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लेख

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सोशल मीडिया : सहमति का विवेक और असहमति का साहस
अमित कुमार विश्वास


स्‍वतंत्रता, समता और बंधुत्‍व की भावनापूर्ण लोकतंत्र का सबसे बड़ा अधिकार है - 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता'। इस बात को प्रसिद्ध विचारक वॉलटेयर के इस कथन से समझा जा सकता है कि 'हालाँकि मैं आपसे असहमत हूँ, पर आप अपनी बात कह सकें, इसके लिए मैं जिंदगी भर संघर्ष करने के लिए तैयार हूँ।' अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछेक छोटे-मोटे हमलों और प्रतिबंधों को झेलते भारतीय लोकतंत्र इक्कीसवीं सदी में आ पहुँचा है। आज अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का असली स्वरूप नव मीडिया अर्थात वेब मीडिया ने प्रस्तुत किया। आधुनिक प्रौद्योगिकीयुक्‍त नव सोशल मीडिया सूचना क्रांति का संवाहक बनकर उभरा है। मसलन ह्वाटसेप, फेसबुक, टि्वटर, गूगल प्लस, लिंक्डइन, माय स्पेस, पिंटररेस्ट, आरकुट सहित तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स दुनिया को एक सूत्र में बाँध रही है, ग्‍लोबल रूप से जोड़ रही है, इससे क्‍या हम सचमुच में 'मानव समाज' के निर्मित्ति में पूर्व से अधिक जागरू‍क हुए हैं? आँकड़ों में बात करें तो फेसबुक पर एक अरब, ट्वीटर पर 20 करोड़, गूगल प्लस पर 17.5 करोड़, लिंक्डइन पर 15 करोड़ एवं पिंटररेस्ट पर 11 करोड़ से ज्‍यादा प्रयोक्ता सक्रिय हैं। जन जागरण से लेकर राजनैतिक आंदोलनों तक में सोशल मीडिया ने अल्प समय में ही महती भूमिका का निर्वाह कर अपना अलग और विशिष्ट स्थान बना लिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रकट करने के लिए धरना प्रदर्शन और प्रतिवेदन देने संबंधी अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार अधिक कारगर नहीं होने पर जब जनता ने सोशल साइट का सहारा लेना शुरू किया तो पुलिस ने सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66-ए का इस्तेमाल करके सबक सिखाने की कवायद शुरू की यानी सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने का जरिया बना आइटी अधिनियम की धारा 66-ए। इस धारा का स्वरूप ही अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ था।

संविधान के अनुच्‍छेद 19 (1) के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार प्राप्‍त है। सही है कि यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान ने धारा 19 (2) के तहत कुछ मर्यादाएँ तय की हुई हैं। मसलन, राष्ट्रीय संप्रभुता पर आँच आने, कानून-व्यवस्था के लिए खतरा उत्‍पन्‍न होने, भिन्‍न समुदायों के बीच वैमनस्यता पैदा करने की स्थितियों में संबंधित सामग्री को लेकर दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। ये मर्यादाएँ ज्यों की त्यों लागू रहेंगी। इसी तरह मानहानि से संबंधित कानून पहले की ही तरह प्रभावी रहेगा।

