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कविता

ज़हर का दरिया
अशोक कुमार


चलो कि ज़हर के दरिया की सैर की जाए
उसे मथें औ अमृत की खोज की जाए
अपने ख़ुदग़र्ज़ इरादों की बाट बट कर के
कायनात इक नई शुरू की जाए !

वो जो दानवों को भस्म करती हो,
जो देवताओं को इनसान करती हो,
वो जिसमें शिव को ज़हर पीना न पड़े
वो कायनात जो सबको समान करती हो !

वो जिसमें भेस राहु बदल न सके
बदल भी ले तो अमृत को पी न सके
वो जिसमें कौरवों की ज़ात न हो
वो जिसमें सीता कोई चुरा न सके !

मैं जानता हूँ दुनिया बदल नहीं सकती
एक हो कर के सागरों को मथ नहीं सकती
यूँ ही ख्याल सा गुज़रा है बेमानी सा
जिसकी तकमील हर हाल हो नहीं सकती !

फिर भी,
चल के देखो तो ज़हर का दरिया
मथने की कोशिशें तो करो
किसे पता है फिर से अमृत निकल ही पड़े !


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