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कहानी

ठग
सत्यनारायण पटेल


दो ठग थे। दोनों के गाँव अलग-अलग थे। लेकिन दोनों के गाँव के करीब एक कस्बा था। जहाँ हर सप्ताह हाट लगता था। दोनों को अपनी जरूरतों का सामान लेने भी और अपनी ठग विद्या का इस्तेमाल करने भी उस हाट में आना पड़ता था। उस समय के हाट आज के बाजार, मॉल और मेलों से अलग हुआ करते थे। लेकिन सदा ही हाट में लोग अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए ही आते-जाते रहे हैं। जरूरतों-जरूरतों में फर्क तब भी था और अब भी है और आगे भी रहेगा ही।

एक बार दोनों ठग अपने-अपने गाँव से कस्बे में लगने वाले हाट के लिए निकले। दोनों के सिर पर भरी हुई एक-एक बोरी थी। दोनों को अपनी बोरी का सामान दे कर दूसरा सामान लाना था। गर्मी का मौसम था। पैदल चलते-चलते दोनों के शरीर से पसीने के रूप में बहुत सारा पानी बह चुका था। दोनों को जोर की प्यास लगी रही थी। लेकिन हाट से पहले कहीं प्याऊ या कुआँ-बावड़ी मिलने की उम्मीद नहीं थी। फिर कुछ देर में दोनों कस्बे के हाट के करीब पहुँचे। हाट की शुरुआत में ही घना छायादार पेड़ था। जिसके नीचे कोल्ड्रिंक शॉप नहीं, एक बुढ़िया का प्याऊ था। दोनों ठगों की नजर प्याऊ पर पड़ी। प्याऊ को देख प्यास थोड़ी और बढ़ गई। दोनों ने अपने-अपने सिर पर रखी बोरी को एक साथ पेड़ की छाँव में पटका और पानी के मटकों की तरफ बढ़े। वहीं दोनों की कुछ क्षण के लिए आँखें मिली। दोनों ने मन भर कर पानी पिया। मुँह पर पानी के छींटे मारे। मुँह को गमछे से पोंछा। अपनी-अपनी बोरी की तरफ पलटे। और चूँकि तब वहाँ बैठने को बैंच, मूढ़ा और स्टूल जैसी कोई चीज नहीं थी, सो जमीन पर ही बैठ गए। और चूँकि तब उन्होंने किसी महँगे ब्रांड के कपड़े नहीं पहने थे, इसलिए धूल लगने की भी चिंता-फिकर न थी।

हालाँकि पेड़ के नीचे दोनों ठगों की मुलाकात इत्तेफाकन ही थी। आज की तरह कोई ग्लोबल इन्वेस्टर मीट नहीं बुलाई गई थी। उनकी शक्लें वालमॉर्ट, बिल गेट्स, अंबानी, टाटा, बिरला में से किसी से भी मिलती-जुलती नहीं थीं। उनकी मुस्कान भी मनमोहिनी नहीं थीं। वे एकदम साधारण आदमी जैसे आदमी दिखते थे। और जानते थे - पैसा पेड़ पर नहीं लगता है... पैसे के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। किसान जमीन गिरवी रखता है। औरत शरीर बेच देती है। राजा... देश और रियाया को दाँव पर लगा देता है। अमेरिका शृखंलाबद्ध युद्ध करने के लिए मजबूर होता है। उन दोनों को भी कुछ न कुछ करना ही था।

जब एक बार फिर दोनों की आँखें मिली। तो दुआ-सलाम हुई। किस गाँव से आए हैं, बात हुई। पहले ने अपनी फतवी की जेब से चिलम, तमाकू और स्यापी निकाली। दूसरे ने अपनी कमर में बँधे गमछे में से दो चकमक पत्थर और जरा-सा कपास निकाला। पहले ने चिलम में तमाकू भरी। चिलम के निचले हिस्से के आस-पास स्यापी लपेटी और चिलम को मुँह से लगाई। दूसरे ने चकमक पत्थर से कपास को सुलगाया। चिलम पर रखा। दोनों बारी-बारी से चिलम के कश खिंचने लगे। धुआँ उगलते हुए पहले ने पूछा - बोरी में क्या है भैय्या...?

दूसरे ने चिलम पहले की ओर बढ़ाते हुए कहा - कौड़ियाँ हैं भैय्या...।

पहला फिर धुआँ उगलता और मुस्कराता बोला - अरे वाह... कौड़ियों की तो मुझे तलाश थी भैय्या... खूब मुलाकात हुई आप से भी... उम्मीद ही नहीं थी कि हॉट में इतनी जल्दी अपने काम की चीज मील जाएगी।

दूसरे ने शांत भाव से पहले से पूछा- आप की बोरी में क्या है भैय्या…?

- मोती है...। पहले ने तपाक से कहा।

दूसरा हँसता हुआ बोला- कौड़ी और मोती तो एक ही मौल है...।

- हाँ भैय्या... पहले ने कहा- बात तो आपकी सोलह आना सही है...।

- तो क्यों न अपन आपस में अपनी-अपनी थैलियाँ बदल लें… दूसरे ने कहा - क्योंकि मुझे मोतियों की ही तलाश थी।

- अरे भैय्या... आपने मेरे मुँह की बात छीन ली...। पहले ने कहा।

दोनों ने एक दूसरे की बोरी उठाई। मन ही मन मुस्कराते। दुआ-सलाम करते अपने-अपने गाँव की ओर चल पड़े। दोनों ने मन ही मन सोचा - आज तो बहुत जल्दी काम बन गया। मन ही मन दोनों को अपनी-अपनी ठग विद्या पर थोड़ा-थोड़ा गुमान भी हुआ। दोनों अपने-अपने घर पहुँचे। पहले पानी-वानी पिया। फिर खाट पर लेट कमर सीधी की और फिर प्रफुल्लित मन से बोरी का मुँह खोलने लगे।

पहला बोरी का मुँह खोलते हुए बुदबुदा रहा था - चलो… आज रेती के बदले मोती ठग लाया हूँ।

दूसरा बुदबुदा रहा था - आज तो काँकरों के बदले कौड़ी ठग लाया हूँ।

लेकिन जब बोरी के मुँह खुले तो पहले ने देखा काँकरें हैं। दूसरे ने देखा… रेती है। और दोनों ठगे-से महसूस करने लगे। फिर दोनों ठहाका मार कर हँसे। ठग से मिलाया ठग को… वाह रे हाट। दोनों को अपने ठगाने पर मलाल नहीं हुआ। दोनों ने अपनी-अपनी खाट पर लेटे-लेटे लगभग एक साथ एक ही बात सोची - जो ठग को ले ठग… वह बहुत कुशल ठग। हम दोनों ने एक दूसरे को ठगा… अगर हम दोनों एक हो जाएँ तो… ठग लें जग। फिर तो जमीन पर दौड़े अपनी गाड़ी और आसमान में उड़े चील गाड़ी।

दोनों एक-दूसरे से मिलने को बेसब्र। कठिनाई से कटा सप्ताह का एक-एक दिन। हाट के दिन पूरी राह चले तेज-तेज कदम। पहुँचे उसी पेड़ के नीचे, जिसके नीचे था प्याऊ। दोनों एक साथ बोले - वाह गुरू… खूब बनाया आपने हमको...।

फिर दोनों एक साथ खिलखिला उठे ऐसे, पेड़ से उड़े असंख्य पक्षी एक साथ जैसे। हाथ पर हाथ ठोकते पहला बोला - गुरू… मिल कर काम करते हैं... खूब जमेगी जोड़ी...।

दूसरे ने भी हँस कर कहा - छीन ली भैय्या मुँह की बात... अब अपना ही होगा सब कुछ… क्या मोती और क्या कौड़ी...? फिर कुछ सोचते हुए पूछा - पर भाई बताओ तो जरा… कहाँ से करें शुरुआत...?

पहला बेफिक्री से बोला - मेरी नजर में है एक बुढ़िया। यहाँ से कुछ दूर है उसका गाँव। सुना है मैंने उसके बारे में कि बहुत मालदार है वह। सोने-चाँदी के बर्तन है उसके घर में। मोहरे रखने को घर में बनाया है तलघर। अगर ठग लें उसको। फिर जिंदगी भर की चिंता किसको।

दूसरा बेसब्री से बोला - बस…बस... और मत ललचाओ... बताओ चलना है किधर से…।

पहले ने कहा खुशी से - उगता है सूरज जिधर से...।

दोनों ठग। चले भरते डग। सूरज के ढलते-ढलते पहुँचे बुढ़िया के द्वार। द्वार पर की खट-खट और लगाई पुकार। बुढ़िया ने ही खोले झट-पट द्वार के पट। पर पहचानी नहीं वह दोनों ठग को।

लेकिन ठगों की आँखें रह गई ठगी की ठगी। जब उन्होंने देखा - बुढ़िया के गले में मोती और सोने की गलसणी। कानों में सोने की टोंटी। माथे पर बालों में सोने का बोर। बाजू में बाजूबंद। कमर में कमर बंद। पैरों में चाँदी की कड़ियाँ और बदन पर कई छोटे-मोटे जेवर लटालूम।

बुढ़िया ने पूछा - कौन हो तुम... और ऐसे देख रहे हो क्या...?

तब पहला बात बनाता बोला - अरे बुआ…। हमने तो तुझे पहली बार देखा… तो हमारी आँखें फटी की फटी रह गई। क्या तो तेरे ठाट-बाट और क्या तेरा रुतबा… हमने देखते ही पहचान लिया… तू ही है हमारी बुआ।

- हाँ बुआ... और तू तो हमें पहचान ही नहीं रही...। दूसरा भी बात बनाता बोला - भूल गई तेरा एक भाई था…। तू तो कमाने और धन जोड़ने में ऐसी लगी कि अपने माइके को ही भूल गई। अपने भाई और भतीजों को भूल गई।

बुढ़िया को मन ही मन थोड़ा पछतावा हुआ कि वह अपने भतीजों को नहीं पहचानी। भतीजे सही कह रहे हैं। पति के जाने के बाद मैं उसके काम-काज और धन-दौलत को सँभालने में ऐसी रमी कि पैंतीस-चालीस बरस हो गए और माइके ही नहीं गई। बुढ़िया ने भाव विह्वल होते हुए कहा - अरे मेरे भतीजों... आओ... आओ भीतर आओ...। कैसा है मेरा भाई...? कैसी है मेरी भाभी...? अब तो तुम भी बड़े-बड़े हो गए... तुम्हारे भी छोरे-छोरी होंगे...?

पहले ने अपना नाम बताया - मन...!

दूसरे ने बताया - मोहन...!

