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लेख

आजादी और विकास की अंधी दौड़
अमित कुमार विश्वास


आजादी की पहली सुबह देखने वालों के जीवन की साँझ हो चली है, मगर आज भी उन्हें वह खिलता सूरज याद है, जिसकी पहली किरण ने 15 अगस्त 1947 को वतन की मिट्टी चूमी थी। आजाद देशवासियों ने भूख, गरीबी को दूर का स्वप्न समझ कर सोचा कि अब उन जैसे हाशिए के लोगों के लिए भी योजनाएँ बनेगी और जल्द ही उनका दुख-दरिद्र दूर होगा। लोकतंत्र के महापर्व स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय तिरंगा पूरे देश में फहराया जाता है। ऐतिहासिक लाल किले के प्राचीर से प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह तिरंगे का परचम फहराकर विकास की कड़ियाँ गिनाएँगें। प्रायः देशभर में सरकारी तंत्र से लेकर नेतागण भी तिरंगे के आगे देशभक्ति का अजूबा दिखाकर उन्नति का बखान आम जनता के सामने करेगे और हम उनकी बातों में आकर देश के विकास की अंधी दौड़ में बह जाएँगे।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के मूल में अँग्रेजी राज्य के शासन तंत्र से उपजे वे परिणाम थे जिनके कारण जनता परेशान थी। ब्रिटानी हुकूमत का एक ही ध्येय था यहाँ से धन बटोरना। आमजन को रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल आदि उपलब्ध कराने का कोई मुद्दा अहम नहीं था। फलतः यहाँ की जनता अँग्रेजी हूकूमत से पिस रही थी। देशभक्त स्वतंत्रता सेनानियों ने प्राणों की बाज़ी लगाकर 15 अगस्त 1947 ई. को क्रूर अँग्रेजी शासन से मुल्क को आजाद कराया पर आज आम लोगों के लिए वो आजादी बेमानी है क्योंकि वो आज भी जीवन के स्तर में सुधार को तरस रहे हैं। चमड़ी बदल गई पर शासन वही है।

आजादी के 63 वर्ष बीत जाने के बाद भी आम जनता, दलितों, मजदूरों, छात्रों, की स्थिति में कुछ खास परिवर्तन नहीं आया है। समस्याएँ लगभग वही हैं जो अँग्रेजी शासन के दौरान थीं। आम जनता के लिए अमन-चैन की जिंदगी, रोटी की जुगाड़, सिर के ऊपर छत, बदन पर कपड़े, बीमारी में इलाज आज भी मयस्सर नहीं है। आज भी दलितों को समाज में सम्मानपूर्वक जीना दूभर हैं। महिलाएँ घरों से निकली तो हैं पर वे घर से लेकर बाहर तक असुरक्षित हैं।

