी भूल सुधार ली, पर मैं डर गई, मन ही मन गाँठ बाँध ली, बहुत सोच समझकर बोलना होगा इससे, चोट खाए अंग पर हलकी सी छुअन भी प्राणलेवा हो सकती है। बात किसी भी विषय पर हो उसे खींच तान कर माँ से जोड़ने की उसकी आदत पड़ गई थी। माँ शब्द वह उच्चारित भी ऐसे करती जैसे माँ को छू रही हो। मुझे याद है एने फ्रैंक के घर को घुमाते हुए बात अनायास ही हिटलर के व्यक्तित्व और उसके जीवन पर चल पड़ी थी। मैंने कहा कि अपने अंतिम दिनों में सर्वशक्तिमान हिटलर को भी पूरी दुनिया में सिर्फ दो लोगों पर ही भरोसा रह गया था - अपनी प्रेमिका ईवा ब्राउनिंग और अपने कुत्ते पर। तभी जैसे शांत सरोवर में किसी ने कंकड़ फेंक दिया हो, प्रणीता एकाएक फूट पड़ी थी - क्योंकि उसके पास माँ नहीं थी, माँ जिंदगी का पहला भरोसा होती है पर दूसरे ही क्षण उसकी भाव भंगिमा बदल गई थी। दूसरी साँस में ही उसने अपनी ही बात काट दी और थरथराती आवाज में बोली - और नहीं भी होती है।

वह आतंकित भी करती और भीगी भीगी सहानुभूति भी जगाती थी। वह अँधेरा भी थी और उजाला भी थी। इसलिए मैंने सोच लिया था कि मैं उससे दुनिया के सारे विषयों पर बात करूँगी पर उसकी माँ पर नहीं ही करूँगी क्या पता कब मुँह से क्या निकल जाए और राख में दबे किसी अंगारे पर पाँव पड़ जाए और वह झुलस जाए।

थोड़ी सी औपचारिक बातों के बाद ही वह अपने एजेंडे पर आ गई थी, कंधे तक लटक आई अपनी कुर्ती को पीछे खींचते हुए कहा उसने, 'आंटी मुझे हिंदी सिखा देंगी ना! बिना हिंदी मेरा भारत आना उतना सार्थक नहीं हो पाएगा। बाल आनंद के बच्चों से खूब घुल मिल सकूँ, इसलिए मेरा हिंदी जानना बहुत जरूरी है आंटी...। बोलते बोलते वह कुछ और भी बोलना चाह रही थी, पर सकुचा रही थी, मैंने उसकी पीठ पर हाथ रख उसे उकसाया, 'खुल कर बोलो मुझसे', उसने धीमे से कहा 'कई बार आंटी मैं यह सोचकर भी परेशान हो जाती हूँ कि यदि मेरी माँ मिल भी गई तो मैं उससे बात कैसे करूँगी, मुझे तो हिंदी आती ही नहीं...' कहते कहते उम्मीद से भरी आँखें उसने फिर टिका दी मेरे चेहरे पर। मैंने उन आँखों की भाषा को पढ़ने में कोई चूक नहीं की। रोजमर्रा के कुछ जरूरी काम सलटाकर मैं बैठ भी गई उसके साथ। मैंने भरसक कोशिश की पर उसके साथ दिक्कत यह थी कि वह 'र', 'ड़' और 'त' एकदम नहीं बोल पाती थी। 'लड़की', 'रोटी' 'वह' जैसे शब्दों को बोलने में ही उसकी गर्दन की सारी नसें बुरी तरह खिंच जाती थी। 'राजा बेटा' उसके मुँह में पड़ते ही 'आजा बेटा' बन जाता। 'रोता रहा' और 'भारत मेरा देश' की तो उसने वह दुर्गति बनाई कि मेरी हिम्मत ही भाग खड़ी हुई।

घंटा बीत चुका था, आँगन से धूप की तितलियाँ उड़ चुकी थी और वह अभी तक 'शुक्रिया', 'आ जा', 'भाग जा', 'सो जा', 'उठ जा', 'नमस्कार' जैसे चंद शब्दों की पूँजी ही बटोर पाई थी। मैं सोचने लगी कि उसे हिंदी सिखाने का कौन सा आसान नुस्खा अपनाऊँ कि उसे सचमुच मदद मिल सके कि तभी उसने अपना लैपटॉप खोल मुझे 'बाल आनंद' की तसवीरें दिखानी शुरू की - आंटी यह खुशबू है, आधी हेलेन केलर, आधी इसलिए कि यह देख सकती है लेकिन सुन और बोल नहीं सकती है, लेकिन है बहुत तेज, आँख और उँगलियों के इशारे से बोलना सीख गई है, मेरे को देखते ही हाथ हिला हिला कर टॉफी की फरमाइश करती है। मैं अँगूठा हिला कर मना करती हूँ तो शैतान मेरे बैग की तलाशी लेकर टॉफी निकाल लेती है। देखना आंटी, यह भी एक दिन नाम करेगी। यह मयंक है, महाशैतान, देख नहीं सकता पर इतना चालाक कि मेरे घुसते ही किलकारी मारने लगता है। जाने कैसे उसको पता चल जाता है कि मैं आ गई हूँ...। तसवीर दिखाते दिखाते उसकी आँखों में नमी सी छा गई थी और वह शायद पहली बार हँसी, एक रस भरी हँसी। कुछ पल बीतते न बीतते 'आंटी आप नागपुर कभी गई हैं क्या?' फिर सवाल की मिसाइल छोड़ दी उसने। नागपुर शब्द चाबुक की तरह पड़ा, जानती थी कि नागपुर उसका नासूर है अब कहीं बातचीत फिर उसके घाव लगे अंगों को न छू दे! लेकिन प्रणीता नाम की वह युवती तो जैसे उस दिन फेंटा कस कर आई थी - अपना सब कुछ उघाड़ देने को, अपना सब कुछ उँड़ेल देने को। प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखते हुए डरते डरते आखिर डर की नोक को छू ही लिया मैंने,' तुम्हें कब पता चला कि मिस्टर एंड मिसेज फर्नाडीज तुम्हारे असली माँ-बाप नहीं हैं।'

