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कहानी

न्याय
सत्यनारायण पटेल


कहने में क्या बुराई है...? मैं अगर कहूँ कि कल दिन में तारे इस कदर चमक रहे थे कि सूरज नजर नहीं आ रहा था, दिन में बहुत भयानक अँधेरा था और जब मैं ठीक साढ़े बारह बजे कोर्ट के सामने से गुजर रहा था, कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, जबकि गाड़ी की सभी लाइट्स झकाझक चालू थीं। आप क्या कहेंगे...? मेरे कहे पर हँसेंगे...! या मुझे खिसका हुआ कहेंगे...! या फिर शायद मुझे किसी तरह के नशे में डूबा समझें...! यकीन हैं आप मुझे कुछ भी कहेंगे... जो चाहे समझेंगे, पर मेरी बात पर भरोसा न करेंगे...! क्योंकि मेरा कहा एक-एक लफ्ज झूठ है, तो मैं आपसे कहाँ कह रहा हूँ कि मैं ही हूँ - हरिशचंद्र की औलाद। इन दिनों खुद को हरिशचंद्र की औलाद साबित करने पर तुला है जो भ्रष्टों का मुखिया, वह मनमोहक शख्स कोई और है... मैं नहीं। मैं तो महज अदना-सा किस्सागो हूँ। यह जो किस्सा या दास्तानगोई कहने जा रहा हूँ, इसका भी वाक्य दर वाक्य और पैरा दर पैरा झूठ है। हम सवा अरब लोग जिस विशाल धरती के टुकड़े पर रोते-झिकते रहते हैं, इस पावन धरती पर ऐसा तो कभी घटा ही नहीं जैसा मैं कहने वाला हूँ। और राज की बात यह कि असल में... मैंने आमिर खाँ साहब (इंदौर वाले) के सिवा, कभी किसी आमिर, खदीजा, असद खाँ या फिर रमा सिंह का नाम नहीं सुना है। फिर भी उनके साथ हुए न्याय का किस्सा सुना रहा हूँ। अगर आपको मनगढंत और झूठे किस्से-कहानियाँ सुनने-पढ़ने का कीड़ा है... तो जरूर सुने-पढ़ें।

लेकिन यह मेरा शौक नहीं, ...बल्कि मजबूरी है। क्योंकि एक बार मुझे झूठे कीड़े ने काट लिया था। कीड़ा कुछ ऐसी प्रभावशाली और झूठी नस्ल का था, कि जिसे एक बार काट लेता। वह जिंदगी भर झूठ की सेवा में जुट जाता। मुझे ही देख लो...। उस कीड़े के काटने के बाद मुझे झूठ बोलना जन्नत में टहलने जैसा सुकून भरा लगने लगा।

इस झूठ को सुनने-पढ़ने वालों से मामूली-सी गुजारिश है कि पढ़ें और खा-पीकर सो जाएँ। जैसा कि चलन है। फालतू-बेफालतू कुछ भी न सोचे। जाति, समाज, संप्रदाय... भेद-भाव, आदि...आदि जैसा कुछ भी नहीं सोचे। क्योंकि देश, दुनिया और हमारे-तुम्हारे सभी के बारे में... सभी कुछ सुनियोजित ढंग से सोचने वाले गिरोह अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ बखूबी निभा रहे हैं। हालाँकि मैंने आपसे यह सब यों ही कहा, आप खुद जानते-समझते हैं सबकुछ..., है कि नहीं...? और ज्यादा कुछ नहीं तो इतना तो भली-भाँति जानते ही होंगे कि झूठ के पैर नहीं होते हैं। लेकिन एक बात कहूँ - भले ही झूठ या अफवाह के पैर न होते हों, पर उसके मुँह में हजार छेद होते हैं और उसके खसमों की तो गिनती ही नहीं...। फिर आपको हिटलर के प्रचारमंत्री गोयबल्स का वह अमर झूठा वाक्य तो याद होगा ही - किसी भी झूठ को इतनी बार दोहराओ की लोग भ्रमित हो जाए, लोग मानने लगे कि हो न हो सच यही है, जो बार-बार कहा जा रहा है। मसलन - हमारी कार्य प्रणाली, न्याय प्रणाली, संसद और प्रेस ईमानदार है। तिरसठ बरसों से यह मंत्र दोहराया जा रहा है। शुरुआत में दो-चार बार दोहराने पर ही लोग मान लेते थे। फिर थोड़ा ज्यादा बार दोहराया जाने लगा। आजकल और ज्यादा दोहराया जाने लगा है। कुर्सी पर विराजमान होते वक्त और कुर्सी को छोड़ते वक्त... बहुत पवित्र भावना से इस मंत्र का आदान-प्रदान और जाप किया जाता है। उन्हें अटूट विश्वास है कि एक दिन लोगों के पास इस मंत्र से सहमत होने के सिवा कोई चारा न बचेगा। खैर... बहरहाल चलिए एक झूठे किस्से की ओर चलते हैं, और झूठा किस्सा कुछ यों है -

आमिर ने अपनी अम्मी खदीजा से सुना था कभी। राम, सीता और लक्ष्मण चौदह बरस का बनवास काट जब अयोध्या में वापस लौटे, तो लोगों के हृदय में खुशी और प्यार के मारे समुद्र की-सी लहरें उठीं थीं। वह दृश्य देखती जनता की भाव-विह्वल आँखों से अश्रु मोतियों की लड़ी-सी झड़ी जैसे रुकना भूल गई थी।

जब आमिर ने अपनी अम्मी से यह राम कथा सुनी, तब वह मजरूह इस्लाम सेकेंडरी स्कूल में आठवीं कक्षा का छात्र था। उसी बरस सच्ची उन्मादी भीड़ ने अयोध्या में एक ढाँचे को ढहाने का गौरवमयी आनंद प्राप्त किया था। तथाकथित महान देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को और चमकाया था। हालाँकि उस चमक से कुछ लोग बुरी तरह चमक भी गए थे। उनके मन में दहशत का गाढ़ा स्याह रंग भर गया था। कुछ के मन में बदला लेने जैसे फितूर के अंकुर फूट आए थे। लेकिन अपने किस्से का आमिर उन सबसे अलग था। और फिर उन दिनों उसकी उम्र भी क्या थी...? खूब से खूब चौदह-पंद्रह बरस। और आमिर के स्वभाव की तो पूछो ही मत - एकदम अल्लाह की गाय। हालाँकि उस उम्र में बच्चे ज्यादा शरारती हो जाते हैं। उसके स्कूल में दोस्तों और शिक्षकों के बीच भी उसकी छवि अल्लाह की गाय की ही थी।

जब चार-पाँच बरस का था, तब कभी-कभी खदीजा को लगता - छोरा कहीं मंद बुद्धि तो नहीं...? पर ऐसा कुछ नहीं था। बस... वह कुछ अंतर्मुखी था और अपने भीतर खुश भी रहता था।

लेकिन खदीजा को ऐसा शायद इसलिए भी लगता था, क्योंकि तब-तक आमिर की पढ़ने में भी कोई खास रुचि नहीं थी। हाँ... किस्से-कहानी सुनने में रुचि थी, जितने चाहो सुनाओ। लेकिन खदीजा अ...आ...इ...ई, ए.बी.सी.डी. या फिर अलीफ...बे...पे... सिखाने की कोशिश करती, तो फिर वह भीतर ही भीतर खिन्न हो उठता। कुछ-कुछ बेसन के लड्डू-सा बिखरने लगता। इसीलिए उसे स्कूल में भी एक-दो साल देरी से भेजा गया था।

आमिर को स्कूल में भले देर से दाखिल किया था, पर उसने स्कूल जाना जल्दी ही बंद कर दिया था। स्कूल के प्रति उसके मन में पैदा हुई अरुचि फिर कभी रुचि में तब्दील न हुई। उसके वालदैन खदीजा और असद खाँ ने अपने तईं समझाया कि अभी से स्कूल मत छोड़। पर वह छोड़ चुके स्कूल से फिर न जुड़ सका। हुआ यूँ कि ढाँचा ढहने के बाद उसके स्कूल में जो किस्से-कहानियाँ सुनने को मिलती, वह उसे न सुहाती। यूँ समझ लें कि किस्से-कहानियाँ सुनने का शौकीन होकर भी... किस्से-कहानियों से तंग आकर ही स्कूल जाना बंद कर दिया। शायद उसे वीभत्स किस्से-कहानियाँ पसंद नहीं थीं। स्कूल छोड़ने के बाद कुछ दिन तक उसका मन बहुत खिन्न रहा। वह भीतर ही भीतर नाखुशी से भरा रहा। उसे अपनी नाखुशी की वजह मालूम थी। पर वह वजह किस वजह से थी यह शायद मालूम नहीं था। हालाँकि उसके मुहल्ले, स्कूल और पूरे देश में ऐसे लोग भरे पड़े थे, जिन्हें वजह के पीछे की वजह और शक्लें मालूम थीं। उन दिनों कुछ लोग बदला लेने की भी बात सोचते-करते। लेकिन आमिर के मन में कभी बदले की भावना घर न कर सकी थी। वह कभी किसी को नुकसान पहुँचाने का न सोच सका था।

कभी-कभी खदीजा अपने पड़ोस में रहनेवाली किरायेदार रमा सिंह से कहती - आमिर तो पूरा राम पर गया है। अल्लाह... मेरे राम पर दया करना।

उन दिनों आमिर के अब्बू असद खाँ जिंदा थे। बड़े खुशमिजाज और नेकदिल इनसान। पाँचों वक्त के नमाजी। जबान, ईमान और लंगोट के पक्के। बकरदाढ़ी, सफेद सलवार-कुर्ता और सिर पर गोल टोपी उनका स्थायी पहनावा था। कोई नशा था जीवन में... तो सिर्फ काम का। अल्लाह की बंदगी का, और कोई शौक था तो वह पान का, आँखों में सुरमा आँजने का, और कपड़ों पर इत्र छिड़कने का।

असद खाँ का सब्जीमंडी में खिलौनों का छोटा-मोटा कारोबार था। आमिर आठवीं के बाद स्कूल नहीं गया और असद खाँ के साथ कारोबार में हाथ बँटाने लगा था। चार-पाँच साल की मेहनत और लगन से आमिर कारोबार को अच्छे से समझ गया था। किनसे लेन-देन होती थी। कहाँ से कच्चा माल लाना होता और कहाँ तैयार खिलौने भेजना होते थे। बाजार में कौन-से खिलौनों की माँग बढ़ेगी... और कौन-से की नहीं...!

आमिर को काम करते देख असद खाँ खुश थे। उनके मन में सुकून था कि आमिर ने अच्छे-से काम-धंधा सँभाल लिया था। अब तो वे आमिर का निकाह करने का मन बना रहे थे। खदीजा ने तो अपनी फुफेरी बहन की लड़की गुलबानो को निगाह में निकाल भी रखी थी। गुलबानो को आमिर भी जानता था... क्योंकि वह आमिर की बहन शहनाज के निकाह में ऐसी नाची थी... कि नाच बंद होने के बावजूद... जैसे जारी छूट गया था, मुहल्ले की आँखों में उसका नाच। जब मुहल्ले की आँखों में ही न थमा उसका नाच, तो फिर आमिर और खदीजा की आँखों में कैसे थमता...?