फिर मन बोला - बुआ… अब माँ और पिताजी तो रहे नहीं...।

दूसरा मोहन बोला - लेकिन जब पिताजी की साँस की डोर टूट रही थी… उन्होंने कहा था - बेटे मन और मोहन… फलाँ गाँव में एक तुम्हारी बुआ है। वह तो मुझे भूल गई हैं... पर तुम उसे मत भूलना। जब अपने बच्चों की शादी करो… तो तुम्हारी बुआ को जरूर-जरूर लेने जाना।

मन भावुक होता बोला - हाँ...बुआ... अब तू मना मत करना... तुझे तेरे भतीजों के बच्चों की शादी में आशीर्वाद देने चलना ही पड़ेगा।

फिर इधर-उधर देखता और बुआ की कलाई में सोने के कड़ों को सहलाता मन आगे बोला - बुआ... मेरी माँ यानी तुम्हारी भाभी ने कहा था कि हमारा एक भाई भी है… वह कहाँ है बुआ... दिखाई नहीं दे रहा…।

मोहन ने भी भाई के प्रति मोह दिखाते हुए पूछा - हाँ... बुआ... हमे आए इत्ती देर हो गई... और हमारा भाई अभी तक हमें दिखा ही नहीं… कहीं ऐसा तो नहीं... कि उसे हमारा आना पसंद नहीं आया हो…। या कहीं परगाम गया है...।

-अरे… नहीं... नहीं बेटा ऐसी कोई बात नहीं...। तुम तो आराम से बैठो-लेटो। जरा कमर सीधी कर लो। थक गए होंगे। बुढ़िया ने प्यार भरे स्वर में कहा था और बोली- वह आता ही होगा… गाँव में ही है...। मैंने खबर भिजवा दी है।

बुढ़िया की बात खत्म होते-होते तो उसका लड़का आ भी गया। बुढ़िया ने उसे देखते ही कहा - अरे बेटा होशियार… कहाँ चला गया था… देख तो… तेरे मामा के छोरे... तेरे भाई आए हैं। तुझे याद कर रहे हैं।

होशियार ने अपने भाइयों को देखा। बारी-बारी से उनके गले मिला और अपने भाइयों से मिल कर बहुत खुश हुआ।

ठगों ने बुढ़िया के बारे में समस्त जानकारी पहले ही जुटा ली थी। मसलन - कहाँ माइका है...! कौन भाई है...! कबसे माइके नहीं गई है...! बुढ़िया का एक लड़का है। आदि...आदि…। अब तक वे उसी जानकारी के आधार पर अपने मकसद में ठीक-ठीक सफल भी हो रहे थे। बुढ़िया के घर में मजे से आराम फरमा रहे थे। बुढ़िया ने उनके लिए बढ़िया पकवान बनाए। होशियार ने उन्हें खूब पकवान परोसे। दोनों ने छक कर खाए। रात भर तान कर सोए।

सुबह पक्षियों की कलरव के साथ ही जाग गए। लोटा ले... दिशा फारिग हो आए। गमछा लेकर तीनों नहाने को बावड़ी तरफ चले, तो बुढ़िया ने होशियार को घर में बुलाया। सोने की कटोरी में सरसों का तेल देती बोली - ले बेटा... अपने भाइयों की नहाने से पहले मालिश करवा देना।

होशियार ने कटोरी ली और फिर भाइयों के साथ चलने लगा। तीनों बावड़ी पर पहुँच गए। मन और मोहन ने आँखों ही आँखों में इशारे से बात की कि होशियार को थोड़ी देर अपने से अलग भेजा जाए।

मन को पहले तरकीब सूझी और होशियार से बोला - भैय्या ऐसा करो... कि यह तेल की बाटकी तो मुझे दे दो… हम एक-दूसरे की मालिश करते हैं... तब तक तुम मुझे नीम की एक टहनी तोड़ कर ला दो… दाँत भी तो साफ करने हैं अभी...।

मोहन ने देखा कि नीम का पेड़ तो पास ही है। डालियाँ भी ज्यादा ऊँचाई पर नहीं है। होशियार झट जाएगा। एक पतली टहनी चट-से तोड़ेगा और पट-से वापस आ जाएगा। होशियार जाने लगा तो मोहन ने कहा - भैय्या... दाँत तो मैं भी साफ करूँगा, पर मुझे नीम बहुत कड़वा लगता है। मेरे लिए तो बबूल की टहनी लाना।

होशियार नीम और बबूल की टहनी लाने चल पड़ा। वह नाम से ही नहीं अक्ल से भी था होशियार। बबूल थोड़ा दूर दिख रहा था, इसलिए वह पहले सीधा बबूल के पास गया। एक पतली टहनी तोड़ी। जाते में होशियार की पीठ मन और मोहन की तरफ थी। वे दोनों बावड़ी पर क्या कर रहे हैं..., होशियार नहीं देख सका था। पर उसे अंदाज था कि कुछ देर तो एक-दूसरे की मालिश करेंगे ही। मन और मोहन ने कुछ देर मालिश की भी। तब तक होशियार बबूल की टहनी तोड़ पलट चुका था। अब वह नीम की तरफ बढ़ रहा था और कनखियों से मोहन और मन को भी देख रहा था।

सोने की कटोरी अच्छी बड़ी थी और उसमें बहुत सारा तेल था, जो जल्दी खत्म नहीं होना था। कुछ तेल मन ने फटाफट अपने बदन पर चुपड़ा। कुछ तेल मोहन ने चुपड़ा। बाकी तेल को गारे में ढोला और कटोरी को एक जगह चिन्हित कर जमीन में छुपा दी।

होशियार टहनियाँ लेकर वापस लौटा तो मोहन ने कहा - अरे भैय्या…क्या बताएँ यार... तुम्हारे इधर के कागले (कव्वे) बहुत बदमाश हैं।

मन ने कहा - हाँ... देखो तो... मैं मोहन की पीठ पर तेल मल रहा था… तब तक तो कागला (कव्वा) उधर दूर बैठा कुछ खोतर रहा था...।

मोहन ने मन की बात काटते हुए बात को आगे बढ़ाई - और जैसे ही मैं मन की पीठ पर तेल मलने लगा… हम थोड़े इधर-उधर की बातों में भी लग गए... कि जाकर छोरों के ब्याह की क्या-क्या तैयारियाँ करनी है… तब तक पलट कर देखा... तो कागला चोंच में कटोरी दबाए... वो दूर... ठेठ बादलों में उड़ता नजर आया।

मन ने कहा - क्या बताएँ भैय्या...? हम देख कर दंग रह गए…!

होशियार हकीकत से वाकिफ तो था, पर अनभिज्ञता जाहिर करता बोला - कोई बात नहीं भैय्या…। कागले ने आपको तो कुछ नहीं किया न...? एक बार तो एक कागला एक आदमी की आँख लेकर उड़ गया था। एक बाटकी का क्या माजना भैय्या…। बाटकी की कोई कमी भी नहीं घर में...। आप कुशल है, ये अच्छी बात है।

होशियार की बात सुन मन और मोहन की पगथली से सिर तक एक झुरझुरी दौड़ गई। दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देख इशारे में ही बात की कि अच्छा हुआ कोई कागला नहीं आया... वरना लेने के देने पड़ जाते।

फिर दोनों ने झटपट दाँत साफ किए। तीनों नहाए-धोए और वापस घर की ओर चल पड़े। घर पहुँचे तो बुढ़िया उनका इंतजार ही कर रही थी। बुढ़िया को देखते ही मन ने कहा - अरे बुआ… तेरे गाँव के कागले बहुत ऐबले… तेल की कटोरी लेकर उड़ गए...।

बुआ को सोने की कटोरी जाने का दुख तो हुआ। बुआ ने बड़ी मेहनत से दौलत कमाई थी और बड़े जतन से अपने पति की दौलत अवेरी थी। वह बुदबुदा कर खुद ही से बोली - मेरी ही गलती थी... सोने की कटोरी में तेल नी देना था। पीतल की में देती तो ठीक रहता। पर मैंने भी... जो हाथ में आ गई… उसी में तेल दे दिया। लेकिन दूसरे क्षण हँसते हुए बोली - अगा ले गया... तो ले गया…।

फिर तीनों से बोली - चलो... आसन बिछा कर फटाफट बैठो… मैंने खुद अपने हाथों से तुम्हारे लिए पकवान बनाए हैं… अभी गरम-गरम है… अच्छे-से पेट भर के जीम लो।

मोहन ने बुढ़िया से कहा - बुआ... तू परोसने के चक्कर में मत पड़े… हम तो तीने अपने हाथ से ले कर जीम लेंगे... तू तो अच्छे-से तैयार हो जा... अभी ठंडे-ठंडे ही निकल चलेंगे... तभी साँझ तक घर पहुँचेंगे…।

- ठीक है... तुम जीमो... मैं तैयार होती हूँ। कहती हुई बुआ अंदर जाने लगी।

मोहन ने कहा - बुआ… बहुत बरस बाद अपने माइके चल रही है... ऐसा श्रृंगार करना कि देखने वाले देख कर दाँतों तले उँगली दबा लें...। कहें - ये है - मन और मोहन की बुआ...।

मन ने कहा - हाँ... बुआ... कोई बार-बार तेरे भतीजे के छोरों का ब्याह नी होगा…। सब खाँत हेड़ (इच्छा पूरी करना) लेना…।

बुआ ने कहा - अरे तुम तो जीमो... फिकर मत करो... मैं भी आज सारी खाँत पूरी कर लूँगी।

तभी होशियार बोला - अरे माँ… अब बुढ़ापे में तू भी… इस चमड़ी झुलसाती गर्मी में… तू कहाँ जाएगी। तू तो घर में ही मजे से पालने में बैठ... मैं नौकरों से कह दूँगा कि पंखों से हवा करते रहें।

बुआ के चलने की तैयारी से मन और मोहन के चेहरे पर जो खुशी आई थी, कुम्हला गई। मुँह में पकवान का निवाल बेस्वाद हो गया। मोहन मन ही मन बुदबुदाया - लगता है ये दाँव नी लगने देगा।

मन और मोहन की तरफ देखे बगैर होशियार आगे बोला - माँ… अब नाते-रिश्तेदारी में आने-जाने के मेरे दिन है। मैं भी तो जरा अपना ननिहाल देख आऊँ। अपनी भौजाइयों और भतीजों से मिल आऊँ। थोड़े दिन वहाँ रहूँगा तो भतीजे मुझे काका...काका पुकारेंगे। मुझे अच्छा लगेगा। यहाँ तो कोई काका पुकारता ही नहीं। इसलिए माँ… तू रहने दे... मैं ही हो आता हूँ।

माँ को अपने बेटे होशियार की बात जँच गई। वह बोली - हाँ… बेटा बात तो तू सही कह रहा। मैं अब जाके भी क्या कर लूँगी... आज हूँ कल नहीं। तू जा। वहाँ गाँव-गाँव से मेहमान आएँगे... तुझे देखेंगे। हो सकता है किसी को तू पसंद आ जाए। कोई तेरी सगाई-शादी का रिश्ता ले आए। फिर आगे रिश्ता-नाता सब निभाना भी तुझे ही है। अच्छा है... तू ही जा।

मोहन ने बुआ की बात काटते हुए कहा - भैय्या बुआ ठीक कह रही है...। तू आज ऐसा सज-सँवर के चलना कि हर जवान लड़की का बाप तुझसे अपनी लड़की का रिश्ता करने को मचल उठे।

मन ने भी उकसाया - हाँ भैय्या… सब में अलग ही नजर आओगे...।

बात करते-करते भोजन तो जीम ही लिए थे। होशियार अच्छे-से तैयार भी हो गया। किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था वह। उसे देख मोहन और मन की आँखों में लालच के गिद्ध मँडरा रहे थे, पर वे खुद पर काबू किए हुए थे। उन्होंने कहीं सुना था कि सब्र का फल मीठा होता है, सो वे बहुत ही मीठे फल की प्रतीक्षा में सब्र किए हुए थे।