उसके चहरे के भाव फिर बदले, आँखों में बदली लहराई। अटलबिहारी अंदाज में एक लंबा सा विराम लिया उसने, मैंने सोचा उसे जवाब देने में शायद दिलचस्पी नहीं, इस कारण मैंने बात घुमाते हुए पूछा, चाय पीओगी या कॉफी, मेरी बात का जवाब दिए बिना वह अपनी ही रौ में बहने लगी - आंटी कुछ चीजें खुद ही बोलने लगती हैं। सच्चाई में बड़ी ताकत होती है आंटी। आप किसी को जड़ सहित उखाड़ कर कहीं ओर रोप सकते हैं लेकिन आप किसी के जींस तो नहीं बदल सकते हैं न! मेरे माँ पापा ने मुझे कभी कुछ नहीं बताया। लेकिन मेरा गेहुँआ रंग, काले बाल, ठिंगना कद, मेरी शक्ल-सूरत ही जैसे मेरी असलियत बयाँ करने लगी थी। मेरे मम्मा-पापा दोनों ही एकदम सफेद, लंबे चौड़े और सुनहरे बालों वाले हैं। पाँच साल की होते न होते मुझे स्कूल, प्ले ग्राउंड, और स्विमिंग क्लासेज में मेरे दोस्त, मेरी टीचर तक कई बार पूछ लेती 'प्रणीता आर यू फ्रॉम पाकिस्तान? आर यू फ्रॉम बंगलादेश? आर यू फ्रॉम इंडिया। मैं तब तक बांग्ला देश का नाम भी नहीं जानती थी, पाकिस्तान का नाम जरूर मैंने सुन रखा था। यानी मुझे लगने लग गया था कि लोग मुझमें दिलचस्पी लेते हैं, मैं कुछ अलग हूँ। पर यह अलग होना इतना पीड़ादायक होगा यह पता चला जब समय मुझे गढ़ रहा था, जब मैं क्लास सेवन में थी। आज भी याद कर सकती हूँ उस शाम को जब मैं बैडमिंटन क्लास से घर लौट रही थी तभी मेरी सहेली मारिया ने मुझे बताया कि मैं मिस्टर फर्नाडीज की अडॉप्टेड डॉटर हूँ, कि वे मेरे असली माँ-बाप नहीं हैं। मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं अपना आपा खो बैठी, मैंने दनादन कई घूँसे जड़ दिए उसे और उस पर भी मुझे चैन नहीं पड़ा तो मैंने धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया उसे। मैं सचमुच उन क्षणों उखड़ चुकी थी, घर आकर मैंने अपने को अपने कमरे में बंद कर लिया, मेरी मम्मा ने जब कई बार पूछा तो मैं फूट फूट कर रो पड़ी, मैंने बिसूरते हुए उन्हें बताया और पूछा कि सच्चाई क्या हैं, पंखहीन पाखी की तरह फड़फड़ा रही थी मेरी जिज्ञासा कि कौन हूँ मैं? मेरी मम्मा ने तुरंत मेरे पापा को फोन कर घर बुलाया। पापा जल्दी ही घर आ गए थे, हाथ में बड़ा सा केक। आते ही 'माय स्वीट चाइल्ड' कहते हुए मुझे चूम लिया। पापा ने वाया ममी वही बताया जो हकीकत थी, पापा बताते जा रहे थे और मैं अपनी जिंदगी के सबसे दर्दनाक अल्फाज सुन रही थी, इंच इंच दरक रही थी। लय ताल में बहती जिंदगी एकाएक धुआँ धुआँ हो गई थी। आंटी दुनिया का सबसे बड़ा धोखा शायद यही है कि एकाएक आपको पता लगे कि आप वह नहीं हैं जो आप हैं, कि आप उस नदी की धार नहीं हैं जो आपके सामने बह रही है। पतंग उड़ाने की उम्र और यह तूफान! मैं हकीकत को सह भी नहीं पा रही थी और रह भी नहीं पा रही थी। वह सच्चाई नहीं एक खंजर थी जो मेरे सीने में गड़ गई थी। बस कुछ पल और मेरा सब कुछ बदल गया था। जैसे बाढ़ आई हो और सबकुछ बह गया हो...। मेरी सारी मासूमियत, मस्ती, सकून, अल्हड़ता। मौत के अँधेरे की तरह जिंदगी एकाएक रहस्यमयी हो गई थी। अब किस अधिकार से मैं मम्मा से कोई चीज माँग सकूँगी? उन्होंने मुझ पर जो किया वह मेरा नैसर्गिक अधिकार नहीं वरन मुझ पर कृपा थी, दया थी, तरस था। अब मुझे नई निगाह से दुनिया को देखना था। अपनी जड़ों को ढूँढ़ना था। मुझे अपना बर्थ सर्टिफकेट दिखाते हुए, मेरे बचपन की तसवीर दिखाते हुए मम्मा और पापा दोनों की आँखें डबडबा गई थीं। बर्थ सर्टिफिकेट पर लिखा माँ का नाम 'सूर्यबाला' जैसे खंजर बन मेरे सीने में धँस गया था। आज भी याद है आंटी की उन दिनों हमारे घर के ड्राइंगरूम की दीवार पर बड़ी सी घड़ी होती थी...। टिक टिक और मुझे एकाएक जाने क्या हुआ कि मैंने टेबल पर पड़ी काँच की गिलास उठाई और उस घड़ी पर जोर से दे मारी। सबके प्रति मेरे भीतर एकाएक कड़ुवाहट भर गई थी। तब मेरे पापा ने मेरे सर पर हाथ फेरते बहुत अच्छी बात मुझसे कही - नो मैटर वेयर आर यू कमिंग फ्रॉम, व्हाट मैटर्स इज वेयर यू रीच' (क्या फर्क पड़ता है कि तुम कहाँ से आए हो, देखना है कि आप पहुँचते कहाँ हो।' ममा ने मेरी हालत देखी तो मुझे भींचते हुए कहा 'कुछ नहीं बदला है' मैंने बिसूरते हुए कहा, 'सब कुछ बदल गया है, तुम और भी प्यारी ममा हो गई हो!' कहते हुए उसने फिर एक थकी हुई गहरी साँस छोड़ी और बोली 'कयामत वाली उस रात बिस्तर की ठंडी कब्र में करवटें बदलती रही मैं आंटी, भोर होते ही मम्मा ने मेरी सूजी आँखें देखी तो मुझे नींद की गोली दे सुला दिया'।