शहनाज का निकाह हो गया। सभी मेहमानों की वापसी हो गई। गुलबानो भी अपनी अम्मी के साथ घर लौट गई। लेकिन बची रह गई आमिर और खदीजा की आँखों में सुरमे की तरह गुलबानो की स्मृति। उसकी चूड़ियों और पायलों की वह आवाज जो नाचते वक्त होती थी। अभी भी मन के फर्श पर उसकी हँसी के दाने टप्पे खा रहे थे। उसका पीला दुपट्टा जूही के इत्र से महकता आँखों के भीतर फरफरा रहा था।

शहनाज के निकाह के बाद, खदीजा जब भी आमिर के करीब होती। उसे अलसाये और खामोश समंदर के किनारे होने का-सा महसूस होता। वह खोजती नजरों से कुछ सूँघती-खोजती। एक उम्र के अनुभव से हरी-भरी जमीन पर खड़ी खदीजा समझ रही थी, समंदर कहीं और नहीं आमिर के मन में ठहरा है। खदीजा अपनी समझ को जाँचने के लिए..., सूने दरवाजे की तरफ ऐसे देखने लगी... जैसे किसी को दूर से दरवाजे तरफ आता देख रही हो... फिर यों ही झूठ-मूठ में कह उठी - ...गुलबानो...।

आमिर के मन में जाने किस छोर से अचानक आँधी चली। खामोश समंदर सितार के तारों की तरह थरथरा उठा। गुलाबी लहरे मन के नाजुक किनारों से टकराने लगी। आमिर के चेहरे पर जैसे हवा ने गुलाल मल दिया। कूल्हे में जैसे खटिया की ईंस की कोई चोंप चुभी हो, यों खड़ा हुआ। आँखें उगते सूरज की रोशनी-सी चमक उठी। लेकिन जब दरवाजे पर गुलबानो न दिखी... तो चेहरे के गुलाल का रंग स्याह हो गया। साँझ ने जैसे रोशनी का जाल समेट लिया।

अनजान बनी आमिर को देखती खदीजा मन ही मन कह उठी - गुलबानो तो सीता जैसी है... अल्लाह... मेरे राम और सीता पर... मेहरबानी की ठंडी और रोशन छाँव रखना।

फिर वह आमिर से मुखातिब हो बात बनाती बोली - सोच रही हूँ कि गुलबानों के घर हो आऊँ...। तू चलेगा मेरे साथ...।

- जी अम्मी जैसी आपकी मर्जी... आमिर ने कहा था।

गुलबानो की अम्मी आइशा, खदीजा की फुफेरी बहन थी। खदीजा के मन में भी चटापटी होने लगी। उसने आइशा से फोन पर बात की और दूसरे दिन सुबह आमिर को लेकर पहुँच गई। गुलबानो और आमिर तो घर में ही किसी कमरे में या छत पर खो गए। खदीजा, आइशा और आइशा के शौहर सुल्तान मियाँ आपस में बतियाने लगे। खदीजा ने शहद की मिठास के-से लहजे में आमिर का पूरा किस्सा सुनाया। गुलबानो के अम्मी-अब्बू को भी कोई ऐतराज न हुआ। क्योंकि वे जानते ही थे कि आमिर खाने-कमाने की राह पर सधे कदम बढ़ रहा है। उन्होंने इतना जरूर कहा - असद खाँ साहब से भी तो पूछना होगा।

खदीजा ने कहा - मैंने रात ही को उनसे बात की थी। बोले - बच्चे खुश हों तो हमें क्यों ऐतराज हो...? कुछ जगह खिलौने भेजने थे, वर्ना वे भी आते ही।

दोनों परिवारों में निकाह को लेकर तरह-तरह से सोच-विचार होने लगा। कभी खदीजा फोन पर बहन आइशा और होने वाली समधन के साथ कोई सलाह मशविरा करती। कभी सुल्तान मियाँ फोन लगा असद खाँ से कुछ सलाहियत लेते-देते। कभी गुल और आमिर ख्वाब महल में खोये होते। सभी को शुभ मुर्हूत का इंतजार था। छोटी-मोटी तैयारियाँ चल रही थीं।

तभी एक अड़चन पैदा हो गई। हुआ यूँ कि एक दिन खिलौनों के गोडाऊन पर आमिर कुर्सी पर बैठा हिसाब-किताब लिख रहा था और मजदूर खिलौनों के पैकेट उठाउठाकर लोडिंग आॉटो में भर रहे थे। हमेशा की तरह काम ठीक-ठाक चल रहा था। तभी अचानक आमिर अपनी कुर्सी पर फैल-सा गया। दर्द के मारे उसका चेहरा बिलबिलाने लगा। चेहरे पर अजीबो-गरीब डरावनी और जर्द लहरें उबरने-डूबने लगीं। आँखों की पुतलियों की चमक बुझती-सी लगने लगी। वह ऐसे कराहने लगा जैसे कोई उसके गुर्दों को चीर रहा हो। दर्द की बल्लम जैसे कराह की राह में घुप गई हो। नथुनों की साँस खींचने की जैसे ताकत ही चूक गई हो। पेशानी से पसीना इस कदर फूटने लागा, मानो पेशानी में झारे पड़ गए हो।

एक मजदूर ने कंठ फाड़ती हुई आवाज में असद खाँ को पुकारा।

असद खाँ सड़क पार पान की गुमटी से पान खाने गया था। चूँकि सड़क पुरानी दिल्ली की थी और राज मार्ग जितनी चौड़ी न थी, इसलिए मजदूर की आवाज पूरी शिद्दत से असद खाँ के कानों में दाखिल हुई थी। चीखने के बाद मजदूर को लगा - जैसे गले की पतली नली से कोई मोटी-तगड़ी और खुरदरी चीज भीतरी सतहों को उसेड़ती निकली थी, जैसे गले से आवाज का रेशा-रेशा एक बार में ही सोरती हुई ले गई हो और अब कभी जरूरत पड़ी तो क्या करेगा...?

मुँह में पान दबाये असद खाँ ने सड़क पार से देखा - समुद्र से बाहर रेत पर पड़ी मछली-सा आमिर तड़प रहा था। असद खाँ को नहीं पता - 'सड़क पर कीड़े-मकौड़ों की तरह रेंगती वाहनों की कतारों को' कैसे पार की...? एक-दूसरे वाहनों के बीच के छेकों में से बचते-बचाते या हनुमान की तरह छलाँग लगाकर। पान जो उसने मुँह में दबाया था, अब मुँह में नहीं था। उसे नहीं मालूम - मुँह से बाहर गिर गया या फिर थूक के साथ बगैर चबाया ही निगल गया था। असद खाँ के बदन से पसीना यों चूने लगा जैसे उसे बदन चूने का कोई पुराना लाइलाज मर्ज था। पैरों की मौजड़ियाँ यों भीग गई मानो रानों और पिंडलियों पर पसीने की नहीं, पेशाब की रेलें फिसलकर मौजड़ी में समा रही थीं। असद खाँ ने पानी की बोतल उठाई, तो फिसल कर गिर पड़ी। भीतर ही भीतर काँपता-थरथराता कि एक ही आँख है, फूट गई तो... जिंदगी बुझ जाएगी।

फिर भी हिम्मत का दामन न असद खाँ ने और न ही मजदूरों ने छोड़ा। आमिर को लोडिंग रिक्शे में किसी सामान की तरह झटपट डाला और रिक्शे को अस्पताल की ओर ले उड़े। डॉक्टर ने तुरत-फुरत दर्द हरने वाली गोली दी। पिचकारी लगाई। सोनोग्राफी की। पता चला - आमिर की किडनी में एक पत्थर आकार ले बैठा है।

डॉक्टर ने आधा-एक घंटे में दर्द को सुला दिया। आमिर की आँखें ठीक से खुल गई। भीतर पत्थर चुभने का संस्मरण वह असद खाँ को सुनाने लगा। पास ही खड़ा डॉक्टर मुस्कराकर बोला - डोंट वरी... सब ठीक हो जाएगा। स्टोन नाइन प्वाईंट टू...टू... एम एम का ही है।

थोड़ी देर बाद असद खाँ को डॉक्टर ने अपने केबिन में बुलाकर समझाया - स्टोन को निकालने के दो तरीके हैं... एक तो यह कि मिनी आॉपरेशन कर स्टोन को बाहर निकाल दें...। दूसरा यह कि लेजर से स्टोन को क्रस कर पेशाब के रास्ते बाहर निकाल दें...। पहले का खर्चा इतना है... और दूसरे का इतना... अभी का इतना हुआ है...। आप विचार कर लो... जैसा आप चाहेंगे... वैसा ट्रीटमेंट कर देंगे... हम तो बैठे ही आपकी सेवा के लिए हैं।

असद खाँ ने कहा - जी... बहुत-बहुत शुक्रिया जनाब... आप बच्चे की साँस वापस ले आए... मेरा तो दम ही निकल रहा था...। मैं सोच-विचार कर बताता हूँ।

असद खाँ ने घर पहुँचकर अपनी पत्नी खदीजा को आमिर के बारे में बताया... खदीजा की साँस ऊपर-नीचे होने लगी। बोली - हाय अल्लाह... कहाँ है मेरा राम...? कैसा है...? मुझे ले चलो उसके पास... वह तो जैसे जान छोड़ने लगी। हदश के मारे दो बार फारिग होने जाना पड़ा। असद खाँ ने उन्हें पानी और गुलुकोस पिलाया। धैर्य से समझाया... तब कहीं से जान में जान की वापसी हुई।

आस-पड़ोस में बात फैली। लोग आमिर के बारे में पूछने लगे। कुछ पथरी की दवा बताने लगे। किसी ने देशी दवा सुझाई। किसी ने बीयर पिलाने की सलाह दी। रमजान चचा पराठे वाले ने कहा - होम्योपैथिक डॉक्टर को दिखाओ...। वो अपने यहाँ पराठे का नाश्ता करने आते हैं... पथरी को घुला देते हैं...। चाहो तो फोन पर बात कर लो... लो लिखो नंबर...। कहना - रमजान चचा पराठे वाले के यहाँ से बोल रहा हूँ।

असद खाँ ने फोन पर होम्योपैथिक डॉक्टर से बात की। डॉक्टर ने सलाह दी - पथरी में पेट को चीरवाना-फाड़वाना नहीं। न पथरी भीतर तुड़वाना-फुड़वाना। आप तो मरीज की उस अस्पताल से छुट्टी करवा लो... मैं मीठी गोलियों से गला-घुला कर पथरी को पेशाब के रास्ते बाहर निकाल दूँगा। बात, रमजान चचा, असद खाँ और खदीजा को ही नहीं, पूरे आस-पड़ोस को जँच गई।

आमिर का होम्योपैथिक इलाज शुरू हो गया। असद खाँ और खदीजा ने विचार किया - अब जब तक पेट का पत्थर न गले निकाह करना ठीक नहीं। बात गुलबानो के परिजन को भी बता दी। उन्हें भी कोई ऐतराज न लगा। आमिर के घर से करीब दो-तीन सौ मीटर की दूरी पर रमजान चचा की पराठे की दुकान थी और उससे कुछ कदम दूरी पर होम्योपैथिक डॉक्टर का क्लिनीक था। आमिर आठ-पंद्रह दिन में एक बार डॉक्टर से दवा ले लेता। महीने में एक बार सोनोग्राफी करवाकर देखता कि पत्थर कितना घुला-गला। पत्थर चूँकि थोड़ा ढीट किस्म का था... उसकी गलने की गति बहुत कम थी, पर गलना जारी था।

