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कहानी

काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस
सत्यनारायण पटेल


ग्लोबल गाँव के उन प्रेमी-युगलों को समर्पित है, जो भ्रष्ट और हत्यारी व्यवस्था के जातीय शुद्धतावादियों और धार्मिक इब्लीसों द्वारा मारे गए, और अभी मारे जाना बाकी हैं।

एक

- आप कौन होते हो; धर्म के नियम-कानून पर बात करने वाले...? धर्म में जो कुछ होता है, पवित्र पुस्तक की रोशनी में होता है। पवित्र पुस्तक का एक-एक लफ्ज... खुदा का लफ्ज है। उसकी आलोचना करने का अधिकार किसी को नहीं है। खुदा के कानून पर कोई बात नहीं हो सकती... उस पर सिर्फ अमल ही किया जा सकता है… अमल ही फर्ज है।

प्रोफेसर हमजा कुरैशी ने फिल्म स्टोनिंग... देखने के बाद यह बात कही थी। जब वे अपने श्रीमुख से बोल रहे थे, तब उनके साथी डॉक्टर अब्दुल्लाह, यूनुस आदि सहमति में गर्दन हिला रहे थे। उस वक्त हॉल में प्रकृति, फोटोग्राफर आर्य कालरा, बेताल और कई दर्शक बैठे थे। सभी के सभी प्रोफेसर के क्लीन सेव श्रीमुख की तरफ स्तब्ध और चकित भाव से देखने लगे थे।

प्रोफेसर की बात थी ही कुछ अटपटी और असहमति के काँटों के ताज से सजी, इसलिए बिजूका के जहन में मसीह की बकरी के सींग की तरह नुकीला और खुरदरा प्रश्न उग आया - क्यों नहीं हो सकती बात…? जब ब्रह्मांड में प्रकट-अप्रकट हर चीज पर की जा सकती बात… तो फिर कोई फिल्म, किताब बाइबिल, गुरुग्रंथ साहिब, गीता, रामायण या फिर हो तथाकथित पवित्र पुस्तक ...उस पर क्यों नहीं की जा सकती बात...? जिस पर बात न हो... फिर उसका जीवन में दखल भी क्यों हो...?

बिजूका के जहन में तो और भी बहुत कुछ आया। पर वहाँ मौजूद सभी की तरह सुनता रहा। वह उस चर्चा गोष्ठी का संचालक था, इसलिए बहरहाल उसका काम था - चर्चा को भटकने-बिखरने से बचाते हुए आगे बढ़ाना।

प्रोफेसर सख्त और दो टूक बात कहने के आदी तो थे ही, पर कभी-कभी उनकी लच्छी की तरह लंबी और उलझी-उलझी बात करने के हुनर में भी माहिर थे। यूँ तो उनमें कई अच्छी और भली आदतें थीं जैसे - पाँचों वक्त के नमाजी। बात और समय के पक्के। अनुशासित इतने कि मय्यत में भी जाना हो... तो दाढ़ी-मूँछ बनाके ही जाते। बगैर दाढ़ी-मूँछ का उनका श्रीमुख सदा ही सफाचट नजर आता। उनकी पाबंदगी को नजरअंदाज कर, घर में बेगम या फिर बेटी की क्या मजाल, कि थूक भी उलाँघती। किसी भी वजह घर से बाहर निकलना हो - साग-भाजी या दूध लाने, बुर्के के बगैर देहली से बाहर लाँघना हराम से कम न था।

जब प्रोफेसर बोलते तो श्रीमुख के भीतर से नकली दाँतों की कतार हँसती हुई और सिर के पक्के सफेद झक बालों की तरह चमकती हुई लगती। उस दिन भी जब प्रोफेसर ने अपनी बात कही... तो दाँतों की कतार श्रीमुख के भीतर सदा की तरह खड़ी थी, पर बात की चमक फीकी और अलोनी-सी लगी थी।

प्रोफेसर हमजा कुरैशी गुलजार कॉलोनी में रहते थे। हलाँकि कॉलोनी न गुलजार थी न छाँवदार। पर प्रोफेसर के घर सामने लान के किनारे-किनारे खड़ी गेंदा और गुलाब की कतारें हवा में डोलतीं, खुशबू बिखेरती सदा ही गुलजार नजर आती। प्रोफेसर चाहते तो अपने नाम के साथ गुलजार या गुलजारी जोड़ने की सोच सकते। पर उन्होंने जोड़ा था कुरैशी। कुरैश कबीला मक्का में है और वहाँ प्रोफेसर के दादा, परदादा का या खुद प्रोफेसर का भी जन्म नहीं हुआ था। यह था तो सिर्फ और सिर्फ कुरैश कबीले से बेइंतहा मुहब्बत का ही नतीजा... और मुहब्बत इसलिए कि वहाँ हजरत का जन्म हुआ था, और मान्यता है कि वहीं उन पर अल्लाह के संदेश के रूप में पवित्र पुस्तक आसमान से उतरी थी और उन्हें पैगंबर माना जाने लगा था।

लेकिन बिजूका का सोचना कुछ यूँ था - भला कोई पुस्तक आसमान से सीधी कैसे उतर सकती है...? जरूर वह हजरत के दिमाग में उपजी होगी...! जैसे शायर के दिमाग में शायरी उपजती है, ठीक वैसे ही उपजी होंगी आयतें भी। उन्हीं का संकलन पवित्र पुस्तक बना होगा। उसे यही बात तार्किक लगती, आसमान से सीधे उतरने वाला तर्क गले में फँसता।

कभी-कभी बिजूका यूँ भी सोचता - फिर भी सच क्या था या है...? हजरत से बेहतर किसे पता...? आज हजरत हों भी, और अपनी सबसे छोटी और प्रिय बेगम की सौगंध खाकर कहे भी... तो लोग मान ही लेंगे ...क्या गारंटी...? अब तो सभी के अपने-अपने सच-झूठ होते हैं।

प्रोफेसर का अपना सच था। उन्होंने सच का जो पल्लू पकड़ा था, उसके सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता था। उनका जाना-समझा सच यही था - आयतों की आकाशवाणी खुदा के श्रीमुख से हुई थीं, जिसे सिर्फ हजरत ने सुनी थीं।

प्रोफेसर पैदाइशी प्रोफेसर हमजा कुरैशी नहीं थे। जैसे छुटपन में बच्चों के नाम अजीबो-गरीब होते हैं... प्रोफेसर का भी था एक नाम। प्रोफेसर को उनके चचा सैबड़्या कहकर बुलाते... सैबड़्या इसलिए कि बचपन में उनकी नाक से रेंट बहती...। जब वे थोड़े बड़े हुए… स्कूल जाने लायक... तब उनका नाम सोचा गया। सैबड़्या के वालिद ने उसका नाम हमजा रखा। हमजा... हजरत के चचा जान का भी नाम था। सैबड़्या का नाम हमजा सभी को पसंद आया। फिर परिवार में, स्कूल में और दोस्ती में सभी उसे हमजा बुलाने लगे। जब हमजा बड़ा हो गया। प्रोफेसर हो गया। उसने असल हमजा के बारे में जाना-समझा... असल में तब अपने नाम के साथ कुरैशी जोड़ा था।

प्रोफेसर हमजा कुरैशी को फक्र था कि धर्म अरब के रेगिस्तान से शुरू हुआ; और फैलते-फैलते संसार के कोनों-कुचालों तक पहुँच गया। प्रोफेसर को पक्का भरोसा था कि अगर खुदा अपने बंदों के घरों में ऐसे ही औलादों की नेमतें भेजता रहा, तो तय है - एक दिन धरती पर सिर्फ अल्लाह और अल्लाह के रसूल (दूत) हजरत के मार्फत दिखाए मार्ग पर ईमान लाने वालों का ही राज होगा।

तब कुफ्र करने वाले काफिरों, इब्लीसों (इब्लीस= शैतानों का सरदार) के लिए धरती पर कोई जगह नहीं होगी। अल्लाह के हुक्म से इन्हें कत्ल कर दोजख (नरक) में भेज दिया जाएगा। जहाँ अल्लाह इन काफिरों और इब्लीसों की आत्मा को जहन्नुम (आग) की ओर घसीट कर ले जाएगा। अल्लाह के हुक्म और धर्म को मानने वालों को, अल्लाह जन्नत बख्शेगा। जहाँ अंगूर के बाग होंगे, जिनके नीचे दूध, शहद और शराब की नहरें बह रही होंगी। ऐश-ओ आराम के लिए एक से अधिक सुंदरियाँ और तरुण चाकर होंगे। यानी मृत्यु के बाद वे सभी काम कर सकेंगे... जो 'जीते-जी अल्लाह के डर से नहीं कर सके। मदमस्त हाथी जैसे मन की चेतना/इच्छा/लालसा में धर्म का अंकुश घोपे रखा। प्रोफेसर को अपने भरोसे पर भरोसा न करने की कोई वजह नजर न आती... और यह कोई उन एकले का भरोसा नहीं... उन जैसे धरती पर मौजूद हरेक का भरोसा था। किसी तरह की बात और संदेह की कोई गुंजाइश नहीं थी। अमल ही फर्ज था। क्योंकि जानते थे प्रोफेसर जैसे सभी - अल्लाह अत्यंत कृपाशील और दयावान है। ईमान वालों पर मेहरबानियाँ और उपहार लूटाने वाला है।

इसलिए अचरज जैसा कुछ नहीं था... जो उस दिन प्रोफेसर ने सख्त लहजे में वह बात कही थी। फिर भी अचरज हुआ बिजूका को, यह वाकई अचरज की बात थी। भूल-चूक यूँ हुई कि दरअसल प्रोफेसर को बिजूका तरक्कीपसंद मुस्लिम समझता था। जब समझ को धक्का लगा, तो अचरज होना स्वाभाविक लगा। बिजूका के जहन में यह शे'र गूँज उठा - हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन / दिल खुश रखने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है। पर उसने जाहिर नहीं किया।

हालाँकि जाहिर कर भी देता तो क्या बनता-बिगड़ता...? बिजूका ने प्रोफेसर को जैसा समझा उसकी समझ। अब कोई हिंदू को... तरक्कीपसंद हिंदू... ईसाई को… तरक्कीपसंद ईसाई और मुस्लिम को तरक्कीपसंद मुस्लिम समझता रहे... तो किसी का क्या दोष...? भई फंडा क्लीयर होना चाहिए... इनसान या तो तरक्कीपसंद है या नहीं। अगर तरक्कीपसंद इनसान है... तो फिर सिख, ईसाई, हिंदू और मुस्लिम जैसा कुछ नहीं। पर ठीक है... बिजूका जीवन में ऐसे ही सीखता-समझता चल रहा था।

प्रोफेसर उर्दू और अरबी के प्रोफेसर थे। उन्होंने लंबे समय तक सउदी अरब के एक कॉलेज में सेवाएँ दीं थीं। उनका कॉलेज सख्त अनुशासन और तालीम के मामले में बहुत ही प्रतिष्ठित था। एक बार तो उनके कॉलेज ने अंतरराष्ट्रीय गौरव भी हासिल किया था।

हुआ यूँ था कि उनकी एक छात्रा फातिमा से उनके एक छात्र बाबर ने इश्क फरमाने का इजहार किया। फातिमा ने इनकार करते हुए कहा - वह इंगेज है।

बाबर जो कि मन ही मन फातिमा को अपनी शरीके-हयात जैसी समझने लगा था, इनकार बर्दाश्त न कर सका, और खास तो उसे यह चुभा कि वह निकाह से पहले किसी से इंगेज है। अचानक उसे निकाह संबंधी तमाम नियम-कायदे याद हो आए। बाबर ने प्रोफेसर कुरैशी से भी ऐसे संबंधों के बारे में रोशनी अता करने की गुजारिश की। फ्रोफेसर ने कुछ मार्गदर्शन दिया। मसले की धर्म के मुताबिक व्याख्या की। बाबर को फातिमा जिना करने की शौकीन नजर आने लगी। एक दिन कॉलेज गेट पर ही बाबर ने फातिमा को रोका। फातिमा ने नीले रंग का बुर्का उठाया। एक क्षण को बाबर को उस दिन भी फातिमा की मछली की-सी आँखें और चाँद-सा चेहरा आकर्षक लगे। भीतर से उसे चूमने को एक लहर-सी उठी। लेकिन फिर प्रोफेसर की बातें कान में गूँज उठी - निकाह से पहले जिस्मानी संबंध जिना है।

बाबर के भीतर धर्म और संस्कृति के रक्षक ने सिर उठाया। वह आगे बढ़ा और फातिमा की मछली की-सी आँखों और चेहरे को तेजाब से नहला दिया। एक-दो दिन अखबारों में छपा। फिर सब शांत हो गया। क्योंकि बाबर ने जो कुछ किया था, वह किसी की नजर में धर्म और धार्मिक नियम-कायदों के खिलाफ नहीं था। बाबर बाद में भी प्रोफेसर के प्रिय शार्गिदों में रहा था।

प्रोफेसर ने सेवानिवृत्ति की उम्र तक उस कॉलेज में पढ़ाया। फिर वे अपनी बेगम और बच्चों के साथ अपने वतन, अपने शहर लौट आए। आखिर यहाँ भी तो एक बेगम और कुछ बच्चे थे, जिन्हें प्रोफेसर की खूब याद आती थी।

तब से प्रोफेसर शहर में ही धर्म और संस्कृति का काम करने में समर्पित भाव से रमने लगे थे। शहर में प्रोफेसर के अतीत के बारे में किसी को कुछ ढंग-ढोरे का पता न था। यह कइयों को पता था कि प्रोफेसर सऊदी अरब में बड़े नामी प्रोफेसर थे। वहाँ सबकुछ जमा जमाया था, पर अपने वतन, अपनी मिट्टी की चाह वापस यहीं खींच लाई।

प्रोफेसर शहर में होने वाली तमाम गतिविधियों में शिरकत करने लगे। अमूमन कम ही बोलते-बतियाते। गाढ़े और अबूझ रहस्य का जाल उनके इर्द-गिर्द हमेशा ही छाया रहता। फिर भी दुआ-सलाम और जरूरी हस्तक्षेप तो किया ही करते। शहर में इसी से कायम हुई थी उनकी तरक्कीपसंद मुस्लिम की छवि। छवि तो छवि है... छवि का क्या...? छवि और असल में थोड़ा फर्क तो होता ही है... जैसे छवि और छल में एक मात्रा और एक अक्षर का फर्क होता है। बिजूका भी उसी छवि से वाकिफ था जिससे बाकी शहर।

प्रोफेसर और बिजूका की मुलाकाते अक्सर शहर में होने वाले तमाम जलसों में ही हुआ करती। जब भी मुलाकात होती। अच्छे-से दुआ-सलाम होती। हाथ मिलाते। मुस्कुराकर खैरियत पूछते। यूँ ही मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा। अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ बात हो... या देश की सत्ता की हरकतों पर बात हो। प्रोफेसर बहुत ही तरक्कीपसंद नजरिये से संक्षिप्त में बात रखते। उनकी बातें चमत्कृत भी करती।

बिजूका को लगता - प्रोफेसर को फिल्म क्लब की गतिविधियों में भी बुलाना चाहिए। बुलाने भी लगा। फिल्म क्लब में दिखाई गई फिल्म विकास बंदूक की नाल से, गाड़ी लोहार दगा मेल, रैली आॉफ डैथ, सागर तट के सौदागर, मोटर साइकिल डायरी, चे पार्ट 1, 2, 3,लाइफ इस ब्यूटीफुल, नो मेन्स लैंड, टिनड्रम जैसी कई फिल्मों पर प्रोफेसर के विचार बहुत साफ-सुलझे और देश-विदेश की राजनीतिक दुर्दशा को समझने में सहायक होते। बिजूका और प्रोफेसर में कुछ और वैचारिक नजदीकी बढ़ी। अब प्रोफेसर फिल्म क्लब की लगभग हर गतिविधि में शरीक होने लगे थे।

बिजूका उम्र में प्रोफेसर से करीब पंद्रह-बीस बरस छोटा था। जब कोई 'बिजूका' पहली बार सुनता। अजीबो-गरीब लगता। था भी...। भई किसी इनसान का नाम बिजूका... पहले किसी ने सुना हो... याद नहीं आता। किसी भी व्यक्ति को 'बिजूका' बोलते-सुनते ही जो याद आता - वह बिजूका यानी काग भगोड़ा ही होता। थी उसकी भी कुछ ऐसी ही शक्ल-सूरत। अगर उसका नाम बिजूका न होता... और गुलाब सिंह, गुलाब खान, या फिर मनमोहन होता... तब भी शायद उसकी शक्ल काग भगोड़ा की ही याद दिलाती। उसकी शक्ल-सूरत अपने नाम के एकदम अनुरूप थी। तरबूज की तरह बड़ा-सा सिर। अधटकले सिर पर... बचे-खुचे खिचड़ी और घुंघराले बाल। किसी नीग्रो के मोटे-मोटे होंठों की तरह होंठ, नीचे का होंठ तो अपने वजन से नीचे लटकता रहता। ऊपरी होंठ को दो दाँत अपनी पीठ पर सँभाले होते। ऊपरी होठ पर पतली-सी मूँछ कॉमरेड भगत सिंह स्टाइल की। लंबी नाक... भरे-भरे गाल। किसी बंदर की आँखों की तरह आँखें। गर्दन सुराही की तरह लंबी-पतली। कंकाल के-से सीने के नीचे मटके-सा झूलता पेट। पूरा का पूरा बिजूका। जब कभी अपने नाम और काम के बारे में वह सोचता। लगता - दादाजी ने उसका नाम कितना परफेक्ट रखा। बिजूका के अलावा उसका नाम... कुछ और हो ही नहीं सकता।

