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उपन्यास

शालभंजिका
मनीषा कुलश्रेष्ठ

अनुक्रम


1

गोआ की मेरी यात्रा, मेरी अपनी खोई आत्मा की खोज की एक शुरुआत थी। मैं जान गया था कि दूसरे मनुष्यों के साथ के बिना मनुष्य नहीं हुआ जा सकता था। मैं बहुत अकेला भटक लिया, मैं सही-सलामत पुरानी दुनिया में वापस आना चाहता था। मैं अपने पुराने इश्क की तरफ लौट रहा था, फिल्म और पद्मा। मुझे शून्य से शुरू करना था, बिना किसी हेल्युसिनेशन (मतिभ्रम) का शिकार हुए। गोआ ने मेरा जीवन ही बचा लिया। वहाँ रह कर मुझे खुद से लम्बी जिरह करने का अवसर मिल गया।

'गोआ फिल्म फेस्टिवल' के शुरू होने में कुछ दिन बाकी थे, मैं ज्यूरी में था। मैं मुम्बई से उकता कर, कुछ दिन पहले ही चला गया था और एक दिन पणजी के एक सुनसान चर्च की सीढ़ियों पर, बियर के सुरूर में बैठा था कि मेरा मोबाइल घनघनाया।

"सुना फिर फिल्म आजमाना चाहते हो।"
    "किसने कहा?"
    "पुराने साझे यारों ने... लिख ली?"
    "नहीं… "
    "सोच ली?"
    "न… ह "
    "फिर क्या... !"
    "है, बस एक थॉट… एक लड़की को लेकर।"

"एक थॉट पर पैसा लगा दें तो तुम्हारी तरह घर बेचना पड़ेगा… छवि बता रही थी कि…"

"चुप रहो, उसका नाम भी मत लो, क्या उसने तुम्हें यह नहीं बताया कि उसे एलीमनी भी चाहिए थी, घर भी। पैसा था नहीं तो घर बेच कर चार साल उसके साथ सोने की कीमत चुका दी, बेटी पालने की हर महीने चुका रहा हूँ… कीमत।"

"कैसा बोलने लगे हो। जाने दो। तुम दोस्त हो मेरे। कद्र है मेरे को तुम्हारी... तुम चाहो तो स्क्रिप्ट लिख कर मुझे दे दो, इसे कोई और बना लेगा।"

"बेकार है यह बात, बनाऊँगा इसे मैं ही, या नहीं बनाऊँगा। या तो यह मेरा मास्टरपीस होगी या ऐसी फ्लॉप कि फिर तुम मुझे उस दुनिया में देखोगे ही नहीं। छोड़ दूँगा फिल्म बनाना।"
"ठीक है मेरे गुरुदत, मगर कब तक? हम इस जनवरी में एक पिच्चर फ्लोर पे उतारना चाहते हैं।"

"लड़की ढ़ूँढ़ रहा हूँ, बस मिलते ही शूटिंग होगी।"

" अभी कहाँ हो?"

"बाद में बताऊँगा।"
"देखो चेतन, तुम होगे महान स्क्रीनप्ले राइटर, या पिट चुके फिल्म-मेकर, तुम दोस्त हो पहले। तुम्हारे टूटते मस्तूल को किसी शहतीर की नहीं, बेन्द्रे की ज़रूरत है, यह बात याद रखो और लौट कर मुम्बई आओ, लड़कियाँ यहाँ भी बहुत हैं।"

सीढ़ियों से उतर कर मैं एक सस्ते रेस्तराँ में जा बैठा और खिड़की से बाहर ताकता रहा, भीतर की सीली, नमकीन और बासी हवा में साँस लेते हुए मुझे नहीं पता था कि मैं क्या नई शुरुआत करना चाहता था। बेन्द्रे अगर फोन करके ऑफर करता है तो बड़ी बात है, वह अनुभवी है, कान नहीं, आँख से सुनता है, वह अगर फाइनेंस करेगा तो औरों के लिए। चाहे दस शर्त रखेगा, मुझे बिलकुल आजाद छोड़ता है।

"चेतन, ये नहीं है कि तुम स्पेशल हो, तुम जब फिल्म बनाते हो, मेरे अन्दर का कलाकार सेटिसफाई होता है… क्या है कि मैं तो बना नहीं सकता न, इस तरह का पिच्चर। तुम फिल्म के जरिए सूफी पोएट्री बनाते हो। एण्ड आय लव सूफी पोएट्री। तुम सही कहते हो फ्रेण्ड कि फिल्म की दुनिया में जिन्दगी की असल बात नहीं कहते, बल्कि मन की बात को आधे सच आधे झूठ में लपेट कर कलात्मक तमाशे की तरह कहते हैं। सही है, मन की बात पूरी की पूरी सच कह दें तो सारा तमाशा खत्म। खूबसूरती खत्म। 'एडविन पोर्टर' की ईजाद ये 'मूवी' खत्म हो जाए।"

कुछ अलौकिक पलों को दुबारा निराकार तौर पर जीने की आत्मछलना का ही दूसरा नाम है 'स्मृति'। एक स्मृति जिसमें वह थी और मैं था, अब मैं उस पर फ्रेम लगाने की कोशिश में हूँ। एक सुनहरा फ्रेम। समय को पलटना चाहता हूँ, मूवी कैमरे की गुस्ताख आँख से। फरवरी के शुरू की हवा अब तक मेरी यादों में बह रही है। जब मैदानों की घास धूप में नहा रही थी। वृक्षों की परछाइयाँ करीब सरक रही थीं। हम मानो अपने ही सपनों में मँडरा रहे थे। मैं कोई दूरी,, दर्द या उपेक्षा नहीं महसूस करता, बस स्मृतियों में फ्रेम लगाने की कोशिश में हूँ। प्रकाश, लेन्स और कैमरे के एक बटन की हरकत से चुरा लिए गए पलों की तरह।

"तुम सीधे-सीधे फोटो नहीं खिंचवा सकती? कभी गुलाबी फूल वाली कनेर के पेड़ की डाल पकड़ लोगी, कभी अमलतास की फूल लदी डण्डी लेकर खड़ी हो जाओगी। कभी बबूल के फूल कान में पहन लोगी कभी... तुम हमेशा फोटो खिंचाने में शालभंजिका क्यों बन जाती हो?"

मेरे सामने कागज का एक टुकड़ा था। एक पुरानी काली-सफेद फोटो को सादे कागज पर उतारा, मगर कुछ धुँधला प्रिंटआउट जिसके पीछे घसीटी हुई चार-पाँच लाइनें थीं।

"आखिरी दिन, रात के आठ बजे घना कोहरा, घंटाघर के बगल से निकली एक लड़की, गली के मुहाने पर पुरानी नीली कार में इंतजार करता एक दुबला-सा लड़का, लम्बी ड्राइव... शहर के बाहरी हिस्से में... एक भग्न, निर्जन मंदिर, शिरीष के मीलों फैले जंगल, शिरीष के पीले फूलों के खिलने के मौसम में पगला देने वाले नीले चाँद का निकलना। रेलवे क्रॉसिंग और लड़की का शिरीष की एक फूलों भरी डाल तोड़ लेना - "शालभंजिका?"

