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लेख

समाजवादी लोकतंत्र के शायर : फ़ैज अहमद फ़ैज
अमित कुमार विश्वास


फ़ैज अहमद फ़ैज का शुमार एशिया के महानतम कवियों में किया जाता है। वे विचारों से साम्यवादी थे और पाकिस्तान कम्यूनिस्ट पार्टी से जुड़े रहे। प्रगतिशील साहित्य आंदोलन के पुरोधाओं में एक, फ़ैज ने पंजाब में प्रगतिशील लेखक संगठन की शाखा (1936) स्थापित की। वे सूफी परंपरा से भी प्रभावित थे, जिसकी झलक उनकी गजलों और नज्मों में मिलती है। कुछ समय तक अध्यापन करने के बाद वे सेना में भर्ती हुए। 1947 में उन्होंने लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से इस्तीफा दिया और पाकिस्तान चले गए। अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ फ़ैज की शायरी हमेशा मुखरित होती रही, जिसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा और कई वर्षों तक निर्वासित जीवन बिताना पड़ा। फ़ैज अहमद फ़ैज की शायरी का अनुवाद हिंदी, रूसी, अँग्रेजी आदि कई भाषाओं में हो चुका है।

उपभोक्‍तावाद ने जिस तरह अपसंस्‍कृति को जन्‍म दिया है उसका प्रभाव साहित्‍य पर भी दिखाई दे रहा है। महाकवि निराला, नागार्जुन, शमशेर, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध, फ़ैज अहमद फ़ैज जैसे हमारे बड़े कवियों ने जिस काव्‍यधारा को हिंदी-उर्दू में विकसित किया, उसकी विरासत आज खतरे में दिखाई देती है। समाज में हो रहे उथल-पुथल के लिए अक्‍सर कवि लेखकों से यह सवाल किया जाता है कि आखिर वे चुप क्‍यों बैठे हैं\ आज के हलचलों की जड़ें बहुत गहराई तक समायी हैं।

फ़ैज़ समाजवादी लोकतंत्र के शायर थे। वे इसलिए इतने लोकप्रिय हुए कि उन्‍होंने लगातार अपनी शायरी में मेहनतकश जनता के उत्‍सर्ग, उनके पराक्रम और खूबसूरती को प्रतिष्ठित किया। वे खुद समस्‍याओं से जुड़ते और जूझते रहते थे। एक कवि की रचनाधर्मिता और उसी ऊँचाई की उनकी संगठन व संचालन क्षमता उनकी व्‍यावहारिक बुद्धि का परिचायक थी। अमृतसर में प्राध्‍यापकीय कार्य के अलावा वे समाज में परिवर्तनगामी चेतना के उत्‍सर्जन को आलोकित करते रहे। यही कारण है कि वे अपना अधिकांश समय ट्रेड यूनियनों की गतिविधियों में बिताते। अमृतसर की छेहरत नामक मुहल्‍ले में बुनकर रहते थे, वहाँ उन्‍होंने ट्रेड यूनियन आंदोलन की गतिविधियों में सक्रियता के साथ पाठ‍कमंच का संयोजन कर बुनकरों को संगठित किया। मेहनतकश जनता के दुख-दर्द में शामिल होने के कारण ही वे दरबारे वतन के कवि के रूप में भी जाने गए। उनकी एक कविता कुछ यूं बयां करती हैं -

'हम मेहनतकश जगवालों से
जब अपना हिस्‍सा माँगेंगे
इक खेत नहीं, इक देश नहीं,
हम सारी दुनिया माँगेंगे'

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ समाजवाद के मानवीय मूल्‍यों के गायक थे। उनका जीवन खुद एक क्रांतिकारी जीवन रहा। जबतक वे जीवित रहे क्रांतिकारी कार्यों के लिए पूरी दुनिया में घूमते रहे। बीसवीं सदी में साम्राज्‍यवाद के विरूद्ध लोहा लेने वाले कवियों में उनका नाम अग्रणी है। वे उस महान कारवाँ के एक योद्धा थे जिसमें शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, मुक्तिबोध जैसे हमारे हिंदी के बड़े कवि शामिल थे। वरिष्‍ठ कवि आलोक धन्‍वा कहते हैं कि 'बीसवीं सदी में वर्ग संघर्ष की जनचेतना को फ़ैज अहमद फ़ैज की कविताओं ने गाँव-गाँव और शहर-शहर में लोकप्रिय किया। जितने भी बड़े जनांदोलन भारत में हुए, उनमें उनकी कविताएँ भी शामिल रही हैं। फ़ैज अहमद फ़ैज, नागार्जुन और मख्‍दूम की कविताएँ सामाजिक न्‍याय के लिए लड़ने वाले हजारों कार्यकर्ताओं को आज भी कंठस्‍थ हैं। उर्दू साहित्‍य के कई आलोचक जो वामपंथी विरोधी हैं वे फ़ैज अहमद फ़ैज को गालिब और मीर की धारा के कवि‍ नहीं मानते हैं। वे उनको एक समाजवादी राजनीति का प्रचारक कवि मानते हैं। इन आलोचकों ने अपनी प्रतिगामी दृष्टि के चलते फ़ैज को वह दर्जा नहीं दिया जो जनता ने दिया।' विनम्रतापूर्वक मैं समकालीन कविता के पाठकों से आग्रह करता हूँ कि मिर्जा गालिब की शायरी पर फ़ैज द्वारा लिखे लेख को अवश्‍य पढ़ें, जिससे यह जानकारी मिल सके कि फ़ैज का मिर्जा गालिब से कितना गहरा व अटूट रिश्‍ता रहा। फ़ैज मिर्जा गालिब को हमेशा ही अपनी महान उस्‍ताद शायर मानते रहे।

