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कविता

इलाहाबाद
नीरज पांडेय


इतना भरतू है इलाहाबाद
कि जरा सी थुलथुली थाप पर भी
टन्न टन्न करता है
इस कदर
नशे की तरह चढ़ा रहता है
कि किसी भी शहर की अचार खटाई चाटते रहो
कोई असर नहीं होता
खटिया इलाहाबाद के किसी मुहल्ले के
आसमान में उड़ती रहती है

जिसे इलाहाबाद की सुबह ने डंक मारा हो
यहाँ की दोपहर ने तनेन किया हो
शामों ने जीना सिखाया हो
रातों ने सपने दिखाए हों
उस पर किसी शहर
की नजर का
कोई असर
नहीं होता

जिया जाता है इलाहाबाद
नहीं जीने पर
झगड़ा करने आ जाती हैं
इलाहाबादी
शामें और रातें!


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