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बात-चीत

जस्टिस पीबी सावंत से बातचीत
अमित कुमार विश्वास


प्र. लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप में जिस पत्रकारिता की परिकल्‍पना की जाती है, क्‍या आज की पत्रकारिता कोई आदर्श स्‍थापित करने में सक्षम है?

उत्‍तर . लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में चौथे स्‍तंभ के रूप में पत्रकारिता, विधायिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका पर गहरी व पैनी नजर रखे तथा यह एक सजग वाचडॉग की बतौर काम करें। लेकिन आज की पत्रकारिता से आशय है - बड़े संस्‍थानों की पत्रकारिता। ये संस्‍थान अपने तरह से आदर्श स्‍थापित कर रहे हैं। इनके आदर्श सामाजिक सरोकारों से बहुत दूर होते दिख रहे हैं। ये बाजार के लिए आदर्श स्‍थापित कर रहा है। आज की पत्रकारिता सक्षम है तो केवल और केवल बाजार के आदर्श को स्‍थापित करने में, क्‍योंकि इसमें बड़ी से बड़ी पूँजी लगी है। इसका उद्देश्‍य लाभ कमाना है और खुद को ज्‍यादा से ज्‍यादा बड़ी पूँजी में परिवर्तित करना भी। पूँजीपति उदारीकरण व निजीकरण प्रक्रिया के तहत औद्योगिक व सेवा क्षेत्र की विभिन्‍न गतिविधियों से संबंधित नियमों में ढील चाहता है। यही कारण है कि कई कंपनियाँ विकासशील देशों में उन पर अपना लेबल लगाकर पूरे विश्‍व बाजार में विकसित देशों के उत्‍पाद के रूप में बेचा जाता है। उत्‍पाद सेवा को बाजार में भुनाने के लिए एक प्रक्रिया के त‍हत मीडिया का सहारा लिया जाता है। ऐसे में मीडिया कोई सामाजिक आदर्श स्‍थापित करने की बजाय यह तो बाजार के लिए आदर्श स्‍थापित करने में अपनी भूमिका निभाएगा।

प्र. क्‍या आप मानते हैं कि मीडिया के मूल्‍यों में गिरावट के लिए समकालीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियाँ जिम्‍मेदार हैं?

उत्‍तर. यह बात सही है कि आज मीडिया के मूल्‍यों में गिरावट आई है। इस बात को लेकर बौद्धिक वर्ग में आम सहमति भी है। मूल्‍यों के पतन के लिए मीडिया को कटघरे में खड़ा किया जाता है। लेकिन एक सवाल अनुत्‍तरित है कि ऐसा हो क्‍यों रहा है। मीडिया कर्मियों के मूल्‍यबोध भी समाज सापेक्ष होते हैं। उन पत्रकारों की भी आकांक्षाएँ व आवश्‍यकताएँ वैसी है, जैसी समाज के अन्‍य मध्‍यमवर्गीय लोगों की। सवाल है कि इस चौथे स्‍तंभ का संचालक कौन है। लोकतंत्र के चौथे स्‍तंभ में मीडिया का कमान हमारे यहाँ व बाहर भी बड़ी पूँजी के हाथों में रही है। मीडिया के संचालक वर्ग आर्थिक हित को ध्‍यान में रखकर सामाजिक मुद्दों से जुड़ते हैं। इसके लिए वे नियोजनबद्ध तरीके से राजनीति को अपने आगोश में लेते हैं। देखिये, हमारे देश में चौथा स्‍तंभ पूँजीपतियों के हाथों में चला गया है। पूँजीपति बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के साथ नाभिनालबद्ध हैं। वे लाभ कमाने के लिए सारी सामाजिक नीति-नियमों की अवहेलना करते हैं, गरीबों पर शोषण करते हैं। आज शोषण-तंत्र का स्‍वरूप बदल गया है, शोषकों के चेहरे बदल गए हैं और उन्‍होंने नए मुखौटे लगा लिए हैं। वर्तमान संदर्भ में आर्थिक विषमताएँ बढ़ रही हैं और जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं वे ही शोषण के शिकार हो रहे हैं यानी शोषण का आधार अब सामाजिक उतना नहीं रह गया है जितना कि आर्थिक।

प्र. उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति में मीडिया की सेलीब्रिटीज में नवधनाढ्यों, पूँजीपतियों तथा दो नंबरी पैसे वालों का बोलबाला है। बुद्धिजीवी भी पूँजी के पैरोकार बनते दिख रहे हैं, इस संबंध में आप अपनी टिप्‍पणी दीजिए?