मैंने उसे पानी की गिलास थमाई, पीने की बजाय वह गिलास के पानी को ही घूरती रही देर तक। अब वह पूरी तरह अपने अतीत में धँस चुकी थी। कुछ खामोश पलों के बाद हाथों से ही बालों में कंघी करते हुए कहा उसने - एकाएक सबकुछ बदल गया था आंटी। उगते सूरज के साथ एक सवाल मेरे भीतर उगने लगता - कौन हूँ मैं? जबतक व्यस्त रहती सबकुछ ठीक रहता जैसे ही खाली होती भीतर घात लगाए बैठी माँ किसी अदृश्य स्केनर की तरह बिप बिप करने लगती। अपने डैने फैलाने लगती, मोमबत्ती की तरह मुझे कतरा कतरा जलाने लगती - कौन थी वह? कैसी थी? कैसा था उनका जीवन? क्या मेरे बाद भी उनके बच्चे हुए? क्या रही होगी उनकी मजबूरी जो उन्हें मुझे फेंकना पड़ा, विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ माँ-बाप बच्चों के लिए ही जीते और मरते हैं, जहाँ बच्चे माँ के लिए मथुरा-वृंदावन होते हैं। जिसने मुझे यह रूप, रंग और काया दी उन्हें देखना चाहती हूँ बस एक बार। आंटी, बहुत सालों तक तो मैं माँ से इतनी आक्रांत रहती थी कि माँ से संबंधित न कोई पिक्चर देख पाती थी और न ही कोई कहानी ही पढ़ पाती थी। रात को नींद उचट जाती तो बादलों और तारों की छाँव में माँ की शक्ल की कल्पना करती।

माँ जब नहीं होती है तो कितनी ज्यादा होती है! मनका मनका बिखर चुकी प्रणीता की घायल आत्मा की मलहम पट्टी करने के उद्देशय से कहा मैंने 'तुम्हारे पापा ठीक कहते है कि इससे क्या फर्क पड़ता है कि आप कहाँ से आए हो, भारतीय माइथोलॉजी में भी जब कर्ण के जन्म से संबंधित अटपटे सवाल उठे तो महर्षि वेदव्यास ने दुर्योधन के मुँह से कहलवाया था कि नदियों, वीरों और ऋषियों के उद्गम नहीं देखे जाते। जीवन संयोग का दूसरा नाम है प्रणीता। हमें अपनी इच्छा के बिना ही जीवन में जीने के लिए धकेल दिया जाता है। क्या यह हमारे हाथ में है कि हम अपने जन्म का समय, परिस्थिति, स्थान या माँ बाप तय करें। इसलिए अपनी जड़ों को लेकर तुम परेशान मत हो प्रणीता, तुम जलकुंभी की तरह बनो जो जहाँ होती हैं वहीं अपनी जड़ें फैला लेती हैं।'

उसके शब्द लड़खड़ाने लगे, कलेजा जैसे कट कट कर गिरने लगा - कैसे परेशान नहीं रहूँ आंटी, माँ दुनिया का सबसे प्यारा और जादू भरा शब्द होता है। कहीं पढ़ा था कि ईश्वर हर कहीं नहीं जा सकता इसलिए उसने माँ बनाई। दुनिया में वास्तविक रिश्ता एक ही होता है - माँ-बेटी का। यह रिश्ता, यह सवाल मेरे होने से जुड़ा है, आप इसकी पीड़ा नहीं समझ पाएँगी। जहाँ जहाँ मैं जाती हूँ मेरे जन्म की कहानी भी साथ साथ चलती है।

मेरी बात से फिर कुछ दरक गया था उसके भीतर, शायद उसके दिमाग की शिराएँ अस्त व्यस्त हो गई थीं। शायद एकाएक ऑक्सीजन की कमी हो गई थी, इस कारण वह हाँफने लगी थी लेकिन हाँफते हाँफते भी उसने कहना जारी रखा - एक बार मेरी मम्मा मुझे तुरंत डॉक्टर के ले गई, मुझे साँस लेने में तकलीफ हो रही थी, डॉक्टर ने बस इतना सा पूछा 'क्या यह रोग हेरेडिटेरी है? याद कीजिए, आपके परिवार में किसी को हुआ है क्या यह रोग? परिवार शब्द मुझे बिच्छू की तरह काटने लगा। किस परिवार की हूँ मैं? कौन मेरे भाई बहन? क्यों हुआ मेरे साथ ऐसा? डॉक्टर मुझे ठकठकाते रहे और मैं जाने कहाँ खो गई। तब मजबूरन मेरी मम्मा को सबकुछ बताना पड़ा, जब वे बता रहीं थी तो मुझे लगा जैसे कोई बेरहमी से मेरे वजूद के एक एक पंख को नोच रहा है। अपने पूर्वजों को जानना जरूरी होता है आंटी, क्योंकि यह सवाल कहीं न कहीं हमारे वजूद से भी जुड़ा रहता है। इसके बिना जिंदगी एक बेबुनियाद इमारत की तरह लगती है। मैं कई बार सोचती हूँ कि कौन ज्यादा ताकतवर है वह वातावरण जिसमें आदमी पलता बढ़ता है या उसके जींस जो उसे खून के साथ मिलते हैं।

