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मानवीय यथार्थ के रचनाकार : अमृतलाल नागर
अमित कुमार विश्वास


'इतिहास में नागरजी को देश की त्रस्‍त जनता के दर्शन होते हैं। उनकी निगाह समाज के उन वर्गों पर जाती है, जिनमें विद्वान लोग वीरता की कल्‍पना भी नहीं करते। स्त्रियों की समस्‍याओं, उनकी अपार शक्ति और वीरता की कल्‍पना भी नहीं करते। स्त्रियों की समस्‍याओं, उनकी अपार शक्ति और वीरता, उनके रीति-रिवाज और विश्‍वासों के वे अनुपम चितेरे हैं। वर्तमान समाज की व्‍यापक जानकारी के बल पर वे इतिहास को रखते हैं और इतिहास की परख के बल पर वे वर्तमान का तानाबाना सजाते हैं'- रामविलास शर्मा ('उजास की धरोहर' पुस्‍तक से उद्धृत)

प्रेमचंदोत्तर हिंदी साहित्य को जिन साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से संवारा है, उनमें अमृतलाल नागर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। किस्सागोई के धनी अमृतलाल नागर ने कई विधाओं से साहित्य को समृद्ध किया। उन्‍होंने कहानी, उपन्यास के अलावा नाटक, रेडियो नाटक, रिपोर्ताज, निबंध, संस्मरण, अनुवाद, बाल साहित्य आदि के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। साहित्य जगत में उपन्यासकार, नाटककार, निबंधकार, कहानीकार के रूप में ख्याति प्राप्त इस साहित्यकार का हास्य-व्यंग्य भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। उनकी जिंदादिली और विनोदी वृत्ति उनकी कृतियों को कभी विषादपूर्ण नहीं बनने देती। 'नवाबी मसनद' और 'सेठ बांकेमल' में हास्य व्यंग्य की जो धारा प्रवाहित हुई है, वह अनंत धारा के रूप में उनके गंभीर उपन्यासों में भी विद्यमान है और विभिन्न चरित्रों एवं स्थितियों में बीच-बीच में प्रकट होकर पाठक को उल्लासित करती रहती है।

शोधपरक चिंतन से साहित्‍य को ऊर्जस्वित करने वाले नागरजी के उपन्यास हों, उनकी कहानियाँ हों या कि 'ग़दर के फूल', 'ये कोठेवालियाँ' जैसी विशिष्ट कृतियाँ हों जिनकी परंपरा तब तक के हिंदी संसार में नहीं ही थी, उनकी यह सभी कृतियाँ उन्हें एक ऐसा महानतम रचनाकार सिद्ध करती हैं जिसकी जड़ें अपनी जमीन, अपनी परंपरा में गहराई तक धंसी थीं। इसीलिए उन्होंने अपने समय का मुकम्मल यथार्थ रचने के साथ-साथ ऐसी भी बहुत सारी कृतियाँ हमें दीं जिनमें भविष्य के ठेठ भारतीय स्वप्न विन्यस्त मिलते हैं। नागरजी कभी एक आयामी लेखक नहीं रहे। उनके विपुल रचना संसार में गोता लगाने पर पता चलता है कि उन्‍होंने सहज भाषा, सरल दृश्य के अनुकूल एक बड़े कैनवास पर काम किया है और हमारी व्‍यवस्‍था व सामाजिक जीवन के विविध आयामों को उद्धाटित किया है।

