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कविता

वह मसीहा बन गया है
तुषार धवल


हत्या के दाग
अब उस तरह काबिज़ नहीं हैं उसके चेहरे पर
उनके सायों को अपनी दमक में
वह धुँधला चुका है
उसकी चमक में
पगी हुई हैं भक्तित उन्वानों की
आकुल कतारें
उसकी दमक में चले आ रहे सम्मोहित लोगों की
भीड़ से उठते
वशीभूत नारे
आकंठ उन्मत्त
स्तुतियों की दीर्घजीवी संतानों का मलयगान
उसकी धरती पर बरस रहा है
काली बरसात के मेंढकों के मदनोत्सव पर
किसी नवयौवना की अंगभूत कसक
उसका वसंत रचती हुई
मादक कल्प में अवतरित हुई थी
ताकत की बेलगाम हवस के माथे चढ़कर

वह रचयिता है नए धर्मों का धर्मग्रंथों का
उसकी कमीज़ में फिट होते फ़लसफ़ों का
सृष्टि का नियामक वह सत्ता का

एक परोसा हुआ संकट
खुद को हल करता हुआ
नए चुस्त फॅार्मूलों से
ब्रैंड के पुष्पक विमान से
दुनिया लाँघता फूल बरसाता यहाँ आ चुका है...

अब वह मुझमें है
तुममें है
हमसे अलग कहीं नहीं
वह विजेता है नई सदी का
गरीबों का नाम जपता
उनकी लाशों पर पनपता
मसीहा है वह
मरणशील नक्षत्रों का
जहाँ हम जीवित हैं
जीते नहीं।


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