"मैं इसी टुकड़े पर उम्मीदें टिकाए बैठा था। 500 पन्नों की, पूरी 2 घंटे 20 मिनट की पिक्चर के लिए यह स्क्रिप्ट कुछ छोटी नहीं? कुछ... "

"तुम होगे बहुत बड़े स्क्रीनप्ले राइटर।'' मैंने दोहराया, मैं मुस्कुराया। कागज पलटा, काला-सफेद अण्डाकार चेहरा, लम्बी, गहरी आँखें। बहुत छोटे घुँघराले बाल बस, ठोड़ी छूते हुए।
"यहाँ है मेरी पूरी पाँच सौ पन्नों की स्क्रिप्ट।" मैं सीटी में गुनगुनाने लगा - हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया।

दरअसल, अब मैं ढूँढ़ रहा था एक चेहरा। मेरे पुराने फक्कड़ दिनों के खाली वॉलेट में बरसों लगी एक तस्वीर से मिलती-जुलता चेहरा। जिसकी आँखों में यंत्रणा देता आमंत्रण हो, 'वार एण्ड पीस' की नताशा-सा। माने की पेंटिंग 'लंचन ऑन द ग्रास' की-सी स्त्री हो, अपनी सम्पूर्ण नग्नता में भी अति सहज, अपनी नग्न सुन्दरता से अनभिज्ञ, अमृता शेरगिल की सेल्फ-पोर्ट्रेट- सी। बोदलेयर की मालाबार लेडी, जिसकी बगलों में बारिश में भीगे शिरीष की गन्ध हो। आँखों में कभी न मिटने वाली उदासी हो।

"व्हाट चार्म कैन सूद हर मैलेंन्कली?"

"व्हाट आर्ट कैन वाश हर गिल्ट? "

गोल्डस्मिथ की इन पंक्तियों पर जो यूँ की यूँ उतर आए वह औरत कहाँ ढ़ूँढ़ूँ? अब तक मैं कुछ-कुछ वैसी ही दिखती केवल तीन लड़कियों से मिला हूँ। मुम्बई में, हैदराबाद में... मैंने अपनी बिन लिखी स्क्रिप्ट के किरदार के लिए हर उस लड़की से मुलाकात की है जो जरा-सी भी उसके जैसी थी। चाहे वह सुपरमार्केट में कैश काउंटर पर बैठी लड़की हो, या कॉफी हाउस की वेट्रेस जो हू-ब-हू वही लगती थी मगर... वह हँसती हुई बहुत बुरी थी और आवाज उसकी बैठी हुई थी। एक तैराकी की चैम्पियन के पीछे तो मैं तीन दिन पड़ा रहा, बल्कि स्विमिंग पूल के लॉकर रूम के बाहर इंतजार तक किया। जबकि उसका जबड़ा ही केवल उस किरदार से मिलता था। एक स्कूल टीचर भी थी, मगर बात जमी नहीं।

भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों की एक ही सड़क होती है, बीच के तीन जोड़ हम देख नहीं पाते, हम अपने भविष्य को आसमान की तरफ जाती सीढ़ियों जैसा समझते हैं, पर वह तो यहीं पसरा होता है, लगभग तय-सा, हमारी ही प्रतीक्षा में, यह इसीलिए बता रहा हूँ कि 'गोआ फिल्म फेस्टिवल' के ठीक आखिरी दिन मुझे ग्रेशल मिली। 'कला अकादमी' की सीढ़ियाँ हम जल्दी-जल्दी साथ-साथ उतरे, मैं चौंका, मुझे उदयपुर का जगदीश मंदिर याद आ गया, बचपन में मैं और पद्मा ऐसे ही साथ उतरते थे। वह तो बहुत जल्दी में थी, कि मानो कहीं आग लगी हो। मुझसे भी कहीं जल्दबाजी में! जबकि एक घण्टे में मेरी फ्लाइट थी, डबलिम एयरपोर्ट से। मेरी टैक्सी प्रतीक्षा में थी नीचे, मगर वह मुझे पीछे छोड़ तेजी से उतर कर पोस्टर पेंट कर रहे एक लड़के के पास जा खड़ी हुई और कमर पर हाथ रख कर गौर से देखने लगी पोस्टर को। जो शायद अगले दिन होने वाले प्ले के स्टेज के लिए तैयार हो रहा था। मेरी नजर उसकी पीठ पर जम गई थी, लम्बा धड़, लम्बी गरदन और कनपटी से नीचे ठोड़ी तक छोटे घुँघराले बाल, मैं ठिठक गया, उसने हाथ कमर के पीछे बाँध रखे थे, एक हाथ में जेकेरेण्डा के जामुनी फूलों की डाली भी थी। उफ्फ! 'शालभंजिका'!

मैं उसके सामने मुड़ने की प्रतीक्षा में ठिठक गया। मैं बाकी की तीन सीढ़ियाँ उतर गया, मेरे ठिठक कर रुक जाने को उसकी स्त्रियोचित छठी इन्द्रिय ने महसूस किया, वह मुड़ी और स्थिर भाव से मुझे देखा, उसकी आँखें आक्रमण करती प्रतीत हुईं कि बाकी का चेहरा देख ही नहीं सका। समूची देह वही थी। वही कदो-बुत, वही यौवन की उच्छृंखलता में कटे देह के कगार, फिसलनें और उठान, ढलाव। मेरा घड़ी में वक्त देखने का मन नहीं हुआ, वक्त देखा तो बस वक्त ही देखता रह जाऊँगा। मैंने जाना स्थगित कर दिया, अनियत काल के लिए। यूँ भी फिल्म फेस्टिवल में देखी फिल्मों, 'कला अकादमी' की खूबसूरत इमारत, कलाकारों का जमघट, एम्फीथियेटर, आर्ट गैलेरी, लाइब्रेरी, सेमिनार हॉल, रिकॉर्डिंग रूम। माण्डोवी नदी के किनारे हरा-भरा अहाता। इन सब ने मेरे बरबाद मन को सँवारा था।

दूसरी बार मैं उसके नाटक को देखने जब गया, तब वह चे गुएरा के पोस्टर के नीचे खड़ी सिगरेट पी रही थी, उसकी कलाई पर चौड़े पट्टे वाली घड़ी थी जिसे वह बार-बार देख रही थी। मेरे पीछे आती निग़ार ने मुझे हैरानी से पूछा था, "जानते हो उसे?"

"नहीं, जानना चाहता हूँ। तुम जानती हो?"