उपन्‍यासकार के रूप में : अमृतलाल नागर एक बेहतरीन उपन्‍यासकार हैं। 'अमृत और विष' उनका प्रसिद्ध उपन्यास है। 'मानस का हंस' उपन्यास हिंदी साहित्य में संभवतः ऐसा पहला उपन्यास है, जो किसी महाकवि के जीवन को आधार बनाकर रचा गया हो। कथाकार अमृतलाल नागर ने वस्तुतः 'मानस का हंस' और 'खंजन नयन' शीर्षक से लिखे अपने दो उपन्यासों से हिंदी-जगत को दो 'कालजयी' महाकवियों के जीवन से परिचित कराया है, जो क्रमशः महाकवि तुलसीदास और महाकवि सूरदास हैं। 'बूँद और समुद्र' तथा 'अमृत और विष' जैसे वर्तमान जीवन पर लिखित उपन्यासों में ही नहीं, 'एकदा नैमिषारण्ये' तथा 'मानस का हंस' जैसे पौराणिक-ऐतिहासिक पीठिका पर रचित सांस्कृतिक उपन्यासों में भी उत्पीड़कों का पर्दाफाश करने और उत्पीड़ितों का साथ देने का अपना व्रत उन्होंने बखूबी निभाया है। अतीत को वर्तमान से जोड़ने और प्रेरणा के स्रोत के रूप में प्रस्तुत करने के संकल्प के कारण ही 'एकदा नैमिषारण्ये' में पुराणकारों के कथा-सूत्र को भारत की एकात्मकता के लिए किए गए महान सांस्कृतिक प्रयास के रूप में, तथा 'मानस का हंस' में तुलसी की जीवन कथा को आसक्तियों और प्रलोभनों के संघातों के कारण डगमगाकर अडिग हो जाने वाली 'आस्था के संघर्ष की कथा' एवं उत्पीड़ित लोकजीवन को संजीवनी प्रदान करने वाली 'भक्तिधारा के प्रवाह की कथा' के रूप में प्रभावशाली ढंग से अंकित किया है। उनके उपन्यासों जैसे 'बूँद और समुद्र', 'अमृत और विष', 'नाच्यौ बहुत गोपाल', आदि में सामाजिक जीवन का चित्रण हैं। 'बूँद और समुद्र' में व्यक्ति और समाज के सामंजस्य पर बल दिया गया है। बूँद के रूप में व्यक्ति और समुद्र के रूप में समष्टि का प्रतीकात्मक संकेत है।

कथाकार के रूप में : अमृतलाल नागर हिंदी के गंभीर कथाकारों (उपन्‍यासकार और कहानीकार) में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में न तो परंपराओं को नकारा है और न ही आधुनिकता से मुँह मोड़ा है। आध्यात्मिकता पर गहरा विश्वास करते हुए भी वे समाजवादी हैं किंतु जैसे उनकी आध्यात्मिकता किसी संप्रदाय कठघरे में बंदी नहीं है, वैसे ही उनका समाजवाद किसी राजनीतिक दल के पास बंधक नहीं है। उनकी कल्पना के समाजवादी समाज में व्यक्ति और समाज दोनों का मुक्त स्वस्थ विकास समस्या को समझने और चित्रित करने के लिए उसे समाज के भीतर रखकर देखना ही नागरजी के अनुसार ठीक देखना है। समाज में खूब घुल-मिलकर अपने देखे-सुने और अनुभव किए चरित्रों, प्रसंगों को तनिक कल्पना के पुट से वे अपने कथा साहित्य में ढ़ालते रहे हैं। अपनी आरंभिक कहानियों में उन्होंने कहीं-कहीं स्वछंदतावादी भावुकता की झलक दी है लेकिन उनका जीवन बोध ज्यों-ज्यों बढ़ता गया त्यों-त्यों वे अपने भावातिरेक को संयत और कल्पना को यथार्थाश्रित करते चले गए।

एक अफीमची किस्‍सागो के रूप में अमृतलाल नागर को कथा-लेखन का संस्‍कार लोकधर्मिता से मिला। उनकी ख्याति उपन्यासों के कारण तो हुई ही हैं, लेकिन इनकी कई कहानियाँ भी लोकप्रिय हुई हैं। नागरजी ने कथ्‍य और शिल्‍प को बड़े विवेक से लोक से ग्रहण किया और उसके तत्‍व को पहचाना जो किस्‍सागो को श्रोता से और लेखक को पाठक से जोड़ता है। 'एक दिल हजार अफसाने' की भूमिका में वे कहते हैं, 'मेरा मालिक आम पाठक था जिसमें अमीर भी थे और गरीब भी, इसलिए किस्‍सागोई को मैंने जनरुचि और जनहित का किस्‍सा बनाकर ही पेश करने की कोशिश की है।' आज के जीवन के आर्थिक संकट, विपन्नता, परिवारिक संबंधों का तनाव आदि इनकी कहानियों के मुख्य विषय रहे हैं। इनमें 'दो आस्थाएँ', 'ग़रीब की हाय', 'निर्धन', 'कयामत का दिन', 'गोरखधंधा' आदि उल्लेखनीय हैं।

