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कविता

निजता-सार्वजनिकता
स्कंद शुक्ल


कुछ भी कविता करते समय
किसी को भी मन में भरते समय
मैं आँखों के आगे अपना पसरा अँधेरा रखता हूँ,
जो मेरे इर्द-गिर्द मुझे और केवल मुझे नजर आता है।
जब कहीं उस किए-भरे को सुनाता हूँ
तो फिर ठहरता हूँ मेधा की मचान पर सामने चढ़ी काली कालीनों पर;
क्योंकि ये ही तो हैं जो आगे की उम्मीद हैं,
कालिम तरुणाई ही बूझेगी-जूझेगी अपने समय के अँधेरे से
क्योंकि समस्याओं और उनके समाधानों के गुणधर्म समान होते हैं।
वसुधा इतनी कुटुंब कभी न थी
कभी न जोड़ा गया था इस तरह सबके उजालों-अँधेरों को
पर फिर भी आदमी किसी यंत्र का पुर्जा नहीं है
इसलिए उसे अपने निजी प्रकाश और अंधकार की पहचान भूलनी नहीं चाहिए।
ताकि सहयोग-साझेपन के इस दौर में भी बनी रहे मौलिकता
क्योंकि बिना व्यक्ति हुए कोई कितना भी कहे, समष्टि हो नहीं सकता
इसलिए मुझे नौजवानों से प्रत्याशा है
कि वे अपनी निजता को बनाए रखकर
दुनिया के हर दर्द को उतना ही महसूस करेंगे
जितना दूरी को दूर से और नजदीकी को नजदीक से किया जा सकता है
और जब सालों बाद जब वे सारे सफेद हो जाएँगे
तो नजर आएगा उनका गढ़ा समाज तमाम मूलों की माला-सा
जब कोई कवि उन्हें यहाँ मंच से अपनी कोई कविता सुनाएगा।


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