उत्‍तर. स्‍वतंत्रता आँदोलन के दौरान उस समय की परिस्थितियों से पत्रकारिता की भूमिका को सराहा गया। आजादी के बाद खास कर उदारीकरण से मध्‍यमवर्गीय मानस में उपभोक्‍तावादी संस्‍कृति ने अपना स्‍थायी घर बना लिया है। उपभोक्‍तावादी दौड़ में समाज, संस्‍था, सरकार के प्रति वैसी प्रतिबद्धता नहीं पायी जाती, जैसी कुछ दशक पहले थी। चूँकि भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के विस्‍तार में मीडिया इंधन का काम करता है। लाभ कमाने के उद्देश्‍य से ये कंपनियाँ विज्ञापनों के माध्‍यम से असमय ही अमीर बनने की ललक पैदा की है। आखिर पत्रकार भी तो इसी समाज का हिस्‍सा है, यही कारण है कि पत्रकार येन-केन-प्रकारेण पूँजीपतियों की पैरोकारी में लग जाता है। विज्ञापनों और चौंकानेवाले खबरें प्राप्‍त करने की होड़ में उसके अपने आदर्श व मूल्‍य दबते चले जाते हैं, जिसकी ओर पेज-थ्री फिल्‍म इशारा करती है। हमें यह जान लेने की जरूरत है कि आज समाज के प्रति मीडिया की जितनी जिम्‍मेदारी है, उससे कम जिम्‍मेदारी राजनीतिक पार्टियों व राजनेताओं की नहीं है।

प्र. आपकी दृष्टि में समाचार-पत्रों पर कानूनी तथा इतर प्रतिबंध क्‍या हैं, क्‍या आप समझते हैं कि ये प्रतिबंध तर्कसंगत हैं?

उत्‍तर. भारतीय संविधान के अनुच्‍छेद।

प्र. पूरे जहान की ख़बर रखने वाले ख़बरनवीसों की खुद की अंदरूनी स्थिति कैसी है?

उत्‍तर. मीडिया सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक विकास का अमूल्‍य हथियार है, कुछ छिपी ताकतें मीडिया पर नियंत्रण कर अपने हितार्थ में खबर की पाठ को प्रसारित करवाते हैं। आज मीडिया की सोच में आजादी के पहले जितनी स्‍वच्‍छता नहीं है और उसकी एकाउंटेबिलिटी लगातार कम हो रही है। आज समाचार व विचार दो अलग-अलग चीजें हैं और उनके घालमेल से खबरों को प्रदूषित नहीं किया जाना चाहिए। टेलीविजन चैनल मनोरंजन के नाम पर भारत की संस्‍कृति को बिगाड़ने पर तुले हैं। पहले पत्रकारिता में मिशन की भावना थी पर आज यह धंधा (कमीशनबाजी) का रूप ले चुका है। मिशन से भटकने के कारण ही मीडिया व मीडिया‍कर्मियों की साख पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। हाल ही में पश्चिम के देशों में सर्वे हुआ कि किस पेशे को लोग सम्‍मान की दृष्टि से देखते हैं तो इसमें मीडियाकर्मियों को मात्र 16-17 प्रतिशत ही अंक मिले।

प्र. आज सूचना व तकनीकी क्रांति के उत्‍तरोतर आधुनिक दौर में मानव जीवन में अप्रत्‍याशित बदलाव हो रहे हैं, इन बदलावों व इनके गंभीर नतीजों को पत्रकारिता किस हद तक प्रतिबिंबित कर रही है?

उत्‍तर. यह सही है कि सूचना के विस्‍फोट से सूचनाओं के आदान-प्रदान में तीव्रता आई है। यही कारण है कि पूरी दुनिया एक गाँव में तब्‍दील होता दिख रहा है, पर इस गाँव के वासी आम जन नहीं हैं अपितु चंद धनकुबेर जरूर हैं। यहाँ यह कहना समीचीन होगा कि सेटेलाइट और इंटरनेट के कारण कारण पूरे परिदृश्‍य में परिवर्तन बहुत हद तक सही भी है, क्‍योंकि जड़ता किसी भी प्रगतिशील समाज के लिए अशुभ है लेकिन सवाल यह है कि हम परिवर्तन के नाम पर क्‍या-क्‍या स्‍वीकार करेंगे क्‍योंकि आज अर्थव्‍यवस्‍था के उदारीकरण ने उपभोक्‍ता संस्‍कृति का नया संसार रच दिया है। आज तमाम बदलावों के बावजूद हमारे सामाजिक-सांस्‍कृतिक विकास की कहानी अधूरी है। इस अधूरी कहानी के संबंध में कहना उचित होगा कि मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा रची गई नई आचार संहिता को देखकर तो यही लगता है कि यह मूल्‍यहीन सामाजिक-सांस्‍कृतिक विकास को प्रतिबिंबित कर रहा है।

प्र. क्‍या आप मानते हैं कि पत्रकारिता समय के साथ कदमताल कर रही है या उससे आँखें चुरा रही है?

