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लेख

अटलमय रहा विश्व हिंदी सम्मेलन
कृपाशंकर चौबे


मॉरीशस में बीते 18 से 20 अगस्त 2018 तक संपन्न 11वाँ विश्व हिंदी सम्मेलन कई कारणों से तात्पर्यपूर्ण रहा। पहला कारण तो यह था कि सम्मेलन पर दो भाव एक साथ व्याप्त थे। पहला शोक का भाव था तो दूसरा संतोष का। अटल बिहारी वाजपेयी के निधन पर शोक की सघन छाया विश्व हिंदी सम्मेलन पर थी किंतु संतोष का भाव भी था कि समूचे हिंदी विश्व ने मॉरीशस में एकत्र होकर अटलजी को श्रद्धांजलि दी। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में ही भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ और पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ के वक्तव्यों में अटल जी के नहीं होने की गहरी प्रतीति थी। सम्मेलन के पहले ही दिन अटल जी की याद में श्रद्धांजलि सत्र रखा गया जिसमें विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधियों ने अटल जी को श्रद्धांजलि दी। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल व हिंदी के वरिष्ठ कवि केशरीनाथ त्रिपाठी ने उस सत्र में अपनी श्रद्धांजलि में ठीक कहा कि शब्द निःशब्द हो गए हैं। वाणी मूक हो गई है। सम्मेलन के दूसरे दिन रात में अटल जी की याद में काव्यांजलि का सत्र रखा गया जिसमें कई कवियों ने अटलजी को काव्यांजलि दी। काव्यांजलि में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज एक श्रोता के रूप में उपस्थित रहीं किंतु समापन के समय वे मंच पर आईं। तब रात के साढ़े 11 बज गए थे। सुषमा जी ने अपने उद्बोधन में कहा कि यह विश्व हिंदी सम्मेलन अटलमय हो गया है। उन्होंने अटलजी की कविताओं का सुचिंतित भाष्य भी किया।

11वें विश्व हिंदी सम्मेलन की दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि यह थी कि उसमें बीस देशों के दो हजार से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। उससे स्पष्ट था कि विश्व हिंदी सम्मेलन ने एक अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्राप्त कर लिया है। विश्व हिंदी सम्मेलन तीन बार भारत में हो चुका है। पहला विश्व हिंदी सम्मेलन, 1975 में नागपुर में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की पहल पर आयोजित हुआ था। दूसरी बार दिल्ली में 28-30 अक्टूबर 1983 तक विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया था। भारत में तीसरी बार दसवाँ विश्व हिंदी सम्मेलन भोपाल में 10 से 12 सितंबर, 2015 तक हुआ था। 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन के साथ ही मॉरीशस में भी तीन बार विश्व हिंदी सम्मेलन हो चुका। इसके पहले 28 से 30 अगस्त 1976 में दूसरा विश्व हिंदी सम्मेलन और दो से चार सितंबर 1993 में चौथा विश्व हिंदी सम्मेलन मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई में हुआ था। उसके अलावा एक बार पोर्ट ऑफ स्पेन (ट्रिनिडाड एंड टोबेगो), एक बार लंदन (यू.के.) में, एक बार पारामारिबो (सूरीनाम) में, एक बार न्यूयार्क (अमेरिका) में और एक बार जोहानिसबर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में विश्व हिंदी सम्मेलन हो चुका है। पहले विश्व हिंदी सम्मेलन में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में स्थापित करने तथा विश्व हिंदी सम्मेलन का मुख्यालय मॉरीशस में खोलने का प्रस्ताव पारित हुआ था। दोनों प्रस्ताव फलीभूत हो चुके हैं। वर्धा में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की स्थापना 1997 में हुई और मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय स्थापित हो चुका है। सचिवालय के भव्य भवन का उद्घाटन इसी वर्ष भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के हाथों संपन्न हो चुका है।

तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में उसकी अनुशंसाओं पर खास ध्यान दिया जा रहा है। खास कर तब से जब से भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पर उसके आयोजन का भार आया है। उन्होंने विश्व हिंदी सम्मेलनों की अनुशंसाओं के अनुपालन पर विशेष ध्यान दिया है। हर तीन महीने में अनुशंसा अनुपालन समिति की बैठक होती है। विदेश मंत्री स्वयं उन बैठकों में भाग लेती रही हैं। बीच में उस कालखंड को छोड़कर जब किडनी ट्रांसप्लांट करने के कारण वे स्वास्थ्य लाभ कर रही थीं। पिछली अनुशंसाओं को 'भोपाल से मारीशस' शीर्षक से पुस्तक रूप में 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रकाशित किया गया।