घर से तीनों एक ही घोड़े पर रवाना होने लगे, तो बुढ़िया ने होशियार से कहा - बेटा… अलग-अलग घोड़ों पर आराम से बैठ के जाओ…।

होशियार ने कहा - अरे माँ… हम तीनों एक पर बैठ के जाएँगे... आपस में बात करते जाएँगे... अच्छा लगेगा… और फिर उधर से तो मुझ अकेले को ही आना है।

मन और मोहन ने एक-दूसरे की आँखों में देखते हुए मन ही मन कहा - अच्छा है... एक ही घोड़े से चलते हैं... अपन मौका देख कर होशियार को उल्लू बना कर इसी घोड़े पर चंपत हो जाएँगे।

मोहन ने प्रकट में बुआ से कहा - हाँ बुआ… भैय्या ठीक कह रहा है। फिर दो घोड़ों को उधर से कौन लाएगा… ? और हम एक घोड़े पर आराम से चले जाएँगे... तू फिकर मत कर...।

बुआ ने अपने दोनों हाथों की अँगुलियों को मोड़ कर अपने सिर से लगाई। बुदबुदाते हुए अपने भतीजों और बेटे की मंगलमय यात्रा की कामना की। वे तीनों घोड़े पर बैठ ही चुके थे। होशियार आगे बैठा था और उसके हाथ में लगाम थी। उसने घोड़े की पासूँ में ऐड़ी मारी… घोड़ा चल पड़ा।

चलते-चलते कुछ दूर निकल आए थे। दूर एक कस्बा नजर आ रहा था। दोपहर हो गई थी। सुबह खाए पकवान हजम हो चुके थे। पेट में भूख और ओठों पर प्यास पसरने लगी थी। मन और मोहन ने एक-दूसरे की तरफ देखा। आँखों ही आँखों में विचार किया कि यहीं कहीं रुकें। भोजन-पानी करें। और किसी तरह होशियार को उल्लू बना, जेवर आदि ठग कर घोड़े पर निकल लें। ऐसे एक घोड़े पर तीन कहाँ तक चलेंगे इसके साथ...? आँखों ही आँखों में दोनों में सहमति हो गई।

फिर मन ने बोला - भैय्या होशियार... जरा भूख और प्यास लग रही है… क्यों न इस कस्बे में कुछ खा लें...

मोहन ने मन की बात को सँभालते हुए कहा - हाँ... ये एकदम ठीक बात है... घोड़े को भी कुछ खिला-पिला दें और थोड़ी देर सुस्ताने को छोड़ दें। भूख-तीस (प्यास) उसे भी तो लगी ही होगी...।

होशियार ने बोला - जैसी आप लोगों की मर्जी, वो सामने कस्बा नजर आ रहा है, वहीं कुछ खा-पी लेते हैं।

वे कस्बे के और करीब पहुँचे। एक गहरे पेड़ को देख मोहन ने कहा - भैय्या होशियार... ये पेड़ घना छाँवदार है। ऐसा करते हैं कि यहीं रुक जाते हैं। आप कुछ देर छाँव में आराम करो... तब तक मैं और मन घोड़े-से जाकर खाने-पीने का सामान बँधवा लाते हैं। फिर यहीं बैठ कर खा लेंगे। कुछ देर आराम कर लेंगे और फिर चल पड़ेंगे।

मन ने मोहन से कहा - पर भैय्या… अपने पास तो पैसे-कौड़ी सब खत्म हो चुके हैं… सामान कैसे लाएँगे…?

मोहन ने जैसे समस्या का हल खोजते हुए होशियार से कहा - भैय्या… आपने इतने सारे जेवर पहने हैं... तो ऐसा करो कि कोई छोटा-बड़ा जेवर उतार कर दे दो... कस्बे में कोई सुनार होगा, तो उसे जेवर बेंच मोहरें ले लूँगा। मोहरों से खाने-पीने का सामान ले आऊँगा…।

होशियार ने होशियारी दिखाते हुए कहा - अरे भाइयों… आप क्यों इतनी चिंता-फिकर कर रहे हो...! यूँ समझो कि ये कस्बा अपना ही है। यहाँ खाना-पीना खरीदने की जरूरत नी है। सब जानते हैं मुझे। जिसकी देहरी पर जाकर रुक जाएँगे… वह खाने-पीने का इंतजाम कर देगा।

फिर होशियार उँगली से एक पेड़ की तरफ इशारा करता बोला - वो पेड़ दिख रहा है न… अपन वहाँ रुकेंगे। वहीं चुटकी बजाते सब बंदोबस्त हो जाएगा।

मन और मोहन ने मन ही मन सोचा - बड़ा होशियार है… इसे ठगने के लिए कोई खास तरकीब सोचनी पड़ेगी।

वह पेड़ कस्बे के किनारे पर ही था। उसकी छाँव में होशियार ने घोड़ा रोका। मन और मोहन को उतार कर बोला - आप मजे से पेड़ के गोड़ से टीक कर बैठो… मैं आता हूँ।

मोहन को लगा कि ये चला तो नहीं जाएगा...! अगर लौट कर नहीं आया... तो पूरी मेहनत पर पानी फिर जाएगा। इसलिए मोहन ने पूछा - कहाँ जा रहे हो अकेले भैय्या… मैं भी चलूँ साथ… मैं सामान पकड़ कर बैठ जाऊँगा...।

होशियार घोड़े से नीचे उतर आया। घोड़े को भी छाँव में सुस्ताने को छोड़ता बोला - अरे नहीं भैय्या… आप यहीं रहो... ये घोड़ा भी यहीं सुस्ता लेगा थोड़ी देर… वो सामने एक बड़ा-सा घर दिख रहा है न... मैं वहाँ जा रहा हूँ। उस सेठ से मेरी अच्छी मर्जी है। अपने खाने-पीने का प्रबंध कर के आता हूँ... दो कदम ही तो है... पैदल ही चला जाता हूँ।

मन और मोहन को भरोसा हो गया कि चुपचाप भागेगा नहीं..., और भाग भी गया तो घोड़ा तो अपने पास ही है। भागते भूत की लंगोटी ही भली। घोड़े से ही संतोष कर लेंगे। मन ने कहा - जाओ… हो आओ भैय्या... हम यहीं बैठते हैं थोड़ी देर...।

होशियार सेठ के घर गया। सेठ से दुआ-सलाम की। सेठ ने उसे बहुत सारे जेवर पहने देखा, तो सोचा कोई अच्छे घर का युवक जान पड़ता है। होशियार ने पानी-वानी पीने के बाद कहा - सेठ जी… आपके घर सामने कुछ दूरी पर वह जो पेड़ है... वहाँ मेरे दो हट्टे-कट्टे हाली (बंधवा मजदूर) बैठे हैं। दरअसल मैं उनको बैचने आया हूँ। मेरे पास अब कोई काम नहीं है। वे खा-खा कर हट्टे-कट्टे हो रहे हैं। सोचा - आपके पास काम होगा, आपको मजदूर की जरूरत होगी, तो मैं आपके पास चला आया।

सेठ ने कहा - ये तो तुमने बहुत अच्छा किया बेटा… बताओ कितनी मोहरों में बेचोगे…?

होशियार ने कहा - पच्चीस-तीस हजार से कम के तो क्या होंगे... दोनों मेहनती है... और रात-दिन काम कर सकते हैं। पर आपसे क्या कहूँ। आप बड़े हैं। आपने दुनिया देखी है... आप जो देंगे रख लूँगा। वैसे भी अब मुझे उनकी जरूरत न रह गई है।

सेठ उठा और बोला - जरा मुझे उन्हें एक झलक देख तो लेने दो... तुम कह रहे हो वैसे ही हैं कि नहीं…।

युवक भी उठा और दोनों घर के दरवाजे की तरफ बढ़े। दरवाजे में से ही खड़े-खड़े उन्होंने मन और मोहन की तरफ देखा। सेठ ने देखा कि मजदूर वाकई हट्टे-कट्टे नजर आ रहे हैं। पच्चीस-तीस हजार मोहरें तो कोई भी दे देगा... अच्छा हुआ ये इन्हें मेरे पास ले आया।

वापस भीतर आए और सेठ ने होशियार से कहा - बेटा... बीस हजार मोहरें दे सकता हूँ मजदूरों के बदले...।

होशियार ने कहा - सेठ जी आप मोहरें गिनकर एक थैली में रख दो... मैं जब तक अपना घोड़ा लाता हूँ। उन्हें भी बता दूँगा... कि थोड़ी देर छाँव में सुस्ताने के बाद आपके पास काम पर आ जाएँ।

- अच्छी बात है, सेठ ने कहा और मन के किसी कोने में पड़ी आशंका के तहत पूछा - पर वे काम तो करेंगे न...?

होशियार ने कहा - सेठ जी मन में कोई आशंका हो तो… मैं घोड़ा लेने जा रहा हूँ... उन्हें जाकर पूरी बात बताता हूँ... फिर आप यहीं से हाथ हिला कर पूछ लेना - कि दोनों काम करोगे न…?

होशियार पेड़ की छाँव में पहुँचा। मन और मोहन तो ठंडी छाँव में मजे से झपकी ले रहे थे। होशियार ने उन्हें जगा कर कहा - वो दरवाजे में खड़े सेठ जी... पूछ रहे है… खाना दोनों ही खाओगे न... वैसा बनवाये…।

मन और मोहन ने इधर से सेठ जी की तरफ हाथ हिला कर दोनों का इशारा किया। सेठ जी ने इशारे से कहा - ठीक है...रुको थोड़ी देर।

सेठ भीतर गया। मोहरें गिन कर एक छोटी थैली में रखने लगा। साथ ही साथ उसके मन में चल रहा था - युवक की जगह कोई और होता... तो मजदूरों को इतना सस्ता नहीं बेचता। एक-एक मजदूर कम से कम पंद्रह-पंद्रह हजार का है।

इधर होशियार ने मन और मोहन से कहा - सेठ बड़ा भला आदमी है...। जब मैंने कहा कि हम भोजन करेंगे… तो गद्गद भाव से बोला - आपका घर है…। लेकिन फिर थोड़ा संकोच में बोला - पर मैं बूढ़ा… अब कस्बे में कैसे जाऊँ... अभी कोई नौकर चाकर भी नहीं... किसे भेजूँ...?

