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वैचारिक आजादी में हिंदी साहित्य की भूमिका
अमित कुमार विश्वास


यूरोप में हुए पुनर्जागरण (रेनेसाँ) ने व्‍यक्ति के बौद्धिक जीवन में एक क्रांति पैदा की, यही कारण है कि सांस्‍कृतिक एवं बौद्धिक वर्ग ने परंपरा से हटकर तर्क, विश्‍लेषण तथा वैचारिक स्‍वातंत्र्य पर जोर दिया। आक्रमणकारियों ने हमारी अर्थसत्‍ताओं को लूटा और अँग्रेजों ने यहाँ लगभग ढ़ाई सौ वर्षों तक राज किया। औपनिवेशीकरण का दौर वस्तुतः नए साम्राज्यवाद के उदय का दौर था। उसकी डोर पूँजीपति घरानों तथा उनके चहेते बुद्धिजीवियों और नौकरशाहों के अधीन थी। और उस समय प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का भी बोलबाला था जो अपने देश और समाज के बौद्धिक नेतृत्व का दावा करते थे। किंतु अपनी वैचारिक प्रेरणाओं के लिए जब-तब पश्चिम की ओर झाँकते रहते थे। 1991 के बाद देश में आर्थिक उदारीकरण के नाम पर पूँजी और कार्पोरेट घरानों का जल-जंगल और जमीन को लूटने का खेल चला। यह साम्राज्यवाद का नया रूप था, जिसमें राष्ट्रों को तलवार के बजाय आर्थिक नीतियों द्वारा योजनाबद्ध तरीके से समर्पण के लिए मजबूर किया जाता था, आज सांस्कृतिक विघटन है। ऐसे में वैचारिक क्रांति के माध्‍यम से आत्‍मचेतस होने की जरूरत महसूस की जाने लगी है।

आजादी आंदोलन के दौरान वैचारिक आजादी में साहित्‍य की भूमिका निर्विवाद रही है। देश की स्वतंत्रता के लिए 1857 से लेकर 1947 तक क्रांतिकारियों व आंदोलनकारियों के साथ ही लेखकों, कवियों और पत्रकारों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी गौरव गाथा हमें प्रेरणा देती है कि हम स्वतंत्रता के मूल्य को बनाये रखने के लिए कृत संकल्पित रहें। प्रेमचंद की 'रंगभूमि, कर्मभूमि' उपन्यास, भारतेंदु हरिश्चंद्र का 'भारत-दूर्दशा' नाटक, जयशंकर प्रसाद का 'चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त' नाटक आज भी उठाकर पढि़ए, देशप्रेम की भावना जगाने के लिए बड़े कारगर सिद्ध होंगे। वीर सावरकर की '1857 का प्रथम स्वाधीनता संग्राम' हो या पंडित नेहरू की 'भारत एक खोज' या फिर लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की 'गीता रहस्य' या शरद बाबू का उपन्यास 'पथ के दावेदार' जिसने भी इन्हें पढ़ा, उसे घर-परिवार की चिंता छोड़ देश की खातिर अपना सर्वस्व अर्पण करने के लिए स्वतंत्रता के महासमर में कूदते देर नहीं लगी। उनदिनों साहित्यकारों ने जिम्मेदारी के साथ अपनी भूमिका निभाई। 1956 के बाद आंबेडकर के प्रभाव में हुए दलित आंदोलन, 1967 के नक्‍सलबाड़ी आंदोलन, 1992 के बाबरी मस्जिद विध्‍वंस से उपजे सांप्रदायिक उन्‍माद, भूमंडलीकरण, आर्थिक उदारीकरण सहित मेधा पाटकर जैसे कार्यकर्ताओं द्वारा चलाए जा रहे आंदोलन सहित अन्‍ना आंदोलन में साहित्‍य की भूमिका को हम देख सकते हैं। साहित्यकारों की कलमें जातीय-धार्मिक उन्माद, श्रेष्ठता-निम्नता,गरीबी-अमीरी से उपजी सामाजिक पीड़ा के आक्रोश को कम करने के मुद्दे पर खूब चली हैं और आज भी थमी नहीं हैं। समाज की जड़ व्‍यवस्‍था के खिलाफ में परिवर्तनगामी बुद्धिजीवियों ने हमें उठकर खड़ा होने का हौसला बढ़ाया है। प्रेमचंद के शब्‍दों में परिवर्तन तो वैचारिक क्रांति से आता है। वैचारिक क्रांति का आगाज साहित्‍यकारों ने अपनी रचनाओं के जरएि किया। प्रेमचंद, मुक्तिबोध, कैफी आजमी, भीष्‍म साहनी, यशपाल, साहिर लुधियानवी, नागार्जुन, अली सरदार जाफरी, फ़ैज, मज़ाज जैसे नामों की रोशनी में खड़ा हुआ साहित्‍य-सांस्‍कृतिक क्षेत्र का प्रगतिशील आंदोलन हमें आकर्षित करती हैं। लंबे संघर्षों के उपरांत सन् 47 में हम आजाद हो गए, राजनीतिक रूप से हमें भौगोलिक आजादी तो मिली पर हम समकालीन समस्‍याओं (जातिवाद, आतंकवाद, मँहगाई, गरीबी, भ्रष्‍टाचार आदि) को देखकर कह सकते हैं क्‍या हम सचमुच में वैचारिक, सामाजिक तथा आर्थिक रूप से आजाद हो पाए हैं, क्‍या हम पूँजीवाद और पश्चिमी सामंतवाद की जकड़न से मुक्‍त हो पाए हैं फिर क्‍यूँ और किसी भ्रम में हम अपने सांस्‍कृतिक/साहित्यिक आंदोलनों की आग को ठंडा होते देखकर भी शांत हैं। सांस्‍कृतिक रूप से हमारी इसी शिथिलता का नतीजा है कि हमारे पाठ्यक्रमों में से प्रेमचंद, यशपाल, परसाई जैसे लेखकों को बाहर का रास्‍ता दिखाया जा रहा है।

