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सिनेमा

हिंदी सिनेमा में दक्षिण भारतीय भाषाओं का साहित्य
प्रियंका


इस बात पर आम सहमति रही है कि हिंदी सिनेमा ने हिंदी भाषा के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत के सभी हिस्सों में हिंदी सिनेमा को पसंद करने वाले लोग हैं। दक्षिण भारत में भी हिंदी सिनेमा के दर्शकों की बड़ी संख्या है। यह कहा जा सकता है कि हिंदी फिल्में पूरे भारत की साझी विरासत हैं। हिंदी सिनेमा की इस व्यापकता के कारण, इस पहलू पर विचार करना जरूरी लगता है कि क्या विषय वस्तु के चयन में हिंदी फिल्मकार हिंदी सिनेमा की इस व्यापकता का ध्यान रखते हैं? क्या हिंदी फिल्में भारत की क्षेत्रीय व अन्य विविधताओं को उचित जगह दे पाती हैं? क्या हिंदी सिनेमा यह दावा कर सकता है कि वह संपूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करता है?

इन पहलुओं पर विचार करते हुए एकदम से निराश तो नहीं होना पड़ता, लेकिन बहुत अधिक उत्साहजनक निष्कर्ष भी नहीं मिलते हैं। उदाहरण के लिए पूर्वोत्तर भारत हिंदी सिनेमा की मुख्य धारा से लगभग गायब है। दक्षिण भारतीय समाज और संस्कृति का प्रतिनिधित्व भी हिंदी सिनेमा में बहुत उल्लेखनीय नहीं है। व्यावसायिक हिंदी सिनेमा में इस तरह के समाज और संस्कृति का जो रूप सामने आता है, वह उस समाज को सूक्ष्मता से दिखा पाने में लगभग असफल होता है। कुछ गंभीर फिल्मकारों ने क्षेत्रीय विविधताओं को अपना विषय बनाने की कोशिश जरूर की है लेकिन ऐसे प्रयास पर्याप्त संख्या में नहीं हुए हैं।

व्यावसायिक दबाव से बहुत हद तक मुक्त होने के कारण विभिन्न भाषाओं के साहित्य को समाज का अधिक प्रामाणिक दस्तावेज समझा जाता है। इसलिए साहित्यिक कृतियों पर बनने वाले सिनेमा का विशेष महत्व होता है। हालाँकि ऐसी फिल्मों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, लेकिन हिंदी फिल्मकारों ने हिंदी साहित्य के अतिरिक्त कुछ अहिंदी भाषी साहित्यिक कृतियों को आधार बनाकर कुछ बहुत उल्लेखनीय फिल्में बनाई हैं। ऐसी फिल्में प्रायः मूल भाषायी समाज का प्रतिनिधित्व कर पाने में अधिक सफल रही हैं।

इस आलेख में इस बात पर विचार किया जाना है कि दक्षिण भारतीय साहित्य को हिंदी फिल्मकारों ने कितनी तरजीह दी है। यह सच है कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के साहित्य के हिंदी अनुवाद बहुत अपर्याप्त हैं, लेकिन उससे भी चिंताजनक दक्षिण भारतीय साहित्य के प्रति हिंदी फिल्मकारों की उदासीनता है। तेलुगु, तमिल, मलयालम, कन्नड़ भाषाओं की साहित्यिक कृतियों पर इन भाषाओं की कुछ उम्दा फिल्में जरूर बनी हैं, लेकिन इन भाषाओं के साहित्य पर हिंदी फिल्में नहीं के बराबर बनी हैं।

टी.आर. सुब्बाराव के 1952 में प्रकाशित कन्नड़ उपन्यास 'हंसा गीते' को आधार बनाकर 1956 में राजा नवाथे ने अपने निर्देशन में 'बसंत बहार' नामक फिल्म बनाई। मूल उपन्यास का कथानक कर्नाटक के अठारहवीं शताब्दी के एक संगीतकार भैरवी वेंकट सुब्बैय्या के जीवन पर आधारित है। यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि इसी कथानक को आधार बनाकर हिंदी में बनी फिल्म के दो दशक बाद 1975 में, जी.वी. अय्यर के निर्देशन में कन्नड़ में मूल उपन्यास के शीर्षक से ही एक फिल्म बनी।

1977 में गिरीश कर्नाड और वी.बी. कारंथ के निर्देशन में एक फिल्म आई थी 'गोधूलि'। यह फिल्म एस.एल. भर्यप्पा के कन्नड़ उपन्यास 'तबाली नीनाड़े मगाने' पर आधारित है। यह फिल्म इस रूप में भी उल्लेखनीय है कि यह हिंदी और कन्नड़ दोनों भाषाओं में प्रदर्शित की गई थी। इसे हिंदी में 'गोधूलि' और कन्नड़ में मूल उपन्यास के ही नाम 'तबाली नीनाड़े मगाने' के साथ प्रदर्शित किया गया था। महत्वपूर्ण फिल्मों को एकाधिक भाषाओं में प्रदर्शित करने की परंपरा को यदि फलने फूलने का अवसर मिलता तो भारतीय दर्शकों को इसका बहुत अधिक लाभ मिलता।