लोक-कथाकार के रूप में : जिस प्रतिभा से लोक-कथाएँ गढ़ी जाती हैं, नागरजी के पास उसका अक्षय भंडार हैं। रामविलास शर्मा ने 'उजास की धरोहर' पुस्‍तक में लिखा है कि 'वे सुनते हैं, गढ़ते हैं, पात्रों की तरह बोलने लगते हैं, यथार्थ जीवन और कथा का भेद मिट जाता है, जीवन में इतना रस है, लोगों की बातें इतनी दिलचस्‍प हैं, उनका जीवन इतना रोचक है, नागरजी उसी में रम जाते हैं। गली-टोले-मोहल्‍ले, नौजवान, बूढ़े, प्रौढ़ा, मुग्‍धा, स्‍वकीया, परकीया, बुद्धिजीवी, व्‍यवसायी-इनके जखीरे हैं उनके कथा-साहित्‍य में।' 'बूँद और समुद्र' में लखनऊ के सामाजिक जीवन का चंद्रकाता, 'शतरंज के मोहरे' में इतिहास में नागरजी की ऐयारी का नमूना, 'सुहाग के नूपुर' में दक्षिण प्रदेश के प्राचीन जीवन की भीनी सुगंध, 'महाकाल' में अकाल के भयावह दृश्‍य, 'नवाबी मसनद' में लखनऊ के नीम सर्वहारा कादिर, पीरू की दुनिया, 'सेठ बांकेमल' में आगरे की दालमोठ की तरह एकदम स्‍थानीय रंग लिए हुए हैं। नागरजी के चरित्र समाज के विभिन्न वर्गों से हैं। उनकी रचनाओं में अच्छे और बुरे सभी प्रकार के पात्र हैं, किंतु उनके चरित्र-चित्रण में मनोविश्लेषणात्मकता को कम और घटनाओं के मध्य उनके व्यवहार को अधिक महत्त्व दिया गया है।

स्‍त्री विमर्शकार के रूप में : अमृतलाल नागर ने अपने उपन्‍यासों में स्‍त्री जीवन की कई समस्‍याओं को बड़े ही तार्किक ढ़ंग से चित्रित किया है। उन्‍होंने अपने उपन्‍यासों में स्‍त्री का यौन शोषण, अनमेल विवाह, विधवा नारी की बिडंबना, दहेज समस्‍या, वेश्‍यावृत्ति जैसी समस्‍याओं को उकेरा है। 'अग्निगर्भा' उपन्‍यास में वे कहते हैं 'नारी युगों-युगों से प्रताड़ित रही हैं। कभी उसे चुराया गया तो कभी उसे बेचा गया। आज भी सूनी सड़कों पर नारी का अकेले निकलना कठिन है। नारी अत्‍याचार नहीं अपहरण, वेश्‍यावृत्ति का व्‍यापार प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष विद्यमान है।' (अग्निगर्भा, पृ.23)। इस उपन्‍यास का रामेश्‍वर अपनी माता के सामने जब अपने विवाह का प्रस्‍ताव रखता है तो उसकी माँ सीता से विवाह का विरोध करती है क्‍योंकि वह अपने साथ कम दहेज लाएगी। 'अग्निगर्भा' की नायिका अपना सम्मान बनाए रखने में पग-पग पर अंतर्विरोध से गुजरती है। वह अपनी पसंद का जीवन साथी चाहती है तथा परंपरागत मूल्यों, मान्यताओं और बंधनों को नकारती है।

