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कविता

ट्रेन की खिड़की से
अर्पण कुमार


आज भी सबकुछ नहीं छूटा है
टूटती हुई बरकरार हैं कई चीजें आज भी
'प्रेमिका' कल की
आज बन गई है दोस्त
अपना घर बसाकर
और मैं भी कहाँ रहा अविवाहित अब!
उदारमना दोनों बतियाते हैं
घर-गृहस्थी की बातें
स्वस्थ मन से
अकलुषित और निर्बाध,
अच्छा लगता है
यह सोचकर कि
पुराने संबंध बच गए
अप्रासंगिक होने से
और उनसे निकल पड़ा है
एक नया सरोकार,
नई और निरंतर नई होती जाती
दहलीज पर
समय और संबंध की

बगुलों के झुंड
पके धान के खेतों पर
आज भी उड़ते हैं
पहले की ही तरह,
खेतों में काम करता
स्त्री-पुरुष युग्म
जो दिखता है
ट्रेन की खुली खिड़की से
भरता है कई रंग
अपने दांपत्य जीवन के
मेरे मन में
दूर ही से
श्रमरत, रागवान होकर
आज भी

ट्रैक्टर तैनात खड़े हैं खेतों में
और भैंसें लोट रही हैं
मनभर जोहड़ में
जाड़ी की गुनगुनी,
मीठी धूप को सेंकती
अपनी अनगढ़ता में
अरसिकता में भी
मगर भरपूर
आकर्षण के साथ आज भी
अतीत की स्मृतियों में कैद मन
देखता है
बाहर की दुनिया
अ‍पने अंदर के
आरोह-अवरोह से चालित होकर
मगर है कुछ ऐसा आकर्षण
बाह्य जगत का
कि पूरा का पूरा परिवेश आ धमकता है
मेरी गोद में
जीता जागता
चलती ट्रेन की खिड़की से कूदकर अकस्मात
और तारी रहता है
देर तक अपनी धमाचौकड़ी में
मेरे आसपास
अलगाव या कहें अनजानेपन की
किसी सख्त दीवार को
तोड़ता, बिखराता हुआ
अपने तईं

सोचता हूँ,
सूखे होंठों की पपड़ियों पर
तरावट फिराती है
बाहर की तरल दुनिया ही
आखिरकार,
अच्छा लगता है यह सोचकर कि
एकांत को भी
अपनी निष्ठा और
शक्ति बटोरने के लिए लिए
जोहना पड़ता है मुँह
समूह का ही।

अच्छा लगता है
यात्रा में होनेवाली,
लाख असुविधाओं के बावजूद
ट्रेन से यात्रा करना
घंटों अपने देश में,
समा लेना एक-एक दृश्य को
अपनी आँखों में
और रचा-बसा लेना
स्वयं को
उन दृश्यों में आज भी


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