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कविता

नग्नता-बोध
स्कंद शुक्ल


लगभग छह के हो चले मेरे बेटे ने
जब मना किया सबके सामने बदलने से अपने कपड़े
कहा कि वह अब अकेले नहा सकता है बिना किसी सहयोग के,
मैं जान गया कि वह भी हम सब की तरह
अदन के बगीचे से बाहर निकल आया है
खाकर वह शैतानी फल जिसे अनजाने चखकर
हम सब बाहर निकले थे कभी।
आदमी का जान जाना कि वह नंगा है
और नंगे होकर रहना संभव नहीं है
क्योंकि उसके पास इतना कुछ है ढाँपने-छिपाने के लिए
उसे अदन छोड़ना ही होगा आखिर गगन में जाने के लिए
उसे आग जलानी है, उसे चाक चलाना है
यंत्रों पर चढ़कर उसे आगे तक जाना है
पहनावे की एक प्रथा-सी बढ़ती भीड़ में
नग्नता एक पतनप्रियता का अपवाद है
विकास की कसमें खाते हमें पोशाकें पहननी ही होंगी
टहलना होगा सुरक्षा और सरपरस्ती के बगीचों के बाहर
अपनी चाम को बचाते, आराम को धता बताते
लेकिन इस तरह कि भीतर के किसी सूने कोने में गिलहरी की कोई फुदकन बाकी रहा करे।
इसलिए मेरे बेटे, तुम्हें इस नग्नता-बोध के लिए बधाई देता हूँ
लेकिन मुझे सबसे ज्यादा प्रसन्नता उस दिन होगी
जिस दिन तुम पोशीदगी के साथ कुछ ऐसा कर जाओगे
कि कोटर से बाहर झाँकेगी वह गिलहरी
कुतूहल से कहती हुई कि अब भी जिंदा हूँ मैं।


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