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कविता

जब घर बाहर जाएगा
संध्या नवोदिता


मैं ऐसे सोचती थी
कि घर कभी खाली नहीं होते
मैं सोचती थी
कि जब आप नींद से भरे
लुढ़कने लगो
तो घर आपको बाँहों में थाम बिस्तर तक ले ही जाएगा
जब रात में दो बजे भूख लगेगी
तो घर पराठे बनाएगा, प्यार से खिलाएगा
जब माँ की याद आएगी
तो घर कंधा देगा, साथ में आँसू बहाएगा
जब ज़रूरत नहीं भी होगी नए पर्दों और कुशन की
घर खुशियाँ बोएगा मुस्कान उगाएगा
घर हरारत बन जाएगा सर्दियों में
कंबल ओढ़ाएगा
रात भर दबाएगा दर्द से बोझिल कमर
ज़रा सी छींक आएगी
तुलसी अदरक लाएगा
काढ़ा पिलाएगा
फल और दूध देगा मेवे से भरकर
लहसुन पसंद नहीं फिर भी लड़कर खिलाएगा
घर मेहमानों को बुलाएगा मनुहार से
प्यारा मेजबान बन जाएगा
चिली पनीर पकाएगा, पूड़ियाँ छानेगा
एक पुरानी सी बाइक पर घर घूमेगा शहर भर
लड़ेगा, भिड़ेगा, नाराज़ होकर जाएगा बाहर
कंधे पर टँगे खाकी पिट्ठू में चॉकलेट लेकर वापस आएगा
एक दिन बातें करते करते घर
हमेशा के लिए घर से बाहर चला जाएगा
और मैं सोचती रहूँगी
घर कभी खाली नहीं होते
एक दिन नींद आएगी और आप कभी सोएँगे ही नहीं
घर कभी अकेले नहीं जाएगा।


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