अगर किसी वेबसाइट को लेकर धारा 19 (2) के तहत तय की गई मर्यादाओं के उल्लंघन की शिकायत हो, तो उसे बंद करने का रास्ता भी सरकार के लिए खुला है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने असहमति और आलोचना को साइबर अपराध का रंग देकर नागरिकों के खिलाफ पुलिस-कार्रवाई की गुंजाइश समाप्त कर दी है। यानि असहमति की आवाज को बर्दाश्‍त करने की क्षमता और उसको अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष लोकतंत्र का सबसे बड़ा अधिकार है। पर इस अधिकार का इस्तेमाल असंवैधानिक तरीके से न किया जाए। अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ यह नहीं है कि आप अपने रोष और क्रोध को प्रकट करने के लिए किसी को गाली दें, व्‍यथित करें और अपने अधिकारों को मनमाने ढ़ंग से इस्तेमाल करें। दरअसल आईटी एक्‍ट की धारा 66-ए के साथ सबसे गड़बड़ बात यह थी कि उसमें किसी टिप्पणी के हानिकारक, मानहानिकारक धार्मिक विद्वेष फैलाने में सहायक या प्रताड़ित करने वाले पर मामला दर्ज करने का प्रावधान था। जिसमें इस शब्दावली की मनमानी व्याख्या संभव थी। यह मनमानी व्याख्या की सुविधा ही वह आकर्षण था, जिसकी वजह से सरकारें इस कानून को हटाना नहीं चाहती थीं। कई नेताओं ने बहुत सामान्य सी टिप्पणियों पर आपत्ति जताई और उनके इशारे पर ही पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर लिया। नेताओं के इशारे पर अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा था। ऐसे कई मामले सामने आए जब इस कानून के तहत गिरफ्तारी की गई। साल 2012 में मुंबई में सोशल मीडिया-फेसबुक पर शिवसेना नेता बाल ठाकरे के निधन पर मुंबई बंद के खिलाफ कमेंट करने पर 2 लड़कियों को गिरफ्तार किया गया था। लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद देशभर में विरोध जताया गया। हाल के दिनों में यूपी में एक मामला सामने आया था जिसमें सपा नेता और अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री आजम खान के खिलाफ सोशल मीडिया पर कमेंट करने वाले एक लड़के को और ममता बनर्जी के कार्टून बनाने पर प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा को गिरफ्तार किया गया था। असीम त्रिवेदी को सोशल मीडिया पर संसद, राष्ट्र चिह्न के खिलाफ आपत्तिजनक कार्टून बनाने के कारण गिरफ्तार किया था। एयर इंडिया के दो कर्मचारियों की कुछ नेताओं के खिलाफ पोस्ट डालने पर गिरफ्तारी की गई थी। वर्ष 2012 में कानून की छात्रा श्रेया सिंघल ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय में जनहित याचिका दाखिल कर माँग की थी कि आईटी एक्ट की धारा 66-ए अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है और इसमें संशोधन किया जाए। दरअसल धारा 69-ए में यह प्रावधान था कि जो सूचना सरासर आक्रामक या चरित्र हनन करने वाली हो। व्यक्ति जानता हो कि उसके द्वारा भेजी गई सूचना गलत है लेकिन दूसरे व्यक्ति को खिजाने, परेशान करने, खतरे में डालने, अपमानित करने, दुश्मनी, बुरे इरादे के साथ कंप्यूटर या किसी अन्य संचार उपकरण के जरिए ऐसी सूचना भेजता है।