मैंने पूछा - क्या बात है सेठ... मुझे कहो... मैं तो तुम्हारे बेटे जैसा हूँ।

सेठ बोला - मैं आप लोगों के लिए भोजन बनवाता हूँ... तब तक तुम जाकर कस्बे के चौक में से कुछ मिठाइयाँ ले आओ... खाने के साथ मिठाई न हो... तो मजा नी आता... फिर तुम तो घर के आदमी हो... पर तुम्हारे भाइयों की सेवा का मौका कब मिलेगा...! सेठ की बात सुन मैं अपने आप को रोक नहीं सका। मैंने कहा - आप चिंता मत करो… मैं अभी घोड़े पर सवार होकर जाता हूँ और मिठाइयाँ लेकर आता हूँ।

मन और मोहन ने एक-दूसरे की तरफ देखा - एक क्षण को दोनों की आँखों में यह भाव आया कि अपन कैसे ठग हैं। कितने भोले और भले इनसानों को ठगते हैं। फिर मन ने होशियार से कहा - हाँ...हाँ... भैय्या जाओ... आप मिठाइयाँ ले आओ... सेठ को बोलना कोई छोटा-मोटा काम हो तो हमें भी कहे... हम कर देंगे।

होशियार घोड़े पर सवार हो सेठ के घर गया। सेठ बीस हजार मोहरें गिन कर थैली में भर कर दरवाजे पर ही खड़ा था। होशियार ने मोहरे लीं और सेठ से कहा - सेठ... वे दोनों कह रहे हैं कि हमें काम करे को बहुत दिन हो गए हैं... काम करने को हमारे हाथ कूळ (छटपटा) रहे हैं, जल्दी कोई काम बताओ... अगर कोई छोटा-मोटा काम हो... तो आज ही से करवाना शुरू कर दो...।

सेठ का पाला अब तक कामचोर मजदूरों से पड़ा था। पहली बार वह ऐसे मजदूर देख रहा था, जो काम करने को छटपटा रहे थे। उसने फिर अपनी तसल्ली और होशियार की बात की पुष्टि के लिए जोर से चिल्ला कर पूछा - काम करोगे...।

मन और मोहन ने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर एक साथ बोले - हाँ… करेंगे। और मोहन वहीं का वहीं बुदबुदाया - कितनी बार पूछोगे...।

सेठ गद्गद हो गया। हाथ के इशारे से कहा - अभी रुको वहीं… काम बताता हूँ। फिर होशियार को कहा - जाओ बेटा... तुम्हारा भला हो... तुमने बड़े भले और मेहनती मजदूर मुझे दिए हैं…।

होशियार ने भी आखिरी राम-राम की और घोड़े को एड़ी मारी। घोड़ा चल पड़ा। कस्बे से गुजरते हुए एक बड़ी भव्य मिठाई की दुकान पर होशियार की नजर पड़ी। दुकान में कई तरह की मिठाइयाँ रखी थीं। होशियार ने घोड़ा रोका और दुकान पर गया। दुकान पर एक पंद्रह-सोलह बरस का छोरा बैठा था। वह दुकानदार का ही छोरा था। होशियार ने छोरे से मिठाई माँगी। छोरे ने एक दोने में उसे मिठाई दी। एक दोना मिठाई खाने के बाद होशियार ने दूसरी तरह की मिठाई माँगी। मिठाइयाँ इतनी स्वादिष्ट थी कि खाने से उसका मन ही नहीं भर रहा था। उसने फिर तीसरी तरह की मिठाई माँगी तो छोरा बोला - भैय्या... आप मिठाई खाते जा रहे हो... तो पैसे भी तो दो...।

होशियार ने छोरे की तरफ देखा और सोचा - छोरा...बोली-बाणी और पहनावे से नौकर नहीं लगता है। हो न हो दुकान के सेठ का छोरा है। अपने खयाल की पुष्टि के लिए होशियार ने पूछा - तुम सेठ के छोरे हो न बेटा…?

- हाँ... छोरे ने कहा - पर उससे क्या... आप मिठाई के पैसे दो...।

- अरे बेटा… तू मुझे नहीं जानता… तेरे पिता जानते हैं। सेठ से मेरी पुरानी पहचान है। वो कहाँ है...?

- पिताजी तो घर में भोजन करने गए हैं...।

- तो जाओ... उनको मेरे बारे में बताओ… मेरा नाम चींटा है... तुम सेठ से कहना - दुकान पर चींटा आया है… चींटा मिठाई खा रहा है… उससे पैसे लेना है कि नहीं...?

छोरा घर में गया। उसके पिता ने रोटी का निवाला मुँह में धरा ही था। वह बोला - पिताजी दुकान पर एक चींटा आया है… मिठाइयाँ खा रहा है... उससे पैसे लेना है कि नहीं...?

दुकान के सेठ ने अपना करम ठोक लिया। बुदबुदाया - अच्छी बेवकूफ औलाद पल्ले पड़ी… ये आगे क्या न्याल करेगी। और बेटे से बोला - अरे मूर्ख… चींटा भी कभी पैसे देता है क्या...? और कितनी मिठाई खाएगा... खा लेने दे…। मिठाई की दुकान में चींटा नी आएगा... तो फिर कौन आएगा… जा दुकान पर बैठ… मैं भोजन करके आ रहा हूँ।

सेठ का छोरा उधर गया। इधर होशियार ने अपने झोले में भी तरह-तरह की मिठाइयाँ भरने लगा। छोरा वापस आया, तब तक वह वापस शांत खड़ा हो गया था। छोरा आते ही बोला - अरे भैया… पिताजी आपको जानते हैं... उन्होंने पैसे लेने से मना किया है…। आप और खा लो जो खाना है... बताओ क्या दूँ...?

होशियार ने कहा - नहीं बस... मेरा हो गया... सेठ से राम-राम कहना… मैं अब जाता हूँ।

होशियार घोड़े पर सवार हुआ, ऐड़ी मारी। घोड़ा कस्बे से बाहर ले जाने वाले रास्ते पर चल पड़ा।

उधर पेड़ के नीचे मन और मोहन के पास वह सेठ एक गैंती और एक खुर्पी लेकर पहुँचा। मन को गैंती देकर बोला - तुम घर के पीछे जरा एक गड्ढा खोद दो…। मोहन को खुर्पी पकड़ाते बोला - तुम घर पीछे के खेत में जरा निंदाई-गुड़ाई करो।

मोहन और मन एक-दूसरे की आँखों में देखे कि ये क्या माजरा है...? कुछ समझ नहीं आया, तो मन ने कहा - सेठ जी हमारा भाई कस्बे में मिठाई लेने गया है। उसे आ तो जाने दो... अभी तो भूख के मारे प्राण निकल रहे हैं। उसने कहा था कि वह मिठाई लेकर आता है। फिर भोजन जीमेंगे।

- आप भोजन बनवा रहे थे न... अभी आपने हाथ हिलाकर पूछा भी था। मन ने कहा - कि एक जना करोगे कि दोनों... हमने कहा था - दोनों जने भोजन करेंगे।

मोहन ने कहा - हाँ... खाने से पहले कुछ लाना हो, जैसे खेत से कोचमीर, मूली या कांदा आदि… तो हम उखाड़ लाते हैं… बाकी निंदाई-गुड़ाई करना, या गड्ढा खोदना तो हमारे बस का नी है। फिर हमारे भाई को भी तो आने दो...!

सेठ थोड़ा ताव खाता बोला - अरे उठो… वो अब क्यों आएगा…? वो तो आपको बीस हजार मोहरों में मुझे बेचकर गया है…। उसने कहा - तुम उसके हाली थे… अब मेरे हाली हो… चलो ये गैंती-खुर्पी उठाओ... और काम पर लग जाओ।

मन और मोहन ने एक-दूसरे को देखा और मन ही मन कहा - अरे भैय्या… ये तो अपना भी बाप निकला। ये तो अपन को ठिकाने लगा गया। पर अब क्या करें...?

क्या करें...? क्या करें...? फिर मन ने बोला - देखो सेठ… हम तो हैं ठग... हमने कभी ऐसा काम किया नहीं... हम उसे ठगने को लाए थे… पर वह हमको और तुमको चूना लगा गया।

सेठ फिर जोश में बोला - मुझे क्यों चूना लगा... मैंने तो बीस हजार मोहरें दी… तुम्हें खरीदा... अब तुम काम करो…! या फिर बीस हजार मोहरें देकर चले जाओ…।

मन और मोहन सेठ को समझाने लगे।

इधर होशियार कस्बे के दूसरे छोर पर निकल आया था। पगडंडी पर एक डोकरी और उसकी जवान छोरी कहीं जा रही थी। डोकरी और उसकी छोरी ने घोड़े की टॉप की आवाज सुनी, तो यह सोच कर रुक गई कि घुड़सवार निकल जाए फिर चलते हैं। वे पलट कर घुड़सवार को देखने लगी।

घुड़सवार होशियार की नजर डोकरी की जवान छोरी पर पड़ी। वह छोरी की खूबसूरती पर एकदम मोहित हो गया। उसे लगा - अगर कोई उसकी पत्नी बनने के लायक है, तो बस... यही एक छोरी है। वह जैसे ही छोरी के करीब आया, उसने छोरी की पतली कमर में हाथ डाला और उठा कर घोड़े पर अपने आगे बैठा लिया।

डोकरी हतप्रभ। क्या करे...? वह कस्बे से ज्यादा दूर नहीं थी, पर आस-पास कोई नजर नहीं आ रहा था किसे आवाज दे...?

तब तक छोरी की माँ आ गई। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगी - अरे दौड़ो रे... बचाओ रे... घुड़सवार मेरी छोरी को हरण करके ले जा रहा।

होशियार ने कहा - देख माई… मेरा नाम जवाँई है… कोई पूछे तो कहना छोरी को जवाँई ले गया है…।

डोकरी को लगा कि मूर्ख ने अपना नाम भी बता दिया है, अब लोग ढूँढ़ ही निकालेंगे। किसी आस-पास गाँव का ही होगा। डोकरी फिर जोर-जोर से चिल्लाने लगी - अरे मेरी छोरी को जवाँई ले गया... बचाओ... छोरी को जवाँई ले गया...।

होशियार ने घोड़े को जोर की ऐड़ी मारी। घोड़ा था तो हवा हो गया। छोरी ने घोड़े पर बैठे-बैठे ही गरदन घुमा कर घुड़सवार की तरफ देखा - उसे वह लगा भी देखने लायक। क्या गजब तो उसकी बड़ी-बड़ी आँखें थीं...? छोरी की तरह ही गोरा रंग। होंठों पर पतली-पतली मूँछ की रेखा। गले में झूलते तमाम जेवर। कमर में मोहरों की थैली बँधी। और पूरा बदन जैसे तराशा हुआ।

छोरी ने मन ही मन सोचा - कैसी अकलमंदी से मेरा हरण किया...? कैसे मेरी माँ को बुद्धु बनाया कि छोरी को जवाँई ले गया...? इससे अच्छा वर और कहाँ मिलेगा...? छोरी घोड़े पर आराम से बैठ गई थी। उसने मान लिया था कि अब यही उसका पति है। घोड़ा दौड़ता हुआ कस्बे से दूर जा रहा था।

पीछे लगातार डोकरी के चिल्लाने-से भीड़ जमा हो गई थी। डोकरी लोगों से कहने लगी - उधर आम के पेड़ों तरफ... जवाँई गया है। वह घोड़े पर मेरी छोरी को बैठा ले गया है।

एक आदमी बोला - कैसी बात करती है डोकरी… बुढ़ापे में अकल भी चरने चली गई लगता है... अरे छोरी को जवाँई ले गया... तो इतना चिल्ला-पुकार करने की क्या जरूरत है... यूँ ही पूरा गाँव भेला कर लिया...।

डोकरी ने दूसरे आदमी की बाँह पकड़ कहा - अरे बीर... ये समझ नी रहा… जवाँई मेरी छोरी को जबरन उठा ले गया है... मेरी छोरी जवान है, खबसूरत है... उसके साथ कोई ऊँच-नीच हो गई तो...! मैं तो किसी को मुँह ही नी दिखा पाऊँगी... उसे जल्दी पकड़ो... कुछ करो...।

वह आदमी भी डोकरी से अपनी बाँह छुड़ाता बोला - ये डोकरी… इनसान है कि क्या है...? जवान छोरी को घर पर बैठाके रखेगी... तो जवाँई कब तक नी ले जाएगा... वो तो ले ही जाएगा... उसका हक है… उसने तो अच्छा किया… और डोकरी को डपटता बोला - जवान छोरी को कोई घर में बैठाल के रखता है...?