- तुम्हारी बात शब्द शब्द सही है प्रणीता, पर जब जिंदगी के कुछ सत्यों पर पर अपना बस नहीं चले तो तिल तिल जलने की बजाय अच्छा है कि वे जिस रूप में मिले उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। उसके अशांत चित्त को शांत करने के लिए मैने ठंडे पानी के छींटे डाले

शायद मेरी बात पसंद नहीं आई उसे, इसलिए मेरी बात को अनसुनी करते हुए घड़ी पर एक नजर फेंकी उसने और जल्दीबाजी में जूते के तस्म बाँधते हुए बोली 'नाउ गो, नेक्स्ट टाइम कम अगेन, शैल रिंग यू, बिफोर आई कम 'मुझे उसकी हिंदी ही नहीं उसकी अँग्रेजी समझने में भी मगजमारी करनी पड़ती थी। ओके। विदा के क्षणों मैं उसे तबतक ताकती रही जब तक उसकी आकृति धूमिल होते होते मेरी आँखों से ओझल नहीं हो गई थी।

***

सप्ताह बीता भी न था कि फिर उसका फोन। आग्रहपूर्वक कह रही थी वह, 'आंटी मेरा एक काम करना होगा आपको, नहीं आंटी मना मत कीजिएगा, बस आपको मेरे साथ बाल आनंद चलना होगा, आंटी मुझे कुछ बच्चों से जरूरी बात करनी है, गणपति उत्सव के चलते सारा स्टाफ छुट्टियों पर हैं, मैं बच्चों से ठीक से बात नहीं कर पा रही हूँ, नहीं ये विकलांग नहीं, थोड़े बड़े बच्चे हैं, आपको मुझे मदद करना होगा जिससे मैं इन बच्चों से अच्छे से बात कर सकूँ। मैं आपको लेने आ जाऊँगी। बाई आंटी!

अपने वादे के अनुसार ही वह मुझको लेने भी आ गई थी। आते ही फिर चहकी 'नमस्ते आंटी जल्दी करिए, यहाँ तो बहुत जल्दी ही सात बजे ही अँधेरा घिर आता है'। वह अब हाई की जगह नमस्ते कहने लगी थी।

वे दशहरे के दिन थे इसलिए लोकल ट्रेन में भीड़ अपेक्षाकृत कम थी, हमें महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में बैठने की जगह मिल गई थी। भीतर एक अलग ही दुनिया थी। खाने के बिस्किट से लेकर साज श्रृंगार के सभी सामान वहाँ बिक रहे थे। बच्चें, लड़कियाँ, औरतें... सभी बेचने में मशगूल। किसी के माथे पर सब्जियों की टोकरी तो किसी के हाथों में स्ट्राबेरी के पैकेट। किसी के नन्हें हाथों में बिंदी और हेयर क्लिप का पत्ता, तो कोई चूड़ियाँ और नकली गहनों के साथ। कुछ श्रमजीवी औरतें आलथी पालथी मारकर तो कुछ उकरू बैठे दरवाजे के पास ही डब्बा निकाल खाने लगी तो एक मध्यवर्गीय घरेलू टाइप कर्मयोगी महिला इतनी भीड़ भाड़ में भी क्रोसिए से लेस बुन रही थी। एक औरत इन सबसे निर्लिप्त अपनी पीठ सीट से टिकाए हनुमान चालीसा का जाप कर रही थी। एक महिला कान का मैल निकालते निकालते ही दिव्य अनुभूति में लीन हो गई थी। ट्रेन फिर अगले स्टेशन पर रुकी, एक बुर्काधारी महिला चढ़ी, कुछ उत्सुक नजरें उठीं उस ओर कि तभी उसने बुर्का उतारा और देखते ही देखते उसके भीतर से जींस टॉप में लिपटी एक आधुनिका निकली। उसे देख प्रणीता पहली बार मुस्कुराई। मैं झुमके बेचने वाली एक बच्ची से उलझी हुई थी। मैंने पूछा क्या नाम तेरा। उसने फट से जवाब दिया 'पिंकी'। मैंने पूछा, 'क्या तू पढ़ती है? उसने जैसे गोली दागी, 'तेरा भेजा फिरेला है, मैं पढ़ेगी तो भाई को कौन पढ़ाएगा?' बातों से पता लगा कि वह और उसकी माँ धंधे में लगी हुई थी, बोरीवली से चर्चगेट तक की लोकल में उसका पूरा धंधा फैला हुआ था। मैंने पूछा कितना कमा लेती हो, उसने माथे पर हाथ पटक जवाब दिया 'क्या कमाएगी, आधा तो पुलिस वालों को देना पड़ जाता है...'। इसी बीच अगला स्टेशन आ गया, उसे नए ग्राहकों की और बढ़ना था इसलिए झल्लाती हुई बोली, 'बूँदा लेना है तो लो, खाली पीली मेरा टैम खोटी मत करो।' पिंकी से बूँदे लेकर मैं प्रणीता को दिखाने लगी तो कयामत ही आ गई थी। हल्की बारिश के बाद की मुलायम धूप उसके चेहरे पर झिलमिला रही थी लेकिन वह अपने मोबाईल पर कभी अपनी ही तसवीर को देखती तो कभी दरवाजे पर बड़ा पाव खाती महिलाओं को गौर से अपलक देख रही थी। यह क्या प्रणीता! अपनी ही तसवीर को क्या देख रही हो? वह लज्जित हुई, आवाज से जैसे लहू टपका - सामान बेचनेवालियों की उम्र देखिए... जाने क्यों मुझे लगता है कि मेरी माँ शायद इन्हीं सामान बेचनेवालियों में कोई हो। वह धीरे से फुसफुसाई देखिए न आंटी क्या इनमे कोई मिलती है मेरी शक्ल से? धत्! यह क्या गधापन है?क्या ऐसे मिलती है माँ? मेरी त्वरित प्रतिक्रिया यही थी। लेकिन उसके चेहरे से बरसते उम्मीद के नूर ने मेरी बोलती बंद कर दी। कचरे से उठकर होश सँभालते ही एक लड़की ने अपनी जन्मदाता के बारे में जानना चाहा था। उसके सवाल की नोंके मुझे चुभने लगी। लगा जैसे धरती भी कुछ क्षणों रुक गई अपनी ही धुरी पर और सोच रही है कि क्या जवाब दें इस दर्द भरे सवाल का? मेरी साँस भारी हो रही थी। पल पल पहाड़, कब खत्म होगा यह दर्दनाक सफर? कुछ पल सरके कि तभी उसने मोबाइल पर फिर अपनी ही तसवीर देखनी शुरू कर दी।