टी.आर. सुब्बाराव के कन्नड़ में लिखे तीन उपन्यासों 'नाग्रहवाहू', 'ओंनु गाडू इरादु हेनु' और 'सर्प मथ्सरा' को आधार बनाकर 1974 में फिल्म 'जहरीला इंसान' प्रदर्शित की गई। वास्तव में पुत्तन्ना कनगल निर्देशित यह फिल्म, 1972 में उन्हीं के निर्देशन में इन्हीं उपन्यासों पर आधारित कन्नड़ फिल्म 'नाग्रहवाहू' का हिंदी रीमिक्स थी। यह फिल्म बहुत उल्लेखनीय तो नहीं है, लेकिन अहिंदी साहित्य को आधार बनाकर बनाई गई फिल्म के हिंदी रीमेक के सकारात्मक प्रयोग के कारण यह ध्यान खींचती है।

तक्षी शिवशंकर पिल्लई के मलयालम भाषा के उपन्यास 'चिरुथा' को आधार बनाकर इसी नाम से 1980 में एक हिंदी फिल्म तनवीर अहमद के निर्देशन में प्रदर्शित हुई। यह फिल्म विषयवस्तु से लेकर फिल्मांकन और अभिनय तक में उम्दा कही जा सकती है। प्रेम, त्याग और अन्य भावनाओं को यह फिल्म बहुत ही सूक्ष्मता से प्रस्तुत करती है।

प्रतिष्ठित कन्नड़ साहित्यकार यू.आर. अनंतमूर्ति की कृति 'घटश्राद्ध' पर अरुण कौल ने 'दीक्षा' नाम से 1991 में बेहद उम्दा हिंदी फिल्म बनाई। जातीय सामंती संस्कार में जकड़े कन्नड़ ब्राह्मण समाज के खोखले अहंकार और दुर्गति को इस फिल्म में बेहद सूक्ष्मता के साथ चित्रित किया गया है। यहाँ इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि यू.आर. अनंतमूर्ति के बहुचर्चित उपन्यास 'संस्कार' पर कन्नड़ में तो फिल्म बनीं लेकिन हिंदी में नहीं बनी। इससे हिंदी फिल्मकारों की इस दिशा में उदासीनता का परिचय मिलता है।

गिरीश कर्नाड के मूल कन्नड़ में लिखे नाटक 'अग्नि मत्तू माले' को आधार बनाकर 2002 में अर्जुन सजनानी ने 'अग्निवर्षा' नामक फिल्म बनाई। गिरीश कर्नाड का यह नाटक मूल रूप से महाभारत की पौराणिक कथा पर आधारित है। कला, शुचिता, धर्म, पाखंड, प्रेम, ईर्ष्या, वर्चस्व, स्त्री जैसे विभिन्न मुद्दों को छूने वाली यह फिल्म दर्शकों पर खासा प्रभाव छोड़ती है।

रामगोपाल वर्मा के निर्देशन में बनी फिल्म 'फूँक' 2008 में प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म की कहानी वैसे तो मिलिंद गडगकर ने लिखी है, लेकिन इस कहानी पर यांदमुरी वीरेंद्र नाथ के तेलुगु उपन्यास 'तुलसी दलम' का बहुत अधिक प्रभाव माना गया है। इस अर्थ में इस फिल्म का उल्लेख किया जा सकता है।

संभव है कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के साहित्य पर कुछ और भी हिंदी फिल्में बनी हों, जिनकी जानकारी मुझे उपलब्ध नहीं हो सकी हो, लेकिन इतना तय है कि ऐसी फिल्मों की संख्या बहुत अपर्याप्त है। कन्नड़ साहित्य पर बनी कुछ हिंदी फिल्में मिल जाती हैं, मलयालम साहित्य परकम से एक हिंदी फिल्म 'चिरुथा' ज्ञात है लेकिन दक्षिण भारत की अन्य प्रमुख भाषाएँ तेलुगू और तमिल साहित्य पर आधारित हिंदी फिल्में नहीं मिलती।

वास्तव में दक्षिण भारतीय साहित्य और हिंदी सिनेमा और इसी तरह हिंदी साहित्य और दक्षिण भारतीय सिनेमा के बीच आदान-प्रदान का रिश्ता कभी ढंग से पनपा ही नहीं! जबकि ऐसा होता तो यह बहुत ही सकारात्मक परिणाम देने वाला साबित होता। हिंदी सिनेमा में प्रतिभाशाली दक्षिण भारतीय फिल्मकार जरूर हुए, लेकिन उन लोगों ने अपनी मातृभाषा के साहित्य को सिनेमा का विषय प्रायः नहीं बनाया। विभिन्न मातृभाषाओं के फिल्मकार यदि अपनी मातृभाषाओं के साहित्य पर आधारित हिंदी फिल्में बनाएँ तो इससे न सिर्फ हिंदी फिल्मों के दर्शक समृद्ध होंगे बल्कि हिंदी सिनेमा को भारत की सामासिक संस्कृति के प्रतिनिधि सिनेमा के रूप में विकसित होने में पर्याप्त मदद मिलेगी। यह दक्षिण भारत और उत्तर भारत की दूरियों को कम कर इन्हें संपर्क भाषा हिंदी के सहारे एक सूत्र में बांधने वाला भी साबित होगा।

संदर्भ

[1.] Gulzar, Govind Nihlani, Saibal chatterjee (Editorial Board) : Encyclopaedia of Hindi Cinema : Edition-2003 : Encyclopaedia Britannica India Pvt. Ltd., New Delhi & Popular Prakashan Pvt. Ltd., Mumbai

[2.] मृत्युंजय (संपादक) : सिनेमा के सौ बरस : तृतीय संस्करण-2011 : शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली-110032


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