जब आमिर अपनी किडनी में कब्जा जमाये पत्थर को खदेड़ने में लगा था, उन दिनों महान देश का प्रधानमंत्री एक ऐसा तुकांत कवि था, जिसे भाँग का अंटा और गाय का मांस बेहद पसंद था। वह एक ढाँचे को ढहाने के दम पर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचा था। ढाँचे को जिस तरह से ढहाया गया था, उससे कई लोगों के मन में महान देश की धर्मनिरपेक्षता की मूर्ति भी ढह गई थी और उनके मन में इस देश की बुनियाद ढहाने के मंसूबे पनपने लगे थे।

फिर एक दिन अखबारों के पन्ने रंग गए... टी.वी. चैनलों के स्क्रीन पर चीखें सुनाई पड़ने लगीं। सिलसिलेवार बम धमाकों से रायसीना टीले पर खड़ी ईमारत काँप उठी। कवि के भाँग के अंटे की साइज बड़ी हो गई। गाय का मांस बेस्वाद लगने लगा। पुलिस और तमाम तरह के रक्षकों की नींद के खुरपड़े झड़ने लगे थे। वे बेचैन आत्मा की तरह जमीन के नीचे पाताल तक और आसमान से ऊपर अंतरिक्ष तक में आतंकवादियों को खोजने लगे थे। उन्हें खोजा ही जाना था। वे ब्रह्मांड में कहीं छिप नहीं सकते थे। कवि का आदेश तो था ही... पुलिस और तमाम तरह के रक्षकों की इज्जत भी दाँव पर लगी थीं। खोजते-खोजते छः-सात महीने हो गए थे, एक चींटी भी हाथ नहीं लगी थी।

लेकिन इधर आमिर की पथरी काफी गल-घुल कर पेशाब में बह गई थी। फिर से उसके निकाह की बात जोर पकड़ने लगी थी। उन्हीं दिनों समझौता एक्सप्रेस की शुरुआत हुई थी। यह प्रयास भी कवि का ही था। असद खाँ और खदीजा ने सोचा - क्यों न... समझौता एक्सप्रेस से जाकर आमिर अपनी बहन शहनाज को लिवा लाए। शहनाज का निकाह कराँची में किया था। शहनाज का शौहर आमिर के वालिद के मामा का लड़का था।

एक दिन आमिर समझौता एक्सप्रेस में बैठ शहनाज के घर पहुँच गया। उसने एक महीने का वीजा लिया था। सोचा - आपा का ससुराल अच्छे-से घूमेगा। अपने मुल्क से कटा हिस्सा देखेगा...! देखेगा कि शरीर से अलग होकर शरीर का अंग कैसे जीवित रहता है। सच में... वह घुमा भी खूब...। अपने दूल्हा भाई के साथ कराँची, रावलपिंडी, एबटाबाद, इस्लामाबाद और लाहौर की वह जेल... जहाँ भगत सिंह और उनके साथियों को सजा दी गई थी। दूल्हा भाई के साथ घूमते-भटकते एक महीना पता ही नहीं चला, और वापसी का वक्त हो गया। आना भी चाहता था, क्योंकि वापसी के दो माह बाद उसका निकाह था। लेकिन तभी आमिर के भाग्य पर पत्थर पड़ गया। उसे पीलिया हो गया। डॉक्टर ने बीस दिन की दवा और एक महीने का पूरी तरह आराम लेने का सुझाव दिया। ऐसी हालत में शहनाज और दूल्हा भाई ने भी आने नहीं दिया। वीजा अवधि को बढ़ाना पड़ा।

जब ठीक होकर वापस अपने वतन आया। सबसे पहले अपने होम्योपैथिक डॉक्टर के पास गया। पीलिया के बारे में बताया। पथरी की सोनोग्राफी करवाई। डॉक्टर ने कहा - अभी एक-दो माह और दवा चलेगी…। एक-दो माह में पत्थर पूरी तरह गल जाएगा। करीब दो माह बाद की ही उसके निकाह की कोई तारीख तय होनी थी।

इस बीच गुलबानो और आमिर के घर के टेलिफोन बिल कुछ बढ़ गए थे। बढ़ते क्यों नहीं... जब-तब वे फोन पर गुटुर-गूँ किया करते थे। दोस्त-सखी पूछने लगे थे - कहाँ गायब रहते हो... आजकल नजर नहीं आते...?

एक सुबह। अंदाजन करीब ग्यारह-साढ़े ग्यारह का वक्त था, और आमिर जा तो रहा था अपने होम्योपैथिक डॉक्टर के पास दवा लेने। पर उसे लग रहा था वह गुलबानो के पीछे-पीछे चल रहा है। गुलबानो सड़क पर नहीं, आमिर के जहनी बागीचे में टहल रही थी। बागीचे में खड़ी लाल गुलाबों की कतारों को हवा झूलों का झाँसा दे... असल में खुशबू की लूटमार कर रही थी। लूटी हुई खुशबू को दरिया दिली से पूरे शहर में मुफ्त लुटाकर शौहरत हासिल कर रही थी। खुशबू के झोंकों से गुलबानो की कमर जैसी पुरानी दिल्ली की पतली और बलखाती गलियाँ भी अछूती न रह पा रही थीं।

जब नाजुक-नाजुक कदमों से टहलती गुलबानो का पीला सलवार-कमीज लाल गुलाबों की कतारों से रगड़ खाता। गुलाबों की पंखुड़ियाँ झड़कर खुशी-खुशी उसकी जामुनी जूतियों तले बिछ जाती, जैसे उनकी जन्नत वहीं थी। कढ़े हुए लाल, हरे, पीले और सफेद फूलों से भरा जामुनी दुपट्टा फरफरते हुए आमिर के नथुनों, पलकों को छू रहा था।

उस क्षण वह दुनिया की हर खबर से बेखबर चल रहा था। उसे नहीं मालूम था उसे यों चलते हुए कोई देख भी रहा था, या फिर घात लगाकर उसका पीछा ही कर रहा था। इश्क में डूबे हुए... दुनियादारी में डूबे हुए... व्यवस्था के घाघों को कहाँ देख पाते हैं। शायद इसिलिए... दोनों एक दुनिया में होकर भी अलग-अलग दुनिया में होते हैं।

जब कुछ दूर से उसके पीछे-पीछे धीरे-धीरे गुड़कती सफेद जिप्सी उसके बराबरी से आकर रुकी... तब भी उसे कहाँ भान था कि जिप्सी उसके लिए रुकी...? वह तो जामुनी दुपट्टे की फड़फड़ाहट को नथुनों, पलकों पर महसूस करता आगे बढ़ रहा था।

लेकिन जब जिप्सी के रुकने के अंदाज ने उसके ख्याल में खलल डाला..., तब वह चौंक उठा। उसने खुद को सड़क पर पाया। यह भी याद आया कि डॉक्टर के पास दवा लेने जा रहा है। यह शायद उसे ध्यान न रहा कि रमजान चचा की दुकान पार हो गया है या नहीं। उसने इधर-उधर देखा 'वह किस जगह है' यह अनुमान लगाने की कोशिश की। जिप्सी में बैठे हुए अपरिचित शरीर उसे घूरते हुए उतरे और दबोच लिया था। घबराहट ने आवाज का गला घोंट दिया था।

अपरिचित शरीरों ने उसकी पेंट को कमर के पास से हाथ डालकर पकड़ा और जिप्सी में पीछे से पटक लिया था, जैसे सूअर पालने वाले सूअर को उठाकर गाड़ी में पटक लेते हैं। वह क्या करे... चीखे... चिंचियाएँ... कुछ समझ नहीं आ रहा था और जिप्सी अपनी राह फर्राट भाग चली थी।

अपरिचित शरीरों का भी एक परिचय था, पर उस वक्त उन्होंने छुपा रखा था। फिर उन्होंने आमिर के चेहरे को भी एक काली थैली से छुपा दिया था। वह थैली थी कुछ ऐसी... जैसे फाँसी पर चढ़ाए जाने वाले को पहनाई जाती है। जिप्सी में उसे अपरिचित शरीरों ने अपने पैरों तले दबा रखा था। उसके मुँह से लेकर कान तक के हिस्से पर रखा था एक मजबूत पैर और दूसरा गर्दन पर। ...उसका शेष शरीर दबा था बाकी पैरों के नीचे। अपरिचित पैरों के नीचे उसके भीतर दहशत इतनी शिद्दत से उभरी कि उसकी पेशाब मूत्र नली को जख्मी करती हुई बाहर निकली थी - जैसे किडनी के भीतर का पत्थर बगैर गले ही बाहर निकला हो।

आमिर को लगा - यह जिंदगी का आखिरी दिन है। उसकी आँखों के भीतर असद खाँ, खदीजा, शहनाज, दूल्हा भाई और गुलबानों के चेहरे घूमने लगे। लगा - अब किसी से नहीं मिल सकेगा...! शायद अपहरण हो गया है...! पर मेरे अपहरण से किसी को क्या मिलेगा...? मेरे वालदैन के पास फिरौती में देने को क्या है...? शायद अपहरणकर्ता किसी गलतफहमी के शिकार हो गए हैं, वर्ना मुझे क्यों उठाते भला! जब जानेंगे कि मैं मामूली खिलौने वाले की औलाद हूँ... तो शायद छोड़ देंगे। पर वो जाने कब जानेंगे... क्यों न मैं ही बता दूँ...! पर कैसे...? मुँह तो उनके जूतों के नीचे दबा..., जरा-सी सिहरन भी होती है... तो मसल देते हैं।

यह जानते और सोचते हुए भी आमिर ने चीखने की कोशिश की, पर कोशिश चीख सहित जूतों के नीचे ही दबी रह गई। उसकी घीघी कुछ इस तरह बँधी कि लगा अब कभी चीख न सकेगा...! कभी न चीख सकने के खयाल ने उसे फिर से चीखने को उकसाया। बाहर चीख का 'च' भी न निकल सका, पर भीतर चीख इस तरह गूँजी कि कुछ देर तक मस्तिष्क सुन्न पड़ गया।

जल्द ही उसे वहाँ लाया जा चुका था... जहाँ लाने को ही उठाया गया था। न उसे लाने वालों का नाम पता। न उस जगह के बारे में कुछ जानता। न ही मालूम कि क्यों लाया गया था...?

जब थैली से बाहर उसका सिर निकाला गया...। वह भय के दलदल में धँस गया। उसने छोटी-सी जिंदगी में पहली बार देखे थे, ऐसे भद्दे और अमानवीय अपरिचित चेहरों को हँसते हुए। देखा तो नहीं था उसने कभी मक्तल भी, पर खून, गुटके और पान की पीक के छींटों से पटी वह कमरेनुमा जगह, उसे मक्तल-सी ही लग रही थी। छत में एक पंखा लगा और एक पंखा लगने के हुक में सूत की मजबूत लंबी रस्सी बँधी झूलती हुई। एक कोने में तेल पिए हुए पीले-साँवले बेंत के डंडे खड़े हुए। जैसे डंडों की आँखें थीं और उसे घूर रही थीं। होंठ ही नहीं..., भीतर खून-पानी भी सूखता मालूम पड़ने लगा। अपहरणकर्ताओं की आपसी बातचीत से ही आमिर ने जाना - कि वे फिरोती माँगने वाले टुच्चे अपहरणकर्ता नहीं हैं..., बल्कि सरकारी खर्चे पर पलने वाले पुलिस या ऐसे ही किसी रक्षक दल के हैं, जिनके कंधों पर सुरक्षा का भार है।

आमिर ने मन ही मन खुद से पूछा - पर मुझसे किसी को क्या खतरा…?

जवाब में उसके गाल पर पहला झन्नाटेदार रशीद हुआ… और एक रक्षक ने पूछा - क्यों बे... क्या नाम है भेण चो...?