सर्वोच्‍च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.चेलमेश्वर और आरएफ नरीमन की पीठ ने 24 अप्रैल, 2015 को जनहित याचिका पर सुनवाई कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को आधारभूत मूल्य घोषित करते हुए सूचना तकनीक कानून की धारा 66-ए (IT ACT Section 66 A) को खत्म करने का निर्देश दिया। इस मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने जाँच के आदेश देते हुए दिशा निर्देश जारी किया कि ऐसे मामलों में एसपी रैंक के अधिकारी ही गिरफ्तारी का आदेश दे सकते हैं। हालाँकि, आईटी एक्ट की अन्य धाराओं 69-ए और धारा-79 को निरस्त नहीं किया है और ये कुछ पाबंदियों के साथ लागू रह सकती हैं। धारा 69-ए किसी कंप्यूटर संसाधन के जरिए किसी सूचना तक सार्वजनिक पहुँच को रोकने के लिए निर्देश जारी करने की शक्ति देती है और धारा-79 में कुछ मामलों में मध्यवर्ती की जवाबदेही से छूट का प्रावधान करती है। सुप्रीम कोर्ट की दलील है कि स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच संतुलन कायम करना सरकार की जिम्मेदारी है। सरकारें खुद तय करें कि यह काम कैसे किया जाए। लेकिन कानून का भय दिखाकर बोलने की आजादी पर प्रतिबंध लगाना संविधान के अनुच्छेद 19-(1) के तहत प्रदत्त वैचारिक अभिव्यक्ति की आजादी का हनन है। इसमें कोई दो मत नहीं हैं कि अदालत का फैसला अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकारों की दलीलों के लिहाज से मील का पत्थर साबित होगा लेकिन सरहद और समाज की सुरक्षा एवं सामाजिक सरोकारों की रक्षा करने की जिम्मेदारी सरकार की है और इसके बोझ तले दबी सरकारों के लिए यह फैसला बेशक चुनौती को बढ़ाने वाला साबित होगा। इस ऐतिहासिक फैसले के नकारात्मक और सकारात्मक पहलुओं की हकीकत से इंकार नहीं किया जा सकता है। इस फैसले के परिप्रेक्ष्य में साइबर स्पेस की स्वच्छंदता को काबू में करने की चुनौती सरकार के लिए एक तरफ परेशानी का सबब बन रही है वहीं सोशल मीडिया पर सक्रिय तबके लिए खुद को काबू में करने की चुनौती भी कम आसान नहीं है। असली दुनिया की ही तरह वर्चुअल दुनिया भी कानून से वंचित दुनिया नहीं है। इस सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है कि साइबर स्पेस में अधिकतर युवा वर्ग सक्रिय हैं। यह वर्ग अपनी भावनाओं के ज्वार में बहकर मर्यादा की हदों को लाँघने के नैसर्गिक खतरे से जूझता रहा है। हालिया जेएनयू प्रकरण या अन्‍य मामलों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि युवाओं को सोशल मीडिया पर विचार अभिव्‍यक्‍त करते समय कानून और मर्यादा की हदें पहचाननी होंगी। इस फैसले का सकारात्मक पहलू यह है कि सूचना क्रांति के दौर में जानने, समझने और अपने विचारों को व्यापकतम आयाम देने की आजादी मिली है। आज़ादी का यह स्वाद तभी सार्थक कहा जा सकता है जबकि सोशल मीडिया या साइबर जगत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुके लोग इस माध्यम की संवेदनशीलता को समझें। साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल का कहना है कि अदालत का यह फैसला बेहद संतुलित है लेकिन सरकारों के प्रति सजगता और दायित्वबोध की सीमा को बढ़ा दिया है। खासकर भारत की विशेष परिस्थितियों में जहाँ शिक्षा के पर्याप्त प्रसार की कमी के बावजूद समाज के सभी तबकों में साइबर जगत की पहुँच अब आसान हो गई है। शिक्षा, रोजगार, आर्थिक हालात जैसे सामाजिक सरोकारों से इतर हर वर्ग के लोग किसी न किसी रुप में इंटरनेट की पहुँच में हैं। इस फैसले के माध्यम से अदालत का संदेश साफ है कि सरकारें कानून की तलवार से सोशल मीडिया पर नियंत्रण का चाबुक नहीं चला सकती हैं। यह सर्वमान्य सत्य है कि देश में हर फैसला राजनीति से प्रेरित होता है। धारा 66-ए का अब तक का इस्तेमाल यह बताता है कि पुलिस प्रशासन ने सोशल मीडिया पर सक्रिय युवाओं की सियासी जमात के खिलाफ उभरती आवाज को दबाने के लिए ही किया है। धारा 66-ए हटाए जाने से बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को बल मिला है। सोशल मीडिया को पुलिस के अनावश्यक भय से मुक्ति मिली है। इस धारा के खत्म होने से फेसबुक, ट्विटर सहित सोशल मीडिया पर की जाने वाली किसी भी कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए पुलिस आरोपी को तुरंत गिरफ्तार नहीं कर सकती, जबकि धारा 66-ए में तुरंत गिरफ्तारी का प्रावधान था। इस धारा के तहत किसी व्यक्ति को सोशल मीडिया के मंचों पर आपत्तिजनक संदेश प्रेषित करने पर तीन साल की कैद का प्रावधान था। हालाँकि आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए आईपीसी की अन्य धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है, लेकिन इस धारा के तहत अब मामला नहीं चलाया जा सकेगा। यहाँ यह कहा जा सकता है‍ कि अब किसी के पोस्ट पर किसी को आपत्ति होगी तो न्यायालय फैसला करेगा कि ये गलत है या सही। हालाँकि यह भी संभव है कि राष्ट्र और सामाजिक विरोधी तबका इसकी आड़ में कुछ भी आपत्तिजनक बातें लिखकर डाल सकते हैं। या फिर अलगाववादी संगठन द्वारा कुछ ऐसी सामग्री पोस्ट किया जा सकता है जो उनके विचार में सही हो लेकिन देश की एकता और अखंडता के लिए नुकसानदेह हो। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इंटरनेट पर साझा होने वाली अपमानजनक सामग्री को रोकने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भिन्न कानूनों का सहारा लेना पङेगा।

