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कविता

चैती
अर्पण कुमार


खुरदरे मगर
कसे शरीरों में आ जाती है
गजब की उमंग
फूट पड़ते हैं
सुमधुर राग और लंबी तानें
एक, दो, तीन...
कई कई कंठों से
एक साथ, समवेत
रबी की पकी
फसलों की अल्हड़ता
और मादकता की गंध से सराबोर
और उत्साहित

लालटेन/पैट्रोमैक्स की लौ काँपती रहती है
ढोलक के तेज
मद्ध्म थापों पर
बजते झालों की
स्वर-लहरियों को
वायु-तरंगें पहुँचाती हैं
दिक-दिगंत तक
हारमोनियम की हार्मनी
मंत्रमुग्ध कर देती है
मंडली के ठीक बाएँ स्थित
अरसे से
गाँव की रक्षा करते आए
गाँव के सबसे बड़े
बुजुर्ग बरगद बाबा
की फुनगियों पर पाँत में
आराम करते बगुलों को
'लौंडे' की श्लील-अश्लील या कहें
अधकचरी लचकता
कमनीयता से भरे नृत्य
एवं सहज, गेय और प्रवाही
रसभरे गीतों की जुगलबंदी पर
रात भी अपनी कमर
लचकाती है पूरी रात

आसपास के गाँवों को
चुपके से दे आती है न्यौता
अपने गाँव से गुजरती हवा
क्रमशः पहुँचने और थिरकने
लगती है भीड़
गाँव के एक छोर पर
गाँव का अंदर जमा हो जाता है
गुदड़ी का एक विशाल
गोलाकार झुंड
नृत्य और संगीत में रम जाता है

उस रात अपने गाँव में
अँधेरा नहीं होता
पोखर के पानी पर
नाचते-थिरकते लोगों की
साया रात भर मँडराती रहती है
प्रीतिकर और मदमस्त चैती सुनने
आकाश कुछ
नीचे आ जाता है
धरती समुत्सुक
इतराती है
अपने भाग्य पर


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