उत्‍तर. पत्रकारिता समय के सापेक्ष कदमताल से चल रही है। देश-काल के अनुसार इसका आचरण बदलता रहा है कभी यह समाज सापेक्ष मूल्‍य के साथ कदमताल किया तो कभी बाजारवादी ताकतों के सामने घुटने टेक दिया। मीडिया की बाजारवादी प्रवृति से मीडिया मालिकानों के हित से जुड़ते हुए पत्रकार के निजी हित उससे जुड़ गए हैं। खबर उसके लिए एक प्रोडक्‍ट है और दश्रोपा (दर्शक, श्रोता, पाठक) उसके खरीददार। प्रोडक्‍ट को बेचने के लिए कोई भी हथकंडा गैरवाजिब नहीं होता। मसलन हर तरह के उपक्रम किए जा रहे हैं जो जितनी जल्‍दी अपने प्रोडक्‍ट की लाँचिंग करेगा और उसे लुभावने आकर्षक कलेवर में बाजार में उतारेगा, उसकी चाँदी है। अब उसका जोर 'सबसे पहले' पर ज्‍यादा है चाहे इसका परिणाम जो भी हो। यह तो तय है कि आज पत्रकारिता वर्तमान समस्‍याओं की बजाय बाजारवादी समय के साथ गठबंधन कर मुनाफा कमाने की होड़ में जुटी है

प्र. सूचना क्रांति और नई से नई तकनीक से ख़बरों की पहुँच बढ़ी, पत्र-पत्रिकाओं को कमोडिटी बना दिया गया। पत्रका‍रिता किस तरह बिकाउ माल की प्रवक्‍ता होती गई है?

उत्‍तर. 21 वीं सदी को सूचनाओं की सदी के रूप में जाना जाने लगा है। सूचना क्राति के विस्‍फोट से सूचनाओं की पहुँच आम जनों तक बहुत तीव्रता के साथ पहुँचायी जा रही है लेकिन उसे मैनीफैक्‍चरिंग करके। सूचना क्रांति के उपरांत विश्‍व में ऐतिहासिक परिवर्तन की बात की जा रही है। सूचना के प्रवाह में लोगों की मनोदशा को ऐसा कर दिया गया है कि झूठ और सच का फर्क मिट गया है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियाँ अपने उत्‍पाद को बाजार में उतारने के लिए मीडिया के पाठ को अपने हित में तैयार करवाता है। आज विज्ञापनदाताओं द्वारा मीडिया का वित्‍त पोषण होने के कारण ये दर्शकों की सेवा विज्ञापनदाताओं की शर्तों के मुताबिक किया करते हैं। प्राइम टाइम में भी विज्ञापनों की भरमार इसी का नतीजा है। पूँजी और मुनाफे के खेल में मीडिया को न तो भारतीय संस्‍कृति से लगाव दिखता है और ना ही मानवता से। विवेकपूर्ण विचारों से तो इसका सरोकार कटता दिख रहा है, किसी के भाव, दाम या कीमत के बारे में तो यह ताकत बहुत कुछ जानती है पर मानवीय मूल्‍यों से इसका कोई सरोकार नहीं रह गया है।

प्र. आज पीली पत्रकारिता समेत कई अन्‍य विकृतियाँ किस तरह इस पेशे में जड़ें जमाने लगी हैं?

उत्‍तर. बाजारीय प्रतिस्‍पर्धा के कारण ही पत्रकारिता में कई विकृतियाँ आई। मुनाफा कमाने हेतु सनसनी फैलाने के लिए पीली पत्रकारिता (येलो जर्नलिज्‍म) का उदय हुआ था पर आज तो च्‍यूइंगम जर्नलिज्‍म का भी चलन बढा है, ऐसी खबरें दिखाते हैं जिसमें जान ही नहीं होती, एक ही स्‍टोरी को बार-बार दिखाते हैं। हर रोज घृणा फैलायी जा रही है, अंधविश्‍वास को अलंकृत किया जा रहा है। मीडिया के माध्‍यम से सामाजिक व आर्थिक हैसियत को बढ़ाने के लिए उद्योगपति व राजनेता पत्रकारिता के आगोश में जाते हैं यही कारण है कि प्रायोजित तरीके से उचित-अनुचित के विवेक को लहुलूहान कर दिया गया है। आज सामाजिक सरोकार की बजाय निजी सरोकार हावी होते दिख रहे हैं।

प्र. मीडिया के निशाने पर कौन हैं?