आमिर को अपना नाम याद नहीं आया। लगा - थप्पड़ पड़ने से नाम दिमाग से कहीं बाहर छिटक गया। कुछ देर नाम याद न आने के एवज में दूसरे तरफ ऐन कान पर मुग्दल की तरह एक हाथ और पड़ा...। नसों में बहता खून रास्ता भटक गया। खून का रेला आमिर के कान से बहने लगा। ताजे और गर्म खून का वह पतला-सा रेला यूँ लगने लगा - जैसे रक्षक के हाथ की ताकत का बखान कर रहा हो। फिर यों ही आमिर प्रश्न और मुग्दल की बरसात में भीगता रहा कुछ देर। उसके कान में साँय…साँय… गूँजने लगा।

यह पूछताछ की साधारण प्रक्रिया की शुरुआत थी... जो रात के घिरते-घिरते अति साधारण होती गई। आमिर के मुँह और मल द्वार से एक समान बरताव किया जाने लगा। उसे दोनों ही द्वार से शराब, पेट्रोल और मिर्ची का नाश्ता करवाया गया। लोकतांत्रिक महान देश में पूछताछ का इससे सहज-शालीन तरीका और कोई क्या हो सकता था...! आजादी के तिरसठ सालों में विकसित किया था वह नायाब तरीका। वह अपनत्व और आत्मीयता से इतना लबरेज था कि मुर्दे तो मुर्दे, भूत-पिशाच भी हँस-हँस के सारे राज उगलने लगे…, फिर आमिर तो जीवित इनसान था भला... कैसे न कुबूल करता...? आमिर ने वह सब कुछ सहर्ष कुबूल किया... जो रक्षकों ने चाहा... जो उन्होंने पूछा था। उसने सीखा - अपराध कुबूल करने के लिए अपराध करना जरूरी नहीं होता।

इधर असद और खदीजा को तीन दिन तक तो पता ही नहीं चला कि आमिर बगैर बताए कहाँ चला गया। उन्होंने पहली रात सोचा - गुलबानो के यहाँ पतंग उड़ाने चला गया होगा। गुलबानो और आमिर दोनों को पतंगबाजी का बहुत शौक था। शहनाज के निकाह में काम की व्यस्तता थी, तब भी एक बार दोनों पतंग लेकर छत पर चढ़ गए थे। शायद पतंगबाजी के दौरान ही दोनों की नजरें और फिर धागन उलझी थीं... जो बाद में पूरे समय उलझती-उलझती निकाह की बातचीत तक पहुँची थी।

जब उस रात नौ-साढ़े नौ तक भी आमिर नहीं लौटा तो… असद खाँ ने गुलबानो के वालिद सुल्तान खाँ से फोन पर पूछा। सुल्तान खाँ ने बताया - आमिर यहाँ तो नहीं आया…। और चिंतित स्वर में पूछा - सब खैरियत तो है़…?

अब चिंता ने दोनों ही परिवारों को अपनी आगोश में लेना शुरू कर दिया था। असद खाँ और खदीजा ने खूब सोचा - आमिर कहाँ जा सकता है। कहीं ऐसा तो नहीं, फिर से अचानक पथरी का दर्द उभर आया हो। किसी ने अस्पताल में पहुँचा दिया हो। असद खाँ ने होम्योपैथिक डॉक्टर से, रमजान मियाँ से और जिन-जिन को जानता उनसे पूछा। पर किसी से कोई खबर हाथ न लगी। और कोई नाम भी याद नहीं आ रहा था

जिससे पूछे या जहाँ आमिर बगैर बताए जा सकता था। अड़ोसी-पड़ोसी भी कब तक बैठते पास...! आखिर उन्हें भी तो दाल-रोटी की जुगाड़ में जाना था सुबह। पड़ोसन रमा सिंह देर रात तक बैठी रही और फिर वह भी चली गई थी। थके-हारे असद खाँ और खदीजा परेशानी का दामन थामे बैठे रहे रातभर। एक-दूसरे की सिसकियाँ ही एक-दूसरे को ढाँढ़स देती रही। वह कलमुँही रात जैसे-तैसे कटी। कहने को सुबह हुई पर उसमें भी कुछ नहीं सूझा साफ-साफ। किससे पूछें...? कहाँ खोजें...? दूसरी रात, दूसरा दिन भी ऐसे ही बीते। अखबार आता... तो बेसब्री से हेडिंग पढ़ते। पन्ने पलटते… शायद कोई खबर आमिर का पता दे दे…! पर अखबार भी तभी दे... जब कोई उन्हें दे खबर।

तीसरी रात खदीजा को बुखार ने घेर लिया। नींद में जब-तब मेरा आमिर… मेरा राम... बुदबुदाती चौंक कर उठ बैठती। कहती - उसने दरवाजा खटखटाया। आमिर के अब्बू… दरवाजा खोलो…।

तीसरी सुबह अखबार के पहले पेज पर आमिर की तसवीर देख असद खाँ के पैरों नीचे जैसे जमीन फट पड़ी। वह अखबार उठाने को झुका तो खड़े होने की बजाए धप्प से कूल्हों के बल गिर पड़ा। असद खाँ ने काँपते हाथ, घबराए जी के साथ फटी आँखों से हेड लाइन पढ़ी - सिलसिलेवार बम धमाके करने वाले पुलिस की गिरफ्त में। वह कुछ देर तो हेड लाइन और आमिर की तसवीर में कोई संबंध ही न बना पाया। धमाकों से आमिर का क्या लेना-देना...? फिर इस हेड लाइन के साथ उसकी तसवीर क्यों...?

खदीजा दूध की थैली लेकर लौटी और असद की हालत देखी... तो पाँव में धूजनी भरने लगी। वह असद खाँ के काँधे को पकड़ हिलाती पूछने लगी - क्या छपा है…? राम की कोई खबर है…?

जब असद खाँ ने पूरी खबर पढ़ी... और एक और किसी मोहम्मद फहीम की छपी तसवीर देखी, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वे कैसे खुद को, खदीजा को यकीन दिलाए कि आमिर ने ऐसा किया होगा… या नहीं...?

पर वह क्या करता…? उसके बस में था क्या... जो करता...? जान-पहचान के जिन लोगों को फोन किया…। मदद माँगी। उनका टके-सा जवाब - बीमारी-सिमारी हो तो कुछ मदद कर दें...। आमिर को जब अस्पताल ले जाना पड़ा था, जिससे जो बना मदद की भी थी। पर ऐसे मामले में क्या कर सकते हैं...? ऐसे में तो जो करे, वो भी मरे।

मुहल्ले के लोग आपस में कहते-सुनते - आज कल के बच्चों के मन की कौन जाने...? हो सकता है… आमिर ने किया ही हो...! वो दूसरा लड़का मोहम्मद फहीम… वो तो पाकिस्तानी ही है... शक्ल से ही आतंकवादी लगता है…।

जब आमिर और मोहम्मद फहीम को कोर्ट में पेश किया गया था। उन्हें देखने को उमड़ी भीड़ की आँखों में रोमांच था। जैसे वे आतंकवादी नहीं, सुपर स्टॉर हो। पर भीड़ को निराशा हाथ लगी। क्योंकि उनके चेहरे न आतंकवादी की तरह खौफनाक थे और न सुपर स्टॉर जैसे मनमोहक। वह आम युवकों जैसे चेहरे-मोहरे के ही थे... अब आम चेहरों को देखने में भीड़ को कैसे मजा आता भला...?

हालाँकि प्रकरण की जाँच हो चुकी थी। फिर भी पुलिस ने कुछ दिन का रिमांड माँग लिया। उन दिनों मोबाइल लांच हुआ ही हुआ था, पर अभी आमिर जैसों की हैसियत वालों तक नहीं आया था। आमिर के घर में लैंड लाइन फोन ही था, जिसकी कॉल डिटेल पुलिस ने निकाली ली थी। अब रिमांड के नाम पर उन लोगों के बारे में जानकारी ली जाती, जिनसे फोन पर बात हुई होती। उनकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हैसियत जानी-समझी जाती... चाहे वह रिश्तेदार हो, दोस्त हो या खिलौने वाला कोई ग्राहक। अगर उसकी माली हैसियत अच्छी होती। पुलिस उन्हें अलग-अलग दिन, अलग-अलग वक्त पर बुलाती। कहती - धमाकों में तुमने आमिर की बड़ी मदद की है। लोग घबरा जाते। आमिर को बद्दुआ देते। उन्हें समझ नहीं आता... आमिर उन्हें क्यों फँसाना चाह रहा…?

पुलिस ने सुल्तान खाँ को भी पूछताछ को बुला लिया, क्योंकि सबसे ज्यादा फोन उन्हीं के नंबर से आता था और जाता भी उन्हीं के नंबर पर। पुलिस तो गुलबानो से भी पूछताछ करना चाहती थी, लेकिन सुल्तान खाँ ने जैसे-तैसे दे-दुआ कर इज्जत बचाई थी। गुलबानो के पास कोई चारा न था कि वह आमिर को न कोसे। पुलिस जिस पर भी आमिर के हवाले से मदद का आरोप लगाती। वह बापड़ा पुलिस को ले-देकर अपनी जान की भीख माँगने लगता।

लोगों के मन में आमिर के प्रति नफरत पैदा होने लगी और पुलिस को बड़ी दयालु समझी जाने लगी। लगता - आमिर ने जरूर कुछ किया ही होगा… वर्ना पुलिस की उससे क्या दुश्मनी जो उसे पकड़ा...? वह घुन्ना शातिर तो पहले से ही नजर आता था। बोलता भी कितना कम था। वह मन ही मन जाने क्य-क्या साजिशें रचता रहा होगा था।

रिमांड का वक्त पुरा होने तक पुलिस ने यूँ ही उगाही की थी। फिर आमिर और फहीम को कोर्ट में पेश कर दिया…। पुलिस ने आरोप-पत्र पेश किया। आरोप-पत्र में पुलिस ने दावा किया - आमिर पाकिस्तान लश्करे-तैयबा के शिविर में प्रशिक्षण लेने गया था। पुलिस ने अपनी जाँच में आमिर का पाकिस्तान जाना। वहाँ वीजा अवधि समाप्त होने पर, फिर से बढ़वाना, ताकि प्रशिक्षण लेता रहे... आदि बातों का उल्लेख किया। हालाँकि वीजा अवधि बढ़वाने की वजह पीलिया होना बताई थी। पर सही वजह बता कर कौन वीजा बढ़वाता है...?