वह एक छोटी-सी नौकरी भी करता, जो परिवार का पेट पालने का एकमात्र चारा थी। पर असल काम जो वह करता... वह तो फिल्म क्लब के मार्फत किसी न किसी मुद्दे पर विमर्श के लिए लोगों को एक जगह इकट्ठा करने का ही था। इस काम से उसकी थाली में रोटी नहीं, बेचैनी के कटोरे में संतोष मिलता। संतोष से पेट नहीं, मन भरता। बिजूका के पेट को कम, मस्तिष्क को ज्यादा खुराक की जरूरत होती। मस्तिष्क की खुराक की पूर्ति की चाह... उसे अक्सर खुद के पेट पर लात मारने को उकसाती। पर कभी लात मार न सका।

बिजूका था तो एक किसान का बेटा, पर अब किसान नहीं था। फिर भी यह तो जानता ही था कि खेत में खड़ा बिजूका फसल को पक्षियों से, सूअरों से, मवेशियों से और चोरों से नहीं बचा सकता। वह एक चिड़िया... एक कव्वे को भी फसल चुगने से नहीं रोक सकता। रोकना या भगाना तो दूर... कोई कव्वा खोपड़ी पर भी आकर बैठ जाए... काँव...काँव... करने लगे... और अपनी काँव...काँव से आसमान में उड़ते पक्षियों को भी फसल चुगने बुला ले... तब भी जस का तस खड़ा रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकता। क्यों...? क्योंकि बिजूका लकड़ी का होता। उसका सिर इनसान की तरह नहीं..., किसी पुरानी गागर...चुड़ले, दोणी या मगर माटले का बना होता, जिसमें भेजा नहीं होता। लकड़ी पर औंधे टिके सिर में नफा-नुकसान कुछ महसूस नहीं करता। उसमें दुख की लहर उठने, क्रोध की आग भपकने जैसा कुछ नहीं होता।

फिल्म क्लब वाले बिजूका में कुछ ऐसे गुण थे, जो लकड़ी वाले में नहीं थे। वही गुण उसे कुछ अलग और खास बनाते। जैसे वह चलता-फिरता। सोचता-समझता। हस्तक्षेप करता। उसे अक्सर समाज में कई खूबसूरत शक्ल-सूरत के बिजूका भी नजर आते। वह उन्हें देखता और मन ही मन कह उठता - बिजूका।

कभी-कभी फिल्म क्लब वाले बिजूका को सपने भी आते। सपने में वह यथार्थ और काल्पना के रंग से बने अजीबो-गरीब दृश्य देखता। कभी-कभी वह सपने में ऐसी दुनिया देखता... जिसमें इस दुनिया के कोई अंश नजर नहीं आते। कभी उसे यह दुनिया अजीबो-गरीब नजर आती। वह देखता - दुनिया भर के टी.वी. चैनलों पर एक ही बिजूका... एक ही समाचार पढ़ रहा है। जिस ओर उसकी नजर जाती - न्यायालय, पुलिस, राजस्व या फिर कहीं भी, उसे बिजूका ही नजर आता। लकड़ी का बिजूका सदा की तरह खड़ा रहता। हाड़-मांस का बिजूका सवाल करता, उत्तर देता, पर उसके सारे सवाल-जवाब, जिरह, न्याय, विकास, संघर्ष खाने और हगने के लिए किए गए प्रयास ही जान पड़ते। देश-दुनिया को चरने-चुगने वाले चरते-चुगते - बिंदास।

बिजूका सोचता- खेतों में खड़े लकड़ी के बिजूका और खाते-पीते, चलते-फिरते बिजूका में एक फर्क तो है...! हाड़-मांस का बिजूका कभी भी सोचना शुरू कर सकता है। वह अपनी शक्ति भूला हुआ हनुमान है। अगर उसे जामवंत मिल गया, तो फिर सिर्फ खाने और हगने वाला नहीं रहेगा। पर जामवंत कहाँ से आएगा...? क्या आसमान से उतरेगा...? या बिजूकाओं से भरी दुनिया में से ही जन्मेगा...?

जन्म से मृत्यु तक गूँगा ही खड़ा रहने को अभिशप्त लकड़ी का बिजूका। खेत में उसका खड़ा होना... न होना, मालिक की मर्जी। जब मालिक चाहेगा, खेत से बाहर फेंक देगा। कोई प्रतिरोध नहीं करेगा... कोई चूँ-चपड़ नहीं होगी। फिल्म क्लब वाला बिजूका खुद से ही प्रश्न करता... तो क्या देश और दुनिया की संसदें धरती पर सिर्फ लकड़ी के बिजूकाओं को ही देखना चाहती है...?

वह खुद को उत्तर देता - हाँ... शायद हाँ...। नहीं... शायद नहीं। संसद वाले बिजूका शेष धरती पर बिजूका ही देखना चाहते हैं... पर हाड़-मांस के। आॉफिसों, फैक्ट्रियों, खेतों और खदानों में चुपचाप काम करते। काम के लिए जिंदा रहना जरूरी है... इसलिए खाए, हगे और काम करे। बस... !

...तो क्या मैं भी एक दिन ऐसा ही बिजूका बन कर रह जाऊँगा...? सपने में ही उसने खुद से सवाल किया... और जवाब में वह चीख उठा... नहीं... नहीं... मैं काठ का नहीं... सिर्फ खाने और हगने वाला नहीं...।

मैं जामवंत बनूँगा... और हनुमान को उसकी शक्ति याद दिलाऊँगा... नहीं... नहीं... मैं जामवंत और हनुमान दोनों बनूँगा...। हाड़-मांस के बिजूकाओं को उनकी ताकत से अवगत भी कराऊँगा और भ्रष्ट व्यवस्था की लंका में आग भी लगाऊँगा...। मैं अपनी आत्मा को बचाऊँगा...। नहीं... सिर्फ मैं नहीं... हम करोड़ों-अरबों बिजूका मिलकर सिर्फ अपनी नहीं... देश और दुनिया की आत्मा को बचाएँगे। जब वह ऐसा बड़बड़ाता, उसकी आँखों के भीतर करोड़ों-अरबों बिजूका हवा में हाथ लहराते नजर आते।

कोई पहला सपना नहीं था बिजूका की जिंदगी में यह। सपने तो वह अक्सर देखता। पर सपनों की दुनिया..., और यथार्थ की दुनिया में किसी भी तरह का तालमेल नहीं पाता, बल्कि सुरसा के मुँह से हजार गुना चौड़ी खाईं पाता।

वह कभी जामवंत... तो कभी हनुमान-सा सोचता-करता। वह लकड़ी का नहीं हाड़-मांस का सजग बिजूका था। झिकता-झाकता। टूटता-बिखरता और खड़ा होता - बिजूका।

शायद यही वजह थी कि अपने नाम के अनुरूप दिखने के बावजूद... वह उलट स्वभाव का था अपने काम के कारण। रुकना बैठना उसकी फितरत नहीं थी। हर समय कोई धुन बजती रहती उसके भीतर। धुन कोई हो... उद्देश्य सामूहिक मुक्ति होता। कई मर्तबा प्रोफेसर से शोषण के ढाँचे और सामूहिक मुक्ति की कोशिशों पर बातें होती। पर कभी सनातन, ईसाई और इस्लाम जैसे किसी धर्म के बारे में खुलकर बात नहीं हुई थी।

प्रोफेसर से दुनिया के किसी भी विषय पर बात हो। उनके श्रीमुख से बात-बात पर अल्लाह के रहम से... अल्लाह के फज्ल (कृपा) से सुनने को मिलता। दुनिया में जो कुछ भी भला-बुरा हुआ और होगा - वह अल्लाह के फज्ल से हुआ और होगा। कुछ भी होने, न होने में सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का कोई दोष नहीं, क्योंकि वह व्यवस्था भी तो अल्लाह के फज्ल से ही कायम है।

बिजूका जब प्रोफेसर के श्रीमुख से यह सुनता, उसे लगता - प्रोफेसर धर्म और ईश्वर में गहरी आस्था के पुराने मरीज हैं। लाइलाज भी। बिजूका का मन था कि कभी मौका लगा तो प्रोफेसर को इस विषय पर कुरेद कर देखेगा। हालाँकि प्रोफेसर किसी को आसानी से अपने भीतर झाँकने भी नहीं देते। खुद को उतना ही खोलते, जितनी जरूरत होती। फिर कुरेदने का मौका कैसे देते...?

बिजूका समझता था कि कोई भी धर्मावलंबी हो... वह कभी भी धर्म, ईश्वर के फेर से मुक्त हो तरक्कीपसंद इनसान में बदल सकता है। वह प्रोफेसर के बारे में भी ऐसा ही सोचता था, प्रोफेसर की छवि बदली भी... पर अफसोस... जो छवि बदली उसका रुख कुछ और था... जो बिजूका को सदमे से कम न लगा था।

वह एक अलग एहसास से भरने लगा। भीतर उसके शब्द बूँद झरने लगी - छवि फिर छवि है। छल फिर छल है। भ्रम फिर भ्रम है। धुंध फिर धुंध है। सच सिर्फ सच है - खोलता और बोलता। नंगा और चमकदार। चाकू की नोक।

दो

बिजूका और उसका काम ऐसा अजूबा नहीं था, जिसे शहर के लोग जानते न हो। वह जलसों का शहर था और उसमें एक से एक बिजूका के नमूने मौजूद थे। जलसों के शहर में दर्शकों के अनेक समूह थे, और जो कहने को भले ही दर्शक थे...। पर ईमान-धरम की बात तो यही है कि वे टिड्डी दलों से कम न थे। जहाँ जैसे तरावटी-सजावटी, चटावची का जलसा होता, वहाँ वैसा ही टिड्डी दल पहुँचता। फिल्म क्लब का दर्शक समूह खिचड़ी था। बिजूका तो काफिराना स्वभाव का था, यह बात सब जानते ही थे।

एक दिन बिजूका अपने घर में पलंग पेटी पर बैठा था। उसके जहन में कुछ चल रहा था। शायद पिछले दिनों फिल्म क्लब द्वारा दिखाई फिल्म - ओसामा के बारे में ही कुछ चल रहा था। लेकिन साथ ही साथ एक बात और थी, जो उसके जहन में चल रही थी। पलंग पेटी पर तो वह हमेशा ही बैठता, लेटता और सोता था। पर कभी उसके बारे में वैसा कुछ खयाल न आया, जैसा उस दिन आया। वह ओसामा के बारे में सोचते-सोचते अचानक पलंग पेटी के बारे में सोचने लगा, और फिर यकायक उतर कर नीचे खड़ा हो गया। पलंग पेटी को गौर से देखने लगा। उसकी पत्नी उसे इस तरह पलंग पेटी को देखते हुए देख रही थी। वह कुछ बोले बगैर, चावल से कंकर चुनती रही थी। थोड़ी देर बाद वही लगभग खुशी से बच्चे की तरह किलकता हुआ बोला - अरे सुन... देख...।

उसके चेहरे पर ऐसी खुशी थी, जैसे उसने कुछ ऐसा खोज लिया था, जिस पर वह गर्व कर सके। फिर वह अपनी पत्नी को पलंग पेटी दिखाता और उसके बारे में कुछ-कुछ बताने लगा - तेरकू... मालूम... ये पलंग पेटी ऐसी-वैसी नहीं है।

उसकी पत्नी ने साधारण ढंग से कहा - पलंग पेटी जैसी... पलंग पेटी है... और क्या...?

बिजूका जैसे किसी रहस्य पर से पर्दा उठाने की इच्छा से बोला - अरे नहीं... मेरी अनाज की भोमली...। ये पलंग पेटी... आज बनने वाली पलंग पेटियों से अलग है...।

पत्नी - हाँ... आजकल थोड़ी छोटी बनती है... ये तो बहुत बड़ी है...।

बिजूका - सिर्फ बड़ी नहीं... देख एक बाजू... श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का ज्ञान दे रहे हैं। दूसरी तरफ नानक ध्यान मग्न बैठे हैं। तीसरी तरफ मसीह भेड़-बकरी चरा रहे हैं, और उधर दीवार तरफ मक्का-मदीना का पाक स्थान, जिसमें हजरत ने तीन सौ साठ मूर्तियों को बंद कर एक अल्लाह को मानने की विवेकपूर्ण बात कही थी।

बिजूका की बातों को सुनने-समझने में उसकी पत्नी की कोई रुचि न जगी। लेकिन बिजूका पलंग पेटी और दादाजी के बारे में सोचते हुए वापस पलंग पेटी पर ही बैठ गया था।

वह पलंग पेटी कभी बिजूका के दादाजी ने ही तो रानीपुरा के एक भाईजान से बनवाई थी। उस पुरानी पलंग पेटी में नई बात क्या थी, जो बिजूका खुशी से किलक उठा था...? शायद उसके चारों तरफ धार्मिक प्रतीकों का बना होना, या फिर शायद उन प्रतीकों को देख बिजूका को यह लगना कि उसके दादाजी धार्मिक प्रवृति के थे। वे सभी धर्मों को समान आदर से देखते थे। या फिर यह जान कर किलक उठा हो कि दादाजी के बारे में यह बात उसने अपनी उम्र के पचासवें बरस में जानी। और शायद उसकी किलकती खुशी में तंज भी शामिल था !

खैर... उस पलंग पेटी का उपयोग पहले दादाजी, फिर पिताजी और अब वह कर रहा था। वह उन्हीं की तरह पलंग पेटी पर सोता तो सही, पर उसमें अनाज की बजाए किताबें भर कर रखता था।

पलंग पेटी लगभग साढ़े छः फिट लंबी और इतनी ही चौड़ी थी। पेटी लोहे की और फालका लकड़ी का था। बिजूका के घर के दोनों कमरों की दीवारों पर एक-एक अलमारी टँगी थी। बाहर वाले कमरे की अलमारी में बेटे-बेटी के स्कूल की किताब-कापियाँ रखी जाती। भीतर वाली अलमारी में उसकी किताबें रखी होती। फिर भी बिजूका के पास किताबें इतनी थी कि पलंग पेटी के भीतर और ऊपर भी लगभग दो-ढाई फिट लंबी-चौड़ी जगह पर किताबें ही थीं।

चूँकि पलंग पेटी बिजूका के दादाजी ने बनवाई थी... तो उन्हीं के हिसाब से बनवाई थी। वे अच्छी लंबी-चौड़ी कद-काठी के थे... उन्हें अकेले को सोने में साधारण कद-काठी वाले दो लोगों के सोने जितनी जगह की जरूरत होती... और फिर दादी को भी तो पलंग पेटी पर सोना होता।

लेकिन बिजूका पलंग पेटी पर अकेला ही सोता..., क्योंकि किताबों के अलावा जितनी जगह खाली बचती, उस पर बिजूका की कद-काठी के तो दो लोग सो सकते थे... पर वह अपनी पत्नी के साथ नहीं सो सकता था। उसकी पत्नी को बड़े आॉपरेशन के पश्चात बादी ने पकड़ लिया था, इसलिए उसकी देह फैलकर अनाज भरने की भोमली-सी हो गई थी। वह हँसी-मजाक में पत्नी को भोमली ही कहा भी करता था। हालाँकि उसकी पत्नी का नाम कोमल था। बिजूका के काम में वह मन से सहयोगी थी। तन से उसके लिए संभव नहीं था।

बिजूका भी पलंग पर सोता तो क्या... करवटें बदला करता...! क्योंकि बिजूका और नींद में जाने कितने जन्मों का बैर था। उसे अक्सर करवटें बदलते हुए रात को सुबह की ओर धकानी पड़ती। कभी-कभी वह इतनी करवटें बदलता कि भीतर किताबों में सोए पात्रों की नींद उचट जाती। कभी बगल में रखी किताबें फिसल कर छाती पर आ गिरती, पन्नों के बीच से कोई बुदबुदाता - चैन नहीं पड़ रही क्या...?

लेकिन बहरहाल वह सो नहीं रहा था, उस पलंग पेटी पर बैठा था। वह वापस फिल्म 'ओसामा' के बारे में सोचने लगा था। दरअसल ओसामा का शो इतना हिट हुआ था कि दर्शक भूल ही नहीं रहे थे उसे। कोई फिल्म की सी.डी. माँग रहा था, तो कोई अपनी कॉलोनी में शो रखने का अनुरोध कर रहा था। प्रोफेसर हमजा कुरैशी यह फिल्म देखना चूक गए थे, अखबार में खबर पढ़ी... तो उन्होंने भी भी देखने की इच्छा जाहिर की थी। ओसामा के शो के बाद यूँ तो बहुत-सी बातें हुईं थीं, पर दो वाकए ऐसे हुए थे, जिन्हें बिजूका कभी भूल नहीं सकता।

पहला वाकया उसी दिन घटा, जब वह पलंग पेटी पर बैठ ओसामा के दूसरे शो के बारे में सोच रहा था। लेकिन दरवाजे पर हुई खट-खट सुन उसकी तंद्रा टूट गई। वह दरवाजे की तरफ देख दंग रह गया। क्योंकि दरवाजे के बीचोंबीच प्रकृति खड़ी थी। प्रकृति ने ओसामा के शो के दौरान बिजूका से उसका फोन नंबर और घर का पता पूछा था, पर उसे क्या मालूम था कि वह एक सुबह यूँ आ धमकेगी...? वह पलंग पेटी पर से उठता हुआ बोला - अरे आप... आओ ...आओ...।

दुआ-सलाम के बाद वह बोली - मुझे फिल्म क्लब से जुड़ना है, क्या करना होगा...?