11वें विश्व हिंदी सम्मेलन की चौथी महत्वपूर्ण बात यह थी कि वह क्रमशः संवाद को सुचिंतित ढंग से आगे बढ़ा रहा है। पहले के विश्व हिंदी सम्मेलन साहित्य की विधाओं पर केंद्रित थे। उसके बाद भोपाल में संपन्न दसवें विश्व हिंदी सम्मेलन का मुख्य विषय 'हिंदी जगत : विस्तार एवं संभावनाएँ' रखा गया था। उसमें भाषा पर केंद्रित 12 सत्र रखे गए थे। उस सम्मेलन का प्रतिवेदन प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने तैयार किया। भाषा के बाद अगला पड़ाव संस्कृति पर ले जाया गया। इसलिए 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन का मुख्य विषय 'हिंदी विश्व और भारतीय संस्कृति' रखा गया था। इसके तहत समानांतर सत्रों में भाषा और लोक संस्कृति के अंतरसंबंध, प्रौद्योगिकी के माध्यम से हिंदी सहित भारतीय भाषाओं का विकास, हिंदी शिक्षण में भारतीय संस्कृति, हिंदी साहित्य में संस्कृति चिंतन, फिल्मों के माध्यम से भारतीय संस्कृति का संरक्षण, संचार माध्यम और भारतीय संस्कृति, प्रवासी संसार, भाषा और संस्कृति और हिंदी बाल साहित्य और भारतीय संस्कृति पर वैचारिक मंथन चला। 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में यह भी दिखा कि गिरमिटिया देशों में संस्कृति का गौरव कायम है। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रवीण कुमार जगन्नाथ अफसोस कर रहे थे कि वे हिंदी भलीभाँति नहीं बोल पाते हैं किंतु उन्होंने अपनी पत्नी से कहा है कि संक्रांति के दिन वे खिचड़ी ही खाएँगे। भारत में भी संक्रांति के दिन खिचड़ी खाई जाती है। संस्कृति को बचाने की छटपटाहट उनमें दिखाई दी। भारत ने यह जिम्मेदारी ली है कि भाषा और बोली जहाँ बची हुई है, उसे कैसे बढ़ाया जाय और जहाँ लुप्त हो रही है, उसे कैसे बचाया जाय। कहने की जरूरत नहीं कि गिरमिटिया देशों में लुप्त हो रही भाषा को बचाने की जिम्मेदारी भारत की है। इस संदर्भ में 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के लोगो पर बनी एनिमेशन फिल्म भी बहुत तात्पर्यपूर्ण थी। उस फिल्म में दिखाया गया है कि मॉरीशस का राष्ट्रीय पक्षी डोडो जब डूबने लगता है तो भारत का राष्ट्रीय पक्षी मोर आकर उसे बचाता है। फिर दोनों नृत्य करते हैं।

हर विश्व हिंदी सम्मेलन में यह प्रस्ताव पारित किया जाता रहा है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाया जाय। उसमें एक समस्या व्यय को लेकर है। भारत को व्यय वहन करना होता तो वह 400 करोड़ रुपए देकर भी उसे हासिल कर लेता किंतु संयुक्त राष्ट्र संघ का नियम यह कहता है कि समर्थक देशों को संबंधित व्यय वहन करना होगा। जहाँ तक देशों के समर्थन का सवाल है तो जब योग दिवस के लिए भारत 177 देशों का समर्थन हासिल कर सकता है तो संयुक्त राष्ट्र की भाषा के लिए 129 देशों का समर्थन भी वह हासिल कर लेगा। भारतीय विदेश मंत्री ने इसकी उम्मीद भी जताई। 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन की पूरी व्यवस्था जिस तरह भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, विदेश राज्य मंत्री द्वय एमजे अकबर तथा जनरल वी.के. सिंह, गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू, केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सतपाल सिंह और मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय के महासचिव प्रो. विनोद कुमार मिश्र ने सँभाल रखी थी, वह भी ध्यान देने योग्य है। यहाँ तक कि बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी और गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने भी सम्मेलन शुरू होने के एक दिन पहले सम्मेलन स्थल पहुँचकर तैयारियों का जायजा लिया। यह उनके हिंदी प्रेम को दर्शाता है। सम्मेलन की पूर्व संध्या पर मॉरीशस गंगा आरती भी भव्य ढंग से हुई। विश्व हिंदी सचिवालय के महासचिव विनोद कुमार मिश्र के संपादन में महात्मा गांधी अंतरराष्ठ्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के सहयोग से प्रतिदिन 'हिंदी विश्व' नामक दैनिक समाचार बुलेटिन भी 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान निकाला गया। पहले दिन के बुलेटिन में प्रथम पृष्ठ पर अटल बिहारी वाजपेयी की तीन कविताएँ दी गई थीं। पहली ही कविता विश्व हिंदी सम्मेलन पर थी :