अब तक हो चुकी हैं कई गिरफ्तारियाँ

आईटी एक्ट की धारा 66-ए के तहत पिछले कुछ सालों में देश के कई राज्यों में सोशल साइटों पर नेताओं के खिलाफ बयान देने पर अब तक कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें व्यवस्था को लेकर सवाल उठाने और अभद्र टिप्पणी करने के मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया गया है। 18 मार्च 2015 को उत्तर प्रदेश के शहरी विकास मंत्री आजम खान के नाम पर विवादास्पद कमेंट करने पर बरेली में 11वीं कक्षा के एक छात्र को गिरफ्तार कर लिया गया था। न्यायिक हिरासत के बाद कोर्ट ने आरोपी छात्र विक्की खान को जमानत दे दी थी। 23 मई 2014 को गोवा पुलिस ने 33 साल के इंजीनियर देवु चोदांकर को गिरफ्तार किया था। उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र कमेंट किया था। 05 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट लिखने की वजह से केरल के कोल्लम जिले में सीपीआईएम कार्यकर्ता राजेश कुमार को गिरफ्तार कर लिया गया था। 6 अगस्त 2013 को दलित साहित्येकार कंवल भारती को फेसबुक पर एक मेसेज डालने के बाद गिरफ्तार कर लिया था। कंवल भारती ने रेत माफिया पर नकेल कसने वाली आईएएस दुर्गा शक्ति नागपाल को सस्पेंड करने के लिए यूपी में सपा सरकार की आलोचना की थी। 19 नवंबर 2012 को मुंबई के पालघर इलाके में रहने वाली शाहीन ढाडा को गिरफ्तार किया गया क्यों कि उसने शिव सेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे की अंतिम यात्रा पर मुंबई बंद को लेकर फेसबुक पर कमेंट किया था और उसकी सहेली रीनू श्रीनिवासन को कमेंट पर लाइक करने के एवज में गिरफ्तार कर लिया गया था। 06 नवंबर 2012 को जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ में किशोरी शर्मा, बंसी लाल और कीर्ती शर्मा को फेसबुक पर एक आपत्तिजनक धार्मिक वीडियो को टैग करने के कारण गिरफ्तार किया गया था। जिसके कारण उन्हें 40 दिनों तक सलाखों के पीछे गुजारना पड़ा था। इस घटना के बाद किश्तवाड़ में तनाव फैल गया था। 01 नवंबर 2012 को यूपीए सरकार में मंत्री रहे पी. चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम के खिलाफ ट्वीट करने पर बिजनेसमैन रवि श्रीनिवासन की गिरफ्तार किया गया था। 10 सितंबर 2012 को अन्ना आँदोलन से जुड़े कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को फेसबुक पर यूपीए सरकार के घोटालों को लेकर एक कार्टून पोस्ट करने के बाद गिरफ्तार कर लिया गया था। 'भ्रष्टमेव जयते' शीर्षक वाले इस कार्टून में संसद और राष्ट्रीय प्रतीक का मजाक उड़ाया गया था। असीम के खिलाफ पुलिस ने देशद्रोह का मामला भी दर्ज किया था। 11 मई 2012 को मुंबई में पुलिस ने एक राजनेता के खिलाफ फेसबुक पर पोस्ट के कारण एयर इंडिया के दो कर्मचारी मयंक शर्मा और केवीजे राव को गिरफ्तार कर लिया था। एयर इंडिया में क्रू मेंबर के तौर पर तैनात दोनों कर्मियों ने एक मजदूर नेता पर टिप्पणी की थी। 13 अप्रैल 2012 को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ एक कार्टून बनाने पर पुलिस ने जादवपुर विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंबिकेश महापात्रा को गिरफ्तार कर लिया था। बाद में अलीपुर कोर्ट ने उन्हें पाँच-पाँच सौ के निजी मुचलके पर जमानत दी थी। अंबिकेश और उनके पड़ोसी सुब्रत सेनगुप्ता ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, रेलमंत्री मुकुल रॉय और पूर्व रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी का व्यंग्यात्मक कार्टून बनाकर और उसे सोशल नेटवर्किंग साइट और ई-मेल पर डाला था। प्रोफेसर ने यह कार्टून उस वक्त फेसबुक पर पोस्ट किया था, जब रेलमंत्री और अपनी पार्टी के सांसद दिनेश त्रिवेदी को ममता बनर्जी ने पद से हटा दिया था। वर्ष 2011 के सितंबर में बिहार में विधान परिषद के कर्मचारी और लोकप्रिय कवि मुसाफिर बैठा को नौकरी से निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने फेसबुक पर सरकार के कामकाज की आलोचना की थी। तब सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर सवाल उठे थे।