बिजूका ने इशारे से उसे पलंग पेटी पर बैठने का कहा और कुछ देर देखता ही रह गया था। प्रकृति थी भी देखने लायक। वह बाहर से जितनी आकर्षक दिखती थी, भीतर से उससे कई गुना खूबसूरत थी। कद-काठी और रंग से पठानी थी कि पंजाबी अंदाज लगाना कठिन था। शायद वह पठानी और पंजाबी के प्रेम का नतीजा थी। उसके दूधिया गुलाबी गाल बेहद चिकने और नाक की ठुड्डी हल्की लाल गुलाबी थी। प्रकृति जैसी थी उसका नाम प्रकृति के सिवा कुछ और नहीं हो सकता था। साधारण-सी दिखने वाली असाधारण थी वह। उसे कोई पहली बार देखता तो थोड़ी देर खुद को भूल ही जाता। हालाँकि बिजूका पहली बार नहीं देख रहा था। इसलिए उसने जल्दी ही चाय और पानी का पूछा था।

जब प्रकृति बिजूका के घर में दाखिल हुई। बच्चे बाहर वाले कमरे में अभी-अभी ही स्कूल बैग खोल कर बैठे थे। वह स्कूल की छुट्टी का दिन था और वे होमवर्क निपटा रहे थे। उन्होंने अपनी जगह से ही एक बार प्रकृति की तरफ देखा था और फिर होमवर्क में जुट गए थे।

कोमल चावल से कंकर चुनने के बाद, बच्चे की उधड़ी स्कूल यूनिफार्म को सुई-धागे से सील रही थी। उसने हाथ का काम एक बाजू रखा और किचन में जाकर पानी का गिलास भर लाई। हालाँकि उसने थोड़ी झिझक के साथ प्रकृति की तरफ पानी का गिलास बढ़ाया। शायद मन में संकोच था कि मटके का पानी पिएगी कि नहीं...!

प्रकृति ने पानी पी लिया, तो कोमल की हिम्मत बढ़ गई। वह किचन में जाकर चाय बनाने लगी। प्रकृति ने पलंग पेटी पर जमी किताबों में से एक किताब उठा ली। यूँ ही पन्ने पलटते हुए बताने लगी कि ओसामा देखने के बाद क्या हुआ...?

- क्या हुआ...? बिजूका ने पूछा।

प्रकृति स्मृति में सरकती हुई बताने लगी - मैं कुछ दिन से शौकिया तौर पर उर्दू जुबान की तालीम ले रही थी। उर्दू बोलने-सुनने में मुझे गुड़ से भी मीठी महसूस होती है। उर्दू गजल और नज्में आसानी से समझ सकूँ, इसलिए भी उर्दू सीखने का मन था। लेकिन जब मैंने ओसामा देखी, तो उसमें तालिबानियों को पढ़ाने वाले बूढ़े मौलवी का हुलिया, मुझे उर्दू सिखाने वाले मास्टरजी के हुलिए से हू-ब-हू मिलता-जुलता लगा। जैसे मास्टरजी ने ही मौलवी की भूमिका की है। वैसा ही पलकों की कोरों पर सुरमा। एक-सी दाढ़ी। एक-सा उच्चारण। मैं मास्टरजी के सामने बैठी होती, तो लगता मौलवी के सामने बैठी हूँ। मुझे मास्टरजी नहीं मौलवी पढ़ा रहे हैं।

जब फिल्म वाला अय्याश मौलवी नाबालिक लड़की ओसामा से उसकी मर्जी के खिलाफ निकाह कर लाता है। उस लड़की ओसामा की जगह मैं खुद को देखती हूँ। मास्टरजी मुझे... नहीं, मास्टरजी नहीं... वही मौलवी मुझे गदागाड़ी में से उतारकर अपने बड़े-से घर में ले जाता है। घर में कई कमरे हैं। आँगन में मुर्गा-मुर्गी और चूजों के संग कुछ बच्चे खेल रहे हैं। घर के अलग-अलग कमरों में अलग-अलग औरत हैं। कोई गर्भवती। कोई बच्चों वाली। कोई बुजुर्ग हो चली। कोई चार-छः माह पहले ही ब्याही। सभी औरतों के कमरों पर बाहर से ताले लगे हैं। ताकि कोई भागे नहीं। मौलवी की मर्जी जिस औरत के साथ रात गुजारने की होती... ताला उसी कमरे का खोलता है। मुझे लगा वे मेरी ही तरह कभी न कभी लाई गई होगी। और वह घर..., जैसे घर नहीं, बच्चे पैदा करने का कारखाना था।

जब पुरानी औरतें मुझे सुहागरात... नहीं..., मुझे नहीं... ओसामा को सुहाग रात के लिए सजाती हैं... वह सब देख मेरी आत्मा काँप उठती है...। लेकिन मैं देख रही थी - मौलवी के मन में खुशी के लड्डू फूट रहे थे... वह गुनगुना रहा था... और फिर जैसा कि ज्यादातर सुहागरातों में किया जाता है... उसके साथ भी साधिकार बलात्कार किया गया था।

जब मौलवी तालों के ढेर में से ओसामा को अपने कमरे पर लगाने के लिए ताला चुनने की आजादी देता है... वह देख मेरी इच्छा होती है कि मौलवी के सिर पर बड़ा-सा ताला दे मारूँ...।

उस दिन मास्टरजी को देख मेरे मन में यही चल रहा था। तभी मास्टरजी ने कहा - जेबा (दिलकश)।

मास्टरजी ने क्यों कहा था जेबा, मुझे नहीं मालूम। मैं गुमसुम बैठी थी, जाने क्यों मुझे जेबा की बजाए जिना (व्यभिचार) सुनाई पड़ा। मुझे गुमसुम देख मास्टरजी ने शायद सोचा हो कि मुझे जेबा का अर्थ समझ में नहीं आया है। मास्टरजी ने मेरी तरफ उर्दू की मोटी-सी डिक्शनरी बढ़ाई। शायद यह सोच कि उसमें से खोजूँ लूँ...।

पर मुझे वह मोटी-सी डिक्शनरी, मोटा-सा ताला लगी। मैंने डिक्शनरी ली और मास्टरजी की नाक पर दे मारी। उसके बाद मेरी उर्दू की तालीम छूट गई थी।

मास्टरजी उस मौलवी जैसे नहीं हैं, पर मैं क्या करूँ...? मास्टरजी में वह मौलवी ही नजर आता है। वही सुरमा लगी आँखों की पलकें। वही दाढ़ी। वही पहनावा। वही उच्चारण। पूरे के पूरे मौलवी। मौलवी की तरफ देख मुझे घिन आती है। मैं सोचती हूँ कि मौलवी और मास्टरजी एक नहीं है। मुझे मास्टरजी से मुआफी माँगनी चाहिए। पर मैं नहीं जा सकी। लगता है जैसे मौलवी में मास्टरजी खो गए हैं। वे तभी तक मास्टरजी हैं, जब तक कि उन्हें मौलवी की तरह का मौका न मिले। पर मैं ख्वाब में भी ओसामा होना नहीं चाहती।

सुनाते हुए प्रकृति की आँखें चू आई थी। बिजूका को लग रहा था उसके सामने प्रकृति नहीं, ओसामा अपनी कहानी सुना रही थी।

कोमल ने चाय के कप स्टूल रख दिए थे। वह प्रकृति के सामने बैठी। फिर वह प्रकृति के चेहरे पर मँडराती भावों की बदलियों को देखती बोली - तालिबानी कहाँ नहीं हैं। हमारे तो घर से पचास कदम की दूरी पर ही उनकी शाखा लगती है। खाप पंचायतों में भी तो वही हैं। संसद भी तो एक बड़ी-सी खाप ही है। जहाँ से मनमाने निर्णय लिए जाते हैं, और उन्हें मानने के लिए हमें बाध्य किया जाता है।

कोमल बोलते हुए भीतर से भर उठी थी। उसने बात बदलते हुए चाय पीने का कहा - और अपना कप उठा उसने चाय की सीप ली। चाय ठंडी हो चुकी थी। वह फिर गरम करने चली गई थी।

प्रकृति ने आँखों की कोरों को पोंछते हुए दुबारा पूछा - मुझे फिल्म क्लब से जुड़ने के लिए क्या करना होगा...?

- कुछ नहीं... बस फिल्म देखने आती रहो। बिजूका ने कहा।

फिर प्रकृति तो फिल्म देखने आती ही। अपने साथ शबनम और दो-तीन युवतियों को भी लेकर आती। फिल्म शो के बाद होने वाली चर्चा गोष्ठी में भी बढ़-चढ़कर भाग लेती। और ऐसे-ऐसे तर्क रखती कि अच्छे-अच्छों की बोलती बंद कर देती।

दूसरा वाकया प्रकृति आई थी, उसके दूसरे दिन घटा था। हुआ कुछ यूँ कि एक रात बिजूका का एक मित्र घर आ धमका। मित्र पत्रकार था और उसका एक सोबर नाम भी था। लेकिन बिजूका उसे बेताल कहा करता था। वह जिसकी पीठ पर सवार हो जाता, उससे अपने काम की हाँ करवा कर ही उतरता। बेताल उस रात बिजूका की पीठ पर सवार हो बैठा। बिजूका की गर्दन कसकर पकड़ी और बोला - जब तक ओसामा का एक शो मेरी कॉलोनी में न करेगा... मैं तेरी पीठ पर ही जमा रहूँगा।

बिजूका के पास हाँ कहने के सिवा कोई चारा न था। बेताल एक ऐसी कॉलोनी में रहता था, जिसमें रहने वाले सभी परिवार मुस्लिम थे। खुद बेताल भी मुस्लिम ही था, पर उसमें ऐसा कोई लक्षण नहीं था, जिसे देख कोई एक बार में उसे मुस्लिम कह सके। फिर भी बिजूका ने बेताल को समझाते हुए कहा - शो की सूचना कट्टर भाई जानों को न देनी है। क्योंकि शो के बाद माहौल खराब हो सकता है।

बेताल आश्वस्त करता बोला - हालाँकि फिल्म अफगानिस्तान में युद्ध के बाद उपजे हालात पर है। वहाँ विधवाओं, बुजुर्गों और कम उम्र बच्चों पर क्या गुजरी उस पर है। उससे किसी को क्यों आपत्ति होगी...? पर फिर भी मैं उन्हीं तरक्कीपसंद जहनियत के बंदों को बुलाऊँगा। जिन्हें मैं निजी तौर पर जानता हूँ, ताकि तर्क के साथ फिल्म के बारे में दो बातें भी की जा सके।

फिल्म शो के लिए बेताल की कॉलोनी में एक मदरसा का हॉल तय कर लिया। मदरसे का मालिक बेताल का भरोसेमंद दोस्त था। मदरसा के हॉल में ओसामा का दूसरा शो शुरू हुआ। फिल्म शुरू होने तक तो वही लोग थे, जिन्हें बेताल ने बुलाया था। रात साढ़े आठ से नौ के बीच का कोई वक्त था। मदरसे के सामने खाली मैदान था। उसके बाद सड़क और फिर बड़ी-सी मस्जिद। आजू-बाजू और पीछे कॉलोनी के घर थे। आसपास का माहौल शांत था।

कुछ देर बाद मस्जिद से नमाजिये छूटे। उन्होंने मदरसे के मैदान में खड़ी गाड़ियाँ देखी। मदरसे के अंदर चलती फिल्म की आवाज सुनी... तो कुछ लोग आकर हॉल में बैठ गए। फिल्म के कुछ दृश्य देखने पर उन्होंने अपने दोस्तो को भी मैसेज कर बुला लिया। देखते ही देखते हॉल छोटा पड़ने लगा। अलग-अलग अखबार और टी.वी. चैनल वाले पत्रकार आ गए। प्रोफेसर भी आकर बैठ चुके थे।

बिजूका और बेताल पास-पास ही बैठे थे। वे ऐसी जगह बैठे थे जहाँ से फिल्म और दर्शक दोनों को देखा जा सकता था, देख भी रहे थे। दर्शकों की बढ़ती तादाद और आपसी खुसुर-फुसुर से बिजूका को चिंता हो रही थी - दर्शक कहीं कोई बखेड़ा खड़ा न कर दे। जैसे-जैसे दर्शकों में खुसुर-फुसुर बढ़ रही थी, वैसे-वैसे बिजूका के दिल में धुकधुकी बढ़ रही थी। बिजूका ने धीरे से बेताल के कान में फुसफुसाया - कुछ लोग आपस में कानाफूसी कर रहे हैं...?

बेताल ने आँखों ही आँखों में कहा - कोई बात नहीं... फिल्म ही तो देख रहे हैं... देखने दो... जब कुछ बोलेंगे... तब देखेंगे।

बिजूका आशंका से लरजते स्वर में बोला - देखना... तुम्हारे ही भरोसे है पूरा तामझाम... कहीं भाई जान लोग... रायता न बगरा दे...।

- चिंता मत करो...। बेताल ने ढाँढ़स बँधाते हुए कहा और फिर बोला - प्रोफेसर हमजा कुरैशी भी बैठे हैं... उनके सामने कौन ज्ञान बघारेगा...?

बिजूका ने प्रोफेसर की तरफ देखा। प्रोफेसर फिल्म में डूबे थे। बिजूका ने चिंता को एक तरफ सरकाने की कोशिश की, पर चिंता कोई वस्तु थोड़ी थी, जिसे दिमाग से उठा कर बाहर रख देता। चिंता तो चिता के समान होती है। जैसे-जैसे संदेही हवा लगती... लपटें बढ़ती जाती। सब कुछ राख होने पर ही शांत होती। चिंता का सबब दर्शकों की कानाफूसी और अन्य हरकतें थीं। जब तक सबब जिंदा था, चिंता कैसे रुकती...? चिंता की लपटें, चिता की लपटों को बौना करने लगी थीं। चिंता की उस घड़ी में बिजूका को प्रकृति की याद हो आई थी। प्रकृति ने ओसामा का पहला शो देखा था, और शो के बाद चर्चा में बहुत दमदारी से अपनी बात रखी थी। हालाँकि बेताल था वहाँ पर, पर प्रकृति होती, तो बात कुछ और ही होती।

बिजूका निश्चिंत रहता, ऐसा अभी माहौल न था, इसलिए वह सोचने लगा - फिल्म को लेकर क्या... क्या सवाल हो सकते हैं...? उनके जवाब क्या हो सकते हैं...?

बिजूका का फिल्में दिखाने का मकसद भी तो यही था। फिल्म क्लब का नारा ही था - देखो, समझो, सोचो और अपने हक के लिए लड़ो।

रात करीब ग्यारह के आस-पास जैसे ही फिल्म खत्म हुई। बगैर किसी भूमिका के प्रोफेसर बोलने लगे - धर्म में ऐसा कुछ नहीं है...। यह एक वाहियात फिल्म है... और आप ये सब दिखा कर क्या... क्या सिद्ध करना चाहते हैं...?

प्रोफेसर के शब्द बहुत सूखे और सख्त चकमक पत्थर की तरह आपस में रगड़ खाते और चिनगारी छोड़ते हुए थे। बिजूका और बेताल ने भौंचक हो एक-दूसरे की ओर देखा...! प्रोफेसर से यह उम्मीद न थी। बात पहले वाक्य से ही बेपटरी... आगे क्या होगा...?

बिजूका की धुकधुकी थोड़ी और बढ़ गई। प्रोफेसर की आँखों और हाव-भाव से यह समझ आ गया था कि सवाल बिजूका से था। पर बेताल को लगा कि पहले उसे बोलना चाहिए, सो वह अपनी रीढ़ और चश्मा ठीक करता बोला - प्रोफेसर साहब मैं आपसे सहमत हूँ। फिल्म धर्म के अनुरूप नहीं है। पर...

- फिर आप ये सब क्यों दिखा रहे हैं...? प्रोफेसर ने कहा - क्या मकसद है आपका...? हम तो आपको अपना

- आप पूरी बात तो सुनिए जनाब...। बेताल की पेशानी पर पसीना उभर आया। वह शब्दों को बटोरता बोला - फिल्म का विषय धर्म नहीं है। युद्ध के बाद की स्थिति पर एक कहानी है...। वहाँ आम आदमी की जिंदगी में रोजी-रोटी का संकट कैसे कुंडली मार बैठा है...? वहाँ तालिबानियों के आतंक से लोग किस हद तक भयभीत हैं, छोटे-छोटे बच्चों को तालिबानी बनाया जा रहा है। क्या यह सब ठीक हो रहा है वहाँ...?

- अब फिल्म भी आपके चश्मे से देखनी होगी...? कहते हुए प्रोफेसर के क्लीन सेव चेहरे पर नागफनी-सी उभर आई थी।

- नहीं... मेरा मतलब यह नहीं है...। बेताल लगभग घिघियाती विनम्रता से बोला था।

- देखिए... खुदा के लिए आप मुझे न समझाएँ... कि आपका मतलब क्या है... या नहीं...? प्रोफेसर दृढ़ स्वर में बोले - और आप ही कौन होते हो... जो वहाँ हो रहा है... उसे सही या गलत ठहराने वाले...? क्या अमेरिका उनके साथ ठीक कर रहा है...?