जाँच फहीम की भी ऐसे ही सख्त नजरिए से हुई थी। कहने को तो फहीम अपने ताऊ के यहाँ मेहमान आया था। लेकिन जाँच अधिकारी ने ऐसा कुछ नहीं पाया था। अधिकारी के मुताबिक फहीम लश्करे-तैयाबा के खुफिया मिशन पर आया था। खुफिया मिशन को आमिर और फहीम मिलकर अंजाम देने वाले थे। खुफिया मिशन क्या था...? जाँच अधिकारी ने यह जानने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन आतंकी अपने संगठन के प्रति बहुत वफादार होते हैं। कभी संगठन के खिलाफ मुँह नहीं खोलते हैं। उन्होंने भी नहीं खोला था। फिर भी जाँच अधिकारी ने जैसे-तैसे जो कुछ जाना था, उसी के आधार पर चालान पेश किया था। चालान के आधार पर ही कोर्ट ने उन्हें जेल भेज दिया था।

आमिर का घर एक तंग गली में था। वैसे उस एरिया में ज्यादातर गलियाँ तंग ही थी। जैसे वे गलियाँ नहीं राजधानी की नसें हों, उनमें ब्लॉकेज आ जाए तो राजधानी का हार्डफेल होने में भी देर न लगे। मगर राजधानी को मुगालता था कि उसकी धड़कन तो राजमार्ग, जनपथ मार्ग, अकबर रोड और रेसकोर्स रोड जैसे मार्गों की हलचल से चलती है। उस गली में आमिर के परिवार को कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ था। भीड़-भाड़ और अपनत्व से लबरेज थी वह गली। किसी के साथ कुछ भी होता… तो पूरी की पूरी उमड़ पड़ती। आमिर जब बीमार हुआ, सबने मदद की थी। शहनाज के निकाह में पूरे मुहल्ले ने दौड़-भाग की थी।

लेकिन जब से आमिर की तसवीर फ्रंट पेज पर छपी, जैसे असद खाँ और खदीजा को पहचानती नहीं थी गली। फिर गली भी क्या करती...? पुलिस ने जाँच के नाम पर आमिर और उसके परिवार के करीबियों को ऐसा तला था कि गली के आस-पास की कबाब बनाने-बेचने वाले भी शर्मिंदगी से भर गए थे। फिर हालत यह हो गई कि कोई असद खाँ की बगल में खड़ा होने का भी साहस न करता। मन के घर में डर का शंख गूँजता। जाने कब पुलिस धर-दबोचे। अपना लेना न देना, जबरन बाल-बच्चों और रोजी-रोटी से दूर क्यों होना...? लोगों का मानना था कि आतंकवादी का सहयोगी या आतंकवादी कहलाने से अच्छा है भूख के दरिया में डूब मरना।

कुछ ही दिन में न्याय के मंदिर के पट खुले। घंटियाँ बजी। मुकदमा शुरू हुआ। फहीम का तो न यहाँ से और न उसके वतन से कोई समाचार लेने आया, न किसी ने उससे अपना कोई रिश्ता उजागर किया। एक ताऊ ही थे यहाँ, जिन्होंने उसे पहचानने से इनकार कर दिया। पुलिस की जाँच में ताऊ का इनकार बहुत सहायक हुआ।

लेकिन असद खाँ ने अपनी हैसियत के मुताबिक एक वकील किया। आमिर की बेगुनाही साबित करना शेष जीवन का लक्ष्य बनाया। घर और कोर्ट के बीच चक्कर शुरू हुए। कभी पंद्रह दिन में एक बार… कभी महीने में एक बार। परिस्थिति कैसी भी हो...। जेब में रुपया हो न हो...। शबनम की या खुद की तबीयत ठीक हो, न हो। जब तारीख हो… जाना तो होता ही। शुरू-शुरू में खदीजा को भी ले जाता। दोनों करते तो क्या वहाँ... पेशी पर आए बेटे का मुँह देख आते...। वकील को फीस दे आते। वकील जो कहता सुन आते। मन में दिलाशा रखते। अल्लाह सब ठीक करेगा। रोज पाँचों वक्त नमाज में एक ही दुआ करते - अल्लाह आमिर और फहीम की रक्षा करना। उसे कभी यह खयाल ही न आया कि अल्लाह रक्षा करता... तो सलाखों के पीछे जाने ही क्यों देता...?

जब आमिर इस लफड़े में नहीं उलझा था... तब असद खाँ खिलौनों के कारोबार में बहुत उलझा हुआ था। कभी यारी-दोस्ती में, रिश्तेदारी में किसी का निकाह होता... किसी के बच्चे का जन्म दिन होता... किसी का चालीसवाँ होता या बरसी होती। असद खाँ को हर हफ्ते कई निमंत्रण होते थे, पर उसका आना-जाना न हो पाता था। लेकिन जब आमिर कारोबार में हाथ बँटाने लगा था... तो जहाँ जाना बहुत जरूरी होता... वहाँ असद खाँ हो आता था।

जब से कोर्ट का सिलसिला शुरू हुआ... कारोबार में समय नहीं दे पाता। फिर जहाँ खिलौनों की दुकान और गोडाऊन था, वह जगह किराये की थी। आमिर के पकड़े जाने के बाद हुई बदनामी की वजह से दुकान खाली करनी पड़ी। कोई नए सिरे से दुकान या गोडाऊन किराये पर देने को राजी न हुआ। वह कहीं भी जाता, तो दुकान या गोडाऊन का मालिक कहता - मियाँ तुम्हारा क्या भरोसा... जाने कब हमारे गोडाऊन को ही उड़ा दो...।

असद खाँ के पास दूसरा कोई चारा न था सिवा इसके, कि अपने घर में आमिर के कमरे को गोडाऊन बना ले। उसने आमिर के कमरे में ठूस-ठूस कर खिलौने भर दिए। बचे हुए अपनी खटिया के नीचे और घर में जहाँ थोड़ी खाली जगह दिखी वहाँ जमा दिए। नया माल बनवाना बंद कर दिया। कच्चा माल घर की छत पर मोमपप्पड़ से ढक कर रख दिया। महीने दर महीने बीतने लगे। न कहीं से खिलौनों का आर्डर आता, न कोई उस संबंध में बात करता। खुद असद खाँ ने अपनी तरफ से फोन लगा कुछ दुकानदारों से पूछा। कोई इधर-उधर की बात करता और मूल बात को टाल देता। कोई साफगोई से कह देता - खाँ साहब… जिस दिन से अखबार में आपके शहजादे के बारे में पढ़ा...। सच कहूँ… मेरी तो फटती है… कहीं खिलौनों में से बम निकलने लगे तो…!

असद खाँ ने खिलौना बनाने वाले कारीगरों का हिसाब कर दिया। खिलौनों को आधे दाम पर लेने को भी कोई तैयार नहीं हुआ। असद खाँ और खदीजा ने अपनी गली से बाहर आ थोड़ी चौड़ी सड़क किनारे ठेला लगाया। सोचा - तैयार खिलौनों को औने-पौने दाम पर बेच दें, पर खिलौनों को कोई पूछता भी नहीं।

पड़ोसन रमा सिंह ही थी जिसकी दोनों लड़कियाँ - सलोनी और शर्मीली। खदीजा के घर में खिलौनों के लालच में अक्सर आ जाती। खेलती रहती। खदीजा और असद खाँ कुछ नहीं बोलते, बल्कि उन्हें अपने हाथों से खिलौने मुफ्त में दे दिया करते। पर सलोनी और शर्मीली भी कितने खिलौनों से खेलती। अंततः वे खिलौने भी कच्चे माल के पास छत पर रख दिए। साल दर साल मौसम की मार से कच्चा माल और खिलौने नष्ट होते रहे, और नष्ट रही थी उनकी जिंदगी भी खिलौनों की ही तरह धीरे-धीरे।

असल में खदीजा और असद खाँ ने अपने बुरे दिनों की परछाईं को भाँप लिया था। खुद को परिस्थिति और अल्लाह की मर्जी के हवाले छोड़ दिया था। भरोसा था कि अल्लाह एक दिन सब ठीक कर देगा। उसके यहाँ देर है अंधेर नहीं। उसके इस भरोसे की जड़ भावुक आस्था में गड़ी थी। अगर वह जानता होता कि भावुक आस्था समझ को कुंद और आँख को अंधी बना देती है, तो अंधविश्वास की जड़ कभी की हिल गई होती।

समय अपनी चाल चलता रहा और कोर्ट अपनी। दोनों की चाल में कोई साम्य नहीं था। साल दर साल बीतने लगे। मुकदमा चलता रहा। वकील आश्वासन देता... बस... उम्मीद थी जल्दी ही फैसला आ जाएगा। अल्लाह के फज्ल से माथे का कलंक मिट जाएगा... फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा।

आमिर का साथी आरोपी मोहम्मद फहीम उर्दू साहित्य में एम.ए. कर रहा था। आमिर की मुलाकात उससे कराँची में एक जलसे में हुई थी। आमिर पुरानी दिल्ली से है जानकर फहीम खुश हुआ था, क्योंकि पुरानी दिल्ली में तो फहीम के ताऊ का परिवार भी रहता था। उसने कहा था - मैं वहाँ आऊँगा।

आमिर ने कहा था - आओ तो मुझे जरूर फोन करना… मैं तुम्हें अपना घर दिखाऊँगा...। अपने अम्मी-आब्बू से मिलवाऊँगा…। रमजान चचा के यहाँ पराठे खिलाऊँगा... फिर …गुल के घर भी ले चलूँगा…।

पाकिस्तान से वापसी के बाद भी दोनों में फोन पर बातचीत हुआ करती। तब दोनों को कहाँ पता था फोन की कॉल डिटेल निकलेगी और जी का जंजाल बनेगी, और तब फहीम भी दिल्ली में ही होगा।

जिस दिन दिल्ली पहुँचा था, उसके एक दिन पहले ही आमिर को उठाया गया था। कॉल डिटेल के आधार पर फहीम के बारे में पूछा गया था। आमिर से पूछताछ में ही पता चला - फहीम भी दिल्ली आ रहा है…। आमिर ने पुलिस से कहा - फहीम उसका सामान्य दोस्त है... न उसका और न मेरा किसी आतंकी संगठन से कुछ लेना-देना है। फहीम मुझसे मिलने नहीं… अपने रिश्तेदार के यहाँ आ रहा है।

उन दिनों फहीम ने नया-नया मोबाइल खरीदा था। आमिर के पास उसके मोबाइल नंबर थे। पुलिस ने फहीम के मोबाइल पर कॉल किया...। फहीम ने फोन उठाया। आमिर से बात करने को कहा। आमिर ने वह बात की जो पुलिस ने चाही। मसलन उसकी लोकेशन क्या है... कपड़े कैसे पहने है आदि...।

फिर पुलिस ने आमिर से कहा - उसे कहो कि जहाँ खड़ा है वहीं खड़ा रहे… तुम अपने अंकल के साथ लेने पहुँच रहे हो…।

मार के आगे तो भूत भी नाचता है फिर आमिर क्या चीज था। जैसा कहा, वैसा ही उसने बोला - फहीम वहीं खड़ा रहा कुछ देर...। मैं तुझे अपने अंकल के साथ लेने आ रहा हूँ।

पुलिस ने आमिर को जिप्सी में बैठाया और फहीम को लेने चल पड़ी। वह एक कबाब की दुकान के सामने पी.सी.ओ. के पास खड़ा था। जिसे आमिर ने पहचान तो लिया था, पर वह पुलिस के पूछने पर भी चुप था। सोच रहा था - कहीं उस पर भी बम ब्लॉस्ट का आरोप न लगा दे।

पुलिस ने आमिर को आश्वासन दिया था - अगर फहीम से पूछताछ में पता चला कि तू बेगुनाह है... तो तुझे छोड़ देंगे। वह भीतर ही भीतर बुदबुदाया - पुलिस छोड़ भी सकती है... नहीं भी छोड़ सकती। क्या करूँ...? फहीम को पहचानूँ या न पहचानूँ...?