"परिचय जैसा तो नहीं पर हाँ जानती हूँ। नई थिएटर आर्टिस्ट है, जय के ग्रुप की।"

उस दिन किसी कोंकणी नाटक का शो था, जिसमें वह भूमिका निभा रही थी। मैं देखना चाहता था मगर हाउसफुल! कोंकणी लोग दिल से कलाकार होते हैं यह पता था, नाटक देखना, थियेटर जाना गोआ के लोगों के कल्चर में है, यह नई खबर थी। अब देखना था तो बस खड़े होकर, कुछ देर खड़े होकर देखा, पूरा प्ले तो नहीं देख सका, मगर अनजान जबान के नाटक - संवादों के बावजूद यह जान लिया कि वह अभिनय कर सकती है।

तीसरी बार जय मुझे उससे मिलवाने ओल्ड गोआ ले गया, ओल्ड गोआ यानी बहुत-से पुराने खण्डहर - खण्डहर गिरजे। गम्भीर सुरों में मन को छूने वाली प्रार्थनाएँ, शांत-फुसफुसा कर बतियाते लोग। पुर्तगाली इमारतें, दीवारों पर पुर्तगाली गवर्नरों के तैलचित्र।

शाम ढल रही थी, धूप अपनी फ्रॉक के फ्रिल्स समेट रही थी, एक खण्डहर चर्च के पीछे सटे-सटे घरों का मोहल्ला था, आगे अहाता।

"वो रहा उसका घर और वह देखो। वही है न!" वहाँ वह छोटा-सा ब्लाउज-मिनी स्कर्ट पहने अपनी गूज़ (बतख) के पीछे दौड़ रही थी, मैं मुस्कुरा दिया। उसे देख कर मुझे 'बाथ शीबा' याद आ गई। जो नहाते-नहाते ही नग्न सुनहले पंख वाली बतख के पीछे भागी थी। "मर्लिन, मम्मी तुमको इस ईस्टर को पका ही देंगी, अगर तुम न सुधरीं तो। लड़ाका कहीं की, जलकुकड़ी!" बतख उसकी बाँहों में फड़फड़ा रही थी और चोंच से आक्रमण कर रही थी। मैं एकदम उसके पीछे खड़ा था, मेरे साथ जय... वह चौंक गई।

एक साधारण मध्यमवर्गीय घर था, जिसके अगले हिस्से को एक रेस्तराँ बना दिया गया था।

"फिल्म-विल्म नहीं... हमें तो बेटे के पास आस्ट्रेलिया जाना है।"

ग्रेशल ने हमें जाते हुए एक चिट पर अपना फोन नम्बर देकर कान पर उँगलियों को कान से सटा कर फोन करने का इशारा किया तब उसकी आँखें कंचों की तरह चमक रहीं थीं।

एक दिन मैंने उसे फोन करके पणजी बुलाया, नीली दीवारों और सफेद खिड़कियों वाले रेस्तराँ में जिसकी दीवारें भीतर से पीली थीं। सिगरेट के धुएँ, प्रॉन बॉलचॉओ और फेनी की मिली-जुली महक से भरा था रेस्तराँ।
"ग्रेशल, हमारा असली चरित्र वही होता है जब हमें कोई नहीं देख रहा होता है। तुम्हें पता भी नहीं था कि कैमरे की आँख से मैंने तीन बार तुममें उस लड़की को देखा है, जिस पर मैं फिल्म बनाने जा रहा हूँ।"
मैंने उसे बताया पहली बार 'पद्मा' के बारे में, संक्षेप में।
"ऐसी लड़कियाँ होती हैं क्या?"
यही बात फोन पर बेन्द्रे ने कही थी, "कहीं होती हैं ऐसी लड़कियाँ क्या? होती हों तो ढूँढ़ ला ऐसा चेहरा। बनाते हैं फिल्म।"

"स्क्रिप्ट कहाँ है?"
"चेहरा मिल जाए बस... बल्कि मिल गया।"

"आर यू श्योर?"

2

बहुत खाली दिन थे वो, मैं पोस्टग्रेजुएशन कर चुकी थी और एक सात साल लम्बे प्रेम से टूट कर उबरी थी। मैं बहुत अकेली थी, मेरे पास बढ़ती उम्र थी, विरासत में मिला नारियल और काजू के पेड़ों से ढँका छोटा-सा कॉटेज था, जिसे मम्मी और मैंने मिल कर एक छोटे रेस्तराँ की शक्ल दे दी थी। ओल्ड गोआ से पंजिम लौटते हुए, उस छोटे-से रेस्तराँ से इतने पर्यटक तो आ ही जाते थे कि हमारी जिन्दगी ठीक-ठाक चल जाए। मम्मी का स्वार्थ था कि मोह, उन्होंने कभी मेरी शादी की बात नहीं चलाई। कभी मेरे पापा की बहन आन्ट स्टैला किसी लड़के का जिक़्र करती तो वह ठण्डे चेहरे के साथ सुनती और कोई उत्तर नहीं देती। आन्ट स्टैला जाते हुए फुसफुसाती, ''ग्रेशल, तुम्हारी मम्मी का तुमको नन बनाने का इरादा तो नहीं?''
मम्मी पीछे-पीछे आकर पूछती, ''क्या कहती थी तेरी यह आन्ट स्टैला?''

फिर बड़बड़ाती हुई लौट जाती, ''हमें कोई जल्दी नहीं है। फिलीप ने कहा है, वह हम दोनों को आस्ट्रेलिया बुला लेगा। उसने एक लड़का फिक्स किया है तुम्हारे वास्ते।''

लगता है, मम्मी, समय की रफ्तार गिनना भूल गई हैं, फिलिप को चार साल हो गए थे, आस्ट्रेलिया गए हुए। पहले चिट्ठियों में और अब फोन पर, वह अपनी मम्मी से यही कहता आ रहा था। चार साल हुए मैंने भी अपने बाईसवें जन्मदिन के बाद अपनी उम्र का हिसाब रखना बन्द कर दिया था।

जब से पापा गुजरे, मम्मी ने अपने आपको रेस्तराँ के गोअन मेन्यू और अपने कस्टमर्स के लिए ढाल लिया था। काम मम्मी की दिनचर्या में रोजरी के मनकों की तरह एकसार गुँथे रहते थे। उनके हर काम में सलीका और तरतीबी होती थी। रेस्तराँ की मेजें हों कि बार के कपबोर्ड में लगी क्रॉकरी का रंग, रूप, आकार और आकृति का क्रम नहीं टूटता। तरतीबवार जमे होते जैली, मुरब्बों, अचारों, चटनियों, सीजनिंग और टॉपिंग्स के जार। वहाँ लाल के बाद नारंगी आता और फिर पीला फिर हल्का पीला और अंत में सफेद चोकोर के बाद तिकोने और फिर गोल होते किनारों के बर्तन - हर चीज में तरतीब। रेस्तराँ की सज्जा यूँ सादा थी मगर रंग, रूप, आकार और आकृति की यह तरतीबी उस सज्जा को अनूठा बना देती। काम, काम और काम। ऑफ सीजन में भी वह व्यस्त रहती। कभी टूटी फेन्स ठीक करवाती तो कभी किचन के सिंक की रुकी हुई नालियाँ।

मैंने उकता कर थिएटर में काम करना शुरू कर दिया था। जय मेरे कॉलेज का सीनियर था, सो उसके हर प्रोडक्शन में काम मिल जाता था। कुछ न कुछ रोल, रोल नहीं तो पोस्टर बनाने का, या कॉस्ट्यूम मैनेजमेंट। मुझे मजा आता, मम्मी के मोनोटोनस रूटीन से निजात मिलती। मैं अकसर जिन्दगी के झूले की रस्सियों को काम और तरतीबी की ऐंठनों में गोल-गोल घुमा कर छोड़ देती। ऐंठनें खुलतीं, फिर बँधतीं, यह सिलसिला खत्म ही नहीं होता। मैं गोल-गोल घूमेती रहती। एक दिन जिन्दगी में लगी घेर-घुमेर ऐंठनों वाले झूले को सचमुच किसी ने रोक दिया था। ऑफ सीजन के एक लम्बे, बरसते दिन की ढलती साँझ थी। हाथ और दिमाग के समन्वय को बिगाड़ते हुए ऐसे ही पागल समय के टुकड़े में बन्द थी मैं। जाने कब, जाती हुई धूप के धब्बों पर चल कर वह आया था। चुपचाप मेरे पीछे आकर खड़ा हो गया था, साँस रोक ली थी क्या? मुझे भान तक नहीं हुआ था। मैं दड़बे से निकल भागी, मर्लिन मनरो यानी अपनी लड़ाका बतख को पकड़ चुकी थी।

वह और जय दोनों चर्च के पीछे बसी हमारी कॉलॉनी में पहुँचे थे। मैं हिचक रही थी, पर वे दोनों सहज थे, गलियों में ऐसे चलते आये थे मानो वे बहुत जानी-पहचानी हों। मैंने पलट कर देखा, "ए स्ट्रेंजर!"

