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विमर्श

कविता में स्त्री
निधि तिवारी


छायावाद युग से ही साहित्य के केंद्र में स्त्री दिखाई देती है। आज के समय में उसे औपनिवेशीकरण, भूमंडलीकरण और पूँजीवाद आदि से जोड़कर देखा जा रहा है और उसका व्यापक वर्णन कविता में किया जा रहा है। बीसवीं सदी के अंतिम दो दशकों में स्त्री विमर्श की चर्चा अधिक मिलती है। समकालीन हिंदी काव्य जगत में कवयित्रियों की संख्या न केवल विस्तृत हुई है बल्कि वे अनुभूति की प्रामाणिकता और जीवन की समझ के साथ नए विमर्श को भी जन्म दे रही हैं। समकालीन कवयित्रियाँ स्त्री मन एवं भाव जगत से जुड़ी अनुभूतियों को अभिव्यक्त कर अपने साहित्यिक वितान का विस्तार कर रही हैं। ऐसी कवयित्रियों में चंद्रकला त्रिपाठी का स्थान महत्वपूर्ण है। एक संवेदनशील रचनाकार होने के साथ-साथ वे प्रभावी कथाकार के रूप में भी सुपरिचित हैं। विगत चार दशक से अध्यापन कार्य के साथ साथ अपनी सृजनधर्मिता से चंद्रकला जी ने साहित्य सृजन किया है और गाँव घर की मिट्टी की महक को अपनी कविता में जगह दी है साथ ही भारतीय परिवार और स्त्री की समस्याओं को स्वर देते हुए नितांत अनछुए पहलुओं को अपनी कविता का विषय बनाया है।

चंद्रकला त्रिपाठी के अब तक तीन काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। सन 1998 में प्रकाशित उनका काव्य संग्रह 'शायद किसी दिन' उनकी काव्यगत विशिष्टताओं को प्रतिपादित करता है।

स्त्री होने के नाते स्त्री के बारे में चंद्रकला जी ने अपनी कविताओं में यथार्थ वर्णन किया है। स्त्री की पीड़ा, उसके स्वप्न एवं आकांक्षाएँ कवयित्री की कविता की परिधि निर्मित करते हैं और उसी परिधि में स्त्री जीवंत हो उठती है। स्त्रियों की शक्ति और संघर्ष का चित्रण करती उनकी कविताएँ सत्य का अन्वेषण करती चलती हैं। स्त्री मन की भावनाओं की अभिव्यक्ति ने उनकी सोच को एक नई उड़ान दी है। औरत और उनसे जुड़े मुद्दे हमेशा उनके मन के करीब रहे हैं। उन्होंने स्त्री मुद्दों को जमीनी हकीकत के साथ पाठकों के सामने रखा। घर-परिवार और रिश्ते-नातों को तरजीह देते हुए बड़ी ही खूबसूरती के साथ उनका अंकन करने वाली चंद्रकला जी समाज में मौजूद विसंगतियों के प्रति गहरी फिक्र का भाव रखती हैं। जटिल जीवन स्थितियों, अत्यंत मामूली और रोजमर्रा की चीजों, विसंगतियों, विडंबनाओं, और विद्रूपताओं के तनाव को कवयित्री ने गहराई से देखा, परखा और पहचाना है और इसी तनाव की अभिव्यक्ति उनकी कविता में हुई है।

''कवयित्री शोषित वर्ग के दर्द और पीड़ा के प्रति सहानुभूति रखती है और उनके साथ संघर्ष के लिए खड़े होना चाहती हैं। राजनीतिक या सामाजिक समस्याओं को उठाने के स्थान परिवेश और समाज के अनेक छोटे-छोटे संदर्भों को अपनी कविता का विषय बनाना चंद्रकला को अधिक प्रिय है। इन संदर्भों के माध्यम से ही वह किसी संदर्भ तक पहुँचना चाहती हैं। बाहरी दुनिया की अपेक्षा कवयित्री व्यक्ति के अंतर में झाँकना चाहती है और आंतरिक जगत की विविधता को उभारना चाहती है।''1

चंद्रकला जी की कविताएँ समाज में व्याप्त विसंगतियों को व्यक्त करती हैं उनकी कविताओं में विद्रोह और संघर्ष का भाव मुखर हुआ है। वे स्त्री जीवन को सहज और सुंदर बनाना चाहती हैं। खोखलेपन और स्वार्थपरता के विरुद्ध आवाज उठाती उनकी कविता वर्तमान परिवेश से गहरी पहचान भी कराती है। वास्तव में चंद्रकला जी की कविता अहसास और विश्वास की कविता है। 'शायद किसी दिन' शीर्षक कविता में घर-परिवार और समाज सब में आमूल-चूल परिवर्तन की परिकल्पना करते हुए कवयित्री कहती हैं -