'नाच्यौ बहुत गोपाल' उपन्यास की केंद्रीय विषय भी स्त्री ही है। उपन्‍यास की नायिका निर्गुणिया अनेक प्रेमियों व स्‍वामियों के पुत्रों की कामवासना का शिकार होती है। उसकी देह के साथ अनेक पुरुषों द्वारा निर्मम खिलवाड़ किया जाता है। दरअसल निर्गुण का विवाह मसुरियादीन से करा दिया जाता है जो उम्र में उसके पिता से भी सात साल बड़ा है। वह निर्गुणिया की दैहिक एवं मानसिक क्षुधा को परितृप्‍त करने में पूर्णरूप से अक्षम है। इसलिए निर्गुण विद्रोह कर मोहन मेहतर से विवाह कर लेती है। जिस प्रकार से प्रेमचंद ने 'गोदान' में एक व्यक्ति (होरी) के किसान से मजदूर बनने पर लिखा है उसी प्रकार नागरजी ने 'नाच्यौ बहुत गोपाल' उपन्यास की नायिका निर्गुण के माध्यम से स्त्री के शोषण और अत्याचार का यथार्थ चित्रण किया है। निर्गुण एक साथ दोहरा दुख भोगती है - एक तो स्त्री होने का, दूसरा मेहतर होने का। दरअसल निर्गुण, पुरुष जाति द्वारा किए गए शोषण के कारण ही ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होकर भी मेहतरानी बनना स्‍वीकार करती है। वह अपने जीवन के कटु यथार्थ के बारे में कहती है। 'दुनिया में दो पुराने से पुराने गुलाम हैं - एक भंगी और दूसरी औरत। जब तक ये गुलाम हैं आपकी आजादी रुपये में पूरे सौ के सौ नए पैसे भर झूठी है।' उपन्‍यास में नारी जीवन की समस्याओं को ज्यों का त्यों वर्णित किया है। भिन्न-भिन्न पात्रों के द्वारा व्यक्त विचार नारी की सामाजिक स्थिति को उद्घाटित करते हैं। आज नारी पुरुष के लिए मात्र भोग की वस्तु रह गई है। एक ओर समकालीन समाज में व्याप्त कौटुम्बिक व्यभिचार, वेश्यागमन, बलात्कार, समलैंगिकता को लेखक ने इस उपन्यास में विस्तार दिया है। दूसरी ओर लेखक ने निर्गुण की कथा में रिशी देवी और वेदवती आदि महिलाओं के इतिहास के द्वारा विधवा स्त्री की कसक को चित्रित किया है। एक नारी के विधवा होते ही किस प्रकार रिश्ते-नाते के कुछ दुराचारी लोग उस नारी का जीवन नरक बना देते हैं। इसका चित्रण करते हुए लेखक कहता है कि 'उनके घरवालों ने उन्हें उनकी बड़ी बहिन की तरह घर से निकाला तो नहीं पर विधवा होने के कुछ ही दिनों बाद रिशी देवी के ससुर ही उनके प्रेमी बन गए।'

'बूँद और समुद्र' उपन्‍यास में जगदंबा सहाय के भतीजे की बहू विवाह के चार-पाँच वर्ष बाद ही विधवा हो जाती है और मास्‍टर जगदंबा सहाय के यहाँ रहती है इसलिए उस पर हर तरह का मालिकाना हक जताते हैं। उसके साथ जगदंबा सहाय अनैतिक कार्य करने से भी नहीं झिझकते, किंतु जब वह गर्भवती हो जाती है तो जगदंबा बाबू बेलाग बच जाते हैं। इसलिए उसके समक्ष जलकर मरने के अतिरिक्‍त अन्‍य कोई विकल्‍प नहीं बचता।

'सुहाग के नुपूर' उपन्यास में नगरवधू की पीड़ा और उससे उत्पन्न कुलवधुओं की पीड़ा को समान रूप से चित्रित किया गया है। 'सुहाग के नुपूर' उपन्‍यास में माधवी के चरित्र के माध्‍यम से नागरजी ने वेश्‍यावृत्त्‍िा के मूल तक जाने का प्रयास किया है। उपन्यास तमिल-साहित्य के महाकवि 'इलडोवन' के महाकाव्य 'शिल-प्यापदिकारम' पर आधारित होते हुए भी एक स्वतंत्र रचना है। नगर के प्रसिद्ध प्रतिष्ठित सेठ का लड़का, दूसरे वैभवशाली सेठ का जामाता कोवलन अनिंध्य सुन्दिरी कलगी की उपेक्षा कर, पायल के नुपूरों की झंकार करने वाली माधवी के प्रति आकर्षित होता है किंतु समाज के नियम और बंधनों से वह विवश होता है। माधवी समस्‍त वेश्‍या वर्ग की तड़प और विवशता की प्रतीक है। नागरजी के 'ये कोठेवालियाँ' उपन्‍यास में लल्‍लू की माँ भी आर्थिक विपन्‍नता से विवश होकर वेश्‍यावृत्ति करने पर मजबूर होती है। वेश्‍या बना देने के पश्‍चात हमारा समाज उस महिला का मख़ौल उड़ाता है।