पुलिस ने आमिर की दुविधा को भाँप लिया। फिर पुलिस ने आमिर के पैर के अँगूठे को जूते से दबाया। आमिर के पैर का नाखून पहले ही प्लायर से खींचा जा चुका था। ऐसे में दर्द की कोई सीमा न थी...। उसने तुरंत फहीम की ओर इशारा किया।

पुलिस वाले सादी ड्रेस में ही थे… और हुलिए से पुलिस कम... गुंडे ही ज्यादा लगते थे। आमिर के हाथ को हथकड़ी और जिप्सी की सीट से बाँध रखा था। फिर भी एक आदमी उसके पास रुका और दो उतर कर फहीम को लाने चले गए।

दोनों फहीम के एक-एक बाजू खड़े हो गए। एक ने बताया - आमिर जिप्सी में पीछे बैठा है... उसके पैर में चोट लगी है... इसलिए गाड़ी से नहीं उतरा... चलिए... एक ने उसका बैग ले लिया, जैसे मेहमाननवाजी की जा रही हो। फहीम ने जिप्सी की ओर देखा - जिप्सी पर न नंबर थे और न कुछ ऐसा लिखा था, जिससे वह यह पहचान लेता कि जिप्सी पुलिस की है।

जिप्सी के भीतर से आमिर ने हाथ का इशारा किया। फहीम खुश होता हुआ जिप्सी में चढ़ गया। पीछे से दोनों पुलिस वाले भी चढ़ गए। जिप्सी अपने ठिये की ओर दौड़ने लगी। थोड़ी देर तक तो फहीम को कुछ समझ में न आया... पर दो-चार मिनिट तक जब आमिर कुछ बोला नहीं, और उसका हाथ नीचे हथकड़ी से सीट में बँधा नजर आया… तो फहीम को दाल काली लगी। पर देर हो चुकी थी। अब कुछ न किया जा सकता था। फहीम को समझ में आ गया था कि वह किसी लंबे खेल में फँस गया है। वह निढाल हो गया।

फिर पुलिस ने फहीम की भी जी भरकर खातिरदारी की। जब दोनों मिट्ठू की तरह वही दोहराने लगे, जो पुलिस कहती। और जब दोनों ने कौल दिया कि हर जगह वही-वही दोहराएँगे। तभी पुलिस ने प्रेस को बताया - कि सिलसिलेवार विस्फोटों के आरोपियों को धर-दबोचा है।

यह खबर दिल्ली से कराँची तक पेट्रोल की आग की तरह फैली। कई अखबारों की फ्रंट स्टोरी और कई चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज बनी। चाय-पान की गुमटियों, बीयर बारों, अहातों, थानों, कचहरियों, विधान सभाओं, संसद और बेडरूम तक की गपशप बनी। अब जिसे जो करना हो - आश्चर्य, दुख, घृणा या फख्र करे। पुलिस या देश के रक्षकों को जो करना था... कर चुके थे…। आमिर और फहीम का अब जो भी होगा - न्याय के मंदिर में होगा।

बहरहाल दोनों को जेल की अलग-अलग कोठरी में बंद कर दिया था। दोनों में आपसी संवाद की हर गुंजाइश खत्म थी। जब कोर्ट में पेशी का सिलसिला शुरू हुआ... तो जरूर उन्हें एक गाड़ी से लाया जाता। शुरू-शुरू में गाड़ी में अक्सर एक-दूसरे के बीच कहा-सुनी और झड़प हो जाती। फहीम को लगता - आमिर की वजह से पकड़ा गया। वरना वह तो अपने ताऊ के यहाँ आया था... उसका विस्फोट वगैरह से कोई लेना-देना नहीं था।

आमिर कहता - काश पाकिस्तान न गया होता। तुझसे दोस्ती न हुई होती। फोन पर दुआ-सलाम न हुआ करती... तो शायद न फँसता।

आखिर दोनों आपस में कब तक लड़ते-झगड़ते। समय के साथ धीरे-धीरे दोनों समझ गए कि वे न फँसते तो कोई और फँसते। उनका नाम फिर शाहरुख-सलमान होता। सलीम-जावेद होता या कुछ भी होता। विस्फोट हुए थे तो पुलिस की मजबूरी थी किसी न किसी को आरोपी बनाना। फिर शरीफ इनसान हो तो… आरोप कुबूल कराने में आसानी हो जाती है।

एक कहावत है - थाना और कचहरी का मुँह काला होता है। इसका अर्थ असद खाँ और खदीजा को तब समझ में आने लगा, जब मुकदमे की शुरुआत हुई। सबसे पहले खिलौनों का धंधा चौपट हुआ। फिर दूध, अखबार, इत्र और फोन के खर्चे कम किए। एक-एक कर घर का सामान बिकने लगा। कपड़ों में पैबंद लगने लगे। जूते बेशर्मी से मुँह फाड़ने लगे। अंततः घर भी जाता रहा। घर खरीदने वाला असद खाँ का पुराना परिचित और भला आदमी था। उसने असद खाँ की गुजारिश मान ली कि आमिर के मुकदमें का निर्णय आने तक घर के एक कमरे में रह सकते हैं। एकदम निःशुल्क। असद खाँ को यह बड़ा उपकार लगा। खुदा के आगे रोज पाँच बार झुकने वाले असद खाँ पहली बार इनसान के आगे झुके और आभार माना। मुकदमे का फैसला जो भी हो... फैसला आते ही घर खाली करना था।

असद खाँ को लग रहा था कि जल्दी मुकदमें का कोई हल निकल आएगा। पर साल दर साल सरकते जा रहे थे। हल की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी। वकील की बातें हिम्मत बँधाती, पर केवल बातों के दम पर हिम्मत भी कब तक बँधती। वकील को फीस देने के लाले पड़ने लगे। फिक्र उसका मांस खा और खून पी रही थी। शरीर इतना कमजोर हो गया कि आईने के सामने खड़ा हो जाए तो खुद की शक्ल न पहचाने। एक दिन नहीं मालूम उसकी रगों में खून जम गया, या फिर खून खत्म हो गया। अचानक धड़कन बंद हो गई। खदीजा ने जैसे ही देखा - पूरी गली माथे पर उठा ली। खूब चीखी-चिल्लाई। अपनी छाती पीटी और असद खाँ की छाती पर भी मुक्के मारे। फिर चीखती-चिल्लाते पूरे कमरे में दौड़ती रही। जैसे यमराज का पीछा कर रही हो। पर न असद खाँ की मौत सत्यवान की मौत थी और न खदीजा का विलाप सावित्री का विलाप था, जो यमराज के पंजों से अपने पति की जान छीन लेती। फिर अचानक जैसे खदीजा गूँगी हो गई। वह असद खाँ का सिर गोदी में लेकर बैठी की बैठी ही रह गई।

उसकी चीख सुन कर जो लोग जमा हुए थे, उनके भीतर आदमियों की ही आत्मा थी, इसलिए पसीज उठी थी। लोगों को लगा - खदीजा भी चल बसी है...। लेकिन जब देखा - खदीजा की साँस चल रही है... पर पलकें नहीं झपक रही है… कुछ बोल नहीं रही है। रमा सिंह अनुनय-विनय करने लगी, तो गली वालों को शर्म आ गई, उन्होंने खदीजा को अस्पताल में भर्ती करवाया। असद खाँ को सुपुर्द-ए-खाक किया गया।

खदीजा के धड़ की एक बाजू लकवाग्रस्त हो गई थी। वह जिंदा तो थी पर जिंदगी के कोई मानी नहीं थे। अस्पताल का बिल रमजान चचा ने भरा था। रमजान चचा ने ही आमिर से मुलाकात कर असद खाँ के इंतकाल की और खदीजा की हालत की खबर दी थी। आमिर से मुलाकात की तो दो-तीन बार रमजान चचा को भी थाने बुलाया गया। उनसे भी पूछा कि आमिर से क्या रिश्ता है। लेकिन जब रमजान चचा ने बताया कि बस… एक गली-मुहल्ले के होने के नाते… आदमी का आदमी से जो रिश्ता होता है… वही है, और कोई रिश्ता नहीं है…

रमजान चचा का जवाब सुन एक पुलिस वाले का माथा ठनक उठा - ओय चचा... भेजे की माँ-भेण मत कर…। हमको इनसानियत सिखा रहा…। और वह हाथ से थाने के एक कोने तरफ इशारा करता बोला - जा बैठ उधर… अभी आदमी से आदमी का रिश्ता कहाँ घुस जाता है... बताता हूँ...।

उस दिन दोपहर तक रमजान चचा की दुकान न खुली। वहाँ नियमित नाश्ता और खाना खाने वाले चक्कर काटने लगे। दुकान की चाबी चचा के पास थी... तो नौकर भी बाहर ही खड़े थे। फिर बगल वाले नाई ने बताया कि चचा से सुबह दुआ-सलाम हुई थी। 'थाने जाकर आता हूँ' कहकर गए थे… शायद वहीं से नहीं लौटे। होम्यौपेथिक डॉक्टर और दो-तीन और स्थायी ग्राहक थाने पहुँचे। देखा - रमजान चचा हेडमोहर्रिर के कमरे और हवालात के बीच के गलियारे में आड़े पड़े हैं। डॉक्टर ने थानेदार से बात की। चचा भला आदमी है सबने मिलकर भरोसा बँधाया। चचा की मौखिक जमानत ली। कुछ लेन-देन का व्यवहार हुआ। तब चचा को लेकर दुकान पर आए। चचा ने उस दिन से कान पकड़ा कि कभी आमिर से मुलाकात को नहीं जाएगा।

खदीजा जिंदा थी, पर पल-पल मौत चाहती हुई। बेटा जेल में और पति कब्र में। ऐसे में साँसें भी बोझ थी उस पर। काश लकवा उसके शरीर को अपंग न करता। साँसें ही छीन लेता, या रहम कर चेतना हर लेता। खदीजा के लिए कैद और कब्र से बढ़कर जहन्नुम-सा था अपंग शरीर। खाट पर पड़ी रहती। तलब लगने पर पेशाब-पानी को भी जाना हो… तो कूल्हे घसीटते हुए। भूख-प्यास भी लगती। बदन की साफ-सफाई भी करनी होती। कपड़े धीरे-धीरे चिथड़ों में बदल रहे थे… पर फिर भी धोने तो पड़ते थे। ऐसे बहुत-से काम थे जो खदीजा के बस के नहीं थे। न ही उसके पास कोई आय का जरिया था, कि कोई काम वाली बाई रख लेती। थी तो वही एक नेकदिल पड़ोसन रमा सिंह।

रमा सिंह पचास के आस-पास की विधवा। न दुबली, न मोटी। न साँवली, न गोरी। न वाचाल, न घुन्नी। रमासिंह का पति तो बहुत पहले ही दुर्घटना में चल बसा था। अब उसकी लड़कियाँ - सलोनी और शर्मीली भी जवान हो गई थीं। सलोनी कॉल सेंटर में और शर्मीली एक बार में काम करने भी लगी थी।

रमा सिंह व खदीजा के बीच किस जन्म का और क्या रिश्ता था...? यह तो पुलिस, एन.आई.ए. और सी.बी.आई. जाँच करके ही भेद खोल सकती थी...। पर रमा सिंह अपनी माँ की तरह खदीजा की देखभाल करने लगी थी। खदीजा को भी जैसे रमा सिंह के रूप में शहनाज मिल गई थी। अब रमा सिंह उसी घर में रहने लगी थी, जिसमें खदीजा एक कमरे में रहती थी। खदीजा के कमरे को छोड़, घर का बाकी हिस्सा रमा सिंह ने किराये पर ले लिया था।

खदीजा का मुँह टेढ़ा और आँखें भेंगी हो गई थी लकवे के बाद। आवाज लगभग चली ही गई थी, फिर भी बोलने की कोशिश करती रहती थी। दो-तीन वाक्य बोलने में भी काफी देर लगाती। एक अक्षर, एक शब्द भी टुकड़े-टुकड़े में निकलता। अक्षर और शब्द से ज्यादा लार बहती। ऐसे ही एक दिन खदीजा ने कहा - जि...स...ने घ...र ख...री...दा बड़ा भ...ला आदमी है… अपना कौ...ल नि...भा रहा…, वर...ना ऐसी हा...लत में स...ड़क पर क...हाँ कूल्हे घसी...टती...?

