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कविता

चिड़िया
स्कंद शुक्ल


कंप्यूटर-स्क्रीन पर मरी हुई चिड़िया
को उभरा देखकर फटी रह गई थीं
तुम्हारी जिज्ञासु आँखें अचानक
जम गया था माउस के सहारे
पेजों को कुतरता हाथ वह
गायब हो गए थे जबड़े के थम जाने से
उठते-मिटते कपोलों के वे कोमल उभार।
'नकली है' मैंने कहा था :
चिड़िया नहीं मरती किसी चूइंग गम को खाकर इस तरह
चबैने को चीन्हना उसकी चोंच जानती है,
मगर उतनी ही कृत्रिम है
मशक्कत करते मुँह के संग
तुम्हारी मुक्ति की मेहनतकश चाह
समय आ गया है कि तुम यह भी जान लो!
समय आ गया है कि तुम यह भी जान लो
कि जानकारियों की फेहरिस्त में ज्यादातर नकली हैं
उड़ानों की कोशिशें इस तरह नहीं की जातीं
अधिकांश आसमान यों झूठमूठ उड़कर नहीं नापे जाते
मांसपेशियों की मेहनत से जो तुम होठों पर
गुलाबी गुब्बारा फुलाती हो न
जो पल भर को रहता है और फिर
सिकुड़कर चिपक जाता है किसी पैराशूट-सा
और लील जाती हो लार कितनी ही
किसी भुलावे के साथ मुझसे यह बघारती
कि काम के समय मुझे प्यास नहीं लगती जरा भी।
उठो, जगो, सच में जियो, सचमुच उड़ो
मेधा की चोंच से अपने चुग्गे पहचानो
कि क्या खाओगी और क्यों खाओगी
अपने उच्छ्वास को बंदिशों में पहले ही बाँध कर मत छोड़ो
कि वह रबड़ के बुलबुले में इतना ही उड़े, जितना नियत है
प्यासी हो तो प्यासी रहो, और कहो कि मैं प्यासी हूँ
क्योंकि दुनिया से पहले, तुम्हारे पपड़ाते होठ, अपने, मात्र अपने स्वस्ति-वाचन के लिए हैं,
जठर की आग को इस तरह अकारण मत बुझने दो आधुनिका!
गिरते झरने का यह अधर-रस भीतर समाते तमाम देश-दुनिया के पाचन के लिए है।


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