दलित विमर्शकार के रूप में : दलित चिंतन के क्रम में अमृतलाल नागर का नाम अग्रगण्य श्रेणी में है। उनके उपन्‍यास 'खंजन नयन', 'नाच्यौ बहुत गोपाल', 'महाकाल' आदि दलित प्रेरणा से युक्त हैं। 'खंजन नयन' में नागरजी ने न सिर्फ जातिवाद पर करारा चोट करने के साथ नवीन समाज की संरचना का मार्ग दिखाया है बल्कि संपूर्ण संत साहित्य के जातिवाद को एक जबरदस्त चुनौती भी देता है। 'नाच्यौ बहुत गोपाल' उपन्यास में मेहतर समाज की शोषण नीतियों को यथार्थ ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें 'मेहतर' कहे जाने वाले अछूतों में भी अछूत, अभागे अंत्यजों के चारों ओर कथा का ताना-बाना बुना गया है और उनके अंतरंग जीवन की करुणामयी और हृदयग्राही झाँकी प्रस्तुत की गई है। इन दलित जातियों की परिस्थितियाँ और किन सामाजिक परिस्थितियों में अस्तित्व में आई, उसकी धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताएं क्या हैं, आदि प्रश्नों के उत्तर तो दिए ही गए हैं, साथ ही, वर्तमान शताब्दी के पूर्वार्द्ध की राष्ट्रीय और सामाजिक हलचलों का दिग्दर्शन भी जीवंतता के साथ कराया गया है। इसमें नौकरी पाने के लिए मजदूरों की मनोदशा का चित्रण किया गया। पात्र मजीद अपनी घरवाली को नौकरी पक्की करने के लिए शरीगा के साथ दो-चार रात बिताने के लिए कहते हैं। उपन्यास का एक अन्य पात्र कहता है - 'मेहतर साला तो करज में ही जन्मता है और करज में ही मरता है। आज एक तो कल दूसरा महाजन नटई दबाएगा।'

'महाकाल' उपन्यास में उच्च जाति के लोग, निम्‍न जाति को ऊपर उठते हुए देख नहीं सकते। इसी बात को लेखक ने स्‍पष्‍ट करने का प्रयास किया है - 'छोटे जातेर भूखे आगुन शालार ब्याहा डोमवादी अब ऊँची जाति की बराबरी करने चले हैं'। 'शतरंज के मोहरे' उपन्यास के आरंभ में ही लेखक ने फौज द्वारा निम्न वर्ग पर किए गए अत्याचार का चित्रण किया है। 'गाड़ी के फाटक पर बाहरी बस्ती के रहने वाले गरीब किसानों खेतीहारी चमारों की स्त्रियाँ, बच्चे और बूढे अपनी गृहस्थी को लाई जा सकने वाली वस्तुओं की गठरी लादे भीड़ लगाए खड़े थे और फाटक खोल देने के लिए भीतर के सिपाहियों से छिछोरी कर रहे थे... कई गृहलक्ष्मियों की अनमोल इज्जत को बेभाव कर दिया था। उच्च वर्ग के जमींदार निम्न वर्ग की महिलाओं पर अत्याचार करते थे। जमींदार जब किसी स्त्री की इज्‍़जत लूटता तो चार दिन बाद भोग करता फिर उसके निचले व्‍यक्ति उस पर अत्याचार करते। स्त्री घर से निकाली जाकर हाथों-हाथ वेश्या बन जाती थी। फिर उसका समाज में और कहीं भी स्थान नहीं था।