खदीजा इतनी बात भी कभी आठ-पंद्रह दिन में बोलती तो बोलती। ज्यादातर तो उसका काम इशारे से ही चलता। रमा सिंह ने उसके पास एक थाली सदा के लिए छोड़ रखी थी कि कभी रमा सिंह इधर-उधर हो, या रात-बेरात अचानक जरूरत हो तो थाली बजा दे। यों ही एक दिन उसने रमा सिंह को बुलाया। रमा सिंह ने आकर देखा - खदीजा की आँखें गीली थी। मुँह से लार बह रही थी। रमा सिंह ने उसकी आँखें और मुँह पोंछ इशारे से पूछा - कुछ चाहिए। खदीजा ने इनकार में गर्दन हिलाई और कहा - बे...टी तू न होती… तो मेरी गा...र का क्या होता...? अ...ल्लाह करे तेरी बे...टियों को राम और ल...क्ष्मण जैसे शौह...र मिले।

खदीजा की आँखें फिर भर आईं। उसके जहन में आमिर और असद खाँ की यादों का तूफान चल रहा था। बेबसी की आलपीन उसकी नस-नस में चुभ रही थी। वह भीख माँगती-सी लड़खड़ाती और बिखरती आवाज में बोलने लगी - मु…झे…को...ई... गो…ली… दे…दे… अ…ल...ला...ह... क...की ग...गो...द... में… ल…ल...म...बी...नीं...द... सो… ज...जा...ऊँ…।

उस दिन रमा सिंह की जैसे आत्मा की जड़ें हिल गईं थीं। उसकी दोनों लड़कियाँ हमेशा की तरह काम पर गई हुई थीं। घर के बाहर दुपहरी आग में नहा रही थी। रमा सिंह निकल पड़ोसन को बुला लाई। खदीजा को पानी टोया। पंखा चलने के बावजूद एक कपड़े से थोड़ी हवा की। पड़ोसन और रमा सिंह ने हिम्मत बँधाने लगी। पड़ोसन ने कहा - आप परेशान मत हो… अल्लाह सब ठीक करेगा।

रमा सिंह ने कहा - मैं हूँ न...। मैं शहनाज… आप फिक्र मत करो।

कहते ही रमा सिंह को अचानक याद आया कि वह अपना नाम भूल गई। वह कहना चाहती थी कि मुझे शहनाज जैसी ही समझो। लेकिन भावुकता में खुद को शहनाज ही कह उठी। खदीजा का मन कभी-कभी आमिर से मुलाकात का होता। पर जेल जाकर मुलाकात करना या कोर्ट जाकर वकील से मिलने जैसा साहस रमा सिंह नहीं कर सकती थी।

एक तो खदीजा काकी को वैसी हालत में जेल तक ले जाना बड़ा कठिन। फिर पुलिस का भी डर… जाने कब थाने बुला ले। जाने क्या उल्टा-सीधा पूछे...? तुम आमिर को कैसे जानती हो...? फिर रमा सिंह ने एक बार अपनी लड़कियों से बात की, पर लड़कियाँ उसे घर बदलने की सलाह देने लगी, तो रमा सिंह चुप हो गई।

आमिर से मुलाकात पर पुलिस ने रमजान चचा की जो गत की थी, उसके बाद आमिर से मिलने की किसी ने हिम्मत नहीं की थी। जेल में आमिर को तेरह-साढ़े तेरह बरस हो गए थे। उन बरसों में देश और दुनिया में बहुत कुछ बदला। देश के अलग-अलग हिस्सों में कई जगह धमाके भी हुए। बहुत सारे आमिर और फहीम पकड़े गए। लेकिन फिर भी कुछ न रुका।

शहनाज कराँची में ही थी और वहीं रहना था उसे दफ्न होने तक। आमिर की खबर सुनने के बाद उसके शौहर ने साफ लफ्जों में कह दिया था - तुम उस आतंकी के घर कभी जाने का नाम मत लेना। उस परिवार से हमारा कोई लेना-देना नहीं। यही वजह थी कि शहनाज असद खाँ के इंतकाल पर भी न आ सकी।

आमिर को जेल होने और जल्दी छूटने की कोई उम्मीद नजर न आने से, सुल्तान खाँ का धीरज भी चूक गया। आमिर के भरोसे गुलबानो को बिठाए रखना समझदारी न लगी। उन्होंने ताबड़तोड़ लड़का ढूँढ़ना शुरू कर दिया। साल-छ महीने की भाग-दौड़ में मिल भी गया। लड़का सुल्तान खाँ के एक दोस्त का था। सभी को पसंद आया। पुलिस में सब इंस्पेक्टर था। सुल्तान खाँ ने सोचा - पुलिस में है... तो कम से कम उसे पुलिस कभी आतंकवादी कह कर बंद तो न करेगी। उसके पीछे परिवार भी सुकून से रह सकेगा। हालाँकि सुल्तान खाँ ऐसा इसलिए सोच रहे थे, क्योंकि वे शायद नहीं जानते थे कि पुलिस कठपुतली होती है। कठपुतली को नचाने वाली डोर तो लोगों द्वारा चुने हुए किसी कमीने सिंह के हाथ में होती है। पुलिस के नाच का कोरियोग्राफर वही होता है।

खैर... गुलबानो का पुलिस सब इंस्पेक्टर से निकाह कर दिया। गुलबानो साढ़े तेरह साल में चार बच्चों की अम्मी बन गई और पाँचवें की उम्मीद बनी हुई थी। गुलबानो जो कुछ कर सकी, सिवा इसके कि पहले लड़के का नाम आमिर रखा। वह बारह साल का था। गुलबानो सुखी थी और साढ़े तेरह साल पहले के आमिर को भूल चुकी थी।

लेकिन आमिर किसी को नहीं भूला। उसे जेल की कोठरी में सबकी याद बहुत बेचैन करती। वह अकेले में उनसे बातें करता। वह बेचैनी से बचने को जेल से पढ़ाई करने लगा और बी.ए. तक पढ़ भी लिया था।

आमिर के अब्बू के इंतकाल और अम्मी के लकवे के बाद वकील को फीस देने वाला कोई नहीं था। हालाँकि वकील पहले ही असद खाँ से अच्छे-खासे पैसे ऐंठ चुका था। अब जब फीस देने वाला असद खाँ नहीं रहा... तो वकील को शर्म आ गई थी। हो सकता है ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ था। लेकिन हुआ और आगे वकील बगैर फीस के ही केस लड़ता रहा था।

जब-जब फहीम से मुलाकात होती। फहीम तो कभी कुछ नहीं बताता। अपनी तरफ से बोलता भी कम। जैसे उसके जीवन में अब कुछ नहीं बचा है, और वह बस मौत का इंतजार कर रहा है। बड़ा उलझा और घुन्ना स्वभाव था उसका। फिर भी चूँकि आमिर उसी के साथ गाड़ी में पेशी आता-जाता था, तो उससे बात भी करता था। बात ज्यादातर एकतरफा ही होती। आमिर अक्सर उससे कहता - छूटकर गुलबानो से निकाह करूँगा। उसके साथ पतंग उड़ाऊँगा। रामलीला मैदान पर रामलीला दिखाने ले जाऊँगा। अब हमसे मुलाकात को कोई नहीं आता है। बस एक गुलबानो ही है, जो सपनों में रोज चली आती है। कभी नागा नहीं करती।

हम कभी चाँदनी चौक पर जाते हैं, कभी दिल्ली हाट। एक दिन तो जिद करने लगी - मुझे कुतुब मीनार में ऊपर चढ़ना है... उसे बढ़ी मुश्किल से समझाया कि अब उसमें ऊपर न जाने देते। गुलबानो अम्मी को भी बहुत पसंद है। वह अम्मी की अच्छे-से देख-भाल करेगी।

कभी-कभी वह अपने अब्बू के कारोबार को फिर से शुरू करने की सोचता। जेल में खाली बैठे-बैठे उसने कई खिलौने की डिजाइन सोच रखी थी। वे ऐसे खिलौने थे जो बाजार में नहीं आए थे… वह खुद से मन ही मन कहता - मुझे क्या मालूम …मेरे सोचे खिलौने अभी बाजार में आए कि नहीं... हो सकता हो; किसी न किसी ने बना लिए हों... अगर बना लिए होंगे तो मैं फिर नए सोच लूँगा…।

कभी-कभी कुछ सोचता हुआ थोड़ा निराश हो उठता - जाने कब मुक्ति मिलेगी इस बनवास से… चौदह साल तो होने को आए हैं… अम्मी राम, सीता और लक्ष्मण के बनवास का किस्सा सुनाया करती थी। लगता है मेरा फैसला भी पूरे चौदह बरस बाद ही आएगा। मेरी अयोध्या में… मेरी वापसी भी चौदह बरस बाद ही होगी...! मेरे लिए तो मेरा गली-मुहल्ला ही अयोध्या है।

फहीम जब दो-तीन मर्तबा अलग-अलग वक्त पर आमिर के मुँह से राम, लक्ष्मण और अयोध्या का नाम सुन चुका... तो एक दिन उसने पूछा - तुम्हारे अब्बू-अम्मी या दादा… क्या कोई अयोध्यावासी रहे हैं...?

आमिर ने कहा - नहीं...।

- फिर…? तुम राम, लक्ष्मण और अयोध्या क्यों जपते रहते हो...?

- मेरी अम्मी को रामलीला बहुत पसंद थी न… हर साल देखने जाती। वह राम के चरित्र से बहुत प्रभावित थी।

उनके बीच जब भी बातचीत होती... यों ही संक्षिप्त-सी बातचीत हुआ करती थी।

एक रात! आमिर की नींद जेल की मजबूत और ऊँची दीवारों को लाँघ कहीं चली गई थी। आमिर करवट दर करवट बदल रहा था। कोर्ट में उसके और फहीम के अंतिम कथन हो चुके थे। पिछली पेशी के दौरान वकील साहब ने कहा था कि अब फैसला कभी भी आ सकता है। तभी से उसके मन में तरह-तरह के खयाल और ज्यादा तेजी से आने-जाने लगे थे। अगर कोर्ट ने मुझे दोषी ठहरा दिया तो... क्या मेरी अयोध्या मुझे स्वीकार करेगी...? अगर कोर्ट ने मुझे निर्दोष करार दिया… तब भी क्या मेरी अयोध्या की नजर में मैं कभी निर्दोष साबित हो सकूँगा। क्या मैं अपनी गली-मुहल्ले को याद भी हूँगा…? क्या वाकई गुलबानो अभी भी मेरा इंतजार कर रही होगी...? करती तो पिछले लगभग चौदह साल में उसके अब्बू या वह एक बार तो मुलाकात पर आते...?

फहीम के हाल भी कुछ ऐसे ही बेचैनी भरे थे। उसने मन ही मन तय कर लिया था - अगर छूटा तो ताऊजी के यहाँ नहीं जाऊँगा...। अपने वतन जाऊँगा... पर अपने शहर... अपने घर कभी नहीं जाऊँगा। मैं कहाँ जाऊँगा…? वह खुद से पूछता। उसे कुछ समझ में नहीं आता - वह कभी बदला लेने की सोचता... फिर सोचता किससे बदला लूँ....? कैसे बदला लूँ…? मुझे किसी व्यक्ति ने तो नहीं फँसाया...? क्या करूँगा...? कहाँ जाऊँगा...?