डोकरी चिल्ला कर लोगों को समझाने की कोशिश करती रही कि वह जवाँई उसका जवाँई नहीं है। उसने अपनी छोरी का ब्याह उससे नहीं किया है। वह बस एक घुड़सवार है, जिसका नाम जवाँई है और जो उसकी छोरी का हरण कर ले गया है। लोगों को डोकरी की पीड़ा और बात समझ में तो आई, पर तब तक देर बहुत हो गई थी। होशियार कई कोस छेक आया था।

तभी होशियार की नजर एक घने पेड़ पर पड़ी, और उसने देखा - पेड़ की छाँव में एक आदमी बैठा है। पेड़ से कुछ दूर धूप में कपड़े सूख रहे हैं। होशियार भी घोड़े को छाँव में ले गया। उसने पहले अपनी पत्नी सुगंधी को उतारा। फिर वह उतरा। छाँव में बैठे आदमी से राम-राम की और पूछा - यहाँ कहीं नदी है।

आदमी एक तरफ इशारे से दिखाता बोला - उधर है... और अपने बारे में बताया - मैं राजा का धोबी हूँ। वहीं पर कपड़े धोकर लाया हूँ।

सुगंधी धीमे स्वर में होशियार से बोली - तभी तो मैं सोच रही थी कि यह इतने महँगे और सुंदर कपड़े-लत्ते किसके सूख रहे हैं! लगता है राजा-रानी और राजकुमारी के हैं।

होशियार ने सुगंधी को गमछा दिया और कहा - इसे बिछा लो।

सुगंधी ने गमछा बिछाया। तब तक होशियार ने अपनी पीठ पर से झोला निकाला। झोले में से कई तरह की मिठाइयाँ निकाली। सुगंधी को दी। थोड़ी धोबी को दी और कुछ अपने घोड़े को खिलाने लगा।

धोबी को मिठाई बहुत स्वादिष्ट लगी। पर उसे मन ही मन यह अच्छा नहीं लगा कि घुड़सवार घोड़े को भी मिठाई खिला रहा है। धोबी ने मिठाई खाते हुए बोला - मुसाफिर भैय्या… मिठाई तो बड़ी स्वादिष्ट है... कहाँ से खरीदी...?

होशियार भी मिठाई खा रहा था। उसने अभी-अभी एक बड़ा टुकड़ा मुँह में रखा था, सोचा थोड़ा चबा लूँ फिर बोलूँ। लेकिन तब तक फिर धोबी ही बोल उठा - मुसाफिर भैय्या… बुरा मत मानना… पर आप घोड़े को ऐसे मिठाई खिला रहे हो... जैसे कहीं से फोकट में लाए हों…।

होशियार अब तक मिठाई का टुकड़ा खा चुका था। वह मुस्कराता बोला - धोबी काका... आपने ठीक पहचाना। फोकट में ही तो लाया हूँ।

धोबी को आश्चर्य हुआ। इतनी बढ़िया और इतनी तरह की मिठाइयाँ फोकट में कौन देगा...? उसने फिर पूछा - कहाँ से लाए हो भैय्या…?

होशियार ने दूर एक पहाड़ी की तरफ इशारा किया और बोला - उस पहाड़ी के पार… एक पेड़ है। उस पेड़ पर तरह-तरह की मिठाइयाँ लगी हैं। वहीं से तोड़ लाया… सोचा - रास्ते में काम आती रहेंगी... थोड़ी-बहुत बच जाएगी तो घर पर काम आ जाएँगी।

आश्चर्य से धोबी की आँखें फटी और मुँह खुला का खुला रह गया। मन में लालची कीड़ा कुलबुलाया। लेकिन वह बात को खरी-पक्की करने के लिहाज से फिर बोला - क्यों मजाक करते हो भैय्या...। मैं यहाँ नदी पर बरसों से कपड़े धोने आ रहा हूँ। कभी नहीं सुना उधर पहाड़ी के पीछे मिठाई का पेड़ है...?

होशियार ने उसकी तरफ कुछ दूसरी तरह की मिठाई के दो-तीन टुकड़े बढ़ाते हुए कहा - धोबी काका... मैंने तो सही बात कही... अब आपकी मर्जी... मानो न मानो...। पेड़ पर जितनी डगालें हैं, उतनी ही तरह की मिठाइयाँ हैं।

अब धोबी के मन में असंख्य लालची कीड़े एक साथ कुलबुलाए थे। कीड़े इतने बड़े और इतने ज्यादा हो गए थे कि धोबी का खुद पर काबू न रहा और बोला - मुसाफिर भैय्या... थोड़ी देर आप यहाँ सुस्ताओ... तब तक मैं भी एकाध थैली मिठाई तोड़ लाऊँ… ! बच्चे मिठाई पाकर खुश हो जाएँगे…। आप जरा देखना - राजा, रानी और राजकु्मारी के कपड़े सूख रहे हैं। हवा में न उड़ जाएँ। ढोर-डंगर गंदे न कर दे...।

होशियार ने कहा - धोबी काका… आप तो फिकर मत करो… मिठाई तोड़ लाओ... हम अभी यहीं सुस्ताएँगे... घोड़े को नदी पर पानी पिलाएँगे... हमें भी प्यास लग रही है… पर आप ज्यादा देर मत करना…।

धोबी ने झटपट थैली उठाई और बोला - नहीं भैय्या देर क्यों करूँगा... बस... यूँ समझो कि दौड़ के गया और भाग के आया।

धोबी सचमुच में दौड़ता हुआ जा रहा था। थोड़ी ही देर में धोबी आँख से ओझल हो गया। होशियार और सुगंधी ने वहाँ सूख रहे सारे कपड़े धोबी के खाली झोलों में भरे, घोड़े पर लादे और खुद सवार होकर चलते बने।

दूर एक-दो गाँव छेक के एक पेड़ के नीचे रुके। पेड़ बरगद का था। उसकी जड़ें नीचे तक झूल रही थीं। होशियार ने बरगद की जड़ों को कपड़े पहना दिए। फिर दोनों पेड़ की छाँव में बैठ मिठाई खाते हुए आमोद-प्रमोद की बातें करने लगे।

अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि एक व्यापारी बैलगाड़ी लेकर उधर से गुजरने लगा। व्यापारी ने पेड़ पर कपड़ों को झूलते देखा। फिर उन दोनों को देखा। और फिर सोचा - ये क्या माजरा है...? पेड़ पर कीमती वस्त्र टँगे हैं। आदमी-औरत छाँव में बैठे बात कर रहे हैं और शायद कुछ खा भी रहे हैं। व्यापारी अपनी बैलगाड़ी को पेड़ के करीब ले गया। होशियार की तरफ गर्दन उचका कर पूछा - क्या भैय्या... पेड़ पर कपड़े टाँग कर क्यों बैठे हो...?

होशियार ने गंभीरता से कहा - कपड़े टाँगे नहीं हैं...। पेड़ पर उगाये हैं और अब बेच रहा हूँ…

- क्या...? व्यापारी ने आश्चर्य से पूछा और फिर मुस्कराकर बोला - मजाक कर रहे हो...?

- नहीं... मैं क्यों मजाक करने लगा...। होशियार ने गंभीरता से ही कहा था।

व्यापारी ने थोड़ा और कुरेदना चाहा - अच्छा... तो बताओ जरा पेड़ पर कपड़े कैसे उगते हैं...?

होशियार ने फिर कहा - क्या है भैय्या...। मेरे एक गुरू थे। बहुत ही पहुँचे हुए थे। उन्होंने मुझे एक गुरू मंत्र सिखाया था…। मैं उस मंत्र को रोज सुबह इस पेड़ पर फूँकता हूँ। फिर इंतजार करता हूँ। धीरे-धीरे कपड़े उग आते हैं। ऐसा मुझे रोज एक बार करना होता है। गुरू ने कहा था कि अगर रोज इस्तेमाल न करूँगा... तो मंत्र अपना असर खो देगा। रोज आम लोगों के कपड़े-लत्ते उगते हैं, तो सुबह-सुबह ही बिक जाते हैं। आज राजा, रानी और राजकुमारी के कपड़े उग आए, तो अभी तक बिके नहीं। देखो-कोई खरीदार आएगा... तो बेच कर चला जाऊँगा।

व्यापारी कपड़ों का ही व्यापार करता था। उसने सोचा - अगर ठीक-ठाक दाम पर ये कपड़ें मिल जाए, तो अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। उसने अतिरेक विनम्र होकर पूछा - क्यों भाई… इन सभी कपड़ों के क्या दाम लोगे…?

होशियार ने अपना गणित कमजोर बताते हुए कहा - अब क्या लूँगा साहब... मैं तो ये जानता हूँ कि आज के कपड़े अच्छे दाम वाले हैं… देखो तो जरा... वो उधर राजकुमारी की उत्तरी है… और रानी की चुनड़ी की किनोर पर सोने के तार में मोती झूल रहे हैं। मुझे तो आप पर भरोसा है... आप ही हिसाब-किताब से दे दो…।

व्यापारी मन ही मन खुश हुआ, पर खुशी को चेहरे पर जाहिर न होने दिया। भीतर ही भीतर खुद से बोला - शक्ल से लगता नहीं, पर है अनपढ़… जो दे देंगे धर लेगा। सारे कपड़े कम से कम सत्तर-अस्सी हजार मोहरों के तो होंगे ही...। इसे पचास हजार मोहरें भी दे देता हूँ, तो भी एक दिन में तीस हजार मोहरों का फायदा है...।

व्यापारी बैल-गाड़ी से नीचे उतरा। होशियार के करीब गया और बोला - देख भाई, मैं पचास हजार मोहरें दूँगा... तेरी मर्जी हो तो बोल...। नहीं तो... मैं जाता हूँ।

होशियार ने कहा - ठीक है सेठ जी... आपने हिसाब लगाया है, तो ठीक ही लगाया होगा। मैं तो यह धंधा करते-करते उकता ही गया हूँ। एक तो हिसाब-किताब में कच्चा। ऊपर से रोज अलग-अलग तरह के कपड़े उग आते हैं पेड़ पर... अब क्या कीमत है उनकी...? क्या नहीं...? हर आदमी आप-सा भला नहीं होता। कोई-कोई तो ठग कर भी चला जाता है।

अब तक होशियार के साथ रहते-रहते सुगंधी भी कुछ गुर सीख गई थी, बोली - अरे सेठ जी हम तो सोच रहे हैं… किसी को ये पेड़ और वह मंत्र ही बेंच दे, जिसे पेड़ पर फूँकने से कपड़े उगते हैं।

व्यापारी के मन में लालच का समुद्र हिलोर मारने लगा। उसने कहा - आपने कितना भला सोचा। आपकी मर्जी हो... तो मुझे ही बेच दो... मैं तो कपड़ों का व्यापारी ही हूँ। मैं आपको उस मंत्र और पेड़ के बदले पचास हजार मोहरें अलग से दे सकता हूँ।