उत्‍तर. बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के साथ मीडिया परस्‍पर कदमताल कर रही है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के निशाने पर छोटे बच्‍चे व महिलाएँ हैं। उनको पता है कि अगर बच्‍चा किसी उत्‍पाद के स्‍वाद को चख लिया तो वे अगले 25 वर्षों तक उनके खरीददार बन जाएँगें। सेक्‍स, हिंसा सम्‍पृक्‍त खबर परोसते वक्‍त यह ध्‍यान नहीं रखा जाता है कि यह बच्‍चों के आँखों के सामने से भी गुजरेगी और ऐसी सामग्री परोसकर हम भविष्‍य के लिए विकृत और कुंठित समाज का निर्माण कर रहे हैं। उनके निशाने पर महिलाएँ भी हैं क्‍योंकि उत्‍पाद कंपनियों को पता है कि महिलाओं के ब्रेनवाश किए बगैर घर में उनके माल की खरीद नहीं की जा सकती हैं। यही कारण है कि दोपहर को धारावाहिकों के बीच में उत्‍पादों के विज्ञापन बेशुमार व आकर्षक ढंग से किए जाते हैं क्‍योंकि गृहिणी महिलाएँ अपने नियत काम से निवृत होकर टीवी के कार्यक्रमों को देखती है। मजेदार बात यह भी है कि उन्‍हें पता है कि जब वे अकेले में हों तभी उनके दिमाग में उत्‍पाद के प्रति ललक पैदा की जा सकती है।

प्र. आपको ये नहीं लगता है कि मीडिया हाउस का कहना है कि भाई लोग जो देखना चाहते हैं उसे ही हम दिखाते हैं?

उत्‍तर. जनता यही माँगती है के तर्ज पर मीडिया अपने पक्ष में तर्क देता है कि हमारा दर्शक, श्रोता पाठक वर्ग हमसे यही अपेक्षा करता है, तो हम क्‍या करें। मीडिया मालिकान ये भी कहते हैं कि जनता की रूचि को भुनाना है, निर्माण करना नहीं। लेकिन पाठकों-दर्शकों में क्‍या यह दिलचस्‍पी मीडिया ने पैदा नहीं की। पत्रकारिता तो एक ऐसा हथियार है, जिसका उपयोग और दुरूपयोग दोनों हो सकता है। आज मीडिया के संदर्भ में जो ऐसी बातें क‍ही जा रही है सवाल है कि इन हथियारों का संचालक कौन है, उसके हित क्‍या हैं। हमें कहने में कोई गुरेज नहीं है कि इस हथियार का संचालन अधिकतर अपरिपक्‍व हाथों में है, जिसे सामाजिक सरोकार से कोई लेना देना नहीं तभी तो अपसंस्‍कृति को बढाने में मीडिया अपना अहम भूमिका अदा कर रही है।

प्र. पत्रकारिता में उपहार संस्‍कृति की प्रवृति बढ़ रही है, क्‍या इससे पत्रकारीय मूल्‍य प्रभावित हो रही है?

उत्‍तर. हाल के वर्षों में मीडिया की प्रतियोगिता ने स्‍कीम जर्नलिज्‍म को प्रश्रय दिया है। हालाँकि यहाँ यह कहना उचित होगा कि नए आर्थिक परिदृश्‍य में प्रतियोगिता होना लाजिमी है, लेकिन जिस तरह से इस प्रतियोगिता ने उपहारों की नई संस्‍कृति को बढ़ावा दिया है, वह पत्रकारिता के लिए शुभ संकेत नहीं है। साबून-शैंपू की शक्‍ल लेता अखबार भी पाठ से ज्‍यादा स्‍कीम को लेकर चर्चा में रहता है। दरअसल आकर्षक स्‍कीम ही प्रतियोगिता की लड़ाई के हथियार बनते जा रहे हैं और मानवीय मूल्‍य, संपादकीय व वस्‍तुनिष्‍ठ पत्रकारिता हाशिये पर चले गए हैं। बढ़ती प्रतियोगिता के 'बैटल ग्राउंड' में अट्रैक्टिव स्‍कीम के सहारे ही लडाई जीतने के लिए मीडिया संस्‍थान उपहार संस्‍कृति को अपनाने लगे हैं। गंभीर पाठक हक्‍का-बक्‍का है कि वे अखबार को पढने के लिए खरीद रहे हैं या उपहारों के लिए। इनाम की गारंटी ने मौसमी पाठकों की संख्‍या एकाएक बढा दी है इनका रिश्‍ता केवल उपहारों से होता है। यह तो तय है कि ये पाठक बरसाती मेढ़क साबित हो सकते हैं। जहाँ तक रही बात कि क्‍या इससे पत्रकारीय मूल्‍य प्रभावित हो रही है तो यहाँ यह कहा जा सकता है कि कोई भी अखबार पाठ की स्‍तरीयता को गिराकर नंबर वन की रेस में नहीं जीत सकता है। अरे मैं तो कहता हूँ कि पत्रकारिता की आत्‍मा को मार कर कब तक मृत शरीर की लड़ाई लड़ेगी। हमें तो यह जान लेना पड़ेगा कि स्‍कीम जर्नलिज्‍म के बहाने करोड़ो रूपये बहाने वाले अखबार अपने कंटेंट के प्रति कितने संवेदनशील हैं।

प्र. पेड न्यूज के संदर्भ में आपकी टिप्‍पणी?