मैंने पूछने की धृष्टता कर ही दी आखिरकार,' - तुम अपनी तसवीर क्यों देख रही हो बार बार? जवाब और भी विचित्र मिला।

- मैं कई बार अपना चेहरा ही भूल जाती हूँ, अपने चेहरे को सामने रखकर मैं सामने वाली के चेहरे से अपने चेहरे की रेखाओं को मिलाती रहती हूँ। काश मेरी माँ ने मेरे बर्थ सर्टिफिकेट के साथ अपनी तसवीर भी रख दी होती! उसने काँपते होठों से कहा और अजीब निगाहों से मुझे देखा... वहाँ फिर कुछ सर्प सरसराए, क्रोध, विवशता और दुख के सर्प!

हे भगवान! यह लड़की तो मुझे भी पागल कर देगी। यह तो माँ से जोंक की तरह चिपक गई है, आड़ी तिरछी जैसी भी हो उसे बस माँ चाहिए। उन उदार क्षणों मन में प्रार्थना भी उठी - हे भगवान! इसे इसकी माँ मिल जाए। पर क्या ऐसे माँ मिलती है? उसका दिमाग सचमुच सटक गया था। उन बहके पागल क्षणों ने डर की सिलवटें मेरे भीतर डाल दी थीं। एक बार तो मेरे मन में यह कुविचार भी आया कि उसे छोड़कर भाग खड़ी होऊँ। लेकिन जिंदगी ने पहले से ही उसे इतने धोखे दे रखे थे कि और धोखे की गुंजाईश अब बची ही कहाँ थी लिहाजा मैं उससे चिपकी रही। थोड़ी ही देर में बांद्रा स्टेशन आया, फिर एक अधेड़ सभ्रांत और समृद्ध महिला चढ़ी। संयोग से वह हमारे सामने की ही सीट पर पसर कर बैठी थी। प्रणीता की संपूर्ण देह जैसे आँखें बन गई थीं। अपलक ताकती रही उसे... फिर मोबाइल पर अपनी ही तसवीर को देखने लगी। कभी उसको देखती कभी अपनी तसवीर को देखती। मेरे भीतर हूक सी उठी - इसे तो माँ की खुजली हो गई है। क्या रोकूँ इसे? कहूँ ऐसा न करे? पर जो बूँद बूँद पैसे बचाकर सात समुंदर पार से आई है यहाँ अपनी माँ को खोजने उसे मैं तो क्या संसार की कोई भी ताकत रोक सकती है भला? विचारों के सैलाब में बहने लगी मैं।

घुटन एकाएक बढ़ गई। प्रणीता और आस पास सबसे अपने को काटकर मैं खिड़की से बाहर बादलों को देखने लगी। मुझे इंका की बात याद आई जिसने कहा था कि मुंबई आते ही प्रणीता की उम्मीद सब कूल किनारा तोड़ कर आगे बढ़ती है। तभी उसकी अधीर और बेचैन सी आवाज फिर मुझसे टकराई - लेकिन यह भी तो हो सकता है आंटी कि मेरी माँ अविवाहित माँ नहीं विवाहित माँ रही हों और पुत्र पाने के इच्छुक परिवार के दबाब में उन्हें मुझे त्यागना पड़ा हो। और आज उनमें इतनी ताकत आ गई हो कि मुझे सामने देख वे अपनी भूल स्वीकार कर लें।

- तो तुम एक काम करो आसमान में सूर्यबाला नाम की पट्टी टाँग दो, सारे घरों की सूर्यबालाएँ बाहर निकल आएँगी, फिर ढूँढ़ लेना अपनी सूर्यबाला को!

आंटी...। और वह रुआँसी हो गई। एकाएक हम दोनों ही दुखी हो गए। वह माँ के दुख से मैं उसके दुख से। स्थिति को सामान्य करने के लिए मुझे कुछ अच्छा कहना था, उसके कंधों पर हाथ रखते हुए कहा मैंने, - फर्ज करो तुम्हे तुम्हारी माँ मिल जाए तो तुम क्या करोगी, क्या एम्सटर्डम के छुरी काँटेवाले माहौल से अपना खूँटा उखाड़ कर यहाँ चली आओगी?

