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कविता

सपने हथियार नहीं देते
अनुराधा सिंह


सपने में देखा
उन्होंने मेरे हाथ से कलम छीन ली
आँख खुलने पर खबर मिली
कि दुनिया में कागज बनाने लायक जंगल भी नहीं बचे अब
सपने में सिरहाने से तकिया उठा ले गया था कोई
सुबह पता चला कि आजीवन
किसी और के बिस्तर पर सोई रही मैं
वे सब चीजें जो मेरी नहीं थीं
बहुत जरा देर के लिए दी गईं मुझे सपनों में
बहुत जरा जरा
मछलियाँ पानी से बाहर आते ही जान नहीं छोड़ देतीं
औरतों के सपने उन्हें जरा देर के लिए मनुष्य बना देते हैं
यही गजब करते हैं
सपने के भीतर दुनिया को मेरे माथे पर काँटों का ताज
और पीठ में अधखुबा खंजर नहीं दिखाई देता
डरती हूँ मैं उन लोगों से जो यातना को
रंग और तबके के दड़बों में छाँट देना चाहते हैं
लेकिन पहले डरती हूँ अपने सपनों से
जो अपने साथ कोई हल या हथियार नहीं लाते
उसी आदमी को मेरी थरथराती टूटती पीठ सहलाने भेजते हैं
जिसे अपने चार शब्द सौंप देने का भरोसा नहीं मुझे
और अबकी नींद खुलने पर भी शायद याद रहे
कि यही खोया था मैंने, यही 'भरोसा'
यही याद नहीं आ रहा था जागते में एक दिन।
मेरे सपने बहुत छोटे आयतन और वृत्त
की संभावनाओं पर टिके
दसियों साल से न देखे हुए एक चेहरे
की प्रत्याशा पर टूट जाते हैं
जबकि मैं न जाने क्या क्या करना चाहती हूँ उस चेहरे के साथ
कितनी विरक्ति, घृणा, कितना प्रेम ।


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