उत्‍तर. पेड न्‍यूज तो हाल के दिनों से प्रचलित हो गया खासकर पिछले चुनाव में, जब कि राजनेताओं ने अपने चुनाव प्रचार हेतु मीडिया का इस्‍तेमाल किया। पेड करके विज्ञापन को न्‍यूज के रूप में प्रकाशित किया जाने लगा है, इससे तो पत्रकारिता की आत्‍मा मर जाएगी। पाठकों के दिलों पर राज केवल और केवल बेहतर पत्रकारिता के जरिए ही संभव है।

प्र. क्‍या आप मानते हैं कि भारतीय प्रेस परिषद दबावों में कार्य करती है। पेड न्‍यूज पर 68 पेज की रिपोर्ट को प्रेस परिषद ने 18 पेज में सिमटा कर चुप्‍पी साध ली?

उत्‍तर. मैं नहीं मानता हूँ कि भारतीय प्रेस परिषद किसी प्रकार के दबावों में कार्य करती है, अगर दबाव में कार्य करने लगे तो न्‍यायप्रणाली पर ही सवालिया निशान उठ जाएगा। हाँ यह जरूर कहूँगा कि कोई भी व्‍यक्ति दबाव में तब कार्य करता है जब कि उसे व्‍यक्तिगत हित दिख रहा हो। जिस समय मैं प्रेस परिषद में था उस वक्‍त पेड न्‍यूज की चर्चा नहीं थी, हाँ ये तो पहले से ही था कि पैसे लेकर खबर छापने की परंपरा। पेड न्‍यूज पर 68 पेज की रिपोर्ट के बारे में मुझे जानकारी नहीं है। प्रभाष जोशी जी ने पत्रकारीय मूल्‍यों को बचाने के लिए मुहिम छेड़ रखे थे, उनके मुहिम को आगे बढ़ाने का काम हम सबको करना चाहिए।

प्र. आप लंबे समय तक भारतीय प्रेस परिषद से जुड़े रहे हैं क्‍या आप मानते हैं कि पत्रकारों के लिए आचरण बनाने वाली संस्‍था को और भी कानूनी शक्तियाँ दी जानी चाहिए?

उत्‍तर. चूँकि लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में पत्रकार को सजग और सचेत रहकर समाज को दिशा देने की जरूरत होती है, लेकिन ये बाजारीय शक्ति के आगे न चाहते हुए भी अपने सामाजिक सरोकार की उपेक्षा कर बैठते हैं। विधिक अधिकार कम होने के कारण पत्रकार अपनी शिकायत करते भी हैं तो हम उन्‍हें न्‍याय दे पाने में असमर्थ हो जाते हैं। प्रेस परिषद को विधायी अधिकार दिए जाने के बावत 1996-97 में न्‍याय प्रक्रिया में संशोधन करने के लिए हमने कानून का प्रारूप बनाकर केंद्र सरकार के पास भेजा था जो कि अब तक पारित नहीं हो सका। मेरा तो मानना है कि पत्रकार बिरादरी को आचार संहिता बनानी चाहिए, उसका उलंघन करने वाले को दंडित करना चाहिए और इस कार्य हेतु इंडियन मेडिकल कौंसिल, बार कौंसिल की भाँति एक स्‍वायत्‍त पेशेवराना संगठन मीडिया कौंसिल होना चाहिए। जिस प्रकार से मेडिकल कौंसिल और बार कौंसिल अपने पेशे के सदस्‍यों को पेशेवराना आचरण पर ऊँगली उठाने वाले को दंडित करती है वैसे ही मीडिया कौंसिल बनाकर दंडित करने वाली संस्‍था के रूप में मान्‍यता दिया जाना चाहिए। मीडिया कौंसिल में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया प्रिंट मीडिया के साथ-साथ न्‍यू मीडिया को भी शामिल किया जाना चाहिए। उसकी बात मानना सबके लिए लाजिमी होना चाहिए और जो न माने उसके लिए दंड का प्रावधान होना चाहिए क्‍योंकि आज भी किसी को आस है तो मीडिया से है।

प्र. पत्रकारों के लिए किस प्रकार की स्‍वतंत्रता दी जानी चाहिए?