उसकी आँखें एकाएक स्वप्निल हो गई, झारखंड की माटी जैसे लाल चेहरे पर पल भर के लिए चाँदनी छिटक गई जैसे सचमुच ही उसे अपनी माँ की खबर मिल गई हो। अब वह ख्बाबों और ख्यालों की लहरों पर सबार थी - 'चलो चले माँ, अपनों से दूर कहीं, स्वप्नों के गाँव में' जैसा कुछ। मुझे अपनी भूल महसूस हुई... इसलिए गला खँखारकर दूसरी ही साँस में मैं कह रही थी - होने को तो कुछ भी हो सकता है पर तुम कबतक अँधेरे में ही छलाँग लगाती रहोगी प्रणीता, उस झुलसे हुए अतीत को अपनी पीठ पर लादे रहोगी। नाम, वंश, पैसा, ताकत, रिश्ते नाते, परिवार, घर... सब भ्रम है, असली चीज है जीवन।

- तो क्या मैं हाथ पर हाथ धर कर बैठी रहूँ? या किसी आम भारतीय की तरह पेड़ पर मन्नत का लाल धागा बाँध लौट जाऊँ अपने देश! वह तो जैसे AK47 लेकर मेरे सामने खड़ी हो गई।

मछली की आँख सी डबडबाती उसकी आँखों का सामना करने की बजाय मैंने आँखें झुका ली। मेरा सौभाग्य कि उन्ही क्षणों ट्रेन में हो हल्ला एकाएक बहुत बढ़ गया था, इस कारण बच गई मैं। दादर स्टेशन पर, उत्सव का सा माहौल था, कुछ लड़के लड़कियाँ जो दौड़ती ट्रेन में अपने सामान बेचते हैं वे देवी दुर्गा की बजाय ट्रेन की पूजा कर रहे थे, क्योंकि जिंदा रहने की जंग में ट्रेन ही उनके साथ थी। प्रणीता तो प्रणीता मुझे भी अजीब लगा देवी दुर्गा की बजाय ट्रेन की पूजा!

लेकिन यथार्थ यही था!

चर्नी रोड स्टेशन के बाहर कटिंग चाय, बड़ा पाव और रगड़ा पैटी खाते खाते एकाएक उसकी नजर कचरे के ढेर पर स्याही के धब्बे सी फैली बस्तियों पर पड़ी, उभरी हड्डियों और धँसे पेट वाले मैले कुचले एनेमिक बच्चे, उन्हें एकटक ताकती रही वह, मैं फिर हैरान, अब फिर किसकी शक्ल से मिला रही है खुद को, आसपास तो कोई अधेड़ महिला भी नहीं थी, पर इस बार वह आसमान से दुख तोड़ लाई, कातर स्वर में बोली -आंटी, कई बार सोचती हूँ कि यदि मुझे मिस्टर फर्नाडीज अडॉप्ट नहीं कर लेते तो मैं भी शायद ऐसी ही जिंदगी गुजारती, शायद इसी प्रकार गंदगी के ढेर पर सोती जैसे आधा हिंदुस्तान सोता है।

- तो मानती हो कि तुम्हारे साथ इतनी बेइनसाफी नहीं हुई जितनी इन बच्चों के साथ हुई?

वह फिर पलट गई।

- ये कम से कम अपने परिवार, अपने भाई बहन के साथ तो हैं। मेरी तरह बेचैन परिंदे तो नहीं। मुझसे ज्यादा खुशनसीब हैं ये कि जिंदगी ने कम से कम इन्हे माँ तो दी है, मुझे तो वह भी नसीब नहीं। बोलते बोलते ओस की बूँदों की तरह चमके उसके आँसू।

हम टहलते टहलते समुद्र की तरफ आ गए थे। आधे घंटे का समय था हमारे पास। सामने उफनता विराट समुद्र! उसके कंधे पर हाथ रखते हुए अपने हृदय को उँड़ेलते हुए कहा मैने - देखो प्रणीता! इस विराट के सम्मुख क्या हैं मनुष्य? कितना असहाय! कितना क्षीण! इसलिए जीवन से ज्यादा अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए, जो मिले उसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए। क्योंकि जिंदगी खोया-पाया के गणित से ऊपर की चीज है।

पता नहीं उसकी श्रवेंद्रियों तक मेरी बात पहुँची या नहीं। उसने मुझे सुना या नहीं, और सुना भी तो समझा या नहीं। क्योंकि दूसरे ही क्षण वह फिर दार्शनिकों की तरह कहने लगी - 'मेरी माँ ने भी देखा होगा इस समुद्र को, माँ की माँ ने भी देखा होगा। शायद मेरी बेटी भी देखे इसे।

***

थोड़ा रुककर वह फिर शुरू हो गई - एक बात बताइए आंटी, क्या आपकी शक्ल मिलती है आपकी माँ से? समझ गई, क्या चल रहा है इसके भीतर। कोई मुकम्मल जवाब मैं उसको दे पाती कि दूसरी ही साँस में वह फिर कहने लगी - मैं नर्स हूँ आंटी, मैटर्निटी वार्ड में हर दिन मैं बच्चे जनवाती हूँ, ओह आंटी अद्भुत लगता है जब बच्चा माँ की कोख से धरती पर आता है, मुझे सबकुछ इतना दिव्य इतना रोमांचक लगता है कि मैं बयाँ नहीं कर सकती। मैं सोच सोचकर पागल हो जाती हूँ कि ऐसे निष्कलंक ईश्वरीय अंश जैसे बच्चे को कोई कैसे फेंक सकता है? साली वो मेरी माँ थी या डाकन, ब्लडी बास्टर्ड! समूची दुनिया के प्रति कड़ुवाहट से भर गई थी वह। उफनते, दुख, विवशता, बेचैनी, छटपटाहट और आक्रोश के चलते उसके चेहरे की खाल काँपने लगी थी। दिल में उतरी माँ दिल से उतर गई थी। कुछ देर वह अपने से ही लड़ती रही।