औपनिवेशिक शासन के प्रभाव स्वरूप भारत के ग्रामीण जीवन में जो बदलाव आए उसका प्रेमचंद ने आम लोगों की भाषा में गोदान, गबन, निर्मला, कर्मभूमि, सेवासदन, कायाकल्प, प्रतिज्ञा जैसे उपन्यासों और कफ़न, पूस की रात, नमक का दारोगा, बड़े घर की बेटी, घासवाली, ईदगाह, पंच परमेश्‍वर, सदगति जैसी कई कहानियों में यथार्थ चित्रण किया। तत्कालीन ग्रामीण समाज की ग़रीबी, जहालत, शोषण, उत्पीड़न, वंचना, भेदभाव, धार्मिक विसंगति, महिलाओं की बदहाली जैसी सच्चाइयाँ और अँग्रेजी शासन के शोषण का असली चेहरा प्रेमचंद की लेखनी का संस्पर्श पाकर जीवंत हो उठे। प्रेमचंद के समय में और उसके बाद जैनेंद्र, अज्ञेय, फणीश्वरनाथ रेणु, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, यशपाल जैसे हिंदी के कई बड़े लेखकों ने सामाजिक समस्‍याओं पर अपनी लेखनी चलाकर लोगों को चेतस बनाया है। हमारे समय में बहुत से लेखक हैं लेकिन कोई भी प्रेमचंद जैसा नहीं हो पाया। आलोचक मैनेजर पांडेय कहते हैं कि "प्रेमचंद जितने बड़े लेखक थे, उतने बड़े लेखक हमेशा पैदा नहीं होते। ये लगभग वैसा ही है कि अँग्रेजी साहित्य में दूसरा शेक्सपियर आज तक पैदा नहीं हुआ। प्रेमचंद ने जिन समस्याओं पर कहानियों और उपन्यासों का लेखन किया था वो सभी समस्याएँ आज भी मौजूद हैं और उनमें से कुछ तो प्रेमचंद के जमाने से अधिक भीषण रूप में।" दरअसल जिस तरह का कथालेखन इस समय हिंदी में हो रहा है, ऐसा लगता है जैसे किसी विचार को प्रसारित करने के लिए किया जा रहा है। इतना ही नहीं, लेखक का जैसा गहरा रिश्ता समाज से होना चाहिए वैसा आज नहीं है। लेखक को जिस तरह अपनी परंपरा, अपने आज और अपने भावी कल के बीच का पुल होना चाहिए वैसा पुल वो नहीं बन पा रहा। आज प्रेमचंद जैसी प्रतिभा वाला लेखक, समाज के बड़े हिस्से को छूने वाला लेखक क्यों नहीं बन पा रहा, इसका कारण स्‍पष्‍ट है कि आज का लेखक आत्मचेतस है, अपनी सफलता के बारे में तो सोचता है लेकिन उसके पास प्रेमचंद जैसी विश्वदृष्टि का अभाव है। आज़ादी के बाद के हिंदी साहित्य में श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास 'रागदरबारी', भीष्‍म साहनी के तमस, मन्नु भंडारी के उपन्यास 'महाभोज' और 'आपका बंटी' और निर्मल वर्मा के उपन्यास 'वे दिन' की खूब चर्चा हुई। हाल के वर्षों में कमलेश्वर के 'कितने पाकिस्तान', निर्मल वर्मा के 'अंतिम अरण्य', कृष्णा सोबती के 'समय सरगम' जैसी कृतियों को खूब सराहा गया। इतिहास गवाह है कि कवियों ने कविता के माध्‍यम से हमें जगाया है। मुक्तिबोध ने अँधेरे में, सुभद्रा कुमारी चौहान ने खूब लड़ी मरदानी वह तो झाँसी वाली रानी थी, निराला ने सरोज स्मृति , धूमिल ने संसद से सड़क तक, शमशेर बहादुर सिंह ने टूटी हुई बिखरी हुई, अज्ञेय ने कलगी बाजरे की, नागार्जुन ने अकाल और उसके बाद, रघुवीर सहाय ने रामदास, धूमिल ने बीस साल बाद, राजकमल चौधरी ने मुक्तिप्रसंग जैसी कविताओं के माध्‍यम से समाज में व्‍याप्‍त शोषण पर दृष्टि डाली है। केदारनाथ अग्रवाल, विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, श्रीकांत वर्मा, कुंवर नारायण और केदारनाथ सिंह की कई कविताएँ, विष्णु खरे की 'लालटेन जलाना' और 'अपने आप', लीलाधर जगूड़ी की 'अंतर्देशीय' और 'बलदेव खटिक', चंद्रकांत देवताले की 'औरत', विनोद कुमार शुक्ल की 'दूर से अपना घर देखना चाहिए' और 'हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था', ऋतुराज की 'एक बूढ़ा आदमी', आलोक धन्वा की 'जनता का आदमी' और 'सफ़ेद रात' और असद ज़ैदी की 'बहनें' और 'समान की तलाश' जैसी अनेक कविताएँ अनुभव के विभिन्न आयामों को मार्मिक ढंग से व्यक्त करने के कारण याद रहती हैं और समय बीतने के साथ वे हिंदी की सामूहिक स्मृति में बस जाएँगी। वर्तमान संदर्भ में नए प्रकार के विमर्श किए जा रहे हैं - यथा : स्‍त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आदि।