ऊँची आर्थिक वृद्धि के बावजूद, भारत दुनिया के सर्वाधिक भूखे और कुपोषित लोगों का घर है। 250 मिलियिन से अधिक लोग भूखमरी में जी रहे हैं और पाँच वर्ष से नीचे के 47 फीसदी बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं। यह कैसी बिडंबना है कि मुल्क के आलाकमान देश की उन्नति का हवाला देते हुए कह रहे हैं कि हम खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो चुके हैं। यह आत्मनिर्भरता आज गोदामों में सड़ रही हैं, संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में खाद्यान्न के उत्पादन में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है पर असमान वितरण व्यवस्था के कारण सबको भोजन नही मिल पा रहा है। भारत के करोड़ों परिवारों को सारी जिंदगी आधे पेट ही बितानी पड़ती है। लाखों घरों में कई दिनों तक चूल्हे नहीं जल पाते, किसान कभी सूखे तो कभी बाढ़ की मार सहता है। उत्पादन में हुई कमी के कारण उन्हें बेवक्त की मौत नसीब होती है। उत्पादन वृद्धि के प्रयासों की होड़ में किसान फसलों के साथ न देने पर आत्महत्या करने पर विवश होते जा रहे हैं। विदर्भ में किसानों की आत्महत्या के बढ़ते ग्राफ पर भी एक नजर डाली जा सकती है। दुनियाँ ने मंदी के समय में भारत की आर्थिक स्थिरता का गुणागान किया। इस गुणगान के पीछे भारत की आर्थिक नीतियों को सही ठहराने की मंशा भी छिपी है। भारत के प्रति विकसित देशों का नजरिया आज भी बड़े बाजार और औद्योगिक कूड़ा खपाने जगह जैसा है। इसके चलते पर्यावरण सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को दरकिनार किया जा रहा है। दुनियाँ कैसे भारत की वृद्धि दर की प्रशंसा कर सकती है, जबकि भूखमरी में भारत का रिकार्ड करीब 25 उप-सहारा अफ्रीकी देशों की तुलना में भी निम्नतर बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा तैयार वैश्विक भूखमरी सूची में भारत 88 अतिसंवेदनशील देशों में 66 वें स्थान पर है। यह देशी-विदेशी आँकडे़ भारत के राजनीतिक निर्णयों की कमजोरी भी दर्शाते हैं। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आजादी के तुरंत बाद 650 रियासतों को भारत का हिस्सा बनाया। उनमें से ही कई को भारत आज तक अपना नही पाया है। यह बेगानापन उन्हें अलगाववाद की ओर ढकेल रहा है। इससे निपटने के लिए जो तरीके अपनाए जा रहे हैं वो भी बेहद खतरनाक है। आज भारत अपने ही कई हिस्सों से लड़ रहा है। पूर्वात्तर भारत और मध्य भारत के अधिकांश हिस्सों में फैल रहे जनाक्रोश को रोक पाने में सरकार असफल साबित हुई हैं। पूर्वात्तर से हिंदी विश्वविद्यालय में उच्च अध्ययन के लिए आई लकेरा थोकचोम अपनी टूटी-फूटी हिंदी में कहते हैं कि ''हमें दिल्ली में ऐसे देखा जाता है जैसे हम कोई विदेशी हो'' यह दर्द केवल लकेरा का नही है ऐेसे करोड़ों पूर्वात्तर निवासियों की भी यही शिकायत है। यह शिकायत स्वतंत्रता दिवस के हर साल के कार्यक्रमों में केवल नेताओं के भाषण का हिस्सा बन संत्वना ही पैदा करती है। जमीनी हकीकत तो कुछ और ही है।

भारत विश्व के अनपढ़ देशों में गिना जाता है क्योंकि संसार का हर तीसरा निरक्षर भारतीय ही है। भारत में प्राथमिक कक्षा के लायक 6 से 11 वर्ष आयु के जितने बच्चे हैं, उनमें से आधे से अधिक बच्चों को स्कूल का मुँह देख पाना भी नसीब नहीं होता। अबोध बालक पेट के आगे शिक्षा से कोसों दूर हो जाते हैं। सामाजिक कोढ़ के रूप में बाल मजदूरी एक उद्योग की तरह पनप रहा है। समाज के अधिकांश लोग मासूम बच्चों को प्राथमिक शिक्षा से दूर रखकर बालकों के श्रम के साथ ही उनका शोषण करने में थोड़ा भी नहीं हिचकिचाते। इनमें भी बच्चियों की स्थिति तो दिल दहलाने वाली है। इतना ही नहीं समाज के कुछ असामाजिक तत्वों के द्वारा समाज के पिछड़े, दलितों व गरीबों के बच्चों को नौकरी के बहाने ले जाते हैं और उनका अंग-भंग कर उन्हें जिंदगी भर के लिए अपाहिज बनाकर उनसे भीख मँगवाते हैं।

एक आँकड़े के अनुसार भारत में प्राथमिक कक्षा की उम्र के बच्चों की संख्या करीब 16 करोड़ है। इनमें से लगभग 10 करोड़ बच्चों के नाम विद्यालयों में दर्ज तो जरूर हुए पर करीब 6 करोड़ बच्चे ही सही मायने में स्कूल जा पाते हैं। 'यूनीसेफ' के अनुसार भारत अपने प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था को विश्व की सबसे बड़ी व्यवस्था अवश्य कह सकता है किंतु सबको साक्षर बनाने का लक्ष्य तो दूर का पनघट ही दिखता है। स्वतंत्रता के समय ही 15 प्रतिशत साक्षरता आज बढ़कर लगभग 67 प्रतिशत तक जरूर पहुँची है लेकिन ग्रामीण महिलाओं की साक्षरता दर में आशातीत वृद्धि अभी भी कोसों दूर है।