''शायद किसी दिन हम भी पी सकें
भीड़भरे चायघरों में
सुख से चाय का एक प्याला अकेले
और किसी को हैरत न हो कि -
देखो इस औरत को
कैसी बैठी है मर्दों से खचाखच भरे
इस चायघर में अकेली
लगता है ऐसी-वैसी है'' 2

चंद्रकला जी का कविमन आलोचकों की परवाह न करके अपनी अनुभूति को बड़ी सादगी से रखता है। उनकी दृष्टि अनदेखे को भी देख लेती है। यही एक रचनाकार की विशिष्टता ही है जो हमें अनदेखे कर्म की अनुभूति कराती है। आज की दुनिया इतनी असुरक्षित है कि हम सब डरे हुए हैं। दहशत भरे वातावरण के कारण बेटियों को साँझ होने से पहले ही माँ घर के भीतर बुला रही है। यह अलग से कहने की जरूरत नहीं है कि हमारी सभ्यता बेटियों के प्रति कितनी क्रूर है। 'नसीहत' शीर्षक कविता की पंक्तियाँ हैं -

साँझ से पहले घर लौट आना
बेटियों के लिए रात-बिरात
चौखट से बाहर की दुनिया जंगल है
शहर में बेधड़क घूमती हैं
कलेजा हिला देने वाली खबरें
कोई पुकारे कहीं से भी
मुड़ कर मत देखना

...

सपनों में गुम रहना चाहने वाली इस उम्र को
बेटियों को किसी तरह सहना होता है
तैयार करना होता है मन को,
देह को,
आत्मा को मर्दों की दुनिया में 3

'नसीहत' शीर्षक कविता तीस साल पहले लिखी गई किंतु आज भी यह उतनी ही प्रासंगिक है। यह कविता चित्र उपस्थित करती है ऐसे क्रूरता भरे समय का जिसमें बेटियों की स्वतंत्रता खत्म होने के साथ ही उनका भोलापन और बचपन भी खो गया है। परिवार एवं समाज दोनों जगह पुरुष शक्तियाँ लड़कियों को अपनी हिंसक उत्तेजना का शिकार बना रही हैं। उनकी आँखों में अपने सपनों से कहीं अधिक कुत्सित मानसिकता वाले पुरुषों की भयावहता दिखती है। अब वे यह आशंका लेकर निकलती है कि जिस सपने को पूरा करने के लिए वे निकली हैं वह किसी पुरुष द्वारा हिंसक उत्तेजना का शिकार होकर कहीं कुचल न दिया जाए।

स्त्री-मुक्ति के प्रश्नों से जूझती चंद्रकला जी की कविता कहीं न कहीं समाज के दोहरे मानदंडों की ओर भी संकेत करती है। इसी दोहरी मानसिकता के कारण ही स्त्रियों का सर्वाधिक शोषण भी हुआ है। आज भी स्त्रियाँ अत्याचारियों द्वारा ठगी जा रही हैं और सामंती विचारधारा के पुरुष आज भी तानाशाह की भूमिका में हैं -

''बहुत फर्क होता है तानाशाह और पेशेवर हत्यारे में
हत्यारा कभी उतना सुनियोजित नहीं होता
जितना कि तानाशाह
और तानाशाह कभी कोई शिनाख्त नहीं छोड़ता।''4

उनकी कविताएँ प्रतिपक्ष धर्मी हैं। उन्होंने इस कविता में पुरुषसत्ता का पर्दाफाश किया है। उनका उद्देश्य इस सत्तातंत्र की सूचना देना भर नहीं हैं बल्कि पुरुष वर्चस्व के स्त्री विरोधी रवैये से पाठक को परिचित कराना है।

अफगानिस्तान जैसे देश में एक लड़की या महिला को सम्मान के साथ जीने का कोई अधिकार नहीं है। एक इनसान की तरह की जिंदगी वह नहीं बिता सकती। सन 1996 में जब तालिबान सरकार आई थी तबसे ही औरतों का जीना और दूभर हो गया था। तालिबानियों की नजर में महिलाओं के लिए चोरी या हत्या करना ही अपराध नहीं बल्कि बुर्के से बाहर निकलना, सजना, सँवरना, मेहँदी लगाना, नेलपालिश लगाना, पढ़ना-लिखना, पर पुरुष के साथ दिखाई पड़ना भी अपराध की श्रेणी में आता है। चंद्रकला जी कहती हैं कि वे इन औरतों से डरते हैं। इनके भीतर की आग को पनपने देने से रोकना चाहते हैं इसलिए उन्होंने पढ़ना-लिखना और घर से बाहर अकेले जाना भी वर्जित कर रखा है। अफगान औरतें कविता की पंक्तियाँ हैं -