बिजूका को बेताल चित होता नजर आया। बिजूका बीच में हस्तक्षेप करता बोला - अमेरिका किसके साथ ठीक कर रहा है... क्या सद्दाम के साथ ठीक किया...? क्या गाजा पट्टी में इजराइल, फिलिस्तीन, साउथ कोरिया, क्यूबा, वियतनाम, निकारागुआ और लीबिया के साथ ठीक कर रहा है...? या फिर भारत के साथ ही क्या कुछ ठीक कर रहा है...? उससे तो पूरी दुनिया त्रस्त है... पर सवाल यह है कि उससे लड़ने का तरीका अल-कायदा या फिर तालिबानियों ने जो चुना है... क्या वह सही है...?

- तो क्या अमेरिका से लड़ना छोड़ दें... प्रोफेसर ने सवाल तालिबानियों के राकेट लांचर की तरह दागा - बुर्का पहन कर बैठ जाएँ...? उसे मजा न चखाएँ...? हि... हि... करें और ताली बजाएँ हिजड़ों की तरह...!

- अमेरिका से लड़ना है... तो क्या तालिबानियों के साथ हो जाएँ...। बेताल ने हिम्मत कर बीच में प्रतिप्रश्न किया।

- आपकी जरूरत नहीं उनको... प्रोफेसर ने भी झटकारने वाले अंदाज में तुरंत जवाब दिया - वे सक्षम है, अमेरिका के दाँत से दाँत बजाने में... और बजा रहे हैं...।

- आप लोग खामखाँ एक-दूसरे पर ताव खा रहे हैं... बिजूका ने फिर से हस्तक्षेप किया। उसके स्वर में उग्रता नहीं विनम्रता थी। वह बोला-

- जरा देखिए... अमेरिका को मजा चखाने के चक्कर में तालिबानी खुद अपनी धरती के लोगों के साथ कैसा जुल्म कर रहे हैं...। जिन विधवाओं का सहारा उनके बच्चे होते हैं... उनसे उन बच्चों को अलग कर हथियारों की ट्रेनिंग देना...। अमेरिका जैसे राक्षस के मुँह में झोंकना...! बच्चों के मन में यह मुगालता भरना कि वे धर्म और संस्कृति के रक्षक हैं... क्या जायज है प्रोफेसर साहब।

- लेकिन रिलिजियस कंट्री में अमेरिका से लड़ने वाले लड़ाके... वहीं के नहीं होंगे तो... क्या आसमान से टपकेंगे...? प्रोफेसर ने सख्त लहजे में सवाल दागा - वतन के बेटे, वतन के काम नहीं आएँगे... तो फिर कौन आएगा...?

- लेकिन तालिबान अफगानिस्तान की सैना नहीं है... बिजूका ने फिर विनम्रता से कहा - वह आतंकी संगठन है... जो अमेरिका से ही खाद-पानी लेता रहा है...। वह अमेरिका से लड़ रहा है... तो अपने लिए... देश के लिए नहीं...,। तालिबानी अगर देश की सोचते... तो वहाँ के कॉमरेड राष्ट्रपति को चौराहे पर नहीं लटकाते...।

फिर बिजूका प्रोफेसर का ध्यान दूसरी तरफ मोड़ता बोला - अच्छा... सुनिए... थोड़ी देर तालिबानियों को भूल जाइए...। हिटलर को याद करिए... वह कट्टर देश भक्त था...। उसकी प्रेमिका, या बीवी की फिक्र से हजार गुना ज्यादा... उसे मातृभूमि से प्यार था। उसने देश भक्ति के नाम पर जो कुछ किया... क्या उससे आप सहमत हैं...?

- नहीं...! प्रोफेसर ने कहा।

- हमारे देश में ही धर्म और संस्कृति के नाम पर संघ जो कुछ कर्म-कुकर्म करता है... बिजूका ने पूछा - क्या उससे आप सहमत है...?

- नहीं...!

- तो फिर प्रोफेसर साहब... बिजूका ने धीरे से पूछा - मुझे यह समझ नहीं आता... आप हिटलर से, संघ से सहमत नहीं... आप तालिबानियों का पक्ष कैसे ले सकते है...?

नहीं... नहीं बात तालिबानियों के पक्ष की नहीं है...। प्रोफेसर थोड़े नरम पड़ते हुए बोले - बात फिल्म की है।

- जनाब फिल्म तालिबानियों के खिलाफ है... धर्म के नहीं। अगर तालिबानी धर्म और संस्कृति की आड़ में गलत करते हैं... तो गलत है। बिजूका विनम्रता से ही बोल रहा था, वहाँ विनम्रता ही रक्षा कवच भी थी - फिर भी अगर फिल्म पसंद नहीं... तो खारिज कर दीजिए...।

बहरहाल अस्थायी तौर पर प्रोफेसर तो नरम पड़ गए... पर माहौल अभी भी गरम था। प्रोफेसर की बातें सुनकर जो लोग उनके पक्ष में थे... उनमें क्या पढ़े-लिखे और क्या अपढ़ सभी कट्टर एक ही भाषा बोल रहे थे...?

उन सभी में ज्यादा हुचुक-हुचुक करने वाला शख्स था यूनुस, जिसने मिशन लव जिहाद के तहत अनीता से निकाह किया था। उस निकाह में प्रोफेसर एक मजबूत गवाह बने थे और निकाह के खर्च में भी हाथ बँटाया था। हालाँकि उनका नाम आम नहीं हुआ था, बिजूका को भी बहुत बाद में यह खबर हाथ लगी थी। लेकिन निकाह की खबर उन्हीं दिनों शहर में फैल गई थी। खबर फैलते ही धर्म और संस्कृति के रक्षक दूसरे दल ने लव जिहाद के खिलाफ ताबड़तोड़ पोस्टर छपवाए और शहर की दीवारों पर चस्पा करवा दिए। लिखा था - जो हिंदू वीर मुस्लिम लड़की से शादी रचाना चाहता है। वह लड़की लेकर हमारे पास आए। हम उसकी हिंदू रिति से शादी करवाएँगे और गृहस्थी बसाने के लिए जरूरत के सामान के अलावा पाँच हजार रुपये नगद और सुरक्षा की गारंटी देंगे। शहर कुछ दिन तक गरम तवे पर बैठा रहा था। फिर धीरे-धीरे तवा और तवे पर बैठा शहर ठंडा पड़ा। शहर बड़ा था और उसमें ऐसी छोटी-मोटी बाते अक्सर हुआ करती थीं।

उस रात यूनुस फिल्म में दिखाई हरेक बात को खुदा, धर्म और संस्कृति की तौहीन के नाम पर खारिज करने लगा था। फिल्म ओसामा के निर्देशक सिद्दिक बरमक और बिजूका को कोसने लगा था। सिद्दिक बरमक साहब तो वहाँ थे नहीं, थे बिजूका और बेताल, सो जो कुछ सुनना पड़ रहा था, वह उन्हीं को सुनना पड़ रहा था।

बेताल के तरक्कीपसंद साथी... बिजूका और प्रोफेसर की बहस के दौरान खिसक लिए थे। कोई इक्का-दुक्का बचा भी था तो वह कट्टरों की भाषा में बोलने लगा था। बिजूका अपने तईं धैर्य से एक-एक की बात का जवाब देते हुए धीरे-धीरे बहस को समाप्ति की ओर ला रहा था, जैसे कोई भयानक तूफान में बाढ़ और लहरों के खिलाफ तैरते-तैरते किनारे की तरफ बढ़ रहा हो। साँस भर रही हो... डूबने का खतारा बढ़ रहा हो, फिर भी तैरने के सिवा कोई उपाय न हो। फिल्म क्लब के दूसरे साथियों ने अपना प्रोजेक्टर... स्क्रीन आदि को सँभाला। मदरसे का मालिक और बेताल ने फिल्म देखने आए दर्शकों का आभार माना और हॉल से बाहर निकल आए। उसके बाद बेताल फिल्म क्लब में फिल्म देखने तो कई बार आया... पर अपनी कॉलोनी में फिर फिल्म दिखाने का कभी न कह सका।

तीन

फिल्म क्लब में फिल्म देखना-दिखाना जारी था। कंट्रोल रूम, ब्लड एंड आॉइल आदि फिल्मों के शो हुए। प्रोफेसर नदारत रहे... क्योंकि सूचना न थी। फिर फिल्म क्लब ने करीब सात-आठ महीने बाद एक बहुत ही संवेदनशील मसला - संगसार पर उपलब्ध फिल्म स्टोनिंग... दिखाना तय किया था और बिजूका उसी की तैयारी में जुटा था। यूँ बरसात के महीने तो खत्म हो चुके थे, पर बरसात का बरसना जारी था। कभी भी बगैर इत्तिला के बरसने लगती थी, जबकि शहर मुंबई न था।

कुछ दिनों से कभी भी बरसने के भय से भयभीत काली कंबल आसमान में तनी थी। काली कंबल की वजह से सबसे ज्यादा चिंता या डर था किसी के मन में, तो वे थे प्रोफेसर हमजा कुरैशी, शहर काजी और उनके मित्र डॉ. अब्दुल्लाह अहमद अंसारी। उनकी चिंता यह नहीं थी कि उनके घर खान नदी के किनारे मिट्टी का या टट्टर के थे, जो हर बरस की तरह बह जाएँगे, तो फिर से बाँस, बल्ली टीन, टट्टर का बंदोबस्त कैसे होगा...?

उनकी चिंता का सबब चाँद था। उनकी नजरें विशाल आसमान में सिर्फ चाँद को ही खोज रही थी। चाँद दिखे तो खुशियाँ मनाएँ। ऐसा तो कभी होता नहीं, पर उस बार हो गया था। रोजे एक महीने और एक दिन के हो गए थे, और चाँद को थोबड़ा दिखाने की परवाह ही नहीं थी।

काजी साहब, प्रोफेसर और डॉक्टर की चिंता का पारावार बढ़ता ही जा रहा था। उनके बस में होता, तो वे चाँद का मुँह देखे बगैर ईद की खुशियाँ मनाने का एलान कर देते। पर यह संभव नहीं था। शंका-आशंकाएँ आसमान से बूँदों की तरह ही चू रही थी कि कहीं किसी काफिर इब्लीस ने चाँद-तारों से भरे उस आसमानी गाँव का अपहरण तो नहीं कर लिया, या फिर कहीं किसी अनजान जगह पर हिजरत (स्थानांतरण) या फिर जबरिया विस्थापित कर दिया हो !

उस दिन काजी साहब अपने घर की छत पर थे। चूँकि काजी साहब अपने को कौम के सबसे ज्यादा खैरख्वाह समझते थे, इसलिए चिंता उनकी काली टोपी के नीचे से बह रह थी। नमाज पढ़ने से माथे पर पड़ा काला निशान, चिंता की वजह से और काला हो रहा था। बार-बार घड़ी में टेम देखते और बड़बड़ाते - इतनी बजे... इस सीध में होना चाहिए...। पर जाने किस माँद में जा छुपा कमबख्त...!

काजी साहब की चिंता की, ओहदे की, उस काली कंबल को कोई फिक्र नहीं थी, बल्कि वह उनके संपूर्ण वजूद का अट्टहास उड़ाती हुई तनी थी। बेखौ़फ... पैदा करती खौफ।

बिजूका को फिल्म शो की चिंता थी, कई लोगों को रोजी-रोटी पर न जा सकने की। जिसको जो याद आया - श्रीकृष्ण, जीसस और हजरत... उसने उससे मदद की गुहार की, पर काली कंबल का ताना-बाना न उधेड़ सका कोई भी अवतारी लाल।

बिजूका सोच रहा था कि प्रोफेसर या काजी साहब इस संकट की रू-ब-रू शिकायत करे भी तो कहाँ करे...। ब्रह्मांड का मालिक हो जो भी... वह धरती पर तो कहीं दफ्तर खोल कर बैठा नहीं...! लोगों से ही सुना - वह आसमान में रहता है... अब जीते जी... कोई जाए भी... तो कैसे जाए उसके पास...? बापड़े रावण ने एक बार सपना देखा था कि धरती से आसमान तक सीढ़ी बनाएगा...। बन जाती तो आज कितनी आसानी होती। पर बगैर बनाए ही उसे जाना पड़ गया। अब तो अमेरिका के राष्ट्रपति से ही उम्मीद की जा सकती है, कि रावण के सपने को पूरा करे...! ताकि काजी साहब और प्रोफेसर जैसे धार्मिक नेता चाँद को कान पकड़ खींच लाए और इमामबाड़े के सामने खड़ा कर दे।

लेकिन अफसोस सभी बेचारों के पास, इसके सिवा कोई चारा नहीं था कि धरती पर ही उसके नाम पर बनी वैध-अवैध इमारतों में दुआ-प्रार्थना करे। करते भी थे। वह अगर होता और उसे सुननी होती... अभी तक सभी दुआएँ कुबूल हो गई होती। फिर दुआ की जरूरत ही क्यों पड़े...? जब वह अत्यंत कृपाशील और दयावान है, तो फिर उसकी दया और कृपा क्यों प्रकट नहीं होती...?

बिजूका खुद से कहता - बकवास है। झूठ है कि वह देखने वाला और जानने वाला है... होता तो वह देखता - चाँद उसके बंदों को दर्शन नहीं दे रहा। अमेरिका उसके बंदों को कहीं भी चैन से नहीं रहने दे रहा। वह विराट ब्रह्मांड का मालिक अपने बंदों की इन तकलीफों को क्यों न समझता। अगर है तो क्यों वह ईमान वालों के साथ मुनाफिक (कपट) कर रहा...? क्या वह भी कपटी है...? या फिर सयुंक्त राष्ट्र संघ और अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की तरह ताकतवर के पक्ष में मौन रहने को अभिशप्त है...?

काजी साहब भी थे तो मालवा के ही बाशिंदे। मालवी ठाट। उनकी बोली-बाणी में मालवी घुली-मिली थी। जब वे किसी चिंतन प्रक्रिया से गुजरते... तब बरबस ही कुछ बुदबुदा या बड़बड़ा उठते। उस दिन चाँद की वजह से चिंता के घटाटोप में घिरे हुए थे ही... अचानक बुदबुदाए - शिकार की टेप पे...।

अभी काजी साहब का वाक्य पूरा भी नहीं हुआ था कि उन्हें लगा - बुदबुदा नहीं रहे... बल्कि जोर से ही बोल रहे हैं। अधबीच में रुक गए। उन्हें आभास हुआ, जैसे आस-पास कोई है। उन्होंने आजू-बाजू देखा... फिल्म क्लब वाला बिजूका खड़ा नजर आया। काजी साहब थोड़ा चौंकते हुए बोले - अरे मियाँ आप...? कैसे आना हुआ...?

बिजूका का हुलिया था ही कुछ ऐसा। जो भी देखता... चौंके बगैर न रहता...? काजी साहब भी तो अंततः इनसान ही थे... भूत-प्रेत तो थे नहीं...। भूत-प्रेत तो बिजूका भी नहीं था... वह भी था संवेदना से लबरेज इनसान ही... पर लोग उसे देख अचानक थोड़ा चौंक ही उठते।

फिर काजी साहब जल्दी सामान्य हो गए। बिजूका उन्हें कई बार गोष्ठियों में बुला चुका था। उन्हें उस दिन पहुँचने का मकसद बताने लगा - जी जनाब... रविवार को एक फिल्म का शो रखा है। उसी शो का दावतनामा देने आया हूँ।

- अरे मियाँ... कौम के किसी मसले पर बात हो... तब तो ठीक... हमारा आना भी वाजिब... काजी साहब ने कहा - अब फिल्म देखने क्या आएँ...? उम्र भी कोई चीज होती है कि नहीं...?

- जनाब पिछली मर्तबा महिला विधेयक पर गोष्ठी रखी तो थी... बिजूका ने याद दिलाया - आप उन दिनों शहर में नहीं थे शायद।

- अरे हाँ... काजी साहब को याद आया - अचानक बाहर एक तकरीर में जाना पड़ गया था।

फिर काजी साहब के भाल की रेखाएँ काले निशान के पास सिकुड़ आई। सुरमा लगी पलकें थोड़ी सिकुड़ गई। काजी साहब ने धीरे से भौंहे उछालते हुए पूछा - तो इस बार क्या दिखा रहे हो...?

- जनाब एक बहुत जरूरी और संवेदनशील मसले की तरफ ध्यान खींचने वाली फिल्म का शो है।

- अच्छा... काजी साहब ने अपनी आकर्षक आँखों को एक बार फिर फैलाते हुए कहा - जरा पर्दा तो उठाओ मसले पर से... ताकि उस दिशा में कुछ सोचूँ...।

- स्टोनिंग... संगसार...। बिजूका ने कहा - धार्मिक कानून और इनसानी समझ पर कुछ सवाल खड़े करने वाली है

- मियाँ... जिसे मसला कह रहे हो... काजी साहब बोले - वह आग की भट्टी है...। और आगे बोले - पर चलो... इन्सा अल्लाह आऊँगा।

काजी साहब और बिजूका चढ़ाव से उतर नीचे हॉल में आ गए थे। पानी पीते हुए टी.वी. पर समाचार देखने-सुनने लगे कि कहीं चाँद दिखने की खबर हो। तभी बिजूका ने काजी साहब को सुझाया - चाँद को टेलीस्कोप से देखो... शायद कोई सिरा नजर आ जाए।

काजी साहब ने असमर्थता जाहिर करते हुए कहा - अपने पास कहाँ टेलीस्कोप...?