बेतरतीब दाढ़ी, ओजस्वी पेशानी, सलेटी-हरे-नीले रंगों की परछाइयों में तैरती आँखें, जिनके नीचे हमेशा रहने वाली एक सूजन। अच्छे-से आकार वाले थोड़े पृथुल होंठ जो सिगरेट से जल कर लाल से कत्थई-सलेटी हो चले थे। तप कर निखरे काँसे का-सा रंग। लापरवाही से सहेजी देह, दुबली-पतली।

ये चेतन भाटी हैं, फेमस स्क्रिप्ट राइटर और फिल्म-मेकर।
वह आराम से बाहर ही बेंच पर बैठ गया था। मैं उसे पहले ही पल से जानती थी कि मम्मी के मना करने पर भी मैं इस व्यक्ति से मिलूँगी, जो काम मिला वो काम करूँगी, गोआ से बाहर ज़रूर निकलूँगी।

दूसरी-तीसरी मुलाकात को मैंने उस व्यक्ति को समझने में लगाया। चौथी बार मैं उससे मटमैली दीवारों वाले, खाली पड़े कैफे में मिली। वह एक बे-रौनक बाजार के ऊपर था, मगर नीचे का शोरगुल बिलकुल ऊपर नहीं आता था। कैफे के साथ एक टैरेस जुड़ा था, शायद शाम को लोग बाहर बैठते हों, फिलहाल तो धूप का समन्दर फैला था। वहाँ लम्बोतरी सफेद पेंट की हुई कुर्सियाँ लगी थीं, गोल मेजों के गिर्द, काई लगे छज्जों के किनारे-किनारे कई फूलों से लदे गमले सजे थे। पोर्चुला के लाल, पीले, गुलाबी फूल खिले थे, मगर शाम को तो ठीक पाँच बजे ये पँखुरियाँ समेट के चलते बनेंगे, तभी तो इन्हें 'ऑफिस टाइम' कहता है मेरा माली।

हम टैरेस की तरफ खुलने वाली खिड़की के पास बैठे थे। करीब से मैंने उसके चेहरे को देखा, वह चुप था। मैंने उसके चेहरे की हल्की झुर्रियों में फँसे तेज के जुगनुओं को देखा। कॉफी आ गयी थी, जिसकी महक बहुत उम्दा थी। 'मोचा' उसकी पसन्द थी। मैंने पहला घूँट लिया, बहुत तुर्श, इस तुर्शी को कम करने के लिए मैंने प्लम केक की स्लाइस को कुतरा, मगर वह बनी रही। दोपहर बेहद नम और गर्म होने की वजह से सुस्त थी, उसकी आँखें बदली-बदली- सी थीं, मोर के ताँबई-सलेटी अण्डों जैसे गोलकों से वह लगातार मुझे देख रहा था, मैं अपने पिछले नाटक की बात कर रही थी। वह अब भी खामोश था। उसके माथे पर झुर्रियों का बना, भँवर-सा था। ऐसा भँवर किसी पेशानी पर नहीं देखा था कभी मैंने , मानो समस्त ब्रह्माण्ड के रहस्य और उन रहस्यों के दस्तावेजों की चाभी यहीं छिपी हो।

जब हम कॉफी खत्म कर चुके तब उसने फोलियो-बैग से कुछ कागजात निकाल कर मेज़ पर रखे, "तुम मेरे साथ काम कर रही हो, फिल्म में। मगर स्क्रिप्ट नहीं है, ये कॉंन्ट्रेक्ट पेपर है।"

"आप तो अभी स्क्रिप्ट लिख..."
"जिस स्क्रिप्ट को जिया हो उसे क्या लिखूँ?"

"मगर मेरा रोल? मैंने तो नहीं जिया है न। साइन करने से पहले जानना होगा न..."
    "समझा दूँगा, वह रोल करना नहीं, जीना ही है।"
    "मगर?"
    "देख लो… " कह कर उसने वेटर को पैसे पकड़ाए और मुझे हैरान छोड़ सीढ़ियाँ उतर गया, "अजीब बन्दा है।"

अब मुझे उससे सम्पर्क करना है, यह तय था, 'ऐसे ब्रिलिएंट आदमी की तो डब्बा बन्द में भी काम करके लोग क्या नहीं सीख जाते।' स्टालिन यही बोलता था।

मैं सोच रही थी कि जो हो रहा है वही तो होना था न, हैरानी की बात तो यह है कि वह बता रहा था कि मुझसे मिलने से पहले उसने कई लड़कियाँ देखी हैं।"

कुछ दिन वह मुम्बई गया फिर लौट आया। मैं जब तक उसे फोन करने की सोचती उसी का फोन आ गया। "आ जाओ पणजी।"
"देखो, फोन पर कुछ तय नहीं होता। एक बार तो आना ही है, अगर तय करना है किरदार तो... है तो... तब बैठेंगे आराम से, सुकून से, बातें करेंगे।"

बस हुआ यही कि... खामोश रहने की ख्वाहिश हो तो बुला कर उसे, बिठा कर सामने घन्टों, बैठे हैं, बिना नजर मिलाए, ताक रहे हैं शून्य में सलेटी आँखों से। वह बोले जा रही है, बोलते-बोलते अपनी पसन्द के किरदार के बारे में, स्क्रिप्ट के बारे में वह अचानक महसूस करती है, माथे पर पड़े भँवर जैसे जाल में कोई हरकत और चुप हो जाती है वाक्य अधूरा छोड़ कर।

सुन भी रहा है यह कि...