यानि असहमति की आवाज को बर्दाश्‍त करने की क्षमता और उसको अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष लोकतंत्र का सबसे बड़ा अधिकार है। पर इस अधिकार का इस्तेमाल असंवैधानिक तरीके से न किया जाए। अभिव्यक्ति की आजादी का अर्थ यह नहीं है कि आप अपने रोष और क्रोध को प्रकट करने के लिए किसी को गाली दें और अपने अधिकारों को मनमाने ढंग से इस्तेमाल करें।

राज्य की संप्रभुता, उसकी प्रतिष्ठा और राजनेताओं के निजी सम्मान में फर्क करना आवश्यक है। समाज में तकनीकी और शिक्षा के विकास के कारण साइबर स्पेस के साथ खुली आज़ादी पश्चिमी देशों की भांति लाजमी है। हमें अभिव्यक्ति की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी संप्रभुता, सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत और विभिन्न समुदायों की गरिमा की रक्षा भी करनी है। हमें साइबर दुनिया को नियंत्रित करने की नियत से नहीं, बल्कि उसे अराजक होने से रोकने के लिए सिस्टम तैयार करना होगा। इस फैसले ने पुलिस को मिली अतिरिक्त शक्ति छीनी है। इन्हीं प्रावधानों में से एक है आई.पी.सी. की धारा 295-ए जिसमें स्पष्ट है कि लिखने, बोलने, और दृश्य प्रचार या अन्य तरीके से कोई किसी की धार्मिक भावनाओं या विश्वास को अपमानित करता है तो उसे गिरफ्तार किया जा सकता है। यह धारा इस कृत्य को अपराधी बनाती है।

समकालीन डिजिटल इंडिया में अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता पर करारा चोट किया जा रहा है। इस डिजिटल बनते भारत में, डिजिटल भारत बनाने वालों के राज में जैसे के तैसे मौजूद हैं और वे कभी किसी अग्निवेश को या कभी किसी विनायक सेन को वर्षों तक जेल की चक्की पीसने के लिए मजबूर कर सकते हैं। फिर, अग्निवेश या विनायक सेन ही क्यों, सोनी सोरेन या अभी हाल में छूटी हिड्मे या बस्तर के जेलों में राजद्रोह के मामले में बंद सैकड़ों आदिवासी भी हो सकते हैं, जो न राज भक्ति का मतलब समझते हैं और न राजद्रोह का मतलब समझते हैं। उनके लिए तो उनकी रोटी और मकान, उनका जंगल और उनकी स्वतंत्रता ही सब कुछ है।