बिजूका ने कहा - जैन मंदिर वालों के पास है।

- वो अपन को देंगे...! काजी साहब ने आशंका जाहिर की...।

- माँगने पर कीमत तो न वसूलेंगे... बिजूका ने कहा और अपने मोबाइल से नंबर डायल करता बोला - जैन मंदिर के अध्यक्ष कनक जैन अपनी बलन के हैं...।

नंबर डायल के जवाब में कनक जैन के मोबाइल पर अनजान स्त्री ने मीठे स्वर में कहा - आप जिस नंबर से संपर्क करने का प्रयास कर रहे हैं... वह नंबर अभी पहुँच से बाहर है। कृप्य...।

बिजूका के मुँह से बेसाख्ता निकला - शिकार की टेम पे... टेगड़ी।

बिजूका काजी साहब से कम से कम बीस साल छोटा था। उनकी उम्र का खयाल आते ही बिजूका ने बात को अधबीच में ही रोक लिया। पर काजी साहब बात पूरी समझ ही गए थे। वे जोर से हँसे और बोले - अरे वाह मियाँ... आपने तो हमारे मुहावरे का ही प्रयोग कर लिया।

बिजूका मुस्कराते हुए बोला - क्या आपने इसका पेटेंट करा लिया है...।

काजी साहब - नहीं जनाब... पेटेंट की ठेकेदारी तो अमेरिका के पास है।

फिर दोनों जोर से हँसे। दोनों के बीच उम्र का भेद काफी कम रह गया था। फिर बिजूका को मुहावरे से अपने दादा की एक बात याद हो आई थी।

वह बोला - काजी साहब... मेरे दादा के पास शहर के खातीपुरा सुखलिया में एक खेत था। उनके पास तेंदुए से भी जबरी एक देशी टेगड़ी थी। उन दिनों फसल को जंगली सूअर चर जाते थे। अक्सर दादा टेगड़ी को लेकर खेत पर जाते... कभी ऐसा मौका भी फँस जाता... जब सूअर फसल चर रहे होते। दादा टेगड़ी को सूअर पर छू करते। टेगड़ी नीची गरदन करके इधर-उधर कुछ सूँघने लगती। दादा फिर छू करते... टेगड़ी घास के कुन्चों में... जाल्यों में कुछ सूँघती रहती। दादा को गुस्सा आता... दादा जोर से टेगड़ी को डाँटते और बड़बड़ाते - शिकार की टेम... क्या हो जाता...? देखते - टेगड़ी पिछले पैरों को चौड़ा किए... कमर से थोड़ा नीचे को झुकी। चेहरे पर जारा खिंचाव के साथ - टट्टी कर रही होती।

फिर दोनों हँसने लगे। हँसते-हँसते बिजूका की आँखों में स्मृति के काले बादल उतर आए। बादलों ने बरसना चाहा। पर बरसना तो ठीक, जरा-सा झिरप भी न सके। पुतलियाँ सूखी खणक ही बनी रही। उसकी पुतलियाँ जाने किस चीज की बनी थी... ऐसी लगती कि दस-बीस समुद्र भी उन्हें गीली न कर सकता था। कौन जाने...? कितनी हजार सदियों का सूखा पसरा था उनमें...?

फिर वह मुँह में उतर आए लार के समुद्र को थूक के घूँट की तरह गटकता बोला - मेरे पिताजी कहते थे कि उनके पिता ने अपने खेत को बचाने का खूब प्रयास किया था। लेकिन फसल नहीं... खेत चरने वाले सूअरों से पिता खेत को नहीं बचा सके थे। कहते हैं, उन्होंने जिन पर भरोसा किया... वे कभी काम नहीं आए। उन्हें भी शिकार की टेम पर टेगड़ी की ही तरह...।

काजी साहब ने ढाँढ़स वाली थपकी देते हुए कहा - मियाँ... ये सिलसिला मुसलसल जारी है, और अब तो सूअर भी बहुराष्ट्रीय हैं। जो सिर्फ खेत ही नहीं, हमारी जिंदगियाँ भी चरने लगे हैं। आपने पिछली दफा इस मसले पर गोष्ठी भी तो की थी।

बिजूका वापस विषय पर लौटता हुआ बोला - काजी साहब... जरूरत है - सूअर बाजार से लड़ने की... पर मानव समाज का एक बड़ा हिस्सा कुप्रथाओं को महिमामंडित करने में लगा है। ...और जब समाज में ऐसे मसले उभरते हैं... तो लोगों का ध्यान असल लड़ाई से भटकाता है।

- जब तक हमारे समाज में यह सब हो रहा है... हम मोहरम, ईद, गणेश चतुर्थी या नौरात्रि आदि कैसे मना सकते हैं...? अंततः यह सब भी तो एक ढोंग ही है...! ढोंग करना भी तो एक तरह की दुष्चरित्रता ही है...!

- हाँ है... लेकिन ये ऐसी दुष्चरित्रताएँ हैं, जिन्हें समाज ने स्वीकार कर लिया है। लेकिन जिना या फिर स्टोनिंग... जैसी दुष्चरित्रताओं को धर्म और समाज में स्वीकार नहीं किया है... किया भी नहीं जा सकता।

बोलते-बोलते काजी साहब चुप हो गए। चुप होने की वजह यह न थी कि कहने को कुछ न बचा था। दरअसल काजी साहब को कुछ ऐसा याद आ गया था, जिसका उस मौके पर याद आना मुनासिब न था शायद। काजी साहब ने अपनी कमीज की ऊपरी जेब में से काले काँच का गागल निकाल आँखों को ढक ली थीं। वह किस स्मृति की परछाई उतर आई थी आँखों में कि जिसे चश्मे से छुपाना पड़ गई थी...?

बिजूका ने भी कुछ भाँप तो लिया था, पर कुरेदना ठीक न समझ और कनक जैन का नंबर मिलाने लगा। घंटी बजने लगी। उधर कनक जैन ने मोबाइल रिसीव किया। बिजूका ने कनक जैन को टेलीस्कोप की जरूरत के बारे में बताया। कनक जैन ने कहा - बिल्कुल... किसी को भेज दो... मंदिर से लेने... धर्म के काम में मनाही की कोई बात नी...।

काजी साहब अपने एक बंदे को भेजने लगे। बिजूका किसी और को न्यौता देने चल पड़ा।

काजी साहब फिर से आसमान को ताकने लगे। उन्हें चाँद की बजाए चाँदनी नजर आने लगी। उस वक्त काजी चाहकर भी आउट आॉफ रिच नहीं हो सकते थे। हाँ बैटरी लो हो जाती और आॉटोमेटिक उनका स्विच आॉफ हो जाता... तो बात दूसरी थी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। हुआ सिर्फ चाँदनी की स्मृति से सामना। चाँदनी कोई गैर नहीं, काजी साहब की मरहूम बेटी थी।

अब काजी साहब को बेटी चाँदनी की आवाज भी सुनाई देने लगी थी, उसने पूछा - अब्बू चाँद दिखेगा... तो ईदी में क्या दोगे...?

काजी साहब सोचने लगे - तो क्या चाँद को चाँदनी ने छुपा रखा है...? क्या चाँदनी बेटी की रूह अभी तक भटक रही है। चाँदनी ने फिर पूछा - बोलो न अब्बू... ईदी में क्या दोगे...?

अब्बू ने खुश दिल दिखते हुए कहा - तू जो कहे चाँद...।

चाँद अपने मन की बात को तोलती और अब्बू का चेहरा पढ़ती बोली - अब्बू... ईदी में चंद्रमोहन से निकाह की इजाजत दे दो।

दरअसल वह दो साल पहले की घटना थी, जो उस दिन अचानक काजी साहब की आँखों के सामने आ रही थी। अब्बू यानी काजी साहब को काटो तो खून नहीं। चेहरा जर्द पड़ गया। काजी साहब के चेहरे का नूर गायब हो चुका था। चाँदनी ने मानो ईमामबाड़ा के सामने भीड़ में उनकी टोपी उछाल दी थी। कुछ बोलते न बनी थी।

उस दिन इधर चाँदनी का अपने मन की बात कहना हुआ और उधर दरवाजे से प्रोफेसर और डॉक्टर साहब का आना हुआ था। वे ईद की मुबारकबाद देने आए थे। लेकिन जब चाँदनी की बात सुनी, तो प्रोफेसर की आँखों में लाल डोरे उभर आए थे। डॉक्टर भी भीतर से असहज हो उठा था। प्रोफेसर ने मौके की नजाकत को समझते हुए चाँदनी से पूछा - बेटी... क्या वह हमारा धर्म कुबूल करेगा...?

चाँदनी ने थोड़ा सहमते हुए कहा - नहीं... वह तो किसी धर्म में एतबार ही नहीं करता।

- फिर ऐसे काफिर के संग तुम्हारा निकाह कैसे हो सकता है चाँदनी...? काजी साहब ने पूछा।

चाँदनी पाँच भाइयों और अम्मी-अब्बू की इकलौती लाड़ली थी। हाल ही में पोस्ट ग्रेजुएट हुई थी। चंद्र मोहन उसी के साथ पढ़ा लड़का था। दोनों में पिछले दो साल से ही प्रेम चल रहा था। अब नौबत यह आ गई थी कि चाँदनी की कोख में दो माह का अंकुर उग आया था। बताना भी जरूरी था, उसे क्या मालूम थी कि ऐसे शुभ मौके पर वह अब्बू से मन की बात कहेगी और प्रोफेसर और डॉक्टर आ धमकेंगे।

चाँदनी की बात सुन उसकी अम्मी भी हॉल में आ गई थी। उसका कलेजा जल उठा था। वह आँय-बाँय बोलती लगी चाँदनी के गाल, माथे और पीठ पर मारने। काजी साहब ने अपनी बेगम को रोका। मन ही मन कहा - शुक्र है खुदा का कि बेटे ईद मिलन को घर से बाहर गए हैं... वर्ना अभी जाने क्या हो जाता...?

उस क्षण काजी साहब को और कुछ नहीं सूझा। प्रोफेसर और डॉक्टर की तरफ ही उन्होंने उम्मीद और मदद की नजर से देखा था। वे ही मार्गदर्शक थे। डॉक्टर ने कहा - लड़की को लेकर अस्पताल चलते हैं। सब अल्लाह की मर्जी के मुताबिक ठीक हो जाएगा। किसी को कुछ पता भी न चलेगा।

प्रोफेसर साहब ने कहा - समाज में टोपी उछलने से भी बच जाएगी। वर्ना चाँदनी संगसार की हकदार है...!

काजी साहब को अपनी नाक बहुत प्यारी थी, शहर और समाज के सामने उसकी कुर्बानी का ख्याल आते ही वे रुआँसे हो उठे थे। चाँदनी जिसे उसकी मारती-पीटती अम्मी अंदर ले गई थी। उसे वापस बुलाया। उसे लेकर डॉक्टर के नर्सिंग होम पहुँचे। फिर नर्सिंग होम में क्या हुआ...?

छोड़ो इस सबको। चाँदनी को जहर का इंजेक्शन लगाया। गला घोंटा या कुछ और किया। कोई माइना नहीं इस सबका। अल्लाह के फज्ल से काजी साहब का पद, इज्जत सभी कुछ महफूज था। चाँदनी का जनाजा भी अच्छे से निकला। कफन-दफन भी ठीक-ठाक हो गया था। यही बात थी जो उस दिन बेमौके याद हो आई थी, जिससे आँखों में झिरप आए पानी को चश्मे से छुपा लिया था।

अब टेलीस्कोप आ चुका था। काजी साहब संगदिली से याद को भी परे सरका चुके थे। उनके आस-पास दो-चार उनके करीबी भी घेरा बाँधे खड़े थे...। वे फिर से चाँद को खोजने में पूरी तरह मसरूफ हो चुके थे। अल्लाह के फज्ल से चाँद भी पकड़ में आ गया था। शहर में एक-दूसरे को ईद की मुबारकबाद दी जाने लगी। मुँह में सेवईंया की मिठास घुलने लगी।

चार

फिल्म स्टोनिंग का शो ईद के तीन दिन बाद था। बिजूका पूरी तरह से प्रचार-प्रसार में ही जुटा था। फेसबुक पर स्टोनिंग का पोस्टर लगा दिया था। ब्लॉग पर फिल्म के बारे में लेख लिख चुका था। सूचना देने के जितने भी तरीके - ई-मेल, लैंड लाइन, मोबाइल और मैसेज इस्तेमाल कर रहा था।

बिजूका ने अपने पड़ोसी धार्मिक शहर के एक मित्र को रोमन में टाइप कर मैसेज किया। उधर से जवाब देवनागरी में आया - शहर में सांप्रदायिक तनाव है।

बिजूका ने पलट कर फोन लगाया और पूछा - क्या हो गया यार...?

धार्मिक शहर के मित्र ने कहा - यार... मुझे तो आजकल शहर का चरित्र ही समझ में नहीं आ रहा... कि कब क्या करेगा...?

उन दिनों देहरादून में कहीं किसी ने पवित्र किताब के पन्ने फाड़ दिए थे, या फिर फटे हुए पन्ने कहीं से उड़ कर मस्जिद के आस-पास आ गए थे। ठंडे शहर में गर्माहट भर गई थी। शायद तीन-चार लोग भी मारे गए थे। वहाँ स्थिति पर नियंत्रण था, लेकिन खबर अखबार और टी.वी. चैनलों पर अभी सुलग रही थी। बिजूका ने दोस्त से पूछा - कहीं उसी वजह से तो धार्मिक शहर में कर्फ्यू नहीं लगा है।

- अरे नहीं यार... छिनाल को यार की क्या कमी...? मित्र ने कहा - लड़ने को हमारे यहाँ ही बहानों की कमी थोड़ी... जो ठेट देहरादून में घटी घटना पर लड़ें...!

- फिर... !

- दरअसल हुआ यूँ कि कोई भाई साहब की चाय की गुमटी मस्जिद के सामने थी... मित्र ने सुनाना शुरू किया - उसने गुमटी में गणेशजी बैठाले हुए थे...।

- फिर...?

- इधर मस्जिद में नमाज होती...। उधर गणेशजी की आरती उतरती। बस... इसी को लेकर कुछ टेंशन हो गया। थोड़ी देर बाद किसी भाईजान ने एक भाई साहब को चाकू से गोद दिया... पुलिस घटना स्थल पर पहुँची... आय.जी. की गाड़ी के काँच फोड़ दिए... सुना कुछ पुलिस वाले भी घायल हुए। फिर किसी भाई साहब ने एक भाईजान को गोली भी मार दी। शहर के कुछ थाना क्षेत्रों में कर्फ्यू लगा दिया। अब देखता हूँ स्थिति सामान्य हो गई... तो जरूर आऊँगा। सहज में ऐसी फिल्म देखने को कहाँ मिलती है।

फिर वह बात को खत्म करने वाले अंदाज में बोला - सच में यार... हम तो ऐसे शहर में रहते हैं... जो आधे से ज्यादा समय तो भाँग के नशे में डूबा रहता है... राजनीतिक पार्टियाँ... प्रशासन... और कोई भी उसकी मय्यू करता रहे... कुछ नहीं बोलता है... घाणे के बैल की तरह जुता रहता है... और जब होश में हो... तब कोई महाकाल की दिशा तरफ पोंद करके पाद भी दे... तो मरने-मारने पर उतर आए...। शहर के ऐसे चरित्र से तो पिंजारबाड़ी की वेश्याओं का चरित्र अच्छा था यार...!

दोस्त की बात सुन... बिजूका के माथे पर गहरी चिंता की लकीरें उभर आई। अपने शहर में तो वैसे ही बारूद उड़ती रहती है, जरा-सी गर्माहट से ही आग फैल जाती है। कहीं शो रद्द न करना पड़े। फिल्म का विषय भी तो सुलगता हुआ है।

पाँच

बिजूका किसी संवेदनशील मसले पर पहली बार फिल्म नहीं दिखा रहा था। अभी पिछले सप्ताह ही शहर के पास के गाँव में संशोधन फिल्म का शो किया था। गाँव के सरपंच ने पूरी ईमानदारी से असहयोग किया। लेकिन वहाँ बिजूका के मित्र मीडिल स्कूल के प्राचार्य की मदद से शो सफल हो गया था।

हालाँकि फिल्म देख... सरपंच का पाव भर खून ओटा गया था। वह शो के बाद 'पंचायत' विषय पर बातचीत में भी शरीक न हुआ। शो के दौरान पूरे समय यों मुँह फुलाए बैठा था, जैसे लोग फिल्म नहीं देख रहे थे, सरपंच की तिजोरी 'मनरेगा' का ताला तोड़ने की इस्कीम सीख रहे थे।

लेकिन स्टोनिंग... का शो गाँव में नहीं, शहर में था। शो की खबर फैलने लगी... और चर्चा गर्म होने लगी। बिजूका के मोबाइल फोन की घंटी बार-बार बज उठती। कोई कहता - ठीक नहीं कर रहे हो। अभी पड़ोसी शहर में माहौल खराब है... ऐसे में क्या जरूरी है... ऐसी फिल्म दिखाना...। और फिर लोगों के घरों में टी.वी., कंप्युटर और इंटरनेट है, जब चाहे मनपसंद फिल्म देख सकते हैं...। फिर तुम क्यों दिखाते हो...?

