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लेख

आसमान के बूढ़े : क़्वेसार
स्कंद शुक्ल


1.

वे जाड़े के उतार के दिन थे। फरवरी का पाँचवाँ। साल 1963। एक बार फिर उस आदमी ने अपनी 'दिव्य दृष्टि' रात के आसमान में उस ओर टिका दी, जहाँ से एक नन्हीं रोशनी आती दिखाई दे रही थी। दूर-बहुत दूर - बहुत-बहुत दूर से। उसे तब क्या मालूम था कि अंतरिक्ष से एक बूढ़ा उसका अभिवादन कर रहा है।

आज हम जानते हैं कि क़्वेसार आसमान के बूढ़े हैं। लेकिन इस उम्र में भी वे अपनी जिंदगी 'लिव-लाइफ-किंग-साइज' जीते हैं। वे हमसे बहुत-बहुत-बहुत दूर हैं। बिलियनों प्रकाश-वर्ष दूर। उनसे अत्यधिक प्रकाश निकलता है। ऐसा तीव्र आलोक जैसा समूची गैलक्सी के सारे तारे मिलकर भी नहीं उत्पन्न कर पाते। तभी तो इतनी दूर होकर भी वे हमें नजर आते हैं यहाँ! और फिर चूँकि ब्रह्मांड फैल रहा है, इसलिए हमसे दूर के सभी पिंड हमसे दूर भाग रहे हैं। जो जितना दूर, वह उतना तेज भाग रहा है : ऐसा वैज्ञानिक हबल हमें बता-दिखा गए हैं। सो बिलियनों प्रकाश-वर्ष दूर क्वेसारों की गति की कल्पना कीजिए : अत्यधिक वेगवान, कुछ तो प्रकाश की गति का अस्सी प्रतिशत तक!

मार्टेन श्मिट ने उस दिन एक अंतरिक्षीय बुजुर्ग को ढूँढ़ निकला था। क़्वेसी-स्टेलर-रेडियो-स्रोतों को छोटा करके उन्होंने इन्हें क़्वेसार पुकारा। पहला क़्वेसार जो खोजा गया, कहलाया 3C 273। किसी कार या बाइक का अधछूटा नंबर हो मानो। मुआ विज्ञान यही करता है : निष्ठुर गणितीय नामकरण ही उसके वश में है। ऐसे में उसे कला का साहचर्य लेना चाहिए। किसी को ढूँढ़ने के बाद कला को धीमे से दिखाना चाहिए। कला प्राणमयी है, वह विज्ञान-संतति को सजीव नाम प्रदान कर देगी और अपना बना कर पालेगी।

तब से अब तक ढेरों क़्वेसार खोज निकाले गए। वे जो भुक्खड़ ब्लैक होलों के चारे की तरह उनके इर्द-गिर्द रहते हैं। ब्लैक होल उन्हें खाते रहते हैं। आसपास खिलाई का नजारा अद्भुत होता है। ब्लैक होलों में गिरता पदार्थ और प्रकाश ! आपस में टकराते कण ! घर्षण और वेग ! जो भीतर जाएगा, फिर कभी न निकल सकेगा ! यह अंतिम घड़ी है ! तभी तीव्र आलोक के साथ सब कुछ अंतिम विदा लेता उस असीम गुरुत्व के पिंड में विलीन हो जाता है। पिंड जिसका एकदिशीय प्रवेश-द्वार ईवेंट-होराइजन कहलाता है। जहाँ से कुछ वापस ब्रह्मांड में आज तक आता नहीं पाया गया।

इस अंतिम प्रवेश से पहले जो भगदड़ मची, उससे केवल आलोक नहीं फूटता। बहुत तरह के विकिरण फूटते हैं। समय आ गया है कि हर व्यक्ति जाने कि प्रकाश और एक्स-किरणें बहनें हैं। लोग बूझें कि गामा किरणें और रेडियो-किरणें भी प्रकाश की सगी रिश्तेदार हैं। प्रकाश हमें दिखता है, क्योंकि हमारी आँखें उसके लिए संवेदनशील हैं। लेकिन एक्स-रे का रंग क्या है, हम नहीं जानते। हमें नहीं पता कि रेडियो वाली विकिरण का कोई रंग भी होता है। गामा या अल्ट्रावायलेट कैसी दिखती है, हमें नहीं पता। सो इन अन्य ज्योति-कुटुंबियों को हम अपने यंत्रों से पकड़ते हैं। जहाँ आँखों का वश नहीं, वहाँ मशीन का प्रयोग हम करते हैं।