उसके उफनते दुख को सम पर लाने के लिए मैने उसे गरम गरम भुट्टा खरीद कर दिया कि उसके आवेग को कुछ विराम मिले। कुछ दाने टूँगे उसने और फिर चालू हो गई जैसे समय कम हो और बातें बहुत ज्यादा हों। - मुझे लगता है कि जो मुझे बताया गया है वह झूठ है। मैं क्या करूँ आंटी, मैं सच को कैसे जानूँ? इसीलिए मैं अपनी माँ की खोज में हूँ, वही मुझे बता सकती है कि सच क्या है? कौन हूँ मैं? किस पेड़ की डाल हूँ मैं?' एक भयभीत बच्चे की सी कातरता झलक आई उसके चेहरे पर। भावावेग में उसने मेरे हाथों को जकड़ लिया था।

उसके गाढ़े होते दुख पर पानी के छींटे मारते हुए कहा मैने - कुछ सवालों के जवाब जिंदगी ताउम्र नहीं देती है। और कितना भी सँभल कर चलो, जिंदगी में कुछ न कुछ छूट ही जाता है। तुमसे माँ छुटी, किसी से प्रेमी, किसी से पुत्र तो किसी से पति तक छूट जाते हैं इसलिए गंगा कहाँ से निकली इसका हिसाब लगाने की बजाय जीवन की गंगा में बहो क्योंकि यह प्रवाह ही सच है। खून के रिश्ते से भी बड़ा होता है एक और रिश्ता - एक ही धरती और योनि में जन्म लेने का रिश्ता। इसलिए अपनी माँ को माफ कर दो, उनकी विवशता को हो सके तो समझने का प्रयास करो। माँ बुरी नहीं होती, बुरी होती हैं खंडित नैतिकता और मर्यादा के चाबुक। इस अमानवीय और क्रूर समय का यह साइड एफेक्ट है जिसने माँ के भीतर बसी माँ को ही कुचल डाला है।

वही मेरा अंतिम संवाद था। नहीं जानती कि मैंने ठीक किया या जो कुछ भी हरा-भरा बचा था उसके भीतर उसकी भी हत्या कर दी थी। पर मैंने यह जरूर चेष्टा की कि अपनी जीवन यात्रा में माँ से संबंधित जितने भी प्रेरक प्रसंग मैंने जाने सुने थे, सब धरती पर गिरे फूल की तरह उठा उठा कर धर दिए उसके आगे जिससे अपनी माँ को लेकर जो अतिशय भावुकता, आक्रोश, या कटुता है उसके भीतर वह रिस जाए।

बाल आनंद में बच्चों के बीच वह फिर वह हो गई थी - एकदम सहज, सामान्य और जिंदादिल। कुछ देर पहले की आकुलता और आवेग सिरे से गायब थे। जिस प्रकार हरेक बच्चे की समस्या को वह नोट कर रही थी और जिस प्रकार वह उनके दुख-सुख के साथ समरस हो रही थी। उनके चेहरे पर एक मुस्कान लाने भर के लिए कभी मुँह बनाती, कभी गाना गाती तो कभी जदूगर के झोले की तरह जाने क्या क्या कमाल की चीजों से उनका दिल बहलाती कि लगा जैसे माँ को खोजते खोजते वह खुद भी माँ ही बन गई है।

उसके बाद न वह आई, न ही उसका फोन। घर गृहस्थी के गोरखधंधे में फँसी मैं भी उसे फोन तक नहीं कर पाई। लेकिन बीच बीच में उड़ते बादलों सा उसका ख्याल आता जाता रहता। कई बार अपराधबोध भी होता कि कहीं मैंने उसकी मासूम खोज पर प्रश्नचिह्न लगाकर कुछ गलत तो नहीं किया? कौन जाने उसकी माँ मिल ही जाए?

***

पूरे सवा आठ महीने बाद मिला उसका ई-मेल। जिसका अनुवाद इस प्रकार है।

सॉरी आंटी, मुंबई से जाते वक्त न आपसे मिल पाई और न ही फोन कर पाई, दरअसल मैं एक ऐसे हादसे से गुजरी की आज तक सँभल नहीं पाई हूँ। आज भी आपको लिख रही हूँ तो इसलिए कि आप और सिर्फ आप ही कर सकती हैं मुझे मदद। दरअसल आंटी जाने क्यों मुझे लगा कि आप नहीं चाहती हैं कि मैं अपनी माँ को खोजने में वक्त जाया करूँ, इसलिए आपको बिना बताए ही मैं फिर नागपुर चली गई थी। छह महीने वहाँ के अनाथालय में रही। वहाँ की म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन और एन.जी.ओ. से संपर्क किया। उनकी मदद से मेरी खोज को जैसे पंख लग गए। मेरे जन्म की घटना कॉर्पोरेशन के ऑफिस में दर्ज थी। २५ साल के पुराने रिकॉर्ड के सहारे हम एक ठीक ठाक फ्लैट के बाहर खड़े थे। नेम प्लेट में दो नाम टँगे थे उनमें एक नाम था 'सूर्यबाला'। नाम पढ़ते ही मेरे दिल की धड़कन जैसे रुक गई। आँखों पर सहसा विश्वास नहीं हुआ। मेरी साथ की महिला मुझे सँभालती रही। हमने कॉल बेल बजाई। एक अधेड़ महिला ने दरवाजा खोला। मेरी साथ की महिला ने पूछा - आपका नाम। सूर्यबाला। कुछ बात करनी है, समय है? हो बोला, काय झाल (जी कहिए, क्या बात है)। आपके कितने बच्चे हैं? एक बेटा आहे',कितने साल का?, 'बीस साल का'। तब मेरी साथ की महिला ने पूछा उससे, 'आज से पच्चीस साल पूर्व आपकी नॉलेज में क्या किसी बच्ची को बास्केट में डालकर 'जनता हॉस्पिटल' के चाइल्ड केअर के पीछे फेंका गया था। आप क्यों पूछ रही हैं? उन्होने मेरी तरफ उँगली दिखाते हुए कहा 'ये ही वो बच्ची थी... आंटी ठीक उसी समय मेरे भीतर जोरों से कुछ धड़का, ठीक उसी समय मेरी आँखें उससे मिली। मैने देखा उसकी काया में कंपन हुआ था। कमजोर जड़ों वाले पेड़ की तरह वह काँपी। उसकी आँखों में कुछ जला। शायद पच्चीस साल पुराने बदनाम अतीत की यादों का धुआँ... दो मिनट वह काँपती सी खड़ी रही। मेरे भीतर बाँसुरी बजने लगी। मुझे लगा मेरी खोज पूरी हुई। अब लहर की तरह वह आगे बढ़ेगी और मुझे गले लगा लेगी। लेकिन वह तो चिकनी मछली की तरह मेरे हाथों से एकदम से फिसल गई।