'बूँद और समुद्र', 'भूख' आदि अन्य उपन्यासों में भी दलित विषयों पर गंभीर विमर्श किया गया है। 'बूँद और समुद्र' में लेखक ने अंतरजातीय विवाह के उल्लेख कर समाज की रग-रग में समाई संकीर्ण जातिगत भावना का नई पीढ़ी द्वारा विरोध दिखाया है और दो जातियों के मेल का समर्थन भी किया है। तारा और उसका पति मिस्टर वर्मा एक ऐसा ही युगल है, जो जात-पाँत के बंधनों को तोड़कर विवाह सूत्र में बँध गया है। उनके इस साहसिक कदम की प्रशंसा करते हुए राधेश्याम कहते हैं - 'हमारे वर्मा जी हुए, इन्होंने तो खैर बहुत ही बड़ा बोल्ड स्टेप लिया है, इंटरकास्ट लव मैरेज की है - जी हाँ।' पात्रों का छोटी-छोटी बातों पर जाँत-पाँत का उल्लेख करना, संक्रांतिकालीन समाज के संकीर्ण मनोमस्तिष्क का परिचय देता है। इस उपन्यास का एक पात्र है - भभूती सुनार जो जाति का वैश्य है, उसकी अशिक्षित, किंतु कुछ-कुछ आधुनिकता की ओर खिंची लड़कों की बहुएँ तारावर्मा द्वारा मिसेज सुनार कहलाने में बुरा नहीं समझती। बड़ी बहू का कथन है, 'इसमें काहे का बुरा मानना? जो जिसकी जात होगी, कही जाएगी और फिर हम कोई नीच कौम थोड़ी, वैश्य हैं।' लेखक ने इस उपन्यास में युवावर्ग द्वारा पुरातन व जीर्ण-शीर्ण वर्ण एवं जाति संबंधी भावनाओं का विरोध को दर्शाते हुए संकीर्ण एवं विकृत जाति व्यवस्था को उन्मूलित करने की पुरज़ोर वकालत की है।

'एकदा नैमिषारण्ये' उपन्यास में लेखक ने समाज में रुढ़ रूप में पनपी हुई वर्णवादी व्यवस्था को प्रतिबिंबित किया है। बुद्धिजीवी वर्ग में प्रायः यह चर्चा का विषय रहा है कि मनुष्य की वर्ण व जाति उसके जन्म से माननी चाहिए या कर्मों के आधार पर निश्चित करनी चाहिए? डॉ. दीप्ति शर्मा ने अपने आलेख 'अमृतलाल नागर के उपन्यासों में वर्ण एवं जाति का चित्रण' में उद्धृत किया है कि 'अतः स्पष्ट है कि लेखक वर्ण एवं जाति को जन्मना न मानकर कर्मणा मानता है। नागरजी के अनुसार निम्नकुलोत्पन्न व्यक्ति अपने श्रेष्ठ व सद्कर्मों के आधार पर उच्च जाति वाला हो सकता है तथा उच्चकुल में उत्पन्न ब्राह्मण भी स्वयं के कुकर्मों द्वारा निंदनीय बन सकता है।' उपन्‍यास 'मानस का हंस' में भी लेखक ने तुलसी कालीन समाज की संकीर्ण वर्ण व्यवस्था का विशद चित्रण किया है। बालक तुलसी चूँकि ब्राह्मण जाति के हैं, अतएव उनकी 'धर्म माँ' भिखारिन 'पार्वती अम्मा' उनके मुख से अपने को 'अम्मा' कहलाने में ही धन्य समझती हैं।

अभिनयकर्ता के रूप में : समाज की समस्‍याओं को उजागर करने और उसका समाधान ढूँढने के लिए नागरजी ने अभिनय को अपनाया। उन्‍होंने 1953 से 1956 ने स्‍टाफ आर्टिस्‍ट के रूप में आकाशवाणी की सेवा की। सेवा के दौरान उनके अभिनय की अद्भुत कला से लोगों को सीखने का अच्‍छा अवसर मिलता था। उनकी डायलॉग की एक विशिष्‍ट शैली थी। नागरजी ने डॉक्‍टर संपूर्णानंद कृत 'पृथ्‍वी से सप्‍तऋषि मंडल तक', अपने नाटक 'सुहाग के नूपुर', 'गूँगी', 'सेठ बाँकेमल' जैसे कस्‍बाई संस्‍कृति के जीवंत रूपक लिखे और मंचन भी किया। उन्‍होंने ड्रामा प्रोड्यूसर के रूप में भगवती बाबू सहित अन्‍य लेखकों के नाटक, रूपक आदि को बड़ी मेहनत और लगन से प्रस्‍तुत किया। वे आवाज में बहुत ज्‍यादा उतार-चढ़ाव और नाटकीयता के पक्षधर थे लेकिन उनकी निष्‍ठापूर्ण सच्‍चाई, कठोर परिश्रम और नवीनता कलाकारों के लिए प्रेरणादायी होती। उनका कलाकार दूसरों के अस्तित्‍व में ही अपने को पहचानता है। रामविलास शर्मा 'उजास की धरोहर' पुस्‍तक में लिखते हैं कि 'वे पात्रों के नख-शिख, बोली-ठोली की विशेषताओं के अलावा उनके मन में पैठकर उनकी आशाओं-आकांक्षाओं के साथ साँस लेते, दुख सहते और संघर्ष करते हैं।'

