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लेख

मानवतावादी अन्वेषक : डॉ. अंबेडकर
अमित कुमार विश्वास


"हिंदू धर्म मेरी बुद्धि में जँचता नहीं, स्वाभिमान को भाता नहीं। जो धर्म तुम्हें शिक्षा प्राप्त नहीं करने देता, उस धर्म में तुम क्यों रहते हो? जिस धर्म में मनुष्यता नहीं, वह धर्म उद्दंडता की सजावट है।" - डॉ. बी.आर. अंबेडकर

छुआ-छूत का प्रभाव जब सारे देश में व्‍याप्‍त था, उसी दौरान 14 अप्रैल, 1891 को महू छावनी (मध्‍य प्रदेश) में जन्‍मे बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर प्रख्यात अर्थशास्त्री, दार्शनिक, राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक, लेखक, शिक्षाविद् एवं राष्ट्रवादी थे। डॉ. अंबेडकर के संपूर्ण वांगमय तथा उनकी रचनाओं का अध्‍ययन करने पर हम पाते हैं कि, उनके संपूर्ण जीवन-दर्शन के मुख्‍यतः दो आयाम हैं। पहला, हिंदू धर्म द्वारा आरोपित सामाजिक अन्‍याय के प्रति साहसपूर्ण असहमति और दूसरा, बौद्ध धर्म-दर्शन में अंतनिर्हित सामाजिक न्‍याय से विवेकपूर्ण सहमति। उन्‍होंने अपने विचारों एवं कार्यों से हिंदू धर्म की तमाम रूढ़ियों, मान्‍यताओं एवं परंपराओं को नकारते हुए उसका एक मजबूत प्रतिपक्ष समाज के समक्ष प्रस्‍तुत किया।

डॉ. अंबेडकर अपने जीवन के प्रारंभिक दौर से ही छुआ-छूत के दंश को झेल रहे थे। मि. ब्‍लेक क्‍लार्क ने डॉ. अंबेडकर के जीवन और कार्य पर 'द विक्‍ट्री ऑफ एन अनटचेबल' लेख लिखकर न्‍यूयार्क के क्रिश्‍चन हेराल्‍ड पत्रिका में प्रकाशित किया है। इस लेख का सारांश 'दि रीडर डाइजेस्‍ट' के मार्च 1950 के अंक में छपा। इस लेख में डॉ. अंबेडकर के सतारा हाई स्‍कूल के दो संस्‍मरण भी हैं। डॉ. अंबेडकर को दोपहर में प्‍यास लगी, तब मास्‍टर ने माली को नल खोल देने के लिए कहा था। डॉ. अंबेडकर को नल से नीचे गिरते हुए पानी पर उलटा मुँह करके पानी-पीना पड़ा। दूसरा संस्‍मरण यह है कि डॉ. अंबेडकर को क्रिकेट खेलने की बड़ी इच्‍छा होती थी। लेकिन अस्‍पृश्‍य होने के कारण उनके मास्‍टर उनको अन्‍य सवर्ण हिंदू बच्‍चों के साथ खेलने नहीं देते थे। लड़के जब क्रिकेट खेलते थे, तब वे दूर बैठकर क्रिकेट का खेल देखा करते थे।