साहित्‍य की विचारधारा में कथा-कहानी का जो शास्त्र है उसका गहरा संबंध कहानी कहने, कथा के चुनने और कहने के समय से है। उस दौर के कहानीकारों ने समकालीन समय, समाज परिवर्तन एवं विकास की प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए कहानी की दुनिया रची है। प्रेमचंद की सद्गति कहानी, हिंदू धार्मिक समाज की जाति व्यवस्था पर एक गहरी मार्मिक आधुनिक टिप्पणी की तरह है, जो आज और अधिक प्रासंगिक हो उठी है. 'ठाकुर का कुआँ', 'सवा सेर गेहूँ', 'मोटेराम का सत्याग्रह', जैसी प्रेमचंद की अनेक कहानियों में अंतर्भूत मानवीय संवेदना तथा जाति व्यवस्था के प्रति उनका दृष्टिकोण इस कहानी को कालजयी और आधुनिक बनाता है। आर्थिक विषमता को किसी अमानुषिक वास्तविकता की त्रासदी में बदलते देखना आज की वंचना और अमीरी की खाइयों में बाँटने वाली राजनीति और समाज व्यवस्था पर प्रेमचंद की कफ़न कहानी एक कालजयी तमाचे की तरह है। जब तक समाज में अमीरी और ग़रीबी यानी वैभव और वंचना की खाई रहेगी, 'कफ़न' किसी क्लासिक की तरह कालजयी रहेगी।