हमारा ब्रह्मांड बूढ़ा हो चला है। इसमें गैलेक्सियाँ बहुत हैं। लगभग सभी के केंद्र में एक महाविशाल ब्लैक होल भी उपस्थित है। लेकिन सबके आसपास क़्वेसार-जैसा कुछ नहीं। 90% गैलेक्सियों के केंद्र से लगभग कुछ नहीं फूट रहा। न कोई प्रकाश और न कोई रेडियो-एक्स-गामा तरंगें। दूसरे शब्दों में के गैलेक्सी-केंद्र निष्क्रिय या इनऐक्टिव हैं।

बाकी बचे 10%। इनमें ब्लैक होलों की भूख बरकरार है। वे आसपास की सामग्री का भक्षण कर रहे हैं। ये सक्रिय गैलेक्टिक केंद्र हैं। इनसे तरह-तरह की तरंगें फूट रही हैं, जिन्हें हम अपने यंत्रों से पकड़ रहे हैं।

कहते हैं कि हर गैलेक्सी कभी तरुण थी। उसके केंद्र में सक्रियता थी। उसके ब्लैक होल यों संतृप्त नहीं हुए थे; वे क़्वेसार-कर्म कर रहे थे लगातार। फिर ज्यों-ज्यों जवानी गई, क्वेसारियत भी गई। अब जो शेष है, वह बस पुरानी याद है।

पर गैलेक्सियाँ बूढ़ी हो गईं, तो वे पुनर्युवा हो सकती हैं। दो गैलेक्सियाँ आपस में टकरा सकती हैं। उनके ब्लैक होल भी परस्पर मिल सकते हैं। भूख फिर से जाग सकती है। क़्वेसार का अपरिमित आलोक फिर से फूट सकता है, रेडियो की धुनें फिर से हम तक आ सकती हैं।

सीखिए अंतरिक्ष से। बूढ़ा होने के लिए बहाना मत तलाशिए। जब चाहे व्यक्ति यौवन को लौट सकता है। जब चाहे वह ब्लैक होल से क़्वेसार का निर्माण कर सकता है। जगमगा सकता है। बस भूख को जगाइए।

यौवन बुभुक्षा है, केवल बुभुक्षा। 'बुभुक्षितः किम् न करोति पापम्' में सबसे बड़ा शब्द 'पापम्' किसी को लगे-तो-लगे, मुझे तो 'किम्' लगता है !

किम् ! कौन सा ! कुछ भी ! भूखा कुछ भी कर सकता है !

मार्टेन श्मिट बहुत भूखे थे !

2.

आसमान में बजे रेडियो, सदियों-सदियों बड़ा पुराना !
जगमग-जगमग भेज इशारे, गाता है अधबूझा गाना !

क़्वेसार को देखिए ! नंगी आँखों से तो हम-आप इन्हें ढूँढ़ ही नहीं सकते, लेकिन इनके चित्र खँगाल तो सकते ही हैं। फिर जब कभी किसी उन्नत वेधशाला में जाने का अवसर मिले, तो बात ही क्या !

क़्वेसार अंतरिक्ष के एफएम-स्टेशन हैं। कौन इन्हें बजा रहा है और कैसे - यह हम अब भी जानने के क्रम में हैं। इन रहस्यमय पिंडों से रेडियो-तरंगें फूटा करती हैं और हम तक आती हैं। हम उनका अध्ययन करते हैं : नित्य नए अनुत्तरण को उत्तरण में बदलते हुए।

आसमान में खरबों-खरब गैलेक्सियाँ हैं; हर गैलेक्सी में खरबों-खरब तारे। ढेरों गैलेक्सियों के केंद्र में एक ऐसे पिंड की अवस्थिति है, जिसे वैज्ञानिक सुपरमैसिव ब्लैक होल कहते हैं। सूर्य से बहुत-बहुत बड़ा (बिलियनों गुना बड़ा !) एक ऐसा काला पिंड जो अपने ऊपर पड़ने वाले समस्त प्रकाश को सोख लेता है और इस कारण नजर नहीं आता !