यह सुखद संदेश है कि देश में नारियाँ आत्मनिर्भर हो रही हैं। जहाँ प्रतिभा पाटिल, मीरा कुमार, मायावती सरीखी महिलाएँ आधी दुनिया की प्रेरणास्त्रोत हैं वहीं पितृसत्तात्मक सोच वाला भारतीय समाज आज भी मादा भ्रूण को कोख में मारने पर लगा हुआ है। अस्पताल के समीप कचरापेटी में कन्या भ्रूण का मिलना तो एक उदाहरण मात्र है। यह सच है कि 63 वर्षों के बाद भी हम अपनी मानसिकता में व्यापक परिवर्तन नहीं ला सके। भौतिकवादी युग में आर्थिक होड़ के कारण मानवीय मूल्यों की ही अवहेलना कर दी गई है। पुरूष-स्त्री की असमानता एक बहुत बड़ी समस्या बनकर उभर रही है। कुछ राज्यों में तो 1000 पुरूष पर 650 स्त्रियों का अनुपात है। जयपुर के पास एक गांव में 417 घरों में से मात्र 13 घरों में ही लड़कियाँ पायी गई। उस गाँव में बारात का आना एक ऐतिहासिक उत्सव की तरह होता है।

सरकार का नारा है कि सबके लिए समुचित स्वास्थ्य सुविधाएँ हो। अच्छे स्वास्थ्य के आभाव के कारण राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है पर सरकार स्वास्थ्य सुविधाएँ मुहैया कराने के मामलों में पूरी तरह असफल है क्योंकि डॉक्टर निजी प्रैक्टिस के जरिए आमजनों से मोटी रकम वसूल कर 'इंडिया शाइनिंग' के चौखटे में फिट हो जाते हैं। डॉक्टर को धरती पर भगवान का एक रूप माना गया है पर इनके द्वारा मानव अंगो की तस्करी के आँकड़े रोंगटे खड़े कर देते हैं। 'इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च' के एक सर्वेक्षण के मुताबिक अस्पतालों के चिल्ड्रन वार्ड के करीब 15 प्रतिशत बिस्तर कुपोषण ग्रस्त बच्चों से घिरे रहते हैं। एक डॉक्टर का कहना है कि उनके क्लिनिक में आने वाली अधिकांश महिलाएँ एनिमियाँ से पीड़ित हैं। गाँवों, पंचायतों व कस्बों में डॉक्टर नियुक्त तो हैं पर स्वास्थ्य केंद्र शो पीस की तरह दिखता है। भारत में चिकित्सा सुविधाओं का घोर अभाव है। दुनिया में जहाँ अच्छे स्वास्थ्य के लिए प्रति सौ व्यक्ति पर एक डॉक्टर हैं वही भारत में प्रति हजार व्यक्ति पर भी एक डॉक्टर उपलब्ध नहीं। बजट में स्वास्थ के लिए जितना प्रावधान किया जाता है उसका महज 15 प्रतिशत ही आमजनों के लिए खर्च हो पाता है। आजाद मुल्क पर सबसे ज्यादा समय तक शासन करने वाली पार्टी के नेताओें के वक्तव्यों के अनुसार जहाँ कभी 1 रु. में से महज 15 पैसा जनता तक पहुँचता था वही अब 5 पैसा भी उन तक नही पहुँच पाता है बाकी कहाँ जाता है, यह बात किसी से छिपी भी नहीं है।

नागरिकों की सुरक्षा एवं स्वास्थ्य को लेकर सरकार की चिंता का एक नमूना भोपाल गैस पीड़ितों को हाल ही में मिला तथाकथित न्याय है। जहाँ एक तरफ भारत अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्था वाला देश बनने की होड़ में है। वही वह अमेरिका से अपने नागरिकों को दिए जाने वाले महत्व को अपने नागरिकों पर लागू नही करता। अमरीकी राष्ट्रपति मैक्सिको की खाड़ी में कच्चे तेल के रिसाव से होने वाली क्षतिपूर्ति के लिए हर्जाना देने का निर्देश देतें हैं तो भारत सरकार भोपाल गैस त्रासदी जैसी घटना के लिए जिम्मेदार लोगों पर कठोर कार्यवाही से बचती रही। आम भारतीय की जान की कीमत आज एक वोट से ज्यादा की नही रह गई है।