भारत-पाकिस्तान के विभाजन पर अनेक कहानियाँ, उपन्यास, समाजशास्त्रीय-राजनीतिक विश्लेषण आदि लिखे गए, लेकिन सआदत हसन मंटो की कहानी 'टोबा टेक सिंह', इस विभाजन के पीछे सक्रिय राजनीति और सांप्रदायिकता के उन्माद की अविस्मरणीय, सार्वभौमिक, कालजयी क्लासिक बन गई। दरअसल जब पाकिस्तान के पागल बिशन सिंह को उसके गाँव टोबा टेक सिंह से निकाल कर हिंदुस्तान भेजा जाता है तब वह दोनों देशों की सरहद पर मर जाता है। उसके शरीर का आधा हिस्सा हिंदुस्तान और आधा पाकिस्तान की सीमा में आता है। मरने के पहले पागल बिशन सिंह की गाली, भारत और पाकिस्तान के लहूलुहान बंटवारे पर एक ऐसी टिप्पणी बन जाती है, जो अब विश्व कथा साहित्य में एक गहरी, मार्मिक, अविस्मरणीय मनुष्यता की चीख के रूप में हमेशा के लिए उपस्थित है। नया मध्‍यवर्ग आज जिस प्रकार से जल्‍दी सब कुछ पा लेने को आतुर दिखता है और वह येन-केन-प्रकारेण अपना स्‍वार्थ सिद्धि चाहता है इसकी अनुगूँज हमें भीष्म साहनी की चीफ़ की दावत में देखने को मिलती है। आधुनिक बनने का प्रदर्शन करते शहरी मध्यवर्गीय परिवार के करियरिज़्म पर एक तीखी टिप्पणी की तरह है यह कहानी, जो पारिवारिक संबंधों के मार्मिक विघटन और बढ़ती संवेदनहीनता की, चेखव की विख्यात कहानी 'एक क्लर्क की मौत' की तरह ही महत्‍वपूर्ण है। शहरी और देहाती भावनाओं और संवेदनाओं की विडंबनात्मक रोमैंटिक परिणति की तर्ज पर फणीश्वर नाथ रेणु ने तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम कहानी लिखी जिसे आंचलिक भाषा के आधुनिक कथा-स्थापत्य में संयोजन और प्रयोग ने इस कहानी को विरल होने का दर्जा दिया है। देवकीनंदन खत्री ने चंद्रकांता संतति, मुंशी प्रेमचंद ने गोदान, सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय ने शेखर : एक जीवनी, इलाचंद्र जोशी ने संन्यासी, श्रीलाल शुक्ल ने राग दरबारी, फणीश्वरनाथ रेणु ने मैला आँचल, विनोद कुमार शुक्ल ने नौकर की कमीज के माध्‍यम से समाज की विसंगतियों पर हमारा ध्‍यान आकर्षित किया है।

वर्तमान संदर्भ में भूमंडलीकरण की कई ऐसी प्रक्रियाएँ हैं, जो इधर के नए कहानीकारों में स्‍पष्‍टतया दिखलाई देती है। यहाँ इंटरनेट की दुनिया से लेकर एक सुविधाभोगी भौतिक जीवन की आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए नव निर्मित्‍त उपादानों की भरमार है जिसमें आज की जिंदगी के यथार्थ को एक नये ढ़ंग से रचा जा रहा है और मनुष्‍य है कि उसके मायाजाल से निकल ही नहीं पा रहा है। उदाहरण के लिए पंकज बिष्‍ट ने बच्‍चे गवाह नहीं हो सकते, उदय प्रकाश ने तिरिछ, संजीव ने अपराध, चित्रा मुदगल ने लकड़बग्‍घा, ओमप्रकाश वाल्‍मीकि ने सलाम, अवधेश प्रीत ने नृशंस में समकालीन समय, समाज, राजनीति के यथार्थ तथा बाजारवाद के मायाजाल में फँसे मनुष्‍य एवं उसके अंतर्मन की बेचैनी, भय, अंतर्द्वंद्व आदि का प्रभावशाली चित्रण अपनी क‍हानियों में किया है।

पूँजीवादी-नव साम्राज्यवादी व्यवस्था ताकतवर दुश्मन के रूप में उनके सामने मुँह बाये खड़ी है जब देश के बड़े मध्‍य वर्ग के बीच नवजागरण का स्‍थान दैवीय जागरण ने ले लिया है और पूरा मध्‍य वर्ग आँखें मूँदे किसी समतामूलक समाज की कामना में तल्‍लीन है। ठीक उसी समय सांप्रदायिकता का खतरनाक खेल, बाजारवाद, निजीकरण और सबसे ऊपर विकास का नाम देकर अपने संसाधनों को कार्पोरेट के लिए जमकर लूटने की खुली छूट देने के उभार हमें बैचेन करते हैं। कला और साहित्‍य की दुनिया में सामाजिक बदलाव के लिए चले राजनीतिक व सामाजिक आंदोलन का न सिर्फ आईना रही है बल्कि वह बेहतर समाज के निर्माण के संघर्ष में प्रेरक भी बनता रहा है। इतिहास में उदाहरणों की कमी नहीं है - फ्रांस की राज्‍य क्रांति हो या रूसी क्रांति, इस संदर्भ में साहित्‍य की भूमिका महत्‍वपूर्ण रही है। जिस प्रकार रूसी क्रांति में टॉलस्‍टॉय, गोर्की, चेखव के साहित्‍य ने जागरण का काम किया उसी प्रकार से आज के नए प्रश्‍नों/समस्‍याओं का हल साहित्‍य द्वारा एक नव जागरण की शुरूआत से किया जाना चाहिए क्‍योंकि एक नागरिक के रूप में हमें आज यह चिंता सताती है कि कैसे हम मनुष्‍यता को बचाए रख सकें।


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हिंदी समय में अमित कुमार विश्वास की रचनाएँ