क्या किसी आतंकी समूह में शरीक हो जाऊँ...! क्या अल्लाह की राह में शहीद हो जाऊँ...? नहीं...नहीं... मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा... तो फिर क्या करूँगा...? जैसे-जैसे फैसले के दिन करीब आ रहे थे, उसकी बेचैनी बढ़ रही थी… और वह जाने क्या-क्या सोच रहा था।

कभी-कभी सोचते-सोचते वह दुआ करने लगता - मेरे मौला…। मुझे निर्दोष होने से बचाना। मैं आतंकी की छाप लेकर कहीं जाना नहीं चाहता। मैं जीना ही नहीं चाहता। मेरे मौला... महरबानी कर… मुझे मृत्यु दंड दे।

आमिर और फहीम की जिंदगी भी कोई जिंदगी थी...! चौदह-पंद्रह से अट्ठाइस-उंतीस के बीच के जैसी रसीली उम्र जेल में सड़ गई थी। दोनों की दाढ़ियों और सिर के बाल खिचड़ी हो गए। बाकी की उम्र तो बस ताँगे में जुते घोड़े की तरह चाबुक खाते हुए काटनी थी। चौदहवें साल की आखिरी रात दोनों की आँखों में बहती हुई गुजरी। दोनों जेल की अलग-अलग कोठरी में थे, पर दोनों के जहन में एक प्रश्न था - क्या होगा कल कोर्ट में...?

फहीम दुआ कर रहा था - आजीवन कारावास या फिर मृत्यु दंड से कम कुछ न मिले।

आमिर पिछले चौदह साल तो जिंदगी को सँवारने के तरह-तरह के ख्वाब सँजोता रहा था। लेकिन अब लग रहा था - जरूरी थोड़ी कि छूट ही जाएँगे...! हो सकता है, फैसले में कोई ऐसा दंड मिले कि बाकी की उम्र भी जेल ही में कटे...! वकील की बातें छूटने की उम्मीद जरूर बँधा रही थीं, पर बातों का क्या...? फैसला तो जज देने वाला है। चौदह साल तक वही-वही जिरह सुनते हुए। वही-वही आरोप झेलते हुए। उन्हें भी ऐसा यकीन हो गया था कि शायद धमाके उन्हीं ने किए थें।

चौदह साल तक जब-जब भी उन्हें जेल से पेशी ले जाया गया। किसी ने उन्हें फैसले के दिन जितना उदास कभी नहीं देखा। उस दिन दोनों के चेहरे फूल की तरह मुरझाए हुए थे। कोर्ट में जज के सामने जाने से पहले वकील ने हिम्मत बढ़ाने की कोशिश में कहा - फिक्र मत करो... जो भी फैसला होगा... अल्लाह के फज्ल से ठीक ही होगा। दोनों मन ही मन सोचते रहे - पता नहीं, यह हमारी परीक्षा की घड़ी है या अल्लाह की।

फिर अचानक आमिर को याद आया कि पिछली पेशी के दौरान वकील से गुजारिश की थी कि उसकी अम्मी को फैसले की सूचना दे दे। उन्हें कहे कि अल्लाह ने चाह तो मैं जल्द ही उनकी खिदमत में हाजिर हो सकूँगा...।

फिर आमिर ने वकील से पूछा - अम्मी को खबर कर दी थी... कुछ कहा अम्मी ने...?

वकील सोचने लगा क्या कहूँ...? वह कहने लायक कुछ सोच पाता उससे पहले आमिर ने दुबारा पूछ लिया।

वकील ने यों ही कहा - अभी बात करते हैं… पहले कोर्ट का फैसला सुन लें...।

आमिर को अचानक अम्मी की याद की हूक-सी उठ रही थी। उसका जी तुड़ा रहा था। अम्मी को याद करते हुए उसके चेहरे पर हल्की-सी चमक आ गई थी। वह विनम्र लेकिन बेसब्र लहजे में बोला - नहीं... पहले अम्मी की खबर सुनाओ… कोर्ट का फैसला तो जो होना होगा... सो होगा ही। फिर थोड़ा संयम से वह बोला - अम्मी की खबर कोर्ट के फैसले को सहने की ताकत बख्शेगी...।

वकील की जिंदगी में तो ऐसे वाकिए आते-जाते रहते हैं। पर फिर भी जाने क्यों वकील थोड़ झिझक रहा था। आमिर की अम्मी की खबर तो उसके पास थी ही। क्योंकि वकील ने अपने एक जूनियर वकील को भेजा था आमिर के घर। लेकिन वहाँ उसे आमिर की अम्मी नहीं मिली थी। असद खाँ के इंतकाल के बाद जब वकील आया था, तो उसे खदीजा के पास रमा सिंह मिली थी। लेकिन इस बार वह भी न मिली थी। वकील ने दूसरे पड़ोसी से पूछा। तब पता चला कि रमा सिंह ने खदीजा की आखिरी समय तक सेवा की थी। करीब महीने भर पहले खदीजा काकी आ…मि…र…आ… मि…र… मे…रा... रा…म… मे…रा... रा…म करते चल बसी।

- और... वे… क्या नाम उनका… वकील ने याद करते हुए पूछा… रमा सिंह…?

- उसके साथ तो मालिक ने अच्छा न किया… पड़ोसी बोला - वह कहाँ गई किसी को कुछ न बता गई। सुना उसकी लड़की शर्मीली...

बोलते हुए पड़ोसी का गला रुँध गया। उसे याद आया - अल्लाह ने मुझे भी दो बेटी दी है…। वह खुद को सँभालता हुआ बोला - अकबर रोड किनारे पड़ी मिली थी शर्मीली...। एकदम निर्वस्त्र, कटी-फटी, लूटी और नोची हुई। उसके बाद रमा सिंह अपनी दूसरी लड़की के साथ कहाँ गई… कुछ पता नहीं...!

जूनियर वकील ने दोनों खबरें अपने सीनियर को हूबहू बता दी थी।

आमिर के बार-बार पूछने पर वकील और टाल न सका और उसे कहना पड़ा - आपकी अम्मी पर अल्लाह ने बहुत मेहरबानी की, उन्हें जहालत भरी जिंदगी से मुक्त कर जन्नत में सुकून की नींद बख्शी।

आमिर के शरीर का तो जैसे खून ही ठंडा पड़ गया। पुलिस और फहीम उसके बाजू न पकड़ते तो वह गिर पड़ता। उसे कोर्ट के कटघरे तक ऐसे ही पकड़े-पकड़े ले गए।

वकील भीतर ही भीतर शर्मिंदगी महसूस कर रहा था। उसे लग रहा था - इंतकाल की खबर देकर गलती की। वह इतना अनुभवी होकर भी यह गलती कैसे कर बैठा...? अभी तो कोर्ट का फैसला भी बाकी है। जाने किस करवट बैठेगा न्याय का ऊँट...? जब फहीम और आमिर को कटघेरे में खड़े कर दिए, तब जज अपना फैसला पढ़ने लगा। आमिर को लग रहा था कि वह मृत्यु शय्या पर लेटा है। कोई मृत्यु के वक्त पढ़े जाने वाला कलमा पढ़ रहा है।

यह बहुत महत्वपूर्ण फैसला था। कोर्ट में जज के सामने बैठे कई वकील फैसला ध्यान से सुन रहे थे। कटघरे की तरफ किसी का ध्यान नहीं था। फहीम भी फैसले को ध्यान से सुन रहा था। आमिर का वकील मन ही मन यह भाँप कर खुश हो रहा था कि फैसला आमिर के पक्ष में जा रहा है।

लेकिन आमिर मानो अपने भीतर के सुनसान बीहड़ में रास्ता भटक गया था, जिससे बाहर आने की इच्छा का कोई रंग उसके चेहरे पर नहीं था। चेहरा मानो सिर्फ एक शून्य था। हालाँकि बाहर जैसा दिख रहा था वह भीतर वैसा बिल्कुल नहीं था। भीतर चौदह साल और एक दिन लंबी कैद की यादों की आरियाँ चल रही थीं। पुलिस के लगाए आरोप ने मुझसे अब्बू, अम्मी और गुलबानो छीन लिए... क्या वे मेरी जिंदगी में फिर से लौट सकते हैं...? क्या मैं वहीं से जिंदगी की शुरुआत कर सकूँगा, जहाँ रोक दी गई थी...? अगर मुझसे खोया कुछ भी वापस नहीं हो सकता, तो मुझे ऐसे न्याय से घृणा है। आमिर के भीतर ऐसा ही कोई अंधड़ रपाटे मार रहा था।

फहीम के भी हाल आमिर से जुदा नहीं थे। जैसे वे खुद से कह रहे हो - सजा तो हम काट चुके हैं। जो धमाके हमने नहीं किए उनमें हमारे परिवार और हमारी जिंदगी के चौदह साल और एक दिन मारे जा चुके हैं। फिर जैसे उन्होंने भीतर ही भीतर एक साथ जोर से चीखते हुए कहा - हमें नहीं चाहिए, नहीं चाहिए हमें - अन्याय से भी क्रूर न्याय।

फहीम मौन खड़ा था। उसके चेहरे पर डरावनी विरानगी थी। शायद भीतर अभी चल रहा हो - माथे पर दाग लेकर कहाँ जाऊँगा...?

अब तक जज पूरा निर्णय पढ़ चुका। आमिर और फहीम निर्दोष करार दिए जा चुके थे। उनका वकील केस जीतने की खुशी में भीतर ही भीतर उछल पड़ा। यह उसके करियर की एक बड़ी उपलब्धि थी। वह तेजी से कटघरे के नजदीक गया। कटघरे की लकड़ी पर रखे आमिर के हाथ पर हाथ रखा। आमिर के हाथ की ठंडक ने वकील के भीतर बर्फ-सी जमा दी। पैरों के नीचे की जमीन जैसे बर्फीले दलदल में बदल गई। उसने उस दलदल में धँसते हुए ही देखा - आमिर के चेहरे पर महीन-सी चमक है।

- कैसी चमक है यह...?

वकील को कहाँ पता था कि आमिर के भीतर क्या कुछ गुजर चुकी थी - उसके चेहरे पर आँधी-तूफान की तरह कई रंग आ-जा चुके थे। फिर यकायक आमिर की गर्दन एक बाजू यों लटक गई जैसे गरदन की हड्डी टूट गई थी। वह अदालत के कटघरे से ऐसे टिक गया जैसे गोड़ से कटा कोई पेड़ दीवार से टिका हो। वह यों शांत चित्त था जैसे महसूस कर रहा हो - साँस की धागन का टूटना। जिंदगी के पिंजरे से मुक्त होने को फड़फड़ाती किसी गौरय्या की फड़फड़ाहट। उसके ललाट पर जो चमक थी, वह कोर्ट में जीत की नहीं, बल्कि मगरूरी और अन्याय के दलदल में डूबती दुनिया से मुक्ति की थी शायद।

यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। तिरसठ बरसों से धमाकों और न्याय का यह सिलसिला जारी है। न्याय का दायरा बढ़ रहा है दिन-रात। न्याय के मारे नदी में बहता पानी लाल। मिट्टी, फसल, घास-पेड़ पौधे और जंगल लाल। लाल...लाल…लाल… फैलता ही जा रहा धरती पर लाल... लाल।


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हिंदी समय में सत्यनारायण पटेल की रचनाएँ