वर्ष 1907 में मैट्रिक पास करने के उपरांत आर्थिक संकटों के कारण भीमराव को महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्‍त करना कठिन हो गया। इसी दौरान कृष्‍णाजी अर्जुन केलुस्‍कर गुरुजी, निर्णय सागर और दामोदर सावला राम के सदप्रयासों से बड़ौदा नरेश सयाजी राव गायकवाड़ ने भीमराव को उच्च शिक्षा हेतु तीन साल की छात्रवृत्ति प्रदान करते हुए शर्त रखी कि अमेरिका से वापस आने पर दस वर्ष तक बड़ौदा राज्य की सेवा करनी है। भीमराव ने कोलंबिया विश्वविद्यालय से एम.ए. तथा पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की। एम.ए. की उपाधि के लिए उन्‍होंने 'एडमिनिस्‍ट्रेशन एंड फायनेंस ऑफ द ईस्‍ट इंडिया कंपनी' नामक शोध प्रबंध प्रस्‍तुत किया। इसके उपरांत उन्‍होंने अर्थशास्‍त्र के क्षेत्र में 'द नेशनल डिविडेंड ऑफ इंडिया-हिस्‍टॉरिकल एंड एनालिटिकल स्‍टडी' विषय पर पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्‍त की। इस शोध से उनकी काफी प्रशंसा हुई। उनकी छात्रवृत्ति एक वर्ष के लिए और बढ़ा दी गई। चार वर्ष पूर्ण होने पर जब वे भारत आए तो बड़ौदा में उन्हें उच्च पद दिया गया लेकिन कुछ सामाजिक विडंबनाओं एवं आवासीय समस्या के कारण उन्हें नौकरी छोड़ कर बंबई जाना पड़ा। नवंबर, 1918 में बंबई के सीडेनहम कॉलेज में राजनीतिक-अर्थव्‍यवस्‍था पढ़ाने के लिए वे प्रोफेसर नियुक्त हुए लेकिन कुछ यथास्थितिवादी लोगों के कारण वहाँ भी उन्‍हें परेशानियों का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके उन्‍होंने अपना आत्मबल नहीं खोया और निरंतर वे नवसमाज के निर्माण हेतु सोचते रहे। 1919 में वे पढ़ाई के लिए लंदन गए। अपने अथक परिश्रम से बैरिस्ट्री की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे तो उन्‍होंने 1923 में बंबई उच्च न्यायालय में वकालत शुरु की। एक मुकदमे में उन्होंने अपने ठोस तर्कों से अभियुक्त को फाँसी की सजा से मुक्त करा दिया था।

डॉ. अंबेडकर ने तीन महापुरुषों-कबीर, महात्‍मा ज्‍योतिबा फुले और भगवान बुद्ध को अपना प्रेरणा स्‍त्रोत बताया है। वे कहते हैं कि कबीर ने उन्‍हें भक्ति भावना प्रदान की, ज्‍योतिबा फुले ने उन्‍हें ब्राह्मणवाद से विरोध करने के लिए प्रेरित किया तथा शिक्षा और आर्थिक उत्‍थान का रास्‍ता दिखाया और बुद्ध से उन्‍हें मानसिक और दार्शनिक आधार मिला, फलस्‍वरूप 'दलितों के उद्धार का मार्गदर्शन प्राप्‍त हुआ, जिसका माध्‍यम था सामूहिक धर्म परिवर्तन।'

बाबासाहेब ने मुख्यधारा के महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी कथित उदासीनता की कटु आलोचना की। डॉ. अंबेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मोहनदास करमचंद गांधी की आलोचना की, उन्होंने उन पर अस्पृश्य समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रुप में प्रस्तुत करने का आरोप लगाया। डॉ. अंबेडकर ब्रिटिश शासन की विफलताओं से भी असंतुष्ट थे, उन्होंने अस्पृश्य समुदाय के लिए एक ऐसी अलग राजनैतिक पहचान की वकालत की जिसमें कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही कोई दखल ना हो। 1929 में अंबेडकर ने भारत में एक जिम्मेदार भारत सरकार की स्थापना पर विचार करने के लिए ब्रिटिश कमीशन के साथ सहयोग करने का एक विवादास्पद निर्णय लिया। कांग्रेस ने आयोग का बहिष्कार करने का फैसला किया और आजाद भारत के एक संविधान के संस्करण की रूपरेखा तैयार की। कांग्रेस के संस्करण में दलित वर्गों के लिए कोई प्रावधान नहीं था। अंबेडकर दलित वर्गों के अधिकारों की रक्षा के कारण कांग्रेस के लिए उलझन बन गए। जब रैम्जे मैकडोनाल्ड 'सांप्रदायिक अवार्ड' के तहत दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचिका की घोषणा की तब गांधीजी इस फैसले के खिलाफ आमरण भूख हड़ताल पर बैठ गए। नेताओं ने डॉ. अंबेडकर को अपनी मांग छोड़ने को कहा। 24 सितंबर, 1932 को डॉ. अंबेडकर और गांधीजी के बीच एक समझौता हुआ जो प्रसिद्ध 'पूना संधि' के नाम से जाना जाता है। इस संधि के अनुसार अलग निर्वाचिका की माँग को क्षेत्रीय विधान सभाओं और राज्यों की केंद्रीय परिषद में आरक्षित सीटों जैसी विशेष रियायतों के साथ बदल दिया गया। हालाँकि 8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान डॉ. अंबेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के समक्ष रखा था, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसके सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने में है। डॉ. अंबेडकर लंदन में तीनों राउंड टेबल कांफ्रेंस में भाग लेते हुए अछूतों के कल्याण के लिए तार्किक तरीके से अपनी बात रखी।