मुझे कुछ क्षणों तक अपलक देखती रही वह। उफ उसका वह देखना! जैसे अभी अभी उगी थी वे आँखें! उसका सौम्य चेहरा धीरे धीरे उदास, धुँधला और फिर स्याह हुआ। उसकी आँखों में कुछ उगा, शायद डर। उसकी आँखों से कुछ बहा - शायद जल। उसकी सुतवाँ नाक की झिलमिलाती लौंग को देखते हुए मैं दो कदम आगे बढ़ने को हुई कि अपना दरवाजा थोड़ी तेजी से बंद करते हुए मुंडकी हिलाते हुए भाँय भाँय शब्दों में बड़बड़ाते हुए कहने लगी वह, 'मला घाई आहे, खूब काम बाकी आहे' (मुझे देरी हो रही है, काम पड़ा हुआ है)। मैने दुबारा घंटी बजाई, तिबारा बजाई, वह मुझे आई ग्लास से देखती रही लेकिन उसने दरवाजा दुबारा नहीं खोला तो नहीं ही खोला। ऊफ आंटी उन क्षणों मेरे भीतर सब कुछ मर गया। मैं मुर्दा हो गई, हवाएँ रुक गईं। सारे रास्ते मैं बच्ची की तरह रोती रही। दूसरे दिन दोपहर के सर्पीले सन्नाटे में मैं फिर गई उसी घर में अकेले, यह सोचकर कि शायद अकेले में वह सच बता दे... मैने घंटी बजाई, मैने देखा आई ग्लास में फिर काली आँख उभरी और दो मिनट बाद घर की महरी ने आकर कहा कि सब कोई दिल्ली चले गए है। मैं कुछ पूछती उसके पहले ही उसने दरवाजा मेरे मुँह पर ही बंद कर दिया।

अपनी घायल आत्मा के साथ मैं लौट आई हूँ आंटी, पर यह सोच मेर जीना हराम कर देता हैं कि यदि वह मेरी माँ नहीं थी तो वह इतनी घबड़ाई क्यों? उसकी काया में कंपन क्यों हुआ? उसके चेहरे का रंग क्यों उड़ा? सूअर की तरह क्यों बिलबिलाई उसकी ममता? समझ गई मैं उसकी बेटी नहीं उसकी लज्जा थी। समझ गई महान संस्कृति वाले आपके उजले देश की मैं एक लाड़ली पुत्री नहीं वरन एक छिः हूँ जिससे सब बचना चाहते हैं।

नहीं जानती कि आपको यह सब क्यों लिख रही हूँ। काश! मैं उससे नहीं मिली होती, लेकिन आज मैं उसे न निगल पा रही हूँ और न ही उगल ही पा रही हूँ। अधपचे अन्न की तरह वह मेरे भीतर हरपल खदबदाती रहती है। एक उम्मीद ने अभी भी दम नहीं तोड़ा है। यदि संभव हो तो मेरे दिए ठिकाने पर आप एक बार फिर मिले उस महिला से, शायद आप उससे कुछ निकलवा सकें। उसके जीवन के भेदों तक पहुँच पाएँ। आपको विश्वास दिलाती हूँ आंटी कि मैं बस सत्य जानना चाहती हूँ, एक बार मुझे पता चल जाए कि वह मेरी माँ थी या नहीं, फिर मैं अपनी खोज पर विराम लगा दूँगी। मैं पुत्री होने का कोई दावा नहीं करूँगी, मिलूँगी भी नहीं। मैं जान गई हूँ कि भारतीय स्त्री भूख और मौत से भी ज्यादा अपनी इज्जत खोने के डर से डरती है। आप उस महिला को बस इतना मेरी तरफ से कह दें। - आपकी प्रणीता

ताजे खून की तरह टप टप टपकती पीड़ा से भरा उसका ई-मेल! फिर पेशोपेश में डाल दिया है प्रणीता ने मुझे। क्या मेरे जाने भर से आ जाएगा सत्‍य सामने? कौन जाने यह महज प्रणीता का भ्रम हो? यदि मान भी लूँ कि उसका शक सही है तो भी मर्यादा की घेराबंदी में कील दी गई सूर्यबाला के पास क्या इतना खुला आसमान होगा कि वह बाहर निकल सीने से लगा ले अपनी नन्हीं गौरया को?

मैं उसे लिखना चाहती हूँ कि जीवन में कुछ खाली जगह ऐसी होती हैं जो कभी नहीं भरी जातीं। पर मैं ऐसा नहीं लिख पाती हूँ और दिमाग को खुला छोड़ देती हूँ।


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हिंदी समय में मधु कांकरिया की रचनाएँ