एक तरफ हम कहते नहीं अघाते कि भारत में करोड़पतियों व अरबपतियों की संख्या में तेजी से ईजाफा हो रहा है जबकि हकीकत यह है कि यहाँ गरीबी का पलड़ा ही भारी है। अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी इसकी कलई खोलते हुए स्पष्ट कहा है कि देश की आबादी की 77 फीसदी 20 रुपये रोजाना से कम में गुजारा करती है। दिलचस्प पहलू यह है कि इतने रुपये में तो करोड़पतियों के कुत्ते भी नहीं पलते। सरकारी आँकड़ों को ही लें तो यहाँ आज भी 28 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करते हुए मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। एक तरफ खरबपति बनने पर मुकेश अंबानी के पीछे मीडिया वाले दीवाने हो जाते हैं वहीं सही भारत की तस्वीर दिखाने को वे अपनी शान पर बट्टा समझते हैं।

उड़ीसा के करम जिले में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले विपिन गजराई ने प्रसव पीड़ा से मृत हुई अपनी पत्नी के दाहसंस्कार के लिए अपने नवजात दुधमुहे शिशु को मात्र 1200 रुपये में बेच दिया। यू.पी. जौनपुर जिला के बंखेड सोनकर ने अपनी पुत्री संगीता के गुर्दे की बीमारी का इलाज न करा पाने के कारण उसे गोमती नदी में फेंक दिया। ऐसे गरीब भारत के लिए जब नेतागण, चुनावी सरगर्मियों के दौरान, वोट बैंक की नीति पर चलते हुए, दूर से ही हाथ जोड़कर, देश के विकास का वायदा कर वोट माँगते हैं तो उन्हें जरा भी शर्म महसूस नहीं होती। चुनाव जीतने के बाद ही क्षेत्र में उनके दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं। गरीब इस आशा में कि कभी तो सूर्योदय होगा, सर्वोदय होगा, उन्हें अपने वोट देता रहता है पर हो यही रहा है कि गरीबी मिटाने का नाम ले लेकर गरीबों को ही मिटाने के प्रयास जारी है। सेज के नाम पर रोज़ी-रोटी कमाने वाले किसानों, मजदूरों को उनके नैसर्गिक ठिकानों जंगल, जमीन आदि से बेदखल किया जा रहा है। ऐसे में किसान, मजदूर जाएँ तो जाएँ कहाँ? एक हिस्से मात्र का समग्र विकास करके क्या भारत का समग्र विकास हो सकेगा? भारत के विकास के बारे में बात करते ही लगता है कि आजाद भारत के लिए आज भी गांधीजी सिसक रहे हैं। 'इंडिया' के विकास के बजाय सत्ता पर काबिज लोगों को 'भारत' के विकास के बारे में सोचना होगा।

आखिर पायदान पर के व्यक्ति के विकास का गांधी जी का स्वप्न, स्वप्न ही रह गया। ऐसे में इस महापुरूष के बलिदानी का क्या औचित्य? अँग्रेजी राज में आमलोगों की जो स्थिति थी वह तो आज भी बदस्तूर वैसी ही है बस, फर्क इतना ही है कि झंडे बदल गए, गोरों की जगह काले शासक आ गए।

जब हम राष्ट्रीय झंडोतोलन में शरीक हों तब चमकदार भारत की इस छवि में मलीन भारत के यथार्थ को भी कम से कम, अपने हृदय से कर लें और उसे न भूलें। इसके बाद बतौर नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों की प्राथमिकता को पुर्नसंयोजित करें। मलीन भारत का संदर्भ निम्न पंक्तियाँ में -

'जब धरा पर हक नहीं, तो गगन का क्या करेंगे?
जब तन पर वस्त्र नहीं, तो मरने के बाद कफन का क्या करेंगे?


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