"सच कहूँ, मेरे दिल के करीब अगर कोई फिल्मी किरदार रहा है तो... वह है... "

उसके होंठ हल्का-सा खिंचते हैं बारीक मुस्कान में, क्या उपहास उड़ा रहा है? वह संजीदा होने की कोशिश में चुप हो जाती है। फिर संवाद का एक अन्धा मोड़, उसका मन खीज से भर जाता है और रोने को करने लगता है।

तभी अचानक कह उठता, "अच्छी लग रही हो, स्कर्ट की जगह जींस ही पहना करो, चलें अब अगली मुलाकात में बात करेंगे पूरी स्क्रिप्ट पर।

उन्हीं बिना लेन-देन वाले दिनों में, एक निर्लिप्त, निस्पृह आकर्षण, चुप्पे प्रेम को महसूस करते हुए थरथराते दिनों में, मैं कई बार उससे मिली। हमेशा ऐसा होता तो नहीं था। मगर उस सारी शाम वही बोलता रहा। उस किरदार के बारे में। शाम की रूमानियत लिए मुस्कुराता हुआ। मँहगी शराब मँगवाते हुए, वह मेरी हर ज़रूरत पर सौ जान से कुरबान था, क्योंकि तब पी कर बोल रहा था वह अपनी उपलब्धियों पर, जो कि अमूमन नहीं बोलता था, कला पर और अपनी उस्तादी पर।

"कोई नहीं रच सका आज तक वैसा सीन। डिफिकल्ट, कलात्मक पिक्चर मेरे बाद किसने बनाई? साले आज के लौंडे, शेरो-शायरी, कविता और अंग्रेजी फिल्मों के संवाद और पूरे सीन के सीन मार कर सोचते हैं कि... "

"मैंने तुमसे कहा था न, हमारा असली चरित्र वही होता है जब हमें कोई नहीं देख रहा होता है।'' जब मैं अपने पात्रों को चरित्रों में ढालता हूँ तो यह ब्रह्म-वाक्य मेरे दिमाग की बनावट में बसा रहता है। यह मेरी प्रेरणा बन गया है। यह अकसर काम करता है, इसलिए जो मैं लिख रहा होता हूँ, वैसा ही सब जी भी रहा होता हूँ। यही मेरे पात्रों को उनके असली रंग में ढालने के काम आता है। उनके सपने, अहसास, कमजोरियाँ, दुनिया के पीछे का उनका व्यवहार, दुनिया के आगे कुछ और ही दिखने की उनकी चाह... ठंडी-कड़वी मुस्कान। यह सब तभी दिखता है जब पात्र के आगे इनविजिबल कैमरा रखा हो। जब वह अनजान हो कि कोई उसे चुपके से परख रहा है। तभी उसकी असली खूबसूरती भी निखर कर आती है। दुष्ट और भला, अच्छे और बुरे की बाँहों में झूलता या फिर दोनों, अच्छे-बुरे के रोल से बेजार और उलझा! उसे और कैमरा को बस अकेला छोड़ दो, जरा-सा ट्विस्ट और एंगल बदल देने से पात्र के चरित्र में नए अर्थ जुड़ जाते हैं।

आज भी जब अपनी पुरानी दोनों हिट फिल्में देखता हूँ तो वो शुरुआती जज़्बा याद आ जाता है। मैं जिद्दी हूँ, जानता हूँ। बिलकुल समझौते नहीं करता स्क्रिप्ट पर या अपने आयडिया पर। अब जब मैं सब कुछ खो चुका था, घर नाम की हदबन्दी भी। मुम्बई से गोआ के रास्ते में आते एक सस्ते रेस्तराँ में एक माचिस की डब्बी पर लिखी इस स्क्रिप्ट पर फिर जुआ खेलने को तैयार हूँ, है न दीवानगी! ये दीवानगी हरेक के बस की बात नहीं... जैसे कि प्रेम हरेक के बस की बात नहीं। हम बस कहते ही नहीं हैं।"

मैं प्रेम के भ्रम के कोष्ठक में बन्द समीकरण सुलझाना चाहती थी। मैंने उसकी आँखों में झाँका, वहाँ शांत समुद्र था, कोई लहरें नहीं थीं कि कोई अता-पता देतीं, किसी नए-पुराने प्रेम का। कोई आश्वस्ति नहीं थी मगर सम्मोहन था मुस्कान में, मैं कब तक वह आमंत्रण टालती, एक अनकेहा आग्रह - "तुम मेरी हर पुकार पर आ जाया करो।"

मैं उसे जान गई थी कि वह अपनी मानसिक और दैहिक ज़रूरतों की ही बात समझता है। उसे रूमानी इश्क की नहीं ऐसे व्यक्ति की तलाश थी, जो उसे घण्टों चुप बैठे देख सके, सुन सके, उसकी कलाकाराना वहशतों की गवाह बन सके। जो पद्मा की तरह मीरा के भजन सुना सके या फिर किताबों पर, क्लासिक सिनेमा पर, शास्त्रीय संगीत और राग, ललित कलाओं के अमूर्तन पर बात करता रह सके। फिर अचानक ऊब जाने पर, वह यह सोचे बिना कि वह किसी का दिल दुखा रहा है, उस व्यक्ति को साफ-साफ कह सके कि -

"अब कौन-सी बस जाएगी तुम्हारी? चलो छोड़ आएँ, रात तक पहुँच तब भी जाओगी।"

"स्क्रिप्ट!"

"लगभग तय तो हो गया न… बताया था न सुबह तुम्हें स्टेशन से लाते हुए, बाकी अब रास्ते में बता दूँगा। यहाँ से चलो, ज्यादा देर बन्द जगह में दम घुटता है मेरा।"

टैक्सी में वह मुझे पूरी कहानी बिना भूमिका के सुनाने लगा, एक स्क्रिप्ट की तरह या आपबीती की तरह, यह मैं समझ नहीं सकी।

"उसके आस-पास की हवा में साँस लेना भी मेरा जीवन सार्थक कर देता था। वह बहुत मीठा गाती थी। तुमने नहीं देखी होगी वैसी सुन्दरता। उद्दाम कामावेग के बावजूद उसमें बहुत कुछ पवित्र और विरल था। दैहिक आवेग उसके लिए, अनुष्ठान-सा होता था। वह खुद अपने कपड़े एक-एक कर उतारती, मानो किसी यज्ञ से पूर्व कोई पुजारिन नदी में उतरे, स्नान के लिए। अपनी सधी काया लिए लेट जाती और दोनों आँखों पर दो-दो उँगलियाँ रख लेती। फिर वह जो भी बुदबुदाती थी, वह बहुत गौर करके भी मैं समझ नहीं सका। यह तय था कि वे कोई इरोटिक शब्द नहीं थे। कभी शक भी हुआ कि किसी अन्य प्रेमी का नाम तो नहीं... पूछा तो उसने अनभिज्ञता जता दी, 'आवेग में किसे क्या याद रहता है। पता नहीं क्या बुदबुदाती हूँ।' मैं बस यह जानता था यह आमंत्रण है। उसका सारा शरीर तनाव में रहता, मुझे कहना पड़ता कि इसे ढीला छोड़ दो। उसके बाद वह किसी सम्मोहन में चली जाती, मुझे देखकर भी नहीं देखती, मेरे साथ होकर भी नहीं होती। मैं एक भँवर डालती लहर में तैरता रहता।

वह एक सुन्दर नर्तकी थी, नाचते हुए भी वह कोई और होती थी। ग्रीन रूम तक वह मुझसे लगातार बात करती, "तुमने नीलिमा के लिए कोई लड़का देखा? तुम कुछ करते क्यों नहीं... जानते हो न बाऊजी को बात करनी नहीं आती, हमारे तो जो हो तुम हो।"

वह शीशे में अपनी पलक खींच कर आई लाइनर को मोटा करते हुए बोलती, "देखो, जरा यहाँ पिन लगाना। हम तीनों बहनों का है ही कौन? बाबू, तुम कल बाउजी के साथ जाना। अच्छा, कल रात देर तक इंतजार किया, तुम आए नहीं। स्टेशन से सीधा घर चले गए? ओह, देखो स्टेज पर अनाउंस हुआ क्या? नहीं हुआ हो तो बाबू, एक-एक पैग बकार्डी लगाओ न दोनों के लिए।