- अरे सेठ जी... आपने तो हमारी रोज-रोज की बेघत से छुटकारा ही दिला दिया। होशियार आभार मानता हुआ बोला - लाओ... आप तो मोहरें दो… और आज से आप ही सँभालो।

- पर हाँ... एक बात का ध्यान रखना। होशियार बोला - आज मैंने कपड़े उगा लिए हैं... अब आप कल सुबह ही मंत्र का उपयोग करना।

सेठ ने एक बड़ी थैली में से गिनकर पूरी एक लाख मोहरें निकाली। एक छोटी थैली में डाली और देता हुआ बोला - लो भाई... अब तुम मजे से इनके ब्याज से ही अपना गुजर-बसर करते रहोगे... रोज-रोज यहाँ आने और कपड़े बिकने तक बैठने के झंझट से मुक्त रहोगे।

होशियार ने मोहरों की थैली सुंगधी के हाथ में थमाई। व्यापारी के कान में मंत्र कहा और अपने घोड़े पर सवार होकर चल पड़ा। व्यापारी ने सभी कपड़ों को उतार कर झोले में भरे और पेड़ के नीचे ही रुका रहा। दरअसल उसने सोचा था कि अब वापस कौन गाँव जाए… थोड़ी देर में रात हो जाएगी… खाना और पानी तो बँधा ही है। बैलों का चारा भी साथ है। खा-पी कर यहीं सो जाऊँगा। सवेरे उठ कर पेड़ पर मंत्र फूँक कपड़े उगा लूँगा... वे कपड़े भी बटोर लूँगा और फिर ही गाँव जाऊँगा। उसने दरी निकाली, और वहीं पेड़ के नीचे बिछा कर आराम करने लगा था।

होशियार और सुगंधी फिर अपने घोड़े पर सवार हो आगे बढ़ गए। जंगल था। साँझ होने में अभी काफी वक्त था, लेकिन था दोपहर बाद का ही कोई वक्त। होशियार को पेशाब की तलब लगी। उसने एक जगह घोड़ा रोका। रास्ते से थोड़ा अलग पेशाब करने लगा।

जंगल में एक सफेद भालू भूख के मारे बेहाल था। वह कीड़े-मकोड़े खा रहा था। अचानक उसका ध्यान पेशाब करते होशियार पर पड़ा। भालू होशियार पर हमला करने को लपका। अब तक होशियार पेशाब कर चुका था। उसने भालू की आवाज सुनी तो… वह अपने घोड़े की तरफ दौड़ा। लेकिन रास्ते किनारे भालू ने उसे झपट लिया। होशियार भी कोई कम तो पड़ता नहीं था। नौजवान था, और अच्छा कसरती बदन था। जब जान पर बन आई तो… वह भालू से गुत्थम-गुत्था हो गया।

सुगंधी एक क्षण को तो यह देख घबराई। लेकिन फिर उसने देखा कि होशियार भालू को अपने पर हावी नहीं होने दे रहा है, तो उसके चेहरे पर खुशी उभर आई। वह भालू और होशियार की कुश्ती का आनंद लेने लगी। होशियार की कमर में बीस हजार मोहरें बँधीं थी, जो उसने मन और मोहन को बेचकर कमाई थी। कुश्ती में वह थैली ढीली हो गई और उससे रह रह कर मोहरें नीचे बिखर रही थी। न भालू कम पड़ रहा था। न होशियार कम पड़ रहा था। थोड़ी-थोड़ी देर में होशियार भालू की थूथ को जमीन पर रगड़ने में सफल हो जाता था। दरअसल उसने भालू की गर्दन को अच्छे-से जफोत ली थी। गर्दन जफोताने की वजह से भालू का कोई दाँव नहीं लग रहा था।

उसी वक्त एक व्यापारी घोड़े पर सवार होकर उस रास्ते पर आया। व्यापारी ने देखा - आदमी बार-बार भालू की थूँथ जमीन पर रगड़ता है, तो नीचे सोने की मोहरें गिरती हैं। व्यापारी ने होशियार से पूछा - क्या भाई… भालू से क्यों लड़ रहे हो...। भालू ने हमला किया हो तो इसे मारने में मदद करूँ क्या...?

होशियार ने कहा - अरे भैय्या... ऐसी कोई बात नी है... आप तो अपने रास्ते जाओ… हम देख लेंगे।

होशियार ने अपनी काँख में भालू की गर्दन कस के पकड़ रखी थी। पसीना-पसीना हो रहा था। व्यापारी और होशियार आपस में बात कर रहे थे, तभी सुगंधी भालू और होशियार के आस-पास बिखरी सोने की मोहरों को खुशी-खुशी बँटोरने लगी।

व्यापारी के मन में लालची भेड़िया गुर्राने लगा। वह मन ही मन खुद से बोला - गुरू... हो न हो... कोई राज की बात है। अगर भालू हमला करता... तो ये आदमी मदद की गुहार अवश्य करता। और इसकी घरवाली भी इतनी खुश नहीं दिखती… और फिर सबसे बड़ा राज तो ये है कि जब भालू की थूँथ जमीन पर रगड़ता है, तो सोने की मोहरें गिरती हैं।

व्यापारी आवाज को चासनी बनाता बोला - अरे भाई… मुझे अपना भाई ही समझो... और बात क्या है...? मुझे भी बताओ... ?

होशियार ने दो बार फिर भालू की थूँथ रगड़ी। कुछ मोहरें और जमीन पर टपकी। अब व्यापारी अपने लालच के आगे नतमस्तक हो गया और लगभग गिड़गिड़ाने वाले स्वर में होशियार से राज पूछने लगा।

होशियार ने कहा - अब तुम मान ही नहीं रहे हो... फिर मुझे अपना भाई भी कह रहे हो... तो भाई से क्या छुपाना...।

व्यापारी के चेहरे पर खुशी उभरी। वह कान खड़े कर होशियार की बात सुनने लगा। होशियार बोलने लगा - ऐसा है भाई…कि यह भालू साधारण भालू नहीं है। इसकी थूँथ को जब भी जमीन पर रगड़ते हैं, तो यह सोने की मोहरें हगता हैं। मैंने बरसों की मेहनत से इसे ढूँढ़ा है। काफी देर से इसकी थूँथ को रगड़ रहा हूँ। मोहरें भी खूब जमा हो गई हैं। पर लालच का तो कोई अंत ही नहीं है। इसी लिए रगड़े जा रहा हूँ और ये भी मोहरें हगता जा रहा है।

होशियार जब बात कर रहा था, भालू की गर्दन पर उसकी पकड़ हल्की ढीली पड़ी, तो भालू ने छूटने की कोशिश की। तभी होशियार सतर्क हुआ और एक-दो बार फिर उसकी थूँथ जमीन पर रगड़ दी। फिर मोहरें टपकी। सुगंधी खुशी-खुशी मोहरें बिन ही रही थीं।

अब व्यापारी ने दाँव खेला। बोला - भाई… आप तो मेरे भाई है… मैं देख रहा हूँ कि भाभी के पास बहुत-सी मोहरें जमा हो गई है। क्या कुछ देर मैं भालू की थूँथ रगड़ लूँ... या फिर आप मुझे ये भालू बेंच दो...?

होशियार ने कहा - अब कैसे मना करूँ…? तुमने भाई कह कर मुझे प्रेम की डोर में बाँध लिया है…। पर भाई फिर तुम्हें भी मेरा एक छोटा-सा काम करना होगा...!

व्यापारी विनम्रता से बोला - बोलो भाई… क्या करना है…?

होशियार ने कहा - ये जितनी मोहरें जमीन पर बिखरी हैं... बिन कर तुम्हारी भाभी को दे दो… और पंद्रह हजार मोहरें तुम्हारे पास से दे दो... फिर आओ मेरे पास… मैं तुम्हें भालू की गर्दन पकड़वा देता हूँ… मन हो... जब तक यहाँ थूँथ रगड़ कर मोहरें हगवाते रहना।

व्यापारी के पास कुल पंद्रह हजार मोहरें ही थीं, पर उसने खुशी-खुशी दे दी। सोचा - अब तो भालू उसी का हो जाएगा... गाड़ी भर मोहरें हगवा लूँगा।

फिर होशियार ने भी अपने वादे के मुताबिक उसे भालू की गर्दन पकड़ा दी और मुक्ति की साँस लेते हुए अपने घोड़े पर सुगंधी के साथ रवाना हो गया। व्यापारी भालू की थूँथ को रगड़ने लगा। एक बार, दो बार, बार-बार पर वह मोहरें नहीं हग रहा था। अब व्यापारी के मन में आशंका घिरने लगी। कहीं वह मुझे ठग तो नहीं गया। व्यापारी बार-बार थूँथ रगड़े, पर भालू एक मोहर भी न हगे। सोने की तो छोड़ो... वह कथीर की भी नहीं हगे। वह तो भूखा था, और कीड़े-मकौड़े खा रहा था। पेट भरा होता, तो मोहरें न सही... कुछ न कुछ तो हगता ही। व्यापारी को समझ तो आ गया था, पर अब भालू को छोड़े... तो भालू उसे फाड़ खाए…। लेकिन फिर करता भी क्या...? जान बचानी थी, इसलिए रात भर भालू से जूझता रहा।

उधर रात भर में मन और मोहन ने सेठ को समझा लिया था कि सुबह होते ही होशियार को ढूँढ़ने चलना है। सेठ के कस्बे की ही सुगंधी की माँ और मिठाई वाला था। वे भी सेठ के साथ चलने को राजी हो गए थे। सुगंधी की माँ ने जिधर उसके भागने का बताया था, उधर ही लोग चल पड़े थे। आगे चल कर उन्हें धोबी मिला। वह पेड़ के नीचे बैठा रो रहा था। सेठ ने पूछा - क्यों रो रहे हो...?

धोबी ने रोते हुए बताया - क्या बताऊँ सेठजी... मैं एक मुसाफिर की बात से ठगा गया। वह अपनी पत्नी और घोड़े को मिठाई खिला रहा था। मुझे भी खिलाई। जब मैंने पूछा - कहाँ से लाए हो इतनी स्वादिष्ट मिठाई... तो बोला पहाड़ी के उस पार पेड़ से...। मेरे मन में भी लालच आया… मैं मिठाई लेने गया… वहाँ ऐसा कोई पेड़ नहीं था...। मुझे वहीं समझ में आ गया था कि कुछ गड़बड़ है। मैं दौड़ता-भागता आया। लेकिन तब तक वह राजा, रानी और राजकुमारी के कपड़े लेकर चंपत हो गया। अब कैसे जाऊँ... राजा मुझे जाने क्या दंड देंगे...?