अपने विवादास्पद विचारों और गांधी और कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद डॉ. अंबेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब देश 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व में आई तो उसने डॉ. अंबेडकर को देश का पहला कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त, 1947 को डॉ. अंबेडकर को स्वतंत्र भारत में नए संविधान की रचना के लिए बनी 'संविधान मसौदा समिति' के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। डॉ. अंबेडकर द्वारा तैयार किया गया संविधान पाठ में संवैधानिक गारंटी के साथ व्यक्तिगत नागरिकों को एक व्यापक श्रेणी की नागरिक स्वतंत्रताओं की सुरक्षा प्रदान की जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता, अस्पृश्यता का अंत और सभी प्रकार के भेदभावों को गैर कानूनी करार दिया गया। डॉ. अंबेडकर ने महिलाओं के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की वकालत की। उन्‍होंने ही पहली बार महिलाओं को प्रसूति अवकाश दिलाने की बात की और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लोगों के लिए सिविल सेवाओं, स्कूलों और कॉलेजों की नौकरियों में आरक्षण प्रणाली शुरु करने के लिए सभा का समर्थन भी हासिल किया। भारत के विधि निर्माताओं ने इस सकारात्मक कार्यवाही के द्वारा दलित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के उन्मूलन और उन्हें हर क्षेत्र में अवसर प्रदान कराने की चेष्टा की। 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। संविधान निर्माण कार्य को पूरा करने के उपरांत डॉ. अंबेडकर ने कहा कि, 'मैं महसूस करता हूँ कि संविधान, साध्य (काम करने लायक) है, यह लचीला है पर साथ ही यह इतना मजबूत भी है कि देश को शांति और युद्ध दोनों के समय जोड़ कर रख सके। वास्तव में, मैं कह सकता हूँ कि अगर कभी कुछ गलत हुआ तो इसका कारण यह नहीं होगा कि हमारा संविधान खराब था बल्कि इसका उपयोग करने वाला मनुष्य अधम था।' आज जब हमें यह सुनने को मिलता है कि दलितों के अन्‍याय हुआ है, विरोध में फैसले दिए गए हैं तब डॉ. अंबेडकर की यह बात हमें याद आती हैं। उनके व्यक्तित्व और चिंतन का संविधान के स्वरुप पर गहरा प्रभाव पड़ा। उनके प्रभाव के कारण ही संविधान में समाज के हाशिए के लोगों (पद-दलित वर्गों, अनुसूचित जातियों और जनजातियों) के उत्थान के लिए विभिन्न संवैधानिक व्यवस्थाओं और प्रावधानों का निरुपण किया; परिणामस्वरूप भारतीय संविधान, सामाजिक न्याय का एक महान दस्तावेज बन गया।

वर्ष 1951 में संसद में अपने हिंदू कोड बिल के मसौदे को रोके जाने के बाद डॉ. अंबेडकर ने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इस मसौदे में उत्तराधिकार, विवाह और अर्थव्यवस्था के कानूनों में लैंगिक समानता की माँग की गई थी। हालाँकि प्रधानमंत्री नेहरू, कैबिनेट और कई अन्य कांग्रेसी नेताओं ने इसका समर्थन किया पर संसद सदस्यों की एक बड़ी संख्या इसके खिलाफ थी। डॉ. अंबेडकर ने 1952 में लोक सभा का चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा पर वे हार गए। मार्च 1952 में उन्हें संसद के ऊपरी सदन यानी राज्य सभा के लिए नियुक्त किया गया और वे मृत्युपर्यंत इस सदन के सदस्य रहे।