ये अतिविशाल ब्लैक होल गैलेक्सियों के बकासुर हैं। वे जो नित्य आसपास की एकचक्रा नगरी के पुरजनों को लील रहे हैं, लीलते जा रहे हैं। इन ब्लैक-होलीय बकासुरों की क्षुधा बहुत-बहुत ज्यादा है। इनके असीमित गुरुत्व के कारण इनके इर्द-गिर्द की धूल-गैसें-तारे और न जाने कितने ही पिंड इनमें समाते जा रहे हैं ! ज्यों नदी के किसी शक्तिशाली भँवर में तमाम वस्तुएँ समा जाती हैं !

ज्यों-ज्यों आसपास की सामग्री इन बकासुरों का ग्रास बनने को घूमती हुए इनमें समाने को आगे बढ़ती है, कई अद्भुत घटनाएँ घटती हैं। अत्यधिक वेग और घर्षण के प्रभाव से इन सामग्री से अपरिमित आलोक फूटता है ! इतना अधिक प्रकाश जितना समूची गैलेक्सी से भी न फूटता हो ! हर तरह की किरणें ! प्रकाश की और प्रकाशेतर की भी ! रेडियो किरणें ! एक्स किरणें ! गामा किरणें ! मानो ग्रास बनती सामग्री अलग-अलग स्वरों में आर्त्तनाद कर रही हो कि हमें इस दैत्य से बचाओ !

क्या ये विशाल बकासुर हर गैलेक्सी के केंद्र में हैं ? संभवतः हाँ। हमारी आकाशगंगा के भी बीचों-बीच एक ऐसा ही दैत्य स्थित है। पर क्या वह भी इतना ही भूखा है ? क्या वह भी आसपास की सामग्री और पिंडों को लील रहा है ? क्या उससे भी इसी तरह का किरण-पुंज फूट रहा है ? नहीं। ऐसा नहीं है। सभी गैलेक्सियों के केंद्र वे ब्लैक होल स्थित भले हों, लेकिन सभी की भूख एक-समान नहीं। सब एक-सी खिलाई नहीं कर रहे। सो सभी से यह किरण-पुंज नहीं फूट रहा। सो सभी क़्वेसार नहीं हैं।

विशाल ब्लैक होलों के चारों ओर घूमती और सदा के लिए भीतर समा जाती सामग्री के इस तंत्र को विज्ञान क़्वेसार कहता है। पूरे नाम क़्वासी-स्टेलर रेडियो-सोर्सेज का लघुरूप। सौरमंडल के बराबर के ये क़्वेसार बहुत-बहुत-बहुत प्रकाशमान हैं, किंतु हमसे बहुत दूर भी हैं। बिलियनों साल पुराना इनका प्रकाश हम-तक आज पहुँच रहा है !

क़्वेसार हम-तक अतीत का इशारा हैं। ब्रह्मांड में जो जितना दूर हैं, वह उतना अतीत में है। बिलियनों साल पुराना प्रकाश आज देखने का अर्थ है कि उस ज्योति-पुंज से मिलना, जो तब चला था जब यहाँ मनुष्य का नामोनिशान नहीं था। वह हम तक आया और इतने सालों में यहाँ इतना कुछ घट गया !

ब्रह्मांड में जो हमसे जितना दूर है, वह उतनी तेजी से हमसे दूर भी जा रहा है। इसी कारण कई क़्वेसार हमसे बहुत तेजी से दूर भाग रहे हैं ! प्रकाश की अस्सी फीसदी गति से ! हमारी पहुँच और पकड़ से ओझल होने के लिए !

हम क़्वेसारों को क्यों जानें ? क्योंकि हमें ब्लैक होलीय बकासुरों को समझना है। उनकी भूख को भेदना है। सभी ब्लैक होलों की भूख एक-सी क्यों नहीं है, यह जानना है। विज्ञान का मानना है कि नए ब्लैक होलों में यह भूख पुरानों से कहीं अधिक होती है। शायद हमारी आकाशगंगा के केंद्र का भी दानव खाते-खाते तृप्त हो गया हो और अब वह क़्वेसार-कर्म न कर रहा हो ? लेकिन फिर प्रश्न है कि क्या हमेशा क़्वेसार को पाने के लिए ब्लैक होल का होना जरूरी है ? ढेरों प्रश्नों के उत्तर हम नहीं जानते। लेकिन हम जानने के क्रम में हैं। हम भूखे हैं और हमारी भूख संसार के सबसे बड़े ब्लैक होल से भी बहुत-बहुत अधिक है।

तुम खगोल-ज्योति खाओ, हम भी खगोल-ज्ञान जीमेंगे ! देखते हैं कालिम पिंड, कि कौन टिकता है !


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