"तुम ज्यादा लेने लगी हो, शुरू में ही हमने तय किया था कि बस शनिवार शाम को लिया करेंगे।"

"बाबू, और रखा क्या है जिन्दगी में? तुम, डांस, बहनें और ये… "

"मैं बाहर जाता और वह बदल जाती। स्टेज पर से वह मेरी तरफ देख कर भी किसी निर्वात में ताकती लगती। शकुंतला बनती तो राजा नल की कृशकाय विरहणी लगती। यशोदा होती तो पूरी चतुर माँ बन जाती, लल्ला को बुद्धू बनाती, काल्पनिक पानी भरी थाली में काल्पनिक चाँद दिखाती हुई मन ही मन मुस्काती। कभी तो वह बस विशुद्ध ऊर्जा के पुंज में बदल जाती, एक उन्मुक्त आत्मा जो अति त्वरित चक्कर काटती हुई यूनिवर्स पार कर जाती और स्टेज के पीछे किसी ब्लैक होल में विलुप्त हो जाती।"

"हाऊ रोमेंटिक।"

"व्हाट रोमांस! ये महज मुखौटा है, या भूमिका है, सेक्स से पहले की। आदिम मानव सभ्यताओं में कोई रूमानियत नहीं झाड़ता, बस दैहिक प्रतिदान होता है। स्साला कहाँ का इश्क, गर सर फोड़ना ठहरा… ।"
मैं अवाक।
"क्या तुम नाचना जानती हो।" उसने पूछा।

"टैंगो सीखा था, कुछ दिन।"

" इण्डियन क्लासिकल।"

"नॉट।"

"ओह, फिर?"

"सीखा जा सकता है।"

"बहुत ज्यादा नहीं थोड़ा कुछ… बस ताल और लय समझ सको उतना ही।"

"क्या ये तुम्हारे अपने जीवन को काट कर गुजरती कहानी है?"

"हाँ, मगर यह विशुद्ध उसकी कहानी है, मुझ पर उसका कर्ज है। जो उसका मेरे भीतर छूटा हुआ वजूद है, जिसे चाहता हूँ कला में उलट दूँ। उसकी यादें मैं परदे के माध्यम से लौटा दूँ। मैं उनसे मुक्त होना चाहता हूँ।"

3

उसी के गाँव, उसी के घर, उसी के रेस्तराँ में जाकर, उसी की मम्मी को कह कर मैंने अपने लिए बकार्डी, उसके लिए रेवेरा वाइन ऑर्डर की। मैं इसलिए पी रहा था कि हिम्मत जुटाऊँ और जो महसूस कर रहा हूँ इसे साफ-साफ कह दूँ कि जो मेरे-तुम्हारे बीच है वह प्रेम नहीं, बस एक खूबसूरत स्क्रिप्ट है, इसे जी लो। मगर बात उसने शुरू कर दी और सब कुछ बिगड़ गया। माना कि मैं एक स्क्रिप्ट नहीं लिख पा रहा था इस फिल्म की, शुरू में तो एक आईडिया की तरह मैंने उसे सिगरेट की डिब्बी पर ही लिखा था, बाद में अपने वॉलेट में बरसों से रखे फोटो का प्रिंटआउट निकाल कर उसके पीछे कुछ वाक्यों में, लेकिन ऐसा नहीं था कि और कुछ ठोस नहीं था, इस डिब्बी के अलावा मैंने खुद 'स्टोरीबोर्डिंग' की थी इन दिनों, हर उस सीक्वेंस की जो उस फिल्म के महत्वपूर्ण हिस्से थे। जिन्हें मैंने अपने लैपटॉप पर स्क्रीन सेवर की तरह डाल रखा था जो कि स्लाइड शो की तरह चलता रहता था।

"मुझे पता चल गया है कि स्क्रिप्टनुमा कोई चीज ही नहीं है तुम्हारे पास... बस मुँहजबानी एक कहानी है, यह फिल्म बन रही है या कोई मॉकिंग हैं... ।"

वह कुछ खीजी-सी थी।
"तुम बेवकूफ हो, मैं जब से गोआ आया हूँ, तुमसे मिला हूँ, मैं लगातार कम्प्यूटर पर 'स्टोरीबोर्डिंग' पर काम कर रहा हूँ।"

"स्टोरीबोर्डिंग!"

"सीन का फ्रेम-दर-फ्रेम स्केच बनाना, जैसे कॉमिक्स होते हैं... स्टोरीबोर्डिंग से फिल्म कसी हुई बनती है, डायरेक्शन ही नहीं, एडिटिंग आसान हो जाती है। इन वर्चुअल स्केचों में पूरी कहानी होती है, एंगल्स होते हैं, कौन कहाँ से एंटर होगा या कहाँ खड़ा होगा... यह तय होता है, डायलॉग बॉक्स भी होते हैं, यह तेज-रफ्तार तरीका है फिल्मस्क्रिप्टिंग का, फालतू बातें नहीं लिखनी होती हैं कि फलाँ बन्दा यहाँ से घुसा, उसने यह पहना था, यह पकड़ा था... पिछली बार जब मैं इटली एक फिल्म फेस्टिवल में गया था तब एक स्क्रिप्टराइटर से यह ट्रिक सीखी, न केवल सीखी बल्कि इसके लिए बाकायदा पिछले साल मैंने यह आर्ट सीखी, कॉरल ड्रॉ सीखा। एनीमेशन सीखा।"

मैंने लैपटॉप निकाल कर उसे वे सीक्वेंसेज़ दिखाए।
    "वाह!"
    "…. "
    "क्या वह सच में बहुत खूबसूरत और टेलेंटेड थी?"
    "खूबसूरत! हाँ थी, मगर तब जब तक अल्कोहलिक नहीं हुई थी।"
    "क्या तब भी तुम उसे प्रेम करते थे?"
    "बता चुका हूँ।"
    "वह?"
    "वह भी।"
    "क्या तुम मुझे…।"

"मैं तुम्हें प्रेम नहीं करता, अब प्रेम होता नहीं है, लेकिन तुम मुझे अच्छी लगती हो, क्या तुम मुझे छूने दोगी?"

मैंने अचानक यह पूछ लिया तो वह रोने लगी। मैं बाहर उठ आया, मैं किसी के रोने से घबरा जाता हूँ। बाहर पेवमेंट गीला था, पतझरी पत्तियों के भूरे कीच के कारण रपटन भरा हो गया था, लकड़ियों के जलने की महक हर तरफ थी। कोहरे की पतली सतह स्ट्रीटलाइट के चारों ओर लिपटी हुई एक पीली तैरती हुई गैस को जन्म दे रही थी। आवाज़ें बस गुनगुन-सी थीं और आवागमन सुस्त था। कारें गन्दे पानी की सतह पर तैरती-सी निकल रही थीं। मानसून के आखिरी विकट दिन थे सैलानियों से सूना शहर उदास था, अभी ड्रिंक्स का समय भी नहीं हुआ था और शहर को सोने भेज दिया गया था। मैं भीतर आया तो वह रोकर चुप हो चुकी थी।

"क्या तुम पहले भी अपनी हीरोइनों के साथ सोए हो?"