यह तो हम सभी जानते हैं कि डॉ. अंबेडकर हिंदू धर्म के कर्मकांडों और छूआ-छूत की बिंडबनाओं से काफी व्‍यथित रहते थे। उनका कहना था कि हिंदू धर्म में जन्‍म लेना, मेरे वश में नहीं था लेकिन यह मेरे वश में है कि मैं किस धर्म में मरुँ। एक पत्रकार से उन्‍होंने कहा था कि मैं बौद्ध धर्म स्‍वीकार करूँगा क्‍योंकि इसमें समतामूलक समाज के तत्‍व सबसे अधिक हैं। 24 मई, 1956 को बंबई में बुद्ध जयंती के अवसर पर उन्होंने यह घोषणा की कि वह अक्टूबर में बौद्ध धर्म अपना लेंगे। 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर दीक्षाभूमि में सुबह 9.40 से 9.45 बजे डॉ. अंबेडकर ने श्रीलंका के एक महान बौद्ध भिक्षु महत्थवीर चंद्रमणी से पारंपरिक तरीके से त्रिरत्न ग्रहण कर और पंचशील को अपनाते हुए बौद्ध धर्म ग्रहण किया। तदनंतर उन्‍होंने पाँच लाख शोषित व पीड़ित मानवों को बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया और यह सिलसिला जारी रहा। डॉ. अंबेडकर द्वारा दस लाख लोगों का बौद्ध धर्म में रूपांतरण ऐतिहासिक था क्योंकि यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक रूपांतरण था। यह रक्‍तहीन सामाजिक क्रांति थी, जिसने जाति-विहीन समाज स्‍थापित किया जिसमें चातुर्वर्ण्‍य, जाति-व्‍यवस्‍था और अस्‍पृश्‍यता का कोई स्‍थान नहीं है। डॉ. अंबेडकर ने अपने विचारों को जनमानस तक पहुँचाने के लिए कई पुस्‍तकें व लेख लिखे। स्‍वास्‍थ्‍य खराब होने के उपरांत वे इस बात को लेकर चिंतित रहते थे कि उनके बाद उनकी पुस्‍तकों को कौन पूरा करेगा और शोषित जनता का कौन सहारा बनेगा। कई बार तो वे इन बातों का स्‍मरण करते हुए फूट-फूट कर रोने भी लगते थे। एक दिन उन्‍होंने नानक चंद रत्‍तू से कहा, 'मेरी जनता को यह बताना कि जो कुछ मैंने उनके लिए किया है, यह मैं अपने जीवन में अनगिनत कठिनाईयों, बाधाओं और विपत्तियों को सहन करके किया है और मुझे अपने विरोधियों के साथ संघर्ष करने पड़े हैं। बड़ी कइिनाई के साथ मैं यह काफिला, जहाँ आज है, ले आ सका हूँ चाहे कुछ भी हो कठिनाईयों के बावजूद यह काफिला आगे बढ़ता ही रहना चाहिए। यदि मेरे अनुयायी इस काफिले को आगे न ले जा सकें तो उन्‍हें इस काफिले को किसी रूप में भी पीछे नहीं जाने देना चाहिए। मेरा अपने लोगों को यही संदेश है।' अपनी अंतिम पांडुलिपि 'बुद्ध और उनके धम्म' को पूरा करने के तीन दिन के बाद 6 दिसंबर, 1956 को अंबेडकर का महापरिनिर्वाण नींद में दिल्ली में उनके घर में हो गया। 1990 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया है।

डॉ. अंबेडकर पर चिंतन करते समय यह हमें यह जान लेना चाहिए कि दरअसल वे ज्ञान आधारित समाज का निर्माण करना चाहते थे, इसलिए उनका आग्रह था कि शिक्षित बनो, संगठित होओ और संघर्ष करो। इस संघर्ष में धम्म का अनुसरण उनकी निष्ठा थी। भीमराव भगवान बुद्ध के जिस धम्म पथ को स्वीकारते हैं, उसमें प्रज्ञा या विचार-धम्म महत्वपूर्ण है, परंतु केवल ज्ञान खतरनाक है, यह शील के बिना अधूरा है, इसलिए शील या आचरण-धम्म भी महत्वपूर्ण माना है। प्रज्ञा, शील, करुणा और मैत्री भावों से संचालित समाज ही समरस समाज हो सकता है, जो सामाजिक क्रांति का नैतिक आदर्श है। यह आदर्श भीमराव ने हम सभी को दिया है।