लखनवी मिजाजी के रूप में : उनकी रचनाओं में लखनवी अंदाज से स्‍पष्‍ट होता है कि वे लोक या स्‍थानीय रस्‍म-रिवाज को कितना तरजीह देते थे। यह कहना तो कठिन है कि अमृतलाल नागर का दिल लखनऊ में धड़कता था या कि लखनऊ के दिल में अमृतलाल नागर धड़कते थे। 'हम फिदाए लखनऊ, लखनऊ हम पे फ़िदा' की इबारत दरअसल उनपर ऐसे चस्पा होती है गोया लखनऊ और नागर दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हों। हिंदी ही क्या समूचे विश्व साहित्य में कोई एक लेखक ऐसा नहीं मिला जिसकी सभी रचनाओं में सिर्फ़ एक ही शहर धड़कता हो... एक ही शहर की कहानी होती हो फिर भी वह कहानी सब को ही अपनी ही कहानी लगती हो और कि पूरी दुनिया में छा जाती हो। लिखने को लखनऊ को अपनी रचनाओं में बहुतेरे लेखकों ने रचा है प्रेमचंद से लेकर श्रीलाल शुक्ल और कामतानाथ तक ने इस पर जैसा नागर ने रचा है, वह बेहतरीन है। और उस लखनऊ में भी चौक। चौक ही उनकी कहानियों में बहुतेरे हैं, जैसे कि किसी पतीली में कोई भोज्य पदार्थ। आते तो वह बनारसी बाग और सिकंदर बाग तक हैं पर लौट-लौट जाते हैं लखनवी चौक। जैसे 'करवट' में वह जाते तो कोलकाता भी हैं पर बताते लखनऊ और चौक ही हैं। लखनऊ पर केंद्रित भी उनकी कई रचनाएं हैं जिनमें 'ये कोठेवालियाँ' पुस्तक बहुत चर्चित हुई।

'बूँद और समुद्र' उनका महाकाव्यात्मक उपन्यास है, इसमें भी समूची कथा लखनऊ के चौक में ही चाक-चौबस्त है। वनकन्या, नंदो, सज्जन, शीला, महिपाल, कर्नल आदि तमाम पात्र 'बूँद और समुद्र' में हमारे सामने ऐसे उपस्थित होते हैं गोया हम उन्हें पढ़ नहीं रहे हों, बल्कि उन्‍हें साक्षात देख रहे हों। बिल्कुल ठीक किसी सिनेमा की तरह। जापान में शेक्सपीयर के संबंध में एक सर्वे हुआ था। जब एक जापानी से पूछा गया कि आखि़र शेक्सपीयर यहां क्यों इतना लोकप्रिय हैं? तो उस जापानी का सीधा सा जवाब था - क्योंकि शेक्सपीयर जापानियों के बारे में बहुत अच्छा लिखते हैं। नागरजी के बारे में भी यह बात सही कही जा सकती है। क्योंकि नागरजी भी भले लखनऊ को ही अपनी कथावस्तु बनाते थे, पर वह कथा तो सभी शहरों की होती थी।

17 अगस्त 1916 में आगरा में जन्मे नागरजी का यह जन्म-शताब्दी वर्ष है। नागरजी की विशिष्ट जीवन-दृष्टि और सहज मानवीयता से ओतप्रोत होने के कारण साहित्य की मूल्यवान संपत्ति हैं। जन्‍मशती वर्ष में उनके विशाल रचना-संसार का पुनर्पाठ किया जाना चाहिए और साथ ही देशी-विदेशी भाषाओं में उसका अनुवाद भी, ताकि शोध के नए आयाम से अनछुए पहलुओं से पाठक रू-ब-रू हो सकें।


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हिंदी समय में अमित कुमार विश्वास की रचनाएँ