''वे डरते हैं कि ये औरतें और इनका विरोध
जमीन के भीतर की आग है
वे जानते हैं कि खतरनाक होता है
आग का कहीं भी जड़ पकड़ना
वे जानते हैं कि जड़ों से जिंदा चीजों को
कभी भी खत्म नहीं किया जा सकता।'' 5

औरतें देश, सत्ता युद्ध एवं ऐश्वर्य से बेदखल करने के बाद भी पुरुषों की नींद हराम किए रहती हैं। तानाशाहों को यह डर बना रहता है कि इन्हें जिंदा छोड़ना अपने खिलाफ लड़ाई को खुला छोड़ देना है। औरतों पर कोड़े बरसाए जाते हैं, उन्हें गोलियों से उड़ाया जाता है। यह तालिबानी मानसिकता धीरे धीरे सबमें घर करती जा रही है किंतु इस तरह के विरोध से औरत का हौसला भी बुलंद होता है। इन विरोधी तेवरों के कारण ही मलाला यूसुफजई जैसी लड़की सामने आ कर प्रतिरोध करती है। मलाला ने तालिबान के फरमान के बावजूद लड़कियों को शिक्षित करने का अभियान चला रखा है जिससे मलाला को तालिबानियों की गोलियों का शिकार होना पड़ा। जीवित बचने पर दुबारा हमला एवं परिजनों पर भी हमले की धमकी दी गई थी, पर वह आग जड़ पकड़ चुकी थी। आज मलाला की पहचान दुनिया के सामने आई है और उसे बहादुरी के लिए नवाजा गया है। वैश्वीकरण की बुराइयों ने हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था को ध्वस्त करने का काम किया है। इसका असर समकालीन कविता पर भी पड़ा है। आज की कविता पर भूमंडलीकरण का प्रभाव दिखाई दे रहा है। पुरुष प्रधान समाज में स्त्री को केवल व्यापार की वस्तु तथा मनोरंजन के साधन के रूप में देखा जा रहा है। औपनिवेशिक बाजार में स्त्री बिकाऊ माल बन गई है। करोड़ों के उत्पाद विज्ञापनों में स्त्री सिर्फ जिंस के रूप में उपस्थित है।

चंद्रकला जी की रचनात्मक दृष्टि की यह भी विशेषता है कि उसका संबंध औपनिवेशिक बाजार की स्त्री से भी है। स्त्री परतंत्रता उन्हें आहत करती है और वे बाजार की संस्कृति से साथ मजबूत होती जाने वाली परतंत्रता की जकड़न को भी खूब पहचानती हैं। चंद्रकला जी के यहाँ स्त्री की चिंता अपने ढंग की है। विज्ञापन के बाजार में अनेक सौंदर्य प्रसाधनों के साथ ही आर्थिक मजबूरियों को झेलती स्त्री है, जिन्हें गहरी सहानुभूति के साथ कवयित्री देखती है। बाजारवाद ने जिस तरह से जीवन और संवेदना को भी बाजारू और कृत्रिम बना दिया हैं, उसकी झलक 'वे औरतें' कविता में देखी जा सकती है -

''लेबल से ज्यादा चिपकी और चमकती हुई ऐसे समय में
जब पैसे से ज्यादा श्लील और ताकतवर कुछ भी नहीं
वे देह को उपभोक्ता माल की तरह चमकाती हुई
खाने-पीने और आराम से सोने की चर्बी से भयभीत
किसी भी कमजोर क्षण में
देह की स्वाभाविकताओं की ओर नहीं लौटतीं।''6

देह की स्वाभाविकता से परे देह को उपभोक्ता की तरह चमकाती हुई स्त्रियाँ इस कविता का प्रतिपाद्य हैं। इनकी कविता की स्त्री सारी औपनिवेशिक यंत्रणा को पहचानती है और अपनी स्वाभाविकता से दूर यंत्रवत अपने को प्रस्तुत करती है। पितृसत्तात्मक व्यवस्था ही ऐसी है जो रूप और यौवन को अधिक महत्व देती है। यह सारा कारोबार ही उसी सत्ता व्यवस्था के तहत चलता है।

चंद्रकला त्रिपाठी लिखती हैं कविता लिखना बैठे ठाले का काम नहीं है। ये कविता कवयित्री के सरोकार को स्पष्ट करती है। 'कविता लिखने वाली स्त्री' शीर्षक कविता की पंक्तियाँ देखिए - कविता लिखने वाली स्त्री कहती है कि -