स्वतंत्र भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कभी भी निरपेक्ष नहीं रही और न ही निरपेक्ष रूप से लोगों को प्राप्त हुई है। लोकतांत्रिक ढाँचे और मूल्यों के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सीधा रिश्ता है। पहले भी और आज भी अकसर यह कहा जाता है की लोकतंत्र के चार स्तंभ हैं - विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया और अब सोशल साईट्स को पाँचवे स्तंभ के रूप में पेश करने की कोशिशें हो रही हैं। एक सरासर झूठ को बचपन से लेकर बड़े होने तक लोगों के गले में उतारने की कोशिश के सिवा यह कुछ और नहीं है। लोकतंत्र का आधार है, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा (बंधुत्व)। ये आधार कहाँ हैं? एक समय था, जब आप उस समय के मद्रास में हिंदी नहीं बोल सकते थे। आज भी मुंबई में हिंदी भाषी को जबरन मराठी बोलने पर विवश किया जा रहा है। चित्रकार एम.एफ. हुसैन को इतनी धमकी मिलती हैं कि उन्हें देश छोड़ना पड़ता है। अग्निवेश को धमकी दी गई है कि बस्तर आओगे तो जान से भी हाथ धोना पड़ सकता है। विजातीय पुरी के मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते। उदारवाद के दौर में किसानों की जमीन छीनकर उद्योगपतियों को दी जा रही है जहाँ वे सेज बना रहे हैं, उनकी अपनी पोलिस होगी, क़ानून होगा, नियम होंगे और जहाँ सामान्य लोगों का प्रवेश वर्जित होगा। यही हाल समानता का है। देश के लगभग प्रत्येक शहर में शहर से अलग हटकर नगर-विहार केवल निजी बिल्डर नहीं सरकारी संस्थाएँ भी बना रही हैं, जहाँ किसानों से कौड़ियों के भाव में ली गई जमीनों पर करोड़ों की लागत वाले भवन बन रहे हैं और शहर का रईस तबका उन नगरों-विहारों में बस रहा है। याने, सामंती ढाँचे का पुनर्निर्माण जहाँ अमीर-उमराव राजा के साथ किले में रहेंगे और श्रमिक-दलित-गरीब जनता किले से बाहर। यही हाल भाईचारे का है, धार्मिक, जातीय भेदभाव पर बात करना तो ऐसा हो गया है, जैसे बहुत छोटी बात है। अब तो यह है कि हिंदू तत्ववादी ताकतें यह कहने से नहीं चूक रहीं कि कोई भी देशवासी किसी भी धर्म का अनुयायी हो या किसी भी संप्रदाय या जाति का हो, है वह हिंदू ही। तात्पर्य यह है कि लोकतंत्र दुनिया में जिन आधारों पर आया था, भारत में वे स्वतंत्रता के बाद से लगातार कमजोर पड़ते गए हैं।

अमेरिकी शीर्ष न्यायालय के न्यायाधीश रॉबर्ट जेक्सन ने कहा था कि 'विचारों पर नियंत्रण अधिनायकत्व का प्रतीक है, और हम (अमेरिका) यह दावा नहीं करते हैं। यह हमारी सरकार का काम नहीं है कि वह नागरिकों को गलतियों में पड़ने से रोके, यह नागरिकों का कार्य है कि वह सरकार को गलतियों में पड़ने से रोकें।' पर, भारत में राजनीतिज्ञों का वह वर्ग तैयार हो गया है जो उन्हें गलत बताने वाले का मुँह किसी भी तरह बंद करने को उतावला है। लोकतंत्र उसके लिए केवल राजा चुने जाने का रास्ता है और अभिव्यक्ति विशेषकर उसके खिलाफ उसे कतई मंजूर नहीं है। जब तक देश में लोकतंत्र के सही आधार स्वतंत्रता-समानता और भाईचारा मजबूत नहीं होंगे, अभिव्यक्ति का अधिकार हमेशा संकट में ही रहेगा।

सारांशत: यह कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वर्तमान शताब्दी की आवश्यकताओं में से है और जिस समाज में अभिव्यक्ति और संचार माध्यमों की स्वतंत्रता न हो वह तानाशाही समाज होता है। यह बात स्पष्ट है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ, अपमान, उपहास और अराजकता नहीं है बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ सदैव अपने तार्किक व यथार्थवाद व्यवहार से हटकर सामने आता है। जाहिर है, लोकतंत्र में विश्वास रखने वाला कोई भी शासन इस अधिकार को कम नहीं कर सकता। किसी भी देश में अभिव्यक्ति या बोलने की आजादी की स्थिति से ही यह तय होगा कि वहाँ का लोकतंत्र कितना मजबूत या कमजोर है। अगर किन्हीं हालात में किसी भी पक्ष की ओर से व्यक्ति के बोलने के अधिकार पर पाबंदी लगाई जाती है या उसे बाधित किया जाता है तो इससे लोकतंत्र को नुकसान पहुँचेगा।

संदर्भ लिंक

1.http://paricharcha.com/%E0%A4%85%E0%A4%AD%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0

2..http://www.sudarshannews.com/news/index.php?option=com_content&view=article&id=7997:2015-03-26-12-52-56&catid=34:2013-06-19-01-33-32

3..http://www.theindiapost.com/articles/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0


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