उत्‍तर. आज अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का सवाल खड़ा किया जाता है लेकिन यहाँ हमें जान लेने की जरूरत है कि किसी भी समाज व्‍यवस्‍था और शासन व्‍यवस्‍था में कभी भी बिना शर्त के निरपेक्ष स्‍वतंत्रता नहीं रहती, वह शर्तों के अधीन ही होती है। शर्तें व स्‍वतंत्रता की सीमा सत्‍ता नियंत्रक ही तय करता है। मीडिया एक स्‍वतंत्रता के मामले में अंतर्विरोधी की भूमिका निभाती है, एकतरफ तो वह जन पक्षधर दिखना चाहता है लेकिन दूसरी ओर अपनी अंतर्वस्‍तु में वह इसके ठीक विपरीत है। भारतीय संविधान में आम नागरिकों के समान ही मीडिया कर्मियों को स्‍वतंत्रता प्राप्‍त हैं अलग से किसी प्रकार की स्‍वतंत्रता नहीं है। चूँकि पत्रकार समाज में वाच डॉग की भूमिका निभाता है, अतएव राज्‍यसत्‍ता को चाहिए कि वे समाज सापे‍क्ष सूचनाओं को जन तक पहुँचाने के लिए पत्रकारों का सहयोग करें, पर वे भी अपने हितार्थ में ही सूचनाएँ देते हैं, इसकी आड़ में वे अपने आप को साफ-सूथरी छवि का बखान करते हैं। ऐसे में पत्रकारों को चाहिए कि वे सूचना के अधिकार का भरपूर उपयोग करें।

प्र. प्रेस परिषद की प्रासंगिकता को लेकर जब न तब सवाल खड़े किए जाते हैं, आपका इस बारे में क्‍या मत है क्‍या प्रेस परिषद प्रासंगिक नहीं रहा है?

उत्‍तर. प्रेस परिषद का गठन हुआ है पत्रकारिता की उच्‍च मानक बनी रहे।

प्र. प्रेस परिषद पर मीडिया मालिकों का दबाव जिस तरह से बढ़ रहा है वैसे में प्रेस परिषद की स्‍वायत्‍तता का क्‍या होगा?

उत्‍तर. मैं यह नहीं मानता कि मीडिया मालिकों का दबाव प्रेस परिषद पर है, वहाँ की सदस्‍यता ही श्रमजीवी पत्रकारों को दी जाती है, ऐसे में श्रमजीवी पत्रकार अपने मुद्दों को प्रेस परिषद में रखते हैं साथ ही आम जनता भी किसी चैनल या पत्रकार के खिलाफ अपनी बातों को प्रेस परिषद में रख स‍कता है। मेरा अनुभव कहता है कि मीडिया मालिकों का दबाव प्रेस परिषद पर नहीं था।

प्र. प्रिंट और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया कर्मियों के लिए घोषित तौर पर आचार संहिता का निर्माण आजतक क्‍यों न‍हीं बन पाया है?

उत्‍तर. मीडिया समाज को बदलने का एक शक्तिशाली औजार है लेकिन कुछ शक्तिशाली ताकतें चाहती हैं कि वह समाज के बजाय उनके हितार्थ में काम करें। वे छिपी ताकतें मीडिया की भूमिका ही बदल देना चाहती हैं। प्रिंट और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया पर कब्‍जा पूँजीपतियों या समाज के संभ्रांत तबकों का है। वे नहीं चाहते कि आम जनों के दिमाग को बंद करने में कोई उनको दखल दे। यह कहना गलत होगा कि प्रिंट और इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के लिए घोषित तौर पर आचार संहिता नहीं है। भारतीय प्रेस परिषद ने तो आचार संहिता बनाई पर सवाल य‍ह है कि इसे लोग मानने को तैयार नहीं है।

प्र. क्‍या इसे प्रेस परिषद की नाकामी नहीं माना जाए?

उत्‍तर. भाई वर्षभर में सैकड़ों मामलों को भारतीय प्रेस परिषद निपटारा करती है। यह वैसी ही बात जैसे कि इस लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था में आज भी लोगों को चौथे खंभे पर भरोसा है कि वह उनकी आवाज बनेगा हालाँकि यह अलग बात है कि वह आम जनों के साथ देने का महज एक ढ़ोंग रचती है, फिर यहाँ कहना उचित होगा कि मीडिया थोड़ा भी विचलित हो जाए तो लोकतंत्र चरमरा जाए। प्रेस परिषद अपनी काम मुस्‍तैदी से कर रहा है, यह अलग बात है कि इसे और भी विधायी शक्तियाँ दी जानी चाहिए ताकि यह मजबूती के साथ अपना निर्वहन कर सके।

प्र. आपकी राय में पाठ की पत्रकारिता और दृश्‍य श्रव्‍य की पत्रकारिता के लिए बुनियादी आचार संहिताएँ क्‍या क्‍या होनी चाहिए?