प्रगतिशील लेखक संघ का स्‍थापना सम्‍मेलन अप्रैल 1936 में लखनऊ में हुआ था पर फ़ैज़ इससे पहले ही इस राह पर चल पड़े थे हालाँकि इसमें कोई शक नहीं कि इस राह पर चलने में डॉ. महमूददुज्‍ज्‍फर और डॉ. रशीद खाँ जहाँ की भूमिका अहम थी। उनकी परवरिश मजहवी माहौल में हुई थी, स्‍पष्‍टतः उन पर इस्‍लाम, सूफ़ीवादी आध्‍यात्‍म का गहरा प्रभाव था। प्रगतिशील विचारधारा से प्रेरित होने के कारण ही उनका मार्क्‍सवाद तथा जीवन से अर्जित अनुभवों का रंग गहरा होता गया। वे रूमानियत से यथार्थवाद की ओर मुखरित होते गए। प्रेम, सौंदर्य, वैचारिकता और यथार्थ की सटीक समझ का अद्भुत सामंजस्‍य था उनमें। वे आह्वान करते हैं कि -

'बोल कि लब आजाद हैं तेरे
बोल जबाँ अब तक तेरी है
तेरा सुतवाँ जिस्‍म है तेरा
बोल की जाँ अब तक तेरी है'

फ़ैज एक सच्‍चे पत्रकार भी थे। सामाजिक परिवर्तन हेतु उनकी पत्रकारिता शोषण व अन्‍याय के विरूद्ध समर्पित थी। स्‍वातंत्र्योतर वे 'पाकिस्‍तान टाइम्‍स (अँग्रेजी)' के प्रमुख संपादक हो गए। यह अखबार प्रगतिशील व जनतांत्रिक विचारों से लबरेज मानी जाती थी। इसके साथ ही वे उर्दू की एक पत्रिका 'इमरोज़' का भी कार्य देख रहे थे। जनचेतना फैलाने के लिए समर्पित भाव से काम करने का ही परिणाम था कि उन्‍होंने अफ्रो-एशियाई लेखक संघ की पत्रिका 'लोटस' के संपादक की हैसियत से वहाँ के रचनाकारों को आंदोलन की नई जिंदगी दी। इस आंदोलन को उन्‍होंने न सिर्फ एशिया और अफ्रीका तक ही सीमित रखा अपितु अपने पाब्‍लो नेरूदा जैसे मित्रों की मदद से इसे तीसरी दुनिया की आज़ादी एवं विकास का मंच बना दिया। लोटस के संपादकीय द्वारा उन्‍होंने संघर्षशील अरब, लैटिन अमरीकी और अफ्रीकी कवियों, लेखकों और बुद्धिजीवियों के लिए उभरता हुआ चेतनागामी जंग का मैदान बना दिया। भुट्टो के शासनकाल में लोक-कलाओं पर शोध करते हुए उन्‍होंने एक पुस्‍तक की श्रृंखला निकाली। इससे उनका वतन से निर्वासन और अधिक मुखर हो गया। गरीबी की बेबसी में पले फ़ैज़ को गंभीर आर्थिक संकट से गुजरना पड़ा था। लियाकत अली खाँ की हुकूमत का तख्‍ता पलटने के आरोप में सन् 1951 में मेजर जनरल अकबर खाँ, ब्रिगेडियर सिद्दीक खां, लेफ्टिनेंट कर्नल मुहम्‍मद अरबाब, सज्‍जाद जहीर, जफर उल्‍लाह पोशनी के साथ फ़ैज़ की भी गिरफ्तारी हुई और उन्‍हें यातना भरी जिंदगी में रखा गया। उनका प्रसिद्ध काव्‍य 'दस्‍तेसबा' करावास के दौरान 1952 ई. में प्रकाशित हुई थी, जिसकी खुशी में जेल अधिकारियों की अनुमति से जश्‍न भी मनाया गया।