धोबी की बात सुन और अपनी मिठाइयों की खाली ट्रे की याद से मिठाई वाले सेठ का मन भर आया था। वह बोला - अरे वो बहोत बड़ा ठग है रे भई…। वे मिठाइयाँ तो मेरी दुकान की थीं।

मन और मोहन ने कहा - ये वही है सेठ जी।

डोकरी ने कहा - वह छोरी मेरी ही होगी...।

सेठ ने कहा - तुम भी चलो हमारे साथ... हम उसी को ढूँढ़ने निकले हैं।

धोबी भी उनके साथ चल पड़ा। रात भी सोते-जागते और चलते-चलते ही गुजरी थी। सुबह होते ही फिर आगे चल पड़े। एक बरगद के पेड़ के नीचे कपड़ों का व्यापारी बैठा-बैठा खुद को कोस रहा था। अपने हाथों अपना माथा पीट रहा था। उसकी गाड़ी में राजा, रानी और राज कुमारी के कपड़े झोले में भरे रखे थे। पर यह वही कपड़े थे, जो होशियार उसे बेच गया था। खूब कोशिश के बावजूद पेड़ पर नए कपड़े नहीं उगे थे। वह मंत्र को हजारों बार फूँकने के बाद, हार मान चुका था।

धोबी की नजर गाड़ी में रखे झोलों पर पड़ी। वह अपने झोले को पहचान गया। उसने दौड़ कर झोलों को देखा - उनमें कपड़े भी राजा, रानी और राजकुमारी के थे। वह कपड़े पाकर खुशी से झूम उठा। जोर-जोर से चिल्ला कर बोला - मेरी जान बच गई… मेरी जान बच गई।

धोबी तो कपड़े लेकर अपने रास्ते चलने लगा। व्यापारी ने उसे दौड़ कर रोका। झोले छुड़ाता बोला - अपने बाप का माल समझ के ले जा रहा है। ये कपड़े मैंने एक लाख मोहरें देकर लिए हैं।

मन और मोहन ने एक-दूसरे की तरफ देखा और आँखों ही आँखों में कहा - यार… होशियार तो अपने बाप का भी बाप निकला। उन्हें पछतावा हुआ कि वे होशियार की माँ को ठगने गए। उन्हें ठगने की बजाए उसके साथ काम करना चाहिए था। पर अब क्या करें…? हो गया जो होना था।

सेठ को पूरी बात समझ में आ गई थी। उसने उस व्यापारी को रोकते हुए कहा - गरीब धोबी पर क्यों झुँझलाते हो… तुम्हें जिसने ये कपड़े बेचे थे… असल दोषी तो वो है…। उसने हमें भी ठगा है... हम उसी को ढूँढ़ने जा रहे हैं... तुम भी साथ चलो। उसे ढूँढ़ कर सभी अपना-अपना हिसाब चुकता कर लेंगे।

वह व्यापारी भी उनके साथ चल पड़ा। और आगे चले तो उन्होंने उस व्यापारी को भालू से लड़ते देखा। सबने मिल कर भालू को मार गिराया। व्यापारी ने अपनी भी कथा सभी को सुनाई और वह भी उनके साथ चल पड़ा।

चलते-चलते साँझ को होशियार के घर पहुँच गए सभी। होशियार घर ही पर था। वह सभी को अपने यहाँ देख कर खूब प्रसन्न हुआ। वह सभी की मेहमानों की तरह आव भगत करने लगा। लेकिन वे सब तो उस पर झुँझला रहे थे।

सेठ ने कहा - तेरी मेहमाननवाजी की जरूरत नहीं है हमें… तू तो जो-जो हम सबसे ठग कर लाया है वह सब वापस कर।

अभी सेठ की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि डोकरी ने सुगंधी का हाथ पकड़ कहा - चल बेटी… ये लाकड़ा का लिया… तुझे जबरन हरण कर लाया था... कुछ किया तो नी...।

सुगंधी अपनी माँ से कुछ कहती उससे पहले कपड़े का व्यापारी अपनी मोहरें माँगने लगा। इस तरह होशियार के घर में हलातौल मच गई। होशियार की माँ आँगन में आ गई और होशियार से पूछने लगी - ये सब कौन है...? और ये क्या चाहते हैं...? क्या मैं लठैतों को बुलवाऊँ...?

लठैतों का नाम सुन सभी चुप हो गए। फिर सभी ने एक-एक कर होशियार की माँ को अपनी दुख भरी दास्तान सुनाई। माँ ने होशियार को डपटा और कहा - जो भी लाया है... अभी का अभी लौटा सभी को...।

होशियार की माँ की नजर मन और मोहन पर पड़ी, तो जैसे वह भीतर ही भीतर कट के रह गई। एक क्षण को उसे अपने जने पर जैसे लज्जा आ रही थी। वह लगभग रुँधी आवाज में बोली - निर्लज्ज... तूने अपने मामा के छोरे... मेरे भतीजों तक नी छोड़ा...।

होशियार की माँ की बात सुन सभी को भरोसा हुआ। मोहरें वापस मिलने की उम्मीद बँधी। सुगंधी की माँ ने भी राहत की साँस ली।

सेठ ने मन और मोहन की तरफ देख आँखों ही आँखों में कहा - ठीक कह रहे थे कि होशियार तुम्हारा भाई है। पर बताओ क्या जमाना आ गया... ? भाई-भाई को ठगने से बाज न आता...!

फिर होशियार अपनी माँ से बोला - माँ… अपन को क्या कमी है... जो मैं इनसे एक-एक, दो-दो मुट्ठी मोहरें ठगूँ…?

माँ के चेहरे पर आश्वस्ति का भाव आया कि बात ठीक है। लेकिन उसके मन में प्रश्न उठा कि फिर ऐसा क्यों किया...? तूने मेरी नाक क्यों कटवाई...?

मन और मोहन सबके पीछे खड़े थे। वे होशियार और उसकी माँ के सामने आने से बच रहे थे। लेकिन होशियार उन्हें अपनी तरफ बुलाता हुआ बोला - देख माँ... तू इस मन और मोहन को अपने भतीजे मानती है… पर ऐसा नहीं है।

माँ की आँखें आश्चर्य से चौंड़ी हो गईं। चेहरे की झुर्रियों पर गुस्से की चमक बढ़ गई, और वह बुदबुदाई - अब तू मेरे भतीजों को… मेरे भतीजे ही नहीं मानता... तुझे हो क्या गया है…?

होशियार ने धीरज का साथ नहीं छोड़ा और वह बोला - माँ... दरअसल ये दोनों तेरे भाई के बेटे बन कर तुझे ठगने आए थे। तुझे बुआ...बुआ कह कर तेरा भरोसा जीता…। तूने इनको बढ़िया-बढ़िया पकवान खिलाए। तेरे कहे पर मैंने भी इनकी सेवा की। लेकिन इन्होंने तेरी सोने की बाटकी छुपाकर कहा कि कागला ले उड़ा। वह बाटकी कागला नहीं ले उड़ा था, इन्होंने वहाँ जमीन में छुपा दी थी, जो मैं आते वक्त सुगंधी के सामने, वहाँ से निकाल कर ले लाया हूँ। भरोसा न हो, तो देख ले... घर में रखी है।

होशियार का बोलना जारी रहा - तू तो इनके साथ जाने को भी राजी हो गई थी माँ। तू साथ चली जाती, तो ये तुझे मार-मूर कर जाने कहाँ फेंकते। तेरे जेवर लेकर भाग जाते। पर मैंने इनकी चालों को पहचान लिया था, इसलिए तुझे मना कर मैं इनके साथ गया।

होशियार की बात सुन मन और मोहन को अपने किए पर पछतावा हो रहा था। होशियार की माँ भी आश्चर्यचकित थी कि वह कैसी भूल कर रही थी। बेटे ने उसकी आँखें खोल दीं, और मैं यूँ ही सभी के सामने उसे डपटने लगी थी।

होशियार की बातों का सेठ और व्यापारियों पर भी गजब का प्रभाव पड़ा था। वे मन और मोहन की तरफ बहुत हीन भाव से देखने लगे। मन ही मन सोचा - सच में इस आदमी को क्या कमी, जो कुछ मोहरों के लिए मन और मोहन जैसे को बेचने इतनी दूर आए। वह तो खुद कितने जेवर पहने हुए था। उसके गले में पहनी एक-एक माला हजारों मोहरों की थीं। और उसकी माँ के ही बदन पर लाखों मोहरों के जेवर हैं।

सुगंधी की माँ भी यह सब देख-सुन चमत्कृत थी। उसकी बेटी के बदन पर भी जेवर लटालूम कर रहे थे। सोच रही थी कि गरीबी के कारण हीरे जैसी बेटी से भी कोई रिश्ता करने को राजी नहीं हो रहा था। कोई रिश्ता आता भी तो वह दहेज के लिए इतना मुँह फाड़ता कि मैं गरीब चाह कर भी बेटी का ब्याह न कर पा रही थी। सुगंधी के बदन पर जितने जेवर हैं, इतने तो कभी मैंने अपनी जिंदगी में देखे भी नहीं। और क्या गजब तो उसके बदन पर जेवर फब रहे हैं। सुगंधी की माँ मन ही मन भाव विह्वल हो उठी थी। वह कभी सुगंधी को... कभी जवाँई को और कभी देवी समान उनकी माँ को देख रही थी।

सुगंधी अपनी माँ को देख रही थी। उसका हाथ थपथपाकर उसे आश्वस्त कर रही थी कि चिंता मत कर माँ। मैं यहाँ खुश रहूँगी। तेरा जवाँई लाखों में एक है।

होशियार का अपनी माँ से बोलना-समझाना जारी था - माँ तू बहुत भोली है… तेरा मन नर्मदा के पानी की तरह निर्मल है। पर माँ ये सेठ, ये व्यापारी और ये सब के सब बहुत बड़े और क्रूर ठग हैं...। ये गाँव के भोले-भाले लोगों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी से ठगते चले आए हैं। इनके मन में कोई दया भाव नी है। एक आना की चीज की दस मोहरें लेते हैं। गरीब का गला काटते हैं…। उसे रोज-रोज ठगते हैं। कभी-कभी तो राजाओं, मंत्रियों के साथ साँठ-गाँठ कर गाँव के गाँव और देश के देश ठग लेते हैं। लोगों को इतनी मधुर वाणी से ठगते हैं कि उन्हें ठगाने का एहसास ही नहीं होता है।

अब व्यापारियों के चेहरों के भाव बदलने लगे थे। उन्हें लगने लगा - कहीं ये फिर से कोई उल तो देने वाला नहीं है। एक व्यापारी बोला - पर भाई... हम तो व्यापारी हैं… सारी तिकड़म करते ही इसलिए हैं कि कुछ नफा हो...। नफा न हो... तो व्यापार ही क्यों करें…?

होशियार ने कहा - आप ठीक कह रहे हैं… पर नफे की कोई सीमा भी तो हो…। आप नफे के लालच में किसानों के घर-बार, खेती बाड़ी बिकवा दो। लकड़ी, कोयला, पानी, नदी, जंगल और हवा बेचने लगो... तो सेठ यह लालच कहाँ जाकर रुकेगा... बोलो तो जरा...?