उत्‍तर. राडिया टेप्‍स, पेड न्‍यूज का फैलता जाल, विज्ञापन का खबर पर बढता असर और सनसनी फैलाने वाली खबरों के जंजाल से तो यही लगता है कि मीडिया आचर संहिता की जानकारी कितनी महत्‍वपूर्ण है। सोच में परिवर्तन लाए बगैर आचार संहिता की बात करना बेमानी है। प्रेस परिषद द्वारा बनायी गई आचार संहिता को अपनाए बगैर सामाजिक व मानवीय मूल्‍यों को बचाए रखना मुश्किल काम है। सत्‍यता को समाज सापेक्ष उजागर करना पत्रकारिता का मूल धर्म होना चाहिए।

प्र. प्रेस परिषद का अध्‍यक्ष रहने के दौरान इस दिशा में क्‍या आपने कुछ प्रयास किए थे, यदि हाँ तो विस्‍तार से बताइये?

उत्‍तर. प्रेस परिषद को विधायी शक्ति देने के संबंध में हमने संशोधन कर कानूनी शक्ति प्रदान करने के लिए कानून बनाया था, पारित होने के लिए सरकार के पास भेजा था जो कि अबतक अधर में ही लटका दिख रहा है।

प्र. मीडिया में जिस तरह अश्‍लीलता, हिंसा मोहक शैली में प्रमुखता से प्रकाशित व प्रसारित किया जा रहा हे और पाठकों, दर्शकों को हिंसा और सेक्‍स की कुंठा में डुबोया जा रहा है, इसकी रोकथाम के लिए क्‍या कदम उठाया जाना चाहिए और ये कदम कौन उठाए-प्रेस परिषद, मीडिया मालिक या पत्रकार या पाठक व दर्शक?

उत्‍तर. मीडिया में बड़ी पूँजी लगी है। पूँजीपति येन-केन-प्रकारेण सिर्फ लाभ कमाना चाहता है। वैश्‍वीकरण के तहत बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों ने अपने माल को उपभोक्‍ताओं तक पहुँचाने के लिए कई तरह के हथकंडे अपनाता है, अलबत्‍ता मीडिया का प्रसार देश में विदेशी पूँजी के लिए रास्‍ता खोलने व देश की अर्थव्‍यवस्‍था के भूमंडलीकृत होने के साथ-साथ जुड़ा हुआ है। विदेशी उत्‍पादकों को बाजार चाहिए और उपभोक्‍ता सामग्री का बाजार-जीवनयापन के लिए जरूरी सामग्री से इतर उत्‍पादों का बाजार तब बनता है जब कि लोगों में उत्‍पाद के विश्‍वास पैदा करे। इसके लिए वह जनपक्षी दिखना चाहता है। लेकिन वह काम अंततः बाजार के नियोजन से ही करता है। इसीलिए देखेंगे कि न सिर्फ विज्ञापनों में अपितु सीरियलों या अन्‍य कार्यक्रमों के पाठ ऐसे निर्मित किए जाते हैं कि ताकि आपमें उनके उत्‍पादों के प्रति लालसा पैदा हो और आप उसे उपभोग करें। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के मालिक ये जानते हैं कि दो चीजों से व्‍यक्ति को भुनाया जा सकता है, एक तो सेक्‍स और दूसरा धर्म। यही कारण है कि सेक्‍स और धर्म का बाजार बूमिंग पर है। जो भोग सके वहीं असली जिंदगी जिएगा की कोरी कल्‍पना पर हमें अवलंबित कर दिया गया है। विभिन्‍न विज्ञापनों सहित कार्यक्रमों में आए उत्‍तेज‍क दृश्‍यों ने बच्‍चों को असमय ही जवान बना दिए गए हैं। मीडिया आपकी ज्ञानेंद्रियों को एकाग्र करने में माहिर हैं। वे अश्‍लीलता, हिंसा को मोहक शैली में गुणगान करते हैं। ऐसे में मीडिया के अंतर्वस्‍तु जन सरोकार के विपरीत है तो दर्शक, श्रोता व पाठक इसकी शिकायत करे। आप जान लीजिए कि जिस दिन से जनता जागरूक हो जाए उसी दिन इन अदृश्‍य ताकतों की शक्ति क्षीण हो जाएगी।

प्र. इस अनौचित्‍य को टोकने व रोकने का दायित्‍व किसका है?