बिजूका बहुत विनम्रता से जवाब देता - देखिए... हम कोई किताब पढ़ते हैं... तो उस किताब के पढ़ने का मजा तब तक नहीं आता... जब तक उस पर किसी से बात न करें...। फिल्म भी एक कलात्मक कृति है... उस पर बात करनी भी जरूरी है... बात करने में क्या बुराई है...? आप भी बातचीत के लिए जरूर पधारें...।

कोई आरोप मढ़ता बोलता - आप हमेशा धर्म को टॉरगेट करने वाली फिल्म ही क्यों दिखाते हो...? पिछले दिनों प्रेस क्लब में 'कंट्रोल रूम' भी दिखाई थी।

- हाँ दिखाई थी... बिजूका संयत स्वर में कहता - पर वह धर्म को टॉरगेट करने वाली फिल्म नहीं थी। वह फिल्म देखने से समझ में आता है कि अमेरिका का मुख्य उद्देश्य सद्दाम या फिर ओसामा को मारना नहीं था। पर इनको मारे बगैर तेल के व्यवसाय पर कब्जे की कल्पना नहीं की जा सकती थी। एक दशक से वहाँ युद्ध अगर जारी है... तो उसकी यह बड़ी वजह है कि तेल व्यवसाय पर अमेरिका का कब्जा पूरी तरह नहीं हो सका है। वह डॉक्यूमेंट्री, अमेरिका के झूठ पर से खूबसूरत ढंग से नकाब उतारती है। और तो और अमेरिका अल-जजीरा टी.वी. चैनल को बदनाम करता रहा कि चैनल ओसामा बिन लादेन की आवाज है। लेकिन इस फिल्म ने इस अफवाह को गलत साबित किया।

उधर से बोलने वाले ने अपना नाम नहीं बताया था। बिजूका ने उसकी आवाज से कयास लगाया कि वह प्रोफेसर का युवा साथी यूनुस हो सकता है, और नहीं भी। लेकिन बिजूका बेखटके और समझाने वाले अंदाज में बोलता रहा - दोस्त... फिल्म क्लब में और फिल्मों के भी शो हुए मसलन - अल-रिसाला, फाइनल साल्युसन, हे राम और फिराक, होटल रवांडा, अछूत भारत, अंबेडकर, परजानिया, खुदा के लिए और बोल जैसी अनेक। आप नहीं पधारे...। जब धर्म या तथाकथित धार्मिक ढोंगियों की नब्ज पर उँगली रखने वाली फिल्म का शो होता है, तभी क्यों जागते हैं आप...?

बिजूका लोगों के अतार्किक सवाल सुन-सुन कर तंग आ गया। जब अलग-अलग आवाज में बिजूका से कुछ-कुछ पूछा जाने लगा। उसने एक बार पुनः फोन कर सवाल करने वाले से नाम पूछा। पर उसने न बताया। बिजूका को लगा - कहीं एक जगह पर प्रोफेसर के बहुत-से शार्गिद बैठे हैं... और वे ही बारी-बारी से फोन कर रहे हैं। एक-दो मर्तबा वह जवाब देते-देते झुँझला उठा था। लेकिन झुँझलाना उसे अपनी कमजोरी लगी। उसने खुद से वादा किया - अब किसी का फोन आया... तो उठाऊँगा ही नहीं। उठाया तो झुँझलाऊँगा नहीं। खुद को समझाया - शायद वे यूँ ही चेक कर रहे हो कि अंततः ऐसी फिल्मों के शो के पीछे फिल्म क्लब का मकसद क्या है...? और मैं खामखाँ झुँझला रहा हूँ। जरूरी नहीं कि वे प्रोफेसर के शार्गिद यूनुस आदि ही हो...। वे भले लोग भी हो सकते हैं और बस... अपने सवालों और जिज्ञासाओं के जवाब चाहते हों।

बिजूका के जहन में फिल्म शो को लेकर कुछ-कुछ चलने लगा। पड़ोसी शहर के तनाव की आड़ में... यहाँ कोई बखेड़ा खड़ा न कर दे। वरना ये बड़ा शहर... यूँ तो बहुत बड़ा बनता है... पर इसका दिल बहुत छोटा है। जरा-सी अफवाह पेट्रोल की आग का काम कर सकती है। पेट्रोल की आग बहुत खतरनाक होती... दुनिया देख रही है... अमेरिकी सत्ता के जहन में भभकती पेट्रोल की आग... बुझने का नाम ही नहीं ले रही। हमारे यहाँ संप्रदाय की आग पेट्रोल की आग की तरह ही भभकती है।

बिजूका को महसूस हुआ कि खोपड़ी के भीतर गरम-गरम हवा चल रही है। अभी थोड़ी देर में नाक, आँख और कान से धुआँ निकलने लगेगा। लेकिन फिर उसे लगा - वह किसी अनजान और आतंकी भीड़ से घिरा है। सशस्त्र भीड़। अंधी, पागल भीड़; खुद अपनी दुश्मन भीड़। पागल, अंधी। भीड़।

छः

आखिर वह दिन आ ही गया, जिसका नाम रविवार था, जिसकी सूरत साँवली और तासीर ठंडी थी। दोपहर बारह बजे से फिल्म स्टोनिंग… का शो था। बिजूका और उसका एक साथी शो संबंधी तैयारियाँ कर रहे थे। महाराष्ट्र साहित्य सभा के हॉल में दरी बिछाने... स्क्रीन टाँगने… जैसा काम हो गया था। बस... प्रोजेक्टर से लैपटॉप जोड़ फिल्म चैक करनी थी। दर्शकों से हॉल भरने लगा था। हॉल की दीवार घड़ी में पौने बारह और बिजूका के चेहरे पर बारह बज रही थी। क्योंकि लैपपटाप लेकर आने वाला साथी रंगकर्मी अभी तक आया नहीं था, जिसे वह दो-तीन बार कॉल कर लोकेशन पूछ चुका था, फिर कॉल करने की सोच ही रहा था कि वह नजर आ गया था।

साथी रंगकर्मी ने लैपटॉप को प्रोजेक्टर से झटपट जोड़ा। स्क्रीन और लैपटाप के तालमेल में पैदा हुई अड़चन ने फिर से चिंता बढ़ा दी - कहीं कंट्रोल रूम के शो के टाइम जैसी आफत न आ जाए। उस शाम तकनीकी खराबी से पूरा एक घंटा देरी से शो शुरू हुआ था। खैर... बहरहाल रंगकर्मी की मेहनत जल्दी ही रंग लाई और बारह बीस पर स्टोनिंग... शुरू हो गई।

जब स्टोनिंग… शुरू हुई … तो फिर न किसी को प्यास लगी... और न सू...सू। न छींक...और न खाँसी। जैसे किसी ने खाली हॉल में फिल्म चला दी। बस... बीच-बीच में सीत्कार उठती... जो सन्नाटे को चीरने की बजाए और सघन महसूस कराती थी।

बिजूका स्टोनिंग पहले ही दो बार देख चुका था। अब तो वह दर्शकों के चेहरों पर उभरते हाव-भाव देख रहा था। और सोच रहा था कि चर्चा गोष्ठी में क्या-क्या तर्क-कुतर्क हो सकते हैं, उनसे कैसे निपटना है...? हालाँकि आज प्रकृति और बेताल भी मौजूद थे... तो बिजका का हौसला थोड़ा-सा बड़ा हुआ भी था।

बिजूका ने देखा - प्रकृति के आगे बैठी युवती के होंठ यों काँप रहे हैं, जैसे भीतर सीत्कार फँस गई हो। आँखों से ढुलकते गर्म रेले, जैसे आत्मा की विशाल भट्टी पर, खौलते दुख के समुद्र की भाप हो। गर्म-गर्म। धार-धार।

प्रकृति के पीछे बैठा बेताल कुछ बुदबुदा रहा था, पर उसे सुन समझ पाना टेढ़ी खीर था। उसके चेहरे के भाव और होंठ हिलने की लय से बिजूका को लग रहा था - बेताल के मुँह से जैसे दुनिया में अब तक सृजित कालजयी गालियों का झरना बह रहा है। वह किसे गालियाँ बक रहा होगा...? फिल्म में स्टोनिंग करने वाले पात्रों को...? धर्मांधता और कठमुल्लापन के चलते स्टोनिंग का आदेश देने वालों को...? मालूम नहीं।

हॉल में बैठे लगभग सभी दर्शकों को बिजूका जानता-पहचानता था, और दर्शकों के हाल कुछ यों थे- वरिष्ठ आय.पी.एस. अपनी कुर्सी से थोड़ा आगे झुके स्टोनिंग... देखते हुए पलक झपकना भूल गए थे। फोटोग्राफर आर्य कालरा ठहरे हुए पानी के-से शांत भाव से फिल्म में डूबे थे। फिल्म का एक-एक दृश्य देख कइयों का कलेजा मुँह को आ रहा था। कुछ भाईजान बार-बार एक-दूसरे के पास मुँह ले जा... जाने किस खुसुर-फुसुर में मगन...! बिजूका के मन में आशंका के घने बादल। दिल में धुकधुकी।

बिजूका एक क्षण को भी भूला नहीं था - धार्मिक नगरी में कर्फ्यू लगा है। शहर में बासी ईद का महौल है, और शहर में पसरा रेड अलर्ट भी है। शायद नियति को यह सब भी लगा होगा कम, तभी तो उन दिनों राजधानी में फूट पड़ा था बम। हवा में तैर रही थी अभी और धमाकों की धमकी। सरकार का नाड़ा ढीला। चारों तरफ थू... थू...।

स्टोनिंग... देखने और चर्चा में शामिल होने काजी साहब नहीं आए थे। वे शहर में सर्वधर्म ईद मिलन समाहरोह में गए थे। हालाँकि ईद मिलन का मैसेज बिजूका को भी आया था। बिजूका ने रिप्लाय में कह दिया था - मुझे ढोंगी होने की जरूरत महसूस नहीं हो रही है। बाद में उसने महसूस किया - जरा तल्ख हो गया मैसेज। पर तब भी जायज लगा। वह भीतर ही भीतर खुद से बोला - तल्ख ही था न... ढोंग तो न था...।

स्टोनिंग खत्म होते ही हॉल की लाइट जला दी गई। कुछ दर्शकों के चेहरों पर मातम छाया था। कुछ भाईजान अभी भी खुसुर-फुसुर में व्यस्त नजर आ रहे थे। बिजूका ने अपनी जगह बैठे-बैठे ही कहा - जो साथी बातचीत में भाग लेना चाहते हैं ...रुकें। बाकी आप सभी साथियो ने धैर्य से फिल्म देखी… इसलिए आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया...। आभार...।

फिर रुके हुए दर्शकों से मुखातिब हो वह बोला- सभी साथी दरी पर गोल घेरा बना बैठ जाएँ.... ताकि बातचीत शुरू की जा सके।

कुछ दर्शक पहले से जहाँ के तहाँ गोल घेरे में बदल गए थे। बिजूका ने नाम लेकर आग्रह किया, तो प्रोफेसर, डॉक्टर और यूनुस वगैराह… भी संकोचवश उठकर दरी पर आ गए थे। पर पहले कौन बोले...? यह संकोची संकट गोल घेरे में बना हुआ था।

बिजूका ने सामने बैठे दर्शकों की ओर देखा- उसके सामने उदासी, संकोच, आँसुओं के सूखे रेलों का कोलाज था। फिर बिजूका ने ही संकोच के सन्नाटे को तोड़ा - आज इनसान के पास सीखने के लिए आदि काल से अब तक का सामाजिक इतिहास और दर्शन मौजूद है। लेकिन इनसान एक से एक महान मूर्खताएँ कर रहा है। रामायण में कभी सीता को अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ा था। आज भी चरित्र के नाम पर स्त्री और पुरुष दोनों को बहुत कुछ अमानवीय भोगना पड़ता है...। हमने अभी फिल्म में देखा कि एक औरत को दुष्चरित्र कहकर किस तरह संगसार कर दिया गया।

बिजूका बोलते हुए जैसे अपने भीतर उतर रहा था। आवाज रुँधाती और ऊँडी जाती लग रही थी - आज जो राह इनसान को तरक्की और गुमनामी की मंजिल पर पहुँचाती है। जिससे रोजी-रोटी छीनती और मिलती है, जिससे जीडीपी का ग्राफ उछलता और गिरता है। जिसके दम पर वॉल स्ट्रीट का साँड़ डुकराता और घिघियाता है। जिस व्यवस्था में चरित्र की रक्षा करना संभव न रह गया है, उससे ज्यादा चरित्रहीन कौन हो सकता है...?

बिजूका की साँस भर गई... तो वह थोड़ा रुक गया। थूक गटकने के बाद फिर बोला - अगर स्टोनिंग ही करना है... तो फिर स्त्री पर ही क्यों…? व्यवस्था पर क्यों नहीं...?

साँस की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती बिजूका की बात सुन रहे थे सभी। उस वक्त भले ही स्क्रीन पर स्टोनिंग... समाप्त हो गई थी, लेकिन जहन में और समाज में प्रकट-अप्रकट रूप से जारी थी। स्टोनिंग करने वालों के जुनून का शोर गूँज रहा था मन के आकाश में। फिर बिजूका ने संक्षिप्त में पूछा - आज किसी भी जाति, धर्म या कानून के तहत स्त्री या पुरुष को, प्रेम या फिर 'जिना' (व्याभिचार) के एवज में 'संगसार' जैसी सजा या अन्य तरीके से मौत देना मानवीय है…? और अगर प्रेम की सजा मौत है... तो फिर मौत की क्या होगी...?

प्रोफेसर हमजा कुरैशी और डॉक्टर अब्दुल्ला अहमद ही थे, जो धार्मिक कानून और पवित्र किताब की एक-एक आयतों से वाकिफ थे। लोगों को उम्मीद भी उन्हीं से थी - मसले पर रोशनी डालने की। बाकी तो सभी अपने-अपने सवाल लेकर बैठे थे। फिर बिजूका ने प्रोफेसर की तरफ बोलने का इशारा किया।

- मैं पवित्र किताब की रोशनी में अपनी समझ के मुताबिक कुछ कहूँगा। प्रोफेसर ने खखारकर गला साफ करते हुए बोलना शुरू किया - जैसा पहले कह चुका हूँ कि खुदा के कानून पर कोई बात, तर्क-वितर्क नहीं किया जा सकता। खुदा के कानून पर कोई कानून भी लागू नहीं होता।

- क्यों...? एक साथ दो-तीन युवा रंगकर्मियों का संयुक्त स्वर गूँजा। साथ-साथ एक अलग स्वर में यह भी प्रश्न उठा - क्या संवैधानिक कानूनों से बड़े हैं धार्मिक कानून...!

- क्योंकि खुदा की हर बात को शब्दसः अमल करना ही फर्ज है।

प्रोफेसर ने थोड़ा नाखुशी से कहा। इसलिए कि प्रश्न बीच में उछाला था। वह भी युवा रंगकर्मियों द्वारा। प्रोफेसर की नाखुशी और देखने के अंदाज में यह भाव शामिल था कि पहले मुझे अपनी बात कहने दो। फिर प्रश्न करना। डॉक्टर, यूनुस और दो-तीन भाईजान ने प्रोफेसर से सहमति में गर्दन हिलाई थी। प्रोफेसर और कोई नसीहत दे... उससे पहले बिजूका ने रंगकर्मियों को शांत रहने का इशारा किया।

लेकिन प्रोफेसर की बात से ज्यादतर लोग असहमत थे। कुछ बोलने के उद्देश्य से कइयों ने हाथ खड़े किए। लेकिन डॉक्टर ने बाजी झपट ली और बात का सिरा पकड़ बोले - जनाब प्रोफेसर साहब ने वाजिब फरमाया। धर्म में जिना (व्याभिचार) को सबसे संगीन जुर्म समझा गया है, तो सजा भी संगीन ही होगी।

डॉक्टर की बात से लोगों के कान खड़े हो गए थे, फिर कागज की घड़ी खोलते हुए डॉक्टर बोले - मैं कुछ लिख लाया हूँ। फिर प्रोफेसर की तरफ देख बोले - ...इसमें कई लफ्ज हैं, जो कुछ लोगों को समझ न आएँगे... इसलिए आप हिंदी तर्जुमा करते चले।

वह पर्चा उर्दू-अरबी में लिखा था। उसे पढ़ने में नौ-दस मिनट लगे। लोगों ने धैर्य से सुनने-समझने की मशक्कत भी की। पल्ले कितना पड़ा, वे ही जाने। प्रोफेसर ने हिंदी में जिना के कई प्रकार बताए - निगाह से होने वाला जिना, स्पर्श जिना वगैराह...। संगसार जायज है आदि... आदि...

- इसका मतलब है कि... प्रकृति की बगल में बैठी शबनम थोड़ा-सा तैश और तंज मिश्रित स्वर में बोली - आज धार्मिकों पर... धर्म के नियम-कायदे ही सबसे बड़ा खतरा है।

- अब देखिए ...शबनम बोली - बस-ट्रेन में एक-दूसरे से रगड़ खाते चढ़ना-उतरना पढ़ता हैं। कुछ नीच किस्म के लोग, हमें यहाँ-वहाँ छू भी लेते हैं। फिर धर्म में तो स्पर्श को भी जिना माना गया है... तो क्या बसों-ट्रेनों में सफर न करें...?

