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कविता

रविवार, तुम्हारे साथ
निशांत


तलाक का क्या है
आज नहीं तो कल होगा

उम्र एक मसला जरूर है
समय जहाँ दीवार पर कैलेंडर की तरह है

कई सालों से हम
एक दीवार ही नहीं बना पा रहे हैं
घरवाले कैलेंडर लिए
भटक रहे है
दरियाँ से समंदर
समंदर से आसमाँ तक
अभी उसी दिन
बाजार से सब्जी खरीदकर लाया तो
तुमने लाड़ से कहा
बच गई मैं, नहीं तो सारी जिंदगी
तुम्हारी लाई हुई सड़ी सब्जियाँ बना रही होती...
और क्या क्या कहा था
मुस्करा मुस्करा कर...

प्रेमिका ही नहीं
पत्नी भी नहीं
एक नाम नहीं
एक लड़की नहीं
दीवार पर टाँग दी जानेवाली कैलेंडर नहीं
कुछ और भी हो

समय
घड़ी और कैलेंडर नहीं होता

कुछ रिश्ते को
हम परिभाषित नहीं कर पाते

मैं अपनी पत्नी को पैसा देता हूँ
उस से खुद नहीं
मेरा वकील बात करता है
प्यार किस चिड़िया का नाम है
किस देश में मिलता है
उसका वकील जानता है

तुम्हें पैसा नहीं देता
तुम कहती हो प्यार भी नहीं करता
रात को ग्यारह बजे दरवाजा खोल कर
अंदर आने देती हो

कहता हूँ पत्नी से तलाक ले लूँ
तुम कहती हो जरूरत क्या है

आज रविवार है
तुम्हारी छुट्टी है
तुम्हारे पसंद की सब्जी खरीदकर लाया हूँ।
तुम कहती - बच गई मैं, नहीं तो सारी जिंदगी
तुम्हारी लाई हुई सड़ी सब्जियाँ बना रही होती...

शादी का क्या है
आज नहीं तो कल करूँगी
घरवाले तुमसे नहीं करेंगे
न करें
उनके अपने अरमान है
उसे वे पूरे करें
और वैसे भी
तुम तो साले सेकेंड हैंड माल हो
इतना काफी है मेरे घरवालों के लिए
हाँ हाँ हाँ...

रविवार, छुट्टी के दिन आना
मेरे हाथ की
दुनिया का सबसे खराब खाना खाकर जाना
अब मुँह मत फुलाओ
इधर आके चुपचाप खाओ
मरने से पहले, भूत मत बन जाओ।


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