"बहुत ही कम… दो या तीन…।"

"दो या फिर तीन।"

"तीन।"

"यानी हर फिल्म... तीन ही तो फिल्म... "

"ग्रेशल, यह सवाल एकदम बेहूदा है, तुम्हारी सोच भी। यह कोई फिल्म में काम करने की शर्त नहीं है, बस तुम अच्छी लगती हो और मैंने महसूस किया कि तुम मुझसे आकर्षित हो... तुम शब्दों में मत उलझो, शब्द विस्मृत हो जाते हैं। क्या मैंने कहा और क्या तुमने... या क्या कहें क्या न कहें... सब बेमानी है, त्वचा पर जो छूट जाता है, सुगंध और स्पर्श के रूप में, चेतना उन्हें विस्मृत नहीं करेगी क्योंकि यह उनकी भूखी है।"

उसने कहा, "नहीं, नहीं। मैं अभी तैयार नहीं हूँ।" यह कहते हुए उसने मुझे ऐसी उदास आँखों से देखा कि मुझे लगा कि मेरे साथ सोने का फैसला खुद उसका न होकर किसी अलौकिक शक्ति के हाथ हो।

4

कोई भी लड़की अपने सपने उन हाथों में नहीं सौंप सकती जो उन्हें तोड़ दे। कोई भी नहीं। मगर मैंने ऐसा किया। मैं उससे तब मिली जब मैं जीवन के मायने ढूँढ़ रही थी। मैं जीना चाहती थी, नाचना चाहती थी। लोगों को अपने इर्द-गिर्द इकट्ठा करना चाहती थी। ऐसे में कोई अजनबी आदमी आपको मिलता है, थिएटर की सीढ़ियों पर, अगले दिन फोन पर बातें करता है, न कोई सलाह देता है, न कोई खास बात करता, मगर आप पर लगातार ध्यान देता है चुपचाप। खयाल रखता है तो आप उससे आकर्षित हुए बिना कैसे रह सकते हो? एक महीने में ही उसके साथ हमबिस्तर हो जाना! यह कुछ ज़्यादती नहीं है अपने साथ? प्रतिभा से प्रभावित होना, उसकी कला को भीतर तक महसूस करना बेकार की दलील है। यूँ भी जेनरेशन गैप... वह उन्नीसवीं सदी का शख्स। सच पूछो तो, पिछले दो महीनों में मैं बहुत ही कम जान पाई थी उसके बारे में। मैं चाहती तो अदांज लगा सकती थी। उसका सामान, उसका परिचय, उसके जीने का ढंग, छोटे-छोटे तौर-तरीके बता सकते थे कि उसके अन्दर एक जिप्सी जीन था।

एक महीने बाद मुंबई से उसका फोन आया, वह आ रहा था। मैं इक्कीसवीं सदी की लड़की फिर उस दुःस्वप्न की तरफ बढ़ी। न केवल बढ़ी, मैंने एक दुःस्वप्न जिया... जब उसने घनी बरसात में देह में एक भूख लिए मुझे बुलाया। वह इस बार एक मित्र के स्पाइस गार्डन में स्थित एक रिसोर्ट में ठहरा था।

"साड़ी पहन कर आना।"

"मैं पद्मा नहीं हूँ।"

"तुम्हारी मर्ज़ी।"

मैं भरी बरसात में शाम पाँच बजे तो पहुँची, दो घण्टे हम पणजी में भटकते रहे, फिर शहर के बाहर आ गए। उसने मुझे सड़क पर छोड़ दिया, यह कह कर कि मैं यहीं झुटपुटे में खड़ी रहूँ, वह सामने गेट खोलने के लिए बूढ़े चौकीदार को बुलाने जा रहा है। मैं हाईवे पर खड़ी हुई जो जी रही थी उस पल वह याद आने पर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मैं लगातार भीग रही थी, सड़क के इस पार, हर चार कार में से पाँचवीं मेरे आगे धीमी हुई थी... ट्रक तो लगभग सारे... मेरे भीतर एक पल को हाईवे की सेक्स वर्कर जन्मी और सिहर कर मर गई... उसकी लाश बमुश्किल मैंने कुछ ही देर कन्धे पर ढोई, फिर जब देखा वह इशारा कर रहा है उस पार आने का तो बेरहमी से वह लाश वहीं फेंक दी, मेरे कन्धे झुके हुए थे।

मैं उसके कमरे में पहुँची तो एक ऐसी पस्त, भीगी अभिसारिका थी जिसकी सारी सज्जा धुल चुकी हो, साड़ी में कीच लिथड़ा था। मेरे मन में से सारा अवसाद जाता रहा जब उसे खुद को सौंप दिया। उसके कसावों में आश्वासन था, चुम्बन कोमल थे। मैं आत्मरति की डोरियों से बने पुल पर खड़ी थी, मेरा जिस्म डोल रहा था। पता नहीं किस पल, मैंने यह मान लिया था कि देह के आदान-प्रदान में प्रेम की कहीं दरकार नहीं। कोई अतीत की कैफियत नहीं। भविष्य के सपने नहीं। बस केवल उसकी भीतरी मादकता को मापती-भोगती, देह की आग को फूँकती वर्तमान की दो आँखें। क्यों नहीं सोच पा रही थी मैं कि ये ताज़ी, खुशरंग फन्तासियाँ कुछ ही पलों में फूट कर बदंरंग हो जाने वाली हैं। मुझे उस पल तो तो यही महसूस हुआ था कि हम एक-दूसरे को जानते हैं। उस पल कम से कम हमें एक-दूसरे के इतिहास में भी दिलचस्पी नहीं रही। मैं कुछ और महसूस कर पाती उससे पहले ही उसने मुझे पलटा लिया, "तुम सँभालो... वुमन शुड बी ऑन टॉप।"

वह मुस्कुरा रहा था, माथे पर, बालों में बूँदें थीं। उस पल हमारे अपने-अपने अस्तित्वों के फैलाव के बीच इतनी सँकरी जगह बची थी कि जहाँ से न सच गुजर सकता था न झूठ।

"चलो, घर छोड़ दें तुम्हें।" उसका यह वाक्य मुझे हमेशा बेहूदा लगता है, इसे किसी और तरीके से बोला जा सकता है।

"हाँ, शुरू हुआ खेल, खत्म हुआ।"

"पागल हो। मेरा एक पेंटर दोस्त कहता है "पता है प्यूरिटन लोग कौन होते हैं?" वह कड़वी हँसी हँसा।
"... "

"ये वो लोग होते हैं जो यह बरदाश्त नहीं कर पाते कि कोई कहीं 'अच्छा' वक्त बिता रहा होगा।"

रास्ते भर वह दर्शन पर बोला, फिर कला पर, प्रेम की निस्पृहता पर। फिर देर के लिए चुप हो गया। उसकी चुप्पी, निस्पृहता, कला और दर्शन के रेशम धागों को लपेटते हुए वह सब कुछ उलझा बैठी। भरी बरसात में उसी सपाट भाव से एक सुनसान बस स्टॉप पर ले आया। हम ओल्ड गोआ जाने वाली बस का इंतजार करने लगे।

"तुम घर तक छोड़ोगे न!"