डॉक्टर कुछ कहने को हुए... लेकिन साँस खींच कर रह गए। क्योंकि शबनम साँस लिए बगैर बोलती रही - फिल्म में औरत को जिना करते कहीं भी न दिखाया है। हाँ... उस औरत का खाविंद कार में एक अनजान औरत के साथ हँसी-ठिठोली... और वैसी हरकत करता है... जो तथाकथित धर्म में वर्जित है... उसे गाँव के लोग और हम सब ने भी अभी देखा... बात फिल्म भर की नहीं, हम यही सब समाज में देख भी तो रहे हैं...! फिर ऐसे लोगों का कुछ क्यों नहीं होता है...?

अब डॉक्टर से रहा न गया। तुनक कर थोड़े ऊँचे स्वर में बोले - देखिए... ऐसे ही किसी को संगसार नहीं किया जाता। एक पूरी प्रोसेस होती है। जिस व्यक्ति पर जिना का आरोप होता है... उसे कम से कम चार लोगों द्वारा जिना करते देखा गया हो... जिना करने वाले को खुद भी अपना अपराध कुबूल करना होता है...। जब तक पक्के सुबूत और चार गवाह न हो, किसी को संगसार नहीं किया जाता।

- फिल्म में औरत के हाथ से मैकेनिक का हाथ अनजाने में टच हुआ..., एक दूसरा युवा रंगकर्मी थोड़ा जोश में बोला - उसे सिर्फ उसके खाविंद ने देखा था... क्योंकि वह छुपकर निगरानी रख रहा था... ताकि अलग होने का बहाना खोजा जा सके। उसके खाविंद और मौलाना ने साजिश रचकर जिना का झूठा आरोप मड़ा। उनके झूठ को किसी ने क्यों नहीं परखा...?

शबनम भावुक हो उठी, लरजते स्वर में बोली - अगर ब्रह्मांड में सब कुछ पवित्र किताब की रोशनी में और खुदा की मर्जी से होता है... तो खुदा ने उस निर्दोष औरत को क्यों नहीं बचाया...? उसने तो अपना गुनाह कुबूल नहीं किया। चार गवाह भी नहीं थे...? क्या खुदा का कानून कुछ मामलों में स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग हैं…?

डॉक्टर ने कहा - नहीं... हरगिज नहीं, धर्म में औरत और मर्द को समान अधिकार है।

शबनम ने संयत स्वर में, लेकिन तीर की तरह सीधे और नुकीले अंदाज में पूछा - तो फिर औरतें मस्जिद में पुरुषों के साथ नमाज क्यों नहीं पढ़ती...? जबकि घरों में पढ़ती हैं! कौन... और क्यों रोकता है उन्हें...?

प्रकृति ने शबनम की पीठ पर स्नेह से भीगा हाथ रखा। बाकी सब भी डॉक्टर की तरफ जिज्ञासा भरी निगाह से देख रहे थे। शायद उनके मन में भी यही प्रश्न थे... पर कभी किसी से पूछे नहीं या फिर संतोषजनक उत्तर नहीं मिले थे। वे देख रहे थे कि डॉक्टर क्या जवाब देते हैं...?

लेकिन डॉक्टर, प्रोफेसर और यूनुस भीतर ही भीतर ऐसे तिलमिला उठे थे कि अगर हाथ में पत्थर होता, तो शबनम का कपाल फोड़ देते। लेकिन बहरहाल मजबूरीवश डॉक्टर ने शब्दों से काम लेना ठीक समझा। डॉक्टर को याद आया। एक बार उनकी शरीके-हयात ने भी यही प्रश्न पूछा था। हालाँकि शरीके-हयात ने बहुत धीमे से, बल्कि सहमे हुए पूछा था। तब डॉक्टर ने जो समझाया था, वही कहने का मन बना बोले - देखो... अब आपसे क्या कहूँ...। आप तो मेरी बेटी की भी बेटी की उम्र की हो। फिर भी पूछा है तो बताता हूँ... सही है, औरतों को मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ने दी जाती। क्या है कि जब इनसान खुदा की इबादत में सिर झुकाता है, तब उसका बैक यानी पुट्ठे ऊँचे हो जाते हैं। अब मान लो - कोई औरत किसी मर्द के आगे ऐसी पोजीशन में झुकी हुई है... तो मर्द के मन में मैल आ सकता है। फिर धर्म में निगाह से भी जिना होना माना गया है। इसीलिए औरतें मस्जिद में नमाज नहीं पढ़तीं या उन्हें नहीं पढ़ने दी जाती।

शबनम को बात हजम न हुई। क्षणभर को सोचती हुई कि जब कोई खुदा की इबादत में लीन होता है... तो औरतों के बैक को कैसे या क्यों देखता है...? और अगर पुरुष देखता भी है... तो औरत का क्या कसूर... जो उसे मस्जिद में नमाज से महरूम रखा जाता है...? युवती ने सोची हुई बात कहने को साँस खींची।

लेकिन शायद शबनम की मनःस्थिति को ताड़, शबनम के कुछ बोलने से पहले ही डॉक्टर बोला - अब बेटी... आप बाल की खाल निकालने पर तुली हो... और विषय से भटक भी रही हो…। फिर डॉक्टर ने युवती को संयत स्वर में झिड़कते हुए कहा - अपन इस मुद्दे पर अलग से बात करेंगे।

प्रकृति धीमे स्वर में बोली - डॉक्टर साहब... दुनिया भर में कितने शाइर... गजल गो... अफसानानिगार हुए... जो निगाह से निगाह मिलने के किस्से अपनी रचनाओं में पिरोते रहे हैं। क्या ये सब किसी से निगाह मिले बगैर संभव था...? तो अब तक कितनों को संगसार किया...?

एक क्षण को तो लगा, जैसे डॉक्टर संपट भूल गया। पर ऐसा नहीं था शायद। उसे कत्ल किए गए कुछ संगीतकार, गायक और संगीतकारों के नाम याद आए थे। लेकिन इस मौके पर उनके उदाहरण उसके पक्ष में न होते। काफिरों के बीच धर्म की ही बदनामी होती। यही सोच कर डॉक्टर चुप रह गया था शायद।

लेकिन प्रोफेसर को कुछ सूझा… और लगा - कुछ बात बन सकती है...! वह बोला - यह फिल्म एक झूठ है... जरूरत से ज्यादा ड्रामेटाइज है... हॉलीवुडी है। मुस्लिम देशों को बदनाम करने का अमेरिकी पोपेगेंडा है।

- लेकिन ये कैसे मान लें कि धरती पर ऐसा कुछ घटता ही नहीं...? बेताल अब तक चुप था, लेकिन अब रहा न गया तो बहस में शामिल होता हुआ बोला - फिल्म ईराकी मूल के फ्रांसीसी लेखक की किताब पर अधारित है। मैंने किताब पढ़ी है। किताब घटना के चश्मदीद गवाह, संगसार की गई उस औरत की मौसी के बयान पर है। ये हो सकता है कि औरत को हजारों पत्थर न मारे गए हों। एक ही पत्थर में काम तमाम कर दिया हो। पर पत्थर से मारी तो गई…! और बात सिर्फ उसी औरत की नहीं… हर बरस हजारों के साथ ऐसा हो रहा है। क्या व्यक्ति की अपनी मर्जी, उनका चुनाव, उनके प्रेम का कोई मूल्य नहीं...?

- देखिए... हम धार्मिक कानून की बात कर रहे हैं और उसमें भी हमारे धार्मिक कानूनों की…। डॉक्टर ने पुनः मोर्चा सँभाला। लेकिन फिर भी डॉक्टर को आगे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या कहे। डॉक्टर के चेहरे पर खीज मिश्रित बेबसी उभरने लगी थी।

प्रोफेसर भी फिर से कुछ तर्क खोजने में मसरूफ हो गया। हॉल में सभी बहस को सुनने में मसरूफ थे ही। बिजूका चुप था... पर उसने मन ही मन सोच रखा था - अगर कुछ भी विवाद जैसी स्थिति पैदा हुई... तो तुरंत हस्तक्षेप करना है।

प्रकृति ने सवाल को पैना बनाया, लेकिन स्वर में मिठास घोली और अदबी लहजे में पूछा - अगर खुदा का कानून है... और उसका उल्लंघन हो रहा है... तो खुदा स्वयं आकर दंड दे... एक इनसान को किसने हक दिया… कि कानून की आड़ में दूसरे इनसान को कत्ल कर दे...?

प्रकृति क्षण भर रुकी। लेकिन वह रुकने को न रुकी थी। शायद कुछ याद आ गया था। और वह फिर बोली - हजरत कहते हैं कि जो इनसान उसकी, जो दोनों जबड़ों के बीच है और जो उसकी दोनों जाँघों के बीच है (यानी जबान और शर्मगाह) को काबू में रखने की जमानत दे, उसे मैं जन्नत की जमानत देता हूँ।

प्रकृति सभी पर नजर घुमाती बोली - मैं पूछती हूँ - कितने लोगों की दोनों चीजें काबू में हैं। क्या हजरत और श्रीकृष्ण जैसी महान हस्तियों की भी काबू में थी…? और अगर थी... तो हजरत ने बारह बेगम और श्रीकृष्ण ने आठ रानियों के उदाहरण पेश क्यों किए...? क्या खुद उन्होंने अपने कहे पर अमल किया...? और क्या उन्हें जन्नत नसीब हुई...? और अगर वह सब कुछ देखने-जानने और समझने वाला है, तो गूँगा, बहरा और अंधा बन किस जिनालय में बैठ रहता है। उसका अन्याय के खिलाफ मौन रहना... अच्छे चरित्र की निशानी कैसे हो सकती है…? वह इलाही (पूज्यनीय) कैसे हो सकता है...? कैसे...?

प्रकृति का बोलना रुकने का नाम नहीं ले रहा था। उसका एक-एक प्रश्न किसी जहरीले तीर के फाल की तरह गच रहा था। डॉक्टर ने दृढ़ता से हस्तक्षेप करते हुए कहा - वह परीक्षा लेता है…।

- परीक्षा… डॉक्टर की बात पर प्रकृति को हँसी आने को हुई… जैसे डॉक्टर ने बच्चों जैसी कोई बात कर दी थी। पर वह हँसे बगैर बोली - ऐसे मौको पर उसकी भी तो परीक्षा होती है... और वह सदा ही फेल क्यों होता है...?

डॉक्टर कनखियों से प्रोफेसर की तरफ देखने लगा। प्रोफेसर अपने मस्तिष्क में पवित्र किताब के पन्ने पलटने लगा।

प्रकृति भरे गले से दृढ़ स्वर में बोली - अखबार में रोज ही छोटी-बड़ी खबरें छपती हैं। फलाँ लड़की को छोटी जाति के नौकर के साथ संसर्ग करते देख, माता-पिता ने लड़की और नौकर को गोल्फ की स्टीक से मार डाला। वह लड़की नौकर की बजाय भावी पी.एम. के साथ संसर्ग करती देख ली जाती, क्या तब भी यूँ ही मार दी जाती...? फलानी युवा पत्रकार को अपने से कम हैसियत वाले युवक से प्रेम करने और गर्भवती होने पर, उसका पिता मनुस्मृति का हवाला देता है। प्रेमी युवक से अलग होने और गर्भपात कराने को बाध्य करता है। न मानने पर… पिता उसका गला घोट देता है। किसी को संदेह के आधार पर पत्थर मार-मार कर मार डाला। किसी को अवैध प्रेम संबंध के चलते गोली मारी। तो किसी को जिंदा जला दिया। कितनी घटनाओं का जिक्र करें। यह देख-सुन और पढ़-पढ़ कर मुझे तो पुरुष की शक्ल से घृणा-सी हो गई है। यह कितनी हास्यास्पद बात है - हत्यारे अपने सम्मान की खातिर हत्या करते हैं।

बिजूका भीतर ही भीतर थरथराहट महसूस कर रहा था। उसे प्रकृति की आँखों में... कहीं दूर अमेरिका में आया आइरीन तूफान-सा कुछ नजर आ रहा था। वह भीतर ही भीतर बुदबुदाया - कहीं ऐसा न हो... शहर खारे पानी से भर जाए। बिजूका के जहन में कई प्रश्न थे। वह कुछ बोलना चाहता था, पर चुप रह गया। क्योंकि कॉ. पुत्ती लाल बोलने को उत्सुक थे, वे तीन-चार बार हाथ खड़ा कर चुके थे।

जब बिजूका ने कॉमरेड से संक्षिप्त में बोलने की अर्ज की। कॉमरेड वज्रासन में बैठते हुए बोलने लगे - ये तो जहालत के समय के कानून हैं...। कोई धर्म और कानून ऐसा करने की इजाजत नहीं देता। लोगों ने अपने-अपने ईश्वर-खुदा बना लिए और उनकी आड़ में काली करतूतें करते हैं। हजरत मुहम्मद भी तो एक इन्कलाबी ही थे। किसी भी सच्चे इन्कलाबी के मुँह से अन्याय की बात नहीं निकलती है। मैं सिंध पाकिस्तान में रहा हूँ... मैंने देखा है - वहाँ 'कारो-कारी' सजा दी जाती है, जो कि गलत है। एक तरह की आॉनर किलिंग ही है।

- माफ करना पाकिस्तान में जिया उल-हक के शासन में कारो-कारी के खिलाफ कानून बना था। प्रोफेसर ने टोका। यूनुस के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान थिरकी।

- हाँ... बना था मालूम है...। कॉ. पुत्ती ने कहा - वह कानून आज भी किताब की शोभा बढ़ाने के काम आता है...। वहाँ कारो-कारी के तहत हर बरस हजारों लड़कियों-औरतों को संगसार या फिर कत्ल किया जाता है। और अपराधी को बगैर सजा और हर्जाने के ही आसानी से मुक्ति भी मिल जाती है।

वरिष्ठ आय.पी.एस. ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि कुछ देश में तो नाजायज संबंधों का पता लगने पर… स्त्री को कानूनी रूप से उसका कोई भी रिश्तेदार मार सकता है। पाँच हजार साल में धरती पर लगभग साढ़े तीन हजार युद्ध लड़े गए, उन सभी की जड़ें आदमी द्वारा बनाए तथाकथित धर्मों में मिलती हैं। हम ऐसे धर्म को क्यों महत्व दें... जिसके इतिहास का एक-एक पन्ना खून से रंगा है।

- मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूँ। जिन्होंने धार्मिक कट्टरता को समझा... और धर्म से तौबा कर ली। फोटोग्राफर आर्य कालरा बीच में बोले - ऐसे कट्टर धर्मों को तो अपनी चौपाइयों, आयतों, इश्लोकों की कब्र में ही दफ्न होना है।

प्रोफेसर का शार्गिद यूनुस तिलमिला उठा। वह खड़ा हो कालरा को घूरते हुए और उसकी ओर बढ़ने को हुआ। प्रोफेसर ने उसे हाथ पकड़ नीचे बैठाया। पीठ पर हाथ फेर शांत किया और धीरे से कहा - किसी के कहने से धर्म दफ्न हो जाएगा क्या…? अभी लड़ाई-झगड़े का मौका नहीं, अभी तो कर्म करो, और अपना कर्म है - धर्म की रक्षा करना।

बिजूका के पास यही मौका था कि बहस को रोक दे। रोकने के उद्देश्य से ही बोला भी कि अपन यहाँ लड़ने-झगड़ने को जमा नहीं हुए। अपन को विचार करना है कि आखिर दोषी कौन है...? स्त्री-पुरुष, धर्म, संस्कृति, राजनीति, संसद, पूँजी या पूँजीवादी व्यवस्था...? हम आपस में लड़ें-मरे या हमें आपस में लड़ाने वालों से लड़ें...? क्या है धर्म...? कभी श्रीकृष्ण ने कहा था कि अन्याय के खिलाफ लड़ना धर्म है…? फिर हजरत ने भी कहा था - बुराई के खिलाफ लड़ना जिहाद है...।

बिजूका के भीतर रोशन खयालों का झरना-सा बह रहा था और वह बोलता जा रहा था - लेकिन आज तो माने ही बदल गए हैं... अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले अन्याय कर रहे हैं... बुराई को मिटाने वाले बुरा कर रहे हैं...। फिर कौन... कौन ऐसी व्यवस्था के खिलाफ… चेतना की फूँक से विद्रोह का शंख फूँकेगा...? क्या श्रीकृष्ण और हजरत जैसे राजनीतिज्ञ इन्कलाबियों को जन्म देने वाली कोख बाँझ हो गई है…?

