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कविता

जिंदा जनाना
स्कंद शुक्ल


हर उस दुनिया में जहाँ अक्सर रहता है अँधेरा
और उजाला नजर आता है कभी-कभी
हर उस संसार में जहाँ कुछ पल की मिठास
लंबी सड़ांध बनकर फैली है
हर उस जगह जो आवाजों की अंतिम सरहद है
और आहारों से पहले परिचय की सीमा
वहाँ अनेक सफेद खूँटे गाड़े मर्दों के बीच
एक ही, केवल एक जिंदा गुलाबी जनाना रह सकती है।
मर्द जिनमें रंग नहीं हैं मगर बल से भरपूर हैं
वे आहार का शिकार करते हैं
उन्हें पकड़ते हैं, मारते हैं, पीसते हैं हर तरह से
और फिर अपने बीच की उस औरत के सम्मुख रख देते हैं
ताकि वह उनका रसपान कर उसकी अनुभूति को दूर कहीं स्थित किसी परलोक में पहुँचा सके।
हर उस कथानक का कथ्य यही है कि उसमें गुलाबी सेज पर मादा सबसे पहले आती है और सबसे अंत तक रहती है
क्योंकि वह मुलायम है, लचीली है, हर रस को पीती सदा-सर्वदा गीली है
जबकि नर तेज हैं, धारदार काटते-छाँटते अनडिगे औजारों की तरह खूँरेज है
इसलिए वे आएँगे बाद में और पहले चले भी जाएँगे
शुरू होगा संसार मादा की मुलायमियत पर
और पत्थरों की पिसान से होता हुआ फिर वहीं बीत जाएगा।


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