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कविता

ओ व्यापारी
संध्या नवोदिता


ओ व्यापारी देखो...
मेरा मन तुम ले तो गए हो
उसे हाट में बेच न आना

महँगा होगा, माँग भी होगी
पैसे की बरसात भी होगी
लेकिन थोड़ा नेह निभाना...

पास तुम्हारे समय नही है
पास हमारे धैर्य नही है
मन का सौदा, खोट न करना
इसे हमेशा जतन से रखना
लौट के आना, हमें बुलाना...

हाट कोई घर-बार नही है
वहाँ कीमती प्यार नही है
वहाँ के नियमों को हम न जानें
वो बेहिस उसूल भला क्यों मानें
तुमको दिया जो, तुम से लेंगे

देखो अपनी बात निभाना...


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हिंदी समय में संध्या नवोदिता की रचनाएँ