होशियार की बातों से सेठ और व्यापारियों की आँखें खुल गई थीं। उन्होंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि जमीन, लकड़ी, कोयला, खदान, नदी जंगल, पहाड़ और पानी बेच कर भी अकूत धन कमाया जा सकता है। अभी तो जिसके मन में जो आया वो करते हैं। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। जल, जंगल, खेत और पहाड़ जैसे नंगे-भूखे किसानों के बाप के हैं।

सेठ के मन में आया - अगर राजा के साथ साँठ-गाँठ कर नदी खरीद लूँ, तो फिर गाँव के गाँव पानी खरीद कर पियेंगे, पानी तो सभी की जरूरत है। मुनाफा ही मुनाफा।

एक व्यापारी के मन में आया - अगर जंगल खरीद लूँ तो… किसी को घर, हल-बक्खर, गाड़ी, बग्घी, चिता कुछ भी बनाना हो या सिर्फ रोटी ही सेंकनी हो... बगैर लकड़ी के तो किसी का काम ही नहीं चलता। हर आदमी मुझसे लकड़ी खरीदेगा। मेरी तो चाँदी ही चाँदी हो जाएगी...।

एक व्यापारी के मन में आया - मैं किसानों से जमीन खरीदूँगा। पर जब किसानों की जमीन कम पड़ने लगेगी, तब तक जंगलों के कटने से खाली हुई जमीन खरीदने लगूँगा। जनसंख्या तो लगातार बढ़ना ही है। लोगों को रहने के लिए घर भी लगेंगे ही। मैं तब सोने के भाव जमीन और घर बेचूँगा।

ऐसे ही किसी ने तेल के भंडार खरीदने का सोचा, किसी ने गैस के भंडार और किसी ने कुछ सोचा। लगभग सभी व्यापारी एक साथ बोले - भाई... तू मुझे मेरी मोहरें दे... मुझे जाना है… कुछ जरूरी काम याद आ रहा है।

होशियार की माँ बड़े अधिकार और स्नेह से बोली - नहीं...नहीं… इत्ती रात में मोहरें लेकर कैसे जाओगे…? ये घर है आपका…। आप जो भी हो... पर अभी तो हमारे मेहमान हो… मैं अभी सभी के लिए बढ़िया खटिया लगवाती हूँ। उस पर कपास की रुई गद्दे और सेमल की रुई के सिरहाने रखवाती हूँ। फिर आप सभी के लिए हम सास-बहू अच्छे-अच्छे पकवान बनाते हैं। आप पकवान जीमना। रात भर आराम करना। सुबह सभी अपनी-अपनी मोहरें लेकर रवाना हो जाना।

फिर वह सुगंधी की माँ के पास गई। उसका हाथ पकड़ बोली - ब्यान जी आपको सुबह भी नी जाने दूँगी…। आप को तो मन भरने तक यहीं रखूँगी। आप चलो भीतर, आपका बिस्तर लगवाती हूँ। इतना स्नेह, इतना अधिकार और प्यार देख कर सुगंधी की माँ की तो आँखें ही भर आई थीं। पर चूँकि कंदील का उजाला था। सिर पर लूगड़ी ओड़ी थी। किसी की नजर नहीं पड़ी तब तक उसने आँखें पोंछ ली थी।

रात में सभी ने बढ़िया पकवान जीमें। एक-एक खटिया पर पसर कर लेट गए। होशियार की माँ और सास भी सो गई। होशियार और सुगंधी अपने कमरे में चले गए। लंबे-चौड़े आँगन में खटियों पर व्यापारी करवट बदलते रहे थे। हवा बहुत ही सुहावनी चल रही थी। लेकिन नींद किसी को नहीं आ रही थी। क्योंकि किसी के जहन में जंगल, नदी, खदान खरीदने की रूपरेखा आकार ले रही थी। किसी के मन में जमीन की खरीदी-बिक्री का गणित चल रहा था। जिसके मन में जैसा खयाल था, वह उसी के विस्तार और गुणा-भाग में खोया था।

नींद न आने की एक खास वजह यह भी थी कि उनमें से कोई भी अपने संभावित मुनाफे का ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा पा रहा था। यह भी नहीं सूझ रहा था - कि इतने धन को कहाँ सँभाल कर रखेंगे…?

हालाँकि उन्हीं में से एक था - जो यह सोच रहा था कि मैं इन सब के धन की सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े गोडाऊन बनवाऊँगा। जहाँ सभी की मोहरें जमा करवाऊँगा। सुरक्षा के लिए बहुत सारे रक्षक रखूँगा। उन्हें अच्छे से अच्छे लुटेरों, डाकुओं से लड़ना सिखाऊँगा..., बल्कि कुछ डाकुओं और लुटेरों को ही रक्षक बना लूँगा।

जिस भी देश का राजा, मंत्री और व्यापारी गोडाऊन में मोहरों को जमा करेगा। उससे मोहरों की देख-भाल और सुरक्षा के बदले मोहरें वसूल करूँगा। ऐसे ही मैं भी बहुत बड़ा धनवान हो जाऊँगा। यूँ सोचते-सोचते सभी की नींद चाले चढ़ गई थी, और उनका करवट दर करवट बदलना जारी था।

होशियार अपनी होशियारी से यह सब अपने कमरे की खिड़की की दरार में से देख रहा था। वह उनके मन की बेचैनी उसी वक्त भाँप गया था, जब सभी बारी-बारी से अपनी मोहरें माँग रहे थे। जरूरी काम का बहाना बना रात में ही जाना चाह रहे थे।

दरअसल होशियार भी तभी से सोच रहा था - ऐसा क्या किया जाए...? ठगों को मोहरें भी न देनी पड़े और माँ की डपट भी न सुननी पड़े। इन ठगों को सबक सिखाना भी जरूरी है। हालाँकि व्यापारियों के मन में पनपते लालची कीड़ों को मारना मुश्किल है।

तभी उसके मन में एक खयाल आया और उसने सुगंधी से कहा - मैं अभी दिशा फारिग होकर आता हूँ।

सुगंधी ने मजाक किया - पेट के बड़े कच्चे हो जी… कि पहली रात है... तो घबरा रहे हो…।

होशियार कुछ नहीं बोला। मुस्कराता हुआ पीछे के दरवाजे से बाहर निकल गया। तेज-तेज कदम से गाँव के चौकीदार के घर पहुँचा। चौकीदार को जगाया। वह होशियार को देख चौंक उठा और फिर पूछा - क्या बात है भैय्या...?

होशियार ने चौकीदार से कहा - यार मेरे घर में कुछ ठग घुस आए हैं… तू ये पचास मोहरें रख... और मेरे घर के आँगन तरफ के दरवाजे पर तीन बार ठक...ठक… ठोकने के बाद जोर से कहना।

- क्या…? चौकीदार ने मोहरों को ठीक से रखते हुए पूछा।

होशियार ने चौकीदार के कान में कुछ कहा और वापस चला आया।

होशियार ने अपने कमरे की खिड़की की दरार से वापस आँगन में देखा - चाँद के उजास से पूरा आँगन भरा था। सभी व्यापारी आँगन में खुसुर-फुसुर कर रहे थे। दरअसल वे आपस में तय कर रहे थे कि कौन किस चीज का व्यापार करेगा...? हम में से कोई एक-दूसरे के आड़े नहीं आएगा। हमें एकजुट रहना होगा। तभी हम राजा और मंत्रियों को ठग सकते हैं...?

तभी आवाज आई - जागते रहो… होशियार रहो…!

सभी व्यापारी चौंक कर दरवाजे की तरफ देखने लगे। दरवाजे की दूसरी तरफ चौकीदार खड़ा था। उसके एक हाथ में कंदील और दूसरे में लाठी थी। उसने लाठी से ही दरवाजा ठक-ठकाया था। चौकीदार जानता तो था ही कि क्या कहना है...? वह ऊँची आवाज में बोला - गाँव में किसी के यहाँ कुछ राज्य-द्रोही छुपे हुए हैं...। आज रात गाँव में राजा के सिपाही आ रहे हैं…। हर घर की तलाशी होगी। जब तक तलाशी न हो जाए…, कोई भी सोएगा नहीं...। पकड़े जाने पर राज्य-द्रोहियों को और पनाह देने वाले को तुरंत मृत्यु दंड दिया जाएगा..., और जो राज्य-द्रोहियों की खबर देगा... या उन्हें पकड़वा देगा... उसे राजा की और से मुँह माँगा इनाम दिया जाएगा।

व्यापारियों ने जैसे ही चौकीदार की डोंडी सुनी। उनके तो होश ही फाक्ता हो गए। एक पसीना पोंछता बोला - भैय्या... होशियार का क्या भरोसा... इनाम के लालच में गुपचुप रूप से खबर कर दे।

दूसरा बोला - हाँ भाइयों… उस पर भरोसा नी कर सकते… वह बड़ा शातिर है। मैं तो कहता हूँ... चंद मोहरों का क्या माजना...! जान है तो जहान है।

तीसरा बोला - और क्या ...? वैसे भी अपनी नजर में तो अब तो खजाने ही खजाने हैं… चुपचाप खिसक लें अपन तो...।

मन ने सोचा - इन व्यापारियों ने तो अपने-अपने बारे में ही सोचा है। हमारे बारे में तो कुछ सोचा नहीं है। अपन क्यों खिसके...? और वह बोला - पर चलेंगे कैसे भैय्या... दरवाजा तो बंद है...? और फिर चाँद भी तो कैसा चमक रहा है...? किसी ने देख लिया तो… कहीं कोई चोर समझ कर धो न दे अपन को...?

मोहन समझ गया कि मन ऐसी बात क्यों कर रहा है...! वह स्पष्ट बोला - और फिर आपके साथ भागने पर हमें क्या मिलेगा...?

अब व्यापारी भी समझ गए कि माजरा क्या है...? एक स्वर में बोले - तुम राजा, मंत्री और हमारे बीच तालमेल बैठालना। माने दलाली करना... तुम्हें दोनों तरफ से अच्छा-खासा बट्टा (कमीशन) मिलेगा।

अब मोहन और मन भी व्यापारियों के साथ भागने को तैयार हो गए थे। फिर मोहन बोला - हमने घर से देखा है। एक दरवाजा पीछे भी है। उसी दरवाजे से अपन चुपके से निकल चलते हैं।

आगे-आगे दबे कदमों से मन-मोहन चलने लगे। पीछे-पीछे व्यापारी। जब वे दरवाजा खोल कर घर से दस-बीस कदम दूर चले गए, तब होशियार दरवाजे के बीच खड़ा उन्हें हाँक देता बोला - अरे रुको... रुको... सवेरे अपनी-अपनी मोहरें लेकर जाना…! यूँ रात में कहाँ जा रहे हो...?

फिर दूसरी तरफ से व्यापारियों के कानों में चौकीदार की आवाज पड़ी - अरे... कौन भाग रहा उधर… राजा के दुश्मन… राज्य-द्रोही हैं क्या...? अरे रुको… फिर जैसे सिपाहियों को हाँक देता बोला - जल्दी आओ… राज्य-द्रोही भाग रहे हैं।

होशियार और चौकीदार ने देखा - व्यापारियों का पूरा गिरोह हिरण हो गया है। वे अपने-अपने घरों में जा सो गए।

व्यापारियों ने पलट कर देखा - पीछे कोई नहीं आ रहा है। पर फिर भी वे रुके नहीं। किसी गाँव-कस्बा में भी नहीं रुके...! वे सीधे राजधानी पहुँचे। मन-मोहन ने अपनी भूमिका बखूबी निभाई। महाराजा से उनकी साँठ-गाँठ करवाई। फिर देखते ही देखते जरूरत की हर चीज पर व्यापारियों का कब्जा होने लगा।

अब तो इस बात को बरसों बरस बीत गए। राजा बदला। राज करने का ढंग बदला। व्यापार में भी बहुत कुछ अदला-बदला। पर नहीं बदला तरक्की का रास्ता कभी। दिन सौ गुनी... रात हजार गुनी तरक्की होने लगी। हो रही है। और जाने कब तक तरक्की का पहिया यूँ ही देश की गर्दन पर से गुजरता रहेगा...?


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हिंदी समय में सत्यनारायण पटेल की रचनाएँ