फिर बिजूका अपनी बात समेटता बोला कि साथियों... प्रेमी-युगलों को संगसार या कत्ल करना समस्या का हल नहीं है। और प्रेम करना तो कोई समस्या है ही नहीं। प्रेम मानव समाज की, दुनिया की धुरी है। धुरी ही टूट जाएगी, तो दुनिया नहीं बचेगी। धुरी की रक्षा ही धर्म है।

बिजूका को सुनते हुए भी प्रोफेसर, डॉक्टर, प्रकृति और हॉल में बैठे कई लोगों के हाथ खड़े थे। लोग अभी बहस को आगे बढ़ाना चाहते थे। बिजूका के मन में तरह-तरह की आशंकाएँ मृत्यु नाच कर रही थीं। बिजूका ने उसी क्षण चर्चा गोष्ठी को समाप्त करना बेहतर समझा और ताबड़तोड़ ढंग-से लोगों का आभार मानते हुए समाप्ति की घोषणा कर दी। वह राहत की साँस छोड़ता उठ खड़ा हुआ। हॉल खाली होने की प्रतीक्षा में ऊबते कुछ रंगकर्मियों के चेहरे पर रंगत लौट आई थी। अब नाटक की रिहर्सल शुरू जो कर सकेंगे।

सात

उस दिन प्रकृति का मन खिन्नता से भर उठा। वह बहुत कुछ सोचकर बैठी थी, बल्कि जबसे फिल्म स्टोनिंग के शो का होना तय हुआ था, उसने मसले पर बोलने को बहुत-सी तैयारियाँ कर रखी थी। उसके जहन में कई मसले और उनसे जुड़े प्रश्न थे - जैसे देश और दुनिया में कई जगहों पर औरतें खरीदी-बेची जाती हैं। खुद शौहर द्वारा शरीके-हयात के साथ संसर्ग का वीडियो बनाना। सास-ससुर से धन की माँग करना…। पैसा न देने पर, फुटेज को नेट पर डालने की धमकी देना। खुद शौहर द्वारा जिना का धंधा करवाना। बुर्का। पोर्न फिल्म व्यवसाय और अभी-अभी मिस्र की संसद में पेश बिल - फेयरवेल इंटरकोर्स (पत्नी की लाश के साथ संभोग करने के अधिकार की माँग), जैसा ताजा-ताजा मसला भी था। लेकिन सब मन का मन में रह गया।

प्रकृति हॉल के बाहर अपनी गाड़ी के पास खड़ी थी। आसमान में फिर नीली, काली, साँवली बदलियाँ तेजी से भागती-दौड़ती नजर आ रही थीं। बिजली रह-रह कर कड़कते हुए चमक रही थी, जैसे बदलियों को मंजिल की राह खोजने में मदद कर रही थीं। हवा में नमी घुली थी। लेकिन हवा किसी से नरमाई से पेश नहीं आ रही थी, कागजों के टुकड़े, पन्नियाँ, तिनकों, झुग्गियों के टट्टर, टीन-टप्पर को आसमान की सैर करा रही थी।

लोग अपने-अपने साधन से अपने-अपने दड़बे की ओर दौड़ने लगे थे। स्क्रीनिंग का सामान रफे-दफे कर बिजूका भी निकल गया था। जैसा बाहर माहौल था, वैसा ही प्रकृति के जहन में चल रह था। उसे आसमान में बदलियों के टुकड़े नहीं, नीले, काले, साँवले बुर्कों से ढकी औरतें नजर आ रही थी। हवा में कागजों के टुकड़े नहीं, दुनिया भर के संविधानों, धार्मिक कानूनों की चिंदियाँ उड़ती लग रही थीं। आसमान से रह-रह कर आने वाली आवाज से हाहाकार, रुदन और तड़प महसूस हो रही थी।

प्रकृति अपनी टूव्हीलर स्टार्ट कर घर की दिशा में बढ़ी। अभी वह महाराष्ट्र साहित्य सभा की सँकरी गली से निकल महात्मा गांधी मार्ग पर आई थी कि उसे गाड़ी रोकनी पड़ गई। लगा - उसके सामने बदलियों का समूह आकर खड़ा हो गया। पर जल्दी ही समझ में आ गया कि बदलियाँ नहीं बुर्के में कैद औरतें हैं। उन सभी के पास कहने और दिखाने को बहुत कुछ था, वे जोर-जोर से और एक साथ बोल रही थी, प्रकृति को शोर के सिवा कुछ समझ नहीं आ रहा था। प्रकृति ने जोर से बोलकर उन्हें शांत करते हुए कहा - साफ-साफ कहो ...क्या कहना चाहती हो...?

सभी औरतें चुप हो गई थीं। एक लड़की जिसकी उम्र करीब दस-ग्यारह साल थी। वह बुर्के के भीतर से ही बोली - मैं सारा जफ्फार निमत हूँ। मुझे खानकिन (इराक) में संगसार किया गया था, मुझे आज तक पता न चला कि किस कसूर की वजह से संगसार किया था।

दूसरी लड़की ने झट-से प्रकृति की गाड़ी का हेंडिल पकड़ा। वह करीब तेरह वर्ष की थी। वह बुर्का उठाए बगैर ही बोली - मैं ईशा इब्राहीम डुहुलोव हूँ। मेरे साथ तीन आदमियों ने बारी-बारी से बलात्कार किया। मैं चीखी-चिल्लाई। रोई। कोई मदद को नहीं आया। फिर सोमालिया के किमाया शहर में सशस्त्र डाकुओं ने लगभग हजार लोगों की भीड़ के सामने मुझे संगसार किया। बलात्कारियों को सजा दी जानी थी, मैं तो फरियादी थी, मुझे क्यों संगसार किया...?

प्रकृति अपने भीतर उलझ गई थी। समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहे...? तब एक तीसरी औरत बोली - मैं सोराया मानुचेहरी हूँ, मुझे ईरान में... चौथी - मैं कुर्दिस्तान अजीज हूँ, मुझे इराकी पहाड़ों… मैं... शौकत... मैं... सौफिया... मुझे पाकिस्तान में…, मुझे भारत में..., मैं दिल्ली में..., मैं हरियाणा में... मैं इंदौर में मारी गई…

एक क्षण को शोर रुका। महौल में नीरव शांति भर गई। फिर मीठा स्वर और संगीत दूर से आता सुनाई देने लगा। प्रकृति सहित सभी आसमान की ओर देखने लगी - आसमान में एक हूर के पीछे-पीछे साजिंदों की टोली चल रही थी। टोली से ही उनके कानों तक मधुर गीत-संगीत पहुँच रहा था।

प्रकृति टोली की ओर देखते हुए बोली - क्या वह गायिका कोई हूर है...? ओह... उसकी आवाज में कितनी मिठास है...।

पाकिस्तान की एक औरत बुर्के के भीतर से बोली - वह युवती हूर नहीं, बल्कि पाकिस्तान की प्रख्यात पश्तो गायिका गजाला जावेद की रूह है। वही गाती जा रही है।

एक दूसरी औरत बुर्के को उठाए बगैर बोली - अभी-अभी जब गजाला एक ब्यूटी पार्लर से बाहर आ रही थी। उसके साथ उसके अब्बू भी थे। उन दोनों को गोली मार दी गई है। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में पिछले वर्षों में कई गायकों और संगीतकारों को मौत के घाट उतारा गया है। क्योंकि तालिबानी गायकी और संगीत को गैर इस्लामिक मानते हैं। वह टोली मारे गए गायकों और संगीतकारों की रूहों की ही है।

धीरे-धीरे गायकों और संगीतकारों की टोली दूर होती गई। बुर्के वाली औरतों का शोर फिर जमीन और आसमान में गूँजने लगा। प्रकृति जोर से चीखी - मैं क्या करूँ…? मैं क्या करूँ…?

और फिर प्रकृति ने पूछा - तुमने धर्म के ठेकेदारों से क्यों नहीं पूछा… तुम्हें क्यों संगसार किया...?

फिर से सभी एक साथ चीख उठी - मैंने...पूछा..., मैंने...पूछा..., मैंने...पूछा, हम सभी ने पूछा...।

उन सभी औरतों की रूहों ने सिर्फ और सिर्फ बुर्का ही पहने थे, बुर्कों के भीतर और कोई वस्त्र न पहने थे। उन सभी ने एक साथ बुर्के उतार फेंके और चीखती हुई कहने लगी - ये देखो…ये देखो… ये कहा... ये दिया…।

उन निर्वस्त्र रूहों पर लाठी, पत्थर, चाकू, तलवार, गोलियों के घाव। नासूर। रिसता खून, हलाहल करते कीड़े थे। महात्मा गांधी मार्ग पर जहाँ तक प्रकृति की नजर जा रही थी। उसे निर्वस्त्र और जख्मी रूहों के सिवा कुछ नजर नहीं आ रहा था। जमीं से आसमाँ तक बस यही-यही था और इन्हीं की चीख, रुदन का शोर था।

आठ

उधर बिजूका अपने घर के द्वार सामने खड़ा था। दो बार कॉलबेल बजा चुका था। सोच रहा था - कोमल की आँख न लग गई हो। एक बार फिर कॉलबेल का खटका दबाने ही वाला था कि कोमल ने किंवाड़ खोला, उसकी आँखों में आज नींद नहीं थी। बिजूका को आश्चर्य हुआ, मन ही मन सोचा - इतनी बजे तक तो कोमल की आँखों में नींद मँडराती नजर आती है, फिर आज क्या बात है...?

वह अंदर दाखिल हुआ। खूँटी पर टँगे कपड़े छत पंखे की हवा से फड़फड़ा रहे थे। बेटा नींद के और बेटी ऊँघ के हवाले थी। कोमल ने पूछा - खाना दूँ...?

- दे दो... एक-दो रोटी... वैसे भूख जैसा कुछ नहीं है। बिजूका बोला - पर खा लेता हूँ... रोटी के नशे में नींद जल्दी आ जाएगी।

कोमल ने खाना लगा दिया। बिजूका खाने लगा। कोमल ने पूछा - फिल्म का शो कैसा रहा...?

- अच्छा रहा...। लगता है कि स्त्रियों के मामले में कुछ लोग कभी नहीं बदलेंगे। बिजूका बोला।

- अरे… आपने सुना कि नहीं… कोमल को अचानक कुछ याद आया और थोड़ी व्यग्र होकर बोली थी।

- क्या…?

अपने घर से आठ-दस घर छोड़ कर ममता रहती थी न...! गोरी-गोरी। जब अपनी गुड़िया छोटी थी, कभी-कभी उसे खेलाने भी आ जाती।

- हाँ भई जानता हूँ… अभी एक दिन जींस पहनने के पीछे उसके पिता ने थप्पड़ मार दिया था उसे, तो वह दौड़ कर अपने यहाँ आ गई थी। बिजूका बोला - फिर मैं ही तो गया था, उसके पिता को समझाने…।

- अभी शाम को उसके पिता ने... कोमल बोलते हुए रुक गई… आवाज रुँध गई... फिर हिम्मत कर धीमे स्वर में बोली - पिता ने ममता को गला दबा कर मार दी… कहते हैं - उसका किसी के साथ लफड़ा था।

- ओह... तो फिर दिन भी उसे जींस पहनने के कारण नहीं मारा होगा... बिजूका बोला - मारने के पीछे यही कारण रहा होगा...। पर उस दिन बाप-बेटी दोनों ने इस बात का जिक्र भी नहीं किया था। जबकि मैं उनके यहाँ चाय पीने इतनी देर रुका भी था।

बिजूका उदास हो गया था। हाथ से निवाला छूट गया था। वह हाथ धोकर पलंग पेटी पर बैठ गया और फिर लेट गया था। कोमल सामान अवेरने के बाद अपने बिस्तर पर लेट गई थी। बिजूका सोच रहा था - जब बेटी छोटी होती है, तो पिता उसे कितना प्यार करता है...! वही बेटी जवान होकर... जब अपनी जिंदगी जीने को कुछ कदम बढ़ाती है, तो पिता उसके साथ इब्लीस की तरह का बरताव करता है। क्या मैं भी एक दिन अपनी बेटी के लिए इब्लीस बन जाऊँगा...? उसकी खुशियों का गला घोट दूँगा...!

उस रात बिजूका की नींद फिर कहीं लंबी निकल गई थी। वह किसी और बात के बारे में सोचते हुए सोने की कोशिश करने लगा। घंटे-सवा घंटे की मशक्कत के बाद वह अर्धनिद्रा में था। कुछ बरस पहले जब उसे चिकुनगुनिया हुआ था, तब से थोड़ी-थोड़ी देर में करवट बदलनी होती थी। करवट न बदलता तो हाथ-पैर सोने लगते। करवटें बदलने से फालका आवाज कर रहा था।

अर्धनिद्रा में मानस की स्क्रीन पर फिल्म की तरह एक स्वप्न चलने लगा। फालके की आवाज स्वप्न में संगीत-सी सुनाई पड़ रही थी। स्वप्न में बाढ़ थी। विकराल और असीम बाँहें फैलाती हुई बाढ़। कुछ ही देर में बाढ़ का पानी कान के सुराखों से बाहर आने लगा। फिर पलंग पेटी के भीतर उतरने लगा।

पलंग पेटी में गीता, बाईबिल, पवित्र किताब जैसी अनेक महान किताबें भरी थीं। पानी सभी को समान भाव से उनकी महानता के साथ गलाने लगा। मानो वे रद्दी कागजों की पोथी के सिवा कुछ न हो।

दरअसल वे महान ग्रंथ कई महान हस्तियों की कब्र थे। जब पानी महान हस्तियों के भी नाक-कान में घुसने लगा। तब महान हस्तियाँ भी आम इनसानों-सी भड़भड़ा उठी, और पलंग पेटी से बाहर आने की मशक्कत करने लगीं। जैसे महान हस्तियों और परमाणु बिजली सयंत्रों की विकिरणों से पीड़ित फुकुशिमा डाईची के आम लोगों में कोई फर्क ही न हो। कुछ महान और अरबों-अरब आम जन फालके के किनारों की तरफ लपकने लगे। आपस में गाली-गलौच धक्का-मुक्की होने लगी। क्या श्रीकृष्ण और क्या हजरत...? हर कोई जल्दी से जल्दी फालके के ऊपर आने का प्रयास करने लगा। कोई फालके को दाएँ से उठाता, तो बिजूका बाएँ लुढ़क जाता। कोई बाएँ से उठाता, तो बिजूका दाएँ लुढ़क जाता।

बिजूका के स्वप्न में ही दूसरी ओर प्रकृति अपने हवा महल में खड़ी थी। हवा महल की दीवारें, छत, किवाड़, खिड़कियाँ, परदे और सब कुछ हवा का था। प्रकृति की देह पर वस्त्र जैसी कोई चीज नहीं थी...। पूरे आकाश की काली बदलियाँ उसके बालों की एक लट भर थी। सैकड़ों कुतुबमीनार की लंबाई का योग उसकी चींटी (छोटी) उँगली के बराबर था। सैकड़ों हिमालय, सफा और मरवा जैसी पहाड़ियाँ 'जो ईश्वर की निशानियाँ मानी जाती हैं, के मलबे का आकार उसके एक स्तन से सैकड़ों गुना छोटा था। सूरज उसके हाथ में पेन्सिल टार्च की माफिक, चाँद जरा-सी बिंदियाँ। उसकी आँखों से रह-रह कर बिजलियों की-सी चमक के झरने बह रहे थे। बिजूका की पत्नी-बेटी, ममता, शबनम ही नहीं, हर शख्स और हर चीज प्रकृति की ओर खिंची जा रही थीं। जैसे नदियाँ समुद्र में समाती है। लग रहा था - प्रकृति से बाहर कुछ भी नहीं है।

बिजूका फिल्में खूब देखता, पर जो नजारा वह अपने भीतर देख रहा था, वैसी तबाही का मंजर टाइटैनिक, अवतार और 2012 जैसी फिल्मों में भी नहीं देखा था। वह अचंभित था यह देख कि बाढ़ किसी को नहीं बख्श रही थी। बाढ़ में सैकड़ों धार्मिक और संसदीय जिनालय टूटे-फूटे खिलौनों की तरह तैरते नजर आ रहे थे। हरी, पीली, नीली, सफेद और लाल, काली पगड़ियों और टोपियों वाली असंख्य लाशें तैर रही हैं।

और फिर बिजूका भी खुद को डूबता और गलता हुआ महसूस करने लगा। वह लंबी-लंबी साँसे भरने लगा। वह शरीर में मौजूद उर्जा का एक-एक कतरा जोड़, जोर-जोर से चीखने लगा। ऐसी चीख कोई तब ही चीख सकता है... जब आँखों के सामने साक्षात मृत्यु खड़ी हो। बचने की एक कतरा उम्मीद न बची हो…। जैसे वह जीवन की आखिरी चीख हो। जीवन से लंबी चीख।

बिजूका ने देखा - चीख से घर की दीवार पर टँगी दादाजी की तसवीर नीचे गिर पड़ी। छत से सीमेंट का एक चकता कोमल के सीने पर गिरा... पंखे की पंखुड़ियाँ मुड़ गई। पंखा चलना बंद हो गया। उसे अपनी बेटी का ख्याल आया - कहीं बेटी पर सीमेंट का चकता तो न गिर पड़ा...! कहीं पंखा तो न टूट पड़ा...!

कोमल और बच्चे जाग कर पलंग पेटी के पास आ गए। सभी भयभीत हो… बिजूका को झिंझोड़ने लगे। नींद की चादर खींची। स्वप्न का घड़ा फोड़ा। बिजूका को बाहर खींचा। कुछ देर बिजूका आँखें मलता रहा। फिर उसने देखा - छत से सीमेंट का कोई चकता नहीं गिरा। पंखे की पंखुड़ियाँ नहीं मुड़ीं।

बिजूका की बेटी के हाथ में पानी का गिलास था। बिजूका ने पानी पिया। बेटी के सिर पर स्नेह भरा हाथ फेरा और फिर उसका भाल चूमा। हल्का-सा मुस्काया और बोला - चलो... सो जाओ। वह भी फिर से सोने की कोशिश में करवटें बदलने लगा।


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हिंदी समय में सत्यनारायण पटेल की रचनाएँ