उत्‍तर. इस अनौचित्‍य को टोकने व रोकने का दायित्‍व सिर्फ सरकार का ही नहीं अपितु दर्शक, श्रोता व पाठक का भी है। यहाँ मैं ये भी कहूँगा कि बाजारीय शक्ति के आगे पत्रकारों को भी यह सुनिश्चित करने की जिम्‍मेदारी है कि विकास के सोपान तय करते हुए वे विरासत में मिले हुए उन मूल्‍यों का संरक्षण करें जिन्‍होंने हमारे देश को दुनिया में अनुपम स्‍थान दिलाया हुआ है वर्ना आज जो संकट दिख रहा है वह और भी गहरा हो जाएगा साथ ही मीडिया साम्राज्‍यवाद और सोच-विचारों, विचारधाराओं व उपनिवेश और फैलेंगे।

प्र. निजी एकांतता को जिस तरह मीडिया भंग कर रहा है, इसपर आपकी क्‍या टिप्‍पणी है?

उत्‍तर. यह तो सही है कि टीआरपी की होड़ में नए-नए तरीके ईजाद किए जा रहे हैं। किसी भी व्‍यक्ति के निजी जिंदगी में झाँकना कानूनन जुर्म है। आजकल ये खूब सुनने में आ रहा है कि मीडियाकर्मियों ने निहायत व्‍यक्तिगत मामलों को कैमरे में कैद कर लेते हैं फिर वे उनसे खरीद फरोख्‍त करते हैं वह पत्रकार है ही नहीं, व‍ह तो दलाल है। पत्र‍कारिता के पेशे में इस प्रकार की हरकतों को बर्दाश्‍त नहीं किया जाना चाहिए।

प्र. और स्टिंग ऑपरेशन के बारे में आपकी क्‍या राय है?

उत्‍तर. जनहित में स्टिंग ऑपरेशन को उचित मानता हूँ। लेकिन इनका उद्देश्‍य जनहित के सिवाय कुछ और नहीं होना चाहिए। आमलोगों को भी मीडिया के विरूद्ध आवाज उठानी चाहिए।

प्र. जेबी कैमरे में किसी नितांत वैयक्तिक का सार्वजनिक खुलासा क्‍या किसी दृष्टि से नैतिक है अगर नहीं तो इसके लिए क्‍या किया जाना चाहिए?

उत्‍तर. आप किसी बात करते हुए बिना बताए उनकी बातचीत को रिकार्ड करना रहें तो यह भी कानूनन जुर्म है। मैंने पहले भी कहा है कि जनहित में नितांत वैयक्तिक का सार्वजनिक खुलासे को मैं गलत नहीं मानता हूँ बशर्ते कि वह सामाजिक मूल्‍यों के सापेक्ष में हो क्‍योंकि कोई भी भ्रष्‍ट व्‍यक्ति अपने गलत कारनामों को यों ही आसानी से आपको नहीं बता सकता है। जनहित में जेबी कैमरे से लिया गया कोई फुटेज को सार्वजनिक किए जाने को मैं उचित मानता हूँ।

प्र. आप पत्रकारिता का भविष्‍य किस प्रकार का देख रहे हैं?

उत्‍तर. मैंने पहले भी कहा है कि लोकतंत्र का मजबूत आधार पर टिका है तो वह उसका चौथा खंभा। इस चौथे खंभे की जिम्‍मेवारी बहुत अहम है। पत्रकारिता का भविष्‍य बहुत हद तक इस पर निर्भर करेगा कि वह जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ से किस रास्‍ते जाने को तैयार है। मैं तो मानता हूँ कि भविष्‍य कोई ऐसी चीज नहीं, जो प्रतीक्षा करने से हाथ आ जाए। इसका निर्माण करना पड़ता है। पत्रकार प‍त्रकारिता का सुनहरा भविष्‍य चाहते हैं तो उन्‍हें इसके लिए वर्तमान में स्‍वस्‍थ बीज बोने पड़ेंगे वर्ना हम नए प्रकार गुलामी में ईंधन का काम कर बैठेंगे। इसलिए पत्रकारों को सामाजिक दायित्‍वों के साथ विश्‍वसनीयता में वृद्धि के प्रयास करने की जरूरत है।

प्र. एक बार यदि पायलट या ट्रेन के ड्राईवर से गलती होने पर उनकी नौकरी चली जाती है अखबार और चैनल प्रायः रोज गलत और अपुष्‍ट खबरें देते हैं और सच्‍चाई सामने आने पर खंडन छाप देते हैं, खंडन छापकर मुक्‍त हो लेते हैं, अखबार या चैनलवालों को गलतियों के लिए असीमित छूट दिए जाने पर आपकी क्‍या प्रतिक्रिया?

उत्‍तर. पत्रकारिता एक हरबडि़या विधा है, यहाँ तुरंत घटी घटनाओं को समाज के सामने प्रस्‍तुत करना है।


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