"हाँ... " वह गुनगुनाने लगा।

"बैठे हैं उन्हीं के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह।"

मुझे लगातार लगता रहा कि उसका जहन एक पुराना बंद पड़ा सिनेमा हॉल है, जिसके पुराने कालीनों पर धूल जमी है, दीवारों पर लंबे जाले और जिसके पर्दे पर एक दृश्य सदा के लिए अटका रह गया है। 60-70 के दशक की किसी भावुक फिल्म का।

मैं सोचती ही रह गई कि क्या यह वही आदमी है? जो उन पलों में था! या उन पलों को लाने की भूमिका में अब तक था। मैंने देखा, गौर से कि फीकी-सी आंतरिक उदासी के कारण उसकी आँखें प्रेम से पहले और प्रेम के बाद अवसाद में डूबी थीं, भारी पलकों पर एक अपरिचय तो खैर अंतरंगता के पलों में भी बना रहा था। मुझे अनमना देख अचानक बोला - "प्यार-व्यार की आज के ज़माने से किसी से उम्मीद मत किया करो, इसका अंत दुख से भरा होता है।"

मैं बुरी तरह हताश हो गई थी और चीख पड़ी।

"तुम्हारा मेरी तरफ का हिस्सा कितना कड़क है, एकदम प्लास्टर ऑफ पेरिस। तुम अब इसे खत्म समझो, अब बुलाया भी तो मैं नहीं आने वाली। यू ब्रूट, यू चीट, यू कांट बी एन आर्टिस्ट, यू डोंट हैव एनी इंटीग्रिटी, यूँ भी मैं पद्मा नहीं हो पाऊँगी, मुझे नाचना नहीं आता है, न मैं वह भाषा बोल सकती हूँ जो वह बोलती थी।"

वह मेरे पास से उठ कर दूर चला गया बिना चुप कराए। बस आ गई थी। वह आगे से चढ़ा, मैं पीछे से। जब ओल्ड गोआ आया तो, वह बस से उतरा नहीं, मुझे देखता रहा, मैं उतर आई….।

उस दु:स्वप्न को जिए भी चार माह हो चुके थे, उस बन्दे ने यह सुध तक नहीं ली कि घर कब कैसे पहुँची। मम्मी ने डाँटा तो नहीं, भीग कर बीमार तो नहीं हुई?

सच ही में एक दु:स्वप्न मान कर भूलने की कोशिश में थी मैं। मैं उस एपिसोड को पूरा डीलीट कर देती जिन्दगी से, अगर उसका ई मेल न आया होता। लम्बा-सा, सविस्तार।

"माय डियर ग्रेशल,

तुम हैरान और दुखी होगी, मगर मैं अब तक उस मुलाकात के ट्रांस में था, यकीन मानोगी? मैं जो तुम्हारी भीगती-सहमती देह सड़क पर पीछे छोड़ आया था, मगर तुम्हारी आत्मा बतियाती मेरे साथ थी। शाम के सात बजे थे तुम बहुत पीछे रह गई थी अकेली हाईवे पर... भीगती हुई। मैं दौड़ कर भीतर आया था, गेट खुलवाने चौकीदार से... "

गीली साड़ी सँभालती, भीगती, आती-जाती गाड़ियों की रोशनी में उघड़ कर नंगी होती अपनी इच्छा छिपाती, मैं भीतर जाकर अपने दोस्त को शिफ्ट करने को कहता हूँ। तुम गीली चप्पल हाथ में लिए अहाते के बाहर उगे वट के नीचे खड़ी थी, ठिठकी हुई, नंगे पैर भीगती, सैण्डल हाथों में लिए, भीगने से बचने के यत्न से थक चुकी, बरसात को खुद को सौंप चुकी-सी, कमरे की तमाम बत्तियाँ बन्द कर मैंने लाइटर जला कर इशारा किया था, तो तुम पस्त कदमों से चलने लगी। तुमने सदियाँ लगा दी थीं, उन पच्चीस कदमों की दूरी को मापने में... मुझे उस पल तुम पर बहुत प्यार आया था कि एक-दो महीने की पहचान के पुरुष के आकर्षण में तुम एक स्पाइस गार्डन के गेस्ट हाउस पर चली आई हो।

मैं उत्तेजना में था, चाहता था तुम सारे कपड़े उतार दो मगर तुम भयभीत थी और "समय का धनुर्धर" कतई दरवाज़े पर पहरा देने को तैयार न था।
"बाँधने में बहुत वक्त लग जाएगा।" तुम्हारे वाक्य को पूरा सुने बिना मैं बेतहाशा तुम्हें चूमने लगा था कि तुम स्वयं को छुड़ाकर भीगी ही लेट गई थी... इस सुख की बागडोर मैंने तुम्हें दी... तुम झिझकीं मगर बाग थाम ली... तुम यकीन मानोगी, तुम्हारा मुख दमक रहा था, मंच पर गिरती एक अण्डाकार रोशनी-सा। परदे की एक दरार से आती बिजली के तड़कने की सुर्ख और ज़र्द-सी रोशनी में तुम्हारा मुख दमका तो दमकता ही रहा जब तक तुम मेरी छाती पर निढाल होकर न ढह गई। हम समानांतर पार उतरे थे। मैं हैरान था, समूची शाम तो तुम्हें घेरे हुए था भय, तुम्हारा समर्पण विवशता भरा था मगर...

लौटते हुए, मैं अपने मुँह में नींबू के फूलों जैसी महक वाली पारदर्शी लार का स्वाद महसूस कर रहा था। कमरे पर लौटा तो बरसात फिर होने लगी थी, मेरे जहन में तुम्हारी छवियाँ खुलने लगीं... सैण्डल उठाए साड़ी में दौड़ती। बहुत कोशिश की मगर कामुक सीक्वेंस याद ही नहीं आई... कहीं कहरवा बजता रहा दिमाग़ में और लगा तुम मुझ पर एक खास ताल में, लय में निबद्ध कोई नृत्य करके गई हो। मेरी देह सूने मंच-सी थरथरा रही थी। काम स्वरूप बदल कर नृत्य हो गया था। उस प्रस्तुति के अंत में मैं हतप्रभ खड़ा था।

तुम नृत्य जानती हो ग्रेशल, नृत्य तुम्हारी देह में है। तुममें पद्मा है, मैंने खोज लिया था तुम्हें...

जब मैं लौटा तो मेरे दोस्त वहाँ जमे थे, मांडवी के तट पर एक नाव में पार्टी हो रही थी, मैं वहाँ नहीं गया, मैं वट के पेड़ तक चल कर आया, जहाँ तुम ठिठुरती हुई ठिठकी थीं, वहीं खड़ा भीगता रहा, भीगता रहा... मेरे घुँघराले बालों से बहता पानी मेरे आँसुओं को कैमोफ्लाज कर रहा था। ग्रेशल, तुम पद्मा हो, मेरी शालभंजिका। तुम्हारी देह में लास्य है, नृत्य है। मैं स्क्रिप्ट लिख चुका हूँ... अगले महीने से उदयपुर में शूटिंग है। टिकट भेज रहा हूँ, गोआ से उदयपुर फ्लाइट है सीधे।"


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