डॉ. अंबेडकर की लोकतांत्रिक मूल्यों में अटूट आस्था थी। वे कहते थे 'जिस शासन प्रणाली से रक्तपात किए बिना लोगों के आर्थिक व सामाजिक जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जाता है, वह लोकतंत्र है।' वे मनुष्य के दुखों की समाप्ति सिर्फ भौतिक व आर्थिक शक्तियों के आधिपत्य से नहीं स्वीकारते थे। वे मार्क्सवादियों से कहते हैं - मनुष्य केवल रोटी के सहारे जिंदा नहीं रहता, उसके पास मन है, उस मन को विचारों की खाद चाहिए। धर्म मनुष्य के मन में आशा का निर्माण करता है। उसे काम करने के लिए प्रवृत्त करता है। उनके अनुसार धर्म सिर्फ पुस्तकों का वाचन या पराप्राकृतिक में विश्वास नहीं है, यह धम्म है, नीति है, जो सभी के लिए ज्ञान के द्वार खोलता है, जिसमें कोई भेदभाव या संकुचितता नहीं है। उनकी संकल्पना का राष्ट्र एक आधुनिक विचार है। वे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की बात करते हैं, लेकिन वे इसे पश्चिमी विचार नहीं मानते। वे इन विचारों को फ्रांसिसी क्रांति से न लेकर, बुद्ध की शिक्षा या बौद्ध परंपरा से लेते हैं। संसदीय प्रणालियों को भी वे बौद्ध भिक्षु संघों की परंपरा से लेते हैं। डॉ. अंबेडकर जाति व्यवस्था का जड़ से उन्मूलन चाहते थे, क्योंकि उनकी तीक्ष्ण बुद्धि देख पा रही थी कि हमने कर्म सिद्धांत को, जो व्यक्ति के मूल्यांकन एवं प्रगति का मार्गदर्शक है, भाग्यवाद, अकर्मण्यता और शोषणकारी समाज का पोषक बना दिया है। उनकी सामाजिक न्याय की दृष्टि यह माँग करती है कि मनुष्य के रूप में जीवन जीने का गरिमापूर्ण अधिकार समाज के हर वर्ग को समान रूप से मिलना चाहिए और यह सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र से प्राप्त नहीं हो सकता। इसके लिए आर्थिक व सामाजिक लोकतंत्र भी चाहिए। एक व्यक्ति एक वोट की राजनीतिक बराबरी होने पर भी सामाजिक एवं आर्थिक विषमता लोकतंत्र की प्रक्रिया को दूषित करती है, इसलिए आर्थिक समानता एवं सामाजिक भेदभाव विहीन जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति वे प्रतिबद्धता का आग्रह करते हैं।

अंत में कहा जा सकता है कि अंबेडकर का संपूर्ण जीवन-दर्शन ब्राह्मणवाद-पूँजीवाद से मुक्‍त एक जनतांत्रिक-समाजवादी भारत के निर्माण हेतु समर्पित था। लेकिन, डॉ. अंबेडकर के बाद कुछेक को छोड़कर, किसी ने भी उनके इस 'मिशन' को पूरा करने हेतु सार्थक प्रयास नहीं किया। यही कारण है कि हमारा देश आज भी ब्राह्मणवाद-पूँजीवाद से ग्रस्‍त है और 'जनतंत्र' एवं 'समाजवाद' संविधान के पन्‍नों में सिमट कर रह गया है। इससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि जगह-जगह डॉ. अंबेडकर का कुपाठ हो रहा है और उनके कारवाँ को पीछे धकेलने की साजिश भी। इसी की बानगी है कि कोई डॉ. अंबेडकर के नाम पर जातीय राजनीति का खेल खेल रहा है, तो कोई उनके हाथ में त्रिशूल डालकर चलाना चाहता है अपना सांप्रदायिक-राजनीतिक एजेंडा। वर्तमान असहिष्णुता, सामाजिक असुरक्षा, दलितों के साथ सवर्णों द्वारा किए जाने वाले कुकृत्‍य, आंतरिक कलह एवं विघटनकारी शक्तियों ने, जो सांप्रदायिक घृणा फैला रखी है, देश को सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पीछे घकेल दिया है। ऐसे में, मानवतावादी अन्‍वेषक डॉ. अंबेडकर के सच्‍चे-उत्‍तराधिकारियों, अनुयायियों की यह महती जिम्‍मेदारी है कि वे उनके विचार-संघर्ष को बचाने-बढ़ाने के लिए मजबूती से आगे आएँ। जय भीम, जय भारत।

संदर्भ-सूची

 

1. नैमिशराय, मो., (2012). 'महानायक बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर', दिल्ली : धम्म ज्योति चैरिटेबल ट्रस्ट

2. शेखर, सु. (2014). 'सामाजिक न्याय'', भागलपुर : दर्शना पब्लिकेशन

3. http://hindi.culturalindia.net/dr-b-r-ambedkar.html

4. http://inc.in/CongressSandesh/Hi/287/-

5. https://samaybuddha.wordpress.com/baba-sahab-ambedkar-the-great/

6. http://www.achhikhabar.com/2016/03/28/b-r-ambedkar-interesting-facts-in-hindi


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