वह कविता लिखना फुरसत के काम की तरह नहीं
छोड़ सकती
कामों से लदे-फदे दिन और रात के भीतर
उसकी फुरसत
तुरंत थकी हुई देह और
आत्मा का हिसाब-किताब शुरू कर देती है।7

कविता लिखना फुरसत का काम नहीं है कि उसे छोड़ दिया जाए। कविता चारों दिशा में घिरे योद्धा का हथियार है और योद्धा कभी भी हथियार रखकर या टिकाकर सोते नहीं। इसी प्रकार कविता स्त्री के लिए भी उन बेचैनियों और समस्याओं से छुटकारा नहीं है। वह सामना करने का हथियार है। अतः स्त्री कविता लिखना कैसे दरकिनार कर सकती है? 'कविता लिखने वाली स्त्री' शीर्षक कविता मात्र लिखने का संघर्ष नहीं, जीवन जिए जाने का संघर्ष भी है। यही सामाजिक संघर्ष समकालीन कविता में उभरकर सामने आ रहा है।

स्त्रियों में एक प्रकार की विशिष्ट प्रतिभा भी होती है। अनामिका के शब्दों में - "औरत काम करते-करते भी गा-बतिया सकती है। वह एक साथ बहुत तरह के काम कर सकती है, क्योंकि वैज्ञानिक शोधों का निष्कर्ष है कि उनके दाएँ और बाएँ मस्तिष्क एक साथ काम करते हैं और इसलिए उनका दिमाग संतुलित भी ज्यादा होता है। दुनिया के हर देश का ऊर्जस्वी लोक साहित्य और अब तो शिष्ट साहित्य भी (साथ-साथ) कपड़े पछीटती, पालने डुलाती, धान कूटती, चक्की चलाती औरतों का अवदान है।'' अनामिका आगे कहती हैं कि ''पाँचो इंद्रियाँ एक साथ सजग हो जाती हैं - स्त्री लेखन में और जीवन में भी। पाँचो इंद्रियाँ एक साथ सजग रखने की सिनेस्थेसिया तकनीक भी स्त्री दृष्टि का बहुत बड़ा अवदान है जो उस चिंतन को एकांगी नहीं बनाने देता और उसे चीजों को समग्रता में लेना सीखना है, दूसरों के पक्ष से सोच पाने की क्षमता उनमें विकसित करता है।''8

चंद्रकला जी की कविताएँ स्त्रियों को उनकी प्रतिभा की याद दिलाते हुए संघर्ष के लिए तैयार करती हैं। रचनाकार भावी संभावनाओं को संकेतबद्ध करते हुए एक प्रेरक भूमि तैयार करता है। समकालीन रचनाकार समय समाज में व्याप्त किसी भी विडंबना को अनदेखा नहीं कर पाता। चंद्रकला जी की कविता का अस्तित्व भी स्त्री की पीड़ा के चित्रण के साथ-साथ उसके स्वाभिमान की सुरक्षा के संघर्ष में दिखाई पड़ता है यह मात्र व्यथा नहीं बल्कि क्रांति का स्वर है।

निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि स्त्रियों की त्रासदी एवं उत्पीड़न के साथ उसके संघर्ष एवं संकल्पशक्ति को चित्रित करने में भी कवयित्री सफल रही है। स्त्री जीवन के विभिन्न पहलुओं को परत-दर-परत खोलने में जहाँ इनकी सामर्थ्य से पाठक परिचित होता है वहीं स्त्री मुक्ति संबंधी प्रश्नों से जूझती भाषा भी बेबाकी से अपनी छाप छोड़ती है।

संदर्भ-ग्रंथ

1. समकालीन कविता का सच, डॉ. गुरचरण सिंह, पृ.सं.-108

2. शायद किसी दिन, चंद्रकला त्रिपाठी, पृ.सं.-09

3 . नसीहत, शायद किसी दिन, चंद्रकला त्रिपाठी, पृ.सं.-30

4 . फर्क़, शायद किसी दिन, चंद्रकला त्रिपाठी, पृ.सं.-01

5. अफगान औरतें, शायद किसी दिन, चंद्रकला त्रिपाठी, पृ.सं.-40

6 . वे औरतें, शायद किसी दिन, चंद्रकला त्रिपाठी, पृ.सं.-41

7. कविता लिखने वाली स्त्री, शायद किसी दिन, चंद्रकला त्रिपाठी, पृ.सं.-43

8. स्त्री-मुक्ति : साझा चूल्हा, अनामिका, पृ.सं.-15


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