अँग्रेज उपनिवेशवाद की साजिश के तहत भारत का विभाजन किया गया था तो फ़ैज़ लाहौर में रहने लगे। इस घटना को लेकर कई बुद्धिजीवी यह सवाल उठाते हैं कि फ़ैज पाकिस्‍तान क्‍यों चले गए\ दरअसल वे बुद्धिजीवी यह जानना नहीं चाहते कि फ़ैज़ लाहौर के ही थे और वे किसी एक मुल्‍क के लिए कविता नहीं लिखते थे। उन्‍होंने पाकिस्‍तान में फौजी तानाशाही का हमेशा विरोध किया जिसके चलते उन्‍हें पाकिस्‍तान में लंबे समय तक जेल काटनी पड़ी और उनको देश निकाला भी झेलना पड़ा। जो काम हमारे भारत में नागार्जुन, मुक्तिबोध, हबीब तनवीर, सज्‍जाद ज़हीर, मख्‍दूम, अली सरदार जाफरी, कैफ़ी आजमी, मुल्‍कराज आनंद, हीरेन मुखर्जी जैसे जनता से जुड़े प्रगतिशील साहित्‍यकारों ने किया उसी रास्‍ते को फ़ैज पाकिस्‍तान में रौशन करते रहे। उनकी एक रचना भी ये बात कहती हैं कि -

'मुकाम फैज़ कोई राह में जँचा ही नहीं,
जो कुएँ यार से निकले तो सूएदार चले'
जब यार की गली से चले तो फाँसी की तख्‍ती पर चढ़े।

फैज़ में गहरा आत्‍मविश्‍वास, प्रखर राजनैतिक चेतना, बदलाव की छटपटाहट तथा जीवन के प्रत्‍येक क्षण में सौंदर्य व माधुर्य की तलाश उनकी शायरी की बखूबी ढ़ंग से देखने को मिलती है। इस्राइल द्वारा बैरूत पर किए गए भीषण बमबारी के दृश्‍य को उकेरते हुए वे कहते हैं कि 'कहाँ हैं शहर के कलाकार, भई उन्‍हें इस युद्ध की विभीषिका को श‍हर की दीवारों पर रंगकर दिखाना चाहिए।'

बैरूत निगाहे बज्‍मे जहाँ
जो चेहरे लहू के गाजे की
जीनत से सिवापुर नूर हुए
अब उनके रंगीं परतौ से
इस शहर की गलियां रौशन हैं

उन्‍होंने दारूण दुख को भी शायरी का विषय बनाया तथा शायरों व कवियों को सोचने को मजबूर किया। उनकी शायरी जुल्‍म व नाइंसाफी के खिलाफ एक अभियान की तरह है। उन्‍हें जितना प्रेम अपनी महबूबा से था उतना ही देश के प्रति भी। उनकी शायरी में जनतांत्रिकीकरण की प्रतिबद्धता सहज रूप से व्‍यक्‍त होती है। फैज़ जनतांत्रिक सोच रखनेवाले शायर तो थे ही साथ ही उनकी शायरी में धर्मनिरपेक्षता की खूशबू भी थी।

समकालीन समय में हमारे लेखक, कवि किस क़दर से उपभोक्‍तावाद को पनपाने में लगे हैं, इससे हम बेखबर नहीं हैं। काश हमारे मुल्‍क के रचनाकर्मी भी जनविरोधी शासकों व सांप्रदायिक शक्तियों से ये प्रश्‍न करते कि आखिर कब तक बेज़ुबान आदिवासियों को कत्‍ल करते रहोगे या फिर किसानों, मजदूरों, नौजवानों, महिलाओं, बच्‍चों को मारा जाएगा या मरने पर मजबूर किया जाता रहेगा। सच्‍चे दिल से पूछ पाते कि कितने घरों को उजाड़कर वे अपने घरों को रोशन करते रहेंगे। य‍ह फ़ैज़ का गौरव है कि पाकिस्‍तान के लुटेरे हुक्‍मरानों या उस भूभाग में उठ रहे सवालों को उनके द्वारा पूछे गए सवाल भारतीय पाठकों को भी अपने शासकों या भूभाग से पूछे गए प्रतीत होते हैं। अपसंस्‍कृति व सामाजिक विद्रूपता के लिए निहितार्थ कारकों की पहचान कर विकल्‍प तलाशने से ही ऐसे वैचारिक विमर्श की सार्थकता सिद्ध होगी।


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हिंदी समय में अमित कुमार विश्वास की रचनाएँ