पोर्टलुई के घाट पर, नवपंडों की भीर
रोली, अक्षत, नारियल, सुरसरिता का नीर
सुरसरिता का नीर, लगा चंदन का घिस्सा
भैया जी ने औरों का भी हड़पा हिस्सा
कह कैदी कविराय जयतु जय शिव सागर जी
जय भगवती जागरण, निरावरण जय नागर जी

इस कविता में अटल जी ने मॉरीशस की राजधानी पोर्टलुई में 28 से 30 अगस्त 1976 तक आयोजित दूसरे विश्व हिंदी सम्मेलन पर टिप्पणी की है। कवि ने निरावरण नागरी के खोखले जयनाद की ओर संकेत करते हुए नवपंडों के औपचारिक हिंदी प्रेम की खबर ली है। दूसरी कविता थी 'गूँजी हिंदी विश्व में' -

गूँजी हिंदी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार
राष्ट्रसंघ के मंच से हिंदी का जयकार
हिंदी का जयकार, हिंद हिंदी में बोला,
देख स्वभाषा प्रेम, विश्व अचरज से डोला
कह कैदी कविराय, मेम की माया टूटी
भारत माता धन्य, स्नेह की सरिता फूटी

तीसरी कविता थी : अपने घर में दासी जिसमें अटलजी ने हिंदी को विश्व भाषा बनाने के संकल्प पर टिप्पणी की है :

बनने चली विश्व भाषा जो, अपने घर में दासी
सिंहासन पर अंगरेजी है, लखकर दुनिया हांसी
लखकर दुनिया हांसी, हिंदीदाँ बनते चपरासी
अफसर सारे अँग्रेजीमय अवधी हों, मद्रासी
कह कैदीकवि राय, विश्व की चिंता छोड़ो
पहले घर में अंगरेजी के गढ़ को तोड़ो

11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के उपलक्ष्य में मॉरीशस के महात्मा गांधी संस्थान में पाणिनि भाषा प्रयोगशाला का उद्घाटन भी किया गया। पाणिनि भाषा प्रयोगशाला में कंप्यूटरों के साथ-साथ अन्य संसाधन और अधुनातम साफ्टवेयर भारत सरकार ने उपलब्ध कराए हैं जिसके द्वारा प्राथमिक, माध्यमिक तथा उच्च शिक्षा लेनेवाले विद्यार्थियों को शिक्षण की नवीन प्रविधियों के माध्यम से भाषा अधिगम के कौशल को सुगम व वैज्ञानिक तरीके से सिखाया जा सकेगा। इसे भी 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन की एक उपलब्धि मानना चाहिए। 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन के स्थल का नाम गोस्वामी तुलसीदास नगर रखा गया था। भारत और मॉरीशस के सभी बड़े हिंदी लेखकों को सम्मेलन में अनोखे ढंग से सम्मान दिया गया। मुख्य सभागार का नाम अभिमन्यु अनत सभागार रखा गया था। समानांतर सत्रों के स्थलों के नाम महावीर प्रसाद द्विवेदी, गोपाल दास नीरज और मणिलाल डाक्टर के नाम पर रखे गए थे। प्रदर्शनी स्थल को रायकृष्णदास का नाम दिया गया था। भरसक प्रयास किया गया था कि हिंदी के सभी बड़े लेखकों को सम्मान मिल सके। 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में विश्वभर के 38 हिंदीसेवियों और दो संस्थाओं को विश्व हिंदी सम्मान से अलंकृत किया गया। कहने का आशय यह है कि विश्व हिंदी सम्मेलनों को सिर्फ संदेह की निगाह से देखने की बनिस्पद अब तक के कार